Chhath Vrat Katha छठ पूजा की पौराणिक तथा व्रत कथा: द्रौपदी ने रखा था छठ का व्रत

Chhath Vrat Katha छठ व्रत कथा  दिवाली के 6 दिन बाद छठ मनाया जाता है। छठ के महाव्रत को करना अत्यंत पुण्यदायक है। छठ व्रत सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को होता है। सूर्योपासना का यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। छठ पर्व के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं, किन्तु पौराणिक शास्त्रों में इसे देवी द्रोपदी से जौड़कर देखा जाता है।मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इसी तरह छठ का व्रत करने से लोगों के घरों में समृद्धि और सुख आता है। छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में छठ का महत्व है। छठ पूजा या सूर्य षष्ठी या छठ व्रत में सूर्य भगवान की पूजा होती है और धरती पर लोगों के सुखी जीवन के लिए सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। सूर्य देव को ऊर्जा और जीवन शक्ति का देवता माना जाता है। इसलिए छठ पर्व पर समृद्धि के लिए पूजा की जाती है।  सूर्य की पूजा से विभिन्न बीमारियों का इलाज संभव है। सूर्य पूजा के साथ स्नान किया जाता है। इससे कुष्ठ रोग जैसी गंभीर रोग भी दूर हो जाते हैं। छठ पर्व परिवार के सदस्यों और मित्रों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए भी मनाया जाता है। * एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग * एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। * कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। * एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।  इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।  Chhath Vrat Katha छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है।  छठ व्रत पूजा विधि छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं। जिनकी पूजा के लिए छठ मनाया जाता है। छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। छठी मैया का ध्यान करते हुए लोग मां गंगा-यमुना या किसी नदी के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इसमें सूर्य की पूजा अनिवार्य है साथ ही किसी नदी में स्नान करना भी। इस पर्व में पहले दिन घर की साफ सफाई की जाती है। छठ पर्व पर गांवों में अधिक सफाई देखने को मिलती है। छठ के चार दिनों तक शुद्ध शाकाहारी भोजन किया जाता है, दूसरे दिन खरना का कार्यक्रम होता है, तीसरे दिन भगवान सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन भक्त उदियमान सूर्य को उषा अर्घ्य देते हैं। छठ के दिन अगर कोई व्यक्ति व्रत को करता है तो  वह अत्यंत शुभ और मंगलकारी होता है। पूरे भक्तिभाव और विधि विधान से छठ व्रत करने वाला व्यक्ति सुखी और साधनसंपन्न होता है। साथ ही निःसंतानों को संतान प्राप्ति होती है। छठ व्रत अनुष्ठान विधि छठ के दिन सूर्योदय में उठना चाहिए।  व्यक्ति को अपने घर के पास एक झील, तालाब या नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद नदी के किनारे खड़े होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता को नमन करें और विधिवत पूजा करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सूर्य को धुप और फूल अर्पण करें। छठ पूजा में सात प्रकार के फूल, चावल, चंदन, तिल आदि से युक्त जल को सूर्य को अर्पण करें। सर झुका कर प्रार्थना करते हुए ॐ घृणिं सूर्याय नमः, ॐ घृणिं सूर्य: आदित्य:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा,  या फिर ॐ सूर्याय नमः 108 बार बोलें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन

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Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग

Chhath Puja 2023 kab hai: छठ पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। महिलाएं छठ के दौरान लगभग 36 घंटे का व्रत रखती हैं। छठ के दौरान छठी मईया और सूर्यदेव की पूजा की जाती है। Chhath Puja 2023 Date: हिंदू धर्म में हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। छठ पूजा की शुरुआत नहाए खाय से होती है और अगले दिन खरना मनाया जाता है। छठ पूजा का त्योहार बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत देश कई हिस्सों में धूमधाम के साथ मनाते हैं। मान्यता है कि छठ पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि व खुशहाली का आगमन होता है।  Chhath Vrat Katha छठ पूजा की पौराणिक तथा व्रत कथा: द्रौपदी ने रखा था छठ का व्रत द्रौपदी भी करती थीं छठ पूजा: छठ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना गया है। महाभारत काल में द्रौपदी ने भी छठ पूजा की थी। खरना के दिन शाम में पूजा करने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर लगातार 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। छठ पूजा 2023 की प्रमुख तिथियां: 17 नवंबर को नहाय खाए किया जाएगा। 18 नवंबर को खरना मनाया जाएगा। 19 नवंबर को छठ पूजा की जाएगी। इस दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और इसी के साथ छठ पूजा का समापन व व्रत पारण किया जाएगा। कब है नहाय-खाय 2023? लोक आस्था का यह महापर्व चार दिन तक चलता है। इसका पहला दिन नहाय-खाय होता है। इस साल नहाय-खाय 17 नवंबर को है। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 45 मिनट पर होगा। वहीं सूर्यास्त शाम 05 बजकर 27 मिनट पर होगा।  छठ पूजा 2023 पर संध्या अर्घ्य का समय छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य का होता है। इस दिन छठ पर्व की मुख्य पूजा की जाती है। इस दिन व्रती घाट पर आते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य 19 नवंबर को दिया जाएगा। 19 नवंबर को सूर्यास्त शाम 05 बजकर 26 मिनट पर होगा। Chhath Puja 2023 छठ पूजा पर उगते सूर्य को अर्घ्य देने का समय चौथा दिन यानी सप्तमी तिथि छठ महापर्व का अंतिम दिन होता है। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और व्रत का पारण का होता है। इस साल 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 06 बजकर 47 मिनट पर होगा।  छठ पूजा कैलेंडर 2023 छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय 17 नवंबर, दिन शुक्रवार छठ पूजा का दूसरा दिन खरना (लोहंडा) 18 नवंबर, दिन शनिवार छठ पूजा का तीसरा दिन छठ पूजा, संध्या अर्घ्य 19 नवंबर, दिन रविवार छठ पूजा का चौथा दिन उगते सूर्य को अर्घ्य, पारण 20 नवंबर, दिन सोमवार

