एक ऐसा भगवान सूर्य का अद्भुत स्तोत्र-जिसके जपने से हो जाता है सभी रोगों का नाश

भगवान सूर्य का अवतरण संसार के कल्याण के लिए हुआ है इसलिए पंचदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। शास्त्र कहते हैं कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए। सूर्य की उपासना से मनुष्य का तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है; मनुष्य दीर्घायु होता है। सूर्य समस्त नेत्र-रोग व चर्म-रोग को दूर करने वाले देवता हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने अपने कोढ़ के रोग को सूर्य की उपासना से दूर किया था। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब बलवान होने के साथ ही अत्यन्त रूपवान भी थे। अपनी सुन्दरता का अभिमान ही उनके पतन का कारण बना। एक बार रुद्रावतार दुर्वासामुनि द्वारकापुरी में आए। तप से अत्यन्त क्षीण हुए दुर्वासा को देखकर साम्ब ने उनका उपहास किया। इससे क्रोध में आकर दुर्वासामुनि ने साम्ब को शाप दे दिया कि ‘तुम कोढ़ी हो जाओ।’ उपहास बुरा होता है; और वही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब अत्यन्त भयंकर कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गए। रोग दूर करने के लिए अनेक उपचार किए पर उनका कुष्ठ नहीं मिटा। तब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से साम्ब चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य की आराधना में लग गए। रोग से मुक्ति के लिए साम्ब नित्य भगवान सूर्य के सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। एक दिन भगवान सूर्य ने साम्ब को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा–’तुम्हें सहस्त्रनाम से मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें अपने अत्यन्त प्रिय एवं पवित्र इक्कीस नाम बताता हूँ, उनके पाठ से सहस्त्रनाम के पाठ का फल प्राप्त होगा। जो मनुष्य दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, संतान आदि वांछित फल प्राप्त करेंगे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाएंगे।’ तब भगवान सूर्य ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को अपने 21 नाम बताये जो ‘स्तवराज’ के नाम से भी जाने जाते हैं। ये नाम भगवान सूर्य के सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्र के रूप में आज भी विद्यमान है –॥ सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्रम् ॥विनियोगः – ॐ श्री सूर्यस्तवराजस्तोत्रस्य श्रीवसिष्ठ ऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीसूर्यो देवता ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यासः – श्रीवसिष्ठऋषये नमः शिरसि ।अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीसूर्यदेवाय नमः हृदि ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगापशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ ।ध्यानं –ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं द्विभुजं रक्तवाससे ।दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्मादिभिः अलङ्कृतम् ॥मानस पूजनं एवं स्तोत्रपाठः –ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः ।लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षु ग्रहेश्वरः ॥लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा ।तपनः तापनः चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥गभस्तिहस्तो ब्रध्नश्च सर्वदेवनमस्कृतः ।एकविंशतिः इत्येष स्तव इष्टः सदा मम ॥॥ फलश्रुतिः ॥श्रीः आरोग्यकरः चैव धनवृद्धियशस्करः ।स्तवराज इति ख्यातः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥यः एतेन महाबहो द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये ।स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥कायिकं वाचिकं चैव मानसं यच्च दुष्कृतम् ।एकजप्येन तत् सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः ॥एकजप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च ।बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च ॥अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाति प्रदक्षिणे ।पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः ॥एवं उक्तवा तु भगवानः भास्करो जगदीश्वरः ।आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः ।पूतात्मा नीरुजः श्रीमान् तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान् ॥भगवान् सूर्यनामावली१. विकर्तन २. विवस्वान् ३. मार्तण्ड ४. भास्कर ५. रवि६. लोकप्रकाशक ७. श्रीमान् ८. लोकचक्षु ९. ग्रहेश्वर१०. लोकसाक्षी ११. त्रिलोकेश १२. कर्ता १३. हर्ता १४. तमिस्रहा१५. तपन १६. तापन १७. शुचि १८. सप्ताश्ववाहन१९. गभस्तिहस्त २०. ब्रघ्न ( ब्रह्मा ) २१. सर्वदेवनमस्कृतइति ।

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माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति हेतु अमोघ प्रयोग

