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Navratri 2025 Day 8

Shardiya Navratri 2025 Day 8 Puja Vidhi: अष्टमी विशेष, जानिए मां महागौरी की कृपा पाने का सही तरीका

Shardiya Navratri 2025 Day 8: आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि 2025 की अष्टमी का महत्व, (Maa Mahagauri) माँ महागौरी की कथा और स्वरूप, पूजा विधि, शुभ रंग, प्रिय भोग और इस Shardiya Navratri 2025 Day 8 Maa Mahagauri: शारदीय नवरात्रि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है, जिसे नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना करके मनाया जाता है। Navratri 2025 Day 8 नवरात्रि की अष्टमी तिथि यानी आठवाँ दिन, माँ महागौरी को समर्पित होता है। इस दिन को दुर्गा अष्टमी या महाअष्टमी भी कहा जाता है। माना जाता है कि माँ महागौरी अपने भक्तों के पाप दूर कर उन्हें पुण्य, शांति और सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं। अष्टमी का दिन विशेष रूप से कन्या पूजन और कन्याभोज के लिए शुभ माना गया है। इस दिन माँ महागौरी की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। Shardiya Navratri 2025 Day 8 Puja Vidhi: शारदीय नवरात्रि कब से आरंभ अष्टमी तिथि कब है:When is Ashtami Tithi? Navratri 2025 Day 8: शारदीय नवरात्रि 2025 का आठवाँ दिन यानी महाअष्टमी 30 सितंबर 2025, मंगलवार को पड़ेगा। इस दिन भक्त विशेष रूप से कन्या पूजन, माँ दुर्गा के महागौरी स्वरूप की आराधना और दुर्गा सप्तशती पाठ का आयोजन करते हैं। माँ महागौरी का स्वरूप:Nature of Mother Mahagauri माँ दुर्गा का आठवाँ रूप ‘महागौरी’ अत्यंत सौम्य, शांत और करुणामयी माना गया है। मां महागौरी का रंग हिम और चंद्रमा की तरह श्वेत और उज्ज्वल होता है, इसलिए उन्हें महागौरी कहा जाता है। उनके वस्त्र और आभूषण भी सफेद होते हैं, जो शुद्धता और निर्मलता का प्रतीक हैं। Navratri 2025 Day 8 मां महागौरी के चार हाथ होते हैं – एक हाथ में त्रिशूल, दूसरा हाथ में डमरू, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में होता है जो निर्भयता दिखाता है और चौथा हाथ वर मुद्रा में होता है जो कृपा का संदेश देता है। उनका वाहन वृषभ यानी सफेद बैल है जो धर्म और सत्य का प्रतीक माना जाता है। माँ महागौरी की कथा:Story of Mother Mahagauri Navratri 2025 Day 8 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिसके कारण उनका शरीर काला पड़ गया था। उनके इस तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें गंगाजल से स्नान कराया जिससे उनका शरीर स्वर्ण सा उज्ज्वल, गौर और पवित्र हो गया। इसी कारण उन्हें महागौरी कहा जाता है। Navratri 2025 Day 8 एक और कथा के अनुसार माता पार्वती ने बाल्यकाल में शिवजी को पति रूप में पाने के लिए कठिन व्रत रखा, जिससे उनके तन पर धूल-मिट्टी जम गई थी और शिवजी ने गंगाजल से उनका शरीर पवित्र और गौर वर्ण बना दिया। अष्टमी का महत्व:Importance of Ashtami नवरात्रि का आठवां दिन यानि Navratri 2025 Day 8 अष्टमी माँ महागौरी को समर्पित होता है और इसे बहुत पवित्र और शुभ माना जाता है। इस दिन पापों का नाश और संकटों से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है, जिससे भक्तों के जीवन के दुख और परेशानियाँ दूर होती हैं। समाज में अष्टमी का सबसे खास महत्व कन्या पूजन का है क्योंकि कन्याओं को माँ शक्ति का स्वरूप माना जाता है। इस दिन दुर्गा सप्तशती, रामचरितमानस और देवी माहात्म्य का पाठ करना बहुत पुण्यकारी होता है। माँ महागौरी विशेष रूप से उन भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। माँ महागौरी की पूजा-विधि;Worship method of Maa Mahagauri अष्टमी तिथि पर माँ महागौरी की पूजा बहुत ही नियमपूर्वक और श्रद्धा भाव से करनी चाहिए। प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ सफेद या गुलाबी वस्त्र धारण करें। घर या मंदिर के पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। माँ दुर्गा का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें और विशेषकर महागौरी का ध्यान करें। दीपक, धूप, कपूर और अगरबत्ती जलाएँ। देवी को सफेद पुष्प, चंदन, अक्षत, रोली और सिंदूर अर्पित करें। माँ महागौरी को विशेष रूप से सफेद पुष्प, कमल या चमेली अर्पित करने की परंपरा है। भोग के रूप में सफेद रंग की मिठाइयाँ जैसे नारियल लड्डू, खीर, मालपुआ, सफेद मिठाई और फल अर्पित किए जाते हैं। “ॐ देवी महागौर्यै नमः” मंत्र का 108 बार जप करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ और “अर्जुन कृत देवी स्तुति” का पाठ विशेष लाभदायक माना जाता है। अंत में देवी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। माँ महागौरी का प्रिय भोग:Mother Mahagauri’s favorite treat Navratri 2025 Day 8: मां महागौरी को भोग अर्पित करने में नारियल, गुड़, दूध और सफेद मिठाइयाँ बहुत शुभ मानी जाती हैं। खासकर खीर, मालपुआ, नारियल बर्फी, सफेद मिठाई और घी से बने पकवान उनकी पूजा में प्रिय होते हैं। मान्यता है कि दूध और नारियल का भोग अर्पित करने से मां महागौरी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य, सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसके अलावा हलवा, पूड़ी और काले चने का भोग भी अष्टमी के दिन बहुत शुभ माना जाता है। माँ महागौरी का मंत्र:Mantra of Maa Mahagauri: अष्टमी तिथि पर निम्न मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना जाता है: “ॐ देवी महागौर्यै नमः।” इस मंत्र के जाप से मन की अशांति दूर होती है, मानसिक शांति मिलती है और कठिनाइयों से छुटकारा मिलता है। साथ ही साधक के जीवन में धन-समृद्धि और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। अष्टमी का शुभ रंग:Auspicious color of Ashtami Navratri 2025 Day 8 नवरात्रि के आठवें दिन यानी अष्टमी पर मोर-परी हरा रंग पहना जाता है। यह रंग नीले और हरे का सुंदर मिश्रण है और इसे पहनने से जीवन में ताजगी, खुशहाली और सकारात्मक ऊर्जा आती है। इस दिन इस रंग का चुनाव करना शुभ माना जाता है और यह मां महागौरी की कृपा को आकर्षित करने में मदद करता है। अष्टमी पर कन्या पूजन की परंपरा:Tradition of worshiping girls on Ashtami Navratri 2025 Day 8 नवरात्रि में मां शक्ति को खुश करने का सबसे उत्तम तरीका अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन करना माना जाता है। इस पूजन में आमतौर पर 2 से 9 साल तक की कन्याओं के साथ एक सुहागिन स्त्री को भी आमंत्रित किया जाता है। आमंत्रित कन्याओं के चरण धोकर साफ आसन पर बैठाया जाता है और उन्हें पूरी, चने, हलवा आदि प्रसाद चढ़ाकर भोजन कराया

