Janmashtami

Janmashtami 2025 Date: जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व Janmashtami: हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण दिवस, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति व आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से बाल गोपाल प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। तो आइए जानते हैं जन्माष्टमी 2025 की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और इससे जुड़े महत्वपूर्ण नियम: Janmashtami 2025 Date and auspicious time:जन्माष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल जन्माष्टमी Janmashtami का पर्व 16 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि का आरंभ: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 15 अगस्त को देर रात 11 बजकर 48 मिनट पर आरंभ होगी। अष्टमी तिथि का अंत: अष्टमी तिथि का समापन 16 अगस्त को रात 09 बजकर 35 मिनट पर होगा। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, इसलिए उनका जन्मोत्सव मध्य रात्रि में ही मनाया जाता है। पूजा का शुभ मुहूर्त: जन्माष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त 16 अगस्त को रात्रि 12:05 से लेकर 12:45 तक रहेगा। निशिता मुहूर्त भी रात 12 बजकर 04 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तक है। शुभ योग: इस साल जन्माष्टमी के दिन सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। Janmashtami Ka Dharmik Mahetwa: जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगरी में राजकुमारी देवकी और उनके पति वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल के रूप में उनकी मूर्ति का पूजन करना शुभ होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति कृष्णजन्माष्टमी Janmashtami का व्रत रखकर पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण की आराधना करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को अक्षय पुण्य (कभी न खत्म होने वाला पुण्य) प्राप्त होता है। इस दिन लोग भजन-कीर्तन करते हैं और मंदिरों को विशेष तौर पर सजाया जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दिन दही हांडी का आयोजन भी किया जाता है, जो भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं का प्रतीक है। Janmashtami Vrat ke Niyam or Puja Vidhi: जन्माष्टमी व्रत के नियम और पूजा विधि जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत शुभ व फलदायी माना गया है, और इसका पालन नियम पूर्वक करना चाहिए। Janmashtami Vrat Kaise Kare: जन्माष्टमी व्रत कैसे करें 1. व्रत का संकल्प: जन्माष्टमी Janmashtami के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. बाल गोपाल का श्रृंगार: इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विधिवत श्रृंगार करें। 3. मध्य रात्रि पूजा: आधी रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा करें। 4. भोग और आरती: भगवान श्रीकृष्ण को मखाने, मिश्री, मक्खन और तुलसी दल का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारें। 5. प्रसाद वितरण और व्रत पारण: परिवारजनों में प्रसाद को वितरित करें और फिर व्रत का पारण करें।     कुछ भक्त व्रत रात 12 बजे तक करते हैं, जबकि कुछ अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं। Krishna Janmashtami Vrat Ke Mahetwa Purn Niyam: कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के महत्वपूर्ण नियम ब्रह्मचर्य का पालन: व्रती को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। अन्न वर्जित: इस दिन अन्न ग्रहण करने की मनाही होती है। दिन में सोना मना: व्रत रखने वालों को दिन में नहीं सोना चाहिए। वाद-विवाद से दूर: इस दिन वाद-विवाद से दूर रहना चाहिए और अपशब्द नहीं बोलने चाहिए। गौ सेवा: इस दिन गौ सेवा करना अत्यंत शुभ माना गया है। दान: व्रत करने वालों को अन्न, धन व वस्त्र का दान करना चाहिए। जन्माष्टमी का पावन पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए!

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Kali Jayanti

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती 2025: माँ काली के पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास (पूर्णिमा भाद्रपद माह) की कृष्ण अष्टमी के दिन मनाई जाती है। देवी काली दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या हैं और काली कुल से संबंधित हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, देवी महाकाली के विभिन्न सौम्य और उग्र रूपों को दस महाविद्याओं के रूप में जाना जाता है। देवी महाकाली भगवान शिव के महाकाल रूप की शक्ति हैं। ब्रह्मनील तंत्र में मिले वर्णन के अनुसार, देवी काली दो रूपों में विद्यमान हैं, लाल और काली। काले रंग की काली को दक्षिणा और लाल रंग की काली को सुंदरी कहा जाता है। देवी का रंग काजल के समान काला होने के कारण, वे काली के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुईं। Kali Jayanti tithi:काली जयन्ती तिथि काली जयन्ती शुक्रवार, अगस्त 15, 2025 कोनिशिता पूजा समय – 12:04 AM से 12:47 AM अगस्त 16अवधि – 00 घण्टे 43 मिनट्स अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 15, 2025 को 11:49 PM बजेअष्टमी तिथि समाप्त – अगस्त 16, 2025 को 09:34 PM बजे

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श्री हयग्रीव (हयग्रीव) स्तोत्रम् – Hayagriva

