Radha Rani Ke 28 Name:राधा रानी के 28 नाम और उनके अर्थ | जाप से होती है हर मनोकामना की पूर्ति

Radha Rani Ke 28 Name :राधा रानी, हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण की प्रेमिका और शक्ति के रूप में पूजित हैं। उनकी भक्ति, कृष्ण भक्ति का एक महत्वपूर्ण आयाम है। राधा रानी के 28 नाम, उनके विभिन्न गुणों और रूपों का वर्णन करते हैं। Radha Rani Ke 28 Name इन नामों का जाप, भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा का साधन है। यह लेख, राधा रानी के इन 28 नामों का अर्थ और उनके विस्तृत विश्लेषण पर केंद्रित होगा। Radha Rani Ke 28 Name राधा रानी के 28 नाम, मात्र नाम नहीं हैं, बल्कि वे उनके स्वरूप, शक्ति और कृपा के प्रतीक हैं। इन नामों का जाप, भक्तों को राधा रानी के करीब लाता है और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। Radha Rani Ke 28 Name मान्यता है कि इन नामों का जाप करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। Radha Rani Ke 28 Name:28 नामों का विस्तृत विश्लेषण Radha Rani Ke 28 Name राधा रानी के 28 नामों का अर्थ और उनका विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है: प्रत्येक नाम का विस्तृत विश्लेषण

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Swapna Shastra:क्या दोपहर में देखे गए सपने होते हैं सच, जानिए क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Swapna Shastra:कई मान्यताओं के अनुसार यह माना गया है कि दोपहर में देखे गए सपने सच होते हैं। स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि किसी भी सपने के सच होने की संभावना उसके समय पर निर्भर करती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि किस समय देखे गए सपनों (Swapna Shastra in Hindi) के सच होने की संभावना अधिक होती है। Dream Astrology:स्वप्न शास्त्र में नींद में देखे गए सपनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है. बता दें कि सपनों का मनुष्य के निजी जीवन से गहरा संबंध होता है. इनमें से कुछ सपने शुभ होते हैं Swapna Shastra और कुछ ऐसे भी सपने हैं जिन्हें अशुभ माना जाता है. कई बार हम अनुभव करते हैं कि रात्रि और सुबह के समय देखे गए सपने सच हो जाते हैं. लेकिन कुछ ही लोग जानते हैं कि दोपहर को देखे गए सपनों का क्या अर्थ होता है और इसका क्या परिणाम निकल कर आता है. स्वप्न शास्त्र में इसके विषय में भी विस्तार से जानकारी दी गई है. आइए जानते हैं किस समय सपना दिखाई देने से उनके सच होने की संभावना बढ़ जाती है. क्या कहता है स्वप्न शास्त्र:What is dream science? स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि समय के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि सपना सच होगा या नहीं। कई बार जो सपने दिखाई देते हैं, वह सच होते हैं। स्वप्न शास्त्र की मानें, तो रात में 10 बजे से 12 के बीच देखे गए सपने का कोई फल नहीं होता है। क्योंकि वह आमतौर पर दिन में हुई घटनाओं पर आधारित होते हैं। Swapna Shastra वहीं कुछ सपने विचारों पर आधारित होते हैं। वहीं दोपहर में देखा गया सपना केवल विचारों और अचेतन मस्तिष्क की कल्पना पर आधारित होते हैं, इसलिए उनके सच होने की संभावना कम ही होती है। Swapna Shastra Know At What Time Dreams Come True Afternoon Night Or Morning :समय पर आधारित होता है सपने के सच होने की संभावना Swapna Shastra:स्वप्न शास्त्र में बताया गया है कि समय के आधार पर सपने सच होने की संभावनाएं बढ़ जाती है. कई बार जो सपने दिखाई देते हैं, वह सच होते हैं और कुछ ऐसे भी सपने होते हैं जो विचारों पर आधारित होते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, रात्रि 10:00 बजे से 12:00 के बीच देखे गए सपने का कोई फल नहीं होता है, वह आमतौर पर दिन में हुई घटनाओं पर आधारित होते हैं. स्वप्न शास्त्र में यह भी बताया गया है कि जो सपने रात्री 12:00 बजे से सुबह 03:00 के बीच देखे जाते हैं. उनके सच होने की संभावनाएं अधिक होती है और वह आमतौर पर 1 साल के भीतर सच हो सकते हैं. बता दें कि ब्रह्म मुहूर्त अर्थात सुबह 03:00 से 05:00 बजे के बीच देखे गए सपने अधिकांश समय सच होने लगते हैं. इनका फल 1 से 6 महीने के बीच ही दिखाई देने लगता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि जो सपने दोपहर को दिखाई देते हैं, उनका कोई भी अर्थ नहीं होता है और वह सच नहीं होते हैं. वह केवल विचारों और अचेतन मस्तिष्क की कल्पना होती है. सपने सच होने के पीछे क्या है कारण:What is the reason behind dreams coming true ? स्वप्न शास्त्र में यह बताया गया है कि सुबह के समय व्यक्ति अपनी आत्मा से सबसे अधिक जुड़ा होता है. इस दौरान देवीय शक्तियों का प्रभाव भी अधिक होता है, जिसका असर हर जीव पर पड़ता है. Swapna Shastra इसलिए इस दौरान देखे गए सपने व्यक्ति के भविष्य पर भी प्रभाव डालते हैं, जिस वजह से सपनों के सच होने की संभावना बढ़ जाती है. सच होते हैं इस समय देखे गए सपने:Dreams seen at this time come true Swapna Shastra:स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि जो सपने हम रात्रि में 12 बजे से सुबह 03 बजे के बीच में देखते हैं, उनके सच होने की संभावना अधिक होती है। माना गया है कि यह सपने 01 साल के भीतर सच हो सकते हैं। ये है सबसे उत्तम समय:This is the best time ब्रह्म मुहूर्त को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र माना गया है। Swapna Shastra ऐसे में ब्रह्म मुहूर्त यानी सुबह 03 बजे से लेकर 05 बजे के बीच देखे गए सपनों के सच होने की संभावना सबसे अधिक होती है। स्वप्न शास्त्र में माना गया है कि ये सपने 01 से 6 महीने के बीच सच हो सकते हैं।

