शिव व्रत कथा | Sawan Somvar Vrat Katha In Hindi

एक समय की बात है, अमरपुर नामक नगर में एक धनवान व्यवसायी रहता था। उसका व्यापार बहुत दूर तक फैला हुआ था। यहां के सभी नगरवासी उसका बहुत आदर करते थे। उस व्यापारी के पास किसी भी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी वह अपने जीवन में सुखी नहीं था। दरअसल, उस व्यापारी का एक भी बेटा नहीं था, जिस कारण हर समय उसे यही चिंता सताती थी कि उसके मरने के बाद उसकी संपत्ति की देखभाल कौन करेगा। वह व्यापारी बेटे की चाहत में हर सोमवार को बाबा भोले नाथ की पूजा करता और शाम ढलते ही मंदिर जाकर शंकर भगवान के सामने दीप जलाता था। एक दिन मां पार्वती उसकी श्रद्धा-भक्ती से खुश हो गईं। उन्होंने बाबा भोले नाथ से उस व्यवसायी की इच्छा पूरी करने के लिए प्रार्थना की। इस पर भगवान शिव ने कहा, “इस दुनिया में हर किसी को उसके कार्यों के आधार पर फल मिलता है।” भगवान शंकर के समझाने पर भी पार्वती जी नहीं मानीं। वह लगातार बाबा भोले नाथ से यही कहती रहीं कि उस व्यापारी की इच्छा पूरी कर दीजिए। अंत में शिवजी ने मां पार्वती के अनुरोध पर उस व्यापारी को बेटे का वरदान दे दिया। आशीर्वाद देने के बाद भगवान शंकर ने पार्वती माता से कहा, “मैंने आपके अनुरोध पर उस व्यापारी को बेटे की प्राप्ति का आशीर्वाद तो दे दिया, लेकिन उसका बेटा केवल 16 साल की उम्र तक ही जीवित रहेगा।” यही बात भगवान शिव ने उस व्यापारी के सपने में जाकर उसे भी बताई। वरदान पाकर व्यापारी प्रसन्न था, लेकिन बेटे की उम्र 16 साल ही होगी सोचकर वह फिर दुखी हो गया। वह पहले की तरह फिर से हर सोमवार को भगवान शंकर की पूजा करने लगा। कुछ महीने बीतने के बाद उसके घर में एक बच्चे ने जन्म लिया, जो बहुत सुंदर था। उसका नाम अमर रखा गया। बेटे के जन्म के साथ ही व्यापारी के घर में खुशियां छा गईं। बेटे के जन्म की खुशी में एक समारोह का भी आयोजन किया गया। इस जश्न के माहौल में व्यापारी अभी भी दुखी था। हर समय उसे यह डर लगा रहता था कि उसका बेटा अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकेगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और उसका बेटा अमर 12 साल का हो गया। एक दिन व्यापारी ने अपने बेटे को अपनी पत्नी के भाई दीपचंद के साथ पढ़ाई के लिए बनारस भेज दिया। वाराणसी जाते समय रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद आराम करने के लिए रुकते, वहां वो यज्ञ और ब्राह्मणों के लिए भोजन की व्यवस्था करते जाते थे। कुछ दूर जाने के बाद अमर और दीपचंद एक नगरी पहुंचे। यहां नगर के महाराज की बेटी चंद्रिका की शादी थी, जिसके लिए पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया था। ठीक उसी समय बारात भी आ गई। इस समय लड़के का पिता परेशान था, क्योंकि उसके बेटे की एक आंख खराब थी। उन्हें डर था कि अगर लड़की वालों को यह बात पता चल गई तो वह शादी तोड़ देंगे। तभी उसकी नजर अमर और दीपचंद पर पड़ी। लड़के के पिता के मन में तुरंत ये ख्याल आया कि क्यों न अमर को ही दूल्हा बनाकर शादी के मंडप में बैठा दिया जाए। एक बार जब उसका विवाह राजकुमारी से हो जाएगा, तो फिर उसके बाद उसे कुछ पैसे देकर वहां से विदा कर देंगे। फिर राजकुमारी और अपने बेटे को अपने घर ले आएंगे। लड़के के पिता ने बिना देरी किए दीपचंद से इस बारे में बात की और धन का प्रस्ताव रखा। दीपचंद ने पैसों के लालच में आकर तुरंत हां बोल दिया और अमन को दूल्हा बनाकर मंडप में बैठा दिया। यहां राजा ने राजकुमारी का कन्यादान कर विवाह संपन्न कराया और बहुत सारी संपत्ति के साथ अपनी बेटी को विदा किया। शादी के बाद जब अमर वहां से लौट रहा था तो उसे लगा कि झूठ बोलना सही नहीं है और उसने राजकुमारी चंद्रिका के दुपट्टे पर सारी सच्चाई लिख दी। अमर ने लिखा, “प्रिय राजकुमारी चंद्रिका! तुम्हारे साथ छल हुआ है। तुम्हारा विवाह मेरे साथ कराया गया। मैं एक व्यापारी का पुत्र हूं और फिलहाल पढ़ाई के लिए वाराणसी जा रहा हूं। तुम्हारी शादी जिससे तय हुई थी उसकी एक आंख खराब है।” राजकुमारी ने यह सच जानने के बाद उस लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया और अपने पिता के साथ ही रहने लगी। उधर, अमर वाराणसी के गुरुकुल में पहुंचकर पढ़ाई करने लगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और अमर 16 साल का हो गया। इस दौरान उसने एक महायज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ समाप्त होने के बाद अमर ने सभी ब्राह्मणों को खाना खिलाया और उन्हें कपड़े दिए। सारे काम खत्म करने के बाद अमर रात में अपने कमरे में सोने चला गया। भगवान शंकर के वरदान के मुताबिक, उसी रात अमर के प्राण चले गए। अगली सुबह जब दीपचंद उसके कमरे में पहुंचा, तो उसने देखा कि अमर जीवित नहीं है। वह जोर-जोर से रोने लगा। उसकी रोने की आवाज सुनकर आसपास के लोग भी इकट्ठा हो गए और अपना दुख जताने लगे। दीपचंद के रोने की आवाज, भगवान शिव और मां पार्वती के कानों तक भी पहुंची। यह सुन माता पार्वती ने कहा, “हे स्वामी! मैं दीपचंद के रोने की इस आवाज को बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूं। कृपा करके इसके दुख को दूर करें।” पार्वती जी की बात सुनकर बाबा भोले नाथ अमर के पास पहुंचे। यहां उन्होंने देखा कि यह तो वही बालक है, जिसे केवल 16 साल की उम्र तक ही जीवित रहने का आशीर्वाद मिला था। इसके बाद भगवान शिव सीधे मां पार्वती के पास पहुंचे और कहा, “हे गौरी! मरने वाला बालक उसी व्यापारी का पुत्र है। इसने अपनी उम्र पूरी कर ली है।” यह सुन माता पार्वती ने भगवान शिव से एक बार फिर से आग्रह किया। उन्होंने कहा, “स्वामी! आप कृपा करके इस बालक को दोबारा जीवित कर दें। इसे मृत देख इसके माता-पिता भी अपने प्राण त्याग देंगे।” माता पार्वती ने बाबा भोले नाथ को याद दिलाया कि अमर के पिता उनके सबसे बड़े भक्त हैं। कई सालों से वह हर सोमवार को उनकी पूजा करते

