MANDIR

Bharat Mata Mandir

भारत माता मन्दिर (Bharat Mata Mandir) : हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

Bharat Mata Mandir : भारत माता मंदिर जिसे मदर इंडिया मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, हरिद्वार में सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह धार्मिक मंदिर भारत माता को समर्पित है, जो हिंदू धर्म की मातृभूमि “आर्यावर्त” का प्रतीक है और यह देशभक्त नागरिकों द्वारा पूजनीय भी है। इसकी जड़ें भारत के विभाजन से पहले की है। यह मंदिर अनेकता में एकता को दर्शाता है। इस भव्य मंदिर को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते है जो इस विशाल मंदिर को देखकर आश्चर्य चकित रहते है। मंदिर का इतिहास मंदिर की स्थापना स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि द्वारा की गई थी और इसका उद्घाटन 1983 में दिवंगत प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था। ‘स्वदेशी आंदोलन’ से प्रेरित होकर, अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को चार भुजाओं वाली हिंदू देवी के रूप में चित्रित किया था, जो केसरिया रंग के वस्त्र पहने, एक सफेद कपड़ा, एक किताब, एक मुट्ठी चावल और पवित्र माला धारण किए हुए थीं। भारत माता को शिक्षा, दीक्षा, अन्न और वस्त्र के दाता के रूप में दर्शाया गया। इस पेंटिंग में भारत माता को धूप वाले आसमान के नीचे हरी धरती पर खड़े हुए चित्रित किया गया है। Bharat Mata Mandir जिसमें मातृभूमि का वर्णन करने वाले सुंदर गीत हैं। इस प्रकार, भारत माता का यह चित्रण भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रभावशाली प्रतीक बन गया, जिसने लोगों के बीच राष्ट्रवादी भावनाओं को जगाया। मंदिर का महत्व आठ मंजिला भव्य भारत माता मंदिर की ऊंचाई 180 फुट की है। Bharat Mata Mandir भारत माता मंदिर के आठवें मंजिल से हिमालय, सप्त सरोवर और हरिद्वार के सुंदर दृश्यों को आसानी से देखा जा सकता है। Bharat Mata Mandir इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मन्दिर में केवल देवी देवताओ की ही मूर्तियाँ नहीं है बल्कि यहाँ पर भारत के स्वंत्रतता सेनानी , वीरांगनाये, संत-महात्मा, महापुरुष और महान नारी की भी प्रतिमाये आपको देखने को मिलेंगी। मंदिर की वास्तुकला भारत माता मंदिर अपने आप में एक अनूठी संरचना है, जिसमें ज़मीन पर भारत का एक प्रभावशाली और व्यापक मानचित्र है, जो ‘राष्ट्रमाता’ का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर का डिज़ाइन अद्वितीय है, जो भारत के अवतार का प्रतीक है और धार्मिक देवताओं, स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं का समान रूप से सम्मान करता है। भारत माता मंदिर आठ मंजिला ईमारत है। प्रथम तल भारत माता मंदिर मंदिर की पहली मंजिल केंद्रीय देवता, भारत माता को समर्पित है। यहां भारत माता की एक प्रतिमा स्थापित है। दूसरी मंजिल- शूर मंदिर दूसरी मंजिल, जिसे “शूर मंदिर” के नाम से जाना जाता है। यह उन बहादुर आत्माओं को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने देश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। तीसरी मंजिल – मातृ मंदिर तीसरी मंजिल पर, “मातृ मंदिर” भारत की प्रतिष्ठित महिलाओं जैसे जहां मीरा बाई, सावित्री और कुछ महान महिलाओं की मूर्तियां हैं। चौथी मंजिल – संत मंदिर चौथी मंजिल, जिसे “संत मंदिर” कहा जाता है, जैन धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म सहित विभिन्न धर्मों के महान संतों को प्रदर्शित करती है। Bharat Mata Mandir यह विभिन्न धर्मों के बीच एकता का प्रतीक है। पांचवीं मंजिल – असेंबली हॉल पांचवीं मंजिल पर असेंबली हॉल है, जिसकी दीवारें भगवान और महान पुरुषों की पेंटिंग से सजी हैं। छठी मंजिल – देवी शक्ति हिंदू धर्म की देवी शक्ति को समर्पित, छठी मंजिल देवी के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करती है, Bharat Mata Mandir जो स्त्री दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। सातवीं मंजिल – भगवान विष्णु के अवतार सातवीं मंजिल पर भगवान विष्णु के अवतारों को दर्शाया गया है। आठवीं मंजिल – भगवान शिव का मंदिर सबसे ऊपरी मंजिल पर हिंदू परंपरा के सर्वोच्च देवता भगवान शिव का मंदिर है। Bharat Mata Mandir का समय भारत माता मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भारत माता मंदिर में मिठाई, लड्डू, पेड़ा और पुष्प का भोग लगाया जाता है।