आज मैं आपको माता महा लक्ष्मी के एक ऐसे स्तोत्र के बारे में बताने जा रहा हूँ जोकि अपने आप में अद्भुत है और जिसको केवल रोज एक बार पढ़ लेने से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इस स्तोत्र का नाम है महालक्ष्मी अष्टकम.. जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्तोत्र मात्र आठ छंद का है और यह स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली है जिससे सुनकर माता महा लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हो जाती है. इसके पीछे एक कथा है- एक बार माता लक्ष्मी विष्णुलोक से रूठकर, पुष्कर में एक सरोवर के अन्दर एक कमल के फूल की नाल के अन्दर जाकर बैठ गयी. माता लक्ष्मी के रूठ जाने से और वहां से चले जाने से, पूरे देवलोक के साथ साथ समस्त संसार की कान्ति क्षय होने लगी. समस्त देवतागण परेशान हो गए. किसी भी देवता को माता लक्ष्मी का पता नहीं मिल रहा था. तब देवराज इन्द्र ने माता महालक्ष्मी को दूंढ़ निकाला और उस कमल के पुष्प के सामने खड़े होकर माता महा लक्ष्मी की स्तुति की और माता को प्रसन्न करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम नामक स्तोत्र की रचना की जिसे सुनकर माता अत्यंत प्रसन्न हुई और प्रकट हो गयी और दोबारा विष्णुलोक चली गयी. इस भगवान् इन्द्र द्वारा रचित महालक्ष्मी अष्टकम की इतनी महिमा है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य एक बार भी पाठ कर ले वहां माता लक्ष्मी का वास सदैव बना रहता है. महालक्ष्मी अष्टकम नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते.‌ शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते..१. नमस्ते गरुडारुढ़े कोलासुर भयंकरी. सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..२. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी. सर्वदुखहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..३. सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी. मन्त्रपूते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..४. आद्यंतरहिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी. योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते..५. स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे. महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते..६. पद्मासनस्थिते देवी परब्रह्मस्वरूपिणी. परमेशी जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..७. श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते. जगतस्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोस्तुते..८. महालक्ष्मय्ष्ट्कम स्तोत्रं यः पठेदक्ति मान्नरः. सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा..९. एककाले पठेन्नित्यम महापापविनाशनम. द्विकालं यः पठेन्नित्यम धनधान्यसमन्वितः..१०. त्रिकालं यः पठेन्नित्यम महाशत्रुविनाशनम. महालक्ष्मीर्भवेंनित्यम प्रसन्ना वरदा शुभा..११.

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एक ऐसा कवच-जिसके पढने से मिलता है एक हज़ार गाय दान करने का फल

