HARIDWAR

Bharat Mata Mandir

भारत माता मन्दिर (Bharat Mata Mandir) : हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

Bharat Mata Mandir : भारत माता मंदिर जिसे मदर इंडिया मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, हरिद्वार में सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह धार्मिक मंदिर भारत माता को समर्पित है, जो हिंदू धर्म की मातृभूमि “आर्यावर्त” का प्रतीक है और यह देशभक्त नागरिकों द्वारा पूजनीय भी है। इसकी जड़ें भारत के विभाजन से पहले की है। यह मंदिर अनेकता में एकता को दर्शाता है। इस भव्य मंदिर को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते है जो इस विशाल मंदिर को देखकर आश्चर्य चकित रहते है। मंदिर का इतिहास मंदिर की स्थापना स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि द्वारा की गई थी और इसका उद्घाटन 1983 में दिवंगत प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था। ‘स्वदेशी आंदोलन’ से प्रेरित होकर, अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को चार भुजाओं वाली हिंदू देवी के रूप में चित्रित किया था, जो केसरिया रंग के वस्त्र पहने, एक सफेद कपड़ा, एक किताब, एक मुट्ठी चावल और पवित्र माला धारण किए हुए थीं। भारत माता को शिक्षा, दीक्षा, अन्न और वस्त्र के दाता के रूप में दर्शाया गया। इस पेंटिंग में भारत माता को धूप वाले आसमान के नीचे हरी धरती पर खड़े हुए चित्रित किया गया है। Bharat Mata Mandir जिसमें मातृभूमि का वर्णन करने वाले सुंदर गीत हैं। इस प्रकार, भारत माता का यह चित्रण भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रभावशाली प्रतीक बन गया, जिसने लोगों के बीच राष्ट्रवादी भावनाओं को जगाया। मंदिर का महत्व आठ मंजिला भव्य भारत माता मंदिर की ऊंचाई 180 फुट की है। Bharat Mata Mandir भारत माता मंदिर के आठवें मंजिल से हिमालय, सप्त सरोवर और हरिद्वार के सुंदर दृश्यों को आसानी से देखा जा सकता है। Bharat Mata Mandir इस मंदिर की खास बात यह है कि इस मन्दिर में केवल देवी देवताओ की ही मूर्तियाँ नहीं है बल्कि यहाँ पर भारत के स्वंत्रतता सेनानी , वीरांगनाये, संत-महात्मा, महापुरुष और महान नारी की भी प्रतिमाये आपको देखने को मिलेंगी। मंदिर की वास्तुकला भारत माता मंदिर अपने आप में एक अनूठी संरचना है, जिसमें ज़मीन पर भारत का एक प्रभावशाली और व्यापक मानचित्र है, जो ‘राष्ट्रमाता’ का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर का डिज़ाइन अद्वितीय है, जो भारत के अवतार का प्रतीक है और धार्मिक देवताओं, स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं का समान रूप से सम्मान करता है। भारत माता मंदिर आठ मंजिला ईमारत है। प्रथम तल भारत माता मंदिर मंदिर की पहली मंजिल केंद्रीय देवता, भारत माता को समर्पित है। यहां भारत माता की एक प्रतिमा स्थापित है। दूसरी मंजिल- शूर मंदिर दूसरी मंजिल, जिसे “शूर मंदिर” के नाम से जाना जाता है। यह उन बहादुर आत्माओं को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने देश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। तीसरी मंजिल – मातृ मंदिर तीसरी मंजिल पर, “मातृ मंदिर” भारत की प्रतिष्ठित महिलाओं जैसे जहां मीरा बाई, सावित्री और कुछ महान महिलाओं की मूर्तियां हैं। चौथी मंजिल – संत मंदिर चौथी मंजिल, जिसे “संत मंदिर” कहा जाता है, जैन धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म सहित विभिन्न धर्मों के महान संतों को प्रदर्शित करती है। Bharat Mata Mandir यह विभिन्न धर्मों के बीच एकता का प्रतीक है। पांचवीं मंजिल – असेंबली हॉल पांचवीं मंजिल पर असेंबली हॉल है, जिसकी दीवारें भगवान और महान पुरुषों की पेंटिंग से सजी हैं। छठी मंजिल – देवी शक्ति हिंदू धर्म की देवी शक्ति को समर्पित, छठी मंजिल देवी के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करती है, Bharat Mata Mandir जो स्त्री दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। सातवीं मंजिल – भगवान विष्णु के अवतार सातवीं मंजिल पर भगवान विष्णु के अवतारों को दर्शाया गया है। आठवीं मंजिल – भगवान शिव का मंदिर सबसे ऊपरी मंजिल पर हिंदू परंपरा के सर्वोच्च देवता भगवान शिव का मंदिर है। Bharat Mata Mandir का समय भारत माता मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भारत माता मंदिर में मिठाई, लड्डू, पेड़ा और पुष्प का भोग लगाया जाता है।

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Vaishno Devi

वैष्णो देवी मंदिर (Vaishno Devi Temple) : हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत…

