Durga mata:दुर्गा अष्टमी: देवी महागौरी की कथा, पूजा विधि और कन्या भोजन का महत्व

देवी महागौरी की कथाकथा है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कठोर तप किया था. इससे उनका शरीर काला पड़ गया था. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव इन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करते हैं और इनके शरीर को गंगाजल से धोया जाता है. इससे वे विद्युत के समान कांतिमान हो जाती हैं. वे गौरवर्ण हैं इसलिए उन्हें महागौरी के नाम से जाना जाता है. Durga mata:महागौरी का स्वरूपमहाअष्टमी के दिन देवी दुर्गा के चार हाथों में से दो हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में होते हैं और दो हाथों में डमरू और त्रिशूल रहता है. महागौरी सफेद या हरा वस्त्र धारण करती हैं. इस दिन देवी दुर्गा के अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है. शस्त्रों के प्रदर्शन के कारण इस दिन को वीराष्टमी भी कहा जाता है. अष्टमी पर लाल फूल, लाल चंदन, दिया और धूप जैसी चीजों से मां दुर्गा का पूजन करते हैं. दुर्गा सप्तशती के पाठ का आज विशेष महत्व है. आराधना मंत्रया देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै मनो नम:. कन्या पूजन का फल अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन 10 साल के कम उम्र की  कन्याओं के पूजन और उन्हें भोजन कराने से शुभ फल मिलता है. ये कन्याएं मां दुर्गा का प्रतिनिधि मानी जाती हैं. आमतौर पर कन्याभोज में नौ कन्याओं को भोजन कराया जाता है लेकिन 5, 7 और 11 की संख्या भी शुभ मानी जाती है. घर बुलाकर पहले उनके पैर पूजे जाते हैं, फिर उन्हें भोजन कराकर पसंदीदा तोहफे दिए जाते हैं और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है. Durga mata: माता को अर्पणमंदिरों में इस दिन महाअष्टमी का हवन होता है. इसमें भक्त बड़ी श्रद्धा से शामिल होते हैं क्योंकि मान्यता है कि इस हवन से पुण्यलाभ होता है. महिलाएं देवी मां को लाल चुनरी, लाल-हरी चूड़ियां और सिंदूर अर्पित करती और अपने सुख-सौभाग्य के लिए प्रार्थना करती हैं. पौराणिक विश्वास के अनुसार देवी के इस स्वरूप की सच्चे मन से पूजा करें तो सारे कष्ट दूर हो जाते हैं.

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Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज

Chhath Puja 2023: इस साल छठ पूजा की शुरुआत 17 नवंबर 2023 से हो रही है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व सभी के लिए बहुत खास होता है। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, छठ पूजा का यह पर्व हर साल कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इसे साल के सबसे बड़े त्योहार के रूप में भी देखा जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है। छठ पूजा को लेकर कई मान्यताएं व परंपराएं हैं, जो इस व्रत को और भी खास बनाती है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और उनके उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है। इसे सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। ये व्रत 36 घंटों तक चलता है। इस दौरान कई नियमों का पालन करना जरूरी होता है नहीं तो छठी मैया नाराज हो सकती हैं। इसी कड़ी में आइए जानते हैं कि छठ पूजा में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। Chhath Puja 2023: कब है छठ पूजा, जानें चैती छठ से जुड़ी ये 5 जरूरी बातें, बस इतने दिन हैं बाकी Chhath Puja 2023 प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल न करेंछठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। इस दौरान भूलकर भी चांदी, स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस पूजा में मिट्टी के चूल्हे और बर्तनों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। लहसुन व प्याज का सेवन न करेंछठ पर्व के शुभ दिनों में भूलकर भी मांसाहारी भोजन का सेवन न करें। साथ ही इसे घर में भी न बनाएं। छठ पूजा के दिनों में लहसुन व प्याज का सेवन भी नहीं करना चाहिए। सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना कुछ न खाएंइस दौरान व्रत रख रही महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य दिए बिना किसी भी चीज का सेवन न करें। साथ ही व्रत रखने वाली महिलाएं जमीन पर सोएं। सेंधा नमक का इस्तेमालछठ पूजा का व्रत कठिन उपवास में से एक है। इस दौरान व्रत रह रही महिलाएं इससे जुड़ें सभी नियमों का पालन करती हैं। छठ पूजा से करीब 10 दिन पहले से ही लोगों को अरवा चावल, सेंधा नमक का इस्तेमाल करना चाहिए। प्रसाद बनाते समय चखने की भूल न करेंछठ पूजा का प्रसाद बेहद पवित्र होता है। इसे बनाते समय भूलकर भी इसे जूठा न करें। साथ ही इसे बनाने से पहले भी कुछ भी न खाएं। अपने हाथों को भी साफ रखें। याद रखें कि, प्रसाद बनाने वाली जगह एक दम स्वच्छ हों।

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Chhath Puja 2023: कब है छठ पूजा, जानें चैती छठ से जुड़ी ये 5 जरूरी बातें, बस इतने दिन हैं बाकी

