DEV

इस शुभ संयोग में शुरू होगा सावन का महीना, जानें कितने होंगे सोमवार व्रत

ऐसी मान्यताएं हैं कि श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस साल श्रावण मास जुलाई से 12 अगस्त तक रहने वाला है हिंदुओं की धार्मिक आस्था का महीना सावन धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा है. यह महीना भगवान शिव (Lord Shiva) का पसंदीदा वक्त माना जाता है और इस दौरान बड़ी संख्या में लोग व्रत रखकर शिव की आराधना करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि सावन में भगवान अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन में सोमवार का व्रत रखकर पूरी विधि के साथ पूजा-अर्चना करने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं. महादेव के भक्त इस वक्त यह जानना चाहते हैं कि साल 2022 में सावन का महीना कब शुरू होगा. इसके अलावा इस महीने में कितने सोमवार आएंगे और किस तरह पूजा करने से भक्तों को पूरा लाभ मिलेगा. कब से शुरू होगा सावन का महीना? श्री रामदेव मिश्रा शास्त्री जी का कहना है कि 13 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के साथ आषाढ़ का महीना खत्म हो जाएगा. 14 जुलाई से सावन का पवित्र महीना शुरू हो जाएगा. उनके मुताबिक इस बार सावन में 4 सोमवार होंगे. सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा. सावन में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-शांति आती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. सावन के पावन महीने में भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व माना गया है. इसके अलावा सावन में काल सर्पदोष शांति के लिए विशेष पूजा कराई जा सकती है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भी लोगों को परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी. इस सावन में कितने सोमवार? सावन का महीना 14 जुलाई यानी गुरुवार से शुरू होगा. इस पवित्र महीने का पहला सोमवार 18 जुलाई को होगा. दूसरा सोमवार 25 जुलाई, तीसरा सोमवार 1 अगस्त और चौथा सोमवार 8 अगस्त को होगा. आचार्य सर्वेश पांडे के मुताबिक इस साल सावन में केवल चार सोमवार ही होंगे क्योंकि सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा.

इस शुभ संयोग में शुरू होगा सावन का महीना, जानें कितने होंगे सोमवार व्रत Read More »

एक ऐसा भगवान सूर्य का अद्भुत स्तोत्र-जिसके जपने से हो जाता है सभी रोगों का नाश

भगवान सूर्य का अवतरण संसार के कल्याण के लिए हुआ है इसलिए पंचदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। शास्त्र कहते हैं कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए। सूर्य की उपासना से मनुष्य का तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है; मनुष्य दीर्घायु होता है। सूर्य समस्त नेत्र-रोग व चर्म-रोग को दूर करने वाले देवता हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने अपने कोढ़ के रोग को सूर्य की उपासना से दूर किया था। भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब बलवान होने के साथ ही अत्यन्त रूपवान भी थे। अपनी सुन्दरता का अभिमान ही उनके पतन का कारण बना। एक बार रुद्रावतार दुर्वासामुनि द्वारकापुरी में आए। तप से अत्यन्त क्षीण हुए दुर्वासा को देखकर साम्ब ने उनका उपहास किया। इससे क्रोध में आकर दुर्वासामुनि ने साम्ब को शाप दे दिया कि ‘तुम कोढ़ी हो जाओ।’ उपहास बुरा होता है; और वही हुआ। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब अत्यन्त भयंकर कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गए। रोग दूर करने के लिए अनेक उपचार किए पर उनका कुष्ठ नहीं मिटा। तब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से साम्ब चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य की आराधना में लग गए। रोग से मुक्ति के लिए साम्ब नित्य भगवान सूर्य के सहस्त्रनाम का पाठ करते थे। एक दिन भगवान सूर्य ने साम्ब को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा–’तुम्हें सहस्त्रनाम से मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें अपने अत्यन्त प्रिय एवं पवित्र इक्कीस नाम बताता हूँ, उनके पाठ से सहस्त्रनाम के पाठ का फल प्राप्त होगा। जो मनुष्य दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, संतान आदि वांछित फल प्राप्त करेंगे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाएंगे।’ तब भगवान सूर्य ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को अपने 21 नाम बताये जो ‘स्तवराज’ के नाम से भी जाने जाते हैं। ये नाम भगवान सूर्य के सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्र के रूप में आज भी विद्यमान है –॥ सर्वरोगनाशक श्रीसूर्यस्तवराजस्तोत्रम् ॥विनियोगः – ॐ श्री सूर्यस्तवराजस्तोत्रस्य श्रीवसिष्ठ ऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीसूर्यो देवता ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगोपशमनार्थे पाठे विनियोगः ।ऋष्यादिन्यासः – श्रीवसिष्ठऋषये नमः शिरसि ।अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । श्रीसूर्यदेवाय नमः हृदि ।सर्वपापक्षयपूर्वकसर्वरोगापशमनार्थे पाठे विनियोगाय नमः अञ्जलौ ।ध्यानं –ॐ रथस्थं चिन्तयेद् भानुं द्विभुजं रक्तवाससे ।दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्मादिभिः अलङ्कृतम् ॥मानस पूजनं एवं स्तोत्रपाठः –ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः ।लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षु ग्रहेश्वरः ॥लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा ।तपनः तापनः चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥गभस्तिहस्तो ब्रध्नश्च सर्वदेवनमस्कृतः ।एकविंशतिः इत्येष स्तव इष्टः सदा मम ॥॥ फलश्रुतिः ॥श्रीः आरोग्यकरः चैव धनवृद्धियशस्करः ।स्तवराज इति ख्यातः त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥यः एतेन महाबहो द्वे सन्ध्ये स्तिमितोदये ।स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥कायिकं वाचिकं चैव मानसं यच्च दुष्कृतम् ।एकजप्येन तत् सर्वं प्रणश्यति ममाग्रतः ॥एकजप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च ।बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च ॥अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाति प्रदक्षिणे ।पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः ॥एवं उक्तवा तु भगवानः भास्करो जगदीश्वरः ।आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनः ।पूतात्मा नीरुजः श्रीमान् तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान् ॥भगवान् सूर्यनामावली१. विकर्तन २. विवस्वान् ३. मार्तण्ड ४. भास्कर ५. रवि६. लोकप्रकाशक ७. श्रीमान् ८. लोकचक्षु ९. ग्रहेश्वर१०. लोकसाक्षी ११. त्रिलोकेश १२. कर्ता १३. हर्ता १४. तमिस्रहा१५. तपन १६. तापन १७. शुचि १८. सप्ताश्ववाहन१९. गभस्तिहस्त २०. ब्रघ्न ( ब्रह्मा ) २१. सर्वदेवनमस्कृतइति ।