हयग्रीव अवतार का वर्णन 1. स्कन्द पुराण (Skanda Purana) स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है कि जब मधु और कैटभ नामक दो असुर वेदों को चुरा कर पाताल में ले गए, तब ब्रह्माजी चिंतित हुए और भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों की रक्षा की। ❝हयग्रीव रूपं कृत्वा वेदान्स्तान्पुनराहृतान्।❞(स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड)➤ अर्थात: विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों को असुरों से वापस लाया। श्री हयग्रीव की पौराणिक कथा प्राचीन ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, जब प्रलय काल आया, तब समस्त सृष्टि अंधकार में डूब गई। चारों ओर विनाश, जल और अज्ञान का साम्राज्य फैल गया। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने अनिरुद्ध रूप में योगनिद्रा में जल पर विश्राम किया और सृष्टि के पुनर्निर्माण का चिंतन किया। ब्रह्मा की उत्पत्ति और वेदों की चोरी विष्णु जी की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। उन्होंने सृष्टि रचने के लिए चार वेदों (ऋग, यजुर, साम और अथर्व) की रचना की।लेकिन तभी कमल के नीचे की दो जल बूंदें दो असुरों — मधु और कैटभ में परिवर्तित हो गईं। वे पाताल लोक से होते हुए कमल के तने में घुस आए और चारों वेदों को चुरा कर ले गए। शोकाकुल ब्रह्मा जी ने श्रीविष्णु से सहायता मांगी। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया — एक अद्वितीय रूप जिसमें शरीर मानव का और मुख घोड़े का था। हयग्रीव अवतार का कार्य श्री हयग्रीव की कथा श्री हयग्रीव ज्ञान के देवता हैं। हय का अर्थ है घोड़ा और ग्रीव का अर्थ है गर्दन। श्री हयग्रीव भगवान विष्णु के अवतार हैं। श्री हयग्रीव परम वासुदेव के अवतार हैं, जिन्होंने प्रलय (विनाश) के दौरान यह रूप धारण किया था, और प्रकृति के सभी स्रोत अंधकार में डूबे हुए थे। मनुष्य और जीव भी अंधकार के भंवर में फँस गए और कष्ट सहने लगे। भगवान विष्णु ने अनिरुद्ध के रूप में अवतार लिया और घूमते हुए जल पर योग निद्रा में विश्राम किया। उन्होंने अंधकार की गहराइयों से जीवन को बचाने और एक नई दुनिया बनाने के तरीके पर चिंतन किया। फिर उन्होंने अपनी नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्म देव की रचना की और उन्हें चारों वेदों के साथ-साथ सृष्टि के जटिल विवरणों की शिक्षा दी। ब्रह्मा की रचना से पहले, कमल के फूल के नीचे पत्ते पर पानी की दो बूँदें थीं। वे दो बूँदें दो असुर बन गईं – मधु और कैटभ, जो तने के माध्यम से कमल के फूल में प्रवेश कर गए। ब्रह्मा ने चार सुंदर बालकों के रूप में चार वेदों की रचना पूरी की ही थी कि असुरों ने उन शिशुओं को छीन लिया और पाताल लोक भाग गए। शोकाकुल ब्रह्मा विष्णु के अवतार श्री हयग्रीव के पास गए, जिन्होंने तब आंशिक रूप से मानव और आंशिक रूप से अश्व अवतार धारण किया था। उन्होंने वेदों को पुनः प्राप्त किया और वेदों के माध्यम से ब्रह्मा देव को सृष्टि के रहस्यों का पुनः ज्ञान दिया। एक अन्य किंवदंती के अनुसार भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप में वेदों की रचना की थी और यह अवतार उनके मत्स्य अवतार से पहले का है। श्री हयग्रीव स्तोत्रम् 1) श्रीमान् वेङकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी। वेदान्त्वर्यो मे सन्निधत्तं सदा हृदि ॥ ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्। आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवम् उपस्महे ॥ ॥ श्रीमन् वेंकटनार्थये कविताकिर्ककेसरी वेदांताचार्यवर्यो मे सन्निधातम सदा ह्रदि | ज्ञानानन्द मयाम् देवम् निर्मलस्पथिकाकृतिम | अधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवं उपासमहे || 1 || ज्ञान के साकार स्वरूप, परम पुरुष श्री हयग्रीव का ध्यान करो। श्री हयग्रीव ज्ञान और आनंद के समन्वित स्वरूप हैं। जिनका मुख और गर्दन अश्व के समान है और जिनका शरीर शुद्ध श्वेत स्फटिक के समान दीप्तिमान और दीप्तिमान है, वे समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता हैं। वे समस्त ज्ञान के आदि देव हैं। 2) स्वतःसिद्धं शुद्धस्फटिकमणि भूभृतप्रतिभातं सुधासाध्रीचिभिर धुतिभिर अवदात्तत्रिभुवनम्। अनन्तैस्त्रयन्तैर् अनुविहित हेषा हलहलं सत्येशावद्यं ह्यवदं मादि मही महः ॥ 2॥ स्वतससिद्धं शुद्धस्फटिकमनि भूभृतप्रतिभातं सुधा साध्रिचिभिर धुतिभिर अवदातात्रिभुवनम् | अनन्तैस्त्रयन्तैर अनुविहिता हेषा हलाहलम् हताशेषावाद्यं हयवदान मीदि मही महः || 2 || अपने भक्तों के सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए अवतरित हुए तेजस्वी श्री हयग्रीव की महिमा का गान करो। उनकी शुभ छवि शुद्ध श्वेत स्फटिक के समान है। श्री हयग्रीव अपनी अमृतमयी श्वेत किरणों से तीनों लोकों को श्वेत और पवित्र बनाते हैं। वे तीनों लोकों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। उनके अश्व रूप से निकलने वाली हला हला ध्वनि एक हिनहिनाहट है जिसमें उपनिषदों का सार और उनके पैरों में अलंकरणों के स्वर समाहित हैं। वेदों में भी यह हिनहिनाहट निरंतर प्रतिध्वनित होती है। श्री हयग्रीव की हिनहिनाहट, ‘हष हला हलम’, अशुभता और पापों के साथ-साथ व्यक्ति के मार्ग की बाधाओं को भी दूर करती है। श्री हयग्रीव से प्रार्थना करें कि वे दुर्भाग्य को दूर करें और उनकी शुभ हिनहिनाहट सुनने की क्षमता प्राप्त करें जो सांसारिक कष्टों के लिए सुखदायक मरहम का काम करती है। 3) समाहारअस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्युहानां लावि वितिर्बोधजलधेः। कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं हृत्वंतर्ध्वन्तं ह्यवदं हेषा हलहलाः ॥ 3 ॥ समाहारस्सनाम प्रतिपदमृचं धाम यजुषां लयः प्रत्यूहनं लहरी वित्तिर्बोधजलधेः | कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वन्तं हयवदना हेषा हलाहलः || 3 || श्री हयग्रीव के दिव्य कंठ से निकलने वाली हला हला की ध्वनियाँ सामवेदों का संग्रह, ऋग्वेद का संक्षिप्त अर्थ और यजुर्वेद की वाणी का सार हैं। श्री हयग्रीव का स्वरूप ही मंत्रों का सार है क्योंकि वे उनमें समाहित हैं। हया हया ध्वनियाँ उन सभी बाधाओं का निवारण करती हैं जो किसी भी व्यक्ति को शुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में आती हैं। वे सच्चे ज्ञान के सागर से उठती अविरल लहरों के समान हैं। वे ज्ञान का दीप जलाती हैं और मोक्ष की ओर हमारे मार्ग को प्रकाशित करती हैं। हल हल ध्वनि की ध्वनियाँ ही वेदों के सत्य को विकृत करने वाले व्यर्थ के तर्कों से उत्पन्न आंतरिक अंधकार और भ्रम को दूर करती हैं। निर्दोष और कमजोर लोगों को उन समर्थकों के शोर से बचाया जाता है जो अपने भ्रामक मतों का समर्थन करते हैं। हिनहिनाहट की दिव्य ध्वनियाँ हमारी चेतना और सिद्धांतों की वास्तविक समझ को अवरुद्ध करने वाले काले बादलों को नष्ट करती हैं, और हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करती हैं। 4) प्राची संध्या काचिदन्तर निश्चयः प्रज्ञादृष्टेर्जन श्रीपूर्वा। वक्त्री वेदान भातु मे वाजि वक्त्रा वाशाख्य वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ 4 ॥ प्राची