Chhath Puja 2023 Date In Hindi: हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार है छठ पूजा. पंचांग के अनुसार यह महापर्व 19 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा. Chhath Puja 2023 Date: छठ (chhath puja) महापर्व उत्तर भारत के सबसे बड़े पर्व में से एक है, जो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से लेकर सप्तमी तक चलता है. यह पर्व सूर्य भगवान और षष्ठी माता को समर्पित है. ये कहना गलत नहीं होगा कि यह पर्व सबसे कठिन त्योहारों में से एक है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें व्रत करने वाले भक्तों को 36 घंटो तक निर्जला व्रत करना पड़ता है यानी इस दौरान वे पानी तक नहीं पीते. इस व्रत के नियम- कानून बहुत (chhath puja niyam) कड़े माने जाते हैं इसलिए यह सबसे कठिन व्रत में गिना जाता है. अगर आपके घर में भी छठ पर्व मनाया जाता है तो आपको इन जरूरी बातों को जरूर जान लेना चाहिए.  Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग छठ पूजा 2023 कैलेंडर (Chhath Puja 2023 Calendar) छठ पूजा की शुरुआत 17 नवंबर, शुक्रवार से हो रही है इस दिन नहाय खाय किया जाता है. 18 नवंबर, शनिवार को खरना किया जाएगा, वहीं 19 नवंबर, रविवार को छठ पूजा की पहली अर्घ्य यानी संध्या अर्घ्य दी जाएगी और 20 नवंबर, सोमवार को छठ पूजा की दूसरी और आखिरी अर्घ्य यानी उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा. छठ पूजा की 5 जरुरी बातें | Chhath Puja 5 Important Things निर्जला व्रत – छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है. यह पर्व चार दिनों तक चलता है और खरना के भोजन ग्रहण करने के बाद इसकी शुरुआत होती है. किन देवता देवी देवताओं की होती है पूजा – छठ पूजा में सूर्य देव, उनकी बहन छठी मैया, उनकी पत्नी उषा, प्रत्युषा की पूजा करने की परंपरा है.  छठी मैया कौन हैं – छठी मैया ब्रह्मा जी की पुत्री है. इन्हें षष्ठी माता भी कहा जाता है, जो संतानों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती है. डूबते सूर्य को अर्घ क्यों दिया जाता है –  छठ में डूबते और उसके बाद उगते सूरज को अर्घ्य देने का यह मतलब होता है कि जो डूबा है उसका उदय होना भी निश्चित है. यानी अगर अभी परिस्थितियां खराब है तो वह अच्छी भी होगी बस सयंम रखने की जरूरत है. छठ पूजा में व्रत पारण की विधि – ऐसी मान्यता है कि छठ पूजा का में चढ़ाए गए प्रसाद से ही अपने व्रत को खोलना चाहिए. उसके बाद कच्चा दूध पीने की सलाह दी जाती है.

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Diwali से पहले और बाद कई बड़े ग्रहों का महापरिवर्तन वाला, दो ग्रहण, किन राशियों की Diwali अच्छी मनेगी, मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी

Diwali big planet rashi parivartan: इस अवधि में आप नया घर खरीदने पर भी विचार कर सकते हैं और आने वाला समय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अनुकूल रहेगा। कुल मिलाकर आपकी आर्थिक स्थिति काफी अनुकूल रहेगी  Diwali bih rashi parivartan: दिवाली से पहले और बाद का महीना कई बड़े ग्रहों का परिवर्तन लेकर आ रहा है। इस साल दिवाली 12 नवंबर को मनाई जाएगी। दिवाली से पहले धनतरेस और नर्क चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है, लेकिन अक्टूबर के आखिर में राहु और केतू का राशि परिवर्तन हो रहा है। इसके बाद अभी सिंह राशि में शुक्रदेव भी सभी राशियों पर सुख सुविधाओं की बरसात करेंगे। 3 नवंबर को शुक्र कन्या राशि में प्रवेश करें। वहीं 4 नवंबर के शुरू में शनि मार्गी हो रहे हैं, जो कई राशियों को लाभ पहुंचाएंगे। शनि के राशि परिवर्तन होने से कई राशियों के लिए शुभ परिणाम होंगे। शनि से  पहले 6 नवंबर को बुध भी वृश्चिक राशि में आ जाएंगे और दिवाली से पहले ही मंगल भी 6 नवंबर को वृश्चिक राशि में आ जाएंगे और फिर 17 नवंबर को सूर्य राशि बदलकर वृश्चिक राशि में आ जाएंगे। कुल मिलाकर इन राशि परिवर्तन से कई राशियों को मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी। Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त Diwali दिवाली से पहले और बाद में ग्रहों का यह राशि परिवर्तन मेष राशि वालों के लिए अच्छा साबित होगा। इस राशि के परिवार के लोग खुश रहेंगे और उन पर धन-धान्य की बरसात होगी। इसकी के साथ हेल्थ का भी आपको थोड़ा ध्यान रखना होगा।  कन्या राशि वालों के लिए यह परिवर्तन अच्छा साबित होगा, आप जिस काम में हाथ डालेंगे सफलता मिलेगी। आपकी राशि में शुक्र आ रहे हैं, तो आपके लिए समय सोने पर सुहागा रहेगा। इस गोल्डन पीरियड का आप अच्छे से इस्तेमाल करें। कुंभ-विदेश यात्रा, धन लाभ दिवाली पर शनि और कई ग्रहों के कारण इस राशि के लोगों के लिए समय बहुत अच्छा है। इस राशि के लोग घर परिवार के साथ मिलकर रहें और सभी को वस्त्र और आभूषण दें। मां लक्ष्मी की कृपा से आपको आर्थिक लाभ होगा।

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Dev Deepawali 2023: देव दीपावली को लेकर लोगों के बीच भम्र की स्थिति, जानें तारीख, दीपदान का महत्व

