करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक शहर में साहूकार रहता था, जिसके सात बेटे और एक बेटी थी। बेटी का नाम करवा था। साहुकार ने अपने बच्चों का पालन-पोषण काफी शाही तरीके से किया था। सभी भाई अपनी इकलौती बहन को बहुत मानते और उस पर अपनी जान छिड़कते थे। उन्होंने उसकी शादी एक अमीर साहूकार के साथ एकदम शाही तरीके से की। एक दिन करवा ससुराल से अपने मायके आई। सभी भाइयों ने उसका जोरदार स्वागत किया। उन्होंने पहले अपनी बहन को खाना खिलाया और फिर खुद खाया। इसके बाद सभी एक साथ बैठकर बचपन की यादें साझा करने लगें। इसी तरह कुछ दिन बीतते चले गए। एक दिन शाम को जब करवा के सातों भाई अपने काम से घर लौटे, तो उन्होंने देखा की उनकी बहन काफी उदास होकर बाहर बैठी थी। अपनी बहन करवा को उदास देखकर सभी भाई चिंतित हो गए। वो तुरंत उसके पास गए और उदासी का कारण पूछने लगे। इस पर करवा ने बताया कि उसने अपने पति के लिए करवा चौथ का उपवास रखा है और चांद के इंतजार में सुबह से ही भूखी-प्यासी है। जैसे ही चांद निकलेगा वह उसे देखकर अपना उपवास तोड़ेगी। यह सुनकर भाइयों का भी मन उदास हो गया। वो सभी करवा के इस कष्ट को नहीं देख पाए। खासकर उसका सबसे छोटा भाई, जिसे करवा से सबसे अधिक स्नेह था। बहन को भूखा-प्यासा देखकर सभी भाई कुछ ऐसा उपाय सोचने लगे, जिससे वो अपनी बहन का कष्ट दूर कर सकें। तभी उन्हें एक तरकीब सूझी। सभी भाई तुरंत एक पीपल के बड़े से पेड़ के पास पहुंचे। उनमें से सबसे छोटा भाई एक जलता हुआ दीपक लेकर उस पेड़ पर चढ़ गया और उसे एक छलनी में रखकर वहीं छोड़ दिया। इसके बाद पूरे गांव में हल्ला हो गया कि चांद निकल आया। करवा भी उस जलते दीपक को चांद समझ बैठी और जल्दी से पूजा पूरी कर अपना उपवास खत्म करने के लिए बैठ गई। जैसे ही उसने खाने का पहला निवाला उठाया उसकी नजर भोजन में पड़े बाल पर पड़ी। उसने तुरंत उस निवाले को अपने प्लेट से निकाल कर दूसरी तरफ रख दिया। इसके बाद उसने दूसरा निवाला अपने मुंह में डाला, तभी उसके दांतों में एक कंकड़ आ फंसा। उसने झटपट उस निवाले को भी प्लेट से हटा दिया। इसके बाद उसने तीसरा निवाला अपने मुंह में रखा कि तभी उसे एक बुरी खबर मिली। करवा को पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो गई। यह सुनते ही करवा पूरी तरह से टूट गई और जोर-जोर से रोने लगी। कुछ समय बीतने के बाद उसे अपने पति के मृत्यु की सच्चाई का पता चला। उसे जानकारी मिली कि उसके भाइयों के कारण उसने दीपक को चांद समझ लिया था और अपना उपवास खत्म किया था। इस वजह से देवता नाराज हो गए और उसके पति को मृत्यु दंड की सजा सुनाई। सच्चाई का पता चलने के बाद करवा ने अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करने का प्रण लिया। देखते-देखते एक साल बीत गए। करवा अपने पति के मृत शरीर के पास ही बैठी रही। वह रोजाना अपने पति के शव को साफ करती और वहां उगने वाली घासों को भी हटाती रहती थी। एक साल के बाद फिर से करवा चौथ का पर्व आया। हमेशा की तरह सभी महिलाएं इस व्रत को करने के लिए एक साथ जुटीं। इसमें उसकी सातों भाभी भी थीं। शाम के समय पूजा समाप्त करने के बाद जब करवा की सभी भाभी उसके पास पहुंची, तो उन्होंने करवा को आशीर्वाद मांगने को कहा। इस पर करवा ने सभी से एक-एक करके अपने पति को जीवित करने का वरदान मांगा। करवा की यह मांग उसकी भाभी पूरी नहीं कर सकती थीं। उन्होंने करवा को समझाया भी, लेकिन वह नहीं मानी। फिर उसकी एक भाभी ने बताया कि उसके छोटे भाई के वजह से ही ऐसा हुआ है, तो उसकी छोटी भाभी ही इस स्थिति को ठीक कर सकती है। यह सुनकर करवा अपनी छोटी भाभी के पास गई और उनके पैर पकड़कर अपने पति को जीवित करने का आशीर्वाद मांगने लगी। पहले तो उसकी छोटी भाभी ने बहुत टाला, लेकिन अंत में उसकी छोटी भाभी ने अपनी तर्जनी उंगली को काटकर उसमें से अमृत की एक बूंद करवा के मृत पति के ऊपर डाल दी। जैसे ही अमृत की बूंद उसके ऊपर गिरी वह जिंदा हो गया और जय श्री गणेश, जय श्री गणेश के नारे लगाने पड़े। इस घटना के बाद से ऐसी मान्यता है कि करवा चौथ का व्रत करने से गौरी-शंकर खुश होते हैं और महिलाओं के सुहाग की रक्षा का वरदान देते हैं। कहानी से सीख  इस कहानी से यह सीख मिलती है कि इंसान को हमेशा सच्ची भक्ति से पूजा-पाठ करनी चाहिए। अगर इसमें किसी प्रकार की कमी रहती है, तो उसके बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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वरलक्ष्मी व्रत कथा | Varalaxmi Vrat Katha In Hindi