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Day 3 Navratri

Day 3 Navratri Puja Vidhi: नवरात्रि के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें सही विधि, भोग, मंत्र, शुभ रंग और कथा

Day 3 Navratri Puja Vidhi: नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है. आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, भोग, मंत्र, शुभ रंग और कथा. Navratri 2025 Day 3: नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के चंद्रघंटा रूप की पूजा की जाती है. मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. इनके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, Day 3 Navratri Puja Vidhi मां के दस हाथ हैं, जिनमें अलग-अलग अस्त्र और शस्त्र होते हैं. वहीं, मां चंद्रघंटा का वाहन सिंह है. मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना करने से जीवन में शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन आता है. ऐसे में आइए जानते हैं Day 3 Navratri मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, भोग, मंत्र, शुभ रंग और कथा. Day 3 Navratri Puja Vidhi: नवरात्रि के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा…. मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Maa Chandraghanta Puja Vidhi) इसके बाद, मां के चरणों में पुष्प अर्पित कर आरती गाएं. देवी चंद्रघंटा की आराधना करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद साफ कपड़े धारण कर लें. मंदिर को साफ कर पूजा स्थान पर देवी की मूर्ति की स्थापना करें.  मां की प्रतिमा को गंगा जल से स्नान कराएं.  इसके बाद धूप-दीप, पुष्प, रोली, चंदन अर्पित करें. मां को भोग लगाकर उनके मंत्रों का जाप करें. मां चंद्रघंटा का मंत्र  (Maa Chandraghanta Mantra) पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥ ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्.सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्.खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्.मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्.कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ मां चंद्रघंटा का भोग (Maa Chandraghanta ka bhog) नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग समर्पित किया जाता है. मां चंद्रघंटा शुभ रंग (Maa Chandraghanta ka Shubh Rang) नवरात्रि के तीसरे दिन का शुभ रंग लाल होता है.मां चंद्रघंटा की कथा (Maa Chandraghanta ki Katha) पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नाम के एक राक्षस ने देवराज इंद्र का सिंहासन हड़प लिया था.  महिषासुर स्वर्गलोक पर राज करना चाहता था. Day 3 Navratri उसकी यह इच्छा जानकार देवता चितिंत हो गए, जिसके बाद वे अपनी इस परेशानी के लिए त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास पहुंचें. महिषासुर के आतंक की गाथा सुनकर त्रिदेव क्रोधिक हो गए. इस क्रोध के चलते तीनों के मुख से ऊर्जा उत्पन्न हुई. इसी उर्जा से मां चंद्रघंटा का जन्म हुआ. महिषासुर का अंत करने के लिए भगवान शंकर ने मां को अपना त्रिशूल और भगवान विष्णु ने अपना चक्र प्रदान किया. इसके बाद सभी देवी देवताओं ने भी माता को अपना-अपना अस्त्र सौंप दिया. इंद्रदेव ने मां को अपना एक घंटा दिया. इसके बाद मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार कर देवताओं की रक्षा की. Durga Puja 2025 Date And Time :दुर्गा पूजा 2025 कब से होगी शुरू? जानें महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा विधि

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Day 2 Navratri Puja Vidhi

Day 2 Navratri Puja Vidhi : नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की होती है पूजा, नोट कर लें पूजन विधि, शुभ