Dev Deepawali 2023: देव दीपावली पर तिथि भेद का यह पहला मामला नहीं है. इसके पहले रक्षाबंधन और होली पर भी तिथिभेद के कारण संशय की स्थिति बन चुकी है. गंगा के घाटों पर शाम की आरती करने वाली समितियों ने बैठक करके 27 नवंबर को देव दीपावली मनाने का फैसला किया. साथ ही काशी विद्वत परिषद के निर्णय को खारिज कर दिया. Dev Deepawali 2023: वाराणसी के विश्व प्रसिद्ध देव दीपावली में शामिल होने के लिए न केवल काशी बल्कि देश दुनिया के कोने-कोने से आस्थावान और सैलानी पहुंचते हैं. लेकिन, इस बार देव दीपावली की तिथि ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है. एक तरफ काशी विद्वत परिषद तो दूसरी तरफ केंद्रीय उद्योग दीपावली महासमिति सहित गंगा आरती कराने वाली तमाम समितियां हो गई हैं. काशी विद्वत परिषद ने देव दीपावली की तिथि का ऐलान 26 नवंबर को किया है और इसे ही शास्त्रोक्त विधि से मनाने की नसीहत भी दी है. दूसरी ओर काशी के गंगा घाटों पर देव दीपावली कराने की जिम्मेदारी उठाने वाली तमाम गंगा आरती की समितियां और केंद्रीय देव दीपावली महासमिति ने बैठक करके 27 नवंबर को देव दीपावली मनाने की घोषणा की है और बताया है कि उदया तिथि के अनुसार ही 27 नवंबर को देव दीपावली मनाई जाएगी. कब मनाई जाएगी देव दीपावली 26 नवंबर या 27 नवंबर?  हिंदू तीज-त्योहारों को लेकर अक्सर तिथियों का मतभेद बड़ा सिरदर्द बन जाता है. लेकिन इस बार इससे भी एक कदम आगे जाकर काशी की विश्व प्रसिद्ध देव दीपावली मनाने को लेकर काशी विद्वत परिषद् के सामने गंगा आरती कराने वाली समितियों के सहित केंद्रीय देव दीपावली महासिमिति आ गई है. परिषद् के मुताबिक 26 नवंबर को देव दीपावली मनाया जाना चाहिए. वहीं समितियों के मुताबिक, बैठक करके यह फैसला ले लिया गया है कि वे 27 नवंबर को ही उदयातिथि के अनुसार देव दीपावली का पर्व मनाएंगे. काशी विद्वत परिषद्’ की ओर से एक पत्र जारी करते हुए बताया गया है कि स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के अंतर वेदांग स्वरूप में काल गणना हेतु ज्योतिष शास्त्र एवं उस गणना के आधार पर शुभ काल के निदर्शन हेतु धर्मशास्त्र की रचना की. जिसके समन्वय से उपयुक्त काल का विवेचन किया जा सके. इसमें शास्त्र का आधार ही प्रमाण होता है अपनी तार्किक बुद्धि नहीं. परंतु वर्तमान समय में लोग शास्त्र और तार्किक शक्तियों के द्वारा अपनी सुविधा की दृष्टि से शुभ काल की व्याख्या करते हुए व्रत पर्व उत्सव आदि मनाने का निर्देश देने लगे हैं. जैसे उदया तिथि मान्य होगी, अस्तकालिक तिथि मान्य होगी, मध्यान्ह काल की तिथि मान्य होगी आदि. परंतु कार्य एवं व्रतादि के भेद से आचार्यों ने इन तिथियों को उदय, अस्त, मध्यरात्रि तथा मध्यदिन कालिक इत्यादि का अलग विवेचन किया है, जैसे- कृष्ण जन्माष्टमी में अर्धरात्रि कालिक, दीपावली में प्रदोष कालिक आदि.  अतः हमें ऋषि और धर्मशास्त्रों के वचनों का अवलोकन करते हुए प्रमाण वचनों का आश्रय लेकर के ही किसी व्रत पर्व आदि का आयोजन करना चाहिए. अन्यथा उसके विपरीत परिणाम भी दृष्टिगत होने लगते हैं. इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि कभी-कभी एक ही तिथि में अनेक व्रत पर्व भी वर्णित होते हैं जो की काल भेद से कुछ मध्यान्ह व्यापिनी कुछ प्रदोष व्यापिनी तो कुछ उदयातिथी में मनाए जाते हैं. इसी तरह से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को भी अनेक व्रत पर्व उत्सवों का वर्णन आचार्य ने किया है जैसे स्नान दान की पूर्णिमा, दक्षसावर्णि मान्वादि (कुतुपाद्यघटी व्यापिनी), महाकार्तिकी (भूतविद्धा), धात्री पूजा (परविद्धा), व्रत की पूर्णिमा, केश बंधन गौरी व्रत (परविद्धा), वृषोत्सर्ग (सायंकाल व्यापिनी), त्रिपुरोत्सव (सायंकाल व्यापिनी), देवदीपावली (सायंकाल व्यापिनी) आदि. इस प्रसंग में कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाने वाली देवदीपावाली अर्थात् त्रिपुरोत्सव अति विशिष्ट है और काशी में इसको बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यह त्रिपुरोत्सव भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर के वध के उपलक्ष्य देवताओं द्वारा दीप जलाकर उत्सव मनाने पर्व है. इसके संबंध में धर्म शास्त्र के ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख प्राप्त है. देव दीपावाली मंत्र अत्रैव त्रिपुरोत्सव उक्तो भविष्य- पौर्णमास्यां तु सन्ध्यायां कर्तव्यस्त्रिपुर उत्सवः . दद्यादनेन मत्रेण सुदीपांश्च सुरालये . कीटाः पतङ्गा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः . दृष्ट्वा प्रदीप नहि जन्मभागिनस्ते मुक्तरूपा हि भवन्ति तत्र .’ इति . अत्र पौर्णमासी संध्याकालव्यापिनी ग्राह्या पूर्वोक्तभविष्यवाक्ये सध्यायामित्युक्तेः . अतः पूर्णिमा की स्थिति एवं सूक्ष्म मान को आधार बनाकर काशी विद्वत परिषद के ज्योतिष प्रकोष्ठ की बैठक में वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में सर्वसम्मति ने यह निर्णय लिया गया कि देव दीपावली 26 नवंबर 2023 को ही मनाई जाएगी. विभिन्न शास्त्र प्रमाणों के आधार पर प्रो. विनय कुमार पाण्डेय ने सब के समक्ष उपस्थापित किया जिस पर सर्वसम्मति से सहमति बनी. वहीं काशी विद्वत परिषद् की घोषणा के बाद गंगा आरती कराने वाली समितियों और कन्द्रीय देव दीपावली महासिमिति ने बैठक की. काशी के गंगा घाटों एवं अनेक देव मंदिरों, कुण्डों, तालाबों में मनाए जाने वाले विश्व विख्यात देव दीपावली महोत्सव आयोजन करने के संदर्भ में एक बैठक का आयोजन पंडित किशोरी रमण दूबे (बाबू महाराज) की अध्यक्षता में गंगा सेवा निधि के कार्यालय में किया गया. जिसमें सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इस वर्ष पंचांग भेद के कारण 26 एवं 27, नवंबर को अलग-अलग दिन पंचांगों में कार्तिक पूर्णिमा देव दीपावली का जिक्र है. लेकिन, देव दीपावली की तिथि को लेकर एक बार पहले काशी नरेश महाराज डॉ विभूति नारायण सिंह जी के समय में एवं गंगा सेवा निधि के संस्थापक स्मृति शेष पंडित सत्येंद्र मिश्रा {मुनन्न महाराज} जी के समय में आई थी. उन दोनों महानुभावों ने विषय विशेष के विद्वानों से परामर्श करने के बाद उदया तिथि की पूर्णिमा जिस दिन पड़ती है, उसी दिन देव दीपावली मनाई गई थी, जिस दिन प्रात: काल स्नान दान की पूर्णिमा है. उसी दिन सायं काल दीपदान की परंपरा घाटों एवं कुंडों – तालाबों पर है जिस वर्ष भी 2 दिन कार्तिक पूर्णिमा पड़ी है उसी दिन उदया तिथि की ही पूर्णिमा वाले दिन ही देव दीपावली महोत्सव के आयोजन की परंपरा सुदृढ़ रही है.  यहां यह भी अवगत कराना जरूरी है कि उदया तिथि में दूर-दूर से काशी में कार्तिक पूर्णिमा स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का गंगा स्नान भी प्रातः काल होता है और सायं काल में भगवती मां गंगा का