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Raghunath Temple

रघुनाथ मंदिर (Raghunath Temple) : ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान इसी मंदिर के तालाब में किया था स्नान। Raghunath Temple : हिमालय की तलहटी में स्थित ऋषिकेश एक पवित्र शहर है जो अपनी शांत प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिकता के लिए जाना जाता है। यह कई मंदिरों और आश्रमों का घर है जो प्रत्येक वर्ष हजारों पर्यटकों और भक्तों को आकर्षित करते हैं। ऋषिकेश में सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है रघुनाथ मंदिर। Raghunath Temple यह हिन्दू मंदिर ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट के समीप स्थित है। भगवान राम और उनकी पत्नी माता सीता को समर्पित यह मंदिर महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व रखता है। इस मंदिर के सामने एक छोटा सा कुंड भी है जिसे ऋषिकुंड कहते है। मंदिर के सामने प्रसिद्ध त्रिवेणी घाट भी है। ऐसा माना जाता है कि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों से मिलती है। मंदिर का इतिहास माना जाता है कि इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में टेहरी के शासक महाराजा प्रताप शाह ने कराया था। इसे ऋषिकेश के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है। मंदिर के समीप निर्मित ऋषि कुंड अद्भुत है। इस कुंड में यमुना का जल है। इस दिव्य कुंड का जल न तो बढ़ता है और न ही घटता है। ऐसी मान्यता है कि ऋषि कुब्ज की तपस्या से प्रसन्न होकर यमुना ने इस कुंड को जल से भर दिया था। तब से यह कुंड समान स्तर पर ही बना हुआ है। Raghunath Temple इसके बारे में पौराणिक कथा है कि ऋषि कुब्ज की माता को जल बहुत दूर से भरकर लाना पड़ता था। यह देख ऋषि कुब्ज इस कुंड के समीप बैठ गए और यमुना की तपस्या करने लगे। जिसके बाद यमुना ऋषि कुब्ज की तपस्या से प्रसन्न होकर इस कुंड में प्रकट हुईं और यह कुंड जल से भर इसका जल कभी भी गंदा नहीं होता है। मंदिर का महत्व ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम जो कि विष्णु जी के अवतार है वह इस स्थान पर आये थे। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान राम ने वनवास के दौरान इस तालाब में स्नान किया था। ऋषि कुब्ज ने भी इसी स्थान पर तपस्या की थी और यमुना नदी को यहां पर अवतरित होने के लिए कहा था। Raghunath Temple मंदिर के समक्ष एक छोटा जलाशय है जहां किंवदंतियों के अनुसार बताया जाता है कि यहीं पर यमुना नदी का पानी प्रकट हुआ था। इस मंदिर में भक्त अपनी परंपराओं के अनुसार प्रार्थना कर सकते हैं और अनुष्ठान भी कर सकते हैं। Raghunath Temple मंदिर में नियमित पूजा और आरती समारोह भी आयोजित होती रहती है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। मंदिर का वातावरण शांत रहता है जो ध्यान और आध्यात्मिक चिंतन के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला उत्तर और दक्षिण भारतीय शैलियों का मिश्रण है। मंदिर परिसर में एक गर्भगृह, एक बड़ा सभा कक्ष और अन्य देवताओं को समर्पित कई छोटे मंदिर भी शामिल हैं। मंदिर में मुख्य देवता भगवान राम हैं, उनके साथ उनकी पत्नी सीता और उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी विराजित हैं। Raghunath Temple भगवान राम की मूर्ति काले पत्थर से निर्मित है और सुंदर आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित है। Raghunath Temple मंदिर में भगवान शिव, हनुमान और गणेश जैसे अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं। रघुनाथ मंदिर की विशेषता है कि इसकी दीवारों और स्तंभों पर सुंदर और जटिल नक्काशी की गई है। इस नक्काशी में भगवान राम की महाकाव्य कहानी, रामायण के दृश्यों को दर्शाया गया है। मंदिर में विभिन्न प्रकार के फूलों और पौधों वाला एक सुंदर बगीचा भी है, जो इस जगह की सुंदरता और शांति को और बढ़ा देता है। रघुनाथ मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल भी है। Raghunath Temple : मंदिर का समय रघुनाथ मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद रघुनाथ मंदिर में भगवन को फल, फूल, मेवा, मिठाई, चना -चिरौंजी आदि का भोग लगाया जाता है।

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Kunjapuri Temple

कुंजापुरी मंदिर (Kunjapuri Temple) : ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत….

सती माता के केश इसी स्थान पर गिरे थे, जिस कारण यह शक्ति पीठ कहलाता है…. Kunjapuri Temple : उत्तराखंड के ऋषिकेश में टिहरी जनपद के हिडोलाखाल कस्बे के समीप एक शिखर पर स्थित है कुंजापुरी मंदिर। यह मंदिर समुद्र तल से 1676 मीटर की ऊंचाई पर है। यह मंदिर प्राचीन होने के साथ साथ सिद्ध पीठ के लिए भी जाना जाता है। इस मंदिर से गढ़वाल की हिमालयी चोटियों का सुन्दर दृश्य भी बहुत अच्छे से दिखाई देता है। जो भी भक्त यहाँ दर्शन करने आते हैं वह प्रकृति के मनमोहक दृश्य को देख कर भावविभोर हो जाते है। यह मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है। मंदिर का इतिहास शिवालिक रेंज में 13 शक्ति पीठों में से एक है कुंजापुरी मंदिर। Kunjapuri Temple साथ ही यह मंदिर जगदगुरु शंकराचार्य द्वारा टिहरी जिले में स्थापित तीन शक्ति पीठों में से भी एक है। इस जिले के दो अन्य शक्ति पीठो में से एक सुरकंडा देवी का मंदिर और दूसरा चन्द्रबदनी देवी का मंदिर हैं। कुंजापुरी, इन दोनों पीठों के साथ एक पवित्र त्रिकोण निर्मित करता हैं। कुंजापुरी मंदिर के इतिहास से जुडी पौराणिक कथा इस प्रकार है कि जब सती के पिता ने यज्ञ का आयोजन किया था तो उसमें सती के पति शिव जी को आमंत्रित नहीं किया। शिव जी को इस आयोजन में आमंत्रित नहीं करने पर और उनका अपमान किए जाने से सती नाराज हो गयी और उन्होंने उस आयोजित यज्ञ में अपनी आहुति दे दी। जब इस बात का पता भगवान भोलेनाथ को लगा तो वह बहुत दुखी हुए और क्रोध से भर गए। Kunjapuri Temple वह सती माता के शव को हाथो में उठाकर कैलास की ओर चल दिए। तब भगवान विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए और जहाँ जहाँ पर माता के शरीर के अंग गिरे वहां शक्ति पीठ स्थापित हुए। इस स्थान पर माता के केश (कुंज) गिरे थे। इस कारण इस स्थान का नाम कुंजापुरी मंदिर पड़ा। मंदिर का महत्व सिद्ध पीठ होने के कारण शारदीय नवरात्र में यहाँ पर भक्तों की काफी भीड़ रहती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माता के दर्शन करने आता है। माता उसकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ पर माता के दर्शनों से अध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। Kunjapuri Temple इस मंदिर से ऋषिकेश का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। सर्दीयों में यहाँ पर बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ देखने को मिलती है। जो इस मंदिर की शोभा में चार चाँद लगा देती है। मंदिर दर्शन के साथ यहाँ पर प्रकृति के खूबसूरत नजारों का भी आनंद लिया जा सकता है। मंदिर की वास्तुकला कुंजापुरी मंदिर के गर्भगृह में माता को कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहाँ पर एक शिलारूप पिंडी है। Kunjapuri Temple मंदिर के अंदर सदैव एक अखंड ज्योत जलती रहती है। इस मुख्य मंदिर के पास ही भगवान भोलेनाथ, महाकाली, नरहरि भगवान और भैरों बाबा की प्रतिमाये स्थापित है। मंदिर परिसर में वृक्ष है। यहाँ पर भक्त चुनरी या डोरी बांधकर अपनी कामना कहते है। यह मंदिर भक्तों के लिए किसी आस्था से कम नहीं है। कुंजापुरी मंदिर का समय : Kunjapuri Temple Timings कुंजापुरी मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद कुंजापुरी मंदिर में माता को फल, फूल, सूखे मेवे, नारियल, चुनरी आदि का भोग लगाया जाता है।