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बृहस्पति व्रत कथा | Brihaspati Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक गांव में ऐसा गरीब धार्मिक ब्राह्मण रहता था, जिसकी को‌ई संतान नहीं थी। वह रोज नहा-धोकर मन से देवताओं की पूजा करते हुए संतान की मांग करता, लेकिन ब्राह्मण की पत्नी खूब आलसी थी। वह न स्नान करती थी और न ही पूजा-पाठ। पत्नी की इस आदत से ब्राह्मण दुखी रहता था। ब्राह्मण के धार्मिक गुणों से उसके घर में जल्द ही संतान के रूप में एक पुत्री ने जन्म लिया। उसकी पुत्री भी ब्राह्मण की ही तरह धार्मिक थी। जैसे-जैसे वो बड़ी हो रही थी, पूजा-पाठ में उसका मन भी उतना ही लगने लगा। वह हर रोज सुबह उठती, स्नान करती और भगवान विष्णु का ध्यान व जप करती थी। इसी तरह वो बृहस्पतिवार का उपवास भी करने लगी। इससे ब्राह्मण के घर की गरीबी भी दूर होती गई। हर दिन पूजा-पाठ करने के बाद वह पढ़ने के लिए स्कूल भी जाती थी। स्कूल जाते समय वह अपनी हाथों की मुट्ठियों में जौ भरकर स्कूल के रास्ते में गिराती थी। जब वह स्कूल से वापस घर के लिए आती, तो गिराए गए जौ के दाने सोने में बदल जाते थे, जिन्हें उठाकर वह घर लेकर चली आती थी। एक दिन ब्राह्मण की बेटी सोने के जौ सूप से साफ कर रही थी। तभी वहां आकर उसकी मां ने कहा, “बेटी, सोने के जौ को साफ करने के लिए सोने का सूप होना चाहिए।” ब्राह्मण की बेटी को मां की बात एकदम सही लगी। उसके अगले बृहस्पतिवार को उपवास रखने के बाद उस लड़की ने बृहस्पति देव से सोने का सूप मांगा। ब्राह्मण की बेटी हर बार पूरे विधि-विधान से बृहस्पति देव की पूजा-अर्चना करती थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान उसकी सारी इच्छाएं भी पूरी कर देते थे। इसी तरह उन्होंने सोने के सूप वाली प्रार्थना को भी स्वीकार कर लिया। अगले दिन हर रोज की तरह ब्राह्मण की बेटी पूजा-पाठ करके स्कूल गई और रास्ते में जौ के दाने बोते हुए गई। वापस आते समय जब वह जौ के दाने बिन रही थी, तो उसे सोने का सूप भी मिल गया। सोने का सूप लेकर वह घर आई, जिससे उसने सोने के जौ साफ किए। एक दिन इसी तरह ब्राह्मण की बेटी घर के बाहर बैठ कर सोने के जौ को सोने के सूप से साफ कर रही थी। तभी उसके घर के सामने से एक राजकुमार गुजर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण की बेटी को देखते ही उस पर मोहित हो गया। जब वह अपने महल पहुंचा, तो ब्राह्मण की बेटी के मोह में उसने खान-पीना त्याग दिया। जब राजा को यह पता चला, तो उन्होंने राजकुमार से इसका कारण पूछा। राजकुमार ने अपने दिल का सारा हाल राजा को बताया। अगले ही दिन राजा अपने मंत्री के साथ ब्राह्मण के घर गया और ब्राह्मण के सामने उसकी बेटी का विवाह अपने राजकुमार से करवाने का प्रस्ताव रखा। राजा का प्रस्ताव सुनकर ब्राह्मण काफी खुश हो गया। उसने तुरंत ही विवाह करने के लिए हां कर दी। कुछ ही दिनों में राजकुमार और ब्राह्मण की बेटी की शादी हो गई। इधर, ब्राह्मण की बेटी शादी होने के बाद अपने ससुराल चली गई। उधर, ब्राह्मण फिर से गरीब होने लगा। उसके बुरे दिन दोबारा वापस आ गए। एक दिन ब्राह्मण अपनी बेटी से मिलने के लिए उसके ससुराल गया। पिता की हालत देखकर उसने बहुत सारा धन देकर ब्राह्मण को विदा किया। बेटी का दिया हुआ धन कुछ ही दिनों में खत्म हो गया और ब्राह्मण गरीबी की वजह से परेशान हो गया। ब्राह्मण फिर से अपनी बेटी से मिलने के लिए महल गया और उसने बेटी को सारी समस्याएं बताई। अपने गरीब ब्राह्मण पिता की बात सुनकर उसकी बेटी ने कहा, “पिताजी, कल आप मां को लेकर मेरे पास आएं। मैं उन्हें बृहस्पति देव के उपवास और पूजन की विधि बताऊंगी। इसे करने से सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी।” ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। अगले दिन वह अपनी पत्नी को लेकर महल में बेटी से मिलने के लिए गया। पुत्री ने अपनी मां को बहुत समझाया कि उन्हें आसल त्याग कर सुबह स्नान करना चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए, लेकिन ब्राह्मण की पत्नी ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी। वह अभी भी पहले की ही तरह रहती थी। मां की ऐसी हरकतों से तंग आकार एक दिन उसकी पुत्री ने मां को एक कोठरी में बंद कर दिया। उसे जबरन सुबह स्नान करवाया और भगवान विष्णु की पूजा करवाई। इससे उसकी मां की बुद्धी में सुधार हो गया। अगले ही दिन से ब्राह्मण की पत्नि सुबह उठती, स्नान करती और भगवान विष्णु की पूजा करती। साथ ही बेटी के बताए अनुसार हर बृहस्पतिवार के दिन वह उपवास भी करने लगी। इससे प्रसन्न होकर बृहस्पति देव ने उनकी सारी गरीबी और सम्याएं दूर कर दी। फिर वह एक सुखी और संपन्न जीवन जीने लगे। इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद ब्राह्मण और उसकी पत्नी को स्वर्ग का द्वार भी मिला। कहानी से सीख – आलस्य करने से किसी भी तरह का काम नहीं बनता है। आलस्य को छोड़कर सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ की जाए, तो मन भी शांत रहता है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं।

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राम जन्म की कथा |  Ram Janam Katha In Hindi

एक समय की बात है, अयोध्या के महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ रखा। इस यज्ञ के लिए राजा दशरथ ने अपनी चतुरंगिणी सेना को काले कान वाले घोड़े को छोड़ने का आदेश भेजा। उनकी इच्छा थी कि इस महान यज्ञ में हर कोई शामिल हो, इसलिए राजा ने सभी ऋषि-मुनियों व विद्वान पंडितों को आमंत्रण भेजा। निर्धारित दिन पर महाराज दशरथ अपने दोस्त, गुरु वशिष्ठ, ऋंग ऋषि व अन्य विद्वानों के साथ यज्ञ मंडप में पहुंचे। इसके बाद विधिवत रूप से यज्ञ की शुरुआत हुई। मंत्र उच्चारण और पाठ जैसे सभी विधि-विधान के साथ कुछ घंटों में यज्ञ पूरा हुआ। राजा दशरथ ने फिर सभी ब्राह्मणों, विद्वानों व अतिथियों को उपहार में धन और गाय आदि देकर आदरपूर्वक विदा गया। उस यज्ञ में प्रसाद के रूप में खीर बनी थी। उस प्रसाद में पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद था, जिसे खाने के बाद तीनों रानियां गर्भवती हो गईं। कुछ समय बाद चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन राजा दशरथ की पहली पत्नी यानी रानी कौशल्या ने एक बच्चे को जन्म दिया। उस बच्चे के चेहरे में इतनी रोनक थी कि हर कोई देखकर समझ जाता था कि वह आम बच्चा नहीं है। इसी तरह राजा की दूसरी रानी कैकेयी ने एक पुत्र और तीसरी रानी सुमित्रा ने दो पुत्र को शुभ नक्षत्रों में जन्म दिया। राजा दशरथ का महल और नगर चार पुत्रों के जन्म से खिलखिला उठा। चारों तरफ आनंद और जश्न का माहौल था। पूरी प्रजा खुशी से गा व झूम रही थी। इस खुशी को देखकर देवता भी फूलों की वर्षा करने लगे। इस जश्न में शामिल होने के लिए कई ब्राह्मण भी पहुंचे और राजा दशरथ के बेटों को आर्शीवाद दिया। खुशी से झूम रहे राजा दशरथ ने ब्राह्मणों को खूब दान दिया। फिर अपनी खुशी जाहिर करने के लिए उन्होंने प्रजा व दरबारियों में भी धन, रत्न और आभूषण बंटवाए। समय आने पर सबकी मौजूदगी में चारों बालकों का नामकरण भी किया गया। महर्षि वशिष्ठ ने उनका नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा। वक्त बीतता गया और धीरे-धीरे ये चारों बालक बड़े हुए। इन चारों में राम अपने तेजस्वी गुणों के कारण प्रजा को अधिक प्रिय लगने लगे। अपनी प्रतिभा के चलते वो कम उम्र में ही सभी विषयों में महारथ हासिल कर चुके थे। राम में सभी गुण थे। चाहे शस्त्र चलाने की बात हो या हाथी व घोड़े की सवारी, हर चीज में वो अव्वल थे। साथ ही वो माता-पिता व गुरुओं का भी खूब सम्मान करते थे। उनके गुणों के कारण बाकी के तीन भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी उनसे काफी कुछ सीखते थे। जब भी महराज अपने चारों पुत्रों को एकसाथ देखते उनका मन आनंद से भर उठता था। राम में मौजूद गुणों के कारण उन्हें श्री राम और भगवान राम तक कहा जाने लगा। आगे चलकर राम के जीवन पर दो पवित्र ग्रंथ लिखे गए, रामचरित मानस और रामायण। कहानी से सीख: व्यक्ति के गुण ही उसे पहचान दिलाते हैं। अगर गुण और संस्कार अच्छे हों, तो वह भगवान तुल्य हो जाता है।