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Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज 2023 में कब? 14 या 15 नंवबर जानें भाई दूज ही सही डेट

Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व भाई बहन के पवित्र रिश्ते है प्रतीक है. कार्तिक मास में मनाया जाने वाला ये पर्व दिवाली के दूसरे दिन आता है. आइये जानते हैं साल 2023 में किस दिन पड़ेगा भाई दूज. Bhai Dooj 2023 Date: भाई दूज का पर्व कार्तिक मास में दिवाली के बाद मनाया जाता है. कार्तिक मास में हिंदू धर्म में बहुत से त्योहार पड़ते हैं.करवाचौथ, धनतेरस, दिवाली, छठ पूजा आदि. इसी मास में भाई दूज का पर्व भी पड़ता है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की  द्वितीया तिथि को मनाया जाता है. भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है. साल 2023 में किस दिन मनाई जाएगा भाई दूज का पर्व आइये जानते हैं. भाई दूज भाई बहन का पवित्र त्योहार है. इस दिन बहने अपने भाईयों को टीका करती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती है. साल 2023 में भाई दूज 15 नंवबर के दिन मनाया जाएगा. Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त भाई दूज की सही डेट (When is Bhai Dooj in 2023?) इस लिहाज से आप दोनों ही दिन भाई दूज का पर्व मना सकते हैं. 14 नंवबर को दोपहर के बाद से आप टीका कर सकते हैं. ये पर्व भाई- बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है. इस दिन भाई अपने बहन के पास जाकर टीका करवाते हैं. 15 नवंबर 2023 को क्यों मनाई जाएगी भाई दूज?हिंदू धर्म में कोई भी त्योहार उदया तिथि पर ही मनाया जाता है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार भाई दूज का पर्व 15 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा। इस दिन भाई को टीका करने के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 10 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 05 मिनट तक है। तिलक करने की विधिपौराणिक मान्यता है कि इस दिन यम अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे। ऐसे में भाईयों को अपनी बहन के ससुराल जाना चाहिए। वहीं कुंवारी लड़कियां घर पर ही भाई का तिलक करें। भाई दूज के दिन सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करते हुए पूजा अवश्य करनी चाहिए। वहीं भाई का तिलक करने के लिए पहले थाली तैयार करें उसमें रोली, अक्षत और गोला रखें तत्पश्चात भाई का तिलक करें और गोला भाई को दें। फिर प्रेमपूर्वक भाई को मनपसंद का भोजन करवाएं। उसके बाद भाई अपनी बहन से आशीर्वाद लें और उन्हें भेंट स्वरूप कुछ उपहार जरूर दें। भाई दूज का महत्व हिंदू धर्म में भाई दूज के पर्व को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि ये पर्व भाइयों और बहनों के बीच के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। भाई दूज पर बहनें अपने भाई के माथे पर हल्दी और रोली का तिलक लगाती हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि भाई बहन यमुना नदी के किनारे बैठकर भोजन करते हैं तो जीवन में समृद्धि आती है। कैसे करें भाई दूज पर पूजा ? (Kaise Karen Bhai Dooj Par Pooja)भाई दूज पर बहने अपने भाईयों को टीका लगाती है. टीका लगाने के बाद भाई की आरती उतारती हैं. ऐसा माना जाता है कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर टीका किया और भोजन कराया था और इसी पूजा के बाद यमराज को सुख की प्राप्ति हुई. तभी से भाई दूज मनाने की परंपरा चली आ रही है. इसीलिए इस दिन को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है.

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Dhanteras 2023: 10 या 11 नवंबर को, कब है धनतेरस? नोट कर लें सही डेट, पूजाविधि और खरीदारी का शुभ मुहूर्त

Dhanteras Kab Hai 2023: हिन्दू धर्म दिवाली या दीपावली खुशियों का त्योहार हर साल की तरह इस साल 2023 में बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा. दिवाली दीपों का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है. हर लोग इस दिन का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते हैं. हर साल दिवाली के मौके पर दीपोत्सव का यह पर्व पूरे पांच दिनों तक मनाया जाता है. जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है. धनतेरस का पर्व छोटी दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है. पंचांग के मुताबिक, धनतेरस का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन धन्वंतरि देव, लक्ष्मी जी और कुबेर महाराज की पूजा-अर्चना की जाती है. साथ ही किसी भी वस्तु की खरीदारी के लिए यह दिन उत्तम माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि हर साल दिवाली के पर धनतेरस के दिन खरीदी गई चल-अचल संपत्ति में तेरह गुना बढ़ोतरी होती है. इसी वजह से लोग इस दिन बर्तनों की खरीदारी के अलावा सोने-चांदी की चीजें भी खरीदते हैं. ऐसे में चलिए जानते हैं इस साल धनतेरस कब है. पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त क्या है… Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त Dhanteras 2023:कब है धनतेरस? धनतेरस का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनया जाता है. इस साल (Dhanteras 2023 )धनतेरस की तिथि 10 नवंबर को दोपहर 12:35 बजे से शुरू होगी और अगले दिन 11 नवंबर को दोपहर 01:57 बजे समाप्त होगी. बता दें कि धनतेरस के दिन प्रदोष काल में पूजा होती है, इसलिए धनतेरस 10 नवंबर को ही मनाई जाएगी. शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06:02 बजे से रात 08:00 बजे तक रहेगा. यानी पूजा के लिए आपके पास करीब 01 घंटा 58 मिनट तक का समय रहेगा. Dhanteras 2023 धनतेरस का शुभ मुहूर्त: हर साल कार्तिक माह कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल 10 नवंबर 2023 को दोपहर 12 बजकर 35 मिनच से धनतेरस की शुरुआत होगी और 11 नवंबर 2023 को दोपहर 1 बजकर 57 मिनट पर इसका समापन होगा। इसलिए उदया तिथि के अनुसार, इस बार 10 नवंबर को ही धनतेरस मनाया जाएगा। धनतेरस की खरीदारी का शुभ मुहूर्त: धनतेरस के दिन दोपहर 2 बजकर 35 मिनट से लेकर 11 नवंबर 2023 को सुबह 6 बजकर 40 मिनट तक खरीदारी का शुभ मुहूर्त बन रहा है। धनतेरस के मौके पर सोना-चांदी और बर्तन की खरीदारी बेहद शुभ माना जाता है। Dhanteras 2023 पूजा का शुभ मुहूर्त: पंचांग के अनुसार, धनतेरस में पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 45 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगा। इस शुभ मुहूर्त में, लक्ष्मी, गणेश, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की पूजा-अराधना का बड़ा महत्व होता है। धनतेरस की पूजाविधि: धनतेरस के दिन पूजा के शुभ मुहूर्त में उत्तर दिशा में गणेश-लक्ष्मी, कुबेर देवता और धन्वंतरि देव की प्रतिमा स्थापित करें। अब मंदिर में दीपक जलाएं और विधिवत सभी देवी-देवताओं की पूजा करें। उन्हें धूप, दीप, फल, फूल, अक्षत, चंदन,इत्र, मिठाई समेत सभी पूजा सामग्री अर्पित करें। इसके बाद कुबरे देवता के मंत्र ऊँ ह्रीं कुबेराय नमः का जाप करें। धन्वंतरि स्तोत्र का पाठ करें। इसके साथ ही माता लक्ष्मी की मंत्रों का जाप करें और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए सभी देवी-देवताओं का ध्यान करें।