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Vaishno Devi

वैष्णो देवी मंदिर (Vaishno Devi Temple) : हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत…

वैष्णो माता मंदिर को लाल माता मंदिर के नाम से भी जानते है। जो जम्मू के प्रसिद्ध वैष्णो धाम की प्रतिकृति है। Vaishno Devi Temple : हरिद्वार में वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू में प्रसिद्ध मंदिर की ही तरह बना हुआ है। इस मंदिर में सुरंगों और गुफाओं की भूलभुलैया भी है जो तीर्थयात्रियों को देवी वैष्णो देवी की प्रतिष्ठित मूर्ति वाले आंतरिक गर्भगृह तक ले जाती है। यह धार्मिक स्थल हरिद्वार के शक्ति पीठों में से एक है। Vaishno Devi यहाँ पर श्रद्धालु उपासकों के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी भी अक्सर आते हैं। मंदिर का शांत वातावरण और धार्मिक महत्व सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। चाहे धार्मिक भक्ति के लिए हो या प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए, हरिद्वार में स्थित वैष्णो देवी मंदिर आने वाले आगंतुकों के दिलों को लुभाता है। मंदिर का इतिहास : History of the temple वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना वर्ष 1965 में सिद्ध पुरुष बाल ब्रह्मचारी कर्म नारायण भिक्षुक द्वारा की गई थी। जिन्हें सिद्धि प्राप्त थी। वैष्णो माता मंदिर को लाल माता मंदिर के नाम से भी जानते है। क्योंकि माता लाल देवी ने वैष्णों देवी के दर्शन सपने में किये थे। सपने में देवी ने उन्हें यहाँ पर अपना एक मंदिर बनाने के लिए कहा। Vaishno Devi इसी सपने के कारण उन्होंने जम्मू स्थित मंदिर से प्रेरित होकर कर उसकी एक छोटी सी प्रतिकृति यहाँ बनाने का निर्णय लिया। तभी यह मंदिर बनकर तैयार हुआ। मंदिर का महत्व : The Significance of the Temple किवदंतियों के अनुसार, जब भगवान राम सीता की खोज में लंका के समुद्र तट पर पहुंचे थे, तो उनकी नजर गहरे ध्यान में डूबी एक लड़की पर पड़ी। उसकी पहचान पूछे जाने पर, लड़की ने उनके प्रति अपनी शाश्वत भक्ति के बारे में बताया। Vaishno Devi लेकिन भगवान राम ने समझाया कि उन्होंने अपनी पत्नी के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहने का वचन लिया है। हालाँकि, वह नहीं चाहते थे कि त्रिकुटा की तपस्या व्यर्थ जाये। इस प्रकार, भगवान राम ने उनसे कहा कि वह उनकी पहचान का परीक्षण करने के लिए भेष बदलकर वापस आएंगे। लंका से लौटने पर, भगवान राम एक बूढ़े भिक्षु के रूप में लड़की से मिलने गए, लेकिन वह उन्हें पहचानने में असफल रही। फिर प्रभु ने अपनी असली पहचान बताई और माता को आश्वासन दिया कि भविष्य में, वह कलियुग में ‘कल्कि’ के रूप में प्रकट होंगे और उनसे विवाह करेंगे। भगवान राम ने उन्हें माणिक पर्वत की त्रिकुटा श्रृंखला में ध्यान करने का भी निर्देश दिया, जहां उन्हें शाश्वत अमरता प्राप्त होगी और ‘वैष्णो देवी’ के रूप में पहचाना जाएगा। मंदिर की वास्तुकला : temple architecture सप्त ऋषि आश्रम रोड पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर, इस क्षेत्र के कई अन्य मंदिरों के मध्य बना हुआ है। यह मंदिर जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी मंदिर की वास्तुशिल्प जैसा ही बनाया गया है। वैसी ही सुरंगे यहाँ आपको देखने को मिलेंगी। Vaishno Devi जो लोग मूल वैष्णो देवी मंदिर की तीर्थयात्रा करने में असमर्थ हैं, उनके लिए यह पवित्र निवास एक आनंददायक विकल्प प्रदान करता है। भक्तों को माँ वैष्णो देवी से आशीर्वाद लेने के लिए मंजिलों पर चढ़ना होगा और एक संकीर्ण मानव निर्मित सुरंग से गुजरना होगा। Vaishno Devi इसके अतिरिक्त, यहां भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति भी देखी जा सकती है। Vaishno Devi यह मंदिर कुंभ मेला, बसंत पंचमी, मकर संक्रांति और गंगा दशहरा सहित हिंदू त्योहारों को भव्य रूप से मनाता है। वैष्णो देवी मंदिर का समय : Vaishno Devi Temple Timings वैष्णो देवी मंदिर खुलने का समय 08:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद वैष्णो देवी मंदिर में सूखा प्रसाद, चना चिरोंजी और माता को चुनरी चढ़ाई जाती है। साथ ही नारियल भी चढ़ा सकते है। पुष्प भी माता के चरणों में अर्पित कर सकते है।

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Kamakhya

Kamakhya Devi Mandir History : कामाख्या देवी मंदिर का इतिहास जो आपको चौंका देगा….