Day 2 Navratri Puja Vidhi : नवरात्रि के दूसरे दिन मां के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान और तप की देवी कहा जाता है। भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए मां पार्वती ने कठोर…. 2nd Day of Navratri Maa brahmacharini : इस समय चैत्र नवरात्रि चल रही हैं। आज चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है। नवरात्रि के दूसरे दिन मां के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान और तप की देवी कहा जाता है। भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए मां पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। Day 2 Navratri Puja Vidhi: मां ब्रह्मचारिणी सफेद साड़ी धारण करती हैं। साथ ही उनके दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमण्डल है। शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से जातक को आदि और व्याधि रोगों से मुक्ति मिलती है। Day 2 Navratri Puja Vidhi शास्त्रों में वर्णित है कि मां ब्रह्मचारिणी के पूजन से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं। यम, नियम के बंधन से मुक्ति मिलती है। ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए भगवती ने तपस्या की, इसलिए उनका नाम ब्रहमचारिणी पढ़ा। शुभ रंग- मां ब्रह्मचारिणी को सफेद रंग बहुत प्रिय है। मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए आज के दिन मां दुर्गा को सफेद रंग के पुष्प अर्पित करने चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को खीर, बर्फी, चीनी और पंचामृता का भोग लगा सकते हैं। Day 2 Navratri Puja Vidhi इस दिन आप पूजा के दौरान सफेद रंग के वस्त्रों को पहन सकते हैं। मां ब्रह्मचारिणी का बीज मंत्र: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को प्रसन्न करने के लिए उनके बीज मंत्र ‘ह्रीं श्री अम्बिकायै नमः’ का 108 बार जाप कर सकते हैं। इसके अलावा ‘ या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’ मंत्र का जाप करना भी बेहद शुभ माना जाता है। व्रत कथा – मां ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था। नारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें। कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा। Day 2 Navratri Puja Vidhi भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं। कठोर तप से उनका शरीर क्षीण हो गया। Day 2 Navratri Puja Vidhi उनक तप देखकर सभी देवता, ऋषि-मुनि अत्यंत प्रभावित हुए। Day 2 Navratri Puja Vidhi उन्होंने कहा कि आपके जैसा तक कोई नहीं कर सकता है। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगा। भगवान शिव आपको पति स्वरूप में प्राप्त होंगे। पूजा-विधि: Day 2 Navratri Puja Vidhi इस दिन सुबह उठकर जल्दी स्नान कर लें, फिर पूजा के स्थान पर गंगाजल डालकर उसकी शुद्धि कर लें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। मां दुर्गा का गंगा जल से अभिषेक करें। मां दुर्गा का गंगा जल से अभिषेक करें। अब मां दुर्गा को अर्घ्य दें। मां को अक्षत, सिन्दूर और लाल पुष्प अर्पित करें, प्रसाद के रूप में फल और मिठाई चढ़ाएं। धूप और दीपक जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ करें और फिर मां की आरती करें। मां को भोग भी लगाएं। इस बात का ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की आरती:(Maa Brahmacharini Aarti) जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो। ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा। जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने। रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना। ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी। Navratri 2025 2nd Day Maa Brahmacharini Puja : नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी पूजा, जाने पूजा विध, महत्व, मंत्र, भोग और पीले रंग का क्या है महत्व

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bhavAnIstuti: भवानीस्तुति

bhavAnIstuti: भवानीस्तुति आनन्दमन्थरपुरन्दरमुक्तमाल्यं मौलौ हठेन निहितं महिषासुरस्य । पादाम्बुजं भवतु वो विजयाय मंजु-मंजीरशिंजितमनोहरमम्बिकायाः ॥ १॥ ब्रह्मादयोऽपि यदपांगतरंगभंग्या सृष्टि स्थिति-प्रलयकारणतां व्रजन्ति । लावण्यवारिनिधिवी चिपरिप्लुतायै तस्यै नमोऽस्तु सततं हरवल्लभायै ॥ २॥ पौलस्त्यपीनभुजसम्पदुदस्यमानकैलाससम्भ्रमविलोलदृशः प्रियायाः । श्रेयांसिवोदिशतुनिहनुतकोपचिह्नमालिंगनोत्पुलकभासितमिन्दुमौलेः ॥ ३॥ दिश्यान्महासुरशिरः सरसीप्सितानि प्रेंखन्नखावलिमयूखमृणालनालम् । चण्डयाश्चलच्चटुलनूपुरचंचरीकझांकारहारि चरणाम्बुरूहद्वयं वः ॥ ४॥ ॥ इति भवानी स्तुति सम्पूर्णा ॥

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bhagavatIstotram: भगवतीस्तोत्रम्

bhagavatIstotram: भगवतीस्तोत्रम् जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।जय शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥ १॥ जय चन्द्रदिवाकर-नेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥ २॥ जय महिषविमर्दिनिशूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे ।जय देवि पितामहविष्णुनुते जय भास्करशक्रशिराऽवनते ॥ ३॥ जय षण्मुख-सायुध-ईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।जय दुःख-दरिद्र-विनाशकरे जय पुत्रकल त्रविवृद्धिकरे ॥ ४॥ जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे जय वांछितदायिनि सिद्धिकरे ॥ ५॥ एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः ।गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥ ६॥ ॥ इति व्यासकृतं भगवतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Amba Vandana: अम्बावन्दना

Amba Vandana: अम्बावन्दना आदावेकां लोक-सिसृक्षा-रसजुष्टां,द्वन्द्वाध्युष्टां,भूत-निकायान् कलयन्तीम् ।माया-मुख्यैर्नामभिराद्यैरुपदिष्टां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ १॥ मूलाधारादा च विशुद्वेः प्रविभक्तां,शाब्दीं सृष्टिं,पात्रविशेषाद् घटयन्तीम् ।श्रौतैः स्मार्तैः पौरुष-सूक्तैरुपगीतां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ २॥ ऐन्द्रीं भूतिं भक्तजनेभ्यो वितरन्तीं,ह्रीङ्कुर्वाणां,तद्विमुखेषु प्रतिवेलम् ।श्रीं निर्दोलां तद्भवनान्ते विदधानां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ३॥ किं बन्धूकैः,किं नु जपाभिः,किमु रक्तै-रब्जैरुद्यदभास्कर-रागैरुत सृष्टैः ।अङ्गैरिङ्गत्कान्तिवितानैरभिरामां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ४॥ याऽपर्णाहो ताप-निरासाय सपर्णा,वर्णातीता वर्ण-विशेषाञ्जुषमाणा ।तां वैचित्र्योद्भासन-सूनावलि-वल्लींवन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ५॥ नीप-श्रेणी-शालिनि चिन्तामणि-गेहे,पीठासीनामावृतिचक्रैरुपगूढाम् ।ब्रह्मादिभ्यो वाञ्छितमर्थं प्रथयन्तीं,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ६॥ स्फूर्जत्सान्द्रामोद-तरङ्गावलि-लीनै-रर्चामाप्तां,षोडश-मुख्यैरुपचारैः ।उद्यन्नानालङ्कृति-रत्न-द्युति-पुञ्जां,वन्देऽमन्द-द्योत-कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ७॥ माद्यद्देवारब्ध-नमस्या-निकुरम्बां,व्यापच्छैलच्छेद-विलक्षीकृत-शम्बाम् ।आज्ञा-दानान्दोलन-हृद्याधर-बिम्बां,वन्देऽमन्द द्योत कदम्बां जगदम्बाम् ॥ ८॥ ब्रह्म-विष्णु-महेशांश्च गमयन्ती महर्षिताम् ।यन्त्रात्मना परिणता पुनातु परमेश्वरी ॥ ॥ इत्यम्बा-वन्दना समाप्ता ॥