एक ऐसा भगवान सूर्य का अद्भुत स्तोत्र-जिसके जपने से हो जाता है सभी रोगों का नाश Read More »

Dussehra 2021: कब है दशहरा? जानें तिथि, महत्व और पूजा का शुभ मुहूर्त

विजय दशमी पूजा मुहूर्त  विजय मुहूर्त: 15 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 38 मिनट से लेकर 2 बजकर 24 मिनट तकरहेगा। इस बीच आप कोई भी कार्य करके अपनी जीत सुनिश्चित कर सकते हैं। अश्विन मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि शुरू – 14 अक्टूबर 2021 को शाम 6 बजकर 52 मिनट सेअश्विन मास शुक्ल पक्ष तिथि समाप्त – 15 अक्टूबर 2021 शाम 6 बजकर 2 मिनट पर दशहरा का महत्व यह त्यौहार भगवान श्री राम की कहानी तो कहता ही है जिन्होंने लंका में 9 दिनों तक लगातार चले युद्ध के पश्चात अंहकारी रावण को मार गिराया और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त करवाया। वहीं इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार भी किया था इसलिए भी इसे विजयदशमी के रुप में मनाया जाता है और मां दूर्गा की पूजा भी की जाती है। माना जाता है कि भगवान श्री राम ने भी मां दूर्गा की पूजा कर शक्ति का आह्वान किया था, भगवान श्री राम की परीक्षा लेते हुए पूजा के लिए रखे गये कमल के फूलों में से एक फूल को गायब कर दिया। चूंकि श्री राम को राजीवनयन यानि कमल से नेत्रों वाला कहा जाता था इसलिए उन्होंनें अपना एक नेत्र मां को अर्पण करने का निर्णय लिया ज्यों ही वे अपना नेत्र निकालने लगे देवी प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हुई और विजयी होने का वरदान दिया। माना जाता है इसके पश्चात दशमी के दिन प्रभु श्री राम ने रावण का वध किया। भगवान राम की रावण पर और माता दुर्गा की महिषासुर पर जीत के इस त्यौहार को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के रुप में देशभर में मनाया जाता है। 

Dussehra 2021: कब है दशहरा? जानें तिथि, महत्व और पूजा का शुभ मुहूर्त Read More »

अच्युताष्टकं २

अथ अच्युताष्टकम् ॥ अभिलपननिसर्गादच्युताख्ये भजे त्वां हरसि मदघबृन्दं त्वद्भुबुक्षावशात् त्वम् । अघहृदिति तवांब प्रत्युत ख्यातिदोऽहं त्वयि मम वद का वा संगतिर्दैन्यवाचाम् ॥ १॥ चिरातीता सान्दीपनितनुभुवः कालभवन- प्रपत्तिस्तं पित्रोः पुनरगमयत् सन्निधिमिति । यशः कृष्णस्येदं कथमहह न त्वां रसनया यदि श्रीकृष्णाख्ये भजति स तादनीं मुनिसुतः ॥ २॥ हरेर्यच्चोरत्वं यदपि च तथा जारचरितं तदेतत् सर्वांहस्ततिकृते संकथनतः । इतीदं माहात्म्यं मधुमथन ते दीपितमिदं वदन्त्याः कृष्णाख्ये तवहि विचरन्त्या विलसितम् ॥ ३॥ सभायां द्रौपत्याऽंशुकसृतिभिया तद्रसनया धृता तस्याश्चेलं प्रतनु तदवस्थं विदधती । व्यतानीश्शैलाभं वसनविसरं चांब हरता- मियान् गोविन्दाख्ये वद वसनराशिस्तव कुतः ॥ ४॥ अधिरसनमयि त्वामच्युताख्ये दधानं वनजभवमुखानां वन्द्यमाहुर्महान्तः । सतु विनमति मातश्चाश्वगोश्वादनादीन् भवति ननु विचित्रा पद्धतिस्तावकानाम् ॥ ५॥ जननि मुरभिदाख्ये जाह्नवीनिम्नगैका समजनि पदपद्माच्चक्रिणस्त्वाश्रितानाम् । परिणमति समस्ताः पादवार्घिन्दुरेको जगति ननु तटिन्यो जाह्नवीसह्यजाद्याः ॥ ६॥ समवहितमपश्यन् सन्निधौ वैनतेयं प्रसभविधुतपद्मापाणिरीशोऽच्युताख्ये । समवितुमुपनीतः सागजेन्द्रं त्वया द्राक् वद जननि विना त्वां केन वा किं तदाभूत् ॥ ७॥ यदेष स्तौमि त्वां त्रियुगचरणत्रायिणि ततो महिम्नः का हानिस्तवतु मम संपन्निरवधिः । शुना लीलाकामं भवति सुरसिन्धुर्भगवती तदेषा किंभूता सतु सपदि सन्तापभरितः ॥ ८॥ इति श्रीश्रीधरवेंकटेशार्यकृतौ अच्युताष्टकं संपूर्णम् ॥

अच्युताष्टकं २ Read More »

अच्युताष्टकम् १

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥ १॥ अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् । इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं सन्दधे ॥ २॥ विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणिऱागिणे जानकीजानये । वल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥ ३॥ कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४॥ राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः । लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥ ५॥ धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद्द्वेषिणां केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः । var द्वेषिहा पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु माम् सर्वदा ॥ ६॥ विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् । var विद्युदुद्योतवान् वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥ ७॥ कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः । हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥ ८॥ अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् । वृत्ततः सुन्दरं कर्तृ विश्वम्भरस्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ॥

अच्युताष्टकम् १ Read More »