Kamakhya Devi Mandir History : सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली परंपरा में कुछ ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जो न केवल श्रद्धा का केंद्र हैं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा और रहस्यों का एक ऐसा महासागर हैं जिसे शब्दों में बांधना असंभव है। असम की सुरम्य वादियों में, गुवाहाटी के निकट नीलाचल पर्वत पर विराजमान Kamakhya Mandir एक ऐसा ही पावन धाम है। एक मार्गदर्शक और व्यक्तिगत ट्यूटर के रूप में, मैं आपको इस मंदिर की उस यात्रा पर ले जाना चाहता हूँ जहाँ इतिहास, पौराणिक कथाएँ और तांत्रिक साधनाएँ एक साथ मिलकर एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव बनाती हैं। यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में सबसे सर्वोपरि माना जाता है, क्योंकि यहाँ माता सती का ‘योनि’ भाग गिरा था। Kamakhya Devi Mandir History : कामाख्या देवी मंदिर का इतिहास…. शक्तिपीठ की उत्पत्ति और सती की पावन कथा : The Origin of Shaktipeeths and the Sacred Legend of Sati Kamakhya Mandir की महिमा को समझने के लिए हमें उस पौराणिक कालखंड में जाना होगा जब राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। शास्त्रों के अनुसार, इस यज्ञ में उन्होंने अपने दामाद भगवान शिव का घोर अपमान किया, जिसे माता सती सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी। सती के वियोग में व्याकुल शिव उनका मृत शरीर लेकर पूरे ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। सृष्टि को इस विनाशकारी तांडव से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 खंड कर दिए। पौराणिक मान्यता है कि जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए, और नीलाचल पर्वत पर उनका योनि भाग गिरने के कारण यहाँ Kamakhya Mandir की स्थापना हुई। योनिपीठ का रहस्य: मूर्ति नहीं, अनुभूति की होती है पूजा : The Mystery of the Yoni Pitha: It is an Experience, Not an Idol, That is Worshipped इस मंदिर की सबसे विशिष्ट और अनोखी बात यह है कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह देवी की कोई पारंपरिक मूर्ति स्थापित नहीं है। Kamakhya Mandir के गर्भगृह के भीतर एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ एक शिला में प्राकृतिक रूप से बनी योनि के आकार की दरार मौजूद है। इसी ‘योनिपीठ’ को माँ कामाख्या का साक्षात स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इस शिला से निरंतर एक प्राकृतिक जलधारा प्रवाहित होती रहती है, जिसे भक्त माँ का आशीर्वाद मानकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। शाक्त परंपरा में यह योनिपीठ केवल शरीर का हिस्सा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की सृजन शक्ति, मातृत्व और चेतना का सर्वोच्च प्रतीक है। अम्बुवाची मेला: जब माँ होती हैं रजस्वला : Ambubachi Mela: When the Mother Goddess Menstruates Kamakhya Mandir की प्रसिद्धि का एक बहुत बड़ा कारण यहाँ आयोजित होने वाला वार्षिक ‘अम्बुवाची मेला’ है। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास (जून) में आयोजित होने वाले इस पर्व के दौरान माना जाता है कि माँ कामाख्या रजस्वला (मेंस्ट्रुएशन) होती हैं। इस दौरान तीन दिनों के लिए मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं ताकि देवी को निजता और विश्राम मिल सके। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है, तो भक्तों को प्रसाद के रूप में ‘अंगोदक’ (पवित्र जल) और ‘अंगवस्त्र’ (लाल रेशमी कपड़ा) दिया जाता है। लोक-आस्था है कि इस वस्त्र को धारण करने से सभी प्रकार की नकारात्मक बाधाएं और ग्रहों के दुष्प्रभाव दूर हो जाते हैं। यह उत्सव इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में नारी देह की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को भी परम पूज्य और पवित्र माना गया है। नरकासुर की कथा और अधूरा मार्ग :The Story of Narakasura and the Incomplete Path स्थानीय लोक कथाओं में Kamakhya Mandir का संबंध शक्तिशाली नरकासुर से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि नरकासुर ने देवी कामाख्या के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा था। देवी ने विनोदपूर्ण ढंग से एक शर्त रखी कि यदि वह एक ही रात में नीलाचल पहाड़ी के नीचे से मंदिर तक सीढ़ियों का निर्माण पूरा कर दे, तो वे उससे विवाह करेंगी। जब नरकासुर यह कार्य लगभग पूरा करने ही वाला था, तब देवी ने माया से एक मुर्गे को भोर होने से पहले ही बांग देने के लिए मजबूर कर दिया। शर्त हारने के कारण नरकासुर का सपना अधूरा रह गया, और आज भी वे अधूरी सीढ़ियाँ ‘मेखेलाउजा पथ’ के रूप में मंदिर में देखी जा सकती हैं। तंत्र साधना और दस महाविद्याओं का केंद्र : A center for Tantric practices and the Ten Mahavidyas. आध्यात्मिक दृष्टिकोण से Kamakhya Mandir को सर्वोच्च तंत्र पीठ माना गया है। यहाँ की साधना पद्धति अन्य स्थानों से भिन्न और अत्यंत गुप्त मानी जाती है। यह मंदिर केवल माँ कामाख्या का ही नहीं, बल्कि ‘दस महाविद्याओं’ का भी पावन संगम है। मंदिर परिसर के चारों ओर काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला के स्थान मौजूद हैं। साधकों का मानना है कि इस क्षेत्र में वास करने मात्र से शरीर के भीतर सुप्त कुंडलिनी शक्ति का स्पंदन प्रारंभ हो जाता है, जो योगी को मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। इतिहास और वास्तुकला: नीलाचल शैली का अद्भुत संगम :History and Architecture: A Remarkable Confluence of the Nilachal Style Kamakhya Mandir का ऐतिहासिक सफर भी काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण 16वीं शताब्दी (1565 ई.) में कोच वंश के राजा नरनारायण द्वारा कराया गया था। इसकी वास्तुकला को ‘नीलाचल शैली’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें गुंबद को मधुमक्खी के छत्ते जैसा आकार दिया गया है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं और पारंपरिक अलंकरणों की सुंदर नक्काशी आज भी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। बाद के समय में अहोम राजवंश के दौरान भी इस मंदिर का काफी विस्तार और विकास हुआ। भैरव उमानंद का महत्व और यात्रा गाइड : Significance and Travel Guide for Bhairav ​​Umananda… शाक्त परंपरा के अनुसार, शक्तिपीठ के दर्शन तब तक अधूरे माने जाते हैं जब तक कि उस पीठ के भैरव के दर्शन न किए जाएँ। माँ कामाख्या के भैरव ‘उमानंद’ हैं, जिनका मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच मयूर द्वीप पर स्थित है। यदि आप Kamakhya Mandir की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है: पहुँचने का मार्ग: गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से यह लगभग 7-8