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Kartik Maas:कार्तिक मास व्रत कथा, इसके पाठ से मिलती है लक्ष्मी नारायण की कथा

कार्तिक मास में भगवान विष्णु धरती पर जल में वास करते हैं। इसलिए इस महीने में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। 29 अक्टूबर से कार्तिक मास का आरंभ हो गया है। कार्तिक मास में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको इस कथा का रोजाना पाठ करना चाहिए। नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी हजार सनकादि ऋषियों से कहा: अब मैं आपको कार्तिक मास (Kartik Maas )की कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूं, जिसका श्रवण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त समय में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। सूतजी ने कहा: श्रीकृष्ण जी से अनुमति लेकर देवर्षि नारद के चले जाने के पश्चात। सत्यभामा प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण से बोली: हे प्रभु! मैं धन्य हुई, मेरा जन्म सफल हुआ, मुझ जैसी त्रौलोक्य सुन्दरी के जन्मदाता भी धन्य हैं, जो आपकी सोलह हजार स्त्रियों के बीच में आपकी परम प्यारी पत्नी बनी। मैंने आपके साथ नारद जी को वह कल्पवृक्ष आदिपुरुष विधिपूर्वक दान में दिया, परन्तु वही कल्पवृक्ष मेरे घर लहराया करता है। यह बात मृत्युलोक में किसी स्त्री को ज्ञात नहीं है। Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त हे त्रिलोकीनाथ! मैं आपसे कुछ पूछने की इच्छुक हूं। आप मुझे कृपया कार्तिक माहात्म्य की कथा विस्तारपूर्वक सुनाइये जिसको सुनकर मेरा हित हो और जिसके करने से कल्पपर्यन्त भी आप मुझसे विमुख न हों।सूतजी आगे बोले: सत्यभामा के ऐसे वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने हंसते हुए सत्यभामा का हाथ पकड़ा और अपने सेवकों को वहीं रुकने के लिए कहकर विलासयुक्त अपनी पत्नी को कल्पवृक्ष के नीचे ले गये फिर हंसकर बोले: हे प्रिये! सोलह हजार रानियों में से तुम मुझे प्राणों के समान प्यारी हो। तुम्हारे लिए मैंने इन्द्र और देवताओं से विरोध किया था। हे कान्ते! जो बात तुमने मुझसे पूछी है, उसे सुनो। Kartik Maas एक दिन मैंने(श्रीकृष्ण) तुम्हारी(सत्यभामा) इच्छापूर्ति के लिए गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक जाकर कल्पवृक्ष मांगा। इन्द्र द्वारा मना किए जाने पर इन्द्र और गरुड़ में घोर युद्ध हुआ और गौ लोक में भी गरुड़ जी गौओं से युद्ध किया। गरुड़ की चोंच की चोट से उनके कान एवं पूंछ कटकर गिरने लगे जिससे तीन वस्तुएं उत्पन्न हुई। कान से तम्बाकू, पूँछ से गोभी और रक्त से मेहंदी बनी। इन तीनों का प्रयोग करने वाले को मोक्ष नहीं मिलता तब गौओं ने भी क्रोधित होकर गरुड़ पर वार किया जिससे उनके तीन पंख टूटकर गिर गये। इनके पहले पंख से नीलकण्ठ, दूसरे से मोर और तीसरे से चकवा-चकवी उत्पन्न हुए। हे प्रिये! इन तीनों का दर्शन करने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त हो जाता है। यह सुनकर सत्यभामा ने कहा: हे प्रभो! कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों के विषय में बताइए कि मैंने पूर्व जन्म में कौन-कौन से दान, व्रत व जप नहीं किए हैं। मेरा स्वभाव कैसा था, मेरे जन्मदाता कौन थे और मुझे मृत्युलोक में जन्म क्यों लेना पड़ा। मैंने ऎसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मैं आपकी अर्द्धांगिनी हुई? श्रीकृष्ण ने कहा: हे प्रिये! अब मै तुम्हारे द्वारा पूर्व जन्म में किए गए पुण्य कर्मों को विस्तारपूर्वक कहता हूं, उसे सुनो। पूर्व समय में सतयुग के अन्त में मायापुरी में अत्रि-गोत्र में वेद-वेदान्त का ज्ञाता देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह प्रतिदिन अतिथियों की सेवा, हवन और सूर्य भगवान का पूजन किया करता था। वह सूर्य के समान तेजस्वी था। वृद्धावस्था में उसे गुणवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। उस पुत्रहीन ब्राह्मण ने अपनी कन्या का विवाह अपने ही चन्द्र नामक शिष्य के साथ कर दिया। वह चन्द्र को अपने पुत्र के समान मानता था और चन्द्र भी उसे अपने पिता की भांति सम्मान देता था। Kartik Maas एक दिन वे दोनों कुश व समिधा लेने के लिए जंगल में गये। जब वे हिमालय में भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें एक राक्षस आता हुआ दिखाई दिया। उस राक्षस को देखकर भय के कारण उनके अंग शिथिल हो गये और वे वहां से भागने में भी असमर्थ हो गये तब उस काल के समान राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। चूंकि वे धर्मात्मा थे इसलिए मेरे पार्षद उन्हें मेरे वैकुण्ठ धाम में मेरे पास ले आये। उन दोनों द्वारा आजीवन सूर्य भगवान की पूजा किये जाने के कारण मैं दोनों पर अति प्रसन्न हुआ। गणेश जी, शिवजी, सूर्य व देवी, इन सबकी पूजा करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मैं एक होता हुआ भी काल और कर्मों के भेद से पांच प्रकार का होता हूं। जैसे- एक देवदत्त, पिता, भ्राता, आदि नामों से पुकारा जाता है। जब वे दोनों विमान पर आरुढ़ होकर सूर्य के समान तेजस्वी, रूपवान, चन्दन की माला धारण किये हुए मेरे भवन में आये तो वे दिव्य भोगों को माता लक्ष्मी के प्रमुख मंदिर : पद्मावती मंदिर तिरुचुरा, लक्ष्मीनारायण मंदिर वेल्लूर, महालक्ष्मी मंदिर मुंबई, लक्ष्मीनारायण मंदिर दिल्ली, लक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर, अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई, अष्टलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद, लक्ष्मी-कुबेर मंदिर वडलूर (चेन्नई), लक्ष्मीनारायण मंदिर जयपुर, महालक्ष्मी मंदिर इंदौर, श्रीपुरम् का स्वर्ण मंदिर तमिलनाडु, पचमठा मंदिर जबलपुर आदि।