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Shri Chamundeshvari Mangalam:श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलम्

Shri Chamundeshvari Mangalam:श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलम् श्रीशैलराजतनये चण्डमुण्डनिषूदिनि । मृगेन्द्रवाहने तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १॥ पञ्चविंशति सालाढ्य श्रीचक्रपुरनिवासिनि । बिन्दुपीठस्थिते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २॥ राजराजेश्वरि श्रीमद्कामेश्वरकुटुम्बिनि । युगनाथ तते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३॥ महाकालि महालक्ष्मि महावाणि मनोन्मणि । योगनिद्रात्मके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ४॥ मन्त्रिणि दण्डिनि मुख्ययोगिनि गणसेविते । भण्डदैत्यहरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ५॥ निशुम्भमहिषाशुम्भेरक्तबीजादिमर्दिनि । महामाये शिवे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ६॥ कालरात्रि महादुर्गे नारायणसहोदरि । विन्ध्याद्रिवासिनि तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ७॥ चन्द्रलेखालसत्पाले श्रीमत्सिंहासनेश्वरि । कामेश्वरि नमस्तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ८॥ प्रपञ्चसृष्टिरक्षादि पञ्चकार्यधुरन्धरे । पञ्चप्रेतासने तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ९॥ मधुकैटभसंहर्त्रि कदम्बवनवासिनि । महेन्द्रवरदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १०॥ निगमागमसंवेद्ये श्रीदेवि ललिताम्बिके । ओढ्याणपीठगदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ११॥ पुण्ड्रेक्षुखण्डकोदण्डपुष्पकण्ठलसत्करे । सदाशिवकले तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १२॥ कामेशभक्तमाङ्गल्य श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरि । सूर्याग्नीन्दुत्रिलोचनि (नित्यं) चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १३॥ चिदग्निकुण्डसम्भूते मूलप्रकृति(स्व)रूपिणि । कन्दर्पदीपके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १४॥ महापद्माटवीमध्ये सदानन्दविहारिणि । पाशाङ्कुशधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १५॥ सर्वदोषप्रशमनि सर्वसौभाग्यदायिनि । सर्वसिद्धिप्रदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १६॥ सर्वमन्त्रात्मिके प्राज्ञे सर्वयन्त्रस्वरूपिणि । सर्वतन्त्रात्मिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १७॥ सर्वप्राणिहृदावासे सर्वशक्तिस्वरूपिणि । सर्वाभिष्टप्रदे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १८॥ वेदमातः महाराज्ञि लक्ष्मि वाणि वसुप्रिये । त्रैलोक्यवन्दिते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ १९॥ ब्रह्मोपेन्द्रसुरेन्द्रादि सम्पूजितपदाम्बुजे । सर्वायुधकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २०॥ महाविद्यासम्प्रदात्रि संवेद्यनिजवैभवे । सर्वमुद्राकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २१॥ एकपञ्चाशते पीठे निवासात्मविलासिनि । अपारमहिमे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २२॥ तेजोमयि दयापूर्णे सच्चिदानन्दरूपिणि । सर्ववर्णात्मिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २३॥ हंसारूढे चतुर्वक्त्रे ब्राह्मीरूपसमन्विते । धूम्राक्षसहन्त्रिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २४॥ माहेस्वरीस्वरूपे पञ्चास्ये वृषभवाहने । सुग्रीवपञ्चिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २५॥ मयूरवाहे षट्वक्त्रे कौमारीरूपशोभिते । शक्तियुक्तकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २६॥ पक्षिराजसमारूढे शङ्खचक्रलसत्करे । वैष्णवीसंज्ञिके तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २७॥ वाराहि महिषारूढे घोररूपसमन्विते । दंष्ट्रायुधधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २८॥ गजेन्द्रवाहनारुढे इन्द्राणीरूपवासुरे । वज्रायुधकरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ २९॥ चतुर्भुजे सिंहवाहे जटामण्डिलमण्डिते । चण्डिके सुभगे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३०॥ दंष्ट्राकरालवदने सिंहवक्त्रे चतुर्भुजे । नारसिंहि सदा तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३१॥ ज्वलज्जिह्वाकरालास्ये चण्डकोपसमन्विते । ज्वालामालिनि तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३२॥ भृङ्गिणे दर्शितात्मीयप्रभावे परमेश्वरि । नानारूपधरे तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३३॥ गणेशस्कन्दजननि मातङ्गि भुवनेश्वरि । भद्रकालि सदा तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३४॥ अगस्त्याय हयग्रीव प्रकटीकृतवैभवे । अनन्ताख्यसुते तुभ्यं चामुण्डायै सुमङ्गलम् ॥ ३५॥ ॥ इति श्रीचामुण्डेश्वरीमङ्गलं सम्पूर्णम् ॥

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Durga Puja 2025

Durga Puja 2025 Date And Time :दुर्गा पूजा 2025 कब से होगी शुरू? जानें महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा विधि

