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Makar Sankranti 2025 Daan:मकर संक्रांति पर करें ये उपाय, भगवान सूर्य का मिलेगा आशीर्वाद

Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति का पर्व पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है. हालांकि, मकर संक्रांति को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों जैसे लोहड़ी, उत्तरायण, खिचड़ी, टिहरी, पोंगल आदि कई नामों से जाना जाता है. इसी दिन से खरमास खत्म होता है और शुभ व मांगलिक कार्यों जैसे शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि की शुरुआत होती है.  Makar Sankranti 2025: सनातन धर्म में मकर संक्रांति तिथि का विशेष महत्व है। यह पर्व सूर्य देव के मकर राशि में गोचर करने की तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन गंगा समेत पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान कर सूर्य देव की पूजा की जाती है। साथ ही दान-पुण्य किया जाता है। सूर्य देव की उपासना करने से साधक को करियर में मनमुताबिक सफलता मिलती है। राशि अनुसार दान Rasi ke anusar kare dhan मेष राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन मूंगफली, गुड़ और शहद का दान करें। वृषभ राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन सफेद तिल और तिल के लड्डू का दान करें। मिथुन राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन साबुत मूंग और हरी सब्जियों का दान करें। कर्क राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन दूध, चावल और उड़द दाल का दान करें। सिंह राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन गेहूं, गुड़, चिक्की आदि चीजों का दान करें। कन्या राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन गन्ने और हरे रंग के कपड़े का दान करें। तुला राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन पोहा (चूड़ा), दही और तिल का दान करें। वृश्चिक राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन मूंगफली, शहद और चिक्की का दान करें। धनु राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन पीले रंग के कपड़े और लड्डू का दान करें। मकर राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन उड़द की दाल और काले तिल का दान करें। कुंभ राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन कंबल और चमड़े के चप्पल-जूते का दान करें। मीन राशि के जातक मकर संक्रांति के दिन बेसन, चने की दाल और पके केले का दान करें। Makar Sankranti per kare ye upay मकर संक्रांति पर करें ये उपाय 1. मकर संक्रांति के दिन स्नान करने के पानी में काले तिल डालें. तिल के पानी से स्नान करना बेहद ही शुभ माना जाता है. साथ ही ऐसा करने वाले व्यक्ति को रोग से मुक्ति मिलती है. 2. मकर संक्रांति के दिन स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और सूर्य देव को चढ़ाए जाने वाले जल में तिल अवश्य डालें. ऐसा करने से इंसान की बंद किस्मत के दरवाजे खुलते हैं. 3. इस दिन कंबल, गर्म कपड़े, घी, दाल चावल की खिचड़ी और तिल का दान करने से गलती से भी हुए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख समृद्धि आती है.  4. पितरों की शांति के लिए इस दिन उन्हें जल देते समय उसमें तिल अवश्य डालें. ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. मकर संक्रांति पूजन विधि Makar Sankranti pujan vidhi इस दिन पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठकर साफ सफाई कर लें. इसके बाद यदि संभव हो तो आसपास किसी पवित्र नदी में स्नान करें. यदि ऐसा करना संभव न हो तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें. यदि आप व्रत रखना चाहते हैं तो इस दिन व्रत का संकल्प लें. इस दिन पीले वस्त्र पहनें क्योंकि इस दिन पीले वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है और फिर सूर्यदेव को अर्घ्य दें. इसके बाद सूर्य चालीसा पढ़ें और आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ जरूर करें.  अंत में आरती करें और गरीबों को दान करें क्योंकि इस दिन दान करने का विशेष महत्व है. Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू क्यों बनाए जाते हैं, क्या है मान्यता? Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति पर क्यों बनाई जाती है खिचड़ी? जानें इसका पौराणिक महत्व Makar Sankranti 2025:मकर संक्रांति 2025 कब है 14 या 15 जनवरी, जानें, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

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Maha Kumbh Mela 2025 Niyam: महाकुम्भ में क्या करें, क्या न करें, जानें ये नियम ताकि आपसे जाने-अन्जाने कोई त्रुटि न हो