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Rama ekadashi vrat katha : रमा एकादशी के दिन जरूर करें व्रत कथा का पाठ, हर मनोकामना होगी पूरी

हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत रखा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस व्रत में विधिवत पूजा करने के साथ-साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। रमा एकादशी Vrat katha एक समय की बात है कि मुचकुंद नाम का एक सत्यवादी तथा विष्णु भक्त राजा था। राजा ने अपनी प्यारी सी बेटी चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से किया था। राजा मुचुकुंद एकादशी का व्रत विधिवत तरीके से करता है। इतना ही नहीं उसकी प्रजा भी एकादशी के नियमों का अच्छी तरह से पालन करती थी। एक बार कार्तिक मास के दौरान सोभन ससुराल आया। उस दिन रमा एकादशी का व्रत था। राजा ने घोषणा कर दी कि सभी लोग रमा एकादशी का व्रत नियम पूर्वक करें। राजा की पुत्री चंद्रभागा को लगा कि ऐसे में उसके पति को अधिक पीड़ा होगी क्योंकि वह कमजोर हृदय का है। जब सोभन ने राजा का आदेश सुना तो पत्नी के पास आया और इस व्रत से बचने का उपाय पूछा। उसने कहा कि यह व्रत करने से वह मर जाएगा। इस पर चंद्रभागा ने कहा कि इस राज्य में रमा एकादशी के दिन कोई भोजन नहीं करता है। यदि आप व्रत नहीं कर सकते हैं तो दूसरी जगह चले जाएं। इस पर सोभन ने कहा कि वह मर जाएगा लेकिन दूसरी जगह नहीं जाएगा, वह व्रत करेगा। उसने रमा एकादशी व्रत किया, लेकिन भूख से उसका बुरा हाल हो गया था। रमा एकादशी की रात्रि के समय जागर भी ण था, वह रात सोभन के लिए असहनीय थी। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व ही भूखे सोभन की मौत हो गई। ऐसे में  राजा मुचकुंद ने अपने दामाद सोभन का शव को जल प्रवाह करा दिया था और अपनी बेटी को सती न होने का आदेश दिया। उसने बेटी से भगवान विष्णु पर आस्था रखने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर बेटी ने व्रत को पूरा किया। उधर रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से सोभन जीवित हो गया और उसे विष्णु कृपा से मंदराचल पर्वत पर देवपुर नामक उत्तम नगर मिला। राजा सोभन के राज्य में स्वर्ण, मणियों, आभूषण की कोई कमी न थी। एक दिन राजा मुचकुंद के नगर का एक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करते हुए सोभन के नगर में पहुंचा। जहां उसने राजा सोभन से मुलाकात की। राजा ने अपनी पत्नी चंद्रभागा तथा ससुर मुचकुंद के बारे में पूछा। ब्राह्मण ने कहा कि वे सभी कुशल हैं। आप बताएं, रमा एकादशी का व्रत करने के कारण आपकी मृत्यु हो गई थी। अपने बारे में बताएं। फिर आपको इतना सुंदर नगर कैसे प्राप्त हुआ? तब सोभन ने कहा कि यह सब रमा एकादशी व्रत का फल है, लेकिन यह अस्थिर है क्योंकि वह व्रत विवशता में किया था। जिस कारण अस्थिर नगर मिला, लेकिन चंद्रभागा इसे स्थिर कर सकती है। उस ब्राह्मण ने सारी बातें चंद्रभागा से कही। तब चंद्रभागा ने कहा कि यह स्वप्न तो नहीं है। ब्राह्मण ने कहा कि नहीं, वह प्रत्यक्ष तौर पर देखकर आया है। उसने चंद्रभागा से कहा कि तुम कुछ ऐसा उपाय करो, जिससे वह नगर स्थिर हो जाए। तब चंद्रभागा ने उसे देव नगर में जाने को कहा। उसने कहा कि वह अपने पति को देखेंगी और अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर कर देगी। तब ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत पर वामदेव के पास ले गया। वामदेव ने उसकी कथा सुनकर उसे मंत्रों से अभिषेक किया। फिर चंद्रभागा ने व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण किया और सोभन के पास गई। सोभन ने उसे सिंहासन पर अपने पास बैठाया। फिर चंद्रभागा ने पति को अपने पुण्य के बारे में सुनाया। उसने कहा कि वह अपने मायके में 8 वर्ष की आयु से ही नियम से एकादशी व्रत कर रही हैं। उस व्रत के प्रभाव से यह नगर स्थिर हो जाएगा तथा यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। दिव्य देह धारण किए चंद्रभागा अपने पति सोभन के साथ उस नगर में सुख पूर्वक रहने लगी।

