VRAT KATHA

Padmini Ekadashi

Padmini Ekadashi Vrat Katha : पद्मिनी एकादशी सम्पूर्ण व्रत कथा….

Padmini Ekadashi Vrat Katha: धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले- हे जनार्दन! अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए। श्री भगवान बोले, हे राजन्- अधिकमास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है वह पद्मिनी (कमला) एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिकमास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती हैं। ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा बताई थी। भगवान कृष्‍ण बोले- मलमास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है, जो मनुष्‍यों के लिए भी दुर्लभ है। यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके कांसे के पात्र में जौ-चावल आदि का भोजन करें तथा नमक न खाएं। भूमि पर सोएं और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दंतधावन करें और जल के 12 कुल्ले करके शुद्ध हो जाएं। सूर्य उदय होने के पूर्व उत्तम तीर्थ में स्नान करने जाएं। इसमें गोबर, मिट्‍टी, तिल तथा कुशा व आंवले के चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करें। Padmini Ekadashi श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करें। हे म‍ुनिवर! पूर्वकाल में त्रेयायुग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की 1,000 परम प्रिय स्त्रियां थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो कि उनके राज्यभार को संभाल सके। देव‍ता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकि‍त्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए, लेकिन सब असफल रहे।  तब राजा ने तपस्या करने का निश्चय किया। महाराज के साथ उनकी परम प्रिय रानी, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या थीं, राजा के साथ वन में जाने को तैयार हो गई। दोनों अपने मंत्री को राज्यभार सौंपकर राजसी वेष त्यागकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए।  राजा ने उस पर्वत पर 10 हजार वर्ष तक तप किया, परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। Padmini Ekadashi तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- 12 मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है, जो 32 मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत के करने से भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे। रानी पद्मिनी Padmini Ekadashi ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण कर‍ती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्‍णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। Padmini Ekadashi तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था। सो हे नारद! जिन मनुष्यों ने मलमास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्‍णुलोक को प्राप्त होते हैं।…… Padmini Ekadashi की सम्पूर्ण जानकारी के लिए क्लिक करें…

Padmini Ekadashi Vrat Katha : पद्मिनी एकादशी सम्पूर्ण व्रत कथा…. Read More »

Apara Ekadashi fast

Beginning of Apara Ekadashi fast: अपरा एकादशी पांडवों के गुप्त वनवास का सहारा जानिए एकादशी की चमत्कारी महिमा और अचूक व्रत विधि….