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श्री भरत मंदिर: ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दिए थे दर्शन श्री भरत मंदिर उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में स्थित है। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। श्री भरत मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर से ही ऋषिकेश शहर का अस्तित्व सामने आया है। इस मंदिर में बहुत सी प्राचीन कलाकृतियों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। श्री भरत मंदिर का इतिहास श्री भरत मंदिर का उल्लेख हिन्दू धर्म के स्कन्द पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, नृसिंह पुराण और वराह पुराण में किया गया है। इसमें यह वह स्थान है जहाँ पर परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा था कि हृषीकेश नाम से मैं सदैव यहीं स्थित रहूँगा। इसलिए इस स्थान का नाम हृषीकेश भी है। इस मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है करीब 789 ई. में बसंत पंचमी के शुभ दिन पर, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने मंदिर में भगवान की प्रतिमा को स्थापित किया गया है। प्रत्येक वर्ष इस दिन शालिग्राम को मायाकुंड में पवित्र स्नान के लिए ले जाते और फिर पुनर्स्थापना हेतु शहर में एक भव्य जुलूस के साथ वापस मंदिर लाया जाता है। श्री भरत मंदिर का महत्व इस मंदिर से सम्बंधित यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन यदि कोई तीर्थयात्री इस मंदिर में भगवान श्री हृषिकेश नारायण की 108 परिक्रमा करता है और उनके चरणों में आशीर्वाद मांगता है तो उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। ऐसा करना बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा के बराबर माना गया है। भगवान विष्णु जी के इस स्थान पर दर्शन दिए जाने के कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र है जिस वजह से मंदिर के दर्शन मात्र से सभी भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्री भरत मंदिर की वास्तुकला श्री भरत मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह के भीतर इस मंदिर में भगवान विष्णुजी जी कि ऐसी प्रतिमा है जिसे एक ही काले रंग का एक पत्थर यानी कि शालिग्राम पत्थर को काटकर बनाया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक प्राचीन पेड़ है। वास्तव में यह तीन अलग-अलग पेड़ों का एक संयोजन है जिनकी जड़ें इस तरह से आपस में जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अलग अलग देखना लगभग असंभव है। इसमें बरगद के पेड़ यानी वट वृक्ष, पीपल के पेड़ और बेल के पेड़ शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि, ये तीन पेड़ त्रि देव, ब्रह्मा निर्माता, विष्णु, संरक्षक और महेश संहारक का प्रतिनिधित्व करते हैं। भक्त इन वृक्षों की अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करते हैं। इस पेड़ के नीचे बुद्ध की एक खंडित मूर्ति रखी हुई है जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह प्रतिमा अशोक काल की है जब बौद्ध धर्म पूरे देश में फैल रहा था। श्री भरत मंदिर का समय सुबह भरत मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 11:00 AM सांयकाल भरत मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान विष्णु को पीली चीजों का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा सूखे मेवे, फल, फूल भी भगवान को अर्पित किये जाते है।

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लक्ष्मी नारायण मंदिर: हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

पूज्य संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा स्थापित मंदिर हरिद्वार में लक्ष्मी नारायण मंदिर अत्यधिक पवित्र महत्व रखता है। यह मंदिर पवित्र शहर हरिद्वार से केवल 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह हिन्दू मंदिर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर निरंजनी अखाड़ा मार्ग, देवपुरा, हरिद्वार पर स्थित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की वास्तुकला कुरुक्षेत्र के समय के मंदिरों से मेल खाती है। हजारों की संख्या में भक्त इस मंदिर में दर्शनों के लिए आते है और भगवान के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी करने की कामना करते है। Laxmi Narayan Temple:लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना श्रद्धेय संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा की गयी थी। 2001 में, गुरुदेव ने धार्मिक संगठन भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम की स्थापना की। जिससे इस दिव्य पूजा स्थल का उदय हुआ। इस मंदिर निर्माण की प्रेरणा गुरुदेव ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी से मिली और इसे गुरुदेव के बड़े बेटे भाईश्री मनदीप नागपाल जी के दूरदर्शी नेतृत्व में फलीभूत किया गया। मंदिर का महत्व मंदिर का विस्तार करने हेतु लक्ष्मी नारायण मंदिर हरिद्वार आने वाले लोगों को गेस्ट हाउस की सुविधाएं प्रदान करता है। जो साधकों के लिए एक स्वागत योग्य और शांतिपूर्ण निवास है। गुरुदेव के अनुसार मंदिर का दृश्य प्रतिष्ठित श्री यंत्र को दर्शाता है, जो दिव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह पवित्र दर्शन मंदिर के महत्व को बढ़ाता है। दूर-दूर से आये तीर्थयात्रियों को देखने और गहन आध्यात्मिकता का अनुभव करने के लिए यह यन्त्र आकर्षित करता है। लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को विशाल भंडारा कराने का चलन है। जो काफी लम्बे समय से किया जाता आ रहा है। इस दौरान यहाँ पर भक्तों की भीड़ दिखाई देती है। मंदिर की वास्तुकला लक्ष्मी नारायण मंदिर भक्तों को शांत वातावरण और विशाल क्षेत्र प्रदान करता है। यह वास्तव में इसके संस्थापकों और अनुयायियों की अटूट भक्ति और आध्यात्मिक आकांक्षाओं का एक प्रमाण है, जो मानवता और परमात्मा के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। मंदिर को जमीन से कुछ ऊंचाई पर बनाया गया है।सीढ़ियों से मंदिर तक पंहुचा जा सकता है। मंदिर के मुख्य कक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान गणपति जी विराजमान है। मंदिर में कई झरोखे भी बने हुए है। यहाँ से हवा प्रवेश कर मंदिर के वातावरण को आनंदित कर देती है। इस मंदिर में भंडार गृह और बहुत सारे कक्ष है। इस मंदिर में हनुमान जी और गरुड़ जी की भी मूर्ति स्थापित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मी नारायण मंदिर में माखन मिश्री ,परमाल, चना चिरोंजी का भोग लगाया है। साथ ही भगवान को पुष्प भी अर्पित किये जाते हैं। भगवान को पीली वस्तुएं अर्पित की जाती है।

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हनुमान मंदिर ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