मगध के राज्‍य में कुंडी नाम का एक नगर था। कहा जाता है कि कुंडी नगर रावण की सोने की लंका की ही तरह सोने से बना हुआ था। इसी नगर में चारूमति नाम की ब्राह्मण महिला रहती थी। वह हर रोज मां लक्ष्मी की पूजा करती थी और पूरे लगन से अपने पति व सास-ससुर की सेवा भी करती थी। एक रात जब चारूमति सो रही थी, तो उसके सपने में मां लक्ष्‍मी आईं। उन्होंने चारूमति से कहा – “मैं वरलक्ष्‍मी हूं। जिस तरह से तुम मेरी पूजा करती हो, मैं उससे बहुत प्रसन्न हूं। अगर तुम सावन के महिने के अंतिम शुक्रवार को मेरा व्रत रखकर मेरी पूजा करो, तो मेरे आशिर्वाद से तुम्हें सुख-समृद्धि मिलेगी और संतान की भी प्राप्ति होगी। इसके अलावा, अगर तुम यह व्रत अन्य लोगों से भी करवाओगी, तो उन्हें भी इसका शुभ फल मिलेगा।” सुबह होने पर चारूमति ने सपने वाली बात अपने पति और सास-ससुर को बताई। उन लोगों ने सलाह देते हुए कहा कि सपने की बातें सच होती हैं। इसलिए उसे सपने के अनुसार सावन माह के आखिरी शुक्रवार को मां वरलक्ष्मी का व्रत करना चाहिए। साथ ही उन्होंने नगर की अन्य महिलाओं से भी यह व्रत कराने की सलाह दी। इसके बाद सावन का महीने आने पर आखिरी शुक्रवार को चारूमति के साथ नगर की अन्‍य महिलाओं ने भी मां वरलक्ष्मी का व्रत रखा और उनका पूजन पाठ किया। उस शुक्रवार के दिन चारूमति के साथ सभी महिलाओं ने सुबह उठकर स्‍नान किया। साफ कपड़े पहनें और मंडप सजाकर उसमें भगवान गणेश व मां लक्ष्मी की वरमुद्रा में मूर्ति रखी और कलश स्थापित करके पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की। पूजा के आखिरी में सभी महिलाएं जब उस मंडप की परिक्रिमा करने लगीं, तो अचानक सभी महिलाओं का शरीर गहनों से सज गया। इस तरह यह पूजन करके सभी महिलाओं को धन-संपत्ति मिली। इसके आलवा, उनका घर भी पशुधन, जैसे – गाय, घोड़े, हाथी आदि से भर गया। मां वरलक्ष्मी की कृपा से उनका नगर सोने का बन गया। तभी से नगर के सभी लोग चारूमती की प्रशंसा करने लगें और मां श्री वरलक्ष्‍मी की हर सावन माह के आखिरी शुक्रवार को पूजन करने लगें। कहानी से सीख – पूरे विधि विधान से की जाने वाली पूजा का परिणाम अच्छा ही मिलता है।

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अनंत चतुर्दशी व्रत कथा | Anant Chaturdashi Vrat Katha In Hindi

बहुत समय पहले सुमंत नाम का एक ब्राह्मण था। वह बहुत ही नेक और तपस्वी भी था। उसने दीक्षा नाम की औरत से विवाह किया था और दोनों को सुशीला नाम की एक पुत्री भी थी। उनकी पुत्री सुशीला बहुत ही रूपवान थी, जो अपने पिता की ही तरह धार्मिक भी थी, लेकिन सुशीला जब थोड़ी बड़ी हुई, तो उसकी मां दीक्षा परलोक सिधार गई। पत्नी दीक्षा की मृत्यु होने के कुछ समय बाद उस ब्राह्मण ने कर्कशा नाम की एक महिला से विवाह कर लिया। इसके कुछ समय बाद जब पुत्री सुशीला विवाह योग्य हुई, तो उसका विवाह कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विवाह में विदाई के समय जब ब्राह्मण ने अपनी दूसरी पत्नी कर्कशा से बेटी और दामाद को कुछ देने के लिए कहा, तो वह नाराज हो गई। कर्कशा ने गुस्से में दामाद को ईंट और पत्थर देकर विदा कर दिया। कर्कशा के इस व्यवहार से कौंडिन्य ऋषि काफी दुखी हुए। वे अपनी पत्नी सुशीला के साथ आश्रम जाने लगें, लेकिन आश्रम के रास्ते में ही रात हो गई। रात होने के कारण दोनों एक नदी के किनारे पर रूक गए। इसी दौरान सुशीला ने देखा कि नदी के किनारे कुछ स्त्रियां सुंदर कपड़ों में सजी हुई हैं, वे किसी देवता की पूजा भी कर रही थीं। सुशीला उन स्त्रियों के पास गई, तो उन्होंने बताया कि वे अनंत व्रत की पूजा कर रही हैं और उन्होंने उस पूजा की महत्ता के बारे में भी बताया। उन स्त्रियों की बात सुनकर सुशीला ने भी उसी समय उस व्रत को करने का मन बनाया और चौदह गांठों वाला डोरा भी हाथ में बांध कर वापस ऋषि कौंडिन्य के पास चली आई। जब ऋषि कौंडिन्य ने सुशीला से उस डोरे के बारे में पूछा, तो सुशीला ने उन्हें सारी बात बता दी। इस पर गुस्सा होते हुए ऋषि कौंडिन्य ने सुशीला के हाथों से उस डोरे को खोलकर तोड़ दिया और उसे आग में जला दिया। उनके ऐसा करने पर भगवान अनंत जी नाराज हो गएं। इसकी वजह से ऋषि कौंडिन्य की सारी संपत्ति खत्म हो गई और वह कुछ ही समय में बहुत गरीब हो गएं। इससे ऋषि कौंडिन्य बहुत ही दुखी रहने लगे। एक दिन उन्होंने अपनी इस गरीबी के बारे में अपनी पत्नी सुशीला से पूछा, तो सुशीला ने बताया कि यह भगवान अनंत का अपमान करने के कारण हो रहा है। उन्हें वह डोरा भी नहीं जलाना चाहिए था। पत्नी सुशीला की बात सुनकर ऋषि कौंडिन्य को अपनी गलती का एहसास हो गया। इसका पश्चाताप करने के लिए वे तुरंत उसी जंगल में गए और अनंत डोरे की खोज करने लगें। कई दिनों तक वह जंगल में भटके, लेकिन उन्हें अनंत डोरा नहीं मिला। एक दिन जंगल में वो बेहोश होकर गिर गएं। तभी उसके सामने भगवान अनंत प्रकट हुए। उन्होंने ऋषि कौंडिन्य से कहा – “हे कौंडिन्य, तुमने अंजाने में ही सही, लेकिन मेरा अपमान किया था। उसी की वजह से तुम्हें ये सारे दुख झेलने पड़े हैं। अब तुमने अपनी उस गलती का पश्चाताप कर लिया है, इसलिए मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें वरदान भी देता हूं कि जब तुम घर जाकर पूरे विधि-विधान से मेरा अनंत व्रत करोगे, तो अगले चौदह सालों में तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। तुम हर तरह के सुख से संपन्न हो जाओगे। ‘” भगवान अनंत की बात सुनकर ऋषि कौंडिन्य घर गए और विधिविधान से अनंत व्रत करते हुए भगवान अनंत की पूजा की। कुछ समय बाद धीरे-धीरे उनके सारे कष्ट दूर हो गए। कहानी से सीख कभी भी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए, खासतौर से धर्म से जुड़ी चीजों का। ऐसा करने से बुरे परिणाम हो सकते हैं।