अध्यात्मरामायणे बालकाण्डम्

॥ प्रथमः सर्गः॥ ॥ राम हृदयम्॥ यः पृथिवीभरवारणाय दिविजैः सम्प्रार्थितश्चिन्मयः सञ्जातः पृथिवीतले रविकुले मायामनुष्योऽव्ययः । निश्चक्रं हतराक्षसः पुनरगाद् ब्रह्मत्वमाद्यं स्थिरां कीर्तिं पापहरां विधाय जगतां तं जानकीशं भजे ॥ १॥ विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूर्तिम् । आनन्दसान्द्रममलं निजबोधरूपं सीतापतिं विदिततत्त्वमहं नमामि ॥ २॥ पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः श‍ृण्वन्ति चाध्यात्मिकसञ्ज्ञितं शुभम् । रामायणं सर्वपुराणसंमतं निर्धूतपापा हरिमेव यान्ति ते ॥ ३॥ अध्यात्मरामायणमेव नित्यं पठेद्यदीच्छेद्भवबन्धमुक्तिम् । गवां सहस्रायुतकोटिदानात् फलं लभेद्यः श‍ृणुयात्स नित्यम् ॥ ४॥ पुरारिगिरिसम्भूता श्रीरामार्णवसङ्गता । अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ५॥ कैलासाग्रे कदाचिद्रविशतविमले मन्दिरे रत्नपीठे संविष्टं ध्याननिष्ठं त्रिनयनमभयं सेवितं सिद्धसन्घैः । देवी वामाङ्कसंस्था गिरिवरतनया पार्वती भक्तिनम्रा प्राहेदं देवमीशं सकलमलहरं वाक्यमानन्दकन्दम् ॥ ६॥ पार्वत्युवाच नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास सर्वात्मदृक् त्वं परमेश्वरोऽसि । पृच्छामि तत्त्वं पुरुषोत्तमस्य सनातनं त्वं च सनातनोऽसि ॥ ७॥ गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः । तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता प्रियोऽसि मे त्वं वद यत्तु पृष्टम् ॥ ८॥ ज्ञानं सविज्ञानमथानुभक्तिवैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत् । जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन ॥ ९॥ पृच्छामि चान्यच्च परं रहस्यं तदेव चाग्रे वद वारिजाक्ष । श्रीरामचन्द्रेऽखिललोकसारे भक्तिर्दृढा नौर्भवति प्रसिद्धा ॥ १०॥ भक्तिः प्रसिद्धा भवमोक्षणाय नान्यत्ततः साधनमस्ति किञ्चित् । तथापि हृत्संशयबन्धनं मे विभेत्तुमर्हस्यमलोक्तिभिस्त्वम् ॥ ११॥ वदन्ति रामं परमेकमाद्यं निरस्तमायागुणसम्प्रवाहम् । भजन्ति चाहर्निशमप्रमत्ताः परं पदं यान्ति तथैव सिद्धाः ॥ १२॥ वदन्ति केचित्परमोऽपि रामः स्वाविद्यया संवृतमात्मसञ्ज्ञम् । जानाति नात्मानमतः परेण सम्बोधितो वेद परात्मतत्त्वम् ॥ १३॥ यदि स्म जानाति कुतो विलापः सीताकृतेऽनेन कृतः परेण । जानाति नैवं यदि केन सेव्यः समो हि सर्वैरपि जीवजातैः ॥ १४॥ अत्रोत्तरं किं विदितं भवद्भिः तद्ब्रूत मे संशयभेदि वाक्यम् ॥ १५॥ श्रीमहादेव उवाच धन्यासि भक्तासि परात्मनस्त्वं यज्ज्ञातुमिच्छा तव रामतत्त्वम् । पुरा न केनाप्यभिचोदितोऽहं वक्तुं रहस्यं परमं निगूढम् ॥ १६॥ त्वयाद्य भक्त्या परिनोदितोऽहं वक्ष्ये नमस्कृत्य रघूत्तमं ते । रामः परात्मा प्रकृतेरनादि- रानन्द एकः पुरुषोत्तमो हि ॥ १७॥ स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा नभोवदन्तर्बहिरास्थितो यः । सर्वान्तरस्थोऽपि निगूढ आत्मा स्वमायया सृष्टमिदं विचष्टे ॥ १८॥ जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि । एतन्न जानन्ति विमूढचित्ताः स्वाविद्यया संवृतमानसा ये ॥ १९॥ स्वाज्ञानमप्यात्मनि शुद्धबुद्धे स्वारोपयन्तीह निरस्तमाये । संसारमेवानुसरन्ति ते वै पुत्रादिसक्ताः पुरुकर्मयुक्ताः ॥ २०॥ यथाऽप्रकाशो न तु विद्यते रवौ ज्योतिःस्वभावे परमेश्वरे तथा । विशुद्धविज्ञानघने रघूत्तमेऽविद्या कथं स्यात्परतः परात्मनि ॥ २१॥ यथा हि चाक्ष्णा भ्रमता गृहादिकं विनष्टदृष्टेर्भ्रमतीव दृश्यते । तथैव देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः कृते परेऽध्यस्य जनो विमुह्यति ॥ २२॥ नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत् प्रकाशरूपाव्यभिचारतः क्वचित् । ज्ञानं तथाज्ञानमिदं द्वयं हरौ रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्घने ॥ २३॥ तस्मात्परानन्दमये रघूत्तमे विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः । अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दलोचने मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम् ॥ २४॥ अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुर्लभम् । सीताराममरुत्सूनुसंवादं मोक्षसाधनम् ॥ २५॥ पुरा रामायणे रामे रावणं देवकण्टकम् । हत्वा रणे रणश्लाघी सपुत्रबलवाहनम् ॥ २६॥ सीतया सह सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः । अयोध्यामगमद्रामो हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ॥ २७॥ अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठाद्यैर्महात्मभिः । सिंहासने समासीनः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥ २८॥ दृष्ट्वा तदा हनूमन्तं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम् । कृतकार्यं निराकाङ्क्षं ज्ञानापेक्षं महामतिम् ॥ २९॥ रामः सीतामुवाचेदं ब्रूहि तत्त्वं हनूमते । निष्कल्मषोऽयं ज्ञानस्य पात्रं नो नित्यभक्तिमान् ॥ ३०॥ तथेति जानकी प्राह तत्त्वं रामस्य निश्चितम् । हनूमते प्रपन्नाय सीता लोकविमोहिनी ॥ ३१॥ सीतोवाच रामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ॥ ३२॥ आनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम् । सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ॥ ३३॥ मां विद्धि मूलप्रकृतिं सर्गस्थित्यन्तकारिणीम् । तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतन्द्रिता ॥ ३४॥ तत्सान्निध्यान्मया सृष्टं तस्मिन्नारोप्यतेऽबुधैः । अयोध्यानगरे जन्म रघुवंशेऽतिनिर्मले ॥ ३५॥ विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः । अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः ॥ ३६॥ मत्पाणिग्रहणं पश्चाद्भार्गवस्य मदक्षयः । अयोध्यानगरे वासो मया द्वादशवार्षिकः ॥ ३७॥ दण्डकारण्यगमनं विराधवध एव च । मायामारीचमरणं मायासीताहृतिस्तथा ॥ ३८॥ जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य तथैव च । शबर्याः पूजनं पश्चात्सुग्रीवेण समागमः ॥ ३९॥ वालिनश्च वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च । सेतुबन्धश्च जलधौ लङ्कायाश्च निरोधनम् ॥ ४०॥ रावणस्य वधो युद्धे सपुत्रस्य दुरात्मनः । विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥ ४१॥ अयोध्यागमनं पश्चाद्राज्ये रामाभिषेचनम् । एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ॥ ४२॥ रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोचत्याकाङ्क्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित् । आनन्दमूर्तिरचलः परिणामहीनो मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ॥ ४३॥ ततो रामः स्वयं प्राह हनूमन्तमुपस्थितम् । श‍ृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ॥ ४४॥ आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान् । जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि । प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥ ४५॥ बुद्ध्यवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम् । आभासस्त्वपरं बिम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः ॥ ४६॥ साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि । साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथा बुधैः ॥ ४७॥ आभासस्तु मृषा बुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते । अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पतः ॥ ४८॥ अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते । तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा ॥ ४९॥ ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः । तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः ॥ ५०॥ एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते । मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम् । न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि ॥ ५१॥ इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो मयैव साक्षात्कथितं तवानघ । मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम् ॥ ५२॥ श्रीमहादेव उवाच एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया । अतिगुह्यतमं हृद्यं पवित्रं पापशोधनम् ॥ ५३॥ साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसङ्ग्रहम् । यः पठेत्सततं भक्त्या स मुक्तो नात्र संशयः ॥ ५४॥ ब्रह्महत्यादि पापानि बहुजन्मार्जितान्यपि । नश्यन्त्येव न सन्देहो रामस्य वचनं यथा ॥ ५५॥ योऽतिभ्रष्टोऽतिपापी परधनपरदारेषु नित्योद्यतो वा स्तेयी ब्रह्मघ्नमातापितृवधनिरतो योगिवृन्दापकारी यः सम्पूज्याभिरामं पठति च हृदयं रामचन्द्रस्य भक्त्या योगीन्द्रैरप्यलभ्यं पदमिह लभते सर्वदेवैः स पूज्यम् ॥ ५६॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे श्रीरामहृदयं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १॥ ॥ द्वितीयः सर्गः॥ पार्वत्युवाच धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो । विच्छिन्नो मेऽतिसन्देहग्रन्थिर्भवदनुग्रहात् ॥ १॥ त्वन्मुखाद्गलितं रामतत्त्वामृतरसायनम् । पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहम् ॥ २॥ श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता सङ्क्षेपतो मया । इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम् ॥ ३॥ श्रीमहादेव उवाच श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम ॥ ४ । तदद्य कथयिष्यामि श‍ृणु तापत्रयापहम् । यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुरज्ञानोत्थमहाभयात् । प्राप्नोति परमामृद्धिम् दीर्घायुः पुत्रसन्ततिम् ॥ ५॥ भूमिर्भारेण मग्ना दशवदनमुखाशेषरक्षोगणानां धृत्वा गोरूपमादौ दिविजमुनिजनैः साकमब्जासनस्य । गत्वा लोकं रुदन्ती व्यसनमुपगतं ब्रह्मणे प्राह सर्वं ब्रह्मा ध्यात्वा मुहूर्तं सकलमपि हृदावेदशेषात्मकत्वात् ॥ ६॥ तस्मात्क्षीरसमुद्रतीरमगमद् ब्रह्माथ देवैर्वृतो देव्या चाखिललोकहृत्स्थमजरं सर्वज्ञमीशं हरिम् । अस्तौषीच्छ्रुतिसिद्धनिर्मलपदैः स्तोत्रैः पुराणोद्भवैः भक्त्या गद्गदया गिरातिविमलैरानन्दबाष्पैर्वृतः ॥ ७॥ ततः स्फुरत्सहस्रांशुसहस्रसदृशप्रभः । आविरासीद्धरिः प्राच्यां दिशां व्यपनयन्स्तमः ॥ ८॥ कथञ्चिद्दृष्टवान् ब्रह्मा दुर्दर्शमकृतात्मनाम् । इन्द्रनीलप्रतीकाशं स्मितास्यं पद्मलोचनम् ॥ ९॥ किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः । विभ्राजमानं श्रीवत्सकौस्तुभप्रभयान्वितम् ॥ १०॥ स्तुवद्भिः सनकाद्यैश्च पार्षदैः परिवेष्टितम् । शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविराजितम् ॥ ११॥ स्वर्णयज्ञोपवीतेन स्वर्णवर्णाम्बरेण च । श्रिया भूम्या च सहितं गरुडोपरि संस्थितम् ॥ १२॥ हर्षगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ १३॥ ब्रह्मोवाच नतोऽस्मि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्द्रियात्मभिः । यच्चिन्त्यते कर्मपाशाद्धृदि नित्यं मुमुक्षुभिः ॥ १४॥ मायया गुणमय्या त्वं सृजस्यवसि लुम्पसि । जगत्तेन न ते लेप आनन्दानुभवात्मनः ॥ १५॥ तथा शुद्धिर्न दुष्टानां दानाध्ययनकर्मभिः । शुद्धात्मता ते यशसि सदा भक्तिमतां यथा ॥ १६॥ अतस्तवाङ्घ्रिर्मे दृष्टश्चित्तदोषापनुत्तये । सद्योऽन्तर्हृदये नित्यं मुनिभिः सात्वतैर्वृतः ॥ १७॥ ब्रह्माद्यैः स्वार्थसिद्ध्यर्थमस्माभिः पूर्वसेवितः । अपरोक्षानुभूत्यर्थं ज्ञानिभिर्हृदि भावितः ॥ १८॥ तवाङ्घ्रिपूजानिर्माल्यतुलसीमालया विभो । स्पर्धते वक्षसि पदं लब्ध्वापि श्रीः सपत्निवत् ॥ १९॥