आज मैं आपको एक ऐसे कवच के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसका महत्ता का वर्णन स्वयं भगवान् श्री नारायण ने किया है। इसका नाम है श्री गायत्री कवच। श्री गायत्री कवच एक महान कवच है जो स्वयं नारद ऋषि को भगवान श्री नारायण ने बताया और जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास जी ने की। श्री गायत्री कवच का उल्लेख श्रीमद देवी भागवत में 12 वे अध्याय में किया गया है। भगवान श्रीमान नारायण, महर्षि नारद को कवच की महिमा और श्री गायत्री देवी की पूजा के माध्यम से प्राप्त भक्ति के बारे में बताते हैं। गायत्री कवच द्वारा अर्जित की गयी शुद्धता सभी प्रकार के पूजा के पापों को नष्ट कर देती है, सभी इच्छाओं को पूरा करती है और मुक्ति प्रदान करती है। भगवान श्रीमान नारायण ने कहा कि देवी गायत्री के दैवीय कवच, सभी अवरोधों और बुराइयों को समाप्त कर सकते हैं। यह पूजा के लिए 64 रूपों के ज्ञान (कला रूपों) और मुक्ति को देने में सक्षम है। इसके अलावा, जो कोई गायत्री कवच की महिमा को पढ़ता या सुनता है, वह एक हज़ार गौ दान के पुण्य को प्राप्त करता है। श्रीगायत्रीकवचम्- श्रीगणेशाय नमः याज्ञवल्क्य उवाच- स्वामिन् सर्वजगन्नाथ संशयोऽस्ति महान्मम । चतुःषष्ठिकलानं च पातकानां च तद्वद। मुच्यते केन पुण्येन ब्रह्मरूपं कथं भवेत् । देहं च देवतारूपं मन्त्ररूपं विशेषतः । क्रमतः श्रोतुमिच्छामि कवचं विधिपूर्वकम् । ब्रह्मोवाच- गायत्र्याः कवचस्यास्य ब्रह्मा विष्णुः शिवो ऋषिः । ऋग्यजुःसामाथर्वाणि छन्दांसि परिकीर्तिताः । परब्रह्मस्वरूपा सा गायत्री देवता स्मृता । रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेन विना कृतम् । सर्वं सर्वत्र संरक्षेत्सर्वाङ्गं भुवनेश्वरी । बीजं भर्गश्च युक्तिश्च धियः कीलकमेव च । पुरुषार्थविनियोगो यो नश्च परिकीर्त्तितः । ऋषिं मूर्ध्नि न्यसेत्पूर्वं मुखे छन्द उदीरितम् । देवतां हृदि विन्यस्य गुह्ये बीजं नियोजयेत् । शक्तिं विन्यस्य पदयोर्नाभौ तु कीलकं न्यसेत् । द्वात्रिंशत्तु महाविद्याः साङ्ख्यायनसगोत्रजाः । द्वादशलक्षसंयुक्ता विनियोगाः पृथक्पृथक् । एवं न्यासविधिं कृत्वा कराङ्गं विधिपूर्वकम् । व्याहृतित्रयमुच्चार्य ह्यनुलोमविलोमतः । चतुरक्षरसंयुक्तं कराङ्गन्यासमाचरेत् । आवाहनादिभेदं च दश मुद्राः प्रदर्शयेत् । सा पातु वरदा देवी अङ्गप्रत्यङ्गसङ्गमे । ध्यानं मुद्रां नमस्कारं गुरुमन्त्रं तथैव च । संयोगमात्मसिद्धिं च षड्विधं किं विचारयेत् । विनियोग- अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, ऋग्यजुःसामाधर्वाणि छन्दांसि, परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता, भूर्बीजं, भुवः शक्तिः, स्वाहा कीलकं, श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुरिति हृदयाय नमः । ॐ भूर्भुवः स्वः वरेण्यमिति शिरसे स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः भर्गो देवस्येति शिखायै वषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः धीमहीति कवचाय हुम् । ॐ भूर्भुवः स्वः धियो यो नः इति नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः प्रचोदयादिति अस्त्राय फट् । वर्णास्त्रां कुण्डिकाहस्तां शुद्धनिर्मलज्योतिषीम्म् । सर्वतत्त्वमयीं वन्दे गायत्रीं वेदमातरम् । अथ ध्यानम्- मुक्ता विद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशां शूलं कपालं गुणं शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे । कवच- ॐ गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे । ब्रह्मविद्या च मे पश्चादुत्तरे मां सरस्वती । पावकी मे दिशं रक्षेत्पावकोज्ज्वलशालिनी । यातुधानीं दिशं रक्षेद्यातुधानगणार्दिनी । पावमानीं दिशं रक्षेत्पवमानविलासिनी । दिशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूपिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा । एवं दश दिशो रक्षेत् सर्वतो भुवनेश्वरी । ब्रह्मास्त्रस्मरणादेव वाचां सिद्धिः प्रजायते । ब्रह्मदण्डश्च मे पातु सर्वशस्त्रास्त्रभक्षक्रः । ब्रह्मशीर्षस्तथा पातु शत्रूणां वधकारकः । सप्त व्याहृतयः पान्तु सर्वदा बिन्दुसंयुताः । वेदमाता च मां पातु सरहस्या सदैवता । देवीसूक्तं सदा पातु सहस्राक्षरदेवता । चतुःषष्टिकला विद्या दिव्याद्या पातु देवता । बीजशक्तिश्च मे पातु पातु विक्रमदेवता । तत्पदं पातु मे पादौ जङ्घे मे सवितुःपदम् । वरेण्यं कटिदेशं तु नाभिं भर्गस्तथैव च । देवस्य मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा । धियो मे पातु जिह्वायां यःपदं पातु लोचने । ललाटे नः पदं पातु मूर्धानं मे प्रचोदयात् । तद्वर्णः पातु मूर्धानं सकारः पातु भालकम् । चक्षुषी मे विकारस्तु श्रोत्रं रक्षेत्तु कारकः । नासापुटेर्वकारो मे रेकारस्तु कपोलयोः । णिकारस्त्वधरोष्ठे च यकारस्तूर्ध्व ओष्ठके । आत्यमध्ये भकारस्तु गोकारस्तु कपोलयोः । देकारः कण्ठदेशे च वकारः स्कन्धदेशयोः । स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् । मकारो हृदयं रक्षेद्धिकारो जठरं तथा । धिकारो नाभिदेशं तु योकारस्तु कटिद्वयम् । गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू मे नः पदाक्षरम् । प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशयोः । दकारो गुल्भदेशं तु यात्कारः पादयुग्मकम् । तकारो व्यंजनं चैव सर्वांगे में सदा Ƨ वतु। फलश्रुति- इदं तु कवच दिव्यं बाधाशतविनाशकम् । चतुःषष्टिकला विद्या दायकं मोक्ष कारकं । मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधिगच्छति । पठनात श्रवणात वा Ƨ पि गो सहस्र फलं लभेत । इति श्री गायत्री कवचम्‌ संपूर्णम्‌

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श्री राम रक्षा स्तोत्रम् (Shri Ram Raksha Stotram)

विनियोग:अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।श्री सीतारामचंद्रो देवता ।अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।श्रीमान हनुमान कीलकम ।श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः । अथ ध्यानम्‌:ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥ राम रक्षा स्तोत्रम्:चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥ ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥ सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥ रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥ कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥ जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥ करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥ सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥ जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥ एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥ पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥ रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥ जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥ वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥ आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥ आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥ तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥ फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥ शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥ आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥ सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥ रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥ वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥ इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥ रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥ रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥ श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥ माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी,रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,जाने नैव जाने न जाने ॥30॥ दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥ लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥ आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥ भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥ रामो राजमणिः सदा विजयते,रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।रामान्नास्ति परायणं परतरं,रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

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रामनवमी ये आसान उपाय, सुखी एवं खुशहाल होगा जीवन