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यीशु के जन्म की कहानी | Jesus Christ Birth Story In Hindi

हजारों साल पहले की बात है। नजारेथ नामक शहर में मरियम नाम की एक जवान महिला रहती थी। उन दिनों मरियम का यूसुफ नाम के एक आदमी से प्रेम था। एक रात जब मरियम सो रही थी, तो ईश्वर ने उसके सपने में गेब्रियल नाम के एक स्वर्गदूत को भेजा। उसने मरियम को बताया कि वह जल्द ही एक पवित्र आत्मा वाले पुत्र को जन्म देगी, जिसका नाम उसे यीशु रखना होगा। जब यह बात मरियम ने अपने साथी यूसुफ को बताई, तो बदनामी के डर से इस खबर को सुनते ही यूसुफ ने मरियम से अलग होने का फैसला कर लिया। यह जानकर ईश्वर का वही स्वर्गदूत यूसुफ को उसके सपनों में मिला और उसे बताया कि मरियम एक पवित्र आत्मा को जन्म देगी। इसलिए, उसे मरियम से शादी करनी चाहिए और उसके साथ रहना चाहिए। उस स्वर्गदूत की बात सुनकर यूसुफ ने ऐसा ही किया। उन दिनों नजारेथ शहर पर रोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। जब मरियम गर्भावती हुई, तो उन्हीं दिनों रोमन राज्य में जनगणना चल रही थी। राज्य के नियमों के अनुसार यूसुफ और उसकी पत्नी मरियम भी जनगणना में अपना नाम लिखवाने के लिए येरूशलम के बैतलहम नगर चले गए। हालांकि, बैतलहम में उन्हें रहने के लिए कोई स्थान नहीं मिला, जिस वजह से वे दोनों एक गौशाले में रूक गए। बैतलहम के उसी गौशाले में ही मरियम ने उस पवित्र आत्मा वाले पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम यीशु रखा। जब उस गौशाले में अपने जानवरों की देखभाल करने के लिए एक चरवाहा आया, तो ईश्वर के दूतों ने उसे बताया कि उसका उद्धार करने वाला बैतलहम में आज पैदा हुआ है। पहले तो उसने इस बात पर यकीन नहीं किया, लेकिन जब उसने गौशाला में मरियम, यूसुफ और यीशु को देखा तो वह हैरान रह गया। वहीं, यीशु के जन्म के समय आसमान में एक तेज चमकता हुआ सितारा भी दिखाई दिया था। उसे देखकर एक दूर के शहर में रहने वाले तीन ज्योतिषी भी यीशु के जन्म की खबर को समझ गए थे। वो तीनों उस सितारे का पीछा करते हुए उस गौशाले तक आ गए थे। वहां पहुंचकर उन्होंने प्रभु यीशु को प्रणाम किया। उन्होंने यीशु के परिवार को उपहार दिया और यीशु की पूजा भी की। उन तीनों ज्योतिषियों को यह पता था कि उस राज्य का राजा अच्छा नहीं है। उसे जब इसका पता चलेगा, तो वह यीशु को मार डालेगा। इसलिए, किसी ने भी राजा को यीशु के जन्म के बारे में नहीं बताया। कुछ दिनों के बाद यूसुफ के सपने में एक परी आई, जिसने बताया की राजा हरोदेस यीशु को मारने की योजना बना रहे हैं। इसलिए, वह अपनी पत्नी मरियम व पुत्र यीशु के साथ मिस्र चला गया। वहीं, जब दुष्ट राजा हरोदेस को यीशु की कोई जानकारी नहीं मिली, तो उसने बैतलहम के सभी छोटे बच्चों को मारने का आदेश दे दिया। हालांकि, इस दौरान उस दुष्ट राजा की मृत्यु हो गई। इसके बाद यीशु ने अपने परिवार के साथ मिस्र को छोड़ दिया और तीनों ने इजराइल की यात्रा की। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन नजारेथ में गुजारा। कहानी से सीख ईसा मसीह की कहानी हमें यह सीख देती है कि बुराई की कभी जीत नहीं होती है। बुरे लोगों का विनाश करने के लिए ईश्वर हमेशा किसी न किसी रूप में धरती पर आते हैं।