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विष्णु भगवान की व्रत कथा |  Vishnu Bhagwan Ki Katha In Hindi

एक समय की बात है, जब ऋषि मुनियों ने यह जानने का निर्णय लिया कि त्रिदेवों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से सर्वश्रेष्ठ कौन है। इस बात का पता लगाने की जिम्मेदारी भृगु ऋषि को दी गई। भृगु ऋषि इस बात का पता लगाने के लिए सबसे पहले ब्रह्मा लोक गए और वहां पहुंचकर ब्रह्मा देव की परीक्षा लेने लगे। उन्होंने सीधे क्रोध में पूछा, “आपने मुझे प्रणाम क्यों नहीं किया?” यह सुनते ही ब्रह्मा देव को गुस्सा आ गया। उन्होंने झल्लाते हुए पूछा, “क्या एक पुत्र अपने पिता से श्रेष्ठ हो गया है, जो उसे मुझे प्रणाम करना होगा।” यह सुनने के बाद भृगु ऋषि उनसे कहते हैं कि मैं तो आपकी परीक्षा ले रहा था और आप मुझपर क्रोधित हो गए। इतना कहकर भृगु ऋषि वहां से सीधे कैलाश चले गए। वहां जाकर वो नंदी से कहते हैं कि मुझे शिव जी से मिलना है। नंदी ने ऋषि को जवाब देते हुए कहा, “मैं भगवान शिव का ध्यान भंग नहीं कर सकता है। ऐसा करने पर भोलेनाथ क्रोधित होंगे।” नंदी का जवाब सुनकर भृगु ऋषि खुद ही शिव जी के ध्यान को भंग कर देते हैं। शिव जी का ध्यान भंग होने पर वो भी गुस्सा करते हुए भृगु ऋषि को भस्म करने की बात कहते हैं। तभी माता पार्वती उन्हें रोकती हैं और ऋषि मुनि को क्षमा करने की प्रार्थना करती हैं। शिव जी के गुस्से को देखने के बाद भृगु ऋषि कैलाश से सीधे बैकुंठ चले जाते हैं। वहां वो देखते हैं कि भगवान विष्णु आराम कर रहे हैं और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही होती हैं। उसी वक्त भृगु ऋषि सीधे विष्णु भगवान की छाती पर पैर से प्रहार कर देते हैं। इस प्रहार से भगवान विष्णु की नींद खुल जाती है और वो भृगु ऋषि से प्यार से पूछते हैं, “हे ऋषिवर! मेरे कठोर शरीर से कहीं आपके कोमल पैर को चोट तो नहीं लगी? अगर लगी होगी, तो मुझे क्षमा कर दें।” यह सुनते ही ऋषि प्रसन्न हो जाते हैं और समझ जाते हैं कि भगवान विष्णु ही त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मां लक्ष्मी भी ये सब होते हुए देखती हैं। वो गुस्से में कहती हैं, “नाथ! उन्होंने आपको पैर से मारा और आप इस तरह प्रेम भाव दिखा रहे हैं। क्रोध में वो भगवान विष्णु को छोड़कर बैकुंठ से सीधे धरती चली जाती हैं और महाराष्ट्र के कोल्हापुर में रहने लगती हैं। माता लक्ष्मी के बैकुंठ छोड़कर चले जाने पर भगवान विष्णु को लगता है कि उनका सम्मान और संपत्ति नष्ट हो गई है। इसी वजह से उनका मन काफी अशांत रहने लगा। फिर वो माता लक्ष्मी की तलाश में धरती चले जाते हैं। धरती जाकर भगवान विष्णु, श्रीनिवास नामक व्यक्ति बनकर माता लक्ष्मी को ढूंढने लगते हैं। माता लक्ष्मी को ढूंढते-ढूंढते वो वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में स्थित बकुलामाई के आश्रम पहुंच जाते हैं। वहां बकुलामाई ने उनका आदर पूर्वक स्वागत किया और उन्हें आश्रम में ही रहने के लिए कहा। उस आश्रम में भगवान आराम से श्रीनिवास बनकर रहने लगे। कुछ दिन बाद वहां एक हाथी आ जाता है, जो सबको परेशान करता है। यह देख श्रीनिवास धनुषबाण लेकर हाथी की ओर दौड़ते हैं। उन्हें आता देख हाथी डरकर घने जंगल में भाग जाता है। श्रीनिवास उस हाथी का पीछा करता हुए थककर एक सरोवर के पास पेड़ की छाया में आराम करने लगते हैं और कुछ ही देर में उन्हें नींद आ जाती है। नींद में वो कुछ युवतियों का शोर सुनते हैं, जिससे उनकी नींद टूटती है। आंखें खोलते ही वो खुद को पांच-छह युवतियों से घिरा पाते हैं। युवतियां श्रीनिवास को डाटते हुए बोलती हैं कि यह राजकुमारी पद्मावती का उपवन है और इस क्षेत्र में पुरुषों का आना एकदम मना है। यहां तुम कैसे और किस लिए आए हो? श्रीनिवास जवाब दे ही रहे थे कि तभी उनकी नजर वृक्ष के पीछे से झांकती राजकुमारी पद्मावती पर पड़ी। वो उसे देखते ही रह गए। कुछ देर में वो युवतियों को बताते हैं कि मैं एक हाथी का पीछा करते हुए यहां पहुंचा हूं। मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि यहां पुरुषों का आना मना है। मुझे क्षमा कर दें। इतना कहकर वो बकुलामाई के आश्रम लौट जाते हैं। आश्रम लौटने के बाद श्रीनिवास का किसी भी काम में मन नहीं लगा। तब एक दिन बकुलामाई उनसे उनकी उदासी की वजह पूछती हैं। उदास होकर श्रीनिवास पद्मावती के बारे में उन्हें बताते हैं और कहते हैं कि मैं उसके बिना नहीं रह पाऊंगा। बकुलामाई उन्हें कहती है कि ऐसा सपना न देखिए जो पूरा न हो सके। वह एक प्रतापी राजा चोल नरेश आकाशराज की बेटी है और आप एक आश्रम में रहने वाले कुल व गोत्रहीन युवक हैं। कुछ देर सोचने के बाद श्रीनिवास कहते हैं कि मां एक तरीका है। बस आपको मेरा साथ देना होगा। बकुलामाई श्रीनिवास का प्यार देखकर हां कह देती हैं। दूसरे दिन श्रीनिवास ज्योतिष विद्या में निपुण औरत का वेष धारण करके राजा आकाश के नगर नारायणपुर पहुंचते हैं। उनकी विद्या की वजह से हर तरफ उनकी चर्चा होने लगती है। होते-होते एक दिन राजा ने उन्हें अपनी बेटी पद्मावती का हाथ देखने के लिए श्रीनिवास को अपने महल बुलवाया। वहां पहुंचकर उन्होंने राजकुमारी के हाथों की रेखा देखी और कहा कि कुछ दिन पहले एक युवक से वन में तुम्हारी मुलाकात हुई होगी। पद्मावती ने जवाब में हां कहा। महिला बने श्रीनिवास ने कहा कि उसी युवक के साथ तुम्हारा विवाह होगा। तभी पद्मावती की मां धरणा देवी उनसे पूछती है कि यह कैसे होगा? तब ज्योतिष औरत कहती है कि यह इसके भाग्य में लिखा है और ग्रह यह कहते हैं कि एक औरत उसके लिए आपकी बेटी का रिश्ता मांगने आएगी। दो दिन बितने के बाद बकुलामाई एक तपस्विनी बनकर राजमहल गई और अपने युवा पुत्र के लिए पद्मावती के रिश्ते की बात की। तभी राजा आकाश बकुलामाई को पहचान जाते हैं और उनसे पूछते हैं कि वह युवक कौन है? बकुलामाई उन्हें श्रीनिवास के बारे में बताते हुए कहती हैं कि वह चन्द्र वंश में जन्मा हुआ लड़का है, जो मेरे आश्रम में रहता है और मुझे मां मानता है। राजा उनकी बात