इस साल राम नवमी 10 अप्रैल दिन रविवार को है. चैत्र शुक्ल नवमी के दिन भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था. भगवान विष्णु ने लंकापति रावण के अत्याचारों से तीनों लोकों को मुक्ति दिलाने के लिए रामावतार लिया था. रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि इस साल 09 अप्रैल की देर रात 01:23 बजे से नवमी तिथि प्रारंभ हो रही है, जो 11 अप्रैल को प्रात: 03:15 बजे तक है. राम नवमी के अवसर पर देशभर के राम मंदिरों में प्रभु श्रीराम की पूजा अर्चना की जाएगी और राम जन्मोत्सव मनाया जाएगा. राम नवमी के अवसर पर आप कुछ आसान उपायों से अपने जीवन को खुशहाल और सुखी बना सकते हैं. संकटों से बचाव का उपाय: यदि आप जीवन में किसी संकट से घिरे हुए हैं तो रामनवमी के दिन राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें. ऐसा करना आपको कष्‍टों से राहत देगा. रक्षा स्तोत्र पढ़ने हेतु करें क्लिक करें KARMASU राम नवमी के दिन शुभ मुहूर्त में प्रभु श्रीराम की पूजा करें. ​उस दौरान राम स्तुति श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…करें. इसका पाठ करने से व्यक्ति के दुख और कष्ट दूर होते हैं. दुखों से निजात पाने का उपाय: दुख के समय में प्रभु की आराधना करना व्‍यक्ति को सकारात्‍मकता और धैर्य देती है. रामनवमी के दिन शुभ मुहूर्त में प्रभु श्रीराम की पूजा करना और राम स्तुति ‘श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…’ करना दुख-कष्‍टों से निजात दिलाता है मनोकामनाएं पूरी करने का उपाय: रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम के परम भक्‍त हनुमान जी की आराधना करने से भगवान राम प्रसन्‍न होते हैं. लिहाजा रामनवमी के दिन हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ करें, ऐसा करने से भक्‍तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. राम नवमी के दिन रामायण या रामचरितमानस का पाठ करना या कराना बहुत ही शुभ होता है. इससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. सुख-समृद्धि पाने का उपाय: राम नाम में बहुत शक्ति होती है. रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम का पूजन करना और राम नाम का जप करना जीवन में सुख-समृद्धि लाता है.  राम नवमी पूजा मुहूर्त 202210 अप्रैल को राम नवमी का शुभ मुहूर्त दिन में 11 बजकर 06 मिनट पर शुरु हो रहा है, जो दोपहर 01 बजकर 39 मिनट तक है. इस मुहूर्त में रामलला का जन्म होगा और मंदिरों में राम जन्मोत्सव मनाया जाएगा. इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 04 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक है. इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. KARMA इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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Chaitra Navratri 2022: चैत्र नवरात्रि पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को लगाएं इन चीजों का भोग

आदिशक्ति मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है। मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की भक्ति भाव के साथ पूजा करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां अंबे को अगर भक्त नवरात्रि के समय राशिनुसार भोग लगाते हैं तो उन्हें दोगुना फल मिलता है। जानें माता रानी को कौन-सा भोग लगाना चाहिए। पहला स्वरूप मां शैलपुत्री पहला दिन मां शैलपुत्री का माना जाता है। आरोग्य और धन लाभ के लिए मां को गाय के घी का भोग लगाना शुभ होगा। मेष- मेष राशि वालों के लिए जातक स्कंद माता की उपासना करें और रोज दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। इसके अलावा मां शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग लगाएं। माता रानी को नारियल चढ़ाएं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन मां ब्रह्मचारिणी को चीनी का भोग लगाना चाहिए। इससे अच्छी सेहत के साथ दीर्घायु का वरदान मिलता है। वृषभ- वृषभ राशि के लोग नवरात्रि में घर में मोर पंख लगाएं। सौभाग्य की प्राप्ति के लिए नवरात्रि के समय माता को मिश्री व पंचामृत का भोग लगाएं। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को लगाएं ये भोग तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है। इस दिन मां को भोग लगाने के साथ जरूरतमंद को दान देना शुभ माना जाता है। इसलिए तीसरे दिन मां को दूध या इससे संबंधी बनी हुई चीजों का भोग लगा सकते हैं। इससे धन लाभ होगा। मिथुन– नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के शक्कर का भोग लगाना शुभ रहेगा। मान्यता है कि इससे धन व वैभव की प्राप्ति होती है। चौथे दिन मां कुष्मांडा देवी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के चौथे दिन माता कुष्मांडा देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन मां को मालपुआ का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। इससे जातक के ऊपर मां का आशीर्वाद बना रहता है। कर्क- कर्क राशि वालों को गाय का घी अर्पित करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भक्त को मां दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। पांचवें दिन माता स्कंदमाता को लगाएं ये भोग नवरात्रि के पांचवे दिन माता स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए। इससे व्यक्ति के बिजनेस, करियर में उन्नति होती है और हर काम बनने लगते है। सिंह- सिंह राशि के जातक माता रानी को मालपुए का भोग लगाएं। मान्यता है कि ऐसा करने से बुद्धि व कौशल का विकास होता है। छठे स्वरूप मां कात्यायनी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठवें अवतार मां कात्यायनी की पूजा की जाती हैं। इस दिन मां को शहद का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इससे जातक को धन, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कन्या- कन्या राशि वालों को मां दुर्गा को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। इससे धन व वैभव की प्राप्ति होती है। सातवें स्वरूप मां कालरात्रि को लगाएं ये भोग नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा करने का विधान है। रोग मुक्त होने के लिए मां कालरात्रि को गुड़ से बनाई हुई चीज का भोग लगाएं। तुला– तुला राशि वालों को मिठाई का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-शांति व खुशहाली आती है। आठवें स्वरूप मां महागौरी को लगाएं ये भोग नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा का आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा करने का विधान है। मां का आशीर्वाद पाने और हर इच्छा पूर्ण करने के लिए मां को नारियल का भोग लगाएं वृश्चिक- वृश्चिक राशि वालों को नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा को रोज 1 नारियल चढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से मां दुर्गा के प्रसन्न होने की मान्यता है। नौवें स्वरूप सिद्धिदात्री को लगाएं ये भोग नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को हलवा, पूड़ी और खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन ये भोग लगाने से मां की कृपा हमेशा जातक के ऊपर बनी रहती है। धनु- धनु राशि वालों को मां दुर्गा को दूध व उससे बनी चीजों का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से दुख व भय दूर होते हैं।मकर– मकर राशि वालों को नवरात्रि के दिनों में दूध व खीर का भोग लगाना चाहिए। सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।कुंभ- कुंभ राशि वालों को मां दुर्गा को गुड़ का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।मीन- मीन राशि वाले मां दुर्गा को खीर या दूध से बनी चीजों का भोग लगाएं। ऐसा करने से घर में खुशहाली आने की मान्यता है।