यहाँ पर हनुमान जी ने ऋषि मणि राम दास जी को दिए थे दर्शन हनुमान मंदिर पवित्र शहर ऋषिकेश में अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा ही प्राचीन और धार्मिक मंदिर है ऋषिकेश में राम झूला पर स्थित हनुमान मंदिर। इस मंदिर को मनोकामना पूर्ण हनुमान मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि भगवान हनुमान जी यहाँ पर आने वाले सभी भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करते है। इस मंदिर में रोज संध्या काल के समय भजन कीर्तन का आयोजन किया जाता है। मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्तों की भीड़ ज्यादा रहती है। साथ ही इन दिनों में विशेष पूजा अर्चना भी की जाती है। मंदिर का इतिहास हनुमान मंदिर के इतिहास के विषय में कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है। परन्तु प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर के पीछे पौराणिक कथाये आज भी चली आ रही है। जिसके अनुसार इस मंदिर में ऋषि मणि राम दास जी ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने राम दास जी यहीं पर दर्शन दिए थे। उसके बाद ऋषि मणि राम दास जी ने इसी स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की और मंदिर का निर्माण भी किया। तभी से यह प्राचीन मंदिर हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर का महत्व हनुमान मंदिर के लिए भक्तों में विशेष आस्था है। इस प्राचीन मंदिर में सभी भक्त अपनी मनोकामना लेकर दरबार में आते है। और जब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यहाँ पर दोबारा आकर नारियल और चुनरी चढ़ाते है। ऐसा माना जाता है कि भगवान के इस दरबार में सभी इच्छाएं पूरी होती है। हनुमान जी के दर्शन से सभी कष्ट दूर हो जाते है। भक्तों को मंदिर में दर्शन कर परम शांति का अनुभव होता है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर के वास्तुकला की बात करें तो यह मंदिर अति प्राचीन होने के कारण प्राचीन कला को दर्शाता है। यह मंदिर अन्य मंदिरों की भांति ही बना हुआ है परन्तु भक्तों के लिए विशेष आस्था को संजोये हुए है। हनुमान मंदिर के मुख्य मंदिर में हनुमान जी की प्राचीन मूर्ति विराजित है। हनुमान जी के साथ भगवान राम और माता सीता कि भी मूर्ति यहाँ पर स्थापित है। इस मंदिर में भक्तो को हनुमान जी के साथ साथ भगवान भोलेनाथ के भी दर्शन होते है। मंदिर का समय हनुमान मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:00 PM संध्या काल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद हनुमान मंदिर में फल, मिठाई, चना चिरोंजी, गुड़ और रोट का भोग लगाया जाता है।

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नीलकंठ महादेव मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

हलाहल विष पान के बाद शिव जी ने इसी स्थान पर की थी साधना। नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के हिमालय पर्वतों के तल में पवित्र शहर ऋषिकेश बसा हुआ है और इस पवित्र व पावन शहर में स्थित है नीलकंठ महादेव मंदिर। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ऋषिकेश आने वाले भक्त इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने जरूर जाते है। विशेष अवसरों पर यहाँ पर भारी भीड़ भोलेनाथ के चरणों में माथा टेकने आती है। नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचना आसान नहीं है। यहाँ पहुंचने के लिए पहाड़ और नदियों से होकर जाना पड़ता है। नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास नीलकंठ महादेव मंदिर के इतिहास के पीछे के पौराणिक कथा प्रचलित है। जिसमे बताया जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमे कई वस्तुएँ बाहर आई, जो देवताओं और दानवों में बाँटी गई । फिर समुद्र में से हलाहल विष निकला। यह विष इतना जहरीला था कि कोई भी इसे नहीं चाहता था। यह विष पूरी सृष्टि का विनाश कर सकता था। सम्पूर्ण जगत में विष के कारण हाहाकार मच गया। तब भोलेनाथ ने इस विष का पान करने का निर्णय लिया। जब वह हलाहल विष को पी रहे थे तो माता पार्वती उनके पीछे खड़ी थी और उन्होंने शिव जी की गर्दन को अपने हाथों से पकड़ लिया। ताकि विष शरीर के अंदर ना जा सके और ना ही गले से बाहर आ सके। यह विष शंकर जी के गले में ही रह गया जिस कारण उनका गला नीला हो गया। इस वजह से भोलेनाथ ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने जाने लगे। परन्तु इस विष में गर्मी बहुत ज्यादा थी। शिव जी शीतलता की तलाश करने लगे और हिमालय की ओर चल दिए। वह मणिकूट पर्वत पर पहुंचे। वहां मधुमती नदी की शीतलता को देखते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। वह वहाँ समाधी में लीन हो गए। कई वर्ष होने के बाद माता पार्वती को चिंता होने लगी तो वह भी मणिकूट पर्वत पर जाकर शंकर जी के जगाने की प्रतीक्षा करने लगी। देवी-देवताओं की कई बार प्रार्थना करने के बाद भोलेनाथ ने आंख खोली और फिर उन्होंने कैलाश के लिए प्रस्थान किया। इस स्थान से जाने से पहले इसे नीलकंठ महादेव का नाम दिया। जिस वृक्ष के नीचे भगवान शिव समाधि में लीन थे, आज उस स्थान पर नीलकंठ महादेव मंदिर है। मंदिर का महत्व नीलकंठ महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने से सारी कामना पूर्ण होती है। ऐसी मान्यता है कि सावन सोमवार के दिनों में नीलकंठ महादेव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। नीलकंठ महादेव जी के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है। सभी भक्त भगवान शिव को जल चढ़ाते है। साथ ही मंदिर परिसर में धागा बांध कर अपनी कामना कहते है। फिर जब उनकी मन्नतें पूरी हो जाती है तो वह उस धागे को खोलने आते है। मंदिर की वास्तुकला नीलकंठ महादेव मंदिर का जितना महत्त्व है, मंदिर की नक़्क़ाशी भी उतनी ही आकर्षक है। इस मंदिर के शिखर के तल पर समुद्र मंथन के दृश्य को दर्शाया गया है। गर्भ गृह के प्रवेश-द्वार पर एक विशाल पेंटिंग निर्मित है जिसमे भगवान भोलेनाथ को विष पीते हुए भी दिखाया गया है। इस मंदिर के सामने की पहाड़ी पर एक मंदिर है जो की माता पार्वती का मंदिर है। इस मंदिर में पानी का एक झरना भी है। भक्त दर्शन करने से पहले इस झरने में स्नान करते हैं और फिर भोलेनाथ के दर्शन करते है। नीलकंठ महादेव मंदिर का समय नीलकंठ महादेव मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद नीलकंठ महादेव मंदिर में फल, फूल, शहद, दूध, जल, नारियल, बेलपत्र, मिठाई, सूखा प्रसाद आदि का भोग लगाया जाता है।