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दशा माता की कथा | Dasha Mata Vrat Katha In Hindi

सालों पहले नल नामक एक राजा राज किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। दोनों अपने दो बेटों के साथ सुखी जीवन जी रहे थे। राजा के शासन में प्रजा भी काफी समृद्ध और सुखी थी। कुछ समय बाद होली दशा का त्योहार आया। दोपहर के समय जब रानी अपने कमरे में आराम कर रही थी, तो एक ब्राह्मण महिला राजमहल आईं और रानी से मुलाकात करने की इच्छा जताई। आज्ञा मिलने पर उस ब्राह्मणी को रानी के पास ले जाया गया। रानी के पास पहुंचकर उस महिला ने कहा, “हे महारानी! ये दशा डोरी तुम ले लो।” इस पर वहां खड़ी दासी भी बोली, “हां महारानी, आज होली दशा है और आज के दिन विवाहित महिलाएं दशा माता का व्रत करती हैं। इस व्रत में महिलाएं इसी डोरी की आराधना कर उसे अपने गले में बांधती हैं। इसे बांधने से घर की सुख-शांति बनी रहती है।” दासी की इस बात को सुनने के बाद रानी दमयंती ने उस डोरी की पूजा कर उसे अपने गले में बांध लिया।कुछ दिन बीतने के बाद राजा नल ने अपनी पत्नी के गले में उस डोरी को बंधा देखा। उसे देखते ही राजा ने अपनी पत्नी से पूछा, “हे प्रिय! आपके पास इतने सोने के हार होने के बावजूद इस डोरी को क्यों बांध रखा है?” रानी दमयंती राजा के सवाल का जवाब दे पाती कि इससे पहले ही राजा ने उनके गले से डोरी निकालकर फेंक दी। इसके बाद रानी ने जमीन से डोरी उठाई और कहा, “महाराज! यह कोई सामान्य डोरी नहीं है। यह तो दशामाता की डोरी थी। आपने इसका अपमान करके सही नहीं किया।” रानी की बात सुनकर राजा ने कुछ नहीं कहा और वहां से चले गए। उसी दिन रात को राजा ने एक सपना देखा। सपने में दशा माता एक बूढ़ी औरत के रूप में आईं और राजा से कहा, “हे राजन! अब तेरी अच्छी दशा समाप्त हो रही है और बुरी दशा की शुरुआत होगी। तुमने मेरा अनादर करके सही नहीं किया।” इतना कह कर वह गायब हो गईं। इस घटना के बाद, जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, वैसे-वैसे राजा का शौर्य कम होता चला गया। समय के साथ-साथ राजा की संपत्ति और सुख-शांति सब खत्म होने लगी। धीरे-धीरे उनका परिवार भूख से तड़पना लगा। अपनी इस स्थिति से परेशान होकर एक दिन राजा नल ने अपनी पत्नी से कहा, “आप हमारे दोनों बेटों को लेकर अपने माता-पिता के घर चली जाइए।” इसपर रानी दमयंती बोलीं, “नहीं स्वामी, मैं इस हालात में आपको अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। आप चाहे जैसी स्थिति में रहें, मैं हमेशा आपके साथ ही रहूंगी।” यह सुनकर राजा ने कहा, “ठीक है फिर हम किसी दूसरे देश चलते हैं। वहां हम जीवन यापन के लिए कोई काम कर लेंगे।” राजा की बात मानकर रानी दमयंती उनके साथ अपने दोनों पुत्रों को लेकर दूसरे देश जाने के लिए राजी हो गईं। राजा नल जब अपने परिवार के साथ दूसरे देश जा रहे थे, तभी उन्हें भील नामक राजा का राजमहल दिखा। राजा नल ने भील के यहां अमानत के रूप में अपने दोनों बेटों को छोड़ दिया। इसके बाद वह अपनी पत्नी के साथ आगे का सफर तय करने लगे। कुछ दूर जाने के बाद राजा को अपने दोस्त का घर दिखा। उसे देख राजा नल ने अपनी पत्नी से कहा, “चलो, तुम्हें अपने मित्र से मिलवाता हूं।” कुछ ही देर में राजा अपने दोस्त के घर पहुंच गए। उनके दोस्त ने दोनों का खूब स्वागत किया। फिर राजा के दोस्त ने अपना कमरा दोनों को सोने के लिए दे दिया। राजा और रानी जब उस कमरे में गए तो उन्होंने देखा कि वहां एक मोर की प्रतिमूर्ति पर हीरों से जड़ा सुंदर-सा हार टंगा है। उसे देखते-देखते दोनों सो गए। बीच रात अचानक रानी की नींद टूटी। उसने देखा कि वह बेजान मूर्ति हीरे का हार खा रही है। रानी यह देखकर हैरान हो गई और उसने तुरंत राजा को जगाया। राजा नल भी इस दृश्य को देखकर दंग हो गए। फिर दोनों ने सोचा कि सुबह होने पर अगर दोस्त ने पूछा कि हार कहां गया तो क्या जवाब देंगे। इसी सोच के साथ चोरी के इल्जाम के डर से दोनों रात को ही महल छोड़कर चले गए। अगली सुबह राजा का मित्र और उसकी पत्नी उस कमरे में गए। वहां उन्होंने देखा राजा नल और रानी दमयंती नहीं थे। तभी उसकी पत्नी की नजर उस मोर की मूर्ति पर पड़ी। हीरे का हार गायब देखकर वो बोली, “आपके मित्र कैसे निकल। हीरे का हार लेकर भाग गए।” इसपर राजा के दोस्त ने अपनी पत्नी से कहा, “नहीं प्रिय, ऐसा नहीं है। मेरा दोस्त कभी भी चोरी नहीं कर सकता। तुम उसे चोर मत कहो।” उधर, राजा नल और उसकी पत्नी जब वहां से निकले, तो कुछ ही दूर चलने के बाद रास्ते में राजा की बहन का घर आया। राजा ने एक दूत से अपने बहन के घर खबर भेजी कि उसके भैया और भाभी वहां आए हैं। राजा की बहन ने दूत से पूछा कि वह दोनों कैसे हैं। इस पर दूत ने बताया, “दोनों पैदल चलकर आ रहे और वो बेहद दुखी भी लग रहे हैं।” दूत की बात सुनकर बहन अपने साथ खाना लेकर उनसे मिलने पहुंची। अपनी बहन से मिलकर राजा नल ने अपने हिस्से का खाना खा लिया, लेकिन उसकी पत्नी ने अपने खाने को उसी जगह जमीन में दबा दिया। इसके बाद राजा और रानी दोनों वहां से आगे सफर के लिए निकल गए। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें एक नदी दिखाई दी। राजा नदी के पास जाकर मछलियों को पकड़ने लगे। कुछ मछलियों को पकड़कर उसने रानी से कहा, “आप ये मछलियों भूनिए, मैं आसपास के इलाके से कुछ और व्यवस्था करके आता हूं। इतना कहकर राजा एक गांव गए। वहां एक व्यक्ति सभी को भोजन करा रहा था। राजा उसके पास गए और अपने लिए कुछ भोजन मांगकर पत्नी के पास लौटने लगे। तभी रास्ते में एक चील ने उनपर हमला कर दिया और खाना गिर गया। भोजन गिरने के बाद राजा दुखी हो गए। उन्होंने सोचा अगर खाली हाथ जाऊंगा, तो रानी समझेंगी कि मैंने खुद खा