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Butterfly in Dream:सपने में तितली देखना होता है शुभ या अशुभ, जानिये क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Butterfly in Dream:सपने में तितली देखना होता है शुभ या अशुभ, जानिये क्या कहता है स्वप्न शास्त्र Swapna Shastra:रात को सोते समय आपको कुछ न कुछ सपना जरूर आया होगा. कई लोगों को सुबह के समय वो सपना याद रहता है, तो बहुत से लोग सपने को भूल जाते हैं. स्वप्न शास्त्र की माने, तो सोते समय देखे गए हर सपनों का कुछ न कुछ अर्थ जरूर होता है, जिन्हें समय रहते पहचान कर व्यक्ति होने वाली किसी अनहोनी से खुद को बचा सकता है. सपने में तितली दिखने का अर्थ:Meaning of seeing butterfly in dream Butterfly in Dream:बता दें कि, अगर आपने सपने में तितली (Butterfly) को देखा है, तो इससे आपके जीवन पर कुछ न कुछ असर पड़ता है। तो चलिए आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे कि, सपने में तितली को देखने का क्या मतलब होता है। इसका आपके जीवन में अच्छा प्रभाव पड़ेगा या फिर आपके साथ कुछ बुरा होगा। तो आइए बिना किसी देरी किए जानते हैं स्वप्न शास्त्र के अनुसार इसका क्या मतलब होता है। तितली को देखना होता है शुभ:Seeing a butterfly is auspicious अगर आपने सपने में किसी विवाहित महिला के घर या फिर आंगन में तितली को उड़ता देखा है, तो यह आपके लिए यह बहुत ही शुभ माना जाता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार आपको जल्द ही धन की प्राप्ति हो सकती है। आपको अपने व्यवसाय में लाभ होगा साथ ही आपके कारोबार में तरक्की होगी। अगर आपने सपने में बड़ी तितली को देखा है, तो यह संकेत देता है कि, आपके सपने जल्द ही पूरे होने वाले हैं साथ ही आपका लक्ष्य पूरा होगा। स्वप्न शास्त्र Butterfly in Dream के मुताबिक, अगर आप सपने में तितली से भाग रहे हैं, Butterfly in Dream तो इसका अर्थ होता है कि आपके अंदर बहुत सी नकारात्मक चीजों ने वास किया हुआ है। ऐसा करने वाला व्यक्ति अनैतिक और बुरा व्यक्ति है जो कि भगवान से दूर है। खुद को पहचाने:identify yourself Butterfly in Dream:स्वप्न शास्त्रों की जानकारी के मुताबिक अगर आप सपने में तितली से भाग रहे हैं, तो इसका अर्थ होता है कि आपके अंदर बहुत सी नकारात्मक चीजों ने वास किया हुआ है. बता दें कि ऐसा करने वाला व्यक्ति  अनैतिक और बुरा व्यक्ति है जो भगवान से दूर है विभिन्न रंगों की तितली के सपने का अर्थ:Dream meaning of butterfly of different colors सपने में तितली देखने का अर्थ केवल तितली को देखकर ही नहीं, बल्कि उसके रंगों से भी जुड़ा हो सकता है। हर रंग का एक विशेष महत्व होता है, जो आपके जीवन में अलग-अलग संकेत और संदेश प्रदान करता है। सफेद तितली: सफेद रंग शुद्धता, शांति और अध्यात्म का प्रतीक है। अगर आप सपने में सफेद तितली देखते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि आपके जीवन में शांति और आध्यात्मिकता का समय आ रहा है। यह सपना आपको आत्मनिरीक्षण करने और अपनी आंतरिक शांति की खोज में समय देने के लिए प्रेरित करता है। पीली तितली: पीला रंग खुशी, उत्साह और नई शुरुआत का प्रतीक है। सपने में पीली तितली देखना यह संकेत करता है कि आपके जीवन में खुशी और उत्साह के नए अवसर आने वाले हैं। यह आपकी सकारात्मक ऊर्जा और उत्साही दृष्टिकोण को दर्शाता है। नीली तितली: नीला रंग विश्वास, समर्पण और शांति का प्रतीक है। नीली तितली का सपना यह संकेत कर सकता है कि आप अपने जीवन में गहराई और स्थिरता की तलाश में हैं। यह सपना आपके मानसिक और भावनात्मक संतुलन की ओर इशारा करता है। काली तितली: काले रंग का सपना अक्सर डर और अनिश्चितता का प्रतीक होता है। Butterfly in Dream काली तितली देखने का अर्थ यह हो सकता है कि आप अपने जीवन में किसी चिंता या भय का सामना कर रहे हैं। हालांकि, यह सपना यह भी बताता है कि यह समय आत्मनिरीक्षण का है और आपको अपने डर पर काबू पाने की आवश्यकता है। सपने में तितली देखना: धर्म और संस्कृतियों में इसके विभिन्न अर्थ:Seeing a butterfly in a dream: Its different meanings in religions and cultures Butterfly in Dream:सपनों में तितली देखना केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन के लिए ही संकेत नहीं देता, बल्कि विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों में भी इसका खास महत्व है। तितली को कई संस्कृतियों में बदलाव, पुनर्जन्म, आत्मा और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना गया है। Butterfly in Dream इस भाग में हम जानेंगे कि सपने में तितली देखना दुनिया के अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों में क्या महत्व रखता है और इसके क्या संकेत हो सकते हैं। 1. हिंदू धर्म में तितली का महत्व:Importance of butterfly in Hinduism हिंदू धर्म में तितली को आत्मा और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। यह जीवन के परिवर्तनशील स्वभाव को दर्शाती है, जैसा कि तितली एक कैटरपिलर से गुजरकर सुंदर और स्वतंत्र तितली में परिवर्तित होती है। Butterfly in Dream हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सपने में तितली देखना यह संकेत देता है कि आपकी आत्मा आध्यात्मिक यात्रा पर है और आप जीवन के एक नए चरण में प्रवेश करने वाले हैं। तितली का सपना इस बात का संकेत हो सकता है कि आप अपने अंदर की शक्ति और आध्यात्मिकता को पहचानने की प्रक्रिया में हैं। यह भी माना जाता है कि तितली देवी-देवताओं का आशीर्वाद या उनकी उपस्थिति का प्रतीक हो सकती है, जो यह संदेश देती है कि आपको अपने जीवन में किसी नई दिशा में जाने का समय आ गया है। 2. बौद्ध धर्म में तितली का प्रतीकात्मक अर्थ:Symbolic meaning of butterfly in Buddhism बौद्ध धर्म में तितली को परिवर्तन, लचीलेपन और नश्वरता का प्रतीक माना जाता है। तितली का जीवनचक्र बौद्ध धर्म के उन विचारों से मेल खाता है, जो जीवन की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता पर जोर देते हैं। सपने में तितली देखना इस बात का संकेत हो सकता है कि आप अपने जीवन के किसी ऐसे हिस्से को स्वीकार करने की तैयारी कर रहे हैं, जो अब तक अज्ञात या अनिश्चित था। तितली का सपना बौद्ध धर्म के अनुसार आत्मा के उत्थान और चेतना के उच्चतर स्तरों की ओर यात्रा का प्रतीक हो सकता है। Butterfly in Dream यह आपको जीवन के नश्वर स्वभाव को याद दिलाता है और यह प्रेरित करता है कि हर पल

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Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:लांगूलास्त्र शत्रुजन्य हनुमत स्तोत्र

Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:लांगुलास्त्र शत्रुजन्य हनुमत स्तोत्र: लांगुलास्त्र शत्रुजन्य हनुमत स्तोत्र (पूंछ जो कि शस्त्र है) में हनुमान जी को वीर अंजनेय के रूप में आह्वान किया गया है। लाल पुष्प और अन्य उपचारों का उपयोग करके रक्त-चन्दन से बने विग्रह में देवता की पूजा करनी चाहिए। फिर साधक को पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर एक बार, तीन बार, सात बार या इक्कीस बार स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। कठोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए यह प्रक्रिया अड़तालीस दिनों तक दोहराई जाती है। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra ऐसा करने से मारुति की कृपा से साधक के सभी शत्रुओं का शमन होता है। इन्द्रिय-निग्रह के बिना, ऐसी साधनाएँ करना खतरनाक साबित हो सकता है।” Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से जीवन से बुरी शक्तियां दूर रहती हैं। भूत-प्रेतों से डरने वाले बच्चों को हनुमान स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए, इससे आसपास की सभी नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra हनुमान चालीसा का प्रतिदिन पाठ करने से हनुमान शक्ति प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है। शत्रुओं का नाश करने और जीवन से सभी बाधाओं और रोगों को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र। भगवान हनुमान भगवान शिव के अवतार हैं। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:भगवान हनुमान मन की तरह तेज हैं, उनकी गति वायु देवता के समान है, वे अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं, वे पवन देव के पुत्र हैं, वानर सेना के प्रमुख हैं, राम के दूत हैं, अतुलनीय शक्ति के भंडार हैं, राक्षसों की शक्तियों का नाश करने वाले हैं और खतरों से मुक्ति दिलाते हैं। लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र का प्रयोग बहुत बड़ी समस्या होने पर भी किया जाता है। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra इसके जाप से बड़ी समस्या भी दूर हो जाती है और सारा संकट नष्ट हो जाता है तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। शत्रुओं द्वारा की गई पीड़ा, व्यवहार, चातुर्य, जप, वध आदि से मानस की शांति होती है और फिर सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र लाभ Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र भगवान हनुमान जी को समर्पित है। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन में बाधा डालने वाले सभी शत्रुओं का नाश होता है। और व्यक्ति के शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ शारीरिक समस्याओं और मानसिक पीड़ा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए लांगुलास्त्र शत्रुजंय हनुमत स्तोत्र अवश्य करना चाहिए। Laangulastr Shatrujany Hanumat Stotra करने से पहले सिद्धि के लिए परामर्श अवश्य लेना चाहिए। लांगूलास्त्र शत्रुजन्य हनुमत स्तोत्र हिंदी पाठLaangulastr Shatrujany Hanumat Stotra in Hindi ।। ॐ हनुमन्तमहावीर वायुतुल्यपराक्रमम् ।मम कार्यार्थमागच्छ प्रणमाणि मुहुर्मुहुः ।। विनियोगः- ॐ अस्य श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमालामन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः, नानाच्छन्दांसि श्री महावीरो हनुमान् देवता मारुतात्मज इति ह्सौं बीजम्, अञ्जनीसूनुरिति ह्फ्रें शक्तिः, ॐ हा हा हा इति कीलकम् श्री राम-भक्ति इति ह्वां प्राणः, श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर इति ह्वां ह्वीं ह्वूं जीव, ममाऽरातिपराजय-निमित्त-शत्रुञ्जय-स्तोत्र-मन्त्र-जपे विनियोगः । करन्यासः- • ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं हनुमते अंगुष्ठाभ्यां नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं रामदूताय तर्जनीभ्यां नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मण-प्राणदात्रे मध्यमाभ्यां नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे अनामिकाभ्यां नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोक-विनाशाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । हृदयादि-न्यासः- • ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं हनुमते हृदयाय नमः ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं रामदूताय शिरसे स्वाहा ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लक्ष्मण-प्राणदात्रे शिखायै वषट् ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं अञ्जनीसूनवे कवचाय हुम् ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं सीताशोक-विनाशाय नेत्र-त्रयाय वोषट् ।• ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय अस्त्राय फट् । ध्यानः- ध्यायेदच् बालदिवाकर द्युतनिभं देवार्रिदर्पापहं देवेन्द्रप्रमुख-प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा ।सुग्रीवादिसमस्तवानरयुतं सुव्यक्त-तत्त्व-प्रियं संरक्तारुण-लोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम् ।। उद्यन्मार्तण्ड-कोटि-प्रकटरुचियुतं चारुवीरासनस्थं मौञ्जीयज्ञोपवीताभरणरुचिशिखं शोभितं कुंडलाङ्कम् ।भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं ध्यायेद् देवं विधेयं प्लवगकुलपतिं गोष्पदी भूतवार्धिम् ।। वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डल-मण्डितम् । निगूढमुपसङ्गम्य पारावारपराक्रमम् ।।स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम् । कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं हरिं भजे ।।सव्यहस्ते गदायुक्तं वामहस्ते कमण्डलुम् । उद्यद्दक्षिणदोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ।। इस तरह से श्रीहनुमानजी का ध्यान करके “अरे मल्ल चटख” तथा “टोडर मल्ल चटख” का उच्चारण करके हनुमानजी को ‘कपिमुद्रा’ प्रदर्शित करें । ।। माला-मन्त्र ।। “ॐ ऐं श्रीं ह्वां ह्वीं ह्वूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्ख्फ्रें ह्सौं नमो हनुमते त्रैलोक्याक्रमण-पराक्रमण-श्रीरामभक्त मम परस्य च सर्वशत्रून् चतुर्वर्णसम्भवान् पुं-स्त्री-नपुंसकान् भूत-भविष्यद्-वर्तमानान् दूरस्थ-समीपस्थान् नाना-नामघेयान् नाना-संकर-जातियान् कलत्र-पुत्र-मित्र-भृत्य-बन्धु-सुहृत्-समेतान् प्रभु-शक्ति-समेतान् धन-धान्यादि-सम्पत्ति-युतान् राज्ञो-राजपुत्र-सरवकान् मंत्री-सचिव-सखीन् आत्यन्ति कान्क्षणेन त्वरया एतद्दिनावधि नानोपायैर्मारय मारय शस्त्रेण छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय अक्षयकुमारवत् पादताक्रमणे शिलातले त्रोटय त्रोटय घातय घातय बंधय बंधय भ्रामय भ्रामय भयातुरान्विसंज्ञान्सद्यः कुरु कुरु भस्मीभूतानुद्धूलय भस्मीभूतानुद्धूलय भक्तजनवत्सल सीताशोकापहारक सर्वत्र मामेनं च रक्ष रक्ष महारुद्रावतार हां हां हुं हुं भूत-संघैः सह भक्षय भक्षय क्रुद्ध चेतसा नखैर्विदारय नखैर्विदारय देशादस्मादुच्चाटय पिशाचवद् भ्रंशय भ्रंशय घे घे हूं फट् स्वाहा ।।१।। ॐ नमो भगवते हनुमते महाबलपराक्रमाय महाविपत्ति-निवारकाय भक्तजन मनःकल्पना कल्पद्रुमाय दुष्टजन-मनोरथ-स्तम्भकाय प्रभञ्जन-प्राणप्रियाय स्वाहा ।।२।। ध्यानः- श्रीमन्तं हनुमन्तमात्तरिपुभिद्भूभृत्तरुभ्राजितं वल्गद्वालधिबद्धवैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम् ।रोषाद्रक्तपिशङ्ग-नेत्र नलिनं भ्रूमभङ्मङ्गस्फुरत् प्रोद्यच्चण्ड-मयूख-मण्डल-मुखं-दुःखापहं दुःखिनाम् ।। १ ।। कौपीनं कटिसूत्रमौंज्यजिनयुग्देहं विदेहात्मजाप्राणाधीश-पदारविन्द-निरतं स्वान्तं कृतान्तं द्विषाम् ।ध्यात्वैव समराङ्गणस्थितमथानीय स्वहृत्पङ्कजे संपूजनोक्तविधिना संप्रार्थयेत्प्रार्थितम् ।। २ ।। ।। मूल-पाठ ।। हनुमन्नञ्जनीसूनो ! महाबलपराक्रम ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। १ ।। मर्कटाधिप ! मार्तण्ड मण्डल-ग्रास-कारक ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। २ ।। अक्षक्षपणपिङ्गाक्षक्षितिजाशुग्क्षयङ्र ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ३ ।। रुद्रावतार ! संसार-दुःख-भारापहारक ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ४ ।। श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायितमानस ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ५ ।। बालिप्रथमक्रान्त सुग्रीवोन्मोचनप्रभो ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ६ ।। सीता-विरह-वारीश-मग्न-सीतेश-तारक ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ७ ।। रक्षोराज-तापाग्नि-दह्यमान-जगद्वन ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ८ ।। ग्रस्ताऽशैजगत्-स्वास्थ्य-राक्षसाम्भोधिमन्दर ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ९ ।। पुच्छ-गुच्छ-स्फुरद्वीर-जगद्-दग्धारिपत्तन ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। १० ।। जगन्मनो-दुरुल्लंघ्य-पारावार विलंघन ! ।लोलल्लांगूलपातेन ममाऽतरीन् निपातय ।। ११ ।।

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Rinmochan Maha Ganapati Stotram:श्री ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र

