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अपने बच्चों को यह सुनाएं I ईश्वर कि नहीं माता-पिता की पूजा करें

आप किस को खुश करना चाहते हो ईश्वर को यदि आप अपने माता पिता को ही नहीं खुश कर सकते हो तो ईश्वर भला आपसे क्यों खुश होंगे क्योंकि जितने भी हमारे वेद हैं पुराण हैं गीता है वह भी आपसे यही बताती है कि अपने माता-पिता में ही भगवान को देखो आप किसकी पूजा करना चाहते हो उस भगवान की जो खुद अपने माता पिता की ही पूजा करता है आप उस भगवान को खुश करना चाहते हो जो अपने माता पिता को ही खुश करना चाहता है माना भगवान का कोई माता-पिता नहीं है लेकिन जल्दी उन्होंने अपने रूप में इस धरती पर आए तब उन्होंने अपने माता-पिता को किस प्रकार सेवा करनी चाहिए किस प्रकार से उनकी बातों को मानना चाहिए यदि हम बात करें तो आप उदाहरण ले लीजिए राम जी का माता पिता जी की आज्ञा के अनुसार ही उन्होंने 14 वर्ष का वनवास काटा चाहते तो मना कर सकते थे लेकिन इस प्रकार उनके मना करने से आने वाली पीढ़ी क्या कहती है आइए इसी से संबंधित आपको एक हम कथा सुनाते हैं जिसके सुनने मात्र से आपको समझ में आ जाएगा कि क्यों आपको ईश्वर की नहीं अपने माता-पिता की पूजा करनी चाहिए यहां पर ईश्वर की नहीं से हमारा आशय यह है कि सर्वप्रथम आप अपने माता-पिता को खुश करें उसके पश्चात आपके घर में आपके माता-पिता ही आपसे खुश नहीं है तो आप इसको भी खुश करके कुछ भी नहीं कर सकते  पुंडरीक अपने माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन वे अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे तभी भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ वहां आ गए । पुंडरीक पैर दबाने में इतने मग्न थे कि उनका अपने इष्टदेव की ओर ध्यान ही नहीं गया । भगवान ने पुंडरीक को उनके नाम से पुकारा- पुंडरीक, हम तुम्हारे मेहमान बनकर आये हैं । जब पुंडरीक ने आवाज सुन पीछे मुड़कर देखा तो भगवान कृष्ण मंद-मंद मुस्का रहे थे । पुंडरीक ने भगवान से कहा कि मेरे माता-पिता अभी सो रहे हैं और मैं उनकी नींद में खलल नहीं डालना चाहता । जब तक मेरे माता-पिता उठते हैं तब तक आप यहां पड़ी ईटों पर खड़े हो जाइये । मैं कुछ ही देर में आपके पास आता हूं । ऐसा कहकर वे फिर से अपने पिता के पैर दबाने में मग्न हो गए । माता-पिता के प्रति पुत्र का ऐसा सेवा-भाव देखकर भगवान वहीं पड़ी ईटों पर खड़े हो गए । किंतु उनके माता-पिता को नींद ही नहीं आ रही थी और उन्होंने फिर से अपनी आंखें खोल दी । अपने मां-बाप को दोबारा उठा देखकर पुंडरीक भगवान से बोले कि आपको थोड़ा और इंतजार करना होगा । ऐसा कहकर वे फिर से पैर दबाने में मग्न हो गए । लेकिन इसी बीच पुंडरीक के माता-पिता और स्वयं पुंडरीक स्वर्ग सिधार गए । इस तरह से जिस स्थान पर भगवान ने अपने भक्त को दर्शन दिये वहां बाद में एक मन्दिर की स्थापना की गई, जिसे आज भी विट्ठल मंदिर के नाम से जाना जाता है । ईंट पर खड़े रहने के कारण श्रीकृष्ण भगवान को विट्ठल के नाम से जाना गया और वह जगह पंढरपुर कहलायी। आप ऐसे ही और प्रेरणादायक कहानियों को सुनने वेदों की कहानियां पुराणों की कहानियां और महान संतों की कहानियां सुनने के लिए डाउनलोड करें कर्मसु ऐप