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सरस्वती पूजा (वसंत पंचमी) की व्रत कथा |  Saraswati Puja (Basant Panchmi) Ki Katha

कई हजारों साल पहले ब्रह्मा जी ने विष्णु भगवान के आदेश पर सृष्टि रचना की। उस समय उन्होंने सभी तरह के जीव जन्तुओं के साथ ही मनुष्यों को भी बनाया। सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी धरती पर आकर भ्रमण करने लगे। तब उन्होंने देखा की हर तरफ शांति है और किसी तरह की ध्वनी नहीं है। यह सब देखकर वो अपनी रचना से संतुष्ट नहीं हुए। फिर उन्होंने अपने कमंडल से जल लेकर जमीन पर छिड़क दिया। जल के छिड़कने के बाद धरती में कंपन हुआ और धरती से चार हाथों वाली सुंदर देवी प्रकट हुईं। उस देवी के एक हाथ में वीणा, दूसरे में वर मुद्रा, तीसरे में पुस्तक और चौथे में माला थी। चतुर्भुजी देवी ने ब्रह्माजी के कहने पर अपनी वीणा से मधुर नाद किया, तब संसार के सभी प्राणियों को वाणी प्राप्त हुई। उस दिन के बाद से हर तरफ मधुर वाणी गूंजने लगी। चिड़िया चहचहाने, भवरे गुनगुनाने और नदियां कलकल करने लगीं। उनके वीणा की मधुरता को सुनने के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें वाणी की देवी सरस्वती पुकारा। तब से ही उस चतुर्भुजी देवी को सरस्वती के नाम से जाना जाने लगा। मां सरस्वती देवी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन प्रकट हुई थी, जिसे वसंत पंचमी कहा जाता है। तभी वसंत पंचमी के दिन को मां सरस्वती के जन्मोत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है। पुराणों के मुताबिक, भगवन श्रीकृष्ण ने माता सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया था कि भक्तों द्वारा वसंत पंचमी के दिन उनकी पूजा-आराधना की जाएगी। यही वजह है कि इस दिन हिंदू धर्म के लोगों द्वारा मां सरस्वती की धूमधाम से पूजा की जाती है। मां सरस्वती को शारदा, भगवती, वीणावादनी, वाग्देवी और बागीश्वरी आदि नामों से भी जाना व पूजा जाता है। मां सरस्वती द्वारा संगीत की उत्पत्ति हुई है, इसलिए संगीत भजन से पहले मां सरस्वती की पूजा भी की जाती है। कहानी से सीख : इस कहानी से यह सीख मिलती है कि जबतक अपने काम से संतुष्टि न मिले, तबतक उसे बेहतर करने की कोशिश करते रहना चाहिए।

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सत्यनारायण की व्रत कथा – द्वितीय अध्याय |  Satyanarayan Vrat Katha (Chapter 2)

ऋषि मुनियों को नारद और भगवान विष्णु की कहानी सुनाने के बाद श्री सूत जी ने कहा, “हे मुनिगण! जिस व्यक्ति ने सबसे पहले इस व्रत को किया था मैं उसके बारे में भी आप लोगों को बताता हूं, ध्यान से सुनें।” एक समय की बात है, सुंदर काशीपुरी नामक नगरी में एक बेहद गरीब ब्राह्मण रहता था। भूखे प्यासे वह ब्राह्मण भोजन की इच्छा लिए धरती पर भ्रमण कर रहा था। यह देख एक दिन सत्यनारायण भगवान खुद बूढ़े ब्राह्मण के रूप में धरती पर आए और उन्होंने उस गरीब ब्राह्मण के पास जाकर पूछा, “आप रोजाना इतना उदास मन लेकर इस धरती पर क्यों घूमते रहते हैं?” ब्राह्मण ने जवाब में कहा, “मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं और भिक्षा की तलाश में धरती पर भ्रमण करने को मजबूर हूं। अगर आपके पास ऐसा कोई उपाय है, जिसका पालन कर मैं अपनी गरीबी दूर कर सकूं, तो मुझे बताइए।” इस पर बूढ़े ब्राह्मण ने कहा, “तुम भगवान सत्यनारायण की आराधना करो। वह सभी के मन की मुराद को पूरी करते हैं। उनकी पूजा करने वाला हर शख्स दुख और कष्ट से दूर हो जाता है।” इतना कहकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप लिए सत्यनारायण भगवान अदृश्य हो गए। उनकी बातें सुनकर निर्धन ब्राह्मण इस व्रत को करने का उपाय सोचने लगा। रात भर गरीब ब्राह्मण ने इसी के बारे में सोचा और पूरी रात जागने के बाद सत्यनारायण भगवान की पूजा करने के लिए भिक्षा मांगने निकल पड़ा। अन्य दिनों के मुकाबले उस दिन उस ब्राह्मण को काफी ज्यादा भिक्षा मिली। उस भिक्षा से और अपने प्रियजनों के सहयोग से किसी तरह ब्राह्मण ने सत्यनारायण भगवान की पूजा की। पूजा के बाद उस गरीब ब्राह्मण के सभी दुख दूर हो गए। धीरे-धीरे वह कई संपत्तियों का मालिक हो गया। ब्राह्मण हर महीने नियमित रूप से इस पूजा को करने लगा। श्री सूत ने कहा, “इस तरह से जो कोई भी सच्ची श्रद्धा के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करेगा वह सभी प्रकार के दुखों और पापों से मुक्ति पा सकेगा।” इस पर ऋषिगण बोले, “हे सर्व ज्ञाता सूत जी! उस ब्राह्मण की बातों को सुनकर और किस-किस ने श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा की? आप इस बारे में भी हमें बताएं।” फिर सूत जी ने आगे कहा, “इस व्रत को जिन लोगों ने भी किया मैं उन सभी के बारे में आप लोगों को बताता हूं, ध्यान से सुनें।” एक बार वह गरीब ब्राह्मण धन और संपत्ति की प्राप्ति के बाद अपने परिजनों के साथ इस व्रत को करने की तैयारी कर रहा था। तभी एक बूढ़ा व्यक्ति लकड़ी बेचते हुए वहां आया। उसने लकड़ियों को बाहर रखा और स्वयं ब्राह्मण के घर के अंदर चला गया। प्यास से तड़पता वह लकड़ी बेचने वाला जब घर के अंदर आया, तो उसने देखा कि ब्राह्मण पूजा पर बैठा हुआ था। उसने ब्राह्मण को नमस्कार किया और पूछा, “हे मुनिवर! आप यह कौन-सा तप कर रहे हैं और इसे करने से क्या फल मिलेगा? लकड़हारे के सवालों का उत्तर देते हुए ब्राह्मण ने कहा, “यह व्रत श्री सत्यनारायण भगवान का है। इसे करने से मन की इच्छा पूरी होती है। इसी व्रत का पालन करके मुझे धन की प्राप्ति हुई है।ठ ब्राह्मण से इस व्रत के बारे में सुनकर लकड़हारा बेहद खुश हुआ। उसने चरणामृत व प्रसाद ग्रहण किया और तुरंत अपने घर चला गया। घर पहुंचकर उसने निश्चय किया कि किसी भी हाल में वह भी श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करेगा। इसके लिए वह लकड़ी बेचने उस नगर जा पहुंचा जहां अधिक संख्या में अमीर लोग रहते थे। वहां उसे पहले के मुकाबले अधिक धन मिला। इसके बाद उस लकड़हारे ने कमाए हुए धन से गेहूं का आटा, केला, घी, शक्कर, दूध सहित सत्यनारायण व्रत में लगने वाली सभी सामग्रियों को खरीदा। फिर उसने अपने परिजनों को भी आमंत्रित किया और पूरी विधि के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। इस पूजा को करने के बाद उस लकड़हारे को भी धन और संपत्ति की प्राप्ति हुई और आखिर में उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई। इस प्रकार सत्यनारायण कथा का दूसरा अध्याय खत्म हुआ।