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Shri Hayagriva Stotram – श्रीहयग्रीवस्तोत्रं

श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥ स्वतःसिद्धं शुद्धस्फटिकमणिभूभृत्प्रतिभटं सुधासध्रीचीभिः द्युतिभिरपतापतिभुवनम् । अनन्तैः त्रय्यन्तैरनुविदितहेषाहलहलं हताशेषावद्यं हयवदनमीडीमहि वहः ॥ व्याख्यानं इन्दिरामन्दिरोरस्कमिन्दादिसुरवन्दितम्- वन्दारुबृन्दमन्दारं वन्दे गोविन्दबालकम् ॥ १॥ कन्दर्पसंवराकारं बृन्दावनविभूषणम् । आनन्दकन्दजं नन्दनन्दनं वन्दिषीमहि ॥ प्रणिपत्य गुरूत्तंसं श्रीमद्वेदान्तदेशिकम् । हयग्रीवस्तवव्याख्यां कुर्वेऽहं तत्प्रसादतः ॥ इह खलु श्रीमान् वेदान्तदेशिकः, सम्यगुपासनविशेषवशीकृत हृदय पुण्डरीकमध्यमण्डनायित ताण्डवप्रचण्डतुरङ्गमुख मार्ताण्डमण्डलः, सकल पण्डितनिकुरुम्बमुक्तातपत्रितकीर्तिमण्डलः, सर्वतन्त्रस्वतन्त्रः, कवितार्किककेसरी, परमकारुणिकः,भगवत्मल्याणगुणगणानुसन्धानेन अनादिसंसार सञ्चितदौष्कर्श्य पाशबन्दीकृत प्राणिबृन्दं सन्तितारयिषुः, श्रीहयग्रीवमभिष्टोतुं प्रतिजानीते (स्वत) इति । स्वतस्सिद्धं – स्वप्रकाशम्, ननु सिद्धशब्दस्य भावार्थविहित कृत्प्रत्ययान्तत्वे स्वत इति पञ्चम्यर्थभूतहेत्वर्थविहित तसिल्प्रत्ययस्यानन्वयः स्यात् – सिद्धशब्दस्य प्रकाशमात्रार्थकत्वेन, स्वशब्दस्यापि “प्रकाशार्थकत्वेन तसिः पञ्चम्यर्थहेत्वर्थकत्वेन च प्रकाशाधीनप्रकाशार्थलाभात्, प्रकृते प्रकाशस्य नित्यत्वेन स्वात्मानं प्रति स्वस्य हेतुत्वासम्भवेन च तदसम्भवात्, कर्त्रर्थविहित कृतकृत्प्रत्ययान्तत्वे पूर्वोक्तरीत्या । स्वाधीन प्रकाशवत्त्वमर्थस्स्यात्। तथा च स्वस्येव स्वप्रकाशस्यापि नित्यत्वेन पूर्वोक्त दूषणग्रासादिति चेत्, मैवम्। उभयधाऽपि दोषाभावात्। तथाहि। आद्यपक्षे-प्रकाशस्य स्वाधीनत्वे तात्पर्याभावात्। अन्यानधीनत्वे तात्पर्यात्, द्वितीयपक्षे- स्वाधीनप्रकाशवत्त्वे तात्पर्याभावात्, अन्यानधीनप्रकाशवत्त्वे तात्पर्यात्, उभयथापि मणि प्रकाशमण्यादि व्यावृत्तिसिद्धेः। स्वतः – स्वस्मात्, सिद्धं – सिद्धिः – ज्ञानं, प्रकाश स्वरूपं; सिद्धं ज्ञातं प्रकाशितं वा; स्वाधीन प्रकाशाभिन्नं अन्याधीन प्रकाशरहितं वेत्यर्थः। सार्वविभक्तिकतसिल् प्रत्ययान्तत्वे तु प्रथमार्ध वर्णनसम्भवेन स्वयं प्रकाशार्थलाभान्न कोऽपि दोषगन्धः। यद्वा – स्वतः – स्वस्मात्, सिद्धं – उत्पन्नं, कारणान्तरापादितोत्पत्ति शून्यमित्यर्थः। नित्यमिति यावत्। अथवा, नित्यत्वं नान्याधीनमित्यावा – (स्वत) इति। अनेन नित्यमुक्त दिव्यावृत्तिः, तेषां स्वरूप स्वभावस्थितिप्रवृत्तीनां भगवदायत्तत्वात्। ननु नित्यमुक्तस्वरूव स्वभावादीनामपि नित्यत्वात्कथं भगदायत्तत्वमिति चेन्न, नित्यानामपि तद्वतिरेक प्रसञ्जितव्यतिरेक प्रतियोगित्वरूप भगवदायत्तत्वसम्भवात्। तथा च श्रुतिः- “को ह्येवान्यात्म प्राण्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” इति – परमाणुगतपारिमाण्डल्यस्य नित्यत्वेऽप्याश्रयाधीनावस्थाया न्यायविद्भिरङ्गीकाराच्च। ननु सिद्धशब्दस्य नित्यपर्यायत्वं कथमिति चेदुच्यते – “सिद्दे शब्दार्थसम्बन्धे” इत्यत्र महाभाष्ये सिद्धशब्दस्य नित्यपर्यायत्वेन व्याख्यानात्। तथा हि। सिद्धशब्दस्य कः पदार्थः? नित्यपर्यायवाची सिद्धशब्दः कथं पुनः ज्ञायते? मत्कूट स्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते तद्वच्च सिद्धं। सिद्धा पृथिवी, सिद्ध माकाश मित्यलं बहुना। (शुद्धस्फटिकमणिभूभृत्प्रतिभट) मिति। शुद्धस्य – निर्मलस्य, स्फटिकमणिभूभृतः – स्फटिकमयपर्वतस्य, प्रतिभटं – ततोऽप्यतिशयित कान्तिमत्त्वेन तं तिरस्कुर्वन्तमित्यर्थः । सुधासध्रीचीभिः – अमृतसहचरीखिः, द्युतिभिः – कान्तिभिः, (अपतापत्रिभुवनम्) अपगतः तापः – आध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकादि समस्तदुःखात्मकस्तापो यस्मिन् तत्; त्रयाणां भुवनानां समाहार स्त्रिभुवनं, पात्रादित्वान्न जीप्। अपतापं त्रिभुवनं यस्य तथोक्तः; हयग्रीवकान्तयश्चन्द्रमण्डलमध्यवृत्तिसुधास हितास्सत्य स्त्रिलोकीसन्तापहारिण्यो भवन्ति। मण्डलस्थस्सुधांशोः “पुंसां कर्मानलार्तानां