Maha Kumbh Mela 2025 कुम्भ मेले में व्यक्ति पुण्य कमाने के उद्देश्य से संगम स्नान, दान, ध्यान करता है, इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जाने-अन्जाने में ऐसा कोई भी कार्य न करें, जिससे पाप अर्जन हो। कुम्भ मेले kumbh mela में व्यक्ति पुण्य कमाने के उद्देश्य से संगम स्नान, दान, ध्यान करता है, इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जाने-अन्जाने में ऐसा कोई भी कार्य न करें, जिससे पाप अर्जन हो।

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Krishnashtakam-Bhaje Vrajaik Maṇḍanam:श्री कृष्णाष्टकम् -भजे व्रजैक मण्डनम्

Krishnashtakam-Bhaje Vrajaik Maṇḍanam:श्री कृष्णाष्टकम् -भजे व्रजैक मण्डनम् भजे व्रजैक मण्डनम्, समस्त पाप खण्डनम्,स्वभक्त चित्त रञ्जनम्, सदैव नन्द नन्दनम्,सुपिन्छ गुच्छ मस्तकम् , सुनाद वेणु हस्तकम् ,अनङ्ग रङ्ग सागरम्, नमामि कृष्ण नागरम् ॥ १ ॥ मनोज गर्व मोचनम् विशाल लोल लोचनम्,विधूत गोप शोचनम् नमामि पद्म लोचनम्,करारविन्द भूधरम् स्मितावलोक सुन्दरम्,महेन्द्र मान दारणम्, नमामि कृष्ण वारणम् ॥ २ ॥ कदम्ब सून कुण्डलम् सुचारु गण्ड मण्डलम्,व्रजान्गनैक वल्लभम नमामि कृष्ण दुर्लभम.यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया,युतम सुखैक दायकम् नमामि गोप नायकम् ॥ ३ ॥ सदैव पाद पङ्कजम मदीय मानसे निजम्,दधानमुत्तमालकम् , नमामि नन्द बालकम्,समस्त दोष शोषणम्, समस्त लोक पोषणम्,समस्त गोप मानसम्, नमामि नन्द लालसम् ॥ ४ ॥ भुवो भरावतारकम् भवाब्दि कर्ण धारकम्,यशोमती किशोरकम्, नमामि चित्त चोरकम्.दृगन्त कान्त भङ्गिनम् , सदा सदालसंगिनम्,दिने दिने नवम् नवम् नमामि नन्द संभवम् ॥ ५ ॥ गुणाकरम् सुखाकरम् क्रुपाकरम् कृपापरम् ,सुरद्विषन्निकन्दनम् , नमामि गोप नन्दनम्.नवीनगोप नागरम नवीन केलि लम्पटम् ,नमामि मेघ सुन्दरम् तथित प्रभालसथ्पतम् ॥ ६ ॥ समस्त गोप नन्दनम् , ह्रुदम्बुजैक मोदनम्,नमामि कुञ्ज मध्यगम्, प्रसन्न भानु शोभनम्.निकामकामदायकम् दृगन्त चारु सायकम्,रसालवेनु गायकम, नमामि कुञ्ज नायकम् ॥ ७ ॥ विदग्ध गोपिका मनो मनोज्ञा तल्पशायिनम्,नमामि कुञ्ज कानने प्रवृद्ध वह्नि पायिनम्.किशोरकान्ति रञ्जितम, द्रुगन्जनम् सुशोभितम,गजेन्द्र मोक्ष कारिणम, नमामि श्रीविहारिणम ॥ ८ ॥ यथा तथा यथा तथा तदैव कृष्ण सत्कथा ,मया सदैव गीयताम् तथा कृपा विधीयताम.प्रमानिकाश्टकद्वयम् जपत्यधीत्य यः पुमान ,भवेत् स नन्द नन्दने भवे भवे सुभक्तिमान ॥ ९ ॥ ॐ नमो श्रीकृष्णाय नमः॥ॐ नमो नारायणाय नमः॥

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तुलसी विवाह श्लोक (हिंदी, अंग्रेजी में अर्थ सहित): TULSI VIVAH 2024