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सत्यनारायण की व्रत कथा- प्रथम अध्याय | Satyanarayan Vrat Katha (Chapter 1)

बहुत समय पहले की बात है, सर्वशास्त्र ज्ञाता श्री सूतजी से हजारों की संख्या में ऋषि-मुनि गण मिलने पहुंचे। वहां पहुंचकर सभी मुनियों ने सूत जी को नमन किया और पूछा, “हे परमपिता! कलयुग के समय में ईश्वर की भक्ति के लिए मनुष्यों को क्या करना होगा? कलयुग में उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? हे प्रभु! कृपया आप हमें किसी ऐसे तप के बारे में बताएं, जिसे करने से मन की मुराद पूरी होने के साथ ही पुण्य की प्राप्ति हो जाए।” ऋषियों की बात सुनने के बाद सूत जी बोले, “हे मुनि गण! आप सभी ने मनुष्यों के हित के बारे में एक अच्छा सवाल किया है। मैं आप सभी को एक ऐसे व्रत के बारे में बताऊंगा, जिसके बारे में खुद लक्ष्मीपति ने नारद मुनि को बताया था। आप सभी इस व्रत को ध्यानपूर्वक सुनें।” एक बार नारद मुनि दूसरों के हित की अभिलाषा लिए कई लोकों के भ्रमण पर निकले। इस भ्रमण के दौरान घुमते-घुमते एक दिन वह मृत्युलोक यानी धरती पहुंचे। यहां नारद मुनि ने देखा कि सभी मनुष्य अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। इसके कारण सभी दुख से पीड़ित हैं। यह देख उनके मन में एक सवाल आया कि ऐसा कौन-सा उपाय निकाला जाए, जिसका पालन करने से मनुष्यों के दुखों का अंत किया जा सके। अपने इस सवाल को लेकर नारद मुनि विष्णु लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने भगवान नारायण की आराधना की। प्रार्थना करते हुए नारद मुनि बोले, “हे प्रभु! आप तो सर्व शक्तिशाली हैं, आपका कोई अंत नहीं है। आप सभी भक्तों के कष्ट को दूर करते हैं, आपको मेरा प्रणाम है। नारद मुनि की यह बातें सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और कहा, “हे नारद मुनि! आपके मन में ऐसा कौन सा सवाल है, जिसके लिए आप यहां पधारे हैं। परमपिता विष्णु की बात सुनकर नारद मुनि बोले, “प्रभु! मृत्युलोक में मनुष्य अपने कर्मों के दुख झेल रहे हैं। भगवन! आप अगर मुझ पर तनिक भी दया करते हैं, तो कृपा करके मुझे बताइए कि मानव ऐसे कौन से काम करे, जिससे उन्हें इस दुख से मुक्ति मिल सके।” विष्णु भगवान ने जवाब में कहा, “हे मुनि ! मानव जाति की भलाई के लिए आपने एक अच्छा सवाल किया है। मैं आपको वह बात बताऊंगा जिसका पालन करने से मनुष्यों का मोह से नाता छूट सकता है।” इतना कहने के बाद भगवान विष्णु ने व्रत के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने कहा, “स्वर्ग और मृत्यु दोनों लोकों में एक ऐसा व्रत है, जिसे करने से पुण्य की प्राप्ति हो सकती है। उस व्रत का नाम है श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा। इस व्रत को पूरे विधि विधान से जो भी करेगा उसे सुख और मोक्ष की प्राप्ति होगी। विष्णु भगवान से इस व्रत के बारे में सुनते ही नारद मुनि ने फिर पूछा, “हे ईश्वर! इस व्रत को करने से कौन-सा फल मिलेगा और इसे करने की विधि क्या है? इस व्रत को सबसे पहले किसके द्वारा किया गया था और इस व्रत को किस दिन करना शुभ होगा? प्रभु! आप इन सभी सवालों के जवाब दें।” नारद के सवालों का जवाब देते हुए भगवान विष्णु कहते हैं, “दुखों को दूर करने वाले इस व्रत को करना बहुत आसान है। इसको करने के लिए मनुष्यों को पूरी भक्ति से शाम के समय ब्राह्मणों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करनी होगी। इसके लिए सबसे पहले भोग तैयार होगा। भोग के लिए दूध, केला, घी और गेहूं के आटे को एक चौथाई भाग में लेना होगा। गेहूं नहीं है, तो उसकी जगह साठी के आटे का उपयोग किया जा सकता है। फिर शक्कर और गुड़ सहित सभी खाने योग्य पदार्थों को मिलाकर भगवान को भोग लगाना होगा। व्रत रखने वाले को भजन, कीर्तन का आयोजन करना होगा। भक्ति में लीन होकर भगवान सत्यनारायण की अर्चना करनी होगी। इसके बाद व्रत रखने वाले को ब्राह्मणों और सभी परिजनों को भोजन कराना चाहिए। इसके बाद व्रत रखने वाला खुद भोजन करेगा। इस तरह पूरी विधि के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजा करने से मनुष्यों की हर इच्छा पूरी हो सकती है। साथ ही यह कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र सरल उपाय है। इस तरह श्री सत्यनारायण कथा का पहला अध्याय पूरा होता है।

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गणेश जी की व्रत कथा |  Ganesh Chaturthi Vrat Katha In Hindi

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे हुए थे। बैठे-बैठे वो उबने लगे, तो माता पार्वती ने महादेव जी से चौसर खेलने के लिए कहा। महादेव माता पार्वती की बात सुनकर चौसर यानी चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए। अब उनके सामने एक परेशानी थी कि उनके खेल में हार-जीत का फैसला करने वाला कोई तीसरा शख्स नहीं था। इसका हल निकालने के लिए शंकर महादेव ने आस-पास से घास के कुछ तिनके इकट्ठे किए और उससे एक पुतला बना दिया। फिर उसमें जान डालकर उससे कहा, “हे पुत्र! मैं पार्वती के साथ चौपड़ खेलूंगा और तुम हम दोनों के खेल के साक्षी बनोगे। खेल के अंत में कौन विजयी होता है, तुम्हें इसका निर्णय करना होगा।” उस पुतले से इतना कहने के बाद महादेव और माता पार्वती ने चौपड़ का खेल खेलना शुरू कर दिया। दोनों ने बारी-बारी से तीन बार चौपड़ का खेल खेला और संयोग से तीनों ही बार माता पार्वती की जीत हुई। जब दोनों ने खेल खत्म किया और उस पुतले से विजयी होने वाले का नाम पूछा, तो उसने महादेव को इस खेल का विजयी घोषित कर दिया। इससे माता पार्वती को गुस्सा आ गया और उन्होंने उस पुतले को लंगड़ा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। माता से श्राप सुनकर उस पुतले ने कहा, “हे मां! मैने इस खेल का गलत निर्णय अपने अज्ञान के कारण लिया। मैंने किसी गलत इरादे से यह निर्णय नहीं लिया। कृपया मुझे क्षमा करें।” पुतले की बात सुनकर माता पार्वती को दया आ गई और उन्होंने उससे कहा, “एक साल बाद यहां पर गणेश की पूजा करने के लिए नाग कन्याएं आएंगी। उनसे पूछकर तुम गणेश व्रत और पूजन करना। ऐसा करने से तुम्हें मनोवांछित फल मिलेगा।” इतना कहकर माता पार्वती और महादेव वहां से वापस कैलाश की तरफ चले गए। एक साल बाद उसी स्थान पर नाग कन्याएं आईं। जब उन्होंने गणेश व्रत के पूजन की विधि शुरू की, तो उस श्रापित पुतले ने उनसे इस पूजन की विधि बताने की प्रार्थना की। नाग कन्याओं ने विस्तार से उस पुतले को गणेश पूजन की विधि बताई। इसके बाद उस पुतले ने विधि अनुसार 21 दिनों तक गणेश जी का उपवास किया और उनका पूजन किया। इस पूजन से गणेज जी काफी प्रसन्न हुए और उन्होंने उस पुतले को मनोवांछित वर मांगने के लिए कहा। पुतले ने कहा, “हे प्रभु! आप मेरे पैरों में इतनी शक्ति दें कि मैं कैलाश पर्वत पर जाकर अपने माता-पिता से मिल सकूं और उन्हें प्रसन्न कर सकूं।” गणेश जी ने तथास्तु बोला और वहां से वे चले गएं। इसके बाद पुतला रूपी वह बालक चलते हुए कैलाश पर्वत तक पहुंचा और वहां पर वह भगवान शिव से मिला। महादेव से उसने सारी बात बताई। बालक की बात सुनकर महादेव ने भी 21 दिनों तक गणेश व्रत करने की इच्छा जाहिर की। दरअसल, चौपड़ के खेल वाले दिन माता पार्वती महादेव से भी नाराज होकर कैलाश छोड़कर वहां से चली गई थीं। माता पार्वती को मनाने के लिए महादेव ने भी 21 दिनों तक गणेश व्रत किया। ऐसा करने से माता पार्वती 21वें दिन कैलाश पर्वत वापस आ गईं और उनके मन में महादेव के लिए जो नाराजगी थी वो भी खत्म हो गई। माता पार्वती के वापस आने पर महादेव ने सारी बात उन्हें बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने बड़े पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने 21 दिनों तक गणेश व्रत करने का निर्णय लिया। उस पुतले रूपी बालक द्वारा बताई गई विधि के अनुसार माता पार्वती ने 21 दिनों तक गणेश जी का उपवास किया और विधि से पूजा-अर्चना भी की। व्रत के 21वें दिन ही कार्तिकेय खुद ही अपनी माता पार्वती से मिलने के लिए कैलाश पर आ गए। आगे चलकर इस कथा और व्रत के बारे में कार्तिकेय ने विश्वामित्र जी को भी बताया। विश्वामित्रजी ने भी 21 दिनों तक यह व्रत रखकर गणेश जी की पूजा की। भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर उन्हें ब्रह्मऋषि होने का वरदान दे दिया। कहानी से सीख – गणेश चतुर्थी व्रत कथा के जरिए गणपति देव को प्रसन्न किया जा सकता है। सच्चे मन से इनका उपवास करने से मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं।