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आज से शुरू होंगे इन राशियों के अच्छे दिन, देखें क्या आप भी हैं 

शुक्र ग्रह कल राशि परिवर्तन करने जा रहा है।  इस दिन शुक्र देव कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शुक्र देव को ज्योतिष में विशेष स्थान प्राप्त है।  ज्योतिष में शुक्र को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शुक्र ग्रह आज राशि परिवर्तन करने जा रहा है। इस दिन शुक्र देव कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शुक्र देव को ज्योतिष में विशेष स्थान प्राप्त है।  ज्योतिष में शुक्र को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग के कारक ग्रह हैं। शुक्र, वृष और तुला राशि के स्वामी होते हैं और मीन इनकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इनकी नीच राशि है। शुक्र के राशि परिवर्तन करते ही कुछ राशि वालों का भाग्योदय होना तय है। आइए जानते हैं शुक्र के राशि परिवर्तन से किन राशि वालों के अच्छे दिन शुरू होंगे….  मिथुन राशि-  वाणी में सौम्यता रहेगी।  परिवार में हंसी खुशी का माहौल बना रहेगा। किसी पुराने मित्र एवं भाइयों के सहयोग से आय के स्रोत विकसित होंगे। आय में वृद्धि की संभावना है। दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए समय शुभ रहेगा। कर्क राशि-  मन में शांति व प्रसन्नता के भाव रहेंगे।  आत्मविश्वास से लबरेज रहेंगे। पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा।  माता व परिवार की किसी बुजुर्ग महिला से धन की प्राप्ती के योग बन रहे हैं। नौकरी में अफसरों का सहयोग।  स्थान परिवर्तन की संभावना भी बन रही है। धनु राशि-  धर्म के प्रति श्रद्धाभाव रहेगा।  आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। कला व संगीत के प्रति रूझान बढ़ेगा। परिवार के साथ यात्रा देशाटन के लिए जाना हो सकता है। अनियोजित खर्चों में वृद्धि हो सकती है। कार्यक्षेत्र में परिश्रम की अधिकता रहेगी। मकर राशि-  कला व संगीत के प्रति रूझान बढ़ेगा।  पारिवारिक जीवन सुखमय रहेगा। संपत्ति से आय में वृद्धि हो सकती है।  संतान की ओर से सुखद समाचार मिल सकते हैं। नौकरी में तरक्की की संभावनएं बन रही हैं।  अफसरों का सहयोग मिलेगा। आय में वृद्धि होगी।  वाहन सुख का विस्तार संभव है। (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)

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नवसंवत्सर में इन राशि वालों पर रहेगी मां लक्ष्मी की विशेष कृपा, नौकरी में प्रमोशन के बनेंगे प्रबल योग