वैष्णो माता मंदिर को लाल माता मंदिर के नाम से भी जानते है। जो जम्मू के प्रसिद्ध वैष्णो धाम की प्रतिकृति है। Vaishno Devi Temple : हरिद्वार में वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू में प्रसिद्ध मंदिर की ही तरह बना हुआ है। इस मंदिर में सुरंगों और गुफाओं की भूलभुलैया भी है जो तीर्थयात्रियों को देवी वैष्णो देवी की प्रतिष्ठित मूर्ति वाले आंतरिक गर्भगृह तक ले जाती है। यह धार्मिक स्थल हरिद्वार के शक्ति पीठों में से एक है। Vaishno Devi यहाँ पर श्रद्धालु उपासकों के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी भी अक्सर आते हैं। मंदिर का शांत वातावरण और धार्मिक महत्व सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। चाहे धार्मिक भक्ति के लिए हो या प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए, हरिद्वार में स्थित वैष्णो देवी मंदिर आने वाले आगंतुकों के दिलों को लुभाता है। मंदिर का इतिहास : History of the temple वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना वर्ष 1965 में सिद्ध पुरुष बाल ब्रह्मचारी कर्म नारायण भिक्षुक द्वारा की गई थी। जिन्हें सिद्धि प्राप्त थी। वैष्णो माता मंदिर को लाल माता मंदिर के नाम से भी जानते है। क्योंकि माता लाल देवी ने वैष्णों देवी के दर्शन सपने में किये थे। सपने में देवी ने उन्हें यहाँ पर अपना एक मंदिर बनाने के लिए कहा। Vaishno Devi इसी सपने के कारण उन्होंने जम्मू स्थित मंदिर से प्रेरित होकर कर उसकी एक छोटी सी प्रतिकृति यहाँ बनाने का निर्णय लिया। तभी यह मंदिर बनकर तैयार हुआ। मंदिर का महत्व : The Significance of the Temple किवदंतियों के अनुसार, जब भगवान राम सीता की खोज में लंका के समुद्र तट पर पहुंचे थे, तो उनकी नजर गहरे ध्यान में डूबी एक लड़की पर पड़ी। उसकी पहचान पूछे जाने पर, लड़की ने उनके प्रति अपनी शाश्वत भक्ति के बारे में बताया। Vaishno Devi लेकिन भगवान राम ने समझाया कि उन्होंने अपनी पत्नी के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहने का वचन लिया है। हालाँकि, वह नहीं चाहते थे कि त्रिकुटा की तपस्या व्यर्थ जाये। इस प्रकार, भगवान राम ने उनसे कहा कि वह उनकी पहचान का परीक्षण करने के लिए भेष बदलकर वापस आएंगे। लंका से लौटने पर, भगवान राम एक बूढ़े भिक्षु के रूप में लड़की से मिलने गए, लेकिन वह उन्हें पहचानने में असफल रही। फिर प्रभु ने अपनी असली पहचान बताई और माता को आश्वासन दिया कि भविष्य में, वह कलियुग में ‘कल्कि’ के रूप में प्रकट होंगे और उनसे विवाह करेंगे। भगवान राम ने उन्हें माणिक पर्वत की त्रिकुटा श्रृंखला में ध्यान करने का भी निर्देश दिया, जहां उन्हें शाश्वत अमरता प्राप्त होगी और ‘वैष्णो देवी’ के रूप में पहचाना जाएगा। मंदिर की वास्तुकला : temple architecture सप्त ऋषि आश्रम रोड पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर, इस क्षेत्र के कई अन्य मंदिरों के मध्य बना हुआ है। यह मंदिर जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी मंदिर की वास्तुशिल्प जैसा ही बनाया गया है। वैसी ही सुरंगे यहाँ आपको देखने को मिलेंगी। Vaishno Devi जो लोग मूल वैष्णो देवी मंदिर की तीर्थयात्रा करने में असमर्थ हैं, उनके लिए यह पवित्र निवास एक आनंददायक विकल्प प्रदान करता है। भक्तों को माँ वैष्णो देवी से आशीर्वाद लेने के लिए मंजिलों पर चढ़ना होगा और एक संकीर्ण मानव निर्मित सुरंग से गुजरना होगा। Vaishno Devi इसके अतिरिक्त, यहां भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति भी देखी जा सकती है। Vaishno Devi यह मंदिर कुंभ मेला, बसंत पंचमी, मकर संक्रांति और गंगा दशहरा सहित हिंदू त्योहारों को भव्य रूप से मनाता है। वैष्णो देवी मंदिर का समय : Vaishno Devi Temple Timings वैष्णो देवी मंदिर खुलने का समय 08:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद वैष्णो देवी मंदिर में सूखा प्रसाद, चना चिरोंजी और माता को चुनरी चढ़ाई जाती है। साथ ही नारियल भी चढ़ा सकते है। पुष्प भी माता के चरणों में अर्पित कर सकते है।

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लक्ष्मी नारायण मंदिर: हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

पूज्य संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा स्थापित मंदिर हरिद्वार में लक्ष्मी नारायण मंदिर अत्यधिक पवित्र महत्व रखता है। यह मंदिर पवित्र शहर हरिद्वार से केवल 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह हिन्दू मंदिर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर निरंजनी अखाड़ा मार्ग, देवपुरा, हरिद्वार पर स्थित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की वास्तुकला कुरुक्षेत्र के समय के मंदिरों से मेल खाती है। हजारों की संख्या में भक्त इस मंदिर में दर्शनों के लिए आते है और भगवान के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी करने की कामना करते है। Laxmi Narayan Temple:लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना श्रद्धेय संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा की गयी थी। 2001 में, गुरुदेव ने धार्मिक संगठन भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम की स्थापना की। जिससे इस दिव्य पूजा स्थल का उदय हुआ। इस मंदिर निर्माण की प्रेरणा गुरुदेव ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी से मिली और इसे गुरुदेव के बड़े बेटे भाईश्री मनदीप नागपाल जी के दूरदर्शी नेतृत्व में फलीभूत किया गया। मंदिर का महत्व मंदिर का विस्तार करने हेतु लक्ष्मी नारायण मंदिर हरिद्वार आने वाले लोगों को गेस्ट हाउस की सुविधाएं प्रदान करता है। जो साधकों के लिए एक स्वागत योग्य और शांतिपूर्ण निवास है। गुरुदेव के अनुसार मंदिर का दृश्य प्रतिष्ठित श्री यंत्र को दर्शाता है, जो दिव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह पवित्र दर्शन मंदिर के महत्व को बढ़ाता है। दूर-दूर से आये तीर्थयात्रियों को देखने और गहन आध्यात्मिकता का अनुभव करने के लिए यह यन्त्र आकर्षित करता है। लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को विशाल भंडारा कराने का चलन है। जो काफी लम्बे समय से किया जाता आ रहा है। इस दौरान यहाँ पर भक्तों की भीड़ दिखाई देती है। मंदिर की वास्तुकला लक्ष्मी नारायण मंदिर भक्तों को शांत वातावरण और विशाल क्षेत्र प्रदान करता है। यह वास्तव में इसके संस्थापकों और अनुयायियों की अटूट भक्ति और आध्यात्मिक आकांक्षाओं का एक प्रमाण है, जो मानवता और परमात्मा के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। मंदिर को जमीन से कुछ ऊंचाई पर बनाया गया है।सीढ़ियों से मंदिर तक पंहुचा जा सकता है। मंदिर के मुख्य कक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान गणपति जी विराजमान है। मंदिर में कई झरोखे भी बने हुए है। यहाँ से हवा प्रवेश कर मंदिर के वातावरण को आनंदित कर देती है। इस मंदिर में भंडार गृह और बहुत सारे कक्ष है। इस मंदिर में हनुमान जी और गरुड़ जी की भी मूर्ति स्थापित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मी नारायण मंदिर में माखन मिश्री ,परमाल, चना चिरोंजी का भोग लगाया है। साथ ही भगवान को पुष्प भी अर्पित किये जाते हैं। भगवान को पीली वस्तुएं अर्पित की जाती है।