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Diwali 2023: दीपावली पर क्या करें, सुबह से लेकर रात तक की 25 जरूरी बातें

Diwali 2023 : ब्रह्म पुराण के अनुसार दिवाली पर अर्धरात्रि के समय महालक्ष्मीजी सद्ग्रहस्थों के घरों में विचरण करती हैं। इस दिन घर-बाहर को साफ-सुथरा कर सजाया-संवारा जाता है। दीपावली मनाने से श्री लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर स्थायी रूप से सद्गृहस्थ के घर निवास करती हैं। दीपावली धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा महालक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा और भाईदूज-इन 5 पर्वों का मिलन है। मंगल पर्व दीपावली के दिन सुबह से लेकर रात तक क्या करें कि महालक्ष्मी का घर में स्थायी निवास हो जाए.. आइए जानें विस्तार से….  Diwali pe kare ye kaam दीपावली के पूजन की संपूर्ण विधियां दी गई हैं। फिर भी संक्षेप में 25 बिंदुओं से जानें कि क्या करें इस दिन ….  Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त 1. प्रातः स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2 . अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें-मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि-सकलशुभफल प्राप्त्यर्थंगजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।  3.दिन में पकवान बनाएं या घर सजाएं। बड़ों का आशीर्वाद लें।  4 . सायंकाल पुनः स्नान करें। 5 . लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का चित्र भी लगाया जा सकता है।) 6 . भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयां बनाएं। 7 .लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बांधें। 8. इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। 9 . फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें। 10. अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें। 11.इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं। 12. फिर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें। 13. पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। 14. एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें-  नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥  साथ ही निम्न मंत्र से इंद्र का ध्यान करें-  ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥ पश्चात निम्न मंत्र से कुबेर का ध्यान करें-  धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥  15. इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें। 16. तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को रुपए दें। 17. लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है। 18. इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। 19. समीप ही एक सौ रुपए, सवा सेर चावल, गुड़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पांच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें। 20 उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएं। 21. दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आंखों में लगाएं। 22. फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें।  23. व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें। 24. रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल तथा छाज (सूप) पर तिलक करें। 25. दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें ‘लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ’। 

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मंगलवार को इस मुहूर्त में करें Hanuman Ji की पूजा-आराधना, पूरी होगी हर मनोकामना