नवसंवत्सर की शुरुआत में मंगल और राहु-केतु अपनी उच्च राशि में रहेंगे वहीं, शनि खुद की ही राशि मकर में होगा। नववर्ष के सूर्योदय की कुंडली में शनि-मंगल की युति से धन, भाग्य और लाभ का शुभ योग बन रहा है। इस योग के प्रभाव से ये साल मिथुन, तुला और धनु राशि वाले लोगों के लिए बहुत शुभ रहेगा। वहीं, अन्य राशियों के लिए बड़े बदलाव का समय रहेगा। ग्रहों का ऐसा संयोग 1563 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 22 मार्च 459 को ये ग्रह स्थिति बनी थी। ग्रह-नक्षत्रों के लिहाज से अप्रैल का महीना खास होने वाला है। इस महीने कई ग्रहों का राशि परिवर्तन होगा। ग्रहों का राशि परिवर्तन का प्रभाव मेष से लेकर मीन राशि तक वालों पर पड़ेगा। ग्रहों की स्थिति से कुछ राशि वालों को धन संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि कुछ राशि वालों की परेशानी दूर होगी। जानें अप्रैल में किन ग्रहों का होगा राशि परिवर्तन व किन राशि वालों को होगा जबरदस्त लाभ- अप्रैल 2022 में ग्रहों का राशि परिवर्तन- 07 अप्रैल 2022 को मंगल का कुंभ राशि में गोचर होगा। इसके अगले दिन यानी 08 अप्रैल को बुध का मेष राशि में प्रवेश होगा। 12 अप्रैल को राहु-केतु राशि परिवर्तन करेंगे। राहु मेष राशि में और केतु का तुला राशि में गोचर होगा। 13 अप्रैल को गुरुदेव बृहस्पति का मीन राशि में गोचर होगा। 14 अप्रैल को सूर्य का मेष राशि में गोचर होगा। 25 अप्रैल को बुध का वृषभ राशि में गोचर होगा। 27 अप्रैल को शुक्र का मीन राशि में गोचर होगा। 29 अप्रैल को शनि का कुंभ राशि में गोचर होगा। मिथुन- अप्रैल का महीना मिथुन राशि वालों के लिए लाभकारी रहेगा। इस समय आपकी राशि में शनि ढैय्या का प्रभाव बना है। शनि के राशि परिवर्तन के साथ ही आपको शनि ढैय्या से मुक्ति मिल जाएगी। इस महीने आपके रुके हुए कार्य पूरे होंगे। नए समाचार मिल सकते हैं। शादी-विवाह में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती हैं। आय के साधनों में वृद्धि होगी। कन्या-  कन्या राशि वालों के लिए नौकरी में स्थान परिवर्तन के योग बन रहे हैं। सरकारी नौकरी करने वाले जातकों का स्थान परिवर्तन संभव है। ऑफिस में मान-सम्मान बढ़ेगा। आय के साधनों में वृद्धि होगी।  नौकरी पेशा करने वाले जातकों के तरक्की के योग बनेंगे। इस समय आप खुद का कारोबार शुरू करने की सोच सकते हैं। घर में कोई महत्वपूर्ण चीज खरीद कर ला सकते हैं। मकर- मकर राशि में शनिदेव विराजमान हैं। 29 अप्रैल को शनि कुंभ राशि में प्रवेश कर जाएंगे। शनि का राशि परिवर्तन धन के मामले में आपके लिए लाभकारी रहेगा। भाग्य में वृद्धि होगी। इस दौरान आपको नए अवसरों का लाभ मिलेगा। गुस्से पर काबू रखें। 

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भारतीय नवसंवत्सर 2079 : 1563 साल बाद दुर्लभ संयोग में शुरू होगा हिंदू नव वर्ष जानें इस साल कौन होगा राजा- मंत्री,

नवसंवत्सर की शुरुआत में मंगल और राहु-केतु अपनी उच्च राशि में रहेंगे वहीं, शनि खुद की ही राशि मकर में होगा। नववर्ष के सूर्योदय की कुंडली में शनि-मंगल की युति से धन, भाग्य और लाभ का शुभ योग बन रहा है। इस योग के प्रभाव से ये साल मिथुन, तुला और धनु राशि वाले लोगों के लिए बहुत शुभ रहेगा। वहीं, अन्य राशियों के लिए बड़े बदलाव का समय रहेगा। ग्रहों का ऐसा संयोग 1563 साल बाद बन रहा है। इससे पहले 22 मार्च 459 को ये ग्रह स्थिति बनी थी। इस बार नव संवत्सर 2079 शनिवार, 2 अप्रैल से शुरू हो रहा है। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी। नवरात्रि के दौरान मां आदिशक्ति की मंदिरों के साथ घर घर में आराधना होगी। मां इस बार नव संवत्सर 2079 शनिवार, 2 अप्रैल से शुरू हो रहा है। चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी। रामदेव मिश्र शास्त्री ने बताया कि नए संवत्सर का नाम नल है और राजा शनि देव तो मंत्री वृहस्पति रहेंगे। शनिवार से ही चैत्र नवरात्र भी शुरू हो जाएगी। नवरात्र व्रत का पारण 11 अप्रैल सोमवार को प्रातः काल में किया जाएगा। इसी दिन धर्मराज दशमी भी मनाया जाएगा। ये नववर्ष रेवती नक्षत्र में शुरू होगा। इसके स्वामी बुध हैं। बुध के कारण कारोबार में फायदा होता है इसलिए इस नक्षत्र में खरीदी-बिक्री करना शुभ माना जाता है। व्यापार का कारक बुध भी इस नक्षत्र में रहेगा। जिससे बड़े लेन-देन और निवेश के लिए पूरा साल शुभ रहेगा। साल की शुरुआत मीन राशि में हो रही है। जिसके स्वामी गुरु है। इसलिए ये समय सबके लिए शुभ रहेगा। पूरे नवरात्र में मंगल अपने ही नक्षत्र में रहेगा। साथ ही 5 दिन उच्च राशि में रहेगा। जिससे प्रॉपर्टी के कारोबार में तेजी आने के योग हैं। वहीं, बृहस्पति के कारण खरीदारी से सुख-समृद्धि बढ़ेगी। इस बार नव वर्ष की शुरुआत सरल, सत्कीर्ति और वेशि राजयोगों में हो रही है। इससे नवरात्र में खरीदारी लेन-देन निवेश और नए कामों की शुरुआत शुभ रहेगी। इन योगों का शुभ फल पूरे साल दिखेगा।देश के लिए सुख समृद्धि के साथ आर्थिक मजबूती और व्यापार बढ़ाने वाला रहेगा ।रेवती नक्षत्र और बुध से बड़े लेन-देन व निवेश के लिए पूरा साल शुभ रहेगा। प्रॉपर्टी के कारोबार में तेजी आएगी। वृहस्पति के कारण खरीदारी से सुख-समृद्धि बढ़ेगी। नए संवत्सर में ग्रहों की खगोलीय मंत्री परिषद के 10 विभागों में राजा और मंत्री सहित पांच विभाग पाप ग्रहों के पास तथा 5 शुभ ग्रहों के पास रहेंगे। इस वर्ष राजा-शनि, मंत्री गुरु, सस्पेश सूर्य, दुर्गेश बुध, धनेश-शनि, रसेश मंगल, धान्येश-शुक्र, नीरसेश-शनि, फलेश मेघेश-बुध होंगे।