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अवधूत हनुमान मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। देवभूमि उत्तराखंड का हरिद्वार जिला चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार है। हरिद्वार को प्रभु हरि का द्वार कहा जाता है। यहां के ज्वालापुर में गंगा तट किनारे स्थित है अवधूत हनुमान मंदिर। यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। इसे बाबा हीरादास हनुमान मंदिर या अवधूत मंडल आश्रम के नाम से भी जानते हैं। इस आश्रम में भक्तों को रहने व खाने की सुविधा मिलती है। हर मंगलवार को यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार आने वाले भक्त यहां दर्शन करना नहीं भूलते। मंदिर में बजरंगबली के अलावा राम दरबार, शंकर-पार्वती, गणेश जी, मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। सबसे खास बात है कि राम दरबार में नेपाल की गंडक नदी से लाए गए दिव्य शालीग्राम पत्थरों के भी दर्शन होते हैं। आपको बता दें कि ऐसे ही शालीग्राम पत्थरों से अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर में मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। अवधूत हनुमान मंदिर का इतिहास यह मंदिर रामानंदी निराकारी वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। इस संप्रदाय की स्थापना स्वर्गीय श्री आचार्य बाबा सरयूदासजी महाराज ने करीब 200 साल पहले की थी। मंदिर के नाम में अवधूत का अर्थ होता है कि जिसको घर या बाहर किसी से कोई मतलब नहीं होता, जो भगवान की भक्ति में लीन रहता है। कुछ ऐसे ही थे मूल रूप से पटियाला के रहने वाले बाबा सरयूदासजी। ये एक महान और आध्यात्मिक संत थे। बताया जाता है एक बार पटियाला के राजा को संतान नहीं हो रही थी। इसको लेकर राजा-रानी सहित पूरी प्रजा दुखी थी। बाबा सरयूदासजी के आशीर्वाद से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद से बाबा की ख्याति और फैल गई। हरिद्वार में बाबा को उनके भक्तों ने ज्वालापुर गांव में गंगा नदी के तट ​पर एक जमीन दान में दी थी। बताया जाता है कि इसी जमीन पर सरयूदासजी के आदेश पर उनके अनुयायी बाबा हीरादास जी ने बसंत-पंचमी, दिनांक 13-04-1830 को यहां हनुमान मंदिर की नींव रखी। मंदिर में स्वामी हीरादास की मूर्ति भी लगी है। अवधूत हनुमान मंदिर का महत्व अवधूत हनुमान मंदिर में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसी वजह से इस मंदिर को कुछ भक्त मनकामेश्वर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना लेकर इस मंदिर में आती हैं। अवधूत हनुमान मंदिर की वास्तुकला अवधूत हनुमान मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही यहां का दृश्य किसी का भी मन मोह लेता है। मुख्य द्वार पर सबसे ऊपर विष्णु भगवान की प्रतिमा लगाई गई है। मंदिर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है। यहां हनुमानजी की एक हाथ में पर्वत लिए विशाल मूर्ति स्थापित है। इसके निर्माण की कहानी बहुत रोचक है। बताया जाता है कि मूर्ति तैयार करते समय लाखों लोगों ने कागज पर 11.11 करोड़ बार राम-नाम मंत्र लिखा था, जिसे गंगाजी के पवित्र जल में मिला दिया गया। इसके बाद सीमेंट व रेत में गंगाजी के इसी पवित्र जल को मिलाकर लेप तैयार किय गया, जिसका उपयोग हनुमानजी की विशाल मूर्ति तैयार करने में किया गया। अवधूत हनुमान मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए एक आश्रम है। इसके अलावा एक गौशाला भी हैं, जहां बड़ी अच्छे तरीके से गायों की देखरेख व सेवा की जाती है। अवधूत मंडल आश्रम जरूरतमंद व गरीब लोगों के लिए एक धर्मार्थ अस्पताल भी चलाता है। मंदिर परिसर में समय समय पर कथा व सत्संग का आयोजन भी होता रहता है। मंदिर परिसर में सत्यदेव पुरम कथा स्थल बना है। अवधूत हनुमान मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद अवधूत हनुमान मंदिर मेंं नारियल, बेसन के लड्डू, दूध के पेड़े, फल, फूल आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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गंगा घाट:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यहां डुबकी लगाने से मिलेगी पापों से मुक्ति गंगा घाट पवित्र शहर हरिद्वार में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हर की पौड़ी के नौ गंगा घाट बहुत ही पावन और महत्वपूर्ण महत्त्व रखते है। ये गंगा घाट हैं -विष्णु घाट, ब्रह्मकुंड घाट, कुशावर्त घाट, नाई घाट, बिरला घाट, सती घाट, गऊ घाट, नीलेश्वर घाट और बिल्केश्वर घाट। इन गंगा घाटों पर स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो गंगा नदी में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए आते है। ज्यादातर भक्त महाकुम्भ के समय इन घाटों पर आते है। गंगा स्नान करने से सभी दुःख दूर होते है। और आत्म को शांति मिलती है। मंदिर का इतिहास हर की पौड़ी पर निर्मित घाटों के विषय में कई किद्वन्तियाँ है जिसमे बताया जाता है कि इसका निर्माण विक्रमादित्य ने अपने भाई भृतहरि की याद में करवाया था। क्योंकि वह इन्ही गंगा घाट पर ध्यान किया करते थे। एक अन्य कथा के अनुसार कुछ इतिहासकारों ने इसका इतिहास राजा अकबर के शासन काल के समय का बताया है। कहा जाता है कि हर की पैड़ी पर स्थित ब्रह्मकुंड का घाट ब्रह्मकुंड न होकर प्राचीन समय का छत्रि स्थल था। यहीं पर राजा मानसिंह की अस्थियां विसर्जित की गयी थी। Ganga Ghat मंदिर का महत्व हर की पौड़ी पर स्थित कुछ गंगा घाट का विशेष महत्त्व है जैसे – 1)विष्णु घाट – हर की पौड़ी पर स्थित विष्णु घाट की अपनी महत्वता है। इस गंगा घाट पर यहां भगवान विष्णु का मंदिर निर्मित है। कहा जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने मात्रा से ही मनोकामना पूर्ण होती है। इस घाट पर स्नान करते हुए भगवान विष्णु का जाप करने का विशेष महत्त्व है। 2)ब्रह्मकुंड घाट – ब्रह्मकुंड घाट का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। बताया जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें इसी ब्रम्ह कुंड में गिरी थी। इस कारण इस कुंड का बहुत महत्त्व है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। 3)गऊ घाट – हर की पौड़ी पर स्थित गऊ घाट भी महत्वपूर्ण है। इस घाट पर बहुत सी गाय देखने को मिलती है। यहाँ स्नान करने के बाद उन्हें चारा, खाना आदि दान देने का महत्त्व है। हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जित के उपरांत मुंडन संस्कार और गऊ दान का विशेष महत्व माना गया है। गाय को चारा देने ,रोटी खिलाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है । इस कारण इस घाट पर बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ मिलती है। 