श्री ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र हिंदी पाठ:Rinmochan Maha Ganapati Stotram in Hindi  Rinmochan Maha Ganapati Stotram:विनियोग – ॐ अस्य श्रीऋण-मोचन महा-गणपति-स्तोत्र-मन्त्रस्य भगवान् शुक्राचार्य ऋषिः, ऋण-मोचन-गणपतिः देवता, मम-ऋण-मोचनार्थं जपे विनियोगः ।  ऋष्यादि-न्यास – भगवान् शुक्राचार्य ऋषये नमः शिरसि, ऋण-मोचन-गणपति देवतायै नमः हृदि, मम-ऋण-मोचनार्थे जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ । ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र  ॐ स्मरामि देव-देवेश।वक्र-तुण्डं महा-बलम् ।षडक्षरं कृपा-सिन्धु, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 1 ।। महा-गणपतिं देवं, महा-सत्त्वं महा-बलम् ।महा-विघ्न-हरं सौम्यं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 2 ।। एकाक्षरं एक-दन्तं, एक-ब्रह्म सनातनम् ।एकमेवाद्वितीयं च, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 3 ।। शुक्लाम्बरं शुक्ल-वर्णं, शुक्ल-गन्धानुलेपनम् ।सर्व-शुक्ल-मयं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 4 ।। रक्ताम्बरं रक्त-वर्णं, रक्त-गन्धानुलेपनम् ।रक्त-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 5 ।। कृष्णाम्बरं कृष्ण-वर्णं, कृष्ण-गन्धानुलेपनम् ।कृष्ण-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 6 ।। पीताम्बरं पीत-वर्णं, पीत-गन्धानुलेपनम् ।पीत-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 7 ।। नीलाम्बरं नील-वर्णं, नील-गन्धानुलेपनम् ।नील-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 8 ।। धूम्राम्बरं धूम्र-वर्णं, धूम्र-गन्धानुलेपनम् ।धूम्र-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 9 ।। सर्वाम्बरं सर्व-वर्णं, सर्व-गन्धानुलेपनम् ।सर्व-पुष्पै पूज्यमानं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 10 ।। भद्र-जातं च रुपं च, पाशांकुश-धरं शुभम् ।सर्व-विघ्न-हरं देवं, नमामि ऋण-मुक्तये ।। 11 ।। Rinmochan Maha Ganapati Stotram:फल-श्रुति – यः पठेत् ऋण-हरं-स्तोत्रं, प्रातः-काले सुधी नरः ।षण्मासाभ्यन्तरे चैव, ऋणच्छेदो भविष्यति ।। इति श्री ऋणमोचन महागणपति स्तोत्र संपूर्णम् ।। जो व्यक्ति उक्त “ऋण-मोचन-स्तोत्र’ का नित्य प्रातः काल पाठ करता है, उसका छः मास में ऋण-निवारण होता है ।

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Raja Harischandra Ki Katha:सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र इसलिए कहलाए महादानी, जरूर पढ़ें यह कथा

Raja Harischandra Ki Katha:सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र (Raja Harischandra) की कहानी सदियों से अनुकरणीय है। सत्य की चर्चा जब भी कही जाएगी, महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम जरूर लिया जायेगा। सूर्यवंशी सत्यव्रत के पुत्र राजा हरिश्चंद्र, जिन्हें उनकी सत्यनिष्ठा के लिए आज भी जाना जाता है। उनकी सत्य के प्रति निष्ठा उनके युगों बाद भी सत्य का प्रतीक बनी हुई है। इनका युग त्रेता माना जाता है। राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे जो सत्यव्रत के पुत्र थे। ये अपनी सत्यनिष्ठा के लिए अड़िग रहे और इसके लिए इन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े। ये बहुत दिनों तक पुत्रहीन रहे पर अंत में अपने कुलगुरु वशिष्ठ के उपदेश से एवं वरुणदेव की उपासना से इन्हे पुत्र प्राप्त हुआ। सत्यवादी हरिश्चंद्र (Raja Harischandra) Raja Harischandra Ki Katha:राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। Raja Harischandra Ki Katha राजा हरिश्चंद्र हर हालत में केवल सच का ही साथ देते थे। अपनी इस निष्ठा की वजह से कई बार उन्हें बड़ी–बड़ी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने किसी भी हाल में सच का साथ नहीं छोड़ा। वे एक बार जो प्रण ले लेते थे उसे किसी भी कीमत पर पूरा करके ही छोड़ते थे। राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य के मार्ग पर चलने के लिये स्वयं तक को बेच दिया था। सपना और सब त्यागना:Dream and give up everything इनकी पत्नी का नाम तारामती था और पुत्र का नाम रोहिताश्व। ये दोनों भी धार्मिक चरित्र के थे। राजा हरिश्चन्द्र ने यदि स्वप्न में भी वाग दान कर दिया यानी वचन दे दिया तो भी पीछे नही हटते थे। Raja Harischandra Ki Katha ऋषि विश्वामित्र की शक्ति से, राजा हरिश्चन्द्र ने सपना देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट विश्वामित्र को दान में दे दिया है। अगले दिन जब विश्वामित्र उनके महल में आए तो उन्होंने विश्वामित्र को सारा हाल सुनाया और साथ ही अपना राज्य उन्हें सौंप दिया। पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं की मांग:Demand for five hundred gold coins जाते–जाते विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से दान उपरांत दक्षिणा में पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं की मांग की। विश्वामित्र ने राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। अपनी मर्यादा को निभाया। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था, वह श्मशान का चांडाल था। राजा हरिश्चंद्र (Raja Harischandra) के पुत्र की मृत्यु  जो शवदाह के लिए आए मृतक के परिजन से कर लेकर उन्हें अंतिम संस्कार करने देता था। एक रात्रि को सर्प के काटने से राजा के पुत्र की मृत्यु हो गई। असहाय रानी तारा, रोती – बिलखती अपने पुत्र को श्मशान में अन्तिम क्रिया के लिये लेकर जा रही थी। Raja Harischandra Ki Katha काली अंधियारी रात में, जोरों की बारिश हो रही थी। बादल गरज रहे थे, बिजली चमक रही थी, और अभागन माता अपने पुत्र के शव को अकेली श्मशान लेकर पहुंची। वहाँ पर राजा हरिश्चंद्र ने रानी को बिना देखे ही श्मशान कर के लिये आदेश दिया। इतने में, आसमान में बिजली चमकी तो उस बिजली की रोशनी में हरिश्चंद्र को उस अबला स्त्री का चेहरा नजर आया। वह स्त्री उनकी पत्नी तारामती थी और उसके हाथ में उनके पुत्र रोहिताश्व का शव था। Raja Harischandra Ki Katha अपनी पत्नी की यह दशा और पुत्र के शव को देखकर हरिश्चंद्र बेहद भावुक हो उठे। उस दिन उनका एकादशी का व्रत भी था और परिवार की इस हालत ने उन्हें हिलाकर रख दिया। उनकी आंखों में आंसू भरे थे। कर्तव्यपरायण राजा हरिश्चंद्र (Raja Harischandra) Raja Harischandra Ki Katha:लेकिन, फिर भी वह अपने कर्तव्य की रक्षा के लिए आतुर थे। भारी मन से उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि “जिस सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने अपना महल, राजपाट तक त्याग दिया, स्वयं और अपने परिवार को बेच दिया, आज यह उसी सत्य की रक्षा की घड़ी है“। राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी से कहा तुम्हे श्मशान में अपने पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए निर्धारित कर देना ही होगा। रानी तारा कर के रूप में अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़ कर देने की कोशिश करती हैं उसी समय आकाशवाणी हुई और स्वयं ईश्वर प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा “हरिश्चन्द्र! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। Raja Harischandra Ki Katha तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे।“ और, राजा की ली जाने वाली ‘दान वाली‘ परीक्षा तथा कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की जीत बतायी। हरिश्चंद्र ने ईश्वर से कहा “अगर वाकई मेरी कर्तव्यनिष्ठा और सत्य के प्रति समर्पण सही है तो कृपया इस स्त्री के पुत्र को जीवनदान दीजिए”। Raja Harischandra Ki Katha इतने में रोहिताश्व जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र का राजपाठ भी उन्हें वापस लौटा दिया। महाराज हरिश्चन्द्र ने स्वयं को बेचकर भी सत्यव्रत का पालन किया। यह सत्य एवं धर्म के पालन का एक बेमिसाल उदाहरण है। आज भी महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है।