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होली का वास्तविक स्वरुप

इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है। यथा–तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।(भाव प्रकाश) अर्थात्―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है। होलिका―किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया। अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। यथा―वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। येष्टि=यज्ञ। इसका दूसरा नाम नव सम्वतसर है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। तो कहा गया है–अग्निवै देवानाम मुखं अर्थात् अग्नि देवों–पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा। हमारे यहाँ आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं―(1) आषाढ़ मास, (2) कार्तिक मास (दीपावली) (3) फाल्गुन मास (होली) यथा फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि। समीक्षा―आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत डालते हो जो आखत हैं–वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। आप जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था। ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते―अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है। *पौराणिक मत में कथा इस प्रकार है―होलिका हिरण्यकश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है जो नितान्त मिथ्या है।

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प्रेरक कथा: श्री कृष्ण मोर से, तेरा पंख सदैव मेरे शीश पर होगा! (Prerak Katha Shri Krishn Mor Se Tera Aankh Sadaiv Mere Shish)

श्री कृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर रहता था, वह मोर बहुत चतुर था और श्री कृष्ण का भक्त था, वह श्री कृष्ण की कृपा पाना चाहता था। इसके लिए उस मोर ने एक युक्ति सोची वह श्री कृष्ण के द्वार पर जा पहुंचा, जब भी श्री कृष्ण द्वार से अंदर-बाहर आते-जाते तो उनके द्वार पर बैठा वह मोर एक भजन गाता।मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… इस प्रकार प्रतिदिन वह यही गुनगुनाता रहता एक दिन हो गया, 2 दिन हो गये इसी तरह 1 साल व्यतीत हो गया, परन्तु कृष्ण जी ने उसकी एक ना सुनी एक दिन दुखी होकर मोर रोने लगा। तभी वहा से एक मैना उडती जा रही थी, उसने मोर को रोता हुए देखा तो बहुत अचंभित हुई। वह अचंभित इस लिए नहीं थी की मोर रो रहा था वह इस लिए अचंभित हुई की श्री कृष्ण के द्वार पर कोई रो रहा था। मैना मोर के पास गई और उससे उसके रोने का कारण पूंछा वह मोर से बोली -हे मोर तू क्यों रोता हैं तब मोर ने बताया की पिछले एक वर्ष से में इस छलिये को रिझा रहा हु, परन्तु इसने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया। यह सुनकर मैना बोली -में श्री राधे के बरसना से आई हु.. तू मेरे साथ वहीं चल, राधे रानी बहुत दयालु हैं वह तुझ पर अवश्य ही करुणा करेंगी। मोर ने मैना की बात से सहमति जताई और दोनों उड़ चले बरसाने की और उड़ते उड़ते बरसाने पहुच गये। राधा रानी के द्वार पर पहुँच कर मैना ने गाना शुरू किया श्री राधे राधे, राधे बरसाने वाली राधे… परन्तु मोर तो बरसाने में आकर भी यही दोहरा रहा था मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… जब राधा जी ने ये सुना तो वो दोड़ी चली आई और प्रेम से मोर को गले लगा लिया, और मोर से पूंछा कि तू कहाँ से आया है। तब मोर बोला -जय हो राधा रानी आज तक सुना था की तुम करुणामयी हो और आज देख भी लिया। राधा रानी बोली वह कैसे तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से के द्वार पर कृष्ण नाम की धुन गाता रहा हु किन्तु कृष्ण जी ने मेरी सुनना तो दूर कभी मुझको थोड़ा सा पानी भी नही पिलाया.. राधा रानी बोली अरे नहीं मेरे कृष्ण ऐसे नहीं है, तुम एक बार फिर से वही जाओ किन्तु इस बार कृष्ण-कृष्ण नहीं राधे-राधे रटना। मोर ने राधा रानी की बात मान ली और लौट कर गोकुल वापस आ गया फिर से कृष्ण के द्वार पर पहुंचा और इस बार रटने लगा जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!… जब कृष्ण जी ने ये सुना तो भागते हुए आये और उन्होंने भी मोर को प्रेम से गले लगा लिया और बोले हे मोर, तू कहा से आया हैं। यह सुनकर मोर बोला – वाह रे छलिये जब एक वर्ष से तेरे नाम की रट लगा रहा था, तो कभी पानी भी नही पूछा और जब आज जय राधे राधे..बोला तो भागता हुआ आ गया ! कृष्ण बोले अरे बातो में मत उलझा, पूरी बात बता..! तब मोर बोला में पिछले एक वर्ष से आपके द्वार पर यही गा रहा हूँ। मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे, गोपाल सांवरिया मेरे, माँ बाप सांवरिया मेरे!… किन्तु आपने कभी ध्यान नहीं दिया तो में बरसाने चला गया, इस प्रकार मोर ने समस्त वृतांत कृष्ण जी को कह सुनाया। तब कृष्ण जी बोले – मेने तुझको कभी पानी नहीं पिलाया यह मेने पाप किया है, और तूने राधा का नाम लिया,यह तेरा सौभाग्य है। इसलिए में तुझको वरदान देता हूँ कि जब तक ये सृष्टि रहेगी, तेरा पंख सदेव मेरे शीश पर विराजमान होगा..! और जो भी भक्त राधा का नाम लेगा, वो भी सदा मेरे शीश पर रहेगा..!! अतः श्री कृष्ण के भक्त प्रेमियों यदि श्री कृष्ण का सनिध्ये चाहिए तो प्रेम से कहिये…जय राधे राधे! जय राधे राधे! जय राधे राधे!…