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Rama Ekadashi 2023:रमा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, जानिए महत्व

कार्तिक माह में 2 एकादशी आती है। रमा एकादशी और देवउठनी एकादशी। रमा एकादशी कृष्ण पक्ष में आती है और देवउठनी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार रमा एकादशी का व्रत 09 नवंबर 2023 को गुरुवार को रखी जाएगी। रमा एकादशी को रमा क्यों कहते हैं और क्या है इसका महत्व।  Rama Ekadashi kab hai:रामा एकादशी 2023 कब है रमा एकादशी गुरुवार, 09 नवंबर 2023 को है। एकादशी 08 नवंबर 2023 को सुबह 08:23 बजे से शुरू होकर 09 नवंबर 2023 को सुबह 10:40 बजे समाप्त होगी। माता लक्ष्मी और भगवान् श्री विष्णु की पूजा करने का विधान है, ऐसा माना जाता है की इस व्रत और पूजा के करने से माता लक्ष्मी अति प्रसन्न होती है,और वे अपने भक्तो की सभी मनोकामना को पूर्ण करती है। Rama Ekadashi:रमा एकादशी का महत्व रमा का एकादशी : माता लक्ष्मी के रमा स्वरूप को इस दिन पूजा जाता है। रमा के साथ ही श्री हरि विष्णु के पूर्णावता केशव स्वरूप की पूजा भी होती है। यह चातुर्मास की अंतिम एकादशी है। Rama Ekadashi 2023: कार्तिक माह में 2 एकादशी आती है। रमा एकादशी और देवउठनी एकादशी। रमा एकादशी कृष्ण पक्ष में आती है और देवउठनी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार रमा एकादशी का व्रत 09 नवंबर 2023 को गुरुवार को रखी जाएगी। रमा एकादशी को रमा क्यों कहते हैं और क्या है इसका महत्व। 

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Rohini Vrat 2023: रोहिणी व्रत पर हो रहा है दुर्लभ ‘भद्रावास’ योग का निर्माण, प्राप्त होगा अक्षय फल

रोहिणी व्रत के दिन सर्वप्रथम वणिज करण का निर्माण हो रहा है। वणिज करण सुबह 09 बजकर 51 मिनट तक है। इसके बाद विष्टि करण का निर्माण हो रहा है जो रात 09 बजकर 30 मिनट तक है। इस दौरान कोई भी शुभ काम करने की मनाही होती है। वहीं रात्रि में 09 बजकर 30 मिनट के बाद बव करण का निर्माण हो रहा है। 1 अक्टूबर को रोहिणी व्रत है। यह दिन भगवान वासुपूज्य स्वामी को समर्पित होता है। अतः विधि विधान और श्रद्धा भाव से भगवान वासुपूज्य स्वामी की पूजा की जाती है। साथ ही विशेष कार्य में सफलता पाने हेतु व्रत भी रखा जाता है। स्त्री और पुरुष दोनों रोहिणी व्रत कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य प्रताप से विवाहित महिलाओं को सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ज्योतिषियों की मानें तो रोहिणी व्रत पर दुर्लभ भद्रावास का निर्माण हो रहा है। आइए, शुभ मुहूर्त और शुभ योग जानते हैं Rohini Vrat 2023 Kab hai शुभ मुहूर्त कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया 31 अक्टूबर को रात 09 बजकर 30 मिनट तक है। इसके पश्चात, चतुर्थी शुरू हो जाएगी। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। Rohini Vrat 2023 भद्रावास योग कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को दुर्लभ ‘भद्रावास’ का निर्माण हो रहा है। इस योग का निर्माण सुबह 09 बजकर 51 मिनट से लेकर रात्रि 09 बजकर 30 मिनट तक है। इस दौरान वासुपूज्य की पूजा करने से अक्षय फल की प्राप्ति होगी। धार्मिक मान्यता है कि भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव जंतु, पशु पक्षी, मानव जगत का कल्याण होता है। करण रोहिणी व्रत के दिन सर्वप्रथम वणिज करण का निर्माण हो रहा है। वणिज करण सुबह 09 बजकर 51 मिनट तक है। इसके बाद विष्टि करण का निर्माण हो रहा है, जो रात 09 बजकर 30 मिनट तक है। इस दौरान कोई भी शुभ काम करने की मनाही होती है। वहीं, रात्रि में 09 बजकर 30 मिनट के बाद बव करण का निर्माण हो रहा है। बव और वणिज दोनों करण शुभ माने जाते हैं। इस योग में मां की पूजा करने से साधक को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है।

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Chandra Grahan 2023 date, time in India: भारत में कल कितने बजे लगेगा चंद्र ग्रहण? जानें सूतक काल लगेगा या नहीं