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Sapne Me Machhli Dekhna:सपने में मछली देखना शुभ है या अशुभ? जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Sapne Me Machhli Dekhna:स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपनों में दिखाई देने वाली चीज़ें भविष्य के लिए संकेत करती हैं. ये अवचेतन मन की सोच जाने-अनजाने में सोते समय साकार रूप में दिखाई दे सकती है. सपने में मछली का दिखना भी कई संकेत देता है Meaning of Fish Dreams:दिनभर थकान भरी लाइफ के बाद एक प्यारी सी नींद हर किसी की चाहत होती है। ऐसे में सोते ही कई लोग स्वप्न लोक में पहुंच जाते हैं। जहां पर उन्हें विभिन्न तरह के सपने दिखाई देते हैं। Sapne Me Machhli Dekhna इनमें से कई सपने सुखद होते हैं, तो कई इतना भयानक होते हैं कि व्यक्ति डर क जाग देता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, व्यक्ति सोते समय विभिन्न तरह के सपनों को देखता है। ऐसे में हर सपना सही हो ये जरूरी नहीं है। ऐसे में कई लोग सपने में मछली देखते हैं। आमतौर पर सपने में मछली देखना कई बार सुखद हो सकता है। आइए जानते हैं सपने में मछली देखने का क्या है अर्थ। Sapne Me Machhli Dekhna:सपने में मछली देखना शुभ है या अशुभ सपने में बड़ी मछली देखने का मतलब:Meaning of seeing big fish in dream अगर सपने में कोई बड़ी मछली देखते हैं, तो इसका मतलब है कि मां लक्ष्मी की आपके ऊपर असीम कृपा होने वाली हैं। बिजनेस में अपार सफलता के साथ धन लाभ हो सकता है। जीवन में हर एक खुशी आएगी। Sapne Me Machhli Dekhna सकारात्मक ऊर्जा तेजी से बढ़ेगी, जिससे ऐशो-आराम भरा जीवन जी सकते हैं। सपने में रंगीन मछली देखने का अर्थ:Meaning of seeing colorful fish in dream अगर सपने में आपको विभिन्न रंग वाली मछली दिखती हैं, तो समझ लें कि आपके जीवन का हर एक कष्ट समाप्त हो वाला है। Sapne Me Machhli Dekhna घर में सुख-सौभाग्य की दस्तक होने वाली है। इसके साथ ही लंबे समय से चल रही बीमारी से भी छुटकारा मिलने वाला है। सपने में मछली को तैरते हुए देखना:Seeing fish swimming in dream अगर आप सपने में मछली को तैरते हुए देखते हैं, Sapne Me Machhli Dekhna तो समझ लें कि आपके जीवन में भी अच्छे दिन आने वाले हैं। सुख-समृद्धि, धन-दौलत की प्राप्ति हो सकती है। व्यापार और नौकरी में भी कोई गुड न्यूज मिल सकती है। संतान की ओर से भी खुशियां आ सकती है।   सपने में मछली को दाना खिलाने का मतलब:Meaning of feeding fish in dream सपने में अगर आप खुद को नदी, तालाब या फिर समुद्र किनारे बैठकर मछली को दाना खिलाते हुए देखते हैं, Sapne Me Machhli Dekhna तो मान लें आपको सुख-समृद्धि के साथ धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी।   प्रेगनेंसी में मछली का सपना देखना:Dreaming of fish during pregnancy यदि प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही के दौरान आप कोई ऐसा सपना देखती हैं, जिसमें आपको ढेर सारी मछलियां दिखाई दे रही है. तो यह आपके लिए शुभ हो सकता है. इस सपने का अर्थ है कि आपका प्रेगनेंसी का समय बेहद अच्छा गुज़रने वाला है. Sapne Me Machhli Dekhna आपको किसी भी तरह की समस्या नहीं होगी. कुल मिलाकर यह सपना आपके लिए बेहद शुभ होगा और यह भविष्य में आपको शुभ फल प्रदान करेगा. सपने में पालतू मछली देखना:Seeing pet fish in dream यदि आप सपने में किसी एक्वेरियम में मछली देखते हैं. जो घर में रखा हुआ है, तो यह आपके लिए ज़िम्मेदारी का संकेत हो सकता है. इस सपने का वास्तविक जीवन में अर्थ है कि आपको आने वाले भविष्य में कोई बड़ी ज़िम्मेदारी मिल सकती है. गोल्डफिश का सपना देखना प्रतीक है कि आप किसी ज़िम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा रहे हैं. सपने में मछली का जोड़ा देखना:Seeing a pair of fish in the dream यदि आपको अपने सपने में मछलियों का जोड़ा दिखाई देता है तो यह आपके प्रेम और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत हो सकता है. मछलियों का जोड़ा देखने का अर्थ है कि आपका आपके प्रेमी या जीवनसाथी के साथ प्रेम बढ़ने वाला है. गोल्डफिश को प्रेम का प्रतीक माना जाता है. सपने में गोल्डफिश देखने का मतलब है कि आपकी जीवन में सामंजस्य आएगा. ख़ुद को मछली पकड़ते हुए देखना:see yourself fishing यदि आप अपने आपको किसी समुद्र में बहुत सारी मछलियां पकड़ते हुए देख रहे हैं, तो यह सपना वास्तविक जीवन में इस बात का प्रतीक है कि आप किसी काम को करने में असफल हो रहे हैं, लेकिन जल्द ही आपको उस काम में सफलता प्राप्त होगी. मछलियां पकड़ते हुए देखना रिश्ते से जुड़े किसी निर्णय की तरफ़ इशारा करता है, या फिर आपकी नौकरी से जुड़ी कोई बात भी हो सकती है.

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History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु का इतिहास जानें