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भक्ति क्या है

भक्ति में बहुत शक्ति होती है। भक्ति का तात्पर्य है-स्वयं के अंतस को ईश्वर के साथ जोड़ देना। जुडऩे की प्रवृत्ति ही भक्ति है। दुनियादारी के रिश्तों में जुट जाना भक्ति नहीं है। भक्ति का मतलब है पूर्ण समर्पण। सरल शब्दों में हम कहते हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा की डोर से बंध गई। ईश्वर के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पित होने वाला स’चा साधक ही भक्त है। जिसके विचारों में शुचिता (पवित्रता) हो, जो अहंकार से दूर हो, जो किसी वर्ग-विशेष में न बंधा हो, जो सबके प्रति सम भाव वाला हो, सदा सेवा भाव मन में रखता हो, ऐसे व्यक्ति विशेष को हम भक्त का दर्जा दे सकते हैं। नर सेवा में नारायण सेवा की अनुभूति होने लगे, ऐसी अनुभूति ही स’ची भक्ति कहलाती है। भक्त के लिए समस्त सृष्टि प्रभुमय होती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-जो पुरुष आकांक्षा से रहित, पवित्र, दक्ष और पक्षपातरहित है, वह सुखों का त्यागी मेरा भक्त मुझे प्रिय है, परंतु अफसोस यह कि इस दौड़ती-भागती और तनावभरी जिंदगी में हम कई बार प्रार्थना में भगवान से भगवान को नहीं मांगते, बल्कि भोग-विलास के कुछ संसाधनों से ही तृप्त हो जाते हैं। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।। (श्रीमद्भा० ७। ५। २३) श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण ने नवधा भक्ति के बारे में बताया। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार नौ प्रकार से ईश्वर की आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन नौ में से किसी भी एक प्रकार की भक्ति को अपने जीवन में हमेशा के लिए अपना लेता है तो मात्र इससे ही वो प्रभु के बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति कर सकता है। यह नौ उपाय अत्यंत सरल और कारगर है। शास्त्रों में ऐसा बताया जाता है कि मनुष्य जन्म का एकमात्र लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति करना है। ऐसे में नवधा भक्ति के बहुत सरल भावों को अपनाकर आप भी भगवत्तप्राप्ति कर सकते है। आइए जानते है नवधा भक्ति के नौ भाव- श्रवण भगवान के चरित्र, लीला, महिमा, गुण, नाम तथा उनके प्रेम एवं प्रभावों की बातों का श्रद्धापूर्वक सदा सुनना और उसी के अनुसार आचरण करने की चेष्टा करना, श्रवण भक्ति है। श्रवण का अर्थ सुनना होता है इस प्रकार की भक्ति में भक्त सुनकर ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को बढ़ाता है। कीर्तन भगवान की लीला, कीर्ति, शक्ति, महिमा, चरित्र, गुण, नाम आदि का प्रेमपूर्वक करना कीर्तन भक्ति है। श्रीनारद, व्यास, वालमीकि, शुकदेव, चैतन्य महाप्रभु आदि इसी श्रेणी के भक्त माने जाते है। ऐसी मान्यता है कि कीर्तन के समय भक्त प्रभु के सबसे निकट होता है। इस कीर्तन भक्ति में प्रभु के भजन को गाकर भक्त अपने भावों को दृढ़ करता है। स्मरण सदा अन्नय भाव से भगवान के गुण प्रभाव सहित उनके स्वरूप का चिन्तन करना और बारम्बार उनपर मुग्ध होना स्मरण भक्ति है। स्मरण का अर्थ याद करना है। थोड़े-थोड़े समय बाद प्रभु को याद करते रहना इस भक्ति में आता है। प्रहलाद, धुव्र, भरत, भीष्म, गोपियां आदि इसी श्रेणी के भक्त है। चरणसेवन भगवान के जिस रूप की उपासना करते हो, उसी का चरण सेवन करना या सब में ईश्वर को देखकर उन्हें प्रणाम करना। इस भक्ति में भगवान के चरणों की आराधना का महत्व है। पूजन अपनी रुचि के अनुसार भगवान की किसी मूर्ति या मानसिक स्वरूप का नित्य भक्तिपूर्वक पूजन करना। नित्य दीप प्रज्जवलित कर भगवान की आरती व पूजा करना इस भक्ति के अंतर्गत आता है। राजा पृथु, अम्बरीष आदि इसी श्रेणी के भक्त है। वन्दन ईश्वर या समस्त जग को ईश्वर का स्वरूप समझकर वन्दन करना वन्दन भक्ति है। जब भी ईश्वर के किसी भी स्वरूप के दर्शन हो तो वन्दन करने से इस प्रकार की भक्ति बढ़ती है। अक्रूर वन्दन भक्त है। दास्य ईश्वर को अपना मालिक मन से स्वीकार कर स्वयं को उनका दास मान लेना दास्य भक्ति है। ईश्वर की सेवा कर प्रसन्न होना। भगवान को अपना सर्वस्व मान लेना दास्य भक्ति कहलाता है। हनुमानजी और लक्ष्मण जी दास्य भाव के भक्त है। सख्य भगवान को अपना परम हितकारी मानकर उन्हें अपना दोस्त मान लेना सख्य भाव की भक्ति है। यह अत्यंत सरल भक्ति है। जिस प्रकार अपने दोस्त के साथ संबंध होते है ठीक उसी प्रकार ईश्वर को अपना मित्र मानना। अर्जुन, उद्धव, सुदामा इस श्रेणी के भक्त है। आत्मनिवेदन या समर्पण अंहकार रहित होकर अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण कर देना। स्वयं को ईश्वर को मन से सौप देना आत्मनिवेदन या समर्पण भक्ति कहलाता है। महाराज बलि, गोपियां आदि इसी श्रेणी के भक्त है।