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प्रेरक कथा: श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर दिखेंगी! (Shiv Ke Sath Ye 4 Cheejen Jarur Dikhengi)

भगवान श‌िव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छव‌ि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। इनके एक हाथ में त्र‌िशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, स‌िर पर त्र‌िपुंड चंदन लगा हुआ है। आप दुन‌िया में कहीं भी जाइये आपको श‌िवालय में श‌िव के साथ ये 4 चीजें जरुर द‌‌िखेगी। क्या यह श‌िव के साथ ही प्रकट हुए थे या अलग-अलग घटनाओं के साथ यह श‌िव से जुड़ते गए।1. श‌िव जी का त्र‌िशूल क्या है?भगवान श‌िव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्‍त्र-शस्‍त्रों के ज्ञाता हैं लेक‌िन पौराण‌िक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्‍त्रों का ज‌िक्र आता है एक धनुष और दूसरा त्र‌िशूल। भगवान श‌िव के धनुष के बारे में तो यह कथा है क‌ि इसका आव‌िष्कार स्वयं श‌िव जी ने क‌िया था। लेक‌िन त्र‌िशूल कैसे इनके पास आया इस व‌िषय में कोई कथा नहीं है। माना जाता है क‌ि सृष्ट‌ि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब श‌िव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण श‌िव जी के तीन शूल यानी त्र‌िशूल बने। इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्ट‌ि का संचालन कठ‌िन था। इसल‌िए श‌िव ने त्र‌िशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण क‌िया। 2. जानें कैसे आया श‌िव के हाथों में डमरू?भगवन श‌िव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्ट‌ि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सष्ट‌ि में ध्वन‌ि जो जन्म द‌िया। लेक‌िन यह ध्वन‌ि सुर और संगीत व‌िहीन थी। उस समय भगवान श‌िव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वन‌ि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। कहते हैं क‌ि डमरू ब्रह्म का स्वरूप है जो दूर से व‌िस्‍तृत नजर आता है लेक‌िन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं वह संकु‌च‌ित हो दूसरे स‌िरे से म‌िल जाता है और फ‌िर व‌िशालता की ओर बढ़ता है। सृष्ट‌ि में संतुलन के ल‌िए इसे भी भगवान श‌िव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे। 3. श‌िव के गले में व‌िषधर नाग कहां से आया?भगवान श‌िव के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है वासुकी। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है क‌ि यह नागों के राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम क‌िया था ज‌िससे सागर को मथा गया था। कहते हैं क‌ि वासुकी नाग श‌िव के परम भक्त थे। इनकी भक्त‌ि से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना द‌िया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांत‌ि ल‌िपटे रहने का वरदान द‌िया। 4. श‌िव के स‌िर पर चन्द्र कैसे पहुंचे?श‌िव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का व‌िवाह दक्ष प्रजापत‌ि की 27 कन्याओं से हुआ था। यह कन्‍याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोह‌िणी से व‌िशेष स्नेह करते थे। इसकी श‌िकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे द‌िया। इस शाप बचने के ल‌िए चन्द्रमा ने भगवान श‌िव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर श‌िव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने श‌‌ीश पर स्‍थान द‌िया। जहां चन्द्रमा ने तपस्या की थी वह स्‍थान सोमनाथ कहलाता है। मान्यता है क‌ि दक्ष के शाप से ही चन्द्रमा घटता बढ़ता रहता है।

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