पापिनां क्लेशशान्तये, स्वदेतेन्दुस्समुद्रेण ह्लादयन्गोगणेनवे” त्यादिवचनात्। अनन्तैः- निरवधिकैः,त्रय्यन्तैः – वेदान्तैः, (अनुविहितहेषाहलहलम्), अनुविहितः – अनुसृतः, हेषा – हेषाभ्यो हलहलः, अश्वध्वनिविशेषो यस्य तथोक्तम्। यथोक्तं भागवते द्वितीय स्कन्धे ब्रह्मनारदसंवादे – “वाचो बभूवु रुशती श्वसतोऽस्य न स्त” इति। “तस्य ह वा तस्य महतो भूतस्य निश्वसित मेतदृग्वेद” इति श्रुतिः। (हताशेषावद्यं) हतानि – परिहृतानि, अशेषावद्यानि – नमस्तदोषाः, येन तत्तथोक्तम्। आश्रितानामिति शेषः। यद्वा – आश्रितापराधोपेक्षकत्वमत्र विवक्षिम्। “न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तये” त्युक्तेः। हतानि- अत्यन्तासंश्लिष्टानि, अशेषावद्यानि – समस्तहेयानि, यस्मिन् तथोक्तम्। निखिलहेयप्रत्यनीकत्वात्तत्र दोषा न सम्भवन्तीति भावः। तथा च श्रुतिः – “अपहतपाप्मा विरजो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसङ्कल्प” इति। हयवदनं – हयस्य वदनमिव वदनं यस्य तथोक्तम्, शाक पार्थिवादित्वान्मध्यमपदलोपी समासः। (मह) इति। परं ब्रह्म ज्योतिषा मपि ज्योतिरयं पुरुषस्स्वयञ्ज्योतिः। “तेजस्तेजस्विनामह” मित्याद्युक्तेः। ईडीमहि – स्तुवीमहि। (ईड- स्तुतौ लडात्मनेपदम्) नित्यत्व- तेजिष्ठत्व -सकलदोषापहारित्व- वेदप्रवक्तृत्व- निर्दोषत्वादिगुणकं श्रीहयग्रीवं स्तुम इत्यर्थः। स्वभावोक्तिरलङ्कारः। “स्वभावोक्तिरलङ्कारो यथावद्वस्तुवर्णन” मितिलक्षणात्। अत्र स्वातन्त्र्याभिमान निवृत्तये कर्तुरनुपादानम् । प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः प्रज्ञादृष्टे रञ्जनश्री रपूर्वा । वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ २॥ भगवन्तं स्तोतुं तदाविर्भावप्रार्थनया तमभिमुखीकरोति। प्राचीति। वासुदेवस्य – “सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः, तत स्स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यत” इत्याद्युक्तस्य परमात्मनः, वाजिवक्त्रा -हयवदना, वागीशाख्या – वागीशेति आख्या यस्या तथोक्ता; वेदान् -ऋग्यजुस्सामाधर्वणरूपान्, वक्त्री – व्यञ्जयन्ती, “ऋचस्सामानि जज्ञिरे छन्दाङ्ग्सि जज्ञिरे तस्मात्” इति, “प्रवक्ता छण्डसां वक्ता पञ्चरात्रस्य य स्स्वय”मित्यादिवचनात्। अत्र “न लोकाय निष्ठाखलर्थतृणा”मिति षष्ठीनिषेधः। अन्तर्निशायाः – अज्ञाननिशीथिन्याः, काचित्-विलक्षणा सन्ध्या, प्राची सन्ध्या – विभातसन्ध्या, अज्ञानान्धकार निवर्तिनीति यावत्। (प्रज्ञादृष्टेः) प्रज्ञा – तत्त्वहितपुरुषार्थविषयिणी धीः, सैव, दृष्टिः – ईक्षणं, तस्याः, अपूर्वा – प्रसिद्धा विलक्षणा, अञ्जनश्रीः – अञ्जनसम्पन्मूर्तिः, तनुः मे, भातु – स्फुरतु, भा -दीप्तौ लोट्। तादृशमूर्तिसाक्षात्कारे स्वस्याप्यज्ञाननिवृत्तिपूर्वक ज्ञानवृद्धिर्भूयादित्याशयः। रूपकालङ्कारः। “आरोप्यविषयस्य स्यादतिरोहितरूपिणः, उपरञ्जितमारोप्यमाणं तदूप्रकं मत” मिति लक्षणात् । ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥ ३॥ पूर्वस्मिन् श्लोके हयमुखसन्निधानं प्रार्थितम्। इदानीं सन्निहितं भगवन्तमुपास्मह इत्याह (ज्ञानानन्देति)। ज्ञानानन्दमयं – ज्ञानानन्दप्रचुरम्। “तत् प्रकृतवचने मयडिति प्राचुर्यार्थे मयट्। यद्वा – ज्ञानानन्दमयं – ज्ञानानन्दस्वरूपं, “स्वार्थे मयट्, प्राणमय इत्यादिवत्। “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् यदेष अकाश आनन्दो न स्या” दित्युक्तेः। (निर्मलस्फटिकाकृतिम्) निर्मलः- जाज्वल्यमानः, स्फटिकः – स्फटिकमणिः, तस्याकृतिरिवाकृतिर्यस्य तं; सर्वविद्यानां – सकलकलानाम्, आधारं – निलयं, “छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मे” त्युक्तेः। हयग्रीवं देवमुपास्महे – ध्यायामः, “आस- उपवेशने” । विशुद्धविज्ञान घनस्वरूपं विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम् । दयानिधिं देहभृतां शरण्यं देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥ ४॥ गुरुलघूपायभूतयोर्भक्ति प्रपत्त्योर्मध्ये प्रचरामीत्याह (विशुद्ध) मिति। अहं – दासभूतः, दयायाः निधिं – अक्षयस्थानं, तम्, अत एव देहभृतां – प्राणिनां, शरण्यं – रक्षकं, (विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपं) विशुद्धेन – निर्मलेन, विज्ञानेन, घनं – निबिडं, अन्तर्बहिर्ज्ञानमयमित्यर्थः। यद्वा, विज्ञानरूपो घनः -पिण्डः, तद्रूपमित्यर्थः। “विज्ञानघन एवे”ति श्रुतेः, स्वरूपं यस्य, तम्। (विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम्) विज्ञानस्य – ज्ञानयोगस्य, विश्राणने – वितरणे, बद्धा -धृता, दीक्षा – सङ्कल्पः, यस्य तम्। “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्, ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति त” इत्यादिवचनात्। हयग्रीवं, प्रपद्ये – शरणं यामि, “पद्ल् -गतौ” लडात्मनेपदम्। ज्ञानस्वरूपस्य ज्ञानप्रदस्य दयाळोः सर्वभूतशरण्यस्य शरणागता अस्मत्संरक्षणं कियदिति भावः । समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्यूहानां लहरिविततिर्बोधजलधेः । कथादृप्यत्कौतस्कुतकलह कोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदनहेषाहलहलः ॥ ५॥ भगवति हयास्ये भक्तिप्रपत्तिरूपोपायद्वयं विधाय,सम्प्रति चिकीर्षितस्तोत्रपरिसमाप्ति प्रतिबन्धकाज्ञानान्धकारनिवृत्तिं सर्वविघ्नोपशमाद्धयमुख हेषारवसकाशात् स्वस्य प्रार्थयते (समाहर) इति। साम्नां – सामशाखानां, समाहारः – सङ्घातः, तत्स्वरूपमिति यावत्। “प्रणवोद्गीथवचस” इत्युक्तेः। ऋक्साखानां, प्रतिपदं- तदर्थबोधकपर्यायपदं, यजुषां – तैत्तिरीयशाखानां, धाम – वासप्थानं, प्रत्यूहानां – विद्याप्रतिबन्धकविघ्नानां, लयः – ध्वंसः, बोधजलधेः – ज्ञानसागरस्य, लहरिविततिः – तरङ्गपरंवरा,(हयवदन हेषाहलहलः) हयवदनस्य – हयग्रीवस्य, हेषाख्यो हलहलः – अश्वध्वनिः, (कथादृप्यत्कौतस्कुतकलह कोलाहलभवम्) कथासु – वादकथासु, दृप्यन्तः कौतस्कुताः – कुतः कुत इति वादिनः, स “कस्कादित्वात्सः”, तेषां, कलहकोलाहलेन – अयथार्थवादकलहेन, भवः – जन्यः, अन्तर्द्वान्तम्, हरतु – निवर्तयतु, “हृञ्- हरणे”। हेषाहलहलस्य समाहाराद्यभेदोक्त्या भेदरूपकालङ्कारः । अपौरुषेयै रपि वाक्प्रपञ्चै रद्यापि ते भूतिमदृष्टपाराम् । स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव कारुण्यतो नाथ ! कटाक्षणीयः ॥ ६॥ साक्षात्कृते भगवति विविध विचित्रानन्ताश्चर्य सनकसनन्दनादि ध्यानागोचर दिव्यस्वभावं दृष्ट्वाऽस्य भगवद्गुणानुवर्णने प्रयत्नः परिहसास्पद इत्यभिप्रेत्याह (अपौरुषेयै रिति)। हे नाथ – हे हयग्रीव, अद्यापि – इदानी मपि, अपौरुषेयैः – नित्यैः, “अनादिनिधना ह्येषा वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवे” त्याद्युक्तेः। वाक्प्रपञ्चैरपि – वेदजालैरपि, (अदृष्टपाराम्) अदृष्टं – प्रतिपादनाविषयीभूतं, पारम्-अवधिः, यस्या स्सा तथोक्ता “यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सहे” ति श्रुतेः । “नान्तोऽस्ति म दिव्यानां विभूतीनां परन्तपे” त्यादि स्मृतेश्च । भूतिं – गुणाद्यैश्वर्यं, स्तुवन् – वर्णयन्, अहं, मुग्धः – बालः, कृत्यसाध्ये यतमान इति यावत्; इति – हेतोः, त्वया, कारुण्यत एव – कृपावशादेव, न ह्यस्मदादिषु कटाक्षनिमित्तं किञ्चिदस्तीति भावः। कटाक्षणीयः – बालेष्वकिञ्चित्कुर्वत्स्वपि परमकारुणिकस्य पितुः करुणाकटाक्षः स्वाभाविक इति भावः । दाक्षिण्यरम्या गिरिशस्य मूर्तिर्देवी सरोजासनधर्मपत्नी । व्यासादयोऽपि व्यपदेश्यवाच स्स्फुरन्ति सर्वे तव शक्तिलेशैः ॥ ७॥ लोके ये विद्यादिकाः ते सर्वेऽपि भवदीयशक्त्यंशैः स्पृशन्तीत्याह (दाक्षिण्ये) ति । हे नाथ – हे हयग्रीव, गिरिशस्य – रुद्रस्य, (दाक्षिण्यरम्या) दाक्षिण्यीन – सुखप्रियवचनादिना, रम्या -मनोहरा, यद्वा, दाक्षिण्येन – विद्याप्रदान सामर्थ्वेन, रम्या – मनोज्ञा, मूर्तिः, सरोजासनस्य – चतुर्मुखस्य, धर्मपत्नी – सहधर्मचरी, देवी – सरस्वती, व्यपदेश्यवाचः – प्रसिद्ध ग्रन्थकर्तारो व्यासादयः, व्यासवाल्मीकिशुक पराशरादयोऽपि, सर्वे – पूर्वसमुदितव्यतिरिक्ताः, तव शक्तिलेशैः – विद्याशक्त्यंशैः, स्फुरन्ति – भान्ति। “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्त मनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाती” ति श्रुतेः।