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“वेदो में बताया है, कि मन की शक्ति अपार है। लोग उस से लाभ लेना नहीं जानते।”

“वेदो में बताया है, कि मन की शक्ति अपार है। लोग उस से लाभ लेना नहीं जानते।” आपने बहुत से वीडियोस में देखा होगा, कि “उस विकलांग व्यक्ति के हाथ नहीं हैं, अथवा पांव नहीं हैं, अथवा आंखें नहीं हैं, अथवा और कोई अंग स्वस्थ नहीं है। फिर भी वह बहुत विशेष योग्यताएं रखता है। यहां तक कि ओलंपिक जैसे ऊंचे खेलों तक भी वह पुरस्कार लेता है। और भी अनेक क्षेत्रों में बहुत अच्छी ऊंची प्रगति कर लेता है। विश्व कीर्तिमान में भी उसका नाम आ जाता है।” इस सबका कारण क्या है? “मन की विचित्र शक्तियां। मन में बहुत अधिक विचित्र शक्तियां हैं।”संसार के लोग उन शक्तियों को नहीं जानते। उनका लाभ उठाना नहीं जानते। “इसलिए सब कुछ होते हुए भी अर्थात शरीर के अंग स्वस्थ होते हुए भी, धन संपत्ति, उत्तम परिवार होते हुए भी, अपने आलस्य प्रमाद पुरुषार्थ हीनता आदि दोषों के कारण शिकायतें करते रहते हैं, कि भगवान ने मुझे यह नहीं दिया, वह नहीं दिया इत्यादि।”और सृजनात्मक कार्य कुछ नहीं करते, जिससे कि उनकी विशेष उन्नति नहीं हो पाती, और बस शिकायतें ही चलती रहती हैं।इसके अतिरिक्त अनेक बार जीवन में कुछ समस्याएं भी आ जाती हैं। “कभी व्यक्ति रोगी हो जाता है, कभी कोई उस पर झूठा आरोप लगा देता है, उसे अपमानित करता है, कभी दुर्घटना हो जाती है, आदि आदि अनेक आपत्तियां आने पर भी व्यक्ति उन समस्याओं का समाधान ढूंढने में परिश्रम नहीं करता, शिकायतें ही करता रहता है। यह जीवनशैली अच्छी नहीं है।”ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया है। जैसे कि, “अच्छे-अच्छे माता-पिता दिए हैं। विद्वान गुरुजन दिए हैं। आपका शरीर स्वस्थ है, बलवान है। आपके मित्र संबंधी भी अच्छे हैं, बहुत सहयोग करते हैं। स्वास्थ्य भी आपका अच्छा है। खाना-पीना सारी सुविधाएं पूरी हैं। बस एक मन में कमजोरी है। आपका मन ढीला है।” मन को बलवान बनाएं। उत्साह उत्पन्न करें। “ईश्वर ने जो आपको सुविधाएं दी हैं, उन सुविधाओं की सूची बनाएं। कागज पर लिखें, कि ईश्वर ने आपको क्या-क्या दिया है?” जैसा कि कुछ सुविधाएं मैंने ऊपर लिखी हैं, ये सारी सुविधाएं; और इसके अलावा और भी जो ईश्वर ने आपको सुविधाएं दी हैं, उन सब को लिखकर एक सूची बनाएं।“उस सूची को 100 दिन तक प्रतिदिन, दिन में तीन बार पढ़ें। आपके अंदर उत्साह भर जाएगा। आपका मन प्रफुल्लित, बलवान हो जाएगा। इस प्रकार से अपने मन को बलवान बनाएं।” “सुबह शाम बैठकर ईश्वर का ध्यान करें। गायत्री मंत्र से ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करें। उससे और शक्ति मांगें। विद्या बल बुद्धि मांगें। आपके अंदर मन की विचित्र शक्तियां जाग जाएंगी, और आप बहुत कुछ कर डालेंगे। यदि आपने अपने मन को इस प्रकार से बलवान बना लिया, और समस्याओं से लड़ने का विचार ठान लिया, तो कोई समस्या आपके सामने टिक नहीं पाएगी, सब की सब भाग खड़ी होंगी।”