तुलसी विवाह श्लोक (हिंदी, अंग्रेजी में अर्थ सहित) तुलसी विवाह में श्लोकों का पाठ किया जाता है जो भगवान विष्णु और माता की महिमा का वर्णन करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ सहित दिए गए हैं: 1. तुलसी स्तुति श्लोकत्वं तुलसी जगन्माता विष्णोश्च प्रियवल्लभा।नमस्ते नारदनुते नारायणमनः प्रिये॥ हिंदी अर्थहे तुलसी! आप इस जगत की माता हैं और भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी हैं। नारद मुनि ने आपकी महिमा का गान किया है। नारायण के मन को प्रिय हो, आपको प्रणाम। English TranslationO Tulsi! You are the mother of the universe and the beloved of Lord Vishnu. Sage Narada has sung your praises. You are dear to the heart of Narayana. I bow to you. 2. विष्णु स्तुति (श्री विष्णु मंत्र) श्लोकॐ नमो भगवते वासुदेवाय। हिंदी अर्थमैं भगवान वासुदेव को प्रणाम करता हूँ। English TranslationI bow to Lord Vasudeva. 3. तुलसी विवाह के लिए विशेष श्लोक श्लोकधर्मात्मनो महावीर्या धर्मिष्टे धर्मपूजिते।धर्मिष्ठो धर्मिणां श्रेष्ठो विष्णुस्तुलस्याः पतिः सदा॥ हिंदी अर्थतुलसी का विवाह हमेशा भगवान विष्णु से ही होता है, जो धर्म के रक्षक, महावीर, और सभी धार्मिक अनुष्ठानों के पालनकर्ता हैं। English TranslationTulsi’s marriage is always with Lord Vishnu, the protector of Dharma, the mighty one, and the upholder of all religious rituals. 4. माता विवाह मंत्र श्लोकत्वं लक्ष्मी साक्षाद् विष्णुपत्नी, त्वं भव सदा मंगलप्रदा।त्वया युक्तो हरिः साक्षात् तुलसी त्वां नमाम्यहम्॥ हिंदी अर्थहे माता , आप लक्ष्मी का रूप हैं और भगवान विष्णु की पत्नी हैं। आप सदा मंगल प्रदान करने वाली हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। English TranslationO Tulsi, you are the form of Lakshmi and the consort of Lord Vishnu. You are always auspicious and bless us with prosperity. I bow to you. 5. मंत्र माता के विवाह के दौरान श्लोकतुलस्यामृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिय।केशवस्त्वां पाणिग्राहिष्यति कं सन्निधौ॥ हिंदी अर्थहे तुलसी! आप अमृत स्वरूप हैं और सदा केशव (भगवान विष्णु) को प्रिय हैं। आपके विवाह में केशव (विष्णु) आपके पति बनेंगे। English TranslationO Tulsi! You are born of nectar and are always dear to Keshava (Lord Vishnu). In your wedding, Keshava (Vishnu) will become your husband. इन श्लोकों का उच्चारण विवाह के दौरान शुभ और पुण्यदायक माना गया है। ये श्लोक भगवान विष्णु और माता की पवित्रता और महत्व को दर्शाते हैं।

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TULSI VIVAH 2024:तुलसी विवाह: महत्व, विधि, और वेदों में प्रमाण