 बजरंगबली (bajrangbali) या यूं कहें हनुमान जी (hanuman ji) का दिन है. कई लोग इस दिन व्रत भी रखते है तो वहीं कई लोग इस दिन बड़े ही भक्ति भाव (hanuman ji bhakt) से हनुमान जी की पूजा भी करते है. लेकिन, अगर आप पूजा भी करना चाहते है तो क्यों ना शुभ मुहूर्त में करें जिससे बजरंगबली प्रसन्न हो जाए. तो चलिए आपको आज के दिन का शुभ मुहूर्त बता देते है. जिसमें पूजा करने से आपको बहुत लाभ होंगे.   हनुमान जी की पूजा का शुभ मुहूर्त (shubh muhurat) या सही समय  वैसे तो मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा सुबह करें या शाम दोनों ही समय में करना फलदायी माना जाता है. इस दिन आप सूरज के उगने के बाद और शाम को सूरज डूबने के बाद हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं. वैसे तो पूरे दिन में सूरज डूबने के बाद ही पूजा का शुभ मुहूर्त (hanuman ji puja shubh muhurat) होता है.  Hanuman Ji:जब जीवन में मिले ये संकेत, तो समझ लीजिए आप पर बनी हुई है हनुमान जी की कृपा चलिए, आपको कुछ इसके शुभ मुहूर्त बता देते है-अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 40 मिनट तकविजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 02 मिनट से 02 बजकर 44 मिनट तकनिशीथ काल- मध्‍यरात्रि 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तकगोधूलि बेला- शाम 05 बजकर 19 मिनट से 05 बजकर 43 मिनट तकअमृत काल- शाम 07 बजकर 45 मिनट से 09 बजकर 32 मिनट तकत्रिपुष्कर योग- सुबह 07 बजकर 10 मिनट से दोपहर 02 बजकर 53 मिनट तक अब, शुभ मुहूर्त तो बता दिए इसके साथ ही अशुभ भी बता देते है जिसमें पूजा नहीं करनी चाहिए –  राहुकाल- दोपहर 03 बजे से 04 बजकर 30 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल- सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकभद्रा- अगली सुबह 03 बजकर 55 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक हनुमान जी की पूजा विधि (hanuman ji puja vidhi)इस दिन सही विधि के साथ हनुमान जी की पूजा करना शुभ माना जाता है. कहते हैं कि हनुमान जी की पूजा जितनी साधारण है उतनी ही मुश्किल भी है. आज के दिन सुबह उठकर नहा-धोकर लाल रंग के कपड़े पहन लें. आप घर या मंदिर कहीं भी पूजा कर सकते हैं. घर में पूजा करने के लिए ईशान कोष को साफ करके वहां पर एक चौकी की स्थापना करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं. इसके बाद उस पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें. इसके साथ ही भगवान श्री राम और माता सीता की मूर्ति रखना न भूलें. इसके बाद बजरंग बली के आगे घी का दीपक जलाएं. दीप, धूप जलाकर सुंदर कांड का पाठ करें और हनुमान जी के मंत्रों का जाप करें. उसके बाद लाल फूल, लाल सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं.  इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी की आरती करें. मंगलवार के दिन भगवान को गुड़, केले और लड्डू का भोग लगाएं और परिवार के सदस्यों को प्रसाद बांटे. अगर आपने मंगलवार का व्रत रखा है तो इस बात का ध्यान रखें कि इसमें शाम के समय एक बार ही खाना खाना होता है. इस दौरान खाने में सिर्फ मीठा भोजन ही शामिल करें. इसके साथ ही दिन में केले, दूध और मीठे फलाहार शामिल किया जा सकता है. 

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Pauranik Katha: भगवान सूर्य की कैसे हुई उत्पत्ति, पढ़ें यह पौराणिक कथा

Pauranik Katha आज रविवार है और आज के दिन सूर्यदेव की पूजा की जाती है। सूर्यदेव और चंद्रदेव साक्षात देव माने जाते हैं। पृथ्वी पर जीवन है तो सूर्यदेव से ही है। वेदों के अनुसार सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। Surya Dev रविवार के दिन सूर्य देव का व्रत सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्रत सुख और शांति देता है. पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में भगवान सूर्य के अर्घ्यदान का विशेष महत्व बताया गया है. प्रतिदिन सुबह तांबे के लोटे में जल लेकर और उसमें लाल फूल, चावल डालकर प्रसन्न मन से सूर्य मंत्र का जाप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए. इस अर्घ्यदान से भगवान सूर्य प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन, धान्य, पुत्र, मित्र, तेज, यश, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं. सूर्य देव जीवन ऊर्जा देने वाले हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सूर्य देव का जन्म कैसे हुआ. आइए इस पौराणिक कथा से जानें कि कैसे हुआ सूर्य देव का जन्म  Surya Dev janam katha सूर्य देव की जन्म कथा: मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जब पूरे जगत में प्रकाश नहीं था तब कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से जो पहला शब्द निकला वो था ॐ। यह शब्द सूर्य के तेज का सूक्ष्म रूप था। फिर ब्रह्मा जी ने चारों मुखों से चार वेद प्रकट किए। यह चारों मिलकर ॐ के तेज में एकाकार हो गए। ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। जब सृष्टि की रचना हुई थी तब ऋषि कश्यप जो ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि के पुत्र थे, का विवाह अदिति से हुआ था। अदिति ने भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के घोर तपस्या की। उनके तप का फल यह मिला कि सुषुम्ना नाम की किरण ने उनके गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति के कठिन व्रत नहीं थमे। वो चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती रहीं। यह देख ऋषि राज कश्यप बेहद क्रोधित हुए। उन्होंने कहा कि इस अवस्था में व्रत करने से गर्भस्थ शिशु को नुकसान होगा। इस तरह शिशु मर जाएगा। तुम क्यों शिशु को मरना चाहती हो। यह सुन अदिति ने उसके गर्भ में पल रहे बालक को उदर से बाहर निकाल दिया। यह बेहद दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। इसके बाद सूर्य भगवान शिशु के रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम- अन्डम कहा जाता था। इससे ही बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है। 

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Tulsi Vivah 2023: तुलसी विवाह कब है? जानें डेट, तिथि, शुभ मुहूर्त व महत्व