4)बिरला घाट – बिरला घाट का भी अपना विशेष महत्व है। बिरला घाट की मान्यता है कि इसके धरातल में हनुमान जी की प्रतिमा स्थित है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। बिरला घाट को “हनुमान घाट” भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी घाट पर पांडव रुके थे। 5)नाई घाट – हर की पौड़ी के इस घाट पर मुंडन संस्कार किया जाता है। मृतक की अस्थि विसर्जन के बाद परिवार के सदस्यों का मुंडन संस्कार यहीं किया जाता है। इस घाट की ऐसी मान्यता है कि मुंडन संस्कार कराने के बाद यहाँ गंगा स्नान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 6)कुशावर्त घाट – हर की पौड़ी का यह घाट विश्व विख्यात है। धार्मिक ग्रंथों में इस घाट का भी वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली है। इस कारण यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय का मंदिर भी है। इस घाट पर पूर्वजों की आत्मा शांति हेतु क्रियाकर्म किया जाता है। 7)नीलेश्वर घाट – धार्मिक ग्रंथों में नीलेश्वर घाट का वर्णन भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। 8)बिल्केश्वर घाट – बिल्केश्वर घाट पर गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व है। यहाँ स्नान करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। महाकुंभ और स्नान पर्वों पर यहाँ भारी संख्या में लोग आते है। 9)सती घाट – धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सती घाट पर जिस भी व्यक्ति की कम उम्र में मृत्यु हो जाती थी , उसकी पत्नी भी साथ में दाह संस्कार करती थी। उनकी स्मृति में इस घाट पर छोटे छोटे मंदिर बनाये गए है। दूर दूर से लोग इस घाट पर अस्थि विसर्जित करने आते है। इस कारण इस घाट को ‘अस्थि प्रवाह घाट’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर अस्थि विसर्जन के बाद गंगा स्नान करने से पितरों को शांति प्रदान होती है। मंदिर की वास्तुकला गंगा घाट की वास्तुकला की बात की जाए तो यह घाट गंगा नदी के किनारे बने हुए है। प्रत्येक घाट पर गंगा नदी में स्नान करने के लिए कुछ दूरी तक सीढ़ियां बनाई गयी हैं। यहाँ पर जाकर आसानी से स्नान किया जा सकता है। प्रत्येक घाट पर मंदिर भी बने हुए जहाँ पर गंगा स्नान करने के बाद पूजा अर्चना की जा सकती है। घाट का सुन्दर दृश्य सुबह और शाम के समय बहुत ही मनोरम होता है। गंगा घाट मंदिर का समय गंगा घाट का समय 12:00 AM – 12:00 AM मंदिर का प्रसाद गंगा घाट पर प्रसाद के रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही गंगा मैया को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी और माँ भगवती को समर्पित है और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर सुरकूट पर्वत के ऊपर स्थित है। थोड़ी चढ़ाई पर स्थित मंदिर के आसपास जंगल का एक रमणीय दृश्य दिखाई देता है। मंदिर परिसर में मोरों को आते देखना आम बात है, जो इस पवित्र स्थान के मनमोहक माहौल को और भी बढ़ा देता है। मानसून के दौरान, मंदिर तक का रास्ता चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां बहने वाली धारा में आमतौर पर बाढ़ आ जाती है। हालाँकि अन्य मौसमों के दौरान जलधारा इस स्थान के प्राकृतिक आकर्षण को बढ़ा देती है। sureshwari devi mandir:का इतिहास सुरेश्वरी देवी मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु इस मंदिर की उत्पत्ति का उल्लेख धार्मिक ग्रंथ स्कंद पुराण के केदारखंड में किया गया है। उसमे बताया गया है कि देवराज इंद्र के स्वर्ग लोक से निष्कासित होने पर राजा रजी के पुत्र से भयभीत होकर वह क्षीर सागर में छुप गए। वहां उन्होंने देव गुरु बृहस्पति की आराधना की। तब इंद्र को गुरु बृहस्पति ने विष्णु भगवान की स्तुति करने का परामर्श दिया। भगवान विष्णु की स्तुति के उपरांत विष्णु जी ने इंद्र को गंगा के दक्षिण भाग में “सूरकूट पर्वत” पर जा कर माता की आराधना करने को कहा। तब देवराज इन्द्र ने इस सूरकूट पर्वत पर एक साधारण मानव की भांति माता की आराधना की। देवराज इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने इसी स्थल पर इंद्र को दर्शन दिए। साथ ही विजय होने का वरदान भी दिया। तब इंद्र को पुनः स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि इंद्र का नाम सुरेश भी है। इस कारण यहाँ पर माता का नाम सुरेश्वरी पड़ा। और यह स्थान सुरेश्वरी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुरेश्वरी देवी मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही चर्म रोग और कुष्ठ रोग का नाश हो जाता है। माता भक्तों के सभी कष्टों का हरण करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सुरेश्वरी देवी माता के दर्शन करने से पुत्र की कामना करने वालो को पुत्र, धन की कामना करने वालो को धन, मोक्ष चाहने वालो को मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन माता के दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवता भी इस दिन मां भगवती के दर्शन करने के लिए यहाँ आते है। सुरेश्वरी देवी मंदिर की वास्तुकला सुरेश्वरी मंदिर एक समृद्ध पारंपरिक पृष्ठभूमि वाला एक प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर तक पहुंचने पर प्रवेश द्वार पर एक खुला प्रांगण है। मुख्य मंदिर के केंद्र में माता सुरेश्वरी देवी की एक शानदार मूर्ति स्थापित है। जबकि बाहरी प्रांगण में भगवान शिव और उनके परिवार को समर्पित एक मंदिर है, जिसमें प्रतिष्ठित शिवलिंग भी शामिल है। प्रांगण की प्रमुख विशेषताओं में से एक राजसी बरगद का पेड़ है, जो उम्र और ज्ञान की आभा बिखेरते हुए अनगिनत पीढ़ियों से वहाँ खड़ा है। इसके अतिरिक्त, पहाड़ी के शिखर पर एक और उल्लेखनीय पूजा स्थल है – काली माता मंदिर। पहाड़ के किनारे सावधानीपूर्वक बनाई गई कई सीढ़ियों पर चढ़कर पहुंचा जा सकने वाला यह मंदिर आसपास के लुभावने दृश्य को दर्शाता है। सुरेश्वरी देवी मंदिर का समय सुरेश्वरी देवी मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद सुरेश्वरी देवी मंदिर में लड्डू, पेड़ा, मिठाई और सूखा प्रसाद चढ़ाया जाता है। माता को चुनरी भी चढ़ाई जाती है। पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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भीमगोड़ा कुंड मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