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नाग पंचमी की व्रत कथा | Nag Panchami Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक नगर में किसी सेठ के सात बेटे रहते थे। सभी की शादी सेठ ने समय रहते करवा दी। सातों बहु मिलकर घर का काम भी किया करती थीं। उन सभी में से सेठ की सबसे छोटी बहु खूब संस्कारी थी। एक दिन यूं ही काम करते हुए घर की बड़ी बहु ने अपनी देवरानियों से कहा कि घर को लीपने के लिए पीली मिट्टी नहीं है। जंगल जाकर मिट्टी लानी होगी। जेठानी के ऐसा कहते ही सभी उसके साथ घर लीपने के लिए मिट्टी लाने के लिए निकल गए। सभी खुरपी से मिट्टी निकाल ही रहे थे कि तभी सबसे बड़ी वाली बहु को एक नाग नजर आया।उसे मारने के लिए जैसे ही बड़ी वाली बहु ने खुरपी उठाई, वैसे ही सबसे छोटी बहु ने कहा, ‘जेठानी जी, इसे मत मारिए। इसकी कोई गलती नहीं है। जंगल तो इसका घर है।’ अपनी देवरानी की बात मानकर उसने नाग को कुछ नहीं किया। तभी उस छोटी बहु ने नाग से कहा कि आप एक जगह पर अलग से बैठ जाइए हम तबतक मिट्टी खोदते हैं। फिर आपके पास आएंगे।इतना कहकर सभी मिट्टी निकालने लगे और कुछ देर बाद घर चले गए। सभी के दिमाग से नाग वाली बात निकल गई थी। अगले दिन छोटी बहु को अचानक से याद आया कि उसने नाग को इंतजार करने के लिए कहा था। वो तुरंत अपनी सभी जेठानियों को अपने साथ लेकर नाग के पास चली गई। वहां देखा तो वो नाग उन सभी के इंतजार में उसी जगह पर बैठा हुआ था। नाग को देखते ही छोटी बहु ने प्यार से कहा, ‘भैया, कल हम लोग आपके पास आना भूल गए थे। उस बात के लिए आप हमें माफ कर दीजिए।’ जवाब में नाग बोला, ‘तुमने मुझे भाई कहा है, इसलिए मैं तुम्हें दण्ड नहीं दे रहा हूं। नहीं तो अबतक मैं तुम्हें डस चुका होता। आज के बाद में तुम हमेशा के लिए मेरी बहन रहोगी। अब तुम अपने भाई से कोई वरदान मांग लो। मैं तुमसे बहुत खुश हूं।’ इतना सब सुनने के बाद छोटी बहु ने नाग को बोला, ‘मेरा कोई भी सगा भाई नहीं है, इसलिए मैंने आपको भाई कहा था। अब से आप मेरे भाई हो। अब हरदम मेरी रक्षा करना आपका फर्ज है। बस यही वरदान मुझे आपसे चाहिए।’ नाग ने हर कदम पर साथ देने का वादा किया और अपने रास्ते निकल गया। सेठ की सारी बहु भी अपने घर लौट गईं। कुछ समय बाद नाग इंसान का रूप बनाकर अपनी बहन से मिलने सेठ के घर गया। उसने सेठ से कहा कि मेरी छोटी बहन को बुला दो। वो आपकी छोटी बहु है। पहले तो उनके मन में हुआ कि बहु का कोई भाई ही नहीं था, ये कहा से आ गया। फिर भी उन्होंने अपनी छोटी बहु को बाहर बुलाया। नाग ने फिर साथ में बहन को अपने घर लेकर जाने की बात की। सेठ ने इसकी भी आज्ञा दे दी। तभी नाग ने अपनी बहन से पूछा, ‘कहीं तुम मुझे भूल तो नहीं गई हो न? जवाब में बहन बोली, ‘नहीं, भैया मैं आपको बिल्कुल नहीं भूली हूं।’ फिर नाग ने कहा, ‘मैं तुम्हें अपने घर लेकर जा रहा हूं। तुम मेरी पूंछ पकड़कर चलती रहना पीछे।’ उसकी बहन ने वैसा ही किया। कुछ ही देर बाद वो एक बड़े से मकान में पहुंच गए। वहां हर तरफ सोना-चांदी और अन्य कीमती सामान थे। वहां नाग की बहन आराम से कुछ दिनों के लिए रहने लगी। नाग की मां भी उसे खूब प्यार करती थी। एक दिन नाग की मां ने छोटी बहु को अपने भाई के लिए दूध लेकर जाने के लिए कहा। छोटू बहु ने दूध को गर्म किया और भाई को पीने के लिए दे दिया। अब गर्म दूध पीते ही नाग का मुंह जलने लगा। ये सब देखकर नाग की मां को खूब गुस्सा आया। नाग ने किसी तरह से अपनी मां के गुस्से को शांत किया और बताया कि उसकी बहन को नहीं पता था कि मैं गर्म दूध नहीं पी सकता हूं। अब नाग के परिवार के साथ कुछ समय बीताने के बाद सेठ की छोटी बहु अपने घर जाने लगी। नाग ने अपनी बहन को खूब सारी दौलत और आभूषण देकर विदा किया। बहु के साथ घर में इतना सारा धन आते देख सेठ और उसकी जेठानियां हैरान हो गईं। एक दिन नाग की बहन को घर की बड़ी बहु ने कहा कि तुम अपने भाई से और सोना-चांदी लेकर आओ। उसके पास तो खूब पैसा है, वो तुम्हें मना नहीं करेगा। छोटी बहु ने अपने भाई नाग को यह बात बताई। इसके बारे में पता चलते ही नाग ने अपनी बहन का घर तरह-तरह के आभूषणों से भर दिया।सभी जेवरातों में से एक हीरे का हार बेशकीमती था। उसे देखते ही हर किसी का मन उसपर आ जाता था। होते-होते उस हीरे की हार की खबर राज्य की रानी तक पहुंची। उसने छोटी बहु से हार लेकर खुद अपने पास रख लिया। दुखी होकर सेठ की छोटी बहु ने अपने भाई को इसके बारे में बताया।गुस्से में उसके नाग भाई ने रानी के गले के हीरे के हार को नाग बना दिया। इससे डरकर रानी ने एकदम हार को अपने गले से उतारा और सेठ की छोटी बहु को महल बुलवाया। उसके महल पहुंचते ही रानी ने छोटी बहु को बताया कि कैसे हार उसके गले में नाग बन गया था और उससे इसकी वजह पूछने लगी? तब सेठ की छोटी बहु ने बताया की नाग भाई ने यह हार सिर्फ मुझे पहनने के लिए दिया है। इसे कोई दूसरा इंसान गले में डालेगा, तो यह तुरंत सांप बन जाएगा। इस बात को सही साबित करने के लिए रानी ने सेठ की छोटी बहु को सांप बन चुके हार को पहनने के लिए कहा। छोटी बहु ने जैसे ही नाग बने हार को गले में डाला, तो वो दोबारा हीरे के हार में बदल गया। महारानी ने ये सब होते हुए खुद अपनी आंखों से देखा और हैरान रह गई। अब उसे सेठ की छोटी बहु की बात पर यकीन हो गया। उसने हार छोटी बहु को अपने साथ लेकर जाने

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जितिया की व्रत कथा | Jitiya Ki Katha In Hindi