Tulsi Vivah 2023:हिंदू पंचांग के अनुसार, तुलसी विवाह हमेशा देवउठनी एकादशी के दिन किया जाता है. इस दिन तुलसी माता और शालिग्राम भगवान का विवाह किया जाता है. यह हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. आइए जानते हैं इस बार तुलसी विवाह कब है और इसका क्या महत्व है. Tulsi Vivah 2023: हिंदू रीति-रिवाजों में तुलसी विवाह का विशेष महत्व है. इस दिन विष्णु भगवान के शालिग्राम स्वरुप के साथ तुलसी जी के विवाह का विधान है. मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक तुलसी माता का विवाह संपन्न कराता है उसके दांपत्य जीवन में खुशियां बनी रहती हैं. सारी मनोकामनाएं पूरी होती है और संतान सुख का भी वरदान मिलता है. पंचांग के अनुसार, तुलसी विवाह प्रति वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के एक दिन बाद रचाई जाती है. इस दिन देशभर में तुलसी विवाह का धूमधाम से आयोजन किया जाता है. इसके साथ हीं, शादी-विवाह आदि मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त की भी शुरुआत हो जाती है. तो चलिए जानते हैं इस साल तुलसी विवाह कब है और इसका क्या महत्व है. कब है तुलसी विवाह? तुलसी विवाह हर साल हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के एक दिन बाद मनाई जाती है. लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, इस बार 23 नवंबर को एकादशी है और अगले दिन 24 नवंबर को द्वादशी तिथि है. द्वदशी तिथि पर घरों में तुलसी माता और शालिग्राम भगवान का विवाह रचाने का विधान है. कहते हैं, ऐसा करने से व्यक्ति जीवन में खूब तरक्की करते हैं और भाग्य में भी वृद्धि होती है. तुलसी विवाह की शुभ मुहूर्त तुलसी विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर किया जाता है. पंचांग के अनुसार, द्वादशी तिथि 23 नवंबर, गुरुवार की शाम 9 बजकर 01 मिनट से प्रारंभ होगी. वहीं इसका समापन 24 नवंबर, शुक्रवार की शाम 7 बजकर 06 मिनट पर होगा. ऐसे में उदयातिथि को मानते हुए तुलसी विवाह 24 नवंबर को ही मनाया जाएगा. कहते हैं, इस शुभ संयोग में अपने घर तुलसी-शालिग्राम के विवाह रचाने से घर में अपार धन का आगमन होता है और वैवाहिक जीवन में भी खुशियां आती हैं. Tulsi Vivah katha तुलसी विवाह की पौराणिक कथा, जानें क्यों कराया जाता है प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह तुलसी विवाह पूजा विधि- व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और व्रत संकल्प लें।इसके बाद भगवान विष्णु की अराधना करें।अब भगवान विष्णु के सामने दीप-धूप जलाएं। फिर उन्हें फल, फूल और भोग अर्पित करें।मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु को तुलसी जरुरी अर्पित करनी चाहिए। शाम को विष्णु जी की अराधना करते हुए विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। पूर्व संध्या को व्रती को सिर्फ सात्विक भोजन करना चाहिए। व्रत के दौरान अन्न का सेवन नहीं किया जाता।व्रत खोलने के बाद ब्राहम्णों को दान-दक्षिणा दें। तुलसी विवाह सामग्री लिस्ट पूजा में मूली, शकरकंद, सिंघाड़ा, आंवला, बेर, मूली, सीताफल, अमरुद और अन्य ऋतु फल चढाएं जाते हैं।   तुलसी पूजा में लगाएं ये चीजें देवउठनी एकादशी पर पूजा स्थल में गन्नों से मंडप सजाया जाता है। उसके नीचे भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान कर मंत्रों से भगवान विष्णु को जगाने के लिए पूजा की जाती है।तुलसी विवाह के दिन व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने से जन्म और जन्म के पूर्व के पापों से मुक्ति मिल जाती है। कार्तिक मास की एकादशी को तुलसी विवाह का त्यौहार बेहद शुभ माना जाता है। तुलसी को विष्णुप्रिया नाम से भी जाना जाता है। तुलसी विवाह का महत्व Tulsi Vivah 2023 सनातन धर्म में तुलसी विवाह का खास महत्व होता है. इस दिन तुलसी माता के साथ भगवान विष्णु के शालिग्राम अवतार की शादी रचाई जाती है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से तुलसी-शालिग्राम के विवाह रचाने से जीवन में सकारात्मकता आती है. साथ ही विवाह में आ रही अड़चने भी दूर होती. कहते हैं जो व्यक्ति जीवन में एकबार भी तुलसी विवाह विधिपूर्वक कर लेता है तो उसे कन्यादान के बराबर फल मिल जाता है.

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Tulsi Vivah katha तुलसी विवाह की पौराणिक कथा, जानें क्यों कराया जाता है प्रबोधिनी एकादशी पर तुलसी विवाह