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साईं बाबा व्रत कथा |  Sai Baba Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक गांव में कोकिला और महेशभाई नाम के पति-पत्नी रहते थे। उनका जीवन सुख के साथ बीत रहा था। दोनों में प्रेम और स्नेह भी बहुत था, लेकिन कभी-कभी कोकिला के पति महेश गुस्से में पत्नी से झगड़ा कर लेता था। कुछ समय बाद जब उसका गुस्सा शांत होता, तो उसे अपने किए पर शर्मिंदगी भी होती थी। कोकिला को पता था कि उसके पति को अपने व्यवसाय में फायदा नहीं हो रहा है, जिसकी वजह से उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया है। इसी वजह से कोकिला पलटकर कोई जवाब नहीं देती थी। काम सही से न चलने के कारण महेश का ज्यादातर समय घर में ही बीत रहा था। उसकी पत्नी बड़ी ही धार्मिक स्वभाव की थी। घर में खुशियां लाने के लिए वो धर्म-कर्म करती रहती थी। एक दिन दोपहर के समय उनके घर में एक बूढ़े महात्मा आए। उनके चेहरे के तेज को देखकर दोनों का सिर श्रद्धा से झुक गया। महात्मा ने उनसे कुछ दान करने के लिए कहा। कोकिला ने महात्मा को भिक्षा में दाल और चावल दिए और प्रणाम करके उनके सामने बैठ गई। उसी समय कोकिला की आंखों से आंसू बहने लगे। कोकिला के आंसू देखकर महात्मा ने इसका कारण पूछा। जवाब में कोकिला ने अपने घर का सारा हाल बता दिया। उसकी बातों को सुनकर महात्मा ने कोकिला को उपाय के रूप में साईं बाबा का व्रत करने को कहा। साथ ही इसकी विधि बताते हुए बोले कि लगातार नौ गुरुवार तक एक समय खाना खाकर पूरी विधि से साईं बाबा की पूजा करने से उसके सारे दुख दूर हो जांएगे। कोकिला ने महात्मा के अनुसार बताई गई विधि से प्रत्येक गुरुवार को साईं बाबा का व्रत किया। फिर आखिरी यानी 9वें गुरुवार को उसे गरीबों को भोजन कराना और साईं पुस्तकें बांटनी थी। किसी तरह से खाना और किताबों का इंतजाम करके कोकिला ने ये सब कार्य भी पूरा कर लिया। जैसे ही यह सारे कार्य सम्पन्न हुए कोकिला के घर में होने वाले झगड़े और महेशभाई के कारोबार में आई अड़चनें दूर हो गईं। अब दोनों पति-पत्नी सुख से अपनी जिंदगी जी रहे थे। एक दिन कोकिला की जठानी और कोकिला आपस में घर-परिवार से जुड़ी बातें करने लगे। उसी समय कोकिला की जेठानी ने उसे बताया कि उसके बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता और वो स्कूल की हर परीक्षा में फेल हो जाता है। जेठानी की बातें सुनकर कोकिला का मन भर आया। उसने तुरंत साईं व्रत के बारे में अपनी जेठानी को बताया। पहले कोकिला ने अपने घर का किस्सा सुनाया कि वो कितने परेशान थे और साईं बाबा कि कृपा से आज कितने सुखी हैं। उसके बाद कोकिला ने अपनी जेठानी को पूरे 9 गुरुवार साईं व्रत करने को कहा और उसकी विधि भी बताई। कोकिला की जेठीनी ने ठीक वैसा ही किया और कुछ ही समय में उसके जीवन का संकट भी दूर हो गया। उसका बच्चे का मन पढ़ाई में लगने लगा और उसके अच्छे अंक आने लगे। कहानी से सीख: मुसीबत के समय घबराने की जगह आराध्य पर सच्ची श्रद्धा रखते हुए परेशानी दूर करने की कोशिश में लगे रहना चाहिए।

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होली की कथा |  Holi Mata Ki Kahani In Hindi