Durga Puja 2025 Mein Kab suru hogi: हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा विशेष रूप से पूर्वी भारत में, खासकर बंगाल, ओडिशा और असम में बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इस पर्व को दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है और यह देवी दुर्गा की पूजा का एक प्रमुख त्योहार है। यह अवधि नवदुर्गाओं की उपासना के लिए उत्तम मानी गई है। देवी दुर्गा का धरती पर आगमन देवी पक्ष के पहले दिन होता है और Durga Puja 2025 दुर्गा विसर्जन के दिन वह प्रस्थान करती हैं। मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान वाले दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इन दिनों से आने वाले समय का अनुमान किया जाता है और यह माना जाता है कि मां के आगमन और प्रस्थान से भविष्य में शुभ और अशुभ स्थितियों का संकेत मिलता है। आइए, जानते हैं साल 2025 में दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्रि से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण तिथियां, घटस्थापना मुहूर्त और पूजा सामग्री के बारे में: Shardiya Navratri 2025 start and end Date: शारदीय नवरात्रि 2025: कब से कब तक? वैदिक पंचांग के अनुसार, साल 2025 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 22 सितंबर 2025, सोमवार से हो रही है, जो 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलेगी। इस बार नवरात्रि 10 दिनों की होगी, क्योंकि तृतीया तिथि दो दिन रहेगी। इस दौरान Durga Puja 2025 मां दुर्गा की पूजा और व्रत करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। Durga Puja 2025: Important dates of Durga festival:दुर्गा पूजा 2025: दुर्गोत्सव की प्रमुख तिथियां Durga Puja 2025:दुर्गोत्सव पांच दिनों तक मनाया जाता है, Durga Puja 2025 जिसमें षष्ठी, महासप्तमी, महाष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के दिन विशेष रूप से पूजे जाते हैं। Durga Puja vidhi 2025:दुर्गा पूजा की विधि क्या है? Durga Puja 2025:दुर्गा पूजा विधि में सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, फिर अपने घर के मंदिर में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें. कलश स्थापना करें, दीप जलाकर गंगाजल छिड़कें, फिर अक्षत, सिंदूर, लाल फूल और फल-मिठाई मां को अर्पित करें. दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, और अंत में मां की आरती करके प्रसाद बांटें.  Durga Puja 2025:मुख्य पूजा विधि अतिरिक्त जानकारी Start of Durga Puja (Shashthi Tithi): 28 September 2025, Sunday:दुर्गा पूजा की शुरुआत (षष्ठी तिथि): 28 सितंबर 2025, रविवार     ◦ इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है।     ◦ दुर्गा पूजा की मूर्ति स्थापना के लिए यह दिन शुभ माना गया है।     ◦ मूर्ति स्थापना का उत्तम मुहूर्त: सुबह 06:08 बजे से लेकर 10:30 बजे तक।     ◦ इस दिन बिल्व निमंत्रण और पंडाल सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। संधि पूजा (अष्टमी तिथि): 30 सितंबर 2025, मंगलवार     ◦ संधि पूजा अष्टमी और नवमी के संधिकाल में की जाती है।     ◦ संधिकाल का मुहूर्त: रात्रि 07:36 बजे से 08:24 बजे तक।     ◦ इस समय 108 दीपों और 108 कमल पुष्पों से मां की पूजा की जाती है।     ◦ यह समय मां दुर्गा के चामुंडा रूप की आराधना के लिए अत्यंत विशेष होता है। दुर्गा विसर्जन (विजयादशमी): 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन नदियों और तालाबों में किया जाएगा। शारदीय नवरात्रि 2025: घटस्थापना का महत्व और मुहूर्त शारदीय नवरात्रि Durga Puja 2025 के पहले दिन कलश स्थापना (घटस्थापना) की जाती है। Durga Puja 2025 ऐसा माना जाता है कि कलश स्थापना में विशेष चीजों को शामिल करने से साधक को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और मां दुर्गा जीवन के सभी दुखों को दूर करती हैं। घटस्थापना के शुभ मुहूर्त: 22 सितंबर 2025, सोमवार को घटस्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त हैं: • पहला मुहूर्त: सुबह 6 बजकर 09 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 06 मिनट तक। • दूसरा मुहूर्त (अभिजीत मुहूर्त): 11 बजकर 49 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक। आप इन दोनों में से किसी भी मुहूर्त में घटस्थापना कर सकते हैं। Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व ! Shardiya Navratri 2025 Puja Samagri: घटस्थापना की सामग्री लिस्ट शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए आपको इन चीजों की आवश्यकता होगी: • अनाज, साफ जवा • कलश • गंगाजल • सुपारी, मौली, रोली • जटा वाला नारियल • आम या अशोक के पत्ते • मिट्टी का बर्तन • किसी पवित्र स्थान की मिट्टी (मंदिर आदि) • अखंड ज्योति के लिए बड़ा दीया, रुई की बाती • लाल सूत्र, सिक्का • लाल कपड़ा • फूल, फूल माला • इलायची, लौंग, कपूर • अक्षत, हल्दी इस तरह करें घटस्थापना (कलश स्थापना विधि) • सुबह स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। • इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करें। • कलश स्थापना के लिए घर की उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा को शुभ माना जाता है। • कलश में साफ जल भरकर उसमें सिक्का, फूल और अक्षत डालें। • इसके बाद कलश पर स्वास्तिक बनाएं और कलावा लपेट दें। • लाल चुनरी में नारियल को लपेट कर कलश के ऊपर रख दें। • देसी घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करें। • व्रत कथा का पाठ करें। • फल और मिठाई का भोग लगाएं। मां दुर्गा के शक्तिशाली मंत्र मां दुर्गा की उपासना के दौरान आप इन मंत्रों का जप कर सकते हैं: • ॐ ह्रींग डुंग दुर्गायै नमः • ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै • सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।। मां दुर्गा का आह्वान मंत्र: • ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