TULSI VIVAH:तुलसी विवाह: महत्व, विधि, और वेदों में प्रमाण TULSI VIVAH तुलसी विवाह हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवउठनी एकादशी भी कहते हैं, पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह तुलसी माता से किया जाता है। इस पूजा का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है, और इसका उल्लेख वेदों एवं पुराणों में भी मिलता है। तुलसी विवाह को शुभ विवाहों का आरंभ भी माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इसके बाद सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह पुनः आरंभ हो जाते हैं। TULSI VIVAH तुलसी विवाह का महत्व तुलसी का विवाह एक धार्मिक और पौराणिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान विष्णु के अवतार शालिग्राम जी का विवाह माता तुलसी से संपन्न किया जाता है। इसे धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। पद्म पुराण में बताया गया है कि जो भक्त तुलसी विवाह कराते हैं, वे असीम पुण्य के भागी होते हैं। ऐसा माना जाता है कि तुलसी विवाह से घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है। इसके अलावा, तुलसी को जीवनदायिनी औषधि माना गया है, और इसके धार्मिक और स्वास्थ्य दोनों ही लाभ होते हैं। TULSI VIVAH तुलसी विवाह का वेदों में प्रमाण तुलसी विवाह का उल्लेख विभिन्न वेदों और पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में तुलसी माता के महत्व और उनके विवाह का वर्णन किया गया है। स्कंद पुराण में तुलसी को लक्ष्मी का अवतार माना गया है, और उनके विवाह से संबंधित कथाएं दी गई हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी माता का जन्म वृंदा नाम की एक असुर कन्या के रूप में हुआ था। उनकी भक्ति और पवित्रता के कारण उन्हें विष्णु जी की पत्नी बनने का वरदान मिला। वेदों में तुलसी को जीवन का प्रतीक माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, तुलसी के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वहीं, धार्मिक दृष्टिकोण से, तुलसी माता के पूजन से व्यक्ति को सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसलिए तुलसी विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी है। TULSI VIVAH तुलसी विवाह के लाभ TULSI VIVAH तुलसी विवाह की पूजन सामग्री तुलसी विवाह में विशेष पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है। यह सामग्री पूजा की शुद्धता और प्रभाव को बढ़ाती है तुलसी विवाह की पूजा विधि तुलसी विवाह की पूजा विधि सरल है, परंतु इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाना चाहिए: तुलसी विवाह के मंत्र और स्तोत्र तुलसी विवाह में श्री विष्णु मंत्र और तुलसी स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, विष्णु सहस्रनाम और तुलसी चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है। यह माना जाता है कि इन मंत्रों के उच्चारण से वातावरण पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। निष्कर्ष तुलसी विवाह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना भी है। इसका पालन कर हम भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। तुलसी विवाह के आयोजन से हमें धार्मिक, सामाजिक, और पारिवारिक लाभ प्राप्त होते हैं। इसका महत्व वेदों और पुराणों में भी दर्शाया गया है, जिससे इसकी प्राचीनता और पवित्रता का पता चलता है। तुलसी विवाह का आयोजन करके न केवल हम अपने घर में सुख-समृद्धि ला सकते हैं, बल्कि इसका पुण्य फल भी प्राप्त कर सकते हैं। इस पवित्र अनुष्ठान को श्रद्धा और विश्वास के साथ संपन्न करें और तुलसी माता एवं भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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Guru Purnima 2024: गुरु पूर्णिमा के दिन बना रहा दुर्लभ संयोग, जॉब, करियर और विवाह की अड़चनें होंगी दूर

गुरु पूर्णिमा का पर्व साल 2024 में 21 जुलाई, 2024 रविवार के दिन पड़ रहा है. इस दिन का हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है. इस तिथि पर महाभारत के रचयिता ऋषि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था इसीलिए इस दिन को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. साथ ही इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है. गुरु पूर्णिमा पर बन रहा दुर्लभ संयोग हिंदू पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है, जो पूरे दिन रहने वाला है। इसके अलावा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र भोर से लेकर मध्यरात्रि 12 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इसके साथ ही प्रीति योग, विष्कुंभ योग का निर्माण हो रहा है। ग्रहों की स्थिति की बात करें, तो कर्क राशि में सूर्य और शुक्र विराजमान है, जिससे दोनों ग्रहों की युति से शुक्रादित्य योग बन रहा है। वृषभ राशि में मंगल और गुरु बृहस्पति विराजमान रहेंगे। इसके साथ ही राहु मीन में, केतु कन्या राशि में और शनि अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में है, जिससे शश राजयोग बन रहा है। इसके साथ ही बुध सिंह राशि में और चंद्रमा मकर राशि विराजमान रहेंगे। गुरु के वृषभ राशि में रहने से कुबेर राजयोग बन रहा है। इसके साथ ही सूर्य और शनि षडाष्टक योग का निर्माण कर रहे हैं। गुरुपूर्णिमा का महत्व (वेदों और पुराणों के अनुसार श्लोक सहित): गुरुपूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा या वेद व्यास जयंती भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन, हम गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता और आदर व्यक्त करते हैं। वेदों और पुराणों में गुरु को ज्ञान, आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्गदर्शक बताया गया है। गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। गुरुपूर्णिमा के महत्व को दर्शाते हुए कुछ श्लोक: गुरुपूर्णिमा के दिन, लोग अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पूजा करते हैं, उपहार देते हैं, और ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनसे आशीर्वाद लेते हैं। गुरु पूर्णिमा 2024 तिथि (Guru Purnima 2024 Tithi)- गुरु पूर्णिमा के दिन से कई राशियों की किस्मत खुलने वाली है इन राशियों की जॉब, करियर और विवाह में चल रही दिक्कतों का अंत हो जाएगा. जानें कौन सी हैं वो लकी राशियां जिन को गुरु पूर्णिमा के दिन से फायदा होगा. मेष राशि: वृषभ राशि: मिथुन राशि: कर्क राशि: सिंह राशि: कन्या राशि: तुला राशि: वृश्चिक राशि: धनु राशि:

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गीता के अनुसार जीवन : WHAT IS LIFE

गीता के अनुसार जीवन: श्लोक सहित गीता में जीवन को अनेक आयामों से देखा गया है। यहाँ कुछ प्रमुख पहलू और उनसे जुड़े श्लोक प्रस्तुत हैं: 1. कर्मयोग: गीता कर्मयोग पर विशेष बल देती है। कर्म का अर्थ है कर्तव्यनिष्ठा से عمل करना, फल की इच्छा किए बिना। कर्मयोग के अनुसार, मनुष्य को अपना कर्म सदैव उत्तम भाव से करना चाहिए, फल भगवान को समर्पित करते हुए। 2. ज्ञानयोग: ज्ञानयोग का अर्थ है आत्मज्ञान प्राप्ति का मार्ग। गीता में ज्ञान को कर्म से भी श्रेष्ठ बताया गया है। ज्ञानयोग के द्वारा मनुष्य अज्ञान और मोह से मुक्त होकर आत्मा की परम सत्ता का अनुभव करता है। 3. भक्ति योग: भक्ति योग का अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव। गीता में भक्ति को मोक्ष का साधन बताया गया है। भक्त ईश्वर को अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है और बदले में कुछ नहीं चाहता। 4. जीवन का उद्देश्य: गीता के अनुसार जीवन का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार है। मनुष्य को अपने कर्म, ज्ञान और भक्ति के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करना चाहिए। 5. जीवन में कठिनाइयाँ: गीता में स्वीकार किया गया है कि जीवन में कठिनाइयाँ और दुःख आते रहते हैं। इनका सामना धैर्य, संयम और कर्मठता से करना चाहिए। निष्कर्ष: गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से मनुष्य जीवन को सार्थक और पूर्ण बना सकता है। गीता के श्लोक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन करते हैं और मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और संयम बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि गीता में जीवन के अनेक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। यहाँ प्रस्तुत किए गए श्लोक केवल कुछ उदाहरण हैं। गीता का गहन अध्ययन करके जीवन के प्रति गहन समझ प्राप्त की जा सकती है।

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हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार क्या है What are the 16 rituals of Hindu religion?

हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों का महत्वपूर्ण स्थान है। ये संस्कार जीवन के विभिन्न चरणों में मनुष्य के चरित्र निर्माण, मूल्यों को विकसित करने और धार्मिक जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। सोलह संस्कार इस प्रकार हैं: गर्भाधान संस्कार: यह संस्कार गर्भधारण के समय किया जाता है। इसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य और सद्गुण संपन्न होने की कामना करना होता है। पुंसवन संस्कार: गर्भावस्था के तीसरे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य पुत्र प्राप्ति की कामना करना होता है। सीमन्तोन्नयन संस्कार: गर्भावस्था के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु और गर्भवती महिला के स्वास्थ्य की रक्षा करना होता है। जातकर्म संस्कार: बच्चे के जन्म के बाद पहले दस दिनों के अंदर यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य नवजात शिशु का स्वागत करना और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना करना होता है। नामकरण संस्कार: बच्चे के जन्म के दसवें दिन से लेकर एक वर्ष के अंदर यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे का नामकरण करना होता है। निष्क्रमण संस्कार: बच्चे के जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकालना होता है। अन्नप्राशन संस्कार: बच्चे के छठे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे को पहली बार अन्न खिलाना होता है। मुंडन संस्कार: बच्चे के पहले या तीसरे वर्ष में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे के सिर के बाल उतारना होता है। कर्णवेधन संस्कार: बच्चे के छठे या सातवें वर्ष में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे के कान छिदवाना होता है। विद्यारंभ संस्कार: बच्चे के पांच या सात वर्ष की आयु में यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे का शिक्षा प्रारंभ करना होता है। उपनयन संस्कार: यह संस्कार केवल द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) जाति के लड़कों के लिए किया जाता है। आमतौर पर यह संस्कार 8 से 16 वर्ष की आयु के बीच किया जाता है। इसका उद्देश्य बालक को गुरु के सानिध्य में वेद शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना होता है। वेदारंभ संस्कार: यह संस्कार केवल द्विज जाति के लड़कों के लिए किया जाता है। उपनयन संस्कार के बाद वेद मंत्रों का अध्ययन प्रारंभ करने पर यह संस्कार किया जाता है। केशांत संस्कार: यह संस्कार केवल द्विज जाति के लड़कों के लिए किया जाता है। 16 वर्ष की आयु में उपनयन संस्कार के बाद स्नान करके सिर के बाल उतारने पर यह संस्कार किया जाता है। समवर्तन संस्कार: यह संस्कार केवल द्विज जाति के लड़कों के लिए किया जाता है। ब्रह्मचर्य की शिक्षा पूर्ण करने के बाद यह संस्कार किया जाता है। विवाह संस्कार: यह संस्कार स्त्री और पुरुष दोनों के लिए किया जाता है। गृहस्थ जीवन प्रारंभ करने के लिए यह संस्कार आवश्यक होता है। अंतिम संस्कार: मृत्यु के बाद यह संस्कार किया जाता है। मृत शरीर को दाह संस्कार या जल समाधि देकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी सोलह संस्कार सभी के लिए आवश्यक नहीं होते हैं। कुछ संस्कार केवल द्विज जाति के लिए ही होते हैं, जबकि कुछ संस्कार सभी के लिए किए जा सकते हैं। आज