बहुत समय पहले हिरण्यकश्यप नाम के राक्षस ने ब्रह्मा देव की तपस्या करके अमर होने का वरदान मांगा। जब बह्मा देव ने अमरता का वरदान देने से मना कर दिया, तो उसने मांगा कि उसे संसार में रहने वाला कोई भी जीव जन्तु, राक्षस, देवी, देवता और मनुष्य मार न पाए। साथ ही न वो दिन में मरे और न ही रात के समय, न तो पुथ्वी पर मरे और न ही आकाश में, न तो घर के अंदर और न ही बाहर और न ही शस्त्र से मरे और न ही अस्त्र से। हिरण्यकश्यप की तपस्या से ब्रह्मा देव खुश थे ही, इसलिए अमरता के एक वरदान के बदले उन्होंने ये सारे वरदान उसे दे दिए। इसे पाकर उसने हर जगह तबाही मचाना शुरू कर दिया। उससे मनुष्य ही नहीं, देवता भी परेशान रहने लगे। वह अपनी शक्ति से दुर्बलों को सताने लगा। हिरण्यकश्यप से बचने के लिए लोगों को हिरण्यकश्यप की पूजा करनी पड़ती थी। भगवान की जगह जो भी हिरण्यकश्यप की पूजा करता वह उसे छाेड़ देता और जो उसे भगवान मानने से मना करता, उसे मरवा देता या अन्य सजा देता। समय के साथ राक्षस हिरण्यकश्यप का आंतक बढ़ता गया। कुछ वक्त बीतने पर हिरण्यकश्यप के घर विष्णु भगवान के परम भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को कई बार विष्णु भगवान की पूजा करने से मना किया और कहा, “मैं ही भगवान हूं। तुम मेरी आराधना करो।” हर बार हिरण्यकश्यप की बात सुनकर प्रहलाद कहते, “मेरे सिर्फ एक ही भगवान हैं और वो भगवान विष्णु हैं। प्रहलाद की बातें सुनकर हिरण्यकश्यप ने उन्हें मारने की कई कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। भगवान विष्णु अपनी शक्ति से हर बार हिरण्यकश्यप के सारे प्रयास विफल कर देते थे। एक दिन हिरण्यकश्यप के घर उसकी बहन होलिका आई। होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। उसके पास एक कंबल था, जिसे लपेटकर यदि वह आग में चली जाए, तो आग उसे नहीं जला सकती थी। हिरण्यकश्यप को अपने बेटे से परेशान देखकर होलिका ने कहा, “भैया, मैं अपनी गोद में प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाऊंगी, जिससे वह जल जाएगा और आपकी परेशानी खत्म हो जाएगी।” हिरण्यकश्यप ने इस योजना के लिए हामी भर दी। उसके बाद होलिका अपनी गोद में प्रहलाद को बैठाकर आग पर बैठ गई। उसी वक्त भगवान की कृपा से हाेलिका का कम्बल प्रहलाद के ऊपर आ गया और होलिका जलकर खाक हो गई। प्रहलाद एक बार फिर प्रभु विष्णु की कृपा से बच गए। आग में जिस दिन होलिका जलकर भस्म हो गई थी, उसी दिन को आज तक लोग होलिका दहन के नाम से जानते हैं। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखते हुए खुशी में होलिका दहन के अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है। कहानी से सीख: बुराई कितनी भी ताकतवर हो, एक दिन जीत अच्छाई की ही होती है। इसी वजह से हमेशा बुराई का मार्ग छोड़कर अच्छाई का मार्ग अपनाना चाहिए।

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सूर्य देव की व्रत कथा |  Surya Dev Vrat Katha In Hindi

सालों साल पहले एक बुढ़िया सूर्य देव की भक्ति में पूरी तरह से लीन थी। वो हर रविवार को सुबह स्नान कर घर के आंगन को गोबर से अच्छी तरह लिपाई करके सूर्य देव की पूजा करती थी। फिर सूर्य देव के लिए व्रत रखकर शाम को उन्हें भोग लगाने के बाद भोजन करती थी। उस बुढ़िया की भक्ति भावना से देव काफी प्रसन्न थे और भगवान की कृपा से उस बुढ़िया को किसी तरह की परेशानी नहीं होती थी। उस बुढ़िया की खुशी और सम्पन्नता को देखकर उसकी पड़ोसन को जलन होने लगी। वह बुढ़िया अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय के गोबर से ही आंगन लीपा करती थी। पड़ोसन ने जलन के मारे उस गाय को आंगन की जगह घर के अंदर बांधना शुरू कर दिया। अब अगले रविवार को सुबह बुढ़िया को सूर्यदेव की पूजा करने के लिए घर गाय का गोबर नहीं मिला, जिस कारण वे सूर्य देव की पूजा नहीं कर पाई और पूरे दिन खुद भी भूखी रही। रात में सूर्य देव उस बुढ़िया को सपने में आए और उससे पूजा न करने और भोग न लगाने का कारण पूछा। जवाब में बुढ़िया ने बताया, “घर के आंगन को लीपने के लिए गोबर नहीं था, इसलिए पूजा नहीं कर पाई। पूजा नहीं की, तो भोग भी नहीं चढ़ाया।” बुढ़िया की बातें सुनकर सूर्य देव उनसे कहते हैं कि मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं, इसलिए मैं तुम्हें एक गाय दे रहा हूं। वो तुम्हारे घर को धन से भर देगी। यह कहते ही सूर्य देव उसके सपने से चले गए। अगली सुबह जब बुढ़िया की आंखें खुलती हैं, तब वह देखती है कि उसके आंगन में एक सुंदर गाय और बछड़ा बंधा हुआ है। यह सब देखकर वह हैरान हो गई। उसे सपने की कोई बात याद नहीं थी। इसे उसने सूर्यदेव की कृपा समझा और गाय को चारा देने लगी। बुढ़िया के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर पड़ोसन की जलन बढ़ गई। कुछ देर बाद जब बुढ़िया घर के अंदर जाती है, तो गाय सोने का गोबर करती है। यह देखकर पड़ोसन चौंक जाती है और उस गोबर को उठाकर अपने घर ले आती है और अपने गाय के गोबर को उसके आंगन में रख देती है। यह सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा और वो पड़ोसन धनवान हो गई। इधर, बुढ़िया को किसी बात की खबर नहीं थी, क्योंकि वो सूर्य देव की भक्ति में ही खोई रहती थी। उधर, सूर्य देव को उस महिला की हरकतों पर काफी गुस्सा आता है। उनके गुस्से के कारण धूप काफी बढ़ जाती है, जिस कारण बुढ़िया गाय और उसके बछड़े को घर के अंदर बांध देती है। उसी रात आंधी चलने लगती है, इसलिए वह गाय और बछड़े को आंगन में नहीं निकालती। रातभर गाय घर के अंदर ही बंधी रही। सुबह जैसे ही बुढ़िया की नींद खुलती है, तो वो सोने का गोबर देखकर हैरान हो जाती है। उस दिन के बाद से रोजाना वो गाय को घर के अंदर ही बांधने लगी। गाय के सोने के गोबर से बुढ़िया धनवान हो गई, जिसे देखकर पड़ोसन को और जलन होने लगी। पड़ोसन ने जलन के मारे सोने का गोबर देने वाली गाय के बारे में उस नगर के राजा को बता दिया। राजा को जैसे ही सोने का गोबर देने वाली गाय का पता चला, तो उन्होंने तुरंत सैनिकों को भेजकर उसे महल लाने के लिए कहा। जब सैनिक बुढ़िया के घर पहुंचते हैं, तब वह सूर्य देव को भोग लगाकर खुद भोजन करने के लिए निवाला उठाने ही वाली थी कि तभी सैनिक गाय और बछड़े की रस्सी खोलकर उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। बुढ़िया उनसे गाय और बछड़े को न ले जाने की प्रार्थना करती है, लेकिन राजा के सैनिक बुढ़िया की एक नहीं सुनते। कुछ ही देर में सैनिक गाय को राजा के पास ले जाते हैं। राजा गाय की सुंदरता को देखकर बहुत खुश होते हैं और उसे अपने ही पास रख लेते हैं। गाय व बछड़े के जाने के गम में बुढ़िया बिना खाएं-पिएं पूरे दिन सूर्य देव से गाय और बछड़े को लौटाने की प्रार्थना करती है। इधर, दूसरे दिन सुबह राजा सोने का गोबर देखकर हैरान हो जाता है। उधर, बुढ़िया भूखी-प्यासी सूर्य देव की प्रार्थना में लगी रहती है। बुढ़िया की तकलीफ देखकर सूर्य देव अगली रात राजा के सपने में आकर कहते हैं कि अगर तुमने इस गाय और उसके बछड़े को नहीं लौटाया, तो तुम्हारे राज्य पर संकट आ जाएगा। तुम्हारी धन-संपत्ति सब नष्ट हो जाएगी। सूर्य देव की बातें सुनकर राजा की नींद टूट जाती है। दूसरे दिन सुबह वो बुढ़िया को गाय और बछड़ा लौटा देते हैं। साथ ही उसे कुछ धन भी देते हैं और उसकी पड़ोसन को सजा देते हैं। सूर्य देव की इस चमत्कारी गाय और बुढ़िया पर उनकी कृपा को देखकर राजा पूरे नगर के लोगों को हर रविवार सूर्य देव की पूजा करके व्रत रखने के लिए कहते हैं। तभी से ही रविवार के व्रत का चलन शुरू हुआ और राजा के पूरे राज्य में खुशियां-ही-खुशियां छा गईं। कहानी से सीख: दूसरे के प्रति द्वेष भाव रखने से खुद की ही हानि होती है। जीवन में जितना हो सके, सामने वालों की मदद करनी चाहिए।

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