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आनन्दस्तोत्रम्: Anandastotram

आनन्दस्तोत्रम्: Anandastotram श्रीकृष्णः परमानन्दो गोविन्दो नन्दनन्दनः । तमालश्यामलरुचिः शिखण्डकृतशेखरः ॥ १॥ पीतकौशेयवसनो मधुरस्मितशोभितः । कन्दर्पकोटिलावण्यो वृन्दारण्यमहोत्सवः ॥ २॥ वैजयन्तीस्फुरद्वक्षाः कक्षात्तलगुडोत्तमः । कुञ्जापितरतिर्गुञ्जापुञ्जमञ्जुलकण्ठकः ॥ ३॥ कर्णिकाराढ्यकर्णश्रीधृतिस्वर्णाभवर्णकः । मुरलीवादनपटुर्वल्लवीकुलवल्लभः ॥ ४॥ गान्धर्वाप्तिमहापर्वा राधाराधनपेशलः । इति श्रीकृष्णचन्द्रस्य नाम विंशतिसंज्ञितम् ॥ ५॥ आनन्दाख्यं महास्तोत्रं यः पठेच्छृणुयाच्च यः । स परं सौख्यमासाद्य कृष्णप्रेमसमन्वितः ॥ ६॥ सर्वलोकप्रियो भूत्वा सद्गुणावलिभूषितः । व्रजराजकुमारस्य सन्निकर्षमवाप्नुयात् ॥ ७॥ इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां श्रीमहानन्दाख्यस्तोत्रं समाप्तम् ।

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आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रम्: Anandachandrikastotram

आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रम्: Anandachandrikastotram श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ।ध्यानम् ।अङ्गश्यामलिमच्छटाभिरभितो मन्दीकृतेन्दीवरं जाड्यं जागुडरोचिषां विदधतं पट्टाम्बरस्य श्रिया ।वृन्दारण्यविलासिनं हृदि लसद्दामाभिरामोदरं राधास्कन्धनिवेशितोज्ज्वलभुजं ध्यायेम दामोदरम् ॥अथ श्रीराधिकाया आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रंश्रीराधिकायै नमः ।राधादामोदरप्रेष्ठा राधिका वार्षभानवी ।समस्तवल्लवीवृन्दधम्मिल्लोत्तंसमल्लिका ॥ १॥कृष्णप्रियावलीमुख्या गान्धर्वा ललितासखी ।विशाखासख्यसुखिनी हरिहृद्भृङ्गमञ्जरी ॥ २॥इमां वृन्दावनेश्वर्या दशनाममनोरमाम् ।आनन्दचन्द्रिकां नाम यो रहस्यां स्तुतिं पठेत् ॥ ३॥स क्लेशरहितो भूत्वा भूरिसौभाग्यभूषितः ।त्वरितं करुणापात्रं राधामाधवयोर्भवेत् ॥ ४॥इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रं समाप्तम् ।

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Aksharadhamadhipatilakshanavarnanam: अक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनम्

Aksharadhamadhipatilakshanavarnanam: अक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनम् पूर्वं त्वसाधारणलक्षणं यच्छ्रीस्वामिनारायणदिव्यमूर्तेः । पूर्वावतारान् सकलान् स्वमूर्ती सन्दर्शयेदुक्तमिदं हि लक्ष्म ॥ १॥ वैकुण्ठलोकादिषु दिव्यमूर्ती दिव्येऽद्भुतैश्वर्यसुखे च तासु । स्वकीयरूपे शतशो मनुष्यान् सन्दर्शयेच्चिह्नमिदं द्वितीयम् ॥ २॥ साधारणानपि तं समाधिं यः कारयित्वा मनसः प्रवृत्तिम् । संरोधयेत् स्वात्मनि तत्तृतीयं लक्ष्मोदितं ब्रह्मपुराधिपस्य ॥ ३॥ अन्यावतारैः श्रितमानवानां श्रेयस्कृतं वृत्तिनिरोधनं वा । सन्दर्शयेत्तद्वयमेव भक्तद्वारा हि तुर्यं प्रभुलक्षणं तत् ॥ ४॥ धाक्षरे स्वे बहुप्रकाशे मुक्तव्रजैः स्नेहभरेण सेव्याम् । सिंहासनस्थां रुचिरां स्वमूर्तिं सन्दर्शयेद् यादृशतादृशान्नृन् ॥ ५॥ तत्पञ्चमं लक्षणमत्र धार्मेः अथोच्यते चिह्नमिदं हि षष्ठम् । पूर्वागमे ज्ञानविरागभक्तिधर्मादिकं योगपथश्च साङ्ख्यम् । कुर्याद्ध तद्वर्णनमात्मयोगात् स्वैः कारयेत्तत्र चमत्कृतिश्च । पूर्वागमार्थादपि सौष्ठवार्थः प्रादुर्भवेच्छान्तिकरः सुधेव ॥ ६॥ स्वालोकमात्रेण सहस्रजीववृत्तेस्तु नैसर्गिकरोधनं स्यात् । स्वस्मिन् यथा चुम्बकमेति लोहं तत् सप्तमं चिह्नम् ॥ ७॥ अथाष्टमं च । कस्यापि नुः स्वाश्रयमात्रतोऽपि महाशिवं स्याद्धि तदन्तकाले । तमक्षरं नेतुमियात् स्वकीयैर्मुक्तैर्विमानैः सहितः स धार्मिः ॥ ८॥ निजे निदेशे शतशो मनुष्यान् ज्ञाने तथा त्यागयुते स्वधर्मे । संस्थापयेद् घोरकलौ युगेऽस्मिन् प्रोक्तं प्रभोस्तन्नवमं हि लक्ष्म ॥ ९॥ जनाः स्वसम्बन्धगवस्त्रपुष्पस्पर्शेक्षणाभ्यां समियुः समाधिम् । पश्येयुरैश्यं हरिमत्र धाम विनापि योगं दशमं च लक्ष्म ॥ १०॥ देशान्तरे कश्चन धार्मिमूर्तेर्वार्ता प्रकुर्यात् पुरतो नृणान्तम् । श्रुत्वा जनास्तेजसि लोकयेयुरेकादशं चिह्नमिदं हरेश्च ॥ ११॥ प्रधानजीवेश्वरकालमायामुक्ताक्षराणां पुरुषोत्तमस्य । पृथक् पृथग् लक्षणमेव कुर्यात् स्वयं स्वभक्तैरपि कारयेद्वा ॥ १२॥ सैश्वर्यरूपाणि पुनश्च तेषां प्रदर्शयेद्वा बहुशो जनांश्च । सर्वोत्तमस्वाक्षरधामभाजश्चिह्नं परं द्वादशमुक्तमेतत् ॥ १३॥ सन्दर्शयेत् पूर्वनिजावताराँल्लीनान् स्वमूर्ती शतशो मनुष्यान् । नो न तेषु स्वयमद्भुतं तत् त्रयोदशं धर्मसुतस्य लक्ष्म ॥ १४॥ इति श्रीअक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनं सम्पूर्णम् ।