इस मंदिर का नाम पांच पांडवों में दूसरे भाई भीम के नाम पर रखा गया है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर:भीमगोड़ा कुंड, हरिद्वार में स्थित एक प्रतिष्ठित तालाब है, जिसका बहुत आध्यात्मिक महत्व है क्योंकि हजारों भक्त शुद्धिकरण हेतु इसके पवित्र जल में स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। इस पवित्र कुंड का नाम पांडव भाइयों के दूसरे बहादुर योद्धा ‘भीम’ के नाम पर रखा गया है। यह कुंड प्रसिद्ध हर की पौड़ी से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। भीमगोड़ा के निकट, भगवान विष्णु की चौबीस मूर्तियों से सुसज्जित एक मंदिर है – जो इस प्रतिष्ठित हिंदू देवता के अवतारों को दर्शाता है। यह पवित्र स्थल तीर्थयात्रियों और आगंतुकों को समान रूप से आकर्षित करता है, जो शांत वातावरण के बीच आशीर्वाद और शांति की तलाश में इसकी दिव्य आभा का आनंद लेने आते हैं। भीमगोड़ा आध्यात्मिक संतुष्टि और शांति की तलाश करने वालों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बना हुआ है। मंदिर का इतिहास भीमगोड़ा कुंड मंदिर के इतिहास से जुडी एक पौराणिक कथा है जिसके अनुसार हिमालय की अपनी यात्रा के समय पांडव भाई एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां उन्हें प्यास लगी। उसी क्षण भीम जो अपनी अपार ताकत के लिए जाने जाते थे उन्होंने अपने घुटने से जमीन पर प्रहार किया। जिससे एक पवित्र कुंड का निर्माण हुआ। उनके सम्मान में इस जलाशय का नाम ‘भीमगोड़ा’ रखा गया। यह कुंड एक भव्य पर्वत के नीचे स्थित है। भीमगोड़ा कुंड को गंगा नदी के पवित्र जल से पानी मिलता है। जिससे इसकी पवित्रता और महत्व बढ़ जाता है। आज भी, यह पूजनीय स्थल असंख्य भक्तों को आकर्षित करता है जो इसका दिव्य आशीर्वाद चाहते हैं और पवित्र जल से स्नान करने के लिए यहाँ आते है। मंदिर का महत्व भीमगोड़ा कुंड मंदिर को “गुप्त गंगा” भी कहते है। इस स्थान को भीमगोड़ा टेंक के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भीमगोड़ा कुंड मंदिर के कुंड में स्नान करने से शरीर का दर्द ठीक हो जाता है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर के विषय में ऐसी मान्यता है कि भीमगोड़ा कुंड में स्नान नहीं करने से गंगा स्नान पूर्ण नहीं माना जाता है। प्राचीन समय में बद्रिनाथ जी की यात्रा के लिए इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता था। परन्तु वर्तमान में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी के समीप ही भीमगोड़ा कुंड है और इस कुंड के पास भीमगोड़ा कुंड मंदिर भी निर्मित है। इस मंदिर में पांडवों की प्रतिमाएं बनी हुयी है। ऐसा भी बताया जाता है कि यहाँ पर ही पांडवों ने एक रुद्राक्ष को रखा और ध्यान किया था। बाद में उस रुद्राक्ष में से ग्यारह शिवलिंग निर्मित हुए थे। यह शिवलिंग आज भी भीमगोड़ा मंदिर में स्थापित है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद भीमगोड़ा कुंड मंदिर में आप अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद ले जा सकते है। साथ ही पुष्प भी चढ़ा सकते है।