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Ganga Saptami 2024: सर्वार्थ सिद्धि योग में आज करें गंगा सप्तमी का पूजन, जानें शुभ मुहूर्त

गंगा सप्तमी: पवित्र गंगा नदी का महत्व और उत्सव गंगा सप्तमी, जिसे “गंगोत्री सप्तमी” और “हस्तिनापुर सप्तमी” के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन पुष्य नक्षत्र, सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग का संयोग भी बनने जा रहा है. इस दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग 13 मई को सुबह 11 बजकर 23 मिनट से शुरू होगा और समापन 14 मई को दोपहर 1 बजकर 5 मिनट पर होगा. वहीं, सर्वार्थ सिद्धि योग इस दिन दोपहर 1 बजकर 5 मिनट पर शुरू होगा और समापन 15 मई को सुबह 5 बजकर 30 मिनट पर होगावैशाख शुक्ल की सप्तमी तिथि को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन गंगा घाट पर आस्था की डुबकी लेकर मां गंगा से मनोवांछित वरदान प्राप्त किया जा सकता है. पापों का नाश और पितृ दोष दूर करने के लिए भी गंगा सप्तमी पर विशेष उपाय किए जा सकते हैं. यह त्यौहार माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का प्रतीक है। गंगा सप्तमी का महत्व: गंगा सप्तमी का उत्सव: गंगा सप्तमी पर धन प्राप्ति के उपाय  गंगा सप्तमी पर चांदी या स्टील के लोटे में गंगाजल भरकर उसमें पांच बेलपत्र डाल लें. कोशिश करें कि इस दिन सुबह या शाम घर से नंगे पैर निकलें. भगवान शिवलिंग पर एक धारा से यह गंगाजल नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए अर्पण करें. ऐसा करते हुए भोलेबाबा को बेलपत्र भी अर्पण करें. ये उपाय करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होने के साथ व्यक्ति को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे. गंगा सप्तमी के कुछ विशेष उपाय:Ganga Saptami 2024 गंगा सप्तमी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह पवित्र गंगा नदी के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। इस दिन गंगा स्नान, पूजा, और दान करने से पापों का नाश होता है, पुण्य लाभ होता है, और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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गीता के अनुसार भोजन किस प्रकार करें  | GITA KE ANUSAR BHOJA K PRKAAR

गीता के अनुसार भोजन किस प्रकार करें (श्लोक सहित) गीता में भोजन के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। यहाँ कुछ मुख्य बातें और उनके संबंधित श्लोक दिए गए हैं: 1. सात्विक भोजन ग्रहण करें: 2. भोजन को पवित्र भावना से ग्रहण करें: 3. भोजन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें: 4. भोजन के बाद धन्यवाद देना: इन श्लोकों के अलावा, गीता में भोजन के बारे में कई अन्य महत्वपूर्ण बातें भी बताई गई हैं। हमें इन बातों का पालन करके स्वस्थ और पवित्र जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार भोजन शास्त्रों में भोजन को बहुत महत्व दिया गया है। यह सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि स्वस्थ और सार्थक जीवन जीने का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। आइए देखें शास्त्र भोजन के बारे में क्या कहते हैं: भोजन का चुनाव: भोजन ग्रहण करने की विधि: शास्त्रों में भोजन से जुड़े कुछ अन्य नियम: यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर शास्त्र में भोजन से जुड़े नियमों में थोड़ा बहुत भिन्नता हो सकती है। आपको जो धर्म या संप्रदाय मानते हैं, उसके अनुसार विस्तृत जानकारी के लिए अपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए।