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अवधूत हनुमान मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। देवभूमि उत्तराखंड का हरिद्वार जिला चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार है। हरिद्वार को प्रभु हरि का द्वार कहा जाता है। यहां के ज्वालापुर में गंगा तट किनारे स्थित है अवधूत हनुमान मंदिर। यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। इसे बाबा हीरादास हनुमान मंदिर या अवधूत मंडल आश्रम के नाम से भी जानते हैं। इस आश्रम में भक्तों को रहने व खाने की सुविधा मिलती है। हर मंगलवार को यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार आने वाले भक्त यहां दर्शन करना नहीं भूलते। मंदिर में बजरंगबली के अलावा राम दरबार, शंकर-पार्वती, गणेश जी, मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। सबसे खास बात है कि राम दरबार में नेपाल की गंडक नदी से लाए गए दिव्य शालीग्राम पत्थरों के भी दर्शन होते हैं। आपको बता दें कि ऐसे ही शालीग्राम पत्थरों से अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर में मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। अवधूत हनुमान मंदिर का इतिहास यह मंदिर रामानंदी निराकारी वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। इस संप्रदाय की स्थापना स्वर्गीय श्री आचार्य बाबा सरयूदासजी महाराज ने करीब 200 साल पहले की थी। मंदिर के नाम में अवधूत का अर्थ होता है कि जिसको घर या बाहर किसी से कोई मतलब नहीं होता, जो भगवान की भक्ति में लीन रहता है। कुछ ऐसे ही थे मूल रूप से पटियाला के रहने वाले बाबा सरयूदासजी। ये एक महान और आध्यात्मिक संत थे। बताया जाता है एक बार पटियाला के राजा को संतान नहीं हो रही थी। इसको लेकर राजा-रानी सहित पूरी प्रजा दुखी थी। बाबा सरयूदासजी के आशीर्वाद से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद से बाबा की ख्याति और फैल गई। हरिद्वार में बाबा को उनके भक्तों ने ज्वालापुर गांव में गंगा नदी के तट ​पर एक जमीन दान में दी थी। बताया जाता है कि इसी जमीन पर सरयूदासजी के आदेश पर उनके अनुयायी बाबा हीरादास जी ने बसंत-पंचमी, दिनांक 13-04-1830 को यहां हनुमान मंदिर की नींव रखी। मंदिर में स्वामी हीरादास की मूर्ति भी लगी है। अवधूत हनुमान मंदिर का महत्व अवधूत हनुमान मंदिर में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसी वजह से इस मंदिर को कुछ भक्त मनकामेश्वर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना लेकर इस मंदिर में आती हैं। अवधूत हनुमान मंदिर की वास्तुकला अवधूत हनुमान मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही यहां का दृश्य किसी का भी मन मोह लेता है। मुख्य द्वार पर सबसे ऊपर विष्णु भगवान की प्रतिमा लगाई गई है। मंदिर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है। यहां हनुमानजी की एक हाथ में पर्वत लिए विशाल मूर्ति स्थापित है। इसके निर्माण की कहानी बहुत रोचक है। बताया जाता है कि मूर्ति तैयार करते समय लाखों लोगों ने कागज पर 11.11 करोड़ बार राम-नाम मंत्र लिखा था, जिसे गंगाजी के पवित्र जल में मिला दिया गया। इसके बाद सीमेंट व रेत में गंगाजी के इसी पवित्र जल को मिलाकर लेप तैयार किय गया, जिसका उपयोग हनुमानजी की विशाल मूर्ति तैयार करने में किया गया। अवधूत हनुमान मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए एक आश्रम है। इसके अलावा एक गौशाला भी हैं, जहां बड़ी अच्छे तरीके से गायों की देखरेख व सेवा की जाती है। अवधूत मंडल आश्रम जरूरतमंद व गरीब लोगों के लिए एक धर्मार्थ अस्पताल भी चलाता है। मंदिर परिसर में समय समय पर कथा व सत्संग का आयोजन भी होता रहता है। मंदिर परिसर में सत्यदेव पुरम कथा स्थल बना है। अवधूत हनुमान मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद अवधूत हनुमान मंदिर मेंं नारियल, बेसन के लड्डू, दूध के पेड़े, फल, फूल आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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गंगा घाट:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यहां डुबकी लगाने से मिलेगी पापों से मुक्ति गंगा घाट पवित्र शहर हरिद्वार में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हर की पौड़ी के नौ गंगा घाट बहुत ही पावन और महत्वपूर्ण महत्त्व रखते है। ये गंगा घाट हैं -विष्णु घाट, ब्रह्मकुंड घाट, कुशावर्त घाट, नाई घाट, बिरला घाट, सती घाट, गऊ घाट, नीलेश्वर घाट और बिल्केश्वर घाट। इन गंगा घाटों पर स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो गंगा नदी में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए आते है। ज्यादातर भक्त महाकुम्भ के समय इन घाटों पर आते है। गंगा स्नान करने से सभी दुःख दूर होते है। और आत्म को शांति मिलती है। मंदिर का इतिहास हर की पौड़ी पर निर्मित घाटों के विषय में कई किद्वन्तियाँ है जिसमे बताया जाता है कि इसका निर्माण विक्रमादित्य ने अपने भाई भृतहरि की याद में करवाया था। क्योंकि वह इन्ही गंगा घाट पर ध्यान किया करते थे। एक अन्य कथा के अनुसार कुछ इतिहासकारों ने इसका इतिहास राजा अकबर के शासन काल के समय का बताया है। कहा जाता है कि हर की पैड़ी पर स्थित ब्रह्मकुंड का घाट ब्रह्मकुंड न होकर प्राचीन समय का छत्रि स्थल था। यहीं पर राजा मानसिंह की अस्थियां विसर्जित की गयी थी। Ganga Ghat मंदिर का महत्व हर की पौड़ी पर स्थित कुछ गंगा घाट का विशेष महत्त्व है जैसे – 1)विष्णु घाट – हर की पौड़ी पर स्थित विष्णु घाट की अपनी महत्वता है। इस गंगा घाट पर यहां भगवान विष्णु का मंदिर निर्मित है। कहा जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने मात्रा से ही मनोकामना पूर्ण होती है। इस घाट पर स्नान करते हुए भगवान विष्णु का जाप करने का विशेष महत्त्व है। 2)ब्रह्मकुंड घाट – ब्रह्मकुंड घाट का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। बताया जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें इसी ब्रम्ह कुंड में गिरी थी। इस कारण इस कुंड का बहुत महत्त्व है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। 3)गऊ घाट – हर की पौड़ी पर स्थित गऊ घाट भी महत्वपूर्ण है। इस घाट पर बहुत सी गाय देखने को मिलती है। यहाँ स्नान करने के बाद उन्हें चारा, खाना आदि दान देने का महत्त्व है। हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जित के उपरांत मुंडन संस्कार और गऊ दान का विशेष महत्व माना गया है। गाय को चारा देने ,रोटी खिलाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है । इस कारण इस घाट पर बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ मिलती है। 