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आप के नाम में छुपा है राम का नाम

आप के नाम में छुपा है राम का नाम अदभुत गणितज्ञ “श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?..तुलसीदास बोले :- ” हां “भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???तुलसीदास :- ” हां अवश्य ” ….तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!तुलसीदास जी ने कहा , “”अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.””हर नाम के अंत में राम का ही नाम है. इसे समझने के लिए तुम्हे एक “सूत्रश्लोक ” बताता हूं .यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!भक्त :-” कौनसा सूत्र महाराज ?” तुलसीदास :- यह सूत्र है …||”नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || “ इस सूत्र के अनुसार★ अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें…१)उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें.२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.४)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .*”” संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! …यह २ ही “राम” है। यह २ अंक ही ” राम ” अक्षर हैं… ★विश्वास नहीं हों रहा है ना???चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं …आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!★ उदा. ..निरंजन… ४ अक्षर१) ४ से गुणा करिए ४x४=१६२)५ जोड़िए १६+५=२१३) दुगने करिए २१×२=४२४)८ से विभाजन करने पर ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!!शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात् – “राम” !!! विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!!★1) चतुर्गुण अर्थात् ४ पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!★2) पंचतत्व अर्थात् ५ पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!★3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् २ माया व ब्रह्म !!!★4) अष्ट सो भागे अर्थात् ८ * आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योगलक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति. ★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा …इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

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अक्षत का क्या मतलब होता है और हिन्दू धर्म में पूजा में इसका क्या महत्व है ?

अक्षत का अर्थ है बिना टूटे चावल। क्योंकि अक्षत शिवलिंग स्वरूप होते हैं और गेहूं का आकार योनि की तरह होता है, जिसे नवरात्रों में माँ की पूजा के पहले गेहूं के जवाव बोए जाते हैं। अक्षत शिवलिंग स्वरूप होने से धन्य-धान्य के प्रतीक हैं। समृद्धि कारक अक्षत चावलों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगे देवताओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।अक्षत यानि चावलों में पृथ्वी व जल तत्व की अधिकता होती है जिससे देव तत्वों को अक्षत सक्रिय कर घर-मन्दिर के वास्तु दोष, कलह-क्लेश का निवारण करने में सहायक होते हैं।अक्षत में दुःख दूर करने की भी क्षमता होती है। इसलिए पूजन सामग्री में यदि कोई सामग्री नहीं होती है, तो उसके स्थान पर अक्षतो का ही उपयोग किया जाता है।श्वेत एवं कुमकुम से रंग अक्षतो का उपयोग :- श्वेत अक्षत वैराग्य अर्थात निष्काम भावना के एवं निर्गुणता के और लाल अक्षत सकाम और सगुण साधना के प्रतीक होते हैं।इसलिए निष्काम पूजा में श्वेत सकाम पूजा में कुमकुम केसर हल्दी से रंगे अक्षतो का उपयोग करना चाहिए देवी पूजन में लाल अक्षत ही चढ़ाना चाहिए।मङ्गल दोष से मुक्ति के लिए भात को शिवलिंग पर लेपित करते है।उज्जैन के मंगलनाथ पर केवल अक्षत ही नैवेद्य अर्पित करने की प्राचीन परंपरा है।

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धनतेरस पर जरूरी है इन छह चीजों की खरीदारी