सालों पहले नर्मदा नदी के ठीक पास कंचनबटी नाम का एक नगर बसा हुआ था। वहां राजा मलयकेतु का शासन था। कंचनबटी नगर के पास में ही एक रेतीली बालुहटा नामक जगह थी, जिसके पास में एक बड़ा-सा पेड़ था। उस पेड़ में एक चील रहती थी और नीचे एक गीदड़। दोनों में गहरी दोस्ती थी। एक दिन दोनों ने सोचा कि सारी महिलाएं जितिया व्रत करती हैं, तो क्यों न हम भी कर लें। इसी सोच के साथ दोनों ने ठान ली कि अब वो भी इस व्रत को करेंगी। उन्होंने श्री जीऊतवाहन भगवान को मन-ही-मन नमस्कार करते हुए कहा, ‘हम आपकी पूजा और व्रत पूरी विधि के साथ करेंगे।’ जैसे ही व्रत का दिन आया, तो पास के ही एक धनवान व्यापारी की मौत हो गई। उसको अंतिम विदाई देने के लिए बालुहटा ही लाया गया, जहां गीदड़ और चील रहते थे। व्रत के दिन गीदड़ ने मरे हुए व्यक्ति को देखा, तो उसे भूख लग गई। वो खुद को रोक नहीं पाई और मांस खाने की वजह से उसका व्रत उसी वक्त टूट गया। उस व्यापारी के शव को चील ने भी देखा था, लेकिन उसने व्रत के कारण उसे नहीं खाया। उसके बाद चील और गीदड़ दोनों अगले जन्म में कंचनवटी के भास्कर नामक ब्राह्मण के घर में बेटी के रूप में पैदा हुए। चील का जन्म बड़ी बहन के रूप में हुआ, जिसका नाम शीलवती पड़ा और उसकी शादी बुद्धिसेन नामक लड़के से कराई गई। गीदड़ का जन्म उसकी छोटी बहन कपुरावती के रूप में हुआ। समय होने पर उसका विवाह कंचनवटी के राजा मलयकेतु से उसके पिता ने करवाया। भले ही कपुरावती विवाह के बाद कंचनबटी की रानी बन गई हो, लेकिन उसे बेटा का सुख नहीं मिला। उसके घर जितने भी बच्चे जन्म लेते थे, वो उसी दिन मर जाते। ऐसा होते-होते कपुरावती काफी परेशान हो गई। इधर, उसकी बड़ी बहन शीलवती को सात बेटे हुए थे। जब उसके सारे बेटे बड़े हो गए, तो उन्होंने महल में कार्य करना शुरू कर दिया। अपनी दीदी के बेटों को देखकर धीरे-धीरे कपुरावती रानी के मन में जलन का भाव पैदा होने लगा। उसने इसी जलन की वजह से अपने पति को कहकर अपनी दीदी के सारे बेटों के सिर कटवाकर एक बर्तन में रख दिए। उन सभी सात बर्तनों को कपुरावती ने लाल रंग के कपड़े से ढक दिया और अपनी दीदी शीलवती के पास भिजवा दिया। भगवान जीऊतवाहन भी ये सब देख रहे थे। उन्होंने रास्ते में ही सभी सात भाइयों के सिर को धड़ से जोड़ा और अमृत पिलाकर जिंदा कर दिया। फिर सभी भाई अपने घर चले गए और उन बर्तन में भगवान की कृपा से फल भर गए। उधर, कुपरावती अपनी दीदी के घर से शोक समाचार मिलने के इंतजार में बैठी हुई थी। जब कोई संदेश नहीं आया, तो वो खुद ही शीलवती के घर चली गई। वहां जैसे ही उसने अपनी दीदी के सारे बेटों को जिंदा देखा, तो वो हैरान हो गई। कुछ देर बाद उसने दीदी शीलवती को अपनी हरकत के बारे में बताया। उसने कहा कि किस तरह से उसने बर्तनों में उसके बेटों के सिर काटकर डाल दिए थे और जोर-जोर से रोने लगी। तभी शीलवती को अपने पिछले जन्म के बारे में याद आ गया। वो अपनी छोटी बहन को उसी पेड़ को पास लेकर गई, जहां वो दोनों पहले रहा करते थे। उसने कपुरावती को  पिछले जन्म में रखे जितिया व्रत की पूरी कहानी सुनाी। यह सब जानते ही कपुरावती ने उसी वक्त अपना दम तोड़ दिया। राजा को तुरंत शीलवती ने इस बात की जानकारी भिजवाई। अपनी पत्नी के बारे में दुख भरा समाचार मिलते ही राजा वहां पहुंचे और कपुरवती को उसी पेड़ के नीचे अंतिम विदाई दी।

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माता शबरी की कथा | Mata Sabri Ki Katha In Hindi