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पावन धाम मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

पावन धाम मंदिर को ‘कांच का मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। पावन धाम मंदिर:चारों तरफ पहाड़ों से घिरे उत्तराखंड राज्य में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। प्रदेश का हरिद्वार जिला पूरे विश्व में धार्मिक व आस्था की दृष्टि से प्रसिद्ध है। यहां की गंगा आरती व कुंभ मेले में भाग लेने दुनिया के कोने-कोने से लोग आते हैं। हरिद्वार में कई ऐसे मंदिर हैं, जोकि आस्था का केंद्र माने जाते हैं, इन्हीं में से एक है पावन धाम मंदिर। यह कांच का मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का मुख्य आकर्षण बिंदु है इसे बनाने में प्रयोग किया गया कांच। मंदिर की दीवारों पर शीशे से सुंदर चित्रण व कलाकृतियां बनाई गई हैं। सप्त सरोवर रोड पर भगीरथी नगर में स्थित यह मंदिर बेहद खूबसूरत व लोकप्रिय है। हरिद्वार आने वाले भक्त इस मंदिर में दर्शन करना नहीं भूलते, क्योंकि यहां जाए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर की स्थापना साल 1970 में स्वामी वेदांत जी महाराज द्वारा की गई थी। पावन धाम एक गैर लाभकारी संस्था है, यानी इस मंदिर का उद्देश्य समाज कल्याण है। वेदांत जी महाराज ने दूसरों की मदद की सोच रखते हुए ही इस मंदिर की नींव रखी थी। यह मंदिर न सिर्फ मनुष्यों की सेवा बल्कि जानवरों की भी मदद करने के लिए जाना जाता है। संत सेवा, गौ सेवा, जरूरतमंद को मुफ्त भोजन आदि पावन धाम मंदिर की मुख्य गतिविधियों में शामिल है। आज भी यह संस्था सक्रिय रूप से सेवा भाव से कार्य कर रही है। वेदांत जी महाराज मोगा के स्कूलों के साथ ऋषिकेष मेंं स्थित प्रतिष्ठित संस्थान गीता भवन के भी संस्थापक हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन अत्यंत करुणा के साथ दूसरों की सेवा व मदद में ही समर्पित कर दिया। मंदिर का महत्व माना जाता है कि पावन धाम मंदिर में दर्शन मात्र से ही सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस मंदिर में दर्शन न करने पर हरिद्वार आने वाले भक्तों की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। भक्तों का मानना है कि इस पावन धाम में मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इस मंदिर में आपको महाभारत और रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों के चित्र दीवारों पर मिल लगे जाएंगे। मंदिर की वास्तुकला कांच से बना यह मंदिर बाहर से देखने में भले ही आम इमारतों जैसा प्रतीत हो लेकिन अंदर से यह किसी के भी मन को मंत्रमुग्ध कर देता है। इसकी स्थापत्य कला बेहद आकर्षक व अनोखी है। इस मंदिर की वास्तुकला जैसी सुंदरता देश के अन्य किसी हिंदू मंदिरों में देखने को नहीं मिलती। मंदिर में प्रवेश करते ही दाएं व बाएं तरफ देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। जबकि सामने कांच से बना मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है। यह देखने में काफी आकर्षक लगता है। मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, भगवान शंकर-पार्वती, गणेशजी व अन्य देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं। कांच से बनी दीवारों में प्रतिमाओं का दर्पण अद्भुत लगता है। मंदिर परिसर की दीवारों पर कांच से महाभारत व रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों का चित्रण किया गया है। यही नहीं मंदिर की छत पर भी छोटे-छोटे व रंग-बिरंगे कांचों का प्रयोग कर सुंदर कलाकृतियां बनाई गई हैं। पावन धाम मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में लईया, मीठा दाना का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके अलावा भक्त अपनी श्रृद्धा अनुसार मंदिर में पैसे दान कर सकते हैं।

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चंडी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। चंडी देवी मंदिर उत्तराखंड राज्य के पवित्र शहर हरिद्वार में चंडी देवी मंदिर स्थित है। हिन्दुओं का यह प्रसिद्ध मंदिर हिमालय के सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला शिवालिक पहाड़ियों के पूर्वी भाग वाले शिखर पर नील पर्वत पर स्थित है। हरिद्वार के अंदर स्थित पांच तीर्थों में इस धार्मिक मंदिर का भी स्थान है। चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। देवी चंडी को समर्पित इस मंदिर के दर्शन के लिए देश के हर कोने से लोग अपनी कामना लेकर माता के दरबार में आते है। विशेष अवसरों पर मंदिर में भारी भीड़ भी देखने को मिलती है। चंडी देवी मंदिर का इतिहास चंडी देवी मंदिर के इतिहास को लेकर कई किद्वन्तियाँ हैं। जिसमे कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कश्मीर के राजा सुच्चत सिंह ने सन 1929 में करवाया था। इसके अलावा दूसरी किद्वंती के अनुसार मंदिर में जो मूर्तियां स्थापित है वह आठवीं सदी की मानी जाती है। चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। जिन्हे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित करवाया गया था। वह हिन्दू धर्म के पूजनीय संतों में से एक थे। इस मंदिर से जुडी एक और पौराणिक कथा है जिसके अनुसार कुछ समय पहले देवता इंद्र के राज्य पर शुंभ और निशुंभ नामक राक्षसों ने कब्जा कर लिया था। सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। देवताओं अपनी इस समस्या को लेकर माता पार्वती के पास पहुंचे। तब माता ने चंडी के रूप को धारण किया और राक्षसों के समक्ष प्रकट हुईं। जब शुंभ ने उस असाधारण महिला की सुंदरता को देखा वो मोहित हो गया और माता चंडी से विवाह करने की इच्छा जताई। जब माता ने इनकार किया तो शुंभ ने अपने राक्षस चंद और मुंड को उन्हें मारने के लिए भेजा। परन्तु माता ने उनका वध कर दिया। इसके बाद शुंभ और निशुंभ दोनों ने माता को मरने का प्रयास किया लेकिन यह दोनों भी माता ने हाथों मारे गया। इसके बाद माता ने नील पर्वत के ऊपर थोड़ी देर विश्राम किया। ऐसा माना जाता है कि माता के इसी स्थान पर चंडी देवी का मंदिर बनाया गया। इस पर्वत श्रृंखला में स्थित 2 चोटियों को शुंभ और निशुंभ कहते है। मंदिर का महत्व चंडी देवी मंदिर के लिए माना जाता है कि इस मंदिर में सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इस कारण यहाँ पर भक्तों का ताँता लगा रहता है। चंडी देवी मंदिर में माता पार्वती के उग्र रूप की पूजा अर्चना की जाती है। इनका यह रूप माँ काली से समान है। कुम्भ मेले के समय श्रद्धालु माता के दर्शन करने जरूर आते है। हरिद्वार में तीन सिद्ध पीठ मंदिर स्थापित है जिसमे से एक पीठ माँ चंडी देवी को समर्पित है। दूसरा पीठ माँ मनसा देवी को समर्पित है और तीसरा माता माया देवी को समर्पित है। मंदिर की वास्तुकला चंडीदेवी मंदिर ऊँचाई पर स्थित होने के कारण मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां है। यदि आप रोप वे से जाते है तो भी आपको जो की लगभग 350 चढ़ना होगा। मंदिर तक पहुंचते समय चारों तरफ जंगल का नजारा बहुत ही मनमोहक रहता है। मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय शैली में है। मंदिर के समीप हनुमानजी की माँ अंजना माता का मंदिर भी स्थित है। जो भक्त चंडी देवी मंदिर में आते है वह इस मंदिर में भी दर्शन के लिए जरूर जाते हैं। चंडी देवी मंदिर का समय चंडी देवी मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद चंडी देवी मंदिर में सूखा मेवा, चना चिरौंजी का भोग लगाया जाता है। साथ ही चुनरी चढ़ाई जाती है। माता को फूल भी अर्पित किये जाते है