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Devi Skandmata

Devi Skandmata: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Devi Skandmata मां दुर्गा का रूप हैं और माना जाता है कि वे अपने भक्तों की रक्षा करती हैं, जैसे एक मां अपने बच्चे को नुकसान से बचाती है। Devi Skandmata एक शक्तिशाली देवी हैं जिनके प्यार और देखभाल ने भगवान कार्तिकेय को राक्षस तारकासुर को हराने में मदद की। भगवान शिव और मां पार्वती के पहले पुत्र, भगवान कार्तिकेय को “स्कंद” के नाम से भी जाना जाता था। Devi Skandmata इसलिए, माँ पार्वती को अक्सर स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ कार्तिकेय या स्कंद की माँ है। नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध ग्रह देवी स्कंदमाता द्वारा शासित हैं। Devi Skandmata का स्वरुप देवी स्कंदमाता Devi Skandmata क्रूर सिंह पर विराजमान हैं। वह बच्चे मुरुगन को गोद में उठाती हैं। भगवान मुरुगन को कार्तिकेय और भगवान गणेश के भाई के रूप में भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता को चार हाथों से चित्रित किया गया है। वह अपने ऊपर के दोनों हाथों में कमल के फूल लिए हुए हैं। वह अपने एक दाहिने हाथ में मुरुगन को रखती है और दूसरे को अभय मुद्रा में रखती है। वह कमल के फूल पर विराजमान हैं और इसी वजह से स्कंदमाता को देवी पद्मासन के नाम से भी जाना जाता है। देवी स्कंदमाता Devi Skandmata का रंग शुभ्रा (शुभ्र) है जो उनके सफेद रंग का वर्णन करता है। Devi Skandmata देवी पार्वती के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों को भगवान कार्तिकेय की पूजा का लाभ मिलता है। यह गुण केवल देवी पार्वती के स्कंदमाता रूप में है। देवी स्कंदमाता मंत्र ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥ Om Devi Skandamatayai Namah॥ देवी स्कंदमाता प्रार्थना सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ Simhasanagata Nityam Padmanchita Karadvaya।Shubhadastu Sada Devi Skandamata Yashasvini॥ Devi Skandmata स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Ma Skandamata Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ देवी स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय को अपनी दाहिनी भुजा में पकड़े हुए दिखाई देती हैं देवी स्कंदमाता ध्यान वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्विनीम्॥ धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पञ्चम दुर्गा त्रिनेत्राम्।अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल धारिणीम्॥ प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् पीन पयोधराम्।कमनीयां लावण्यां चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhita Kamarthe Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chaturbhuja Skandamata Yashasvinim॥ Dhawalavarna Vishuddha Chakrasthitom Panchama Durga Trinetram।Abhaya Padma Yugma Karam Dakshina Uru Putradharam Bhajem॥ Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Dharinim॥ Praphulla Vandana Pallavadharam Kanta Kapolam Pina Payodharam।Kamaniyam Lavanyam Charu Triwali Nitambanim॥ देवी स्कंदमाता स्तोत्र नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।समग्रतत्वसागरम् पारपारगहराम्॥ शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्ति भास्कराम्॥ महेन्द्रकश्यपार्चितां सनत्कुमार संस्तुताम्।सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलाद्भुताम्॥ अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।मुमुक्षुभिर्विचिन्तितां विशेषतत्वमुचिताम्॥ नानालङ्कार भूषिताम् मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेदमार भूषणाम्॥ सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्र वैरिघातिनीम्।शुभां पुष्पमालिनीं सुवर्णकल्पशाखिनीम्॥ तमोऽन्धकारयामिनीं शिवस्वभावकामिनीम्।सहस्रसूर्यराजिकां धनज्जयोग्रकारिकाम्॥ सुशुध्द काल कन्दला सुभृडवृन्दमज्जुलाम्।प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरम् सतीम्॥ स्वकर्मकारणे गतिं हरिप्रयाच पार्वतीम्।अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥ पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहम् सुरार्चिताम्।जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवी पाहिमाम्॥ Namami Skandamata Skandadharinim।Samagratatvasagaram Paraparagaharam॥ Shivaprabha Samujvalam Sphuchchhashagashekharam।Lalataratnabhaskaram Jagatpradipti Bhaskaram॥ Sushuddha Kala Kandala Subhridavrindamajjulam।Prajayini Prajawati Namami Mataram Satim॥ Swakarmakarane Gatim Hariprayacha Parvatim।Anantashakti Kantidam Yashoarthabhuktimuktidam॥ Punah Punarjagadditam Namamyaham Surarchitam।Jayeshwari Trilochane Prasida Devi Pahimam॥ देवी स्कंदमाता कवच ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मधरापरा।हृदयम् पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥ श्री ह्रीं हुं ऐं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।सर्वाङ्ग में सदा पातु स्कन्दमाता पुत्रप्रदा॥ वाणवाणामृते हुं फट् बीज समन्विता।उत्तरस्या तथाग्ने च वारुणे नैॠतेअवतु॥ इन्द्राणी भैरवी चैवासिताङ्गी च संहारिणी।सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥ Aim Bijalinka Devi Padayugmadharapara।Hridayam Patu Sa Devi Kartikeyayuta॥ Shri Hrim Hum Aim Devi Parvasya Patu Sarvada।Sarvanga Mein Sada Patu Skandamata Putraprada॥ Vanavanamritem Hum Phat Bija Samanvita।Uttarasya Tathagne Cha Varune Nairiteavatu॥ Indrani Bhairavi Chaivasitangi Cha Samharini।Sarvada Patu Mam Devi Chanyanyasu Hi Dikshu Vai॥ देवी स्कंदमाता आरती जय तेरी हो स्कन्द माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥सबके मन की जानन हारी। जग जननी सबकी महतारी॥तेरी जोत जलाता रहूं मैं। हरदम तुझे ध्याता रहूं मै॥कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥कही पहाड़ों पर है डेरा। कई शहरों में तेरा बसेरा॥हर मन्दिर में तेरे नजारे। गुण गाए तेरे भक्त प्यारे॥भक्ति अपनी मुझे दिला दो। शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥इन्द्र आदि देवता मिल सारे। करे पुकार तुम्हारे द्वारे॥दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए। तू ही खण्ड हाथ उठाए॥दासों को सदा बचाने आयी। भक्त की आस पुजाने आयी॥ Maa Kushmanda: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

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Skanda Mata

Skanda Mata Puja Vidhi: नवरात्रि के 5वें दिन करें मां स्कंदमाता का पूजन: विधि, मंत्र और आरती सहित सम्पूर्ण जानकारी