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पढ़ाई में फोकस और सफलता के लिए हर स्टूडेंट को जरूर करना चाहिए इन 6 मंत्रों का जाप

शिक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित छः मंत्रों का जाप करना महत्वपूर्ण है: इन मंत्रों का नियमित रूप से अनुसरण करने से आप अपने शिक्षा में महत्वपूर्ण उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। बहुत सारे माता-पिता अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं लगता है और अच्छे नंबर नहीं ला पाता है. साथ ही कुछ पेरेंट्स की यह शिकायत रहती है कि उनका बच्चा दिन-रात पढ़ाई तो करता है लेकिन उसके नंबर अच्छे नहीं आते हैं. अच्छे नंबर लाने को लेकर अक्सर छात्रों में तनाव रहता है. अगर मेहनत और पूरी कोशिश करने के बाद भी बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता है, तो इसका मतलब है कि उनमें कहीं न कहीं एकाग्रता यानी फोकस में कमी है. स्टूडेंट्स को अधिकतर शैक्षणिक उत्कृष्टता और व्यक्तिगत विकास की ओर बढ़ने में बहुत-सी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता है. कॉम्पिटिशन, अच्छे नंबर, स्कोर और ग्रेड की दौड़ में छात्र मानसिक तनाव से जूझने लगते हैं. इसलिए, अगर कोई छात्र ऐसी ही स्थिति में फंसा है और ठीक से पढ़ाई नहीं कर पा रहा है, तो माना जाता है कि ये 6 मंत्र ऐसे समय में बहुत मददगार साबित होते हैं जिनका जाप उन्हें जरूर करना चाहिए. ॐ मंत्र यह सभी सबसे सरल मंत्रों में से एक है. ऐसा कहा जाता है कि ‘ओम’ का सभी परंपराओं में बहुत शक्ति और महत्व है. ओम ब्रह्मांड के कुल सार का प्रतिनिधित्व करता है. इस मंत्र के कंपन से भीतर की ऊर्जा प्रभावित होती हैं. मान्यता है कि ‘ओम’ का जाप गहन ध्यान और आंतरिक शांति पैदा करता है, जिससे छात्रों में एकाग्रता और ध्यान में आने वाली बाधा दूर हो सकती है. रोजाना अभ्यास में ‘ओम’ का जाप शामिल करने से व्यक्ति के चारों ओर सकारात्मक माहौल बन सकता है जो अध्ययन का वातावरण बनाने में मदद करता है. महामृत्युंजय मंत्र मंत्र – ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टि वर्धनम्, उर्वर रुकमेव बंधनान, मृत्योर् मोक्षीय मामृतात्। मानसिक स्पष्टता और आंतरिक शक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र को सबसे मजबूत मंत्रों में से एक माना जाता है. इसका जाप करने से भय और बाधाओं को दूर करने, कठिनाइयों का सामना करने की भावना को बढ़ावा मिलता है. यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित होता है. इस मंत्र का जाप करके, छात्रों में निडरता की भावना बढ़ती है और जीवन के विभिन्न चरणों से गुजरने के लिए प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त होती है. पढ़ाई से लेकर किसी अन्य काम में सफलता पाने के लिए इस मंत्र का जाप मानसिक और आध्यात्मिक विकास बढ़ाने में मदद कर सकता है. गणेश मंत्र मंत्र – ॐ गं गणपतये नमः हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के रूप में जाना जाता है. इस मंत्र का जाप करके छात्र अपनी पढ़ाई की किसी भी बाधा को दूर करने के लिए गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. भगवान गणेश का यह मंत्र स्पष्टता और एकाग्रता की भावना पैदा करता है, जिससे छात्रों को अध्ययन की चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है. सरस्वती मंत्र मंत्र – ॐ महासरस्वते नमः यह मंत्र मां सरस्वती से ज्ञान और बुद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है. मां सरस्वती ज्ञान और बुद्धि की देवी मानी जाती हैं. वह देवी हैं जो छात्रों को शिक्षा और कला का आशीर्वाद देती हैं. ‘ओम महासरस्वते नमः’ मंत्र उनकी अपार कृपा के लिए एक बेहद शक्तिशाली है. यह मंत्र सीखने और दिमाग तेज करने में देवी मां की सहायता और आशीर्वाद मांगने में मदद करता है. इस मंत्र का जाप करके छात्र मां सरस्वती से ऊर्जा, एकाग्रता, याददाश्त और समझ अच्छी करने के लिए प्रार्थना कर सकते हैं. सरस्वती मंत्र का जाप आमतौर पर तब किया जाता है जब कोई छात्र नई शिक्षा शुरू करता है या कुछ नया सीख रहा होता है. ऐसा करने से उसे सीखने और चीजों को समझने के लिए उसका दिमाग तेज होता है. गायत्री मंत्र मंत्र – ॐ भूर् भुवः स्वाहा तत्सवितुर् वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि, धियोर योन प्रचोदयात् गायत्री मंत्र ऋग्वेद का एक बेहद शक्तिशाली भजन है, जो कि देवी गायत्री की दिव्य आदि शक्ति को समर्पित है. इस एक प्रभावशाली मंत्र का जाप छात्रों द्वारा आत्मज्ञान के लिए किया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस मंत्र के प्रभाव से मनुष्य अंधकार और अज्ञानता से दूर हो जाता है. ऐसी मान्यता है कि गायत्री मंत्र का जाप करने से मन और बुद्धि शुद्ध होती है, जो छात्रों को विचार करने और अंतर्दृष्टि की स्पष्टता बढ़ाने में मदद कर सकता है. श्री कृष्ण मंत्र मंत्र- ॐ कृष्णाय नमः यह सरल कृष्ण मंत्र ऐसा है जिसे बहुत से लोग बचपन से सुनते और सीखते आए हैं. परिवार के बुजुर्गों द्वारा या स्कूल की प्रार्थना के दौरान छात्रों को यह मंत्र सिखाया जाता है. यह कृष्ण मंत्र भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद करता है. ओम कृष्णाय नमः का सरल मंत्र मूल रूप से अर्थ है कि मैं आपको नमन करता हूं और आपके हाथों में अपने जीवन की सारी चिंता आप पर छोड़ देता हूं. अगर इस मंत्र का जाप एकाग्रता और सच्चे दिल और दिमाग के साथ किया जाता है, तो यह मंत्र छात्रों को भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से ध्यान केंद्रित करने और जीवन में अच्छा प्राप्त करने में मदद कर सकता है.