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श्री अष्टाक्षरीध्यानम्: Shri Ashtaksharidhyanam

वेदान्तस्वद्रुमायस्तलपरिलसिताष्टाक्षराष्टच्छदाब्जे तिष्ठन् वामाङ्घ्रिणासावितरपदतलं वामतोऽग्रे निधाय । बिभ्रत् सर्वा विभूतीर्मणिगणविलसद्भूषणश्यामलश्रीः शब्दब्रह्मात्मवेणुं भुवनधृतिहरं नादयन् माधवोऽव्यात् ॥ १॥ इति श्री अष्टाक्षरीध्यानं सम्पूर्णम् ।

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Randhan Chhath

Randhan Chhath 2025 Date: कब है रांधन छठ, जाने शुभ मुहूर्त व तिथि

Randhan Chhath: रांधण छठ एक पारंपरिक गुजराती हिंदू त्योहार है, जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह अगले दिन आने वाले शीतला सतम के लिए भोजन पकाने से जुड़ा है। रांधण छठ गुजरात का पारंपरिक त्योहार है, जो रक्षाबंधन से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और अगले दिन यानी श्रावणी पूर्णिमा के लिए पकवान बनाकर पूजा हेतु तैयार करती हैं। 2025 में कब है रांधन छठ? पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान कृष्ण के जन्म से दो दिन पहले यानि षष्ठी तिथि पर उनके बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष षष्ठी को रांधन छठ या हल छठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियां अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं, और भगवान बलराम की पूजा करती हैं। Randhan Chhath 2025 Date: रांधण छठ 2025 का शुभ मुहूर्त व तिथि रांधण छठ – 14 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार (भाद्रपद, कृष्ण पक्ष, षष्ठी) Kya hai Randhan Chhath: क्या है रांधण छठ? रांधण छठ भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जिसे बलराम जयंती, हलछठ, या हर छठ के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने संतान की सुख-समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। विशेष रूप से यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिनका जन्म कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व हुआ था। Kyo manate hai Randhan Chhath: क्यों मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व भगवान बलराम के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। बलराम जी को हल और खेती का देवता माना गया है, इसलिए इस दिन विशेष रूप से कृषि संस्कृति, मातृत्व, और संरक्षण का सम्मान किया जाता है। साथ ही यह व्रत स्त्रियों द्वारा संतान सुख, उनकी भलाई व निरोगी जीवन के लिए रखा जाता है। रांधण छठ का महत्व: Randhan Chhath ka Mahetwa कहाँ और कौन से लोग मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व उत्तर भारत, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। खासकर वैष्णव परंपरा, गृहस्थ स्त्रियाँ, और कृषक परिवार इस पर्व को बड़ी आस्था से मनाते हैं। Randhan Chhath Per Kiski Puja Ki Jati Hai: रांधण छठ पर किसकी पूजा की जाती है? इस दिन भगवान बलराम, शीतला माता, और कभी-कभी अन्नपूर्णा देवी या गृह लक्ष्मी की पूजा की जाती है। बलराम जी को हल का प्रतीक माना जाता है, अतः उनकी पूजा में खेती-बाड़ी से जुड़े प्रतीकों का उपयोग होता है। Randhan Chhath Ke Din Puja Kaise Kare: रांधण छठ के दिन पूजा कैसे करें? रांधण छठ के धार्मिक अनुष्ठान Randhan Chhath Manane Ke Labh: रांधण छठ मनाने के लाभ Randhan Chhath Ke Din Kya Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या करना चाहिए? Randhan Chhath Ke Din Kya Nahi Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

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Sapne me Kua Dekhna: सपने में कुआं देखना शुभ होता है या अशुभ, जाने सच