अध्यात्मरामायणे बालकाण्डम् Read More »

श्रीउच्छिष्टगणपतिसहस्रनामस्तोत्रम्

श्रीगणेशाय नमः । श्रीभैरव उवाच । श‍ृणु देवि रहस्यं मे यत्पुरा सूचितं मया । तव भक्त्या गणेशस्य वक्ष्ये नामसहस्रकम् ॥ १॥ श्रीदेव्युवाच । ॐ भगवन्गणनाथस्य उच्छिष्टस्य महात्मनः । श्रोतुं नाम सहस्रं मे हृदयं प्रोत्सुकायते ॥ २॥ श्रीभैरव उवाच । प्राङ्मुखे त्रिपुरानाथे जाता विघ्नकुलाः शिवे । मोहने मुच्यते चेतस्तैः सर्वैर्बलदर्पितैः ॥ ३॥ तदा प्रभुं गणाध्यक्षं स्तुत्वा नामसहस्रकैः । विघ्ना दूरात्पलायन्ते कालरुद्रादिव प्रजाः ॥ ४॥ तस्यानुग्रहतो देवि जातोऽहं त्रिपुरान्तकः । तमद्यापि गणेशानं स्तौमि नामसहस्रकैः ॥ ५॥ तदद्य तव भक्त्याहं साधकानां हिताय च । महागणपतेर्वक्ष्ये दिव्यं नामसहस्रकम् ॥ ६॥ ॐ अस्य श्रीउच्छिष्टगणेशसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीभैरव ऋषिः । गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपतिर्देवता । गं बीजम् । ह्रीं शक्तिः । कुरुकुरु कीलकम् । मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गणाध्यक्षो ग्लौं गँ गणपतिर्गुणी । गुणाढ्यो निर्गुणो गोप्ता गजवक्त्रो विभावसुः ॥ ७॥ विश्वेश्वरो विभादीप्तो दीपनो धीवरो धनी । सदा शान्तो जगत्त्राता विश्वावर्तो विभाकरः ॥ ८॥ विश्रम्भी विजयो वैद्यो वारान्निधिरनुत्तमः । अणिमाविभवः श्रेष्ठो ज्येष्ठो गाथाप्रियो गुरुः ॥ ९॥ सृष्टिकर्ता जगद्धर्ता विश्वभर्ता जगन्निधिः । पतिः पीतविभूषाङ्को रक्ताक्षो लोहिताम्बरः ॥ १०॥ विरूपाक्षो विमानस्थो विनीतः सदस्यः सुखी । सात्वतः सुरूपः सात्त्विकः सत्यः शुद्धः शङ्करनन्दनः ॥ ११॥ नन्दीश्वरो जयानन्दी वन्द्यः स्तुत्यो विचक्षणः । दैत्यमर्द्दी सदाक्षीबो मदिरारुणलोचनः ॥ १२॥ सारात्मा विश्वसारश्च विश्वसारो(२) विलेपनः । परं ब्रह्म परं ज्योतिः साक्षी त्र्यक्षो विकत्थनः ॥ १३॥ विश्वेश्वरो वीरहर्ता सौभाग्यो भाग्यवर्द्धनः । भृङ्गिरिटी भृङ्गमाली भृङ्गकूजितनादितः ॥ १४॥ विनर्तको विनीतोऽपि विनतानन्दनार्चितः । वैनतेयो विनम्राङ्गो विश्वनायकनायकः ॥ १५॥ विराटको विराटश्च विदग्धो विधुरात्मभूः । पुष्पदन्तः पुष्पहारी पुष्पमालाविभूषणः ॥ १६॥ पुष्पेषुमथनः पुष्टो विवर्तः कर्तरीकरः । अन्त्योऽन्तकश्चित्तगणाश्चित्तचिन्तापहारकः ॥ १७॥ अचिन्त्योऽचिन्त्यरूपश्च चन्दनाकुलमुण्डकः । लोहितो लिपितो लुप्तो लोहिताक्षो विलोभकः ॥ १८॥ लब्धाशयो लोभरतो लोभदोऽलङ्घ्यगर्धकः । सुन्दरः सुन्दरीपुत्रः समस्तासुरघातकः ॥ १९॥ नूपुराढ्यो विभवेन्द्रो नरनारायणो रविः । विचारो वान्तदो वाग्मी वितर्की विजयीश्वरः ॥ २०॥ सुजो बुद्धः सदारूपः सुखदः सुखसेवितः । विकर्तनो विपच्चारी विनटो नटनर्तकः ॥ २१॥ नटो नाट्यप्रियो नादोऽनन्तोऽनन्तगुणात्मकः । गङ्गाजलपानप्रियो गङ्गातीरविहारकृत् ॥ २२। गङ्गाप्रियो गङ्गजश्च वाहनादिपुरःसरः । गन्धमादनसंवासो गन्धमादनकेलिकृत् ॥ २३॥ गन्धानुलिप्तपूर्वाङ्गः सर्वदेवस्मरः सदा । गणगन्धर्वराजेशो गणगन्धर्वसेवितः ॥ २४॥ गन्धर्वपूजितो नित्यं सर्वरोगविनाशकः । गन्धर्वगणसंसेव्यो गन्धर्ववरदायकः ॥ २५॥ गन्धर्वो गन्धमातङ्गो गन्धर्वकुलदैवतः । गन्धर्वगर्वसंवेगो गन्धर्ववरदायकः ॥ २६॥ गन्धर्वप्रबलार्तिघ्नो गन्धर्वगणसंयुतः । गन्धर्वादिगुणानन्दो नन्दोऽनन्तगुणात्मकः ॥ २७॥ विश्वमूर्तिर्विश्वधाता विनतास्यो विनर्तकः । करालः कामदः कान्तः कमनीयः कलानिधिः ॥ २८॥ कारुण्यरूपः कुटिलः कुलाचारी कुलेश्वरः । विकरालो रणश्रेष्ठः संहारो हारभूषणः ॥ २९॥ उरुरभ्यमुखो रक्तो देवतादयितौरसः । महाकालो महादंष्ट्रो महोरगभयानकः ॥ ३०॥ उन्मत्तरूपः कालाग्निरग्निसूर्येन्दुलोचनः । सितास्यः सितमाल्यश्च सितदन्तः सितांशुमान् ॥ ३१॥ असितात्मा भैरवेशो भाग्यवान्भगवान्भवः । गर्भात्मजो भगावासो भगदो भगवर्द्धनः ॥ ३२॥ शुभङ्करः शुचिः शान्तः श्रेष्ठः श्रव्यः शचीपतिः । वेदाद्यो वेदकर्ता च वेदवेद्यः सनातनः ॥ ३३॥ विद्याप्रदो वेदरसो वैदिको वेदपारगः । वेदध्वनिरतो वीरो वेदविद्यागमोऽर्थवित् ॥ ३४॥ तत्त्वज्ञः सर्वगः साधुः सदयः सदसन्मयः । शिवशङ्करः शिवसुतः शिवानन्दविवर्द्धनः ॥ ३५॥ शैत्यः श्वेतः शतमुखो मुग्धो मोदकभूषणः । देवो दिनकरो धीरो धृतिमान्द्युतिमान्धवः ॥ ३६॥ शुद्धात्मा शुद्धमतिमाञ्छुद्धदीप्तिः शुचिव्रतः । शरण्यः शौनकः शूरः शरदम्भोजधारकः ॥ ३७॥ न् दारकः शिखिवाहेष्टः सितः शङ्करवल्लभः । शङ्करो निर्भयो नित्यो लयकृल्लास्यतत्परः ॥ ३८॥ लूतो लीलारसोल्लासी विलासी विभ्रमो भ्रमः । भ्रमणः शशिभृत्सुर्यः शनिर्धरणिनन्दनः ॥ ३९॥ बुधो विबुधसेव्यश्च बुधराजो बलंधरः । जीवो जीवप्रदो जेता स्तुत्यो नित्यो रतिप्रियः ॥ ४०॥ जनको जनमार्गज्ञो जनरक्षणतत्परः । जनानन्दप्रदाता च जनकाह्लादकारकः ॥ ४१। विबुधो बुधमान्यश्च जैनमार्गनिवर्तकः । गच्छो गणपतिर्गच्छनायको गच्छगर्वहा ॥ ४२॥ गच्छराजोथ गच्छेथो गच्छराजनमस्कृतः । गच्छप्रियो गच्छगुरुर्गच्छत्राकृद्यमातुरः ॥ ४३॥ गच्छप्रभुर्गच्छचरो गच्छप्रियकृताद्यमः । गच्छगीतगुणोगर्तो मर्यादाप्रतिपालकः ॥ ४४॥ गीर्वाणागमसारस्य गर्भो गीर्वाणदेवता । गौरीसुतो गुरुवरो गौराङ्गो गणपूजितः ॥ ४५॥ परम्पदं परन्धाम परमात्मा कविः कुजः । राहुर्दैत्यशिरश्छेदी केतुः कनककुण्डलः ॥ ४६॥ ग्रहेन्द्रो ग्रहितो ग्राह्योऽग्रणीर्घुर्घुरनादितः । पर्जन्यः पीवरः पत्री पीनवक्षाः पराक्रमी ॥ ४७॥ वनेचरो वनस्पतिर्वनवासी स्मरोपमः । पुण्यः पूतः पवित्रश्च परात्मा पूर्णाविग्रहः ॥ ४८॥ पूर्णेन्दुसुकलाकारो मन्त्रपूर्णमनोरथः । युगात्मा युगकृद्यज्वा याज्ञिको यज्ञवत्सलः ॥ ४९॥ यशस्यो यजमानेष्टो वज्रभृद्वज्रपञ्जरः । मणिभद्रो मणिमयो मान्यो मीनध्वजाश्रितः ॥ ५०॥ मीनध्वजो मनोहारी योगिनां योगवर्धनः । द्रष्टा स्रष्टा तपस्वी च विग्रही तापसप्रियः ॥ ५१॥ तपोमयस्तपोमूर्तिस्तपनश्च तपोधनः । सम्पत्तिसदनाकारः सम्पत्तिसुखदायकः ॥ ५२॥ सम्पत्तिसुखकर्ता च सम्पत्तिसुभगाननः । सम्पत्तिशुभदो नित्यसम्पत्तिश्च यशोधनः ॥ ५३॥ रुचको मेचकस्तुष्टः प्रभुस्तोमरघातकः । दण्डी चण्डांशुरव्यक्तः कमण्डलुधरोऽनघः ॥ ५४॥ कामी कर्मरतः कालः कोलः क्रन्दितदिक्तटः । भ्रामको जातिपूज्यश्च जाड्यहा जडसूदनः ॥ ५५॥ जालन्धरो जगद्वासी हास्यकृद्गहनो गुहः । हविष्मान्हव्यवाहाक्षो हाटको हाटकाङ्गदः ॥ ५६॥ सुमेरुर्हिमवान्होता हरपुत्रो हलङ्कषः । हालाप्रियो हृदा शान्तः कान्ताहृदयपोषणः ॥ ५७॥ शोषणः क्लेशहा क्रूरः कठोरः कठिनाकृतिः । कुबेरो धीमयो ध्याता ध्येयो धीमान्दयानिधिः ॥ ५८॥ दविष्ठो दमनो हृष्टो दाता त्राता पितासमः । निर्गतो नैगमोऽगम्यो निर्जयो जटिलोऽजरः ॥ ५९॥ जनजीवो जितारातिर्जगद्व्यापी जगन्मयः । चामीकरनिभो नाभ्यो नलिनायतलोचनः ॥ ६०॥ रोचनो मोचको मन्त्री मन्त्रकोटिसमाश्रितः । पञ्चभूतात्मकः पञ्चसायकः पञ्चवक्त्रकः ॥ ६१॥ पञ्चमः पश्चिमः पूर्वः पूर्णः कीर्णालकः कुणिः । कठोरहृदयो ग्रीवालङ्कृतो ललिताशयः ॥ ६२॥ लोलचित्तो बृहन्नासो मासपक्षर्तुरूपवान् । ध्रुवो द्रुतगतिर्बन्धो धर्मी नाकिप्रियोऽनलः ॥ ६३॥ अङ्गुल्यग्रस्थभुवनो भुवनैकमलापहः । सागरः स्वर्गतिः स्वक्षः सानन्दः साधुपूजितः ॥ ६४॥ सतीपतिः समरसः सनकः सरलः सरः । सुरप्रियो वसुमतिर्वासवो वसुपूजितः ॥ ६५॥ वित्तदो वित्तनाथश्च धनिनां धनदायकः । राजीवनयनः स्मार्तः स्मृतिदः कृत्तिकाम्बरः ॥ ६६॥ अश्विनोऽश्वमुखः शुभ्रो भरणो भरणीप्रियः । कृत्तिकासनकः कोलो रोहिणीरमणोपमः ॥ ६७॥ रौहिणेयप्रेमकरो रोहिणीमोहनो मृगः । मृगराजो मृगशिरा माधवो मधुरध्वनिः ॥ ६८॥ आर्द्राननो महाबुद्धिर्महोरगविभूषणः । भ्रूक्षेपदत्तविभवो भ्रूकरालः पुनर्मयः ॥ ६९॥ पुनर्देव: पुनर्जेता पुनर्जीवः पुनर्वसुः । तिमिरास्तिमिकेतुश्च तिमिषासुरघातनः ॥ ७०॥ तिष्यस्तुलाधरो जृम्भो विश्लेषाश्लेषदानराट् । मानदो माधवो माधो वाचालो मघवोपमः ॥ ७१॥ मध्यो मघाप्रियो मेघो महाशुण्डो महाभुजः । पूर्वफाल्गुनिकः स्फीत फल्गुरुत्तरफाल्गुनः ॥ ७२॥ फेनिलो ब्रह्मदो ब्रह्मा सप्ततन्तुसमाश्रयः । घोणाहस्तश्चतुर्हस्तो हस्तिवन्ध्यो हलायुधः ॥ ७३॥ चित्राम्बरार्चितपदः स्वस्तिदः स्वस्तिनिग्रहः । विशाखः शिखिसेव्यश्च शिखिध्वजसहोदरः ॥ ७४॥ अणुरेणूत्करः स्फारो रुरुरेणुसुतो नरः । अनुराधाप्रियो राधः श्रीमाञ्छुक्लः शुचिस्मितः ॥ ७५॥ ज्येष्ठः श्रेष्ठार्चितपदो मूलं च त्रिजगद्गुरुः । शुचिश्चैव पूर्वाषाढश्चोत्तराषाढ ईश्वरः ॥ ७६॥ श्रव्योऽभिजिदनन्तात्मा श्रवो वेपितदानवः । श्रावणः श्रवणः श्रोता धनी धन्यो धनिष्ठकः ॥ ७७॥ शातातपः शातकुम्भः शरज्ज्योतिः शताभिषक् । पूर्वाभाद्रपदो भद्रश्चोत्तराभाद्रपादितः ॥ ७८॥ रेणुकातनयो रामो रेवतीरमणो रमी । आश्वयुक्कार्तिकेयेष्टो मार्गशीर्षो मृगोत्तमः ॥ । ७९॥ पोषेश्वरः फाल्गुनात्मा वसन्तश्चैत्रको मधुः । राज्यदोऽभिजिदात्मेयस्तारेशस्तारकद्युतिः ॥ ८०॥ प्रतीतः प्रोर्जितः प्रीतः परमः परमो हितः । परहा पञ्चभूः पञ्चवायुपूज्यपरिग्रहः ॥ ८१॥ पुराणागमविद्योगी महिषो रासभोऽग्रजः । ग्रहो मेषो मृषो मन्दो मन्मथो मिथुनाकृतिः ॥ ८२॥ कल्पभृत्कटको दीपो मर्कटः कर्कटो धृणिः । कुक्कुटो वनजो हंसः परमहंसः सृगालकः ॥ ८३॥ सिंहा सिंहासनाभूष्यो मद्गुर्मूषकवाहनः । पुत्रदो नरकत्राता कन्याप्रीतः कुलोद्वहः ॥ ८४॥ अतुल्यरूपो बलदस्तुल्यभृत्तुल्यसाक्षिकः । अलिश्चापधरो धन्वी कच्छपो मकरो मणिः ॥ ८५॥ कुम्भभृत्कलशः कुब्जो मीनमांससुतर्पितः । राशिताराग्रहमयस्तिथिरूपो जगद्विभुः ॥ ८६॥ प्रतापी प्रतिपत्प्रेयोऽद्वितीयोऽद्वैतनिश्चितः । त्रिरूपश्च तृतीयाग्निस्त्रयीरूपस्त्रयीतनुः ॥ ८७॥ चतुर्थीवल्लभो देवो परागः पञ्चमीश्वरः । षड्रसास्वादविज्ञानः षष्ठीषष्टिकवत्सलः ॥ ८८॥ सप्तार्णवगतिः सारः सप्तमीश्वररोहितः । अष्टमीनन्दनोत्तंसो नवमीभक्तिभावितः ॥ ८९॥ दशदिक्पतिपूज्यश्च दशमी द्रुहिणो द्रुतः । एकादशात्मगणयो द्वादशीयुगचर्चितः ॥ ९०॥ त्रयोदशमणिस्तुत्यश्चतुर्दशस्वरप्रियः । चतुर्दशेन्द्रसंस्तुत्यः पूर्णिमानन्दविग्रहः ॥ ९१॥ दर्शदर्शो दर्शनश्च वानप्रस्थो महेश्वरः । मौर्वी मधुरवाङ्मूलमूर्तिमान्मेघवाहनः ॥ ९२॥ महागजो जितक्रोधो जितशत्रुर्जयाश्रयः । रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रो रुद्रपुत्रोऽघनाशनः ॥ ९३॥