बात भगवान राम के जन्म से पहले की है, जब भील आदिवासी कबीले के मुखिया अज के घर बेटी पैदा हुई थी। उसका एक नाम श्रमणा और दूसरा नाम शबरी रखा गया। शबरी की मां इन्दुमति उसे खूब प्यार करती थी। बचपन से ही शबरी पशु-पक्षियों की भाषा समझकर उनसे बातें करती और जब सबरी की मां उसे देखती, तो कुछ समझ नहीं पाती थी। कुछ समय बाद एक पंडित ने शबरी के परिवार को बताया कि वो आगे चलकर संन्यासी बन सकती है। इस बात का पता चलते ही शबरी के पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया। जैसे ही शादी का दिन नजदीक आया, शबरी के घर वालों ने खूब सारी बकरियां और अन्य जानवर घर के पास लाकर बांध दिए। एक दिन शबरी का मां जब उसके बाल बना रही थी, तो उसने मां से पूछा, “इतने सारे जानवर हमारे घर क्यों लाए गए हैं।” मां ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हारा विवाह होने वाला है, इसलिए हम लोगों ने इनका इंतजाम बलि के लिए किया है। तुम्हारी शादी के दिन ही बलि प्रथा होगी और फिर इनसे स्वादिष्ट भोजन बनाकर सबको परोसा जाएगा।’ यह सब सुनकर शबरी दुखी हो गई। काफी देर तक शबरी ने उन जानवरों को आजाद करने के बारे में सोचा। सोचते-सोचते शबरी के मन में हुआ कि अगर ये जानवर यहां नहीं होंगे, तो इनकी बलि रूक सकती है। ऐसा नहीं हुआ, तो मेरे घर से कहीं चले जाने पर ही यह बलि रुकेगी। जब मैं ही नहीं रहूंगी, तब न विवाह होगा और न ही बलि प्रथा। इससे मासूम जानवर बच जाएंगे।इसी सोच के साथ जानवरों को रखी गई जगह पर सबरी पहुंची। उसने सोचा कि उन्हें खोल देती हूं, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। उसके बाद शबरी जंगल की तरफ भागने लगी। भागते-भागते शबरी ऋषिमुख पर्वत पहुंच गई। वहां करीब दस हजार ऋषि रहा करते थे। शबरी को लगा कि वो भी इसी जंगल में किसी तरह ऋषि-मुनियों की सेवा करके अपना जीवन जी लेगी। वो चुपचाप उसी जंगल में एक हिस्से में किसी तरह से रहने लगी। शबरी रोजाना ऋषि-मुनियों की झोपड़ी के आगे झाड़ु लगाती और हवन के लिए लकड़ियां भी लाकर रख देती। ऋषि-मुनियों को समझ नहीं आ रहा था कि जंगल में उनके काम अपने आप कैसे हो रहे हैं। एक दिन शबरी को किसी ऋषि ने देख लिया। उसे देखते ही उसका परिचय पूछा। जैसे ही शबरी ने बताया कि वो भील आदिवासी परिवार से संबंध रखती है, तो उसे ऋषियों ने खूब डांट लगाई। शबरी को इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था कि उसकी जाति छोटी है और उसे ऋषियों द्वारा जाति की वजह अपमान सहन करना पड़ेगा।इतना सब होने के बाद भी शबरी हर ऋषि-मुनि के दरवाजे पहुंचती और उनके आंगन में झाड़ू लगाकर उनसे गुरु दीक्षा देने के लिए कहती। हर कोई शबरी को उसकी जाति की वजह से अपने आश्रम से भगा देता था। ऐसा होते-होते काफी समय बीत गया। उसके बाद शबरी मतंग ऋषि की कुटिया में पहुंची।वहां पहुंचकर मतंग ऋषि को सबरी ने बताया कि वो उनसे गुरु दीक्षा लेना चाहती है। उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने गुरुकुल में रहने दिया और भगवान से जुड़ा ज्ञान देते रहे। शबरी ने भी अपने गुरु मतंग ऋषि की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो गुरुकुल के भी सारे काम करती थी। शबरी से खुश होकर मतंग ऋषि ने उसे बेटी मान लिया था। समय के साथ मतंग ऋषि का शरीर बूढ़ा हो गया। उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, ‘बेटी मैं अपना देह त्यागना चाह रहा हूं। बहुत साल हो गए इस शरीर में रहते-रहते।’ शबरी ने दुखी मन से कहा, ‘आपके ही सहारे मैं इस जंगल में रह पाई हूं। आप ही चले जाएंगे, तो मैं जीकर क्या करुंगी। आप अपने संग मुझे भी ले जाइए। मैं भी देह त्याग दूंगी मतंग ऋषि ने जवाब दिया, ‘बेटी, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। राम तुम्हारी चिंता करेंगे और ध्यान भी रखेंगे।’ शबरी ने ‘राम’ का नाम सुनने के बाद पूछा, ‘वो कौन हैं और उन्हें मैं किस तरह से ढूढूंगी।’ मंतग ऋषि ने बताया, ‘राम कोई और नहीं भगवान हैं। वो तुम्हें सारे अच्छे कर्मों का फल देंगे। तुम्हें उन्हें ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। वो एक दिन खुद तुम्हें खोजते हुए इस कुटिया में आएंगे और तु्म्हें उनके हाथों ही मोक्ष मिलेगा। तब तक तुम इसी आश्रम में रहो।’ इतना कहते ही मंतग ऋषि ने अपना शरीर त्याग दिया।शबरी के मन में मंतग ऋषि के जाने के बाद से एक ही बात थी कि भगवान राम स्वयं उससे मिलने आएंगे। वो रोज भगवान राम से मिलने के लिए बाग से अच्छे-अच्छे फूल लाकर पूरा आश्रम सजाती और भगवान के लिए बेर तोड़कर लाती। भगवान के लिए बेर चुनते हुए शबरी उन्हें चख लेती थी, ताकि भगवान वो सिर्फ मीठे बेर ही दे। रोजाना शबरी इसी तरह भगवान के दर्शन की आस में फूल और बेर इकट्ठा करती रहती थी। इसी तरह इंतजार में कई साल बीत गए। शबरी का शरीर एकदम वृद्ध हो गया। एक दिन आश्रम के पास के ही तलाब में शबरी पानी लेने के लिए गई। तभी पास के ही एक ऋषि ने उसे अछूत कहते हुए वहां से भागने के लिए कहा और एक पत्थर मार दिया। वो पत्थर जब शबरी को लगा, तो उसे चोट लगी और खून बहने लगा। बहते हुए खून की एक बूंद उसी तलाब के पानी में गिर गई। तभी पूरा तालाब का पानी खून में बदल गया। ये सब होता देखकर ऋषि ने शबरी को ही डांटा और कहा कि पापीन तुम्हारी वजह से पूरा पानी खराब हो गया। रोज ऋषि उस पानी को साफ करने के लिए अपनी कई तरह की विद्याओं का इस्तेमाल करते। कई सारे जतन करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। फिर उन्होंने गंगा जैसी कई पवित्र नदियों का जल भी उस तालाब में डाला। फिर भी तालाब का पानी साफ नहीं हो पाया और वो खून जैसा ही रहा। कई सालों तक तालाब के पानी को साफ करने की कोशिश के बाद भी कुछ काम नहीं आया, तो ऋषि ने थककर सबकुछ छोड़

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योगिनी एकादशी व्रत के दिन पढ़ें यह कथा, मिटेंगे दुख और पाप

आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष का योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) व्रत 24 जून शुक्रवार को है। यह एकादशी पापों के प्रायश्चित के लिए विशेष महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन श्री हरि के ध्यान, भजन और कीर्तन से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है। योगिनी एकादशी के दिन उपवास रखने और साधना करने से समस्याओं का अंत हो जाता है। यहां तक कि पीपल का पेड़ काटने का पाप भी इस एकादशी पर नष्ट हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है। जो लोग योगिनी एकादशी व्रत रहेंगे, वे योगिनी एकादशी व्रत कथा को अवश्य पढ़ें। ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान भगवान शंकर सृष्टि का संचालन करते हैं। इन महीनों में शुभ कार्यों की मनाही होती है। निर्जला एकादशी और देवशयनी एकादशी के बीच योगिनी एकादशी व्रत रखा जाता है। इसलिए इसे बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। योगिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त योगिनी एकादशी का व्रत 24 जून को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 23 जून रात 9:41 बजे से शुरू होगी और 24 जून को सूर्योदय तक रहेगी। 25 जून को एकादशी व्रत का पारण किया जाएगा। योगिनी एकादशी व्रत के नियम – सुबह नहाकर सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद पीले कपड़े पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें।– श्रीहरि को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करें।– इसके बाद श्री हरि और मां लक्ष्मी के मन्त्रों का जाप करें। किसी निर्धन व्यक्ति को जल, अनाज, कपड़े, जूते और छाते का दान करें। – इस दिन केवल जल और फल ग्रहण करके ही उपवास रखें।