सपने में कुआं देखना (Sapne Mein Kua Dekhna) – विस्तृत हिन्दी व्याख्या सपने में कुआं Kua देखना एक आम लेकिन महत्वपूर्ण सपना है, जिसे देखकर जागने के बाद कई प्रश्न मन में उठते हैं – क्या यह सपना शुभ है या अशुभ? स्वप्न शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर सपना किसी न किसी संकेत को दर्शाता है, जो आने वाले समय में होने वाली घटनाओं के बारे में इशारा करता है। सपने में कुआं देखने का सामान्य अर्थ (Swapan Shastra ke Anusar) विशेष परिस्थितियों में कुएं Kua का सपना क्या दर्शाता है: सपने में नदी देखना क्या संकेत देता है? जानिए इसका गहरा अर्थ कुएं Kua के प्रकार और उनके अर्थ: कुएं से संबंधित क्रियाएं और उनके अर्थ: धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व: आपके भावनात्मक अनुभव का महत्व: सपने के बाद क्या करें? विशेष सुझावयदि आपने सपना में कोई पहचाना हुआ कुआं देखा हो (जैसे बचपन का या गांव का Kua कुआं), तो यह अतीत से जुड़ा संकेत हो सकता है।अगर कुआं नई जगह या अनजाना हो, तो यह भविष्य के नए अनुभवों या अज्ञात चुनौतियों का संकेत देता है।

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AShTashlokI:अष्टश्लोकी

AShTashlokI:अष्टश्लोकी अकारार्थो विष्णुर्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्मकारार्थो जीवस्तदुपकरणं वैष्णवमिदम् ।उकारोऽनन्यर्हं नियमयति सम्बन्धमनयोःत्रयीसारस्त्र्यात्मा प्रणव इममर्थं समदिशत् ॥ १॥मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंसःस्वरूपङ्गतिःगम्यं शिक्षितमीक्षितेन पुरतःपश्चादपि स्थानतः ।स्वातन्रयं निजरक्षणं समुचिता वृत्तिश्च नान्योचितातस्यैवेति हरेर्विविच्य कथितं स्वस्यापि नार्हं ततः ॥ २॥अकारार्थायैवस्वमहमथ मह्यं न निवहाःनराणां नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।यमाहास्मै कालं सकलमपि सर्वत्र सकला-स्ववस्थास्वाविः स्युर्मम सहजकैङ्कर्यविधयः ॥ ३॥देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदं साधु विद्यात्तृतीयंस्वातन्त्र्यान्धो यदि स्यात्प्रथममितरशेषत्वधीश्चेद्द्वितीयम् ।आत्मत्राणोन्मुखश्चेन्नम इति च पदं बान्धवाभासलोलःशब्दं नारायणाख्यं विषयचपलधीश्चेच्चतुर्थीं प्रपन्नः ॥ ४॥नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनञ्चो-पायं कर्त्तव्यभागं त्वथ मिथुनपरं प्राप्यमेवं प्रसिद्धम् ।स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणं दशैतान्मन्तारं त्रायते चेत्यधिगतनियमः षट्पदोऽयं द्विखण्डः ॥ ५॥ईशानाञ्जगतामधीशदयितां नित्यानपायां श्रियंसंश्रित्याश्रयणोचिताखिलगुणस्याङ्घ्री हरेराश्रये ।इष्टोपायतया श्रिया च सहितायात्मेश्वरायार्थयेकर्तुं दास्यमशेषमप्रतिहतं नित्यं त्वहं निर्ममः ॥ ६॥मत्प्राप्त्यर्थतया मयोक्तमखिलं सन्त्यज्य धर्मं पुनःमामेकं मदवाप्तये शमणमित्यार्तोऽवसायं कुरु ।त्वामेकं व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णो ह्यहंमत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितं कुर्यां शुचं मा कृथाः ॥ ७॥निश्चित्य त्वदधीनतां मयि सदा कर्माद्युपायान् हरेकर्तुं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलं सीदामि दुःखाकुलः ।एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम पुनस्सर्वापराधक्षयंकर्तासीति दृढोऽस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन्सारथेः ॥ ८॥शाखानामुपरि स्थितेन मनुना मूलेन लब्धात्मकःसत्ताहेतुसकृज्जपेन सकलं कालं द्वयेन क्षिपन् ।वेदोत्तंसविहारसारथिदयागुम्फेन विस्त्रम्भितःसारज्ञो यदि कश्चिदस्ति भुवने नाथः स यूथस्य नः ॥ ९॥इति अष्टश्लोकी समाप्ता ॥

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Ashtamahishiyuta Krishna Stotram: अष्टमहिषीयुतकृष्णस्तोत्रम्

Ashtamahishiyuta Krishna Stotram: अष्टमहिषीयुतकृष्णस्तोत्रम् हृद्गुहाश्रितपक्षीन्द्रवल्गुवाक्यैः कृतस्तुते । तद्गरुत्कन्धरारूढ रुक्मिणीश नमोऽस्तु ते ॥ १॥ अत्युन्नत्याऽखिलैः स्तुत्य श्रुत्यन्तात्यन्तकीर्तित । सत्ययोजित सत्यात्मन् सत्यभामापते नमः ॥ २॥ जाम्बवत्याः कम्बुकण्ठालम्बिजृम्भिकराम्बुज । शम्भुत्र्यम्बकसम्भाव्यं साम्बतात नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ नीलाय विलसद्भूषाजालायोज्ज्वलमालिने । लोलालकोद्यत्फालाय कालिन्दीपतये नमः ॥ ४॥ जैत्रचित्रचरित्राय शात्रवानीकमृत्यवे । मित्रप्रकाशाय नमो मित्रविन्दाप्रियाय ते ॥ ५॥ बालानेत्रोत्सवानन्तलीलालावण्यमूर्तये । नीलाकान्ताय ते भक्तावालायाऽस्तु नमोनमः ॥ ६॥ भद्राय स्वजनाविद्यानिद्राविद्रावणाय वै । रुद्राणीभद्रमूलाय भद्राकान्ताय ते नमः ॥ ७॥ रक्षिताखिलविश्वाय शिक्षिताखिलरक्षसे । लक्षणापतये नित्यं भिक्षुश्लाघ्याय ते नमः ॥ ८॥ षोडशस्त्रीसहस्रेशं षोडशातीतमच्युतम् । ईडेत वादिराजोक्तप्रौढस्तोत्रेण सन्ततम् ॥ ९॥ इति श्रीमद्वादिराजयतिकृतं अष्टमहिषीयुतकृष्णस्त्रोत्रं सम्पूर्णम् । भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।

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