History of Lord Vishnu:पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रिदेव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश देवताओं में सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। संसार के निर्माण, संचालन और संहार का कार्य इन तीनों के ही हाथ में है। इन त्रिदेवों में भगवान विष्णु पालनकर्ता के रूप में संसार को चलाते हैं। History of Lord Vishnu लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के संचालन कर्ता श्रीहरि विष्णु जी की उत्पत्ति कैसे हुई? इस संदर्भ में , शिवपुराण की कथा प्रचलित हैं।  History of Lord Vishnu:शिव पुराण में उल्लेख है कि विष्णु जी की उत्पत्ति भगवान शंकर जी की इच्छा से हुई है। शिव जी ने एक बार अपने मनोभाव प्रकट करते हुए पार्वती से कहा कि मैं सृष्टि का पालन करने में सक्षम एक ऐसे श्रेष्ठतम साधक की रचना करना चाहता हूं जो संसार का संचालन कर सकें। शिव जी की इच्छानुसार आदिशक्ति ने कमल नयन, चतुर्भुजी और कौस्तुकमणि से सुशोभित विष्णु जी को अवतरित किया। History of Lord Vishnu सर्वत्र व्याप्त होने में सक्षमता के कारण उनका नाम विष्णु हुआ़। History of Lord Vishnu अवतरित होने के तुरंत बाद भगवान शिव ने उन्हें तप के लिए भेजा। चिरकाल तक तपस्या करने के बाद भगवान श्रीहरि विष्णु जी ने अपने तपोबल से जल की उत्पत्ति कर जीवन सृजन किया। भगवान विष्णु की सवारी गरुड़ है। इनके एक हाथ में कौमोदकी गदा, दूसरे हाथ में पाञ्चजन्य शंख, तीसरे हाथ में सुदर्शन चक्र और चौथे हाथ में कमल है। History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु का इतिहास History of the Forms of Gods & Goddesses Lord Vishnu:विष्णु रूप में उन्होंने ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी से विवाह किया। माता लक्ष्मी की माता का नाम ख्याति था। विष्णु और लक्ष्मी के करीब 18 पुत्र थे।  आनन्द: कर्दम: श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुत:। ऋषय श्रिय: पुत्राश्च मयि श्रीर्देवी देवता।।- (ऋग्वेद 4/5/6) नाम : विष्‍णु वर्णन : हाथ में शंख, गदा, चक्र, कमल पत्नी : लक्ष्मी पुत्र : आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत शस्त्र : सुदर्शन चक्र वाहन : गरूड़ विष्णु पार्षद : जय, विजय विष्णु संदेशवाहक : नारद निवास : क्षीरसागर (हिन्द महासागर) ग्रंथ : विष्णु ‍पुराण, भागवत पुराण, वराह पुराण, मत्स्य पुराण, कुर्म पुराण। मंत्र : ॐ विष्णु नम:, ॐ नमो नारायण, हरि ॐ विष्णु के प्रकट अवतार :Manifest incarnations of Vishnu 1. हंसावतार : सनकादि मुनियों के दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करने के लिए विष्‍णु ने हंसावतार धारण किया था। History of Lord Vishnu उन्होंने मुनियों को वैदिक ज्ञान बताकर दीक्षा प्रदान की थी। हंस रूप विष्णु ने ही शांत नामक दैत्य का वध किया था 2 . आदि वराह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह रूप धरा था। 3. नृसिंह अवतार : विष्णु ने कश्यप के पुत्र हिरण्यकशिपु का नृसिंह रूप धारण कर वध किया था। 4. मोहिनी अवतार : उन्होंने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों से अमृत कलश को बचाकर देवताओं को दे दिया था। 5. जलंधर : विष्णु ने शिव पुत्र जलंधर का रूप धारण करके वृंदा का सतीत्व खंडित किया था। 6. मोहिनी अवतार : विष्णु ने भस्मासुर को मारने के लिए एक बार फिर उन्होंने मोहिनी रूप धारण किया। 7. कच्छप अवतार : समुद्र मंथन के दौरान जब धरती डोल रही थी, तब उन्होंने कच्छप रूप धारण किया। 8. धन्वंतरि : समुद्र मंथन के दौरान अंत में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे History of Lord Vishnu विष्णु जिन्हें भगवान धन्वंतरि कहा गया। भगवान के इस देव रूप ने आयुर्वेद, वेद, आरोग्य, वनस्पति आदि की शिक्षा दी। उनके बाद राजा धन्व के पुत्र धन्वंतरि हुए जिनके केतुमान नामक पुत्र थे। केतुमान के पुत्र का नाम भीमरथ था। भीमरथ के पुत्र का नाम दिवीदास था। दिवीदास का संवरण था जिसने सुदास से युद्ध लड़ा था। 9. हयग्रीव अवतार : विष्णु ने हयग्रीव नामक सोमकासुर को मारने के लिए हयग्रीव का ही रूप धारण किया। 10. मत्स्य अवतार : प्रलयकाल के दौरान मत्स्य रूप धारण कर राजा वैवस्वत मनु को नाव बनाकर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा। 11. गजेन्द्रोधारावतार : हाथी (इंद्रद्युम्न) को मगरमच्छ (हुहू) से बचाने के लिए गजेन्द्रोधारावतार धरण किया। 12. स्वायंभुव मनु के दो पुत्र प्रियवत और उत्तानपाद में से उत्तानपाद के पु‍त्र ध्रुव को विष्णु ने वरदान दिया था। विष्णु के जन्मावतार 1. सनकादि अवतार : विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्रों सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार के रूप में जन्म लेकर वेद ज्ञान का प्रकाश फैलाया। 2. नर-नारायण : धर्म की पत्नी रुचि के गर्भ से भगवान विष्णु ने नर और नारायण नामक दो ऋषियों के रूप में जन्म लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अतः जन्म लेते ही बदरीवन में तपस्या करने के लिए चले गए। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार होता है। 3. वामनावतार : कश्यप-अदिति के 12 पुत्रों में से एक त्रिविक्रम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया जिन्होंने असुर राज बाली से तीन पग में धरती दान में ले ली थी। उन्हें वामन भी कहा गया। 4. परशुराम अवतार : क्रूर राजाओं से समाज को बचाने के लिए और समाज में फिर से वैदिक व्यवस्था लागू करने के लिए विष्णु ने जमदग्नि-रेणुका के पुत्र के रूप में जन्म लिया, जो आगे चलकर परशुराम कहलाए। 5. व्यास अवतार : परशुराम के बाद वेद व्यास के रूप में भगवान ने अवतार लेकर वैदिक ज्ञान का उद्धार किया। (ये वे वेद व्यास नहीं हैं, जो कृष्ण के काल में हुए थे) 5. रामावतार : रावण का वध करने के लिए दशरथ-कौशल्या के पुत्र के रूप में विष्णु ने जन्म लिया। 6. कृष्णावतार : वासुदेव-देवकी के यहां विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लेकर दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। History of Lord Vishnu:भगवान विष्णु ने ही नृसिंह अवतार लेकर एक और जहां अपने भक्त प्रहलाद को बचाया था वहीं क्रूर हिरण्यकश्यपु से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। उसी तरह वराह अवतार लेकर उन्होंने महाभयंकर हिरण्याक्ष का वध करके देव, मानव और अन्य सभी को भयमुक्त किया था। उन्होंने ही महाबलि और मायावी राजा बलि से देवताओं की रक्षा की थी। History of Lord Vishnu:श्री विष्णु के 24 अवतार : जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान विष्णु ने अब तक 23