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इस शुभ संयोग में शुरू होगा सावन का महीना, जानें कितने होंगे सोमवार व्रत

ऐसी मान्यताएं हैं कि श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस साल श्रावण मास जुलाई से 12 अगस्त तक रहने वाला है हिंदुओं की धार्मिक आस्था का महीना सावन धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा है. यह महीना भगवान शिव (Lord Shiva) का पसंदीदा वक्त माना जाता है और इस दौरान बड़ी संख्या में लोग व्रत रखकर शिव की आराधना करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि सावन में भगवान अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन में सोमवार का व्रत रखकर पूरी विधि के साथ पूजा-अर्चना करने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं. महादेव के भक्त इस वक्त यह जानना चाहते हैं कि साल 2022 में सावन का महीना कब शुरू होगा. इसके अलावा इस महीने में कितने सोमवार आएंगे और किस तरह पूजा करने से भक्तों को पूरा लाभ मिलेगा. कब से शुरू होगा सावन का महीना? श्री रामदेव मिश्रा शास्त्री जी का कहना है कि 13 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के साथ आषाढ़ का महीना खत्म हो जाएगा. 14 जुलाई से सावन का पवित्र महीना शुरू हो जाएगा. उनके मुताबिक इस बार सावन में 4 सोमवार होंगे. सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा. सावन में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-शांति आती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. सावन के पावन महीने में भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व माना गया है. इसके अलावा सावन में काल सर्पदोष शांति के लिए विशेष पूजा कराई जा सकती है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भी लोगों को परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी. इस सावन में कितने सोमवार? सावन का महीना 14 जुलाई यानी गुरुवार से शुरू होगा. इस पवित्र महीने का पहला सोमवार 18 जुलाई को होगा. दूसरा सोमवार 25 जुलाई, तीसरा सोमवार 1 अगस्त और चौथा सोमवार 8 अगस्त को होगा. आचार्य सर्वेश पांडे के मुताबिक इस साल सावन में केवल चार सोमवार ही होंगे क्योंकि सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा.

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जानिए आखिर क्यों साधु-संत और ऋषि मुनि पहनते है लकड़ी के खड़ाऊ

आपने अक्सर साधु-संत और ऋषि मुनि के पैरों में लकड़ी के खड़ाऊ पहने देखा होगा इनका चलन कई लाखो साल पहले से चला आ रहा है। आज भी कई साधू संत इन्हे ही इस्तेमाल करते है लेकिन अब इनका प्रचलन कम हो गया है, लेकिन आपको बता दे कि इसके पीछे कई धर्मिक और वैज्ञानिक तथ्य जुड़े है। इसको धारण करने से हमारे शरीर में कई तरीके के बदलाव और कई तरीके के फायदे होते है जिन्हे ऋषि मुनियो ने कई बरसो पहले जान लिया था। शायद कई बार आप इन्हे देखकर सोचा भी होगा या देखते हुए आपके मन में यही विचार भी आया होगा कि ये क्यों पहने जाते है क्या है इसके लाभ। वैसे देखा जाए जो इसके पहनने के पीछे हमारे पूर्वजों की सोच पूर्णत: वैज्ञानिक थी, आइये जानते है कैसे, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। तो आइए जानते हैं कि क्या है वो वैज्ञानिक कारण। गुरुत्वाकर्षण का जो सिद्धांत वैज्ञानिकों ने बाद में प्रतिपादित किया उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने काफी पहले ही समझ लिया था। उस सिद्धांत के अनुसार शरीर में प्रवाहित हो रही विद्युत तरंगे गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। यह प्रक्रिया अगर निरंतर चले तो शरीर की जैविक शक्ति (वाइटल्टी फोर्स) समाप्त हो जाती है। इसी जैविक शक्ति को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने पैरों में खड़ाऊ पहनने की प्रथा प्रारंभ की ताकि शरीर की विद्युत तंरगों का पृथ्वी की अवशोषण शक्ति के साथ संपर्क न हो सके। इसी सिद्धांत के आधार पर खड़ाऊ पहनी जाने लगी।साथ ही साथ धार्मिक मान्यता अनुसार उस समय चमड़े का जूता कई धार्मिक, सामाजिक कारणों से समाज के एक बड़े वर्ग को मान्य न था और कपड़े के जूते का प्रयोग हर कहीं सफल नहीं हो पाया। इसलिए खड़ाऊ का ही इस्तेमाल करना पड़ता था। लकड़ी के खड़ाऊ पहनने से किसी भी धार्मिक या सामाजिक लोगों को कोई आपत्ति नहीं थी, इसलिए इसका अधिक प्रचलन था। यही खड़ाऊ बाद में जाकर साधु-संत की पहचान बन गए कालांतर में यही खड़ाऊ ऋषि-मुनियों के स्वरूप के साथ जुड़  गए । खड़ाऊ के सिद्धांत का एक और सरलीकृत स्वरूप हमारे जीवन का अंग बना वह है पाटा। डाइनिंग टेबल ने हमारे भारतीय समाज में बहुत बाद में स्थान पाया है। पहले भोजन लकड़ी की चौकी पर रखकर तथा लकड़ी के पाटे पर बैठकर ग्रहण किया जाता था। भोजन करते समय हमारे शरीर में सबसे अधिक रासायनिक क्रियाएं होती हैं। इन परिस्थिति में शारीरिक ऊर्जा के संरक्षण का सबसे उत्तम उपाय है चौकियों पर बैठकर भोजन करना चाहिये ।

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वट सावित्री व्रत में क्यों की जाती है वट वृक्ष की पूजा, जानिए पौराणिक महत्व