Chandra Grahan 2023 on 28 October, date, time in India: साल का दूसरा चंद्र ग्रहण 28-29 अक्टूबर की मध्यरात्रि, शनिवार को लगने जा रहा है. यह चंद्र ग्रहण मेष राशि में लगेगा. साथ ही यह चंद्र ग्रहण भारत में भी दिखाई देगा और इसका असर देश दुनिया और मानव जीवन पर पड़ेगा. तो आइए जानते हैं कि साल 2023 के दूसरे चंद्र ग्रहण का सूतक मान्य होगा या नहीं. Chandra Grahan 2023 कब है: साल का पहला चंद्र ग्रहण लग चुका है. साल का दूसरा चंद्र ग्रहण 28 और 29 अक्टूबर की मध्यरात्रि को लगने जा रहा है. साथ ही इस दिन शरद पूर्णिमा भी है. ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण लगना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस बार लगने वाला चंद्र ग्रहण आंशिक होगा. यह ग्रहण मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में लगने जा रहा है. साल 2023 के आखिरी चंद्र ग्रहण को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये चंद्र ग्रहण भारत में दिखेगा और आखिर क्या इसका समय होगा. चलिए जानते हैं.  भारत में 28 अक्टूबर को कितने बजे लगेगा चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2023 kitne baje lagega in India) ज्योतिष की मानें तो विश्व परिदृश्य में एक ही महीने में लगने वाले दो ग्रहण उत्पातकारी योग लेकर आए हुए है. इस महीने 28-29 अक्टूबर की रात में लगने वाला चंद्र ग्रहण पूरे भारतवर्ष में दृष्टिगोचर होगा. वैसे तो 28 अक्टूबर की रात 11.30 बजे से चांद पर हल्की छाया पड़ना शुरू हो जाएगी. इसे चंद्र ग्रहण का पेनब्रा स्टेज भी कहा जाता है. हालांकि, सूतक काल इसके हिसाब से नहीं बल्कि गहरी छाया पड़ने के 9 घंटे पहले ही माना जाता है. चंद्र ग्रहण के मुख्य चरण (अम्ब्रा स्टेज) या गहरी छाया पड़ने की बात की जाए तो ये 29 अक्टूबर की रात 1 बजकर 5 मिनट से शुरू होकर 2 बजकर 24 मिनट पर खत्म होगा यानी ये एक घंटा 19 मिनट का होगा. ग्रहण का आरंभ मध्य रात्रि 1 बजकर 5 मिनट, मध्य 1 बजकर 44 मिनट और ग्रहण का मोक्ष 2 बजकर 40 मिनट पर होगा.  यह ग्रहण मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में लगने जा रहा है. ग्रहण जब भी लगता है तो इसका भौतिक, आध्यात्मिक और व्यक्तिगत जीव-जगत पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है.  चंद्र ग्रहण के सूतक काल की टाइमिंग (Chandra Grahan 2023 sutak timings) 28-29 अक्टूबर को खंडग्रास चंद्र ग्रहण चूंकि रात 1 बजकर 5 मिनट पर लग रहा है इसलिए इसका सूतक काल 9 घंटे पहले यानी 28 अक्टूबर की शाम 04 बजकर 05 मिनट से लग जाएगा.  कहां कहां दिखेगा ये चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2023 When and where to watch)   यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखेगा देगा. इस साल का दूसरा चंद्र ग्रहण यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, नॉर्थ अमेरिका, उत्तर व पूर्व दक्षिण अमेरिका, अटलांटिक महासागर, हिन्द महासागर, अंटार्कटिका में भी दिखेगा. साल का आखिरी चंद्र ग्रहण कितने बजे से शुरू होगा: साल का आखिरी चंद्र ग्रहण भारत में 28 अक्टूबर की रात 01 बजकर 06 मिनट पर शुरू होगा और सुबह 02 बजकर 22 मिनट पर समाप्त होगा। ग्रहण 1 घंटे और 19 मिनट तक रहेगा चंद्र ग्रहण कहां-कहां दिखाई देगा: चंद्र ग्रहण को भारत के अलावा  पश्चिमी प्रशांत महासागर, ऑस्ट्रेलिया, एशिया, यूरोप, अफ्रीका, पूर्वी दक्षिण अमेरिका, उत्तरपूर्वी उत्तरी अमेरिका, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर में भी देखा जा सकेगा। चंद्र ग्रहण कब लगता है: चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन ही होता है जब पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य के बीच आ जाती है। पृथ्वी की छाया चंद्रमा की सतह पर पड़ती है, जिससे यह कुछ घंटों के लिए धुंधला हो जाता है और कभी-कभी लाल रंग का भी दिखाई देने लगता है।  चंद्र ग्रहण का सूतक काल कब से शुरू होगा: चंद्र ग्रहण का सूतक काल 09 घंटे पूर्व से प्रारंभ हो जाता है। इस चंद्र ग्रहण का सूतक काल 28 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 52 मिनट पर प्रारंभ होगा। किस समय चंद्र ग्रहण होगा अपने चरम पर: साल का आखिरी चंद्र ग्रहण यानी परमग्रास चंद्र ग्रहण 28 अक्टूबर की देर रात 01:44 बजे अपने चरम पर होगा। भारत के किन शहरों में दिखेगा चंद्र ग्रहण: साल का आखिरी चंद्र ग्रहण नई दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु, अहमदाबाद, कोलकाता और वाराणसी में दिखाई देगा।  

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 Durga mata:जानिए कैसे हुआ मां दुर्गा का जन्म और कहां से मिली इतनी शक्तियां