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गंगा घाट:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यहां डुबकी लगाने से मिलेगी पापों से मुक्ति गंगा घाट पवित्र शहर हरिद्वार में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हर की पौड़ी के नौ गंगा घाट बहुत ही पावन और महत्वपूर्ण महत्त्व रखते है। ये गंगा घाट हैं -विष्णु घाट, ब्रह्मकुंड घाट, कुशावर्त घाट, नाई घाट, बिरला घाट, सती घाट, गऊ घाट, नीलेश्वर घाट और बिल्केश्वर घाट। इन गंगा घाटों पर स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो गंगा नदी में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए आते है। ज्यादातर भक्त महाकुम्भ के समय इन घाटों पर आते है। गंगा स्नान करने से सभी दुःख दूर होते है। और आत्म को शांति मिलती है। मंदिर का इतिहास हर की पौड़ी पर निर्मित घाटों के विषय में कई किद्वन्तियाँ है जिसमे बताया जाता है कि इसका निर्माण विक्रमादित्य ने अपने भाई भृतहरि की याद में करवाया था। क्योंकि वह इन्ही गंगा घाट पर ध्यान किया करते थे। एक अन्य कथा के अनुसार कुछ इतिहासकारों ने इसका इतिहास राजा अकबर के शासन काल के समय का बताया है। कहा जाता है कि हर की पैड़ी पर स्थित ब्रह्मकुंड का घाट ब्रह्मकुंड न होकर प्राचीन समय का छत्रि स्थल था। यहीं पर राजा मानसिंह की अस्थियां विसर्जित की गयी थी। Ganga Ghat मंदिर का महत्व हर की पौड़ी पर स्थित कुछ गंगा घाट का विशेष महत्त्व है जैसे – 1)विष्णु घाट – हर की पौड़ी पर स्थित विष्णु घाट की अपनी महत्वता है। इस गंगा घाट पर यहां भगवान विष्णु का मंदिर निर्मित है। कहा जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने मात्रा से ही मनोकामना पूर्ण होती है। इस घाट पर स्नान करते हुए भगवान विष्णु का जाप करने का विशेष महत्त्व है। 2)ब्रह्मकुंड घाट – ब्रह्मकुंड घाट का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। बताया जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें इसी ब्रम्ह कुंड में गिरी थी। इस कारण इस कुंड का बहुत महत्त्व है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। 3)गऊ घाट – हर की पौड़ी पर स्थित गऊ घाट भी महत्वपूर्ण है। इस घाट पर बहुत सी गाय देखने को मिलती है। यहाँ स्नान करने के बाद उन्हें चारा, खाना आदि दान देने का महत्त्व है। हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जित के उपरांत मुंडन संस्कार और गऊ दान का विशेष महत्व माना गया है। गाय को चारा देने ,रोटी खिलाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है । इस कारण इस घाट पर बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ मिलती है। 4)बिरला घाट – बिरला घाट का भी अपना विशेष महत्व है। बिरला घाट की मान्यता है कि इसके धरातल में हनुमान जी की प्रतिमा स्थित है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। बिरला घाट को “हनुमान घाट” भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी घाट पर पांडव रुके थे। 5)नाई घाट – हर की पौड़ी के इस घाट पर मुंडन संस्कार किया जाता है। मृतक की अस्थि विसर्जन के बाद परिवार के सदस्यों का मुंडन संस्कार यहीं किया जाता है। इस घाट की ऐसी मान्यता है कि मुंडन संस्कार कराने के बाद यहाँ गंगा स्नान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 6)कुशावर्त घाट – हर की पौड़ी का यह घाट विश्व विख्यात है। धार्मिक ग्रंथों में इस घाट का भी वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली है। इस कारण यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय का मंदिर भी है। इस घाट पर पूर्वजों की आत्मा शांति हेतु क्रियाकर्म किया जाता है। 7)नीलेश्वर घाट – धार्मिक ग्रंथों में नीलेश्वर घाट का वर्णन भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। 8)बिल्केश्वर घाट – बिल्केश्वर घाट पर गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व है। यहाँ स्नान करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। महाकुंभ और स्नान पर्वों पर यहाँ भारी संख्या में लोग आते है। 9)सती घाट – धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सती घाट पर जिस भी व्यक्ति की कम उम्र में मृत्यु हो जाती थी , उसकी पत्नी भी साथ में दाह संस्कार करती थी। उनकी स्मृति में इस घाट पर छोटे छोटे मंदिर बनाये गए है। दूर दूर से लोग इस घाट पर अस्थि विसर्जित करने आते है। इस कारण इस घाट को ‘अस्थि प्रवाह घाट’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर अस्थि विसर्जन के बाद गंगा स्नान करने से पितरों को शांति प्रदान होती है। मंदिर की वास्तुकला गंगा घाट की वास्तुकला की बात की जाए तो यह घाट गंगा नदी के किनारे बने हुए है। प्रत्येक घाट पर गंगा नदी में स्नान करने के लिए कुछ दूरी तक सीढ़ियां बनाई गयी हैं। यहाँ पर जाकर आसानी से स्नान किया जा सकता है। प्रत्येक घाट पर मंदिर भी बने हुए जहाँ पर गंगा स्नान करने के बाद पूजा अर्चना की जा सकती है। घाट का सुन्दर दृश्य सुबह और शाम के समय बहुत ही मनोरम होता है। गंगा घाट मंदिर का समय गंगा घाट का समय 12:00 AM – 12:00 AM मंदिर का प्रसाद गंगा घाट पर प्रसाद के रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही गंगा मैया को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी और माँ भगवती को समर्पित है और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर सुरकूट पर्वत के ऊपर स्थित है। थोड़ी चढ़ाई पर स्थित मंदिर के आसपास जंगल का एक रमणीय दृश्य दिखाई देता है। मंदिर परिसर में मोरों को आते देखना आम बात है, जो इस पवित्र स्थान के मनमोहक माहौल को और भी बढ़ा देता है। मानसून के दौरान, मंदिर तक का रास्ता चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां बहने वाली धारा में आमतौर पर बाढ़ आ जाती है। हालाँकि अन्य मौसमों के दौरान जलधारा इस स्थान के प्राकृतिक आकर्षण को बढ़ा देती है। sureshwari devi mandir:का इतिहास सुरेश्वरी देवी मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु इस मंदिर की उत्पत्ति का उल्लेख धार्मिक ग्रंथ स्कंद पुराण के केदारखंड में किया गया है। उसमे बताया गया है कि देवराज इंद्र के स्वर्ग लोक से निष्कासित होने पर राजा रजी के पुत्र से भयभीत होकर वह क्षीर सागर में छुप गए। वहां उन्होंने देव गुरु बृहस्पति की आराधना की। तब इंद्र को गुरु बृहस्पति ने विष्णु भगवान की स्तुति करने का परामर्श दिया। भगवान विष्णु की स्तुति के उपरांत विष्णु जी ने इंद्र को गंगा के दक्षिण भाग में “सूरकूट पर्वत” पर जा कर माता की आराधना करने को कहा। तब देवराज इन्द्र ने इस सूरकूट पर्वत पर एक साधारण मानव की भांति माता की आराधना की। देवराज इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने इसी स्थल पर इंद्र को दर्शन दिए। साथ ही विजय होने का वरदान भी दिया। तब इंद्र को पुनः स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि इंद्र का नाम सुरेश भी है। इस कारण यहाँ पर माता का नाम सुरेश्वरी पड़ा। और यह स्थान सुरेश्वरी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुरेश्वरी देवी मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही चर्म रोग और कुष्ठ रोग का नाश हो जाता है। माता भक्तों के सभी कष्टों का हरण करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सुरेश्वरी देवी माता के दर्शन करने से पुत्र की कामना करने वालो को पुत्र, धन की कामना करने वालो को धन, मोक्ष चाहने वालो को मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन माता के दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवता भी इस दिन मां भगवती के दर्शन करने के लिए यहाँ आते है। सुरेश्वरी देवी मंदिर की वास्तुकला सुरेश्वरी मंदिर एक समृद्ध पारंपरिक पृष्ठभूमि वाला एक प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर तक पहुंचने पर प्रवेश द्वार पर एक खुला प्रांगण है। मुख्य मंदिर के केंद्र में माता सुरेश्वरी देवी की एक शानदार मूर्ति स्थापित है। जबकि बाहरी प्रांगण में भगवान शिव और उनके परिवार को समर्पित एक मंदिर है, जिसमें प्रतिष्ठित शिवलिंग भी शामिल है। प्रांगण की प्रमुख विशेषताओं में से एक राजसी बरगद का पेड़ है, जो उम्र और ज्ञान की आभा बिखेरते हुए अनगिनत पीढ़ियों से वहाँ खड़ा है। इसके अतिरिक्त, पहाड़ी के शिखर पर एक और उल्लेखनीय पूजा स्थल है – काली माता मंदिर। पहाड़ के किनारे सावधानीपूर्वक बनाई गई कई सीढ़ियों पर चढ़कर पहुंचा जा सकने वाला यह मंदिर आसपास के लुभावने दृश्य को दर्शाता है। सुरेश्वरी देवी मंदिर का समय सुरेश्वरी देवी मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद सुरेश्वरी देवी मंदिर में लड्डू, पेड़ा, मिठाई और सूखा प्रसाद चढ़ाया जाता है। माता को चुनरी भी चढ़ाई जाती है। पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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त्रयंबकेश्वर मंदिर (तेरह मंजिल) :ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