हिंदू धर्म की महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखती हैं. यह त्यौहार ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन पड़ता है. इस बार यह त्यौहार 30 मई को मनाया जाएगा. इस दिन महिलाएं व्रत रहकर वट वृक्ष की पूजा करती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिलाएं वट सावित्री व्रत में वट(बरगद) वृक्ष की ही पूजा क्यों करती हैं? आइए जानते हैं क्या है वट सावित्री व्रत का पौराणिक महत्व और क्यों की जाती है वट वृक्ष की पूजा? ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्रा शास्त्री जी ने बताया  क्यों की जाती है वट वृक्ष की पूजाधार्मिक मान्यता अनुसार सावित्री के पति सत्यवान की दीर्घआयु में ही मृत्यु हो गई. जिसके बाद सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने पुण्य धर्म से यमराज को प्रसन्न करके अपने मृत पति के जीवन को वापस लौटाया था. यही वजह है कि सावित्री व्रत के दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं. वट सावित्री व्रत में देवी सावित्री की पूजा की जाती है. वट वृक्ष का धार्मिक महत्ववट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ में त्रिदेव यानी जड़ में ब्रम्हा जी, तन में विष्णु जी और सबसे ऊपर भोले शंकर का निवास माना जाता है. बरगद के वृक्ष में इन तीनों देवताओं के वास के चलते इसे देव वृक्ष कहा जाता है.  वट सावित्री व्रत कथाअश्वपति नामक राजा की कोई संतान नहीं थी. जिसके वजह से राजा ने यज्ञ करवाया जिसके बाद उनके घर कन्या ने जन्म लिया. जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा. सावित्री का विवाह राजा ने घुमत्सेन नामक राजा के लड़के सत्यवान से कर दिया. इसी बीच घुमत्सेन का सारा राजपाट छिन गया. जिसके बाद सावित्री अपने सास-ससुर और पति के साथ जंगल में बरगद के पेड़ के नीचे रहने लगी. इसी बीच उनके सास-ससुर के आंखों की रोशनी चली गई. सत्यवान एक दिन जंगल में लकड़ी काट रहे थें. इसी बीच उनके सिर में दर्द हुआ और वे जमीन पर लेट गए. सावित्री ने उनका सिर अपनी गोद में लेकर दाबने लगी. इसी बीच यमराज ने आकर बोला कि इनका समय पूरा हो गया है. मैं इन्हें ले जा रहा हूं. यमराज के पीछे-पीछे सावित्री भी चल पड़ी. यमराज ने सावित्री की तप को देखते हुए वर मांगने को कहा. सावित्री ने अपने सास-ससुर के आंखों की रोशनी मांगी. इसके बाद भी सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चलती रही. यमराज ने सावित्री से दूसारा वर मांगने को कहा, सावित्री ने अपने सास-ससुर के राज्य को वापस लौटाने को कहा.इसके बाद भी सावित्री यमराज का पीछा नहीं छोड़ी और उनके पीछे चलती रही. यमराज सावित्री की निष्ठा को देखते हुए अत्यधिक प्रसन्न हुए और उनसे अंतिम वर मांगने को कहा. जिसमें सावित्री ने अपने पति के प्राणों को वापस मांगने को कहा. यमराज ने उनके पति सत्यवान को मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दिया. जिसके बाद सावित्री वापस आकर वट वृक्ष के पास गई. जहां उनके पति मृतक अवस्था में पड़े थे. सावित्री के पहुंचते ही उनके शरीर में जान आ गया और वे उठ बैठें. 

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पहली बार वट सावित्री का व्रत रखने जा रही महिलाएं यहां जानिए व्रत करने का पूरा तरीका

जो महिलाएं पहली बार वट सावित्री का व्रत रखने जा रही हैं, उन्हें पूजा मुहूर्त, पूजा विधि के बारे में जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है. क्योंकि वट सावित्री का व्रत अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु का वरदान पाने के लिए किया जाता है. हर साल ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत किया जाता है. इस साल यह 30 मई दिन सोमवार को पड़ रहा है. ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्रा शास्त्री जी ने बताया 30 मई दिन सोमवार को सोमवती अमावस्या भी पड़ रही है. इसी दिन शनि जयंती भी मनाई जाएगी. प्रातः काल से ही सर्वार्थ सिद्धि योग और सुकर्मा योग भी है. ऐसे शुभ संयोग में वट सावित्री का व्रत अत्यंत फलदायक सिद्ध होगा. अमावस्या तिथि का प्रारंभ 29 मई दिन रविवार को दोपहर 2:54 से होगा. अमावस्या तिथि का समापन 30 मई दिन सोमवार को सायंकाल 3:40 पर होगा. वटसावित्री व्रत 30 मई 2022 सोमवार को रखा जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने और रक्षा सूत्र बांधने से पति की आयु लंबी होता है और हर मनोकामना पूर्ण होती है। क्योंकि इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवता वास करते हैं। इसलिए वृक्ष की पूजा करने से सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य अच्छा रहता है। वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्री सूची वट सावित्री की पूजा में लगने वाली प्रमुख सामग्रियां इस प्रकार है। इसमें सावित्री-सत्यवान की मूर्ति, कच्चा सूता, बांस का पंखा, लाल कलावा, धूप-अगरबत्ती, मिट्टी का दीपक, घी, बरगद का फल, मौसमी फल जैसे आम ,लीची और अन्य फल, रोली, बताशे, फूल, इत्र, सुपारी, सवा मीटर कपड़ा, नारियल, पान, धुर्वा घास, अक्षत, सिंदूर, सुहाग का समान,  नगद रुपए और घर पर बने पकवान जैसे पूड़ियां, मालपुए और मिष्ठान जैसी सामग्रियां व्रत सावनत्री पूजा के लिए जरूरी होती हैं। वट सावित्री पूजा विधि वट सावित्री के दिन सुबह जल्दी उठें। स्नान आदि करने के बाद नए कपड़े पहने और पूरे सोलह सिंगार कर तैयार हो जाएं। इसके बाद पूजा की सभी सामग्रियों को किसी थाली या टोकरी में सजाकर बरगद के पेड़ के पास जाएं। क्योंकि वट सावित्री की पूजा वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ पर ही की जाती है। पेड़ के नीचे सावित्री और सत्यवान की तस्वीर रखें। तस्वीर पर रोली, अक्षत, भीगे चने, कलावा, फूल, फल, सुपारी, पान, मिष्ठान आदि अर्पित करें। इसके बाद बांस के पंखे से हवा करें। कच्चा सूता वट वृक्ष पर बांधते हुए 5,7 या 11 बार परिक्रमा करें। इसके बाद सभी सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष के पास बैठकर वट सावित्री व्रत की कथा सुने या पढ़ें। पूजा समाप्त होने के बाद हाथ जोड़कर पति की दीर्घायु की कामना करें। सात भीगे चने और बरगद की कोपल को पानी के साथ निगलकर अपना व्रत खोलें।

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