Tulsi Vivah 2023 Date : ऐसा करने से भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। क्योंकि पद्म पुराण के अनुसार तुलसी जी लक्ष्मी का ही रुप है और भगवान विष्णु ने शालग्राम का रुप लिया था। ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथा है। तुलसी और शालग्राम विवाह करवाने से घर में समृद्धि और सुख बढ़ता है। इसलिए सनातन धर्म में देवी तुलसी और भगवान शालग्राम के विवाह की परंपरा है। Tulsi Vivah poranik katha: पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक राक्षस था जिसका नाम जालंधर था। वह बहुत ही शक्तिशाली था। उसे हरा पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। उसके शक्तिशाली होने का कारण था। उसकी पत्नी वृंदा। दरअसल, उसकी पत्नी बहुत ही पतिव्रता थी। उसके प्रभाव से जालंधर को कोई भी परास्त नहीं कर पाता था। धीरे धीरे उसके उपद्रव के कारण देवतागण परेशान होने लगे। तब सभी देवतागण मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा और उन्हें सारी व्यथा सुनाई। इसके बाद समाधान यह निकाला गया की क्यों न वृंदा के सतीत्व को ही नष्ट कर दिया जाए। Tulsi Vivah 2023: तुलसी विवाह कब है? जानें डेट, तिथि, शुभ मुहूर्त व महत्व तब भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वृंदा के पास जा पहुंचे। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे। जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गई। ऋषि ने वृंदा के सामने दोनों को भस्म कर दिया। इसके बाद वृंदा ने अपने पति के बारे में पूछा जो कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के साथ युद्ध कर रहा था। ऋषि ने अपनी माया से दो वानर को प्रकट किया। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था और दूसरे के हाथ में उसका धड़। अपनी पति की ऐसी स्थिति को देखकर वृंदा मूर्छित हो गई। जब वह होश में आई जो उसने ऋषि से विनती की कि वह उसके पति को जिंदा कर दें। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपनी माया से जालंधर का सिर फिर से धड़ से जोड़ दिया। लेकिन वह साथ ही उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को भगवान के इस छल का जरा भी पता नहीं चला। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी। जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया और ऐसा होते ही वृंदा का पति युद्ध हार गया। इन सबके बारे में जब वृंदा को पता चला तो उसने क्रोध में आकर उसने भगवान विष्णु को हृदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गए। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन हो गया। इसके बाद सभी देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की वह जल्द ही भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर दें। इसके बाद वृंदा ने भगवान विष्णु को तो श्राप मुक्त कर दिया लेकिन, उसने खुद आत्मदाह कर लिया। जहां वृंदा भस्म हुई वहां तुलसी का पौधा उग गया। तब भगवान विष्णु ने कहा कि वह उनके सतीत्व का आदर करते हैं। लेकिन, वह तुलसी के रूप में सदा तुम मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक माह की देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने कहा कि जो व्यक्ति भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी विवाह Tulsi Vivah करेगा उसे इस लोक और परलोक में यश प्राप्त होगा। ऐसा कहा जाता है कि जिस घर में भी तुलसी मौजूद होती है वहां यम के दूत असमय नहीं जा सकते। मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में डालकर निकलते हैं वह पापों से मुक्ति हो जाता है और बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।

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Mata Durga:माता दुर्गा के 5 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान

हिन्दू धर्म में माता रानी का देवियों में सर्वोच्च स्थान है। उन्हें अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली आदि नामों से पुकारा जाता है। संपूर्ण भारत भूमि पर उनके सैंकड़ों मंदिर है। ज्योतिर्लिंग से ज्यादा शक्तिपीठ है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ये त्रिदेव की पत्नियां हैं। इनकी कथा के बारे में पुराणों में भिन्न भिन्न जानकारियां मिलती है। पुराणों में देवी पुराण देवी में देवी के रहस्य के बारे में खुलासा होता है। Mata Durga:शाक्त सम्प्रदाय की वह मुख्य देवी हैं। दुर्गा को आदि शक्ति, परम भगवती परब्रह्म बताया गया है। वह अंधकार व अज्ञानता रुपी राक्षसों से रक्षा करने वाली, ममतामई, मोक्ष प्रदायनी तथा कल्याणकारी हैं। उनके बारे में मान्यता है कि वे शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर आघात करने वाली राक्षसी शक्तियों का विनाश करतीं हैं। Mata durga ki kahani आखिर उन अम्बा, जगदम्बा, सर्वेश्वरी आदि के बारे में क्या रहस्य है? यह जानना भी जरूरी है। माता रानी के बारे में संपूर्ण जानकारी रखने वाले ही उनका सच्चा भक्त होता है। हालांकि यह भी सच है कि यहां इस लेख में उनके बारे में संपूर्ण जानकारी नहीं दी जा सकती, लेकिन हम इतना तो बता ही सकते हैं कि आपको क्या क्या जानना चाहिए? माता रानी कौन है? : 1.अम्बिका : शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी परब्रह्म (काल) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है। वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। पराशक्ति जगतजननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है। एकांकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। उस कालरूप सदाशिव की अर्द्धांगिनी हैं यह शक्ति जिसे जगदम्बा भी कहते हैं। 2.Mata Durga:देवी दुर्गा : हिरण्याक्ष के वंश में उत्पन्न एक महा शक्तिशाली दैत्य हुआ, जो रुरु का पुत्र था जिसका नाम दुर्गमासुर था। दुर्गमासुर से सभी देवता त्रस्त हो चले थे। उसने इंद्र की नगरी अमरावती को घेर लिया था। देवता शक्ति से हीन हो गए थे, फलस्वरूप उन्होंने स्वर्ग से भाग जाना ही श्रेष्ठ समझा। भागकर वे पर्वतों की कंदरा और गुफाओं में जाकर छिप गए और सहायता हेतु आदि शक्ति अम्बिका की आराधना करने लगे। देवी ने प्रकट होकर देवताओं को निर्भिक हो जाने का आशीर्वाद दिया। एक दूत ने दुर्गमासुर को यह सभी गाथा बताई और देवताओं की रक्षक के अवतार लेने की बात कहीं। तक्षण ही दुर्गमासुर क्रोधित होकर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र और अपनी सेना को साथ ले युद्ध के लिए चल पड़ा। घोर युद्ध हुआ और देवी ने दुर्गमासुर सहित उसकी समस्त सेना को नष्ट कर दिया। तभी से यह देवी दुर्गा कहलाने लगी। 3.Mata shati:माता सती : भगवान शंकर को महेश और महादेव भी कहते हैं। उन्हीं शंकर ने सर्वप्रथम दक्ष राजा की पुत्री दक्षायनी से विवाह किया था। इन दक्षायनी को ही सती कहा जाता है। अपने पति शंकर का अपमान होने के कारण सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में कूदकर अपनी देहलीला समाप्त कर ली थी। माता सती की देह को लेकर ही भगवान शंकर जगह-जगह घूमते रहे। जहां-जहां देवी सती के अंग और आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित होते गए। इसके बाद माता सती ने पार्वती के रूप में हिमालयराज के यहां जन्म लेकर भगवान शिव की घोर तपस्या की और फिर से शिव को प्राप्त कर पार्वती के रूप में जगत में विख्यात हुईं। Mata Durga:मां दुर्गा में हैं ये 8 प्रकार की शक्ति, जानिए भगवती के निर्माण की कथा 4.Mata parbati माता पार्वती  : माता पार्वती शंकर की दूसरी पत्नीं थीं जो पूर्वजन्म में सती थी। देवी पार्वती के पिता का नाम हिमवान और माता का नाम रानी मैनावती था। माता पार्वती को ही गौरी, महागौरी, पहाड़ोंवाली और शेरावाली कहा जाता है। माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरूपा माना गया है, लेकिन वे दुर्गा नहीं है। इन्हीं माता पार्वती के दो पुत्र प्रमुख रूप से माने गए हैं एक श्रीगणेश और दूसरे कार्तिकेय।  5.कैटभा : पद्मपुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में मधु और कैटभ नाम के दोनों भाई हिरण्याक्ष की ओर थे। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार उमा ने कैटभ को मारा था, जिससे वे ‘कैटभा’ कहलाईं। दुर्गा सप्तसती अनुसार अम्बिका की शक्ति महामाया ने अपने योग बल से दोनों का वध किया था। 6.काली : पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली सती जिसने यज्ञ में कूद कर अपनी जान दे दी थी। यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं। फिर शिव की एक तीसरी  फिर शिव की एक तीसरी पत्नी थीं जिन्हें उमा कहा जाता था। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है। उत्तराखंड में इनका एकमात्र मंदिर है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां काली है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। काली माता ने ही असुर रक्तबीज का वध किया था। इन्हें दस महाविद्याओं में से प्रमुख माना जाता है। काली भी देवी अम्बा की पुत्री थीं। 7.महिषासुर मर्दिनी : नवदुर्गा में से एक कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही रम्भासुर के पुत्र महिषासुर का वध किया था। उसे ब्रह्मा का वरदान था कि वह स्त्री के हाथों ही मारा जाएगा। उसका वध करने के बाद माता महिषसुर मर्दिनी कहलाई। एक अन्य कथा के अनुसार जब सभी देवता उससे युद्ध करने के बाद भी नहीं जीत पाए तो भगवान विष्णु ने कहा ने सभी देवताओं के साथ मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना की जाए। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के