धनतेरस को साल के सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है. कई लोग इस दिन आभूषण और घर का सामान खरीदते हैं तो कुछ जरूरत का सामान. मान्यता है कि इससे सुख-समृद्धि आती है. आप सोच रहे हैं कि आपको क्या खरीदना चाहिए तो हम कुछ चीजों के बारे में बता रहे हैं 1. बर्तन : घर के नए बर्तन खरीदने के लिए यह दिन शुभ है. तांबे से बने बर्तनों को खरीदकर उन्हें पूर्व दिशा में रखें.पीतल या चांदी की वस्तुएं खरीदना शुभ है. 2. गोमती चक्र : यह खास तरह का समुद्री घोंघा (स्नेल) होता है. जो मुख्य रूप से गोमती नदी में पाया जाता है. इसे हिंदू बहुत पवित्र मानते हैं. माना जाता है कि यह धन-दौलत, सुख, सेहत और सफलता को लाता है. गोमती चक्र बच्चों की सुरक्षा करता है. 3. लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा : इस दिन लोग लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां खरीदते हैं. जो बेहद शुभ है. आप मिट्टी या शुद्ध चांदी या सोने की मूर्ति खरीद सकते हैं.4. नया खाता खोलें : धनतेरस पर आप अपने लिए नया बैंक अकाउंट खोल सकते हैं. यह कारोबारियों के लिए अहम दिन है. शाम को होने वाली लक्ष्मी पूजा कारोबार के लिए शुभ मानी जाती है.5. झाड़ू : मान्यता है कि इस दिन घर को साफ-सुथरा रखने से सुख-समृद्धि आती है. इसलिए झाड़ू बहुत अहम बन जाता है. इसे जरूर खरीदना चाहिए. इसका सांकेतिक महत्व यह है कि इसे खरीदकर सालभर घर और जीवन को साफ-सुथरा रखा जाएगा. धनतेरस 2021 शुभ मुहूर्त- धनतेरस तिथि 2021- 2 नवंबर, मंगलवारधन त्रयोदशी पूजा का शुभ मुहूर्त- शाम 5 बजकर 25 मिनट से शाम 6 बजे तक।प्रदोष काल- शाम 05:39 से 20:14 बजे तक।वृषभ काल- शाम 06:51 से 20:47 तक। धनतेरस पूजा विधि- 1. सबसे पहले चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। 2. अब गंगाजल छिड़कर भगवान धन्वंतरि, माता महालक्ष्मी और भगवान कुबेर की प्रतिमा या फोटो स्थापित करें। 3. भगवान के सामने देसी घी का दीपक, धूप और अगरबत्ती जलाएं। 4. अब देवी-देवताओं को लाल फूल अर्पित करें। 5. अब आपने इस दिन जिस भी धातु या फिर बर्तन अथवा ज्वेलरी की खरीदारी की है, उसे चौकी पर रखें।6. लक्ष्मी स्तोत्र, लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र और कुबेर स्तोत्र का पाठ करें। 7. धनतेरस की पूजा के दौरान लक्ष्मी माता के मंत्रों का जाप करें और मिठाई का भोग भी लगाएं।

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कर्म का फल “एक या दूसरे अवतार” में नही बल्कि “एक से दूसरे युग” मे भी मिल सकता है।

“श्री कृष्ण” ने कंस को उनके जन्म के 14 वर्ष बाद मारा और फिर वासुदेव जी – देवकी जी को कारागार से मुक्त करवा दिया। देवकी जी ने श्री कृष्ण से पूछा, “बेटा, तुम जन्म से जानते थे कि तुम भगवान हो, तो हमें 14 वर्ष तक जेल में क्यों रहने दिया?” अगर चाहते तो तुम हमें जन्म के तुरंत बाद छुड़ा सकते थे … ♦️ श्री कृष्ण ने कहा – सुनो माँ मेरा पहला अवतार “श्री राम” का था, आप उस जगत के माता “कैकेयी” थे, ओर पिता “राजा दशरथ” थे, आपने मुझे बिना कोई कारण 14 वर्ष का वनवास दे दिया था, इसी कारण आप के पूर्वजन्म के “प्रायश्चित” के रूप में आपको 14 वर्षो तक कारावास भुगतना पड़ा, “माता यशोदा” का अर्थ पूर्वजन्म की माँ “कौशल्या”। मेरे वनवास के कारण उन्हें पुत्र वियोग 14 वर्ष तक भुगतना पड़ा था, वो 14 वर्ष की भरपाई मैंने उनके साथ 14 वर्ष रहकर की। ♦️ कर्म का फल सभी को भुगतना पड़ता है, इसमे देवताओं को भी इस बात से भिन्न नहीं किया जाता।स्वार्थ को छोड़कर अच्छे कर्म निरंतर करते रहिये। आइए भारत की विश्वव्यापी संस्कृत संस्कृति और संस्कारों को कर्मसू , एप के माध्यम से जन जन तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करेDOWNLOAD करें KARMASU APP और पाएं महान धार्मिक संतो एवम् विद्वानों की वाणी और अनेक धार्मिक ग्रंथों , मंत्रो एवम् अनेक प्रकार के संस्कृत विश्वविद्यालय कोर्स जो आपको और आपके साथ जुड़े लोगों को अपने धर्म के बारे में बताने का प्रयास करेगा आपके द्वारा शेयर किया गया एक लिंक हमे अन्य लोगों के साथ जोड़ सकता है

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