4)बिरला घाट – बिरला घाट का भी अपना विशेष महत्व है। बिरला घाट की मान्यता है कि इसके धरातल में हनुमान जी की प्रतिमा स्थित है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। बिरला घाट को “हनुमान घाट” भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी घाट पर पांडव रुके थे। 5)नाई घाट – हर की पौड़ी के इस घाट पर मुंडन संस्कार किया जाता है। मृतक की अस्थि विसर्जन के बाद परिवार के सदस्यों का मुंडन संस्कार यहीं किया जाता है। इस घाट की ऐसी मान्यता है कि मुंडन संस्कार कराने के बाद यहाँ गंगा स्नान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 6)कुशावर्त घाट – हर की पौड़ी का यह घाट विश्व विख्यात है। धार्मिक ग्रंथों में इस घाट का भी वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली है। इस कारण यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय का मंदिर भी है। इस घाट पर पूर्वजों की आत्मा शांति हेतु क्रियाकर्म किया जाता है। 7)नीलेश्वर घाट – धार्मिक ग्रंथों में नीलेश्वर घाट का वर्णन भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। 8)बिल्केश्वर घाट – बिल्केश्वर घाट पर गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व है। यहाँ स्नान करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। महाकुंभ और स्नान पर्वों पर यहाँ भारी संख्या में लोग आते है। 9)सती घाट – धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सती घाट पर जिस भी व्यक्ति की कम उम्र में मृत्यु हो जाती थी , उसकी पत्नी भी साथ में दाह संस्कार करती थी। उनकी स्मृति में इस घाट पर छोटे छोटे मंदिर बनाये गए है। दूर दूर से लोग इस घाट पर अस्थि विसर्जित करने आते है। इस कारण इस घाट को ‘अस्थि प्रवाह घाट’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर अस्थि विसर्जन के बाद गंगा स्नान करने से पितरों को शांति प्रदान होती है। मंदिर की वास्तुकला गंगा घाट की वास्तुकला की बात की जाए तो यह घाट गंगा नदी के किनारे बने हुए है। प्रत्येक घाट पर गंगा नदी में स्नान करने के लिए कुछ दूरी तक सीढ़ियां बनाई गयी हैं। यहाँ पर जाकर आसानी से स्नान किया जा सकता है। प्रत्येक घाट पर मंदिर भी बने हुए जहाँ पर गंगा स्नान करने के बाद पूजा अर्चना की जा सकती है। घाट का सुन्दर दृश्य सुबह और शाम के समय बहुत ही मनोरम होता है। गंगा घाट मंदिर का समय गंगा घाट का समय 12:00 AM – 12:00 AM मंदिर का प्रसाद गंगा घाट पर प्रसाद के रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही गंगा मैया को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी और माँ भगवती को समर्पित है और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर सुरकूट पर्वत के ऊपर स्थित है। थोड़ी चढ़ाई पर स्थित मंदिर के आसपास जंगल का एक रमणीय दृश्य दिखाई देता है। मंदिर परिसर में मोरों को आते देखना आम बात है, जो इस पवित्र स्थान के मनमोहक माहौल को और भी बढ़ा देता है। मानसून के दौरान, मंदिर तक का रास्ता चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां बहने वाली धारा में आमतौर पर बाढ़ आ जाती है। हालाँकि अन्य मौसमों के दौरान जलधारा इस स्थान के प्राकृतिक आकर्षण को बढ़ा देती है। sureshwari devi mandir:का इतिहास सुरेश्वरी देवी मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु इस मंदिर की उत्पत्ति का उल्लेख धार्मिक ग्रंथ स्कंद पुराण के केदारखंड में किया गया है। उसमे बताया गया है कि देवराज इंद्र के स्वर्ग लोक से निष्कासित होने पर राजा रजी के पुत्र से भयभीत होकर वह क्षीर सागर में छुप गए। वहां उन्होंने देव गुरु बृहस्पति की आराधना की। तब इंद्र को गुरु बृहस्पति ने विष्णु भगवान की स्तुति करने का परामर्श दिया। भगवान विष्णु की स्तुति के उपरांत विष्णु जी ने इंद्र को गंगा के दक्षिण भाग में “सूरकूट पर्वत” पर जा कर माता की आराधना करने को कहा। तब देवराज इन्द्र ने इस सूरकूट पर्वत पर एक साधारण मानव की भांति माता की आराधना की। देवराज इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने इसी स्थल पर इंद्र को दर्शन दिए। साथ ही विजय होने का वरदान भी दिया। तब इंद्र को पुनः स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि इंद्र का नाम सुरेश भी है। इस कारण यहाँ पर माता का नाम सुरेश्वरी पड़ा। और यह स्थान सुरेश्वरी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुरेश्वरी देवी मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही चर्म रोग और कुष्ठ रोग का नाश हो जाता है। माता भक्तों के सभी कष्टों का हरण करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सुरेश्वरी देवी माता के दर्शन करने से पुत्र की कामना करने वालो को पुत्र, धन की कामना करने वालो को धन, मोक्ष चाहने वालो को मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन माता के दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवता भी इस दिन मां भगवती के दर्शन करने के लिए यहाँ आते है। सुरेश्वरी देवी मंदिर की वास्तुकला सुरेश्वरी मंदिर एक समृद्ध पारंपरिक पृष्ठभूमि वाला एक प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर तक पहुंचने पर प्रवेश द्वार पर एक खुला प्रांगण है। मुख्य मंदिर के केंद्र में माता सुरेश्वरी देवी की एक शानदार मूर्ति स्थापित है। जबकि बाहरी प्रांगण में भगवान शिव और उनके परिवार को समर्पित एक मंदिर है, जिसमें प्रतिष्ठित शिवलिंग भी शामिल है। प्रांगण की प्रमुख विशेषताओं में से एक राजसी बरगद का पेड़ है, जो उम्र और ज्ञान की आभा बिखेरते हुए अनगिनत पीढ़ियों से वहाँ खड़ा है। इसके अतिरिक्त, पहाड़ी के शिखर पर एक और उल्लेखनीय पूजा स्थल है – काली माता मंदिर। पहाड़ के किनारे सावधानीपूर्वक बनाई गई कई सीढ़ियों पर चढ़कर पहुंचा जा सकने वाला यह मंदिर आसपास के लुभावने दृश्य को दर्शाता है। सुरेश्वरी देवी मंदिर का समय सुरेश्वरी देवी मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद सुरेश्वरी देवी मंदिर में लड्डू, पेड़ा, मिठाई और सूखा प्रसाद चढ़ाया जाता है। माता को चुनरी भी चढ़ाई जाती है। पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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