Skanda Mata Ki Puja Kese Kare: नवरात्रि का पावन पर्व, देवी दुर्गा की शक्ति और भक्ति का उत्सव है. नौ दिनों और दस रातों तक चलने वाले इस महापर्व में, प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक विशिष्ट स्वरूप की पूजा की जाती है. Skanda Mata Puja Vidhi पांचवां दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप, मां स्कंदमाता को समर्पित है. यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर पुत्र के समान स्नेह लुटाती हैं. Skanda Mata Puja Vidhi: नवरात्रि के 5वें दिन करें मां स्कंदमाता का पूजन मां स्कंदमाता का स्वरूप:Form of Mother skandamata Skanda Mata मां स्कंदमाता, स्कंद कुमार भगवान कार्तिकेय की माता हैं. भगवान स्कंद बालरूप में उनकी गोद में विराजमान हैं. मां कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है. Skanda Mata मां का वाहन सिंह है. इन्हें गौरी, माहेश्वरी, पार्वती और उमा जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है. मां स्कंदमाता का महत्व और पूजा से लाभ:Importance and benefits of worshiping Mother Skandamata नवरात्रि के पांचवें दिन पंचमी तिथि पर Skanda Mata मां स्कंदमाता की उपासना विशेष रूप से की जाती है. मां की उपासना से कई अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं: संतान सुख की प्राप्ति: जिन व्यक्तियों को संतान की इच्छा होती है, वे Skanda Mata मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चन और मंत्र जप से निश्चित रूप से लाभ उठा सकते हैं. नकारात्मक शक्तियों का नाश: मां की उपासना से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. बुद्धि का विकास: भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है. परम शांति और सुख: देवी के इस स्वरूप की आराधना से व्यक्ति की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं, मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है और परम शांति व सुख का अनुभव होता है. अलौकिक तेज की प्राप्ति: मां को विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है, और उनकी उपासना से अलौकिक तेज की प्राप्ति होती है. स्कंदमाता पूजन विधि:Skandamata worship method मां स्कंदमाता की पूजा अत्यंत सरल और फलदायी है. यहाँ चरण-दर-चरण पूजन विधि दी गई है: 1. शुद्धिकरण: सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें. पूजन से पहले चौकी (बाजोट) पर मां स्कंदमाता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें और उसे गंगाजल या गोमूत्र से शुद्ध करें. 2. कलश स्थापना: चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर कलश स्थापित करें. 3. अन्य देवताओं की स्थापना: उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें. 4. संकल्प: इसके बाद व्रत और पूजन का संकल्प लें. 5. षोडशोपचार पूजा: वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा Skanda Mata स्कंदमाता सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें. इसमें निम्नलिखित क्रियाएं शामिल हैं: Skanda Mata आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा और मंत्र पुष्पांजलि. 6. भोग अर्पित करें: मां को मिष्ठान और पांच प्रकार के फलों का भोग लगाएं. विशेष रूप से, मां को केले का भोग अति प्रिय है और आप खीर का प्रसाद भी अर्पित कर सकते हैं. 7. ध्यान और आरती: मां स्कंदमाता का अधिक से अधिक ध्यान करें और अंत में मां की आरती अवश्य करें. 8. प्रसाद वितरण: पूजन संपन्न होने के बाद प्रसाद का वितरण करें. मां स्कंदमाता के शक्तिशाली मंत्र:Powerful mantras of Mother Skandamata मां की आराधना के लिए इन मंत्रों का जाप करें: मूल मंत्र: सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ सरल मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥ संतान प्राप्ति हेतु विशेष मंत्र: ‘ॐ स्कन्दमात्रै नम:।।’ (यह मंत्र संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत सरल और निश्चित लाभ देने वाला है). सार्वभौमिक मंत्र: या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। भोग और प्रसाद:Bhog and Prasad मां स्कंदमाता को केला अति प्रिय है. पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए. ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है. आप मां को खीर का प्रसाद भी अर्पित कर सकते हैं. शुभ रंग Skanda Mata मां स्कंदमाता को श्वेत रंग प्रिय है. मां की उपासना में श्वेत रंग के वस्त्रों का प्रयोग करना शुभ माना जाता है. पूजा के समय पीले रंग के वस्त्र धारण करना भी अत्यंत शुभ होता है. मां स्कंदमाता की आरती:Aarti of Maa Skandamata जय तेरी हो स्कंद माता, पांचवा नाम तुम्हारा आता. सब के मन की जानन हारी, जग जननी सब की महतारी. तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं, हरदम तुम्हे ध्याता रहूं मैं. कई नामो से तुझे पुकारा, मुझे एक है तेरा सहारा. कहीं पहाड़ों पर है डेरा, कई शहरों में तेरा बसेरा. हर मंदिर में तेरे नजारे गुण गाये, तेरे भगत प्यारे भगति. अपनी मुझे दिला दो शक्ति, मेरी बिगड़ी बना दो. इन्दर आदी देवता मिल सारे, करे पुकार तुम्हारे द्वारे. दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये, तुम ही खंडा हाथ उठाये दासो को सदा बचाने आई, चमन की आस पुजाने आई। Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व !