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माया देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

माया देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। माया देवी मंदिर:हरिद्वार का लोकप्रिय माया देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर हिंदू देवी माया को समर्पित है। इस मंदिर को तीन शक्तिपीठों में शामिल होने का गौरव भी प्राप्त है। माना जाता है कि देवी सती का हृदय और नाभि इसी स्थान पर स्थापित हैं। आदि शक्ति का एक रूप मानी जाने वाली देवी माया के दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में भक्तों भीड़ एकत्रित होती है। खासकर नवरात्र और कुंभ मेले के दौरान इस मंदिर में ज्यादा भीड़ देखने को मिलती है। कई भक्तों का यह भी मानना है कि इस पवित्र स्थल पर प्रार्थना करने से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। लोगों का मानना है कि हरिद्वार की प्राथमिक देवी के रूप में मानी जाने वाली माया देवी का एक विशेष महत्त्व है। देवी माता की एक झलक देखे बिना कोई भी तीर्थ यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है। हरिद्वार को पहले ‘मायापुरी’ भी कहा जाता था। प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर की संरचना भी हरिद्वार के तीन सबसे पुराने मंदिरों में से एक है, जो अभी भी कायम है। इसके अलावा नारायण-शिला और भैरव मंदिर हैं। देवी माया के साथ, पवित्र मंदिर में देवी कामाख्या और देवी काली की मूर्तियाँ हैं – जिन्हें आदि पराशक्ति के विभिन्न रूप माना जाता है। माया देवी मंदिर का इतिहास 11वीं शताब्दी में माया देवी मंदिर का निर्माण किया गया था। क्योंकि हरिद्वार में 11वीं शताब्दी में यह मंदिर अस्तित्व में आया। माया देवी मंदिर धार्मिक महत्व के साथ साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखता है। पवित्र गंगा के तट पर स्थित इस मंदिर द्वारा कई राजवंशों के उत्थान और पतन को देखा गया है। कई बार इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। इस प्राचीन मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और भक्ति की भावना को जीवित रखा है। वर्षो बाद भी यह मंदिर नारायण-शिला मंदिर और भैरव मंदिर के साथ अभी भी मजबूती से खड़ा है। माया देवी मंदिर का महत्व माया देवी मंदिर में दर्शन करने श्रद्धालु दूर-दूर से हरिद्वार आते है। इस मंदिर में पूजा अर्चना करने की विशेष मान्यता यह है कि यहां पर मांगी गई समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है। विशेषकर महिलाएं जो भी मनोकामना लेकर इस मंदिर में दर्शन को आती है। वह यहां से खाली नहीं जातीं। उनकी मनोकामना अवश्य ही पूरी होती है। माया देवी मंदिर 52 शक्तिपीठों में से पहला शक्तिपीठ है, जो हरिद्वार शहर के मध्य में स्थित है। इस मंदिर की कहानी भगवान शिव और माता सती से सम्बंधित है। समस्त शक्तिपीठों की उत्पत्ति का केंद्र हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मायादेवी मंदिर है। माता सती ने यहीं बैठकर योगाग्नि से अपने शरीर का त्याग किया था। माया देवी मंदिर की वास्तुकला माया देवी मंदिर उत्तरी भारत की पारंपरिक वास्तुकला को दर्शाता है। इस मंदिर में पारंपरिक और आधुनिक शैलियों का एक अच्छा मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर की संरचना साधारण होने के बावजूद भी मंदिर में प्लास्टर वाली मूर्तियां है जो विभिन्न मुद्राओं को चित्रित करती हैं। मुख्य गर्भगृह के अंदर, तीन मूर्तियाँ स्थापित हैं। इसके केंद्र में माया देवी, बाईं ओर देवी काली, और दाईं ओर देवी कामाख्या विराजित हैं। इसके अलावा, मंदिर में दो अन्य देवियाँ भी हैं, जिन्हें देवी शक्ति का रूप माना जाता है। चामुंडा की एक धातु की मूर्ति और शीतला देवी को समर्पित एक उप-मंदिर भी है। भक्त मंदिर परिसर के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। वह हर देवी देवताओं से आशीर्वाद लेते हैं। माया देवी मंदिर का समय मंदिर का सुबह का समय 06:30 AM – 12:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 03:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद माया देवी मंदिर में फल, नारियल, मिठाई, फूल और अगरबत्ती अर्पित की जाती है।