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Mata Durga:मां दुर्गा में हैं ये 8 प्रकार की शक्ति, जानिए भगवती के निर्माण की कथा

Mata Durga वैसे इस पर्व के साथ अनेकों कथाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन मुख्यतः दुर्गा, जो शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसका इतिहास अधिक महत्त्व रखता है। कथा है कि ब्रह्माजी ने असुरों का सामना करने के लिए सभी देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति संगृहीत करके मां दुर्गा अर्थात् संघशक्ति का निर्माण किया और उसके बल पर शुंभ-निशुंभ, मधुकैटभ, महिषासुर आदि राक्षसों का अंत हुआ। मां दुर्गा की अष्टभुजा का मतलब आठ प्रकार की शक्तियों से है। शरीर-बल, विद्याबल, चातुर्यबल, धनबल, शस्त्रबल, शौर्यबल, मनोबल और धर्म-बल इन आठ प्रकार की शक्तियों का सामूहिक नाम ही दुर्गा है। मां दुर्गा ने इन्हीं के सहारे बलवान राक्षसों पर विजय पायी थी। नवरात्रि की कहानी। दुर्गा माता की कहानी। Story of Durga Mata समाज को हानि पहुंचाने वाली आसुरी शक्तियों का सामूहिक और दुष्ट व्यक्तियों का प्रतिरोध करने के लिए हमें संगठन शक्ति के साथ-साथ उक्त शक्तियों का अर्जन भी करना चाहिए। उक्त आठ शक्तियों से संपन्न समाज ही दुष्टताओं का अंत कर सकता है, समाज द्रोहियों को विनष्ट कर सकता है। दुराचारी षड्यंत्रकारियों का मुकाबला कर सकता है। दशहरा का पर्व इन शक्तियों का अर्जन करने तथा शक्ति की उपासना करने का पर्व है। स्मरण रहे संसार में कमजोर, अशक्त व्यक्ति ही पाप-बुराई को प्रोत्साहन देते हैं। जहां इस तरह के व्यक्ति अधिक होंगे, वह समाज अस्त-व्यस्त एवं नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा। वहां असुरता, अशांति अन्याय का बोलबाला होगा ही। दशहरे पर भगवान राम द्वारा रावण पर विजय की कथा भी सर्वविदित है। व्यक्ति के अंदर परिवार एवं समाज में असुर प्रवृत्तियों की वृद्धि ही अनर्थ पैदा करती है। जिन कमजोरियों के कारण उन पर काबू पाने में असफलता मिलती है, उन्हें शक्ति साधना द्वारा समाप्त करने के लिए योजना बनाने- संकल्प प्रखर करने तथा तदुनसार क्रम अपनाने की प्रेरणा लेकर यह पर्व आता है। इसका उपयोग पूरी तत्परता एवं समझदारी से किया जाना चाहिए। Mata Durga नवदुर्गा का रहस्य : नवरात्रि के नौ दिनों में जिन देवियों को पूजा जाता है उनमें से कौन सी देवी का संबंध किससे है यह जानना जरूरी है। पहली देवी शैलपुत्री को सती कहा गया है जो द‍क्ष की पुत्र थीं, जिन्होंने यज्ञ की आग में कूदकर खुद को भस्म कर लिया था। इसके बाद उन्होंने ही ब्रह्मचारिणी के रूप में दूसरा जन्म लिया और वे ही बाद में स्कंद (कार्तिकेय) की माता कहलाई। कठोरतप करने के कारण जब उनका वर्ण काला पड़ गया तब शिव ने प्रसंन्न होकर इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। यही माता हिमालय की पुत्री होने के कारण पार्वती कहलायी।

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