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Maa Kushmanda

Maa Kushmanda: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Kushmanda को शक्ति का एक रूप माना जाता है और उन्हें इस ब्रह्मांड को बनाने वाली के रूप में जाना जाता है। वह थी जिन्होंने अंधेरे को दूर किया और तीन दिव्य देवी और अन्य देवताओं को भी बनाया। कल्प (कल्पपंथ) के अंत के बाद, पराशक्ति ने देवी कुष्मांडा का रूप धारण किया और ब्रह्मांड के निर्माण को फिर से शुरू किया, जो पूर्ण अंधकार से भरा था। सबसे पहले देवी ने अपने तेज से अंधकार को दूर किया और ब्रह्मांड में प्रकाश लाया। तब देवी ने अपनी कोमल मुस्कान और तेज से ब्रह्मांड के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की।  जीवन को बनाए रखने के लिए, वह पूरे ब्रह्मांड के लिए ऊर्जा का स्रोत बन गई। बाद में उन्होंने पूरे ब्रह्मांड की रचना की और सूर्य मंडल में अपनी शक्ति को स्थापित किया और सूर्य को ब्रह्मांड में पर्याप्त प्रकाश प्रदान करने की शक्ति प्रदान की।  इस तरह, देवी सूर्य देव की शक्ति का स्रोत बन गईं। यही कारण है कि इस देवी को सूर्य मंडल अंतरवर्धिनी (सूर्य मंडल के भीतर रहने वाली) के नाम से पुकारा जाता है। कुष्मांडा नाम का अर्थ न केवल अंडे के आकार के ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में है, बल्कि उसके गर्भ में ब्रह्मांड के रक्षक के रूप में भी है, जो प्रकृति को बनाने और उसकी रक्षा करने का संकेत देता है। वह एक बाघ की सवारी करती है और उनकी कुल 8 भुजाएँ हैं। इनमें से प्रत्येक भुजा में एक विशेष वस्तु या हथियार होता है। उन्हें आमतौर पर एक धनुष और तीर, एक कमल, एक गदा, एक अमृत का बर्तन, एक माला, एक चक्र और एक कमंडल (पानी देने वाला बर्तन) के रूप में चित्रित किया जाता है। माँ कुष्मांडा एक दिव्य, शाश्वत प्राणी हैं और सभी ऊर्जा का स्रोत हैं। वह अपने भक्तों को शक्ति, ज्ञान, समृद्धि का आशीर्वाद देने के लिए जानी जाती है और उन्हें जीवन की परेशानियों और कठिनाइयों से बचाती है।  नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा के रूप में भी जाना जाता है। Maa Kushmanda: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती Maa Kushmanda के मंदिर कुष्मांडा दुर्गा मंदिर, दुर्गा कुंड, वाराणसी। (वाराणसी में नवदुर्गा देवी को समर्पित नौ मंदिर हैं) कुष्मांडा देवी मंदिर, घाटमपुर, उत्तर प्रदेश। Maa Kushmanda का मंत्र ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ Om Devi Kushmandayai Namah॥ Maa Kushmanda की Prarthana सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥ Surasampurna Kalasham Rudhiraplutameva Cha।Dadhana Hastapadmabhyam Kushmanda Shubhadastu Me॥ Maa Kushmanda की स्तुति या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Kushmanda Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Kushmanda का ध्यान वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhita Kamarthe Chandrardhakritashekharam।Simharudha Ashtabhuja Kushmanda Yashasvinim॥Bhaswara Bhanu Nibham Anahata Sthitam Chaturtha Durga Trinetram।Kamandalu, Chapa, Bana, Padma, Sudhakalasha, Chakra, Gada, Japawatidharam॥Patambara Paridhanam Kamaniyam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala, Manditam॥Praphulla Vadanamcharu Chibukam Kanta Kapolam Tugam Kucham।Komalangi Smeramukhi Shrikanti Nimnabhi Nitambanim॥ Maa Kushmanda का स्त्रोत दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ Durgatinashini Tvamhi Daridradi Vinashanim।Jayamda Dhanada Kushmande Pranamamyaham॥Jagatamata Jagatakatri Jagadadhara Rupanim।Charachareshwari Kushmande Pranamamyaham॥Trailokyasundari Tvamhi Duhkha Shoka Nivarinim।Paramanandamayi, Kushmande Pranamamyaham॥ Maa Kushmanda का कवच हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥ Hamsarai Mein Shira Patu Kushmande Bhavanashinim।Hasalakarim Netrecha, Hasaraushcha Lalatakam॥Kaumari Patu Sarvagatre, Varahi Uttare Tatha,Purve Patu Vaishnavi Indrani Dakshine Mama।Digvidikshu Sarvatreva Kum Bijam Sarvadavatu॥ Maa Kushmanda की आरती कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। शाकम्बरी माँ भोली भाली॥लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुँचती हो माँ अम्बे॥तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥ Maa Kushmanda Worship Mantra:नवरात्रि का चौथा दिन: पढ़ें मां कूष्मांडा की पूजन विधि, श्लोक, मंत्र एवं भोग

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Maa Chandraghanta

Maa Chandraghanta:मां चंद्रघंटा का मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Chandraghanta देवी पार्वती का विवाहित रूप हैं। भगवान शिव से विवाह के बाद देवी महागौरी ने अपने माथे को आधा चंद्र से सजाना शुरू किया और जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित है। देवी चंद्रघंटा बाघिन पर सवार हैं। वह अपने माथे पर अर्ध-गोलाकार चंद्रमा (चंद्र) पहनती है। उनके माथे पर अर्धचंद्र घंटी (घंटी) की तरह दिखता है और इसी वजह से उन्हें चंद्र-घण्टा के नाम से जाना जाता है। माँ को दस हाथों से चित्रित किया गया है। देवी चंद्रघंटा अपने चार बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल रखती हैं और पांचवें बाएं हाथ को वरद मुद्रा में रखती हैं। वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल का फूल, तीर, धनुष और जप माला धारण करती है और पांचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती है। देवी पार्वती का यह रूप शांत और अपने भक्तों के कल्याण के लिए है। इस रूप में देवी चंद्रघंटा अपने सभी हथियारों के साथ युद्ध के लिए तैयार हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके माथे पर चंद्र-घंटी की आवाज उनके भक्तों से सभी प्रकार की बुरी आत्माओं को दूर कर देती है। Maa Chandraghanta Mantra: मंत्र  ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ Om Devi Chandraghantayai Namah॥ Maa Chandraghanta प्रार्थना  पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥ Pindaja Pravararudha Chandakopastrakairyuta।Prasadam Tanute Mahyam Chandraghanteti Vishruta॥ Maa Chandraghanta स्तुति  या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Chandraghanta Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Chandraghanta ध्यान  वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chandraghanta Yashasvinim॥Manipura Sthitam Tritiya Durga Trinetram।Khanga, Gada, Trishula, Chapashara, Padma Kamandalu Mala Varabhitakaram॥Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Manditam॥Praphulla Vandana Bibadhara Kanta Kapolam Tugam Kucham।Kamaniyam Lavanyam Kshinakati Nitambanim॥ Maa Chandraghanta स्तोत्र  आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥ Apaduddharini Tvamhi Adya Shaktih Shubhparam।Animadi Siddhidatri Chandraghante Pranamamyaham॥Chandramukhi Ishta Datri Ishtam Mantra Swarupinim।Dhanadatri, Anandadatri Chandraghante Pranamamyaham॥Nanarupadharini Ichchhamayi Aishwaryadayinim।Saubhagyarogyadayini Chandraghante Pranamamyaham॥ Maa Chandraghanta कवच  रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम्॥बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम्।स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम॥कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च।न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम्॥ Rahasyam Shrinu Vakshyami Shaiveshi Kamalanane।Shri Chandraghantasya Kavacham Sarvasiddhidayakam॥Bina Nyasam Bina Viniyogam Bina Shapoddha Bina Homam।Snanam Shauchadi Nasti Shraddhamatrena Siddhidam॥Kushishyam Kutilaya Vanchakaya Nindakaya Cha।Na Datavyam Na Datavyam Na Datavyam Kadachitam॥ Maa Chandraghanta आरती  जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥भक्त की रक्षा करो भवानी।

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