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार दुर्गा अपने पूर्व जन्म में प्रजापति रक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। जब दुर्गा का नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं को भाग लेने हेतु आमंत्रण भेजा, किन्तु भगवान शंकर को आमंत्रण नहीं भेजा।सती के अपने पिता का यज्ञ देखने और वहां जाकर परिवार के सदस्यों से मिलने का आग्रह करते देख भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती के पिता ने भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा जानिए कौन-कौन से शुभ काम कर सकते हैं चैत्र नवरात्रि पर अगले जन्म में सती ने नव दुर्गा का रूप धारण कर जन्म लिया। जब देव और दानव युद्ध में देवतागण परास्त हो गये तो उन्होंने आदि शक्ति का आवाहन किया और एक एक करके उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने युद्ध भूमि में उतरकर अपनी रणनीति से धरती और स्वर्ग लोक में छाए हुए दानवों का संहार किया। जानिए कौन-कौन से शुभ काम कर सकते हैं चैत्र नवरात्रि पर अगले जन्म में सती ने नव दुर्गा का रूप धारण कर जन्म लिया। जब देव और दानव युद्ध में देवतागण परास्त हो गये तो उन्होंने आदि शक्ति का आवाहन किया और एक एक करके उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने युद्ध भूमि में उतरकर अपनी रणनीति से धरती और स्वर्ग लोक में छाए हुए दानवों का संहार किया। शारदीय नवरात्रि 10 अक्टूबर से आरम्भ होने वाले हैं। नौ दिनों तक माता दुर्गा के भक्त उनकी पूजा-आराधना में लीन रहेंगे। शारदीय नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाएगी। लेकिन क्या आप जानते है किन विशेष परिस्थितियों में मां दुर्गा को जन्म लेने पड़ा। पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ दुर्गा का जन्म राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ था। दैत्यराज ने वरदान में मिली अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर सभी देवी-देवताओं को परेशान कर रखा था। तब सभी देवी-देवता इस राक्षस से बचने के लिए ब्रह्राा जी के पास पहुंचे। देवताओं की समस्या को सुनकर तब ब्रह्मा जी ने बताया कि दैत्यराज का अंत किसी कुंवारी कन्या के हाथों से ही संभव है। तब सभी देवता ने मिलकर अपने तेज से देवी के विभिन्न अंगों का निर्माण किया। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्ष, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पौरों की ऊंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र। नवरात्रि की कहानी। दुर्गा माता की कहानी। Story of Durga Mata देवी देवताओं ने प्रदान किए अस्त्रदेवी की शरीर संरचना के बाद सभी देवी-देवताओं ने अलग-अलग शक्तियां भी दी। शिवजी ने शक्ति को त्रिशूल दिया वही विष्णु ने चक्र तो लक्ष्मीजी ने कमल का फूल दिया। इसके अलावा अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमानजी ने गदा, शेषनागजी ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया। इसके अलावा मां दुर्गा की 18 भुजाओं में विभिन्न देवी देवताओं ने अपने आभूषण भेंट किये।

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नवरात्रि की कहानी। दुर्गा माता की कहानी। Story of Durga Mata

उत्तर भारत में यह पर्व नवरात्रि के नाम से जाना जाता है जिसमें 9 दिन तक मां शक्ति की आराधना कर दसवें दिन विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है जो रावण पर भगवान श्री राम बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। उत्तर भारत में जहां इस दौरान रामलीला का मंचन हो रहा होता है, वहीं पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में दृश्य परिवर्तन हो जाता है। यहां भी इस उत्सव को बुराई पर अच्छाई के रूप में ही मनाते हैं लेकिन यहां पर मुख्य रूप से मां दुर्गा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो दो कथाएं प्रचलित हैं, जो इस प्रकार हैं उत्तर भारत में प्रचलित कथा : जब राजा दशरथ ने भगवान श्री राम और माता सीता को वनवास का आदेश दिया, तब एक दिन वन में रहते हुए रावण ने माता सीता का हरण कर लिया। रावण को उसके अपराध का दंड देने के लिए और माता सीता को वापस लाने के लिए राम भगवान ने रावण पर आक्रमण किया। श्री राम और रावण में कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। श्री राम ने विजय प्राप्ति के लिए माता दुर्गा की आराधना की और दसवीं तिथि को रावण का वध किया। इसी उपलक्ष्य में विजयदशमी का उत्सव मनाया जाता है।  Durga mata:दुर्गा माता के 9 रूपों की कहानी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में प्रचलित कथा : वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जो कथा प्रचलित है वह मां दुर्गा से जुड़ी है। एक बार महिषासुर ने तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन किया। ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर महिषासुर को वरदान मांगने के लिए कहा, तब महिषासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। इस पर ब्रह्माजी ने जवाब दिया कि जो इस संसार में आया है उसकी मृत्यु भी अवश्य होगी, इसलिए चाहो तो कोई दूसरा वरदान मांग सकते हो। तब महिषासुर ने बहुत सोचा और कहा मुझे यह वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों ही हो। तब ब्रह्माजी तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए। महिषासुर सोचने लगा कि एक स्त्री भला मेरा क्या बिगाड़ सकती है, अब तो मैं अमर हो गया। उसने सारे देवताओं को अधिकारहीन और पराजित करके स्वर्ग से निकाल दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास गए। महिषासुर की ऐसी करतूत सुनकर उन दोनों ने बड़ा क्रोध प्रकट किया। तब उनके शरीर से एक तेज निकला। सभी देवताओं के भीतर से जो शक्तियां निकली, उसने एक स्त्री का रूप धारण कर लिया जिसे दुर्गा कहा गया। महिषासुर और माता दुर्गा में घोर संग्राम छिड़ गया। यह 10 दिनों तक चला और दशमी तिथि को माता दुर्गा में ने महिषासुर का वध कर दिया और महिषासुरमर्दिनि कहलाईं।  इस प्रकार मान्यता या कथा चाहे जो भी हो लेकिन यह पर्व हर रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

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Durga mata:दुर्गा माता के 9 रूपों की कहानी

कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है।इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि। इनके दो पुत्र हैं गणेश और कार्तिकेय नवरात्रि शब्द 9 की संख्या से बना है जो कि एक रहस्यात्मक बोध कराता है। माना जाता है कि यह संख्या अखंड होती है और जिसका ब्रह्म स्वरूप कभी खंडित नहीं किया जा सकता। विभिन्न कामनाओं के लिए भक्तगण नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना और पूजन करते हैं। आइए हम बताते हैं आपको इन नौ रूपों की कथा और कौन से हैं यह नौ रूप।  दुर्गा के 9 रूप कौनसे हैं। Durga ke 9 roop ki kahani प्रथम दुर्गा मां शैलपुत्री  नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। पर्वतराज हिमालय के घर देवी ने पुत्री के रूप में जन्म लिया और इसी कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। प्रकृति का प्रतीक मां शैलपुत्री जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का सर्वोच्च शिखर प्रदान करती हैं। शैलपुत्री के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल रहता है तथा इनका वाहन वृषभ (बैल) है। मां के इस रूप को लाल और सफेद रंग की वस्तुएं पसंद होने के कारण इस दिन लाल और सफेद पुष्प एवं सिंदूर अर्पित करें और दूध की मिठाई का भोग लगाएं। मां शैलपुत्री का पूजन घर के सभी सदस्य के रोगों को दूर करता है एवं घर से दरिद्रता को मिटा संपन्नता को लाता है। इनकी पूजा का मंत्र है – “या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।” द्वितीय दुर्गा मां ब्रह्मचारिणी वह परम ब्रह्म जिसका न आदि है न कोई अंत, उसी ब्रह्म सरूपा चेतना का स्वरूप है मां ब्रह्मचारिणी। नवरात्रि के दूसरे दिन इन देवी की पूजा की जाती है। नारद मुनि के कहने पर इन देवी ने शिवजी को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और उन्हें ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ था, इसीलिए इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। जो भक्त ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा करते हैं, उनको असीमित व अनंत शक्तियों का वरदान प्राप्त होता है। मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में जप की माला रहती है। देवी दुर्गा का यह स्वरूप हमें  संघर्ष से विचलित हुए बिना सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। मां ब्रह्मचारिणी को कमल और गुड़हल के पुष्प अर्पित करने चाहिए तथा चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। इससे देवी प्रसन्न होकर हमें दीर्घायु एवं सौभाग्य प्रदान करती हैं। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का मंत्र है – “या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।” तृतीय दुर्गा चंद्रघण्टा नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होता है। मां चंद्रघंटा के दस हाथ हैं जिनमें कमल का फूल, कमंडल, त्रिशूल, गदा, तलवार, धनुष और बाण है। एक हाथ आशीर्वाद तो दूसरा अभय मुद्रा में रहता है, शेष बचा एक हाथ वे अपने हृदय पर रखती हैं। माता का यह प्रतीक रत्न जड़ित आभूषणों से सुशोभित है और गले में सफेद फूलों की माला शोभित है। इन देवी का वाहन बाघ है। माता का घण्टा असुरों को भय प्रदान करने वाला होता है और वहीं इससे भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। माता का यह स्वरुप हमारे मन को नियंत्रित रखता है। नवरात्रि में मां के इस रूप को दूध और दूध से बने पदार्थों का भोग अर्पित करना चाहिए इनकी साधना का मंत्र है “ओम देवी चंद्रघंटाय नमः।” चतुर्थ दुर्गा कूष्मांडा देवी दुर्गा के 9 रूपों में से यह चौथा रूप है। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, ‘उष्म’ का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंडा’ ब्रह्मांडीय गोला का प्रतीक है। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार जब ब्रह्मांड में अंधकार छा गया था तब इन देवी ने अपनी मंद मुस्कान से पूरे संसार में उजाला कर ब्रम्हांड का निर्माण किया और तभी से इन्हें कूष्मांडा कहा गया। ऐसा माना जाता है कि इन देवी का निवास सूर्यलोक में हैं क्योंकि उस लोक में निवास करने की क्षमता केवल इन्हीं के पास है। मां कुष्मांडा के 8 भुजाएं हैं जिनमें से 7 भुजाओं में वे कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र और गदा धारण करती हैं और आठवें हस्त में सर्व सिद्धि और सर्व निधि प्रदान करने वाली जपमाला सुशोभित है। नवरात्रि के चौथे दिन देवी कूष्मांडा को मालपुए का भोग लगाकर आप उनकी कृपा प्राप्त कर सकती हैं। माता का यह रूप बौद्धिक विकास के लिए लाभदायक है। इनकी पूजा का मंत्र है “या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।” पंचम दुर्गा मां स्कंदमाता  नवरात्रि के पांचवे दिन देवी स्कंदमाता का पूजन किया जाता है। ब्रह्मांड में व्याप्त शिव तत्व का मिलन जब देवी शक्ति के साथ होता है तो स्कंद का जन्म होता है। इनकी माता होने के कारण ही इन्हें स्कंदमाता कहकर पुकारा जाता है। माता का वर्ण पूर्णत: श्वेत है और यह इनका रूप चतुर्भुज है। ऊपर वाली दाहिनी भुजा में यह षडानन बालरूप स्कंद को पकड़े रहती हैं और ऊपर वाली बाई भुजा से आशीर्वाद देती हैं। नीचे वाली दोनों भुजाओं में माता ने कमल पुष्प धारण किया हुआ है। इनका वाहन सिंह है। इस रूप को पद्मासना नाम से भी जाना जाता है। वात्सल्य विग्रह होने के कारण माता के इस रूप में कोई शस्त्र नहीं होता। इनकी उपासना से भक्तगण मृत्यु लोक में भी परम शांति और सुख प्राप्त कर सकते हैं। देवी का यह रूप ज्ञान का प्रतीक है। इस दिन माता की पूजा करने के बाद केले का भोग अर्पण करने से परिवार में सुख शांति आती है। इनकी पूजा का मंत्र है “या देवी सर्वभूतेषु  मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।” षष्ठी दुर्गा मां कात्यायनी  कात्यायन ऋषि के गोत्र में जन्म लेने के कारण इन देवी का नाम कात्यायनी पड़ा जिनकी पूजा नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। दिव्यता की अति गुप्त रहस्य एवं शुद्धता का प्रतीक यह देवी मनुष्य के आंतरिक सूक्ष्म जगत से नकारात्मकता का नाश कर सकारात्मकता प्रदान करती हैं।

Durga mata:दुर्गा माता के 9 रूपों की कहानी Read More »