श्रीउच्छिष्टगणपतिसहस्रनामस्तोत्रम् Read More »

श्रीउच्छिष्टगणनाथस्य अष्टोत्तरशतनामावलिः

ॐ वन्दारुजनमन्दारपादपाय नमो नमः ॐ । १ ॐ चन्द्रार्धशेखरप्राणतनयाय नमो नमः ॐ । ॐ शैलराजसुतोत्सङ्गमण्डनाय नमो नमः ॐ । वन्दनाय ॐ वल्लीशवलयक्रीडाकुतुकाय नमो नमः ॐ । ॐ श्रीनीलवाणीललितारसिकाय नमो नमः ॐ । ॐ स्वानन्दभवनानन्दनिलयाय नमो नमः ॐ । ॐ चन्द्रमण्डलसन्दृष्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ क्षीराब्धिमध्यकल्पद्रुमूलस्थाय नमो नमः ॐ । ॐ सुरापगासिताम्भोजसंस्थिताय नमो नमः ॐ । ॐ सदनीकृतमार्ताण्डमण्डलाय नमो नमः ॐ । १० ॐ इक्षुसागरमध्यस्थमन्दिराय नमो नमः ॐ । ॐ चिन्तामणिपुराधीशसत्तमाय नमो नमः ॐ । ॐ जगत्सृष्टितिरोधानकारणाय नमो नमः ॐ । ॐ क्रीडार्थसृष्टभुवनत्रितयाय नमो नमः ॐ । ॐ शुण्डोद्धूतजलोद्भूतभुवनाय नमो नमः ॐ । ॐ चेतनाचेतनीभूतशरीराय नमो नमः ॐ । ॐ अणुमात्रशरीरान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ । ॐ सर्ववश्यकरानन्तमन्त्रार्णाय नमो नमः ॐ । ॐ कुष्ठाद्यामयसन्दोहशमनाय नमो नमः ॐ । ॐ प्रतिवादिमुखस्तम्भकारकाय नमो नमः ॐ । २० ॐ पराभिचारदुष्कर्मनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ सकृन्मन्त्रजपध्यानमुक्तिदाय नमो नमः ॐ । ॐ निजभक्तविपद्रक्षादीक्षिताय नमो नमः ॐ । ॐ ध्यानामृतरसास्वाददायकाय नमो नमः ॐ । ॐ गुह्यपूजारताभीष्टफलदाय नमो नमः ॐ । कुलीयपूजा ॐ रूपौदार्यगुणाकृष्टत्रिलोकाय नमो नमः ॐ । ॐ अष्टद्रव्यहविःप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ । ॐ अवताराष्टकद्वन्द्वप्रदानाय नमो नमः ॐ । भवताराष्टक ॐ भारतालेखनोद्भिन्नरदनाय नमो नमः ॐ । ॐ नारदोद्गीतरुचिरचरिताय नमो नमः ॐ /३० ॐ निखिलाम्नायसङ्गुष्ठवैभवाय नमो नमः ॐ । ॐ बाणरावणचण्डीशपूजिताय नमो नमः ॐ । ॐ इन्द्रादिदेवतावृन्दरक्षकाय नमो नमः ॐ । ॐ सप्तर्षिमानसालाननिश्चेष्टाय नमो नमः ॐ । ॐ आदित्यादिग्रहस्तोमदीपकाय नमो नमः ॐ । ॐ मदनागमसत्तन्त्रपारगाय नमो नमः ॐ । ॐ उज्जीवितेशसन्दग्धमदनाय नमो नमः ॐ । कुञ्जीविते ॐ शमीमहीरुहप्रीतमानसाय नमो नमः ॐ । ॐ जलतर्पणसम्प्रीतहृदयाय नमो नमः ॐ । ॐ कन्दुकीकृतकैलासशिखराय नमो नमः ॐ । ४० ॐ अथर्वशीर्षकारण्यमयूराय नमो नमः ॐ । ॐ कल्याणाचलश‍ृङ्गाग्रविहाराय नमो नमः ॐ । ॐ आतुनैन्द्रादिसामसंस्तुताय नमो नमः ॐ । ॐ ब्राह्म्यादिमातृनिवःपरीताय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्थावरणारक्षिदिगीशाय नमो नमः ॐ । रक्षिधीशाय ॐ द्वाराविष्टनिधिद्वन्द्वशोभिताय नमो नमः ॐ । ॐ अनन्तपृथिवीकूर्मपीठाङ्गाय नमो नमः ॐ । ॐ तीव्रादियोगिनीवृन्दपीठस्थाय नमो नमः ॐ । ॐ जयादिनवपीठश्रीमण्डिताय नमो नमः ॐ । ॐ पञ्चावरणमध्यस्थसदनाय नमो नमः ॐ । ५० ॐ क्षेत्रपालगणेशादिद्वारपाय नमो नमः ॐ । ॐ महीरतीरमागौरीपार्श्वकाय नमो नमः ॐ । ॐ मद्यप्रियादिविनयिविधेयाय नमो नमः ॐ । ॐ वाणीदुर्गांशभूतार्हकलत्राय नमो नमः ॐ । भूतार्ध ॐ वरहस्तिपिशाचीहृन्नन्दनाय नमो नमः ॐ । ॐ योगिनीशचतुष्षष्टिसंयुताय नमो नमः ॐ । ॐ नवदुर्गाष्टवसुभिस्सेविताय नमो नमः ॐ । ॐ द्वात्रिंशद्भैरवव्यूहनायकाय नमो नमः ॐ । ॐ ऐरावतादिदिग्दन्तिसंवृताय नमो नमः ॐ । ॐ कण्ठीरवमयूराखुवाहनाय नमो नमः ॐ । ६० ॐ मूषकाङ्कमहारक्तकेतनाय नमो नमः ॐ । ॐ कुम्भोदरकरन्यस्तपादाब्जाय नमो नमः ॐ । ॐ कान्ताकान्ततराङ्गस्थकराग्राय नमो नमः ॐ । ॐ अन्तस्थभुवनस्फीतजठराय नमो नमः ॐ । ॐ कर्पूरवीटिकासाररक्तोष्ठाय नमो नमः ॐ । ॐ श्वेतार्कमालासन्दीप्तकन्धराय नमो नमः ॐ । ॐ सोमसूर्यबृहद्भानुलोचनाय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वसम्पत्प्रदामन्दकटाक्षाय नमो नमः ॐ । ॐ अतिवेलमदारक्तनयनाय नमो नमः ॐ । ॐ शशाङ्कार्धसमादीप्तमस्तकाय नमो नमः ॐ । ७० ॐ सर्पोपवीतहारादिभूषिताय नमो नमः ॐ । ॐ सिन्दूरितमहाकुम्भसुवेषाय नमो नमः ॐ । ॐ आशावसनतादृष्यसौन्दर्याय नमो नमः ॐ । ॐ कान्तालिङ्गनसञ्जातपुलकाय नमो नमः ॐ । ॐ पाशाङ्कुशधनुर्बाणमण्डिताय नमो नमः ॐ । ॐ दिगन्तव्याप्तदानाम्बुसौरभाय नमो नमः ॐ । ॐ सायन्तनसहस्रांशुरक्ताङ्गाय नमो नमः ॐ । ॐ सम्पूर्णप्रणवाकारसुन्दराय नमो नमः ॐ । ॐ ब्रह्मादिकृतयज्ञाग्निसम्भूताय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वामरप्रार्थनात्तविग्रहाय नमो नमः ॐ । ८० ॐ जनिमात्रसुरत्रासनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ कलत्रीकृतमातङ्गकन्यकाय नमो नमः ॐ । ॐ विद्यावदसुरप्राणनाशकाय नमो नमः ॐ । ॐ सर्वमन्त्रसमाराध्यस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ षट्कोणयन्त्रपीठान्तर्लसिताय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्नवतिमन्त्रात्मविग्रहाय नमो नमः ॐ । ॐ हुङ्गङ्क्लाङ्ग्लाम्मुखानेकबीजार्णाय नमो नमः ॐ । ॐ बीजाक्षरत्रयान्तस्थशरीराय नमो नमः ॐ । ॐ हृल्लेखागुह्यमन्त्रान्तर्भाविताय नमो नमः ॐ । बीजमन्त्रान्तर्भाविताय ॐ स्वाहान्तमातृकामालारूपाध्याय नमो नमः ॐ । ९० ॐ द्वात्रिंशदक्षरमयप्रतीकाय नमो नमः ॐ । ॐ शोधनानर्थसन्मन्त्रविशेषाय नमो नमः ॐ । ॐ अष्टाङ्गयोगिनिर्वाणदायकाय नमो नमः ॐ । ॐ प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिप्रेरकाय नमो नमः ॐ । ॐ मूलाधारवरक्षेत्रनायकाय नमो नमः ॐ । ॐ चतुर्दलमहापद्मसंविष्टाय नमो नमः ॐ । ॐ मूलत्रिकोणसंशोभिपावकाय नमो नमः ॐ । ॐ सुषुम्नारन्ध्रसञ्चारदेशिकाय नमो नमः ॐ । ॐ षट्ग्रन्थिनिम्नतटिनीतारकाय नमो नमः ॐ । ॐ दहराकाशसंशोभिशशाङ्काय नमो नमः ॐ । १०० ॐ हिरण्मयपुराम्भोजनिलयाय नमो नमः ॐ । ॐ भ्रूमध्यकोमलारामकोकिलाय नमो नमः ॐ । ॐ षण्णवद्वादशान्तस्थमार्ताण्डाय नमो नमः ॐ । ॐ मनोन्मणीसुखावासनिर्वृताय नमो नमः ॐ । ॐ षोडशान्तमहापद्ममधुपाय नमो नमः ॐ । ॐ सहस्रारसुधासारसेचिताय नमो नमः ॐ । ॐ नादबिन्दुद्वयातीतस्वरूपाय नमो नमः ॐ । ॐ उच्छिष्टगणनाथाय महेशाय नमो नमः ॐ । १०८ यति श्रीरामानन्देन्द्रसरस्वतीस्वामिगल् (शान्ताश्रम, तञ्जावुर १९५९)

श्रीउच्छिष्टगणनाथस्य अष्टोत्तरशतनामावलिः Read More »