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Vishnu bhagavanविष्‍णु के 10 अवतार : भगवान श्रीहरि के दशावतार की 10 प्रामाणिक कथाएं….

विष्णु के 10 अवतार हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के 10 अवतारों को दशावतार के रूप में जाना जाता है। इन अवतारों को धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए लिया गया था। 1.मत्स्य अवतार – मत्स्य अवतार में, विष्णु ने एक विशाल मछली का रूप लिया और प्रलय से पृथ्वी को बचाया। मत्स्य अवतार की कथा पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु Vishnu bhagavanने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।  राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है। 2.कूर्म अवतार – कूर्म अवतार में, विष्णु ने एक कछुए का रूप लिया और समुद्र मंथन में मंदर पर्वत को संभाला। कूर्म अवतार की कथा धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु (Vishnu bhagavan)ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इन्द्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इन्द्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इन्द्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ। Vishnu Ji 108 Naam:विष्णु के 108 नाम अर्थ और मंत्र सहित जरूर पढ़ें 3.वराह अवतार – वराह अवतार में, विष्णु ने एक सूअर का रूप लिया और हिरण्याक्ष राक्षस का वध कर पृथ्वी को बचाया। वराह अवतार की कथा धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। 4.नृसिंह अवतार – नृसिंह अवतार में, विष्णु ने आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप लिया और हिरण्यकश्यप राक्षस का वध किया। नृसिंह अवतार की कथा भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। 5.वामन अवतार – वामन अवतार में, विष्णु ने एक बौने का रूप लिया और बलि राक्षस से तीन पग भूमि का वरदान मांगा। बाद में, उन्होंने तीन पग में तीन

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