13 मंजिला ईमारत में विभिन्न देवी देवताओं के साथ विराजित है भोलेनाथ त्रयंबकेश्वर मंदिर:उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में गंगा नदी के तट पर लक्ष्मण झूला के पार स्थित है त्रयंबकेश्वर मंदिर। यह बहुमंजिला मंदिर है जो कि एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। इस मंदिर को तेरह मंजिल के नाम से भी जानते है। क्योंकि इस मंदिर में 13 मंजिल है। इन 13 मंजिलों में हिंदू देवी-देवताओं की कई मूर्तियाँ स्थापित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। त्र्यंबकेश्वर का अर्थ है त्रिनेत्र। भगवान शिव को त्रिनेत्र भी कहते है। मंदिर का इतिहास Trimbakeshwar Temple:त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर के मूल इतिहास की कोई भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर भी मतभेद है। बताया जाता है कि लगभग तीन दशक पूर्व इस मंदिर को स्वामी कैलाशानंद महाराज ने बनवाया था। इसके अलावा लोगों का मानना है कि मंदिर की स्थापना 8वीं और 9वीं शताब्दी के बीच आदि शंकराचार्य ने की थी। मंदिर का महत्व त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में सावन के महीने और महाशिव रात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ रहती है। शिव भक्त यहाँ पर भोलेनाथ के दर्शन करने आते है साथ ही अपनी मन्नते भी भोले शम्भू के समक्ष रखते हैं। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियां है। इस कारण भक्त एक ही स्थान पर सभी देवी देवताओं के दर्शन आसानी से कर सकते हैं। लक्ष्मण झूला से इस मंदिर का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। जो लोग लक्ष्मण झूला देखने जाते है उन्हें यह मंदिर अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर में होने वाली गंगा आरती का मनोरम नजारा ऐसा होता है कि कोई भी भक्त इसे भूल ही नहीं सकता है। त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला देखते ही बनती है। जो भी भक्त ऋषिकेश दर्शन के लिए आते है वह इस मंदिर की भव्यता को देख कर यहाँ पर जरूर जाते है। यह मंदिर पिरामिड के आकार में तरह मंजिल ईमारत है। सबसे ऊपरी मंजिल पर भगवान शिव का मंदिर है। मंदिर को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आप ऊपर जाते समय अधिकांश भगवानों की परिक्रमा करते हुए जाते हैं। इस मंदिर में माता लक्ष्मी, देवी दुर्गा, देवी सरस्वती, हनुमान जी, भगवान कृष्ण और विष्णु भगवान के मंदिर भी स्थित हैं। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ यहाँ पर छोटी छोटी दुकानें भी है। जिसमें तुलसी – रुद्राक्ष से निर्मित मालाएं मिलती है। इसके अलावा विभिन्न धातुओं की अंगूठियां भी इन दुकानों पर मिलती है। जिन्हे भक्त खरीदकर अपने अपने घर ले जाते है। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में एक बड़ी लाइब्रेरी भी है जिसमे हिन्दू धर्म के वैदिक और धार्मिक ग्रन्थ रखे गए है जो पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं। हिन्दू देवी और देवताओं के आकृतियां मंदिर के दीवारों पर उकेरी गई हैं जो मंदिर की भव्यता को बढ़ाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर का समय त्रयंबकेश्वर मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में फल, फूल, नारियल, मिठाई, बेलपत्र, दूध, दही, घी आदि का भोग लगाया जाता है।

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Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए? रखें इन बातों का ध्यान

Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत ज्येष्ठ महीने में किया जाता है जिसमें 24 घंटे बिना पानी पिए रहना होता है। गर्मी में यह व्रत मुश्किल हो सकता है इसलिए व्रत से एक दिन पहले शरीर को हाइड्रेट रखें और धूप में निकलने से बचें। साथ ही कुछ और बातों को ध्यान में रख आप इस व्रत को अच्छे से कर सकते हैं। हिंदू धर्म में कई तरह के व्रत-उपवास किए जाते हैं। मन की शुद्धि और भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए लोग अक्सर व्रत-उपवास करते हैं। सिर्फ धार्मिक ही नहीं साइंस के मुताबिक भी फास्टिंग सेहत के लिए फायदेमंद होती है। हिंदू धर्म में यूं तो कई तरह के व्रत किए जाते हैं, लेकिन एकादशी व्रत का काफी ज्यादा महत्व माना जाता है। खासकर निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2025) का व्रत सभी एकादशी में अहम माना जाता है। हर साल ज्येष्ठ महीने में निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत किया जाता है। इस साल 6 जून को यह व्रत किया जाएगा। जैसाकि नाम से ही पता चलता है कि यह व्रत यानी बिना पानी पिए किया जाता है। इस दौरान लोग 24 घंटे बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। ऐसे में गर्मी के मौसम में बिना कुछ खाए-पिए रहना मुश्किल हो जाता है, जिससे कई बार तबीयत भी खराब हो सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे टिप्स बताएंगे, जिनका फॉलो कर आप बिना तबीयत बिगाड़े निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi fasting tips) का व्रत कर सकते हैं। निर्जला एकादशी Nirjala Ekadashi का व्रत 24 घंटे के लिए रखा जाता है। इसका मतलब है कि इस व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी को खोला जाता है। ऐसे में पूरा एक दिन पानी के बिना रहने से शरीर डिहाइड्रेशन का शिकार बन सकता है। इसलिए व्रत के एक दिन पहले आप बॉडी को अच्छी तरह से हाइड्रेट कर लें। इसके लिए ढेर सारा पानी और नारियल पानी पिएं। साथ ही ढेर सारे फलों को डाइट में शामिल करें। धूप में निकलने से बचें:avoid exposure to sunlight अगर आप निर्जला एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो इस दौरान धूप में निकलने से बचें। इस दिन आप वैसे ही पानी नहीं पीते हैं। ऐसे में धूप में निकलने से गर्मी की वजह से आप डिहाइड्रेशन का शिकार हो सकते हैं, जिससे आपकी तबीयत बिगड़ सकती है। इसलिए कोशिश करें कि आप घर या कहीं अंदर ही रहें। एक साथ ढेर सारा पानी न पिएं:Do not drink a lot of water at once पूरे एक दिन बिना पानी पिए रहना काफी मुश्किल होता है। ऐसे में जब लोग व्रत खोलते हैं, तो एक साथ ढेर सारा पानी पी जाते हैं। हालांकि, ऐसा करना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए व्रत खोलते समय थोड़ा पानी पिएं और फिर इसे घूंट-घूंट करके पीते रहें। Nirjala Ekadashi 2025 Vrat Niyam  हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान विष्णु की उपासना के लिए खास माना गया है। हिंदू पंचांग के आधार पर यह व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत में भक्त अन्न व जल ग्रहण नहीं करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से 24 एकादशी का फल मिलता है व भगवान विष्णु की कृपा से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, निर्जला या भीमसेनी एकादशी के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है। जानें- 1. इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में कीड़े मकोड़े के रूप में जन्म लेता है। 2. इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि नमक का सेवन करने से एकादशी व गुरु ग्रह का फल खत्म हो जाता है। 3. एकादशी के दिन तुलसी को जल अर्पित नहीं करना चाहिए और न ही छूना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन तुलसी माता उपवास करती हैं। तुलसी को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। 4. इस दिन किसी के प्रति बुरे या अपमानजनक शब्द प्रयोग नहीं करने चाहिए। Nirjala Ekadashi इस दिन क्रोध नहीं करना चाहिए और वाद-विवाद से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। 5. एकादशी के दिन बाल या नाखून काटना अशुभ माना गया है। What to do on the day of Ekadashi:एकादशी के दिन क्या करें- 1. एकादशी के दिन अधिक से अधिक मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की अराधना करनी चाहिए। 2. भगवान विष्णु को तुलसी दल युक्त प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। 3. भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। 4. इस दिन गरीब व जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।

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