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दक्षिण काली मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। दक्षिण काली मंदिर आमतौर पर किसी मंदिर का नाम वहां स्थापित भगवान या उस स्थान के नाम पर रखा जाता है। लेकिन उत्तराखंड के हरिद्वार में एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। शहर के नील धारा क्षेत्र में चंडी देवी मंदिर मार्ग पर स्थित प्राचीन दक्षिण काली मंदिर सिद्धपीठ है। इसकी महिमा कोलकाता में स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर से कम नहीं है। देश में ऐसे सिर्फ 2 ही मंदिर हैं। मंदिर के नाम के साथ यहां की एक और खास बात है। पूरे देश में नवरात्रि 9 दिन की होती है, लेकिन यहां नवरात्रि पूरे 15 दिन तक मनाई जाती है। मां काली को समर्पित इस मंदिर में शनिवार को विशेष पूजा अर्चना ​की जाती है, जिससे माता प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सारे कष्ट दूर कर देती हैं। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। इस मंदिर में आए बिना तंत्र साधकों की साधना को पूरा नहीं माना जाता है। दक्षिण काली मंदिर का इतिहास बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 351 में हुई। इसका विवरण स्कंध पुराण में भी किया गया है। कलकत्ता के काली व शिवभक्त गुरु कमराज ने मां की मूर्ति को यहां स्थापित किया था। इसलिए इस धाम को कमराज पीठ, अमरा गुरु और दक्षिण काली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नील धारा क्षेत्र में ही माता कमराज के सपने में आईं और 108 नरमुंडों से मंदिर निर्माण की स्थापना की बात कही। जब कमराज ने पूछा कि इतने सारे नरमुंड वह कहां से लाएंगे, तो माता ने बताया कि इस जगह पर महामशान है। यहां आने वाले मुर्दों को जीवित कर उनकी इच्छा से 108 नरमुंडों की बलि दो। बताया जाता है कि 108 नरमुंडों के ऊपर ही मंदिर का निर्माण किया गया है। हालांकि, माता की मूर्ति कहां से आई, इसकी कोई जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि माता की यह प्रतिमा लाखों सालों से यहां है, जोकि स्वयंभू है। यानी अपने आप प्रकट हुई है। इस मंदिर का सागर मंथन से भी कनेक्शन है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सागर मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए पूरा विष अपने कंठ में धारण कर लिया। जिसके बाद महादेव ने विष के असर को कम करने के लिए कजरीवन में बह रह गंगा जी में स्नान किया था। बताया जाता है कि भगवान के स्नान के बाद विष के कारण कजरीवन में गंगा जी की धारा नीली हो गई। गंगा की इसी धारा को ही नीलधारा कहा गया। इसी नीलधारा के तट पर विराजमान हैं मां काली। दक्षिण काली मंदिरका महत्व माना जाता है कि खुद काल भैरव दक्षिण काली मंदिर की रक्षा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के आसपास काले व सफेद रंग के नाग-नागिन के जोड़े रहते हैं, जोकि सिर्फ सावन के दिनों में दिखाई देते हैं। शनिवार के दिन इस मंदिर में मां काली की अराधना करने से बड़े से बड़ा विघ्न दूर हो जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि इस मंदिर में तंत्र साधक विशेष साधना करते हैं जिससे प्रसन्‍न होकर मां काली उन्‍हें अपना आशीर्वाद देती हैं। यहां नील धारा क्षेत्र में गंगा की धारा में स्‍नान करने पर सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। दक्षिण काली मंदिरकी वास्तुकला गंगा की धारा मंदिर के दक्षिण की ओर से बहती है, इसलिए मंदिर का नाम दक्षिण काली मंदिर पड़ा। नील पर्वत माला व गंगा की तलहटी में मां काली विराजमान है। मंदिर के आसपास का वातावरण काफी शांत है। इसी वजह से यहां आने वाले भक्तों का तनाव व परेशानी दूर हो जाती है। मंदिर के गर्भगृह में मां काली की मूर्ति विराजमान है। गर्भगृह के कोने में ही एक प्राचीन त्रिशूल लगा है, जोकि 2700 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर के एक ओर नील पर्वत है तो दूसरी ओर मां गंगा की नील धारा। दक्षिण काली मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM शाम की आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद दक्षिण काली मंदिर में शनिवार को माता को पसंदीदा खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त माता को नारियल, गुलाब के फूल, काला जामुन, मीठा पान आदि अर्पित किया जाता है।

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बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

महादेव का यह एक ऐसा मंदिर है जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो भगवान शिव के कई मंदिर हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर लेकिन आज हम महादेव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं व कुंवारी कन्याओं को विवाह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माता पार्वती ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भोलेनाथ को पति के रूप में पाया था। हरिद्वार में बिल्व पर्वत पर स्थित है बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर। बिल्वकेश्वर महादेव बिल्व का अर्थ होता है (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के रूप में फल देने वाला स्थल। इसी पर्वत के नाम पर मंदिर का नाम पड़ा। नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है,बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जिसकी अराधना बिल्वकेश्वर या बिल्केश्वर महादेव के रूप में की जाती है। चारों तरफ हरे-भरे जंगलों से घिरे इस प्राचीन मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। सावन महीने में यहां जल चढ़ाने के लिए कांवड़ियों की भारी भीड़ आती है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का सबसे पहले जिक्र आया है। इसे माता पार्वती की तपोस्थली भी माना जाता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जैसा की प्रचलित है कि माता पार्वती दो बार भगवान शिव की अर्द्धांगिनी बनीं थीं, यानी 2 बार इनका विवाह हुआ था। पहला जब भगवान ने दक्षेश्वर के राजा दक्ष की पुत्री सती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। बिल्वकेश्वर महादेव जिसके बाद माता सती ने यज्ञ कुंड में भस्म होकर हिमालय राजा के घर पार्वती रूप में जन्म लिया था। माता पार्वती ने ऋषि नारद मुनि की सलाह पर बिल्व पर्वत पर आकर कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न कर दोबारा उनकी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। बताया जाता है कि माता पार्वती ने बिल्व पर्वत पर 3000 साल तक तपस्या की थी, जिसमें 1 हजार साल वो बिना अन्न व जल पीये रहीं थीं। माता की कठोर तपस्या देख महादेव ने उन्हें वृक्ष की शाखा के रूप में दर्शन दिए और माता पार्वती को विवाह का वरदान दिया। बेलपत्रों से घिरे मनोरम बिल्व पर्वत पर बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक गौरी कुंड है। इसको लेकर बताया जाता है बिल्वकेश्वर महादेव कि भगवान शिव की उपासना के दौरान माता पार्वती बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत की थी। लेकिन जब उन्हें प्यास लगी तो स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमंडल से पानी दिया, जोकि एक कुंड के रूप में आज भी है। बिल्वकेश्वर महादेव माता पार्वती के इस कुंड से पानी पीने के कारण इसका नाम गौरी कुंड पड़ा। कहते हैं कि इस कुंड का जल गंगा की तरह पवित्र है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का महत्व माना जाता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा इस मंदिर में बेलपत्र चढ़ाने से उनके विवाह की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के पास बने गौरी कुंड के जल को छू लेने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है कि मंदिर में मणिधारक अश्वतर नाम का महानाग रहता है, जो कभी कभी शिवलिंग के पास दिखाई देता है। माना जाता है कि महानाग के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ साल तक स्वर्ग में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला बिल्व पर्वत पर स्थित यह मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। मंदिर में नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। यानी इसे कहीं से लाकर स्थापित नहीं किया गया बल्कि यह अपने आप यहां प्रकट हुआ। नीम के पेड़ को काटे बिना मंदिर के गर्भगृह को बनाया गया है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में भगवान शंकर पार्वती के अलावा गणेश जी, हनुमानजी व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पीछे करीब 50 कदम पर गौरी कुंड है। उसी के ठीक बगल में एक गुफा भी है। बताया जाता है कि इसी गुफा में माता पार्वती विश्राम करती थीं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद महादेव की इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र चढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त पंचामृत, धतूरा, दूध, घी, शहर, फल व फूल भगवान को अर्पित करते हैं।

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