Beginning of Apara Ekadashi fast: हिन्दू सनातन धर्म में एकादशी व्रतों का अत्यंत विशिष्ट और सर्वोच्च स्थान है। वैदिक पंचांग के अनुसार हर वर्ष कुल चौबीस एकादशियां आती हैं, लेकिन ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को ‘अपरा’ या ‘अचला’ एकादशी के नाम से पूरी श्रद्धा के साथ जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन और पुण्यदायी तिथि 13 मई 2026 को पड़ रही है। इस महान दिन पर सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के वामन अवतार यानी त्रिविक्रम रूप की विशेष रूप से पूजा-आराधना की जाती है। अगर आप अपने जीवन के सभी बड़े कष्टों, आर्थिक परेशानियों और मानसिक तनाव को हमेशा के लिए मिटाना चाहते हैं, तो Apara Ekadashi fast आपके लिए एक अचूक और दिव्य मार्ग है। Apara Ekadashi fast यह उपवास इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली है कि साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर और अन्य पांडवों को उनके जीवन के सबसे कठिन समय में Apara Ekadashi fast रखने की विशेष सलाह दी थी। आइए इस लेख में गहराई से जानते हैं कि इस पावन व्रत का रहस्य क्या है और यह आपकी किस्मत कैसे बदल सकता है। Beginning of Apara Ekadashi fast: अपरा एकादशी पांडवों के गुप्त वनवास का सहारा जानिए एकादशी की…… अपरा एकादशी का गहरा अर्थ और इसका असीम महत्व : Deep meaning of Apara Ekadashi and its immense importance संस्कृत व्याकरण में ‘अपरा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है ‘अपार’, ‘असीम’ या ‘अपरंपार’। नाम के बिल्कुल अनुरूप ही, जो भी भक्त पूरे नियम और सात्विक मन से Apara Ekadashi fast का पालन करता है, उसे ईश्वरीय कृपा और अपार व असीमित पुण्य की प्राप्ति होती है। प्राचीन पुराणों और शास्त्रों के अनुसार, इस एक दिन के Apara Ekadashi fast को रखने से मनुष्य को वही भारी और दुर्लभ ईश्वरीय पुण्य मिलता है, जो पवित्र कार्तिक मास में गंगा में डुबकी लगाने से, कुरुक्षेत्र में स्नान करने से, केदारनाथ-बद्रीनाथ के दर्शन करने से, काशी में शिवरात्रि का उपवास करने से, गया जी में पितरों का पिंडदान करने से और यहां तक कि एक विशाल अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होता है। यह मन, आत्मा और शरीर को पूरी तरह से शुद्ध कर देता है। पांडवों ने क्यों किया था यह अत्यंत कठिन व्रत ? : Why did the Pandavas observe this extremely difficult fast ? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब महाभारत काल में पांडव कौरवों से अपना पूरा राज्य हारकर घोर वनवास और अज्ञातवास के भयंकर कष्टों को जंगल में सह रहे थे, तब सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इन दुखों से पार पाने का एक सुरक्षित और वैदिक उपाय पूछा। तब जगतगुरु श्रीकृष्ण ने उन्हें Apara Ekadashi fast का असीम महात्म्य विस्तार से समझाया। भगवान ने उन्हें बताया कि वनवास की भयंकर कठिनाइयों को सहने के लिए जो मानसिक धैर्य, अलौकिक आध्यात्मिक बल और अजेय शक्ति चाहिए, वह सीधे तौर पर इसी व्रत से मिलेगी। श्रीकृष्ण की इसी दिव्य आज्ञा और मार्गदर्शन का पूरी तरह से पालन करते हुए सभी पांचों पांडवों और माता द्रौपदी ने पूरे विधि-विधान से यह Apara Ekadashi fast रखा था। यहाँ तक कि अत्यंत भारी भूख वाले महाबली भीमसेन ने भी धर्म की रक्षा के लिए इस नियम का पालन किया था। माना जाता है कि इसी व्रत के महान प्रभाव से उनका आध्यात्मिक बल बढ़ा, उनके सारे पुराने पाप और दोष नष्ट हुए, और अंततः महाभारत के भयंकर धर्म युद्ध में उन्हें प्रचंड विजय प्राप्त हुई। राजा महीध्वज और धौम्य ऋषि की रहस्यमयी पौराणिक कथा : The mysterious legend of King Mahidhwaj and Rishi Dhaumya इस व्रत की महिमा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एक अत्यंत रहस्यमयी और भावुक कथा सुनाई। प्राचीन काल में महिष्मती नाम की एक अत्यंत सुंदर नगरी में एक बहुत ही धर्मात्मा, सत्यवादी, प्रजावत्सल और न्यायप्रिय राजा राज किया करता था, जिसका नाम महीध्वज था। लेकिन उसका सगा छोटा भाई वज्रध्वज उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत अत्यंत क्रूर, ईर्ष्यालु और महा-अधर्मी था। अपनी अंधी ईर्ष्या के चलते एक रात दुष्ट वज्रध्वज ने एक बड़ा षड्यंत्र रचा, धोखे से राजा महीध्वज की बेरहमी से हत्या कर दी और उसके मृत शरीर को घने जंगल में एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे दफना दिया। अकाल मृत्यु और अपने ही भाई द्वारा धोखे से मारे जाने के कारण राजा महीध्वज की आत्मा को मोक्ष नहीं मिला। Apara Ekadashi fast वह एक भयंकर और खूंखार प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगा और वहां से गुजरने वाले राहगीरों को भयंकर उत्पात मचाकर परेशान करने लगा। कुछ समय पश्चात वहां से एक अत्यंत ज्ञानी, महान और सिद्ध संत, धौम्य ऋषि गुजरे। उन्होंने अपने तपोबल से उस भयंकर प्रेत को देखा और उसकी अकाल मृत्यु का पूरा कारण और इतिहास जान लिया। ऋषि का हृदय उस पर बहुत दया से भर गया। उन्होंने उस प्रेत को पेड़ से उतारा, उसे परलोक विद्या का गहरा ज्ञान दिया और उसकी मुक्ति के लिए स्वयं पूरे विधि-विधान से ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष का यह Apara Ekadashi fast रखा। जब द्वादशी का शुभ दिन आया, तो ऋषि धौम्य ने अपने Apara Ekadashi fast से प्राप्त हुआ सारा महान और असीम पुण्य उस भटकते हुए प्रेत को दान (अर्पित) कर दिया। इस महान पुण्य के जादुई और अत्यंत चमत्कारी प्रभाव से राजा महीध्वज को प्रेत योनि की उस भयंकर यातना से तुरंत हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई। उसने एक सुंदर दिव्य रूप धारण किया और धौम्य ऋषि को बार-बार धन्यवाद देते हुए पुष्पक विमान में बैठकर सीधे स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गया। यह कथा स्पष्ट करती है कि यह Apara Ekadashi fast इंसान ही नहीं, बल्कि प्रेत योनि में पड़े और भटक रहे जीवों का भी आसानी से उद्धार कर सकता है। भयंकर महापापों को जड़ से नष्ट करता है यह अचूक व्रत : This infallible fast destroys grave sins from their roots. भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को समझाया कि यह Apara Ekadashi fast मनुष्य के पाप रूपी विशाल और पुराने वृक्ष को एक ही झटके में काटने वाली एक तेज कुल्हाड़ी के समान है। इतना ही नहीं, यह व्रत पाप रूपी ईंधन को जलाने वाली प्रचंड अग्नि और पाप रूपी घने अंधकार को मिटाने

Beginning of Apara Ekadashi fast: अपरा एकादशी पांडवों के गुप्त वनवास का सहारा जानिए एकादशी की चमत्कारी महिमा और अचूक व्रत विधि…. Read More »

Mohini Ekadashi

Mohini Ekadashi Vrat Katha: मोहिनी एकादशी व्रत कथा…..

Mohini Ekadashi Vrat Katha:मोहिनी एकादशी व्रत कथा….. Mohini Ekadashi: धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे कृष्ण! वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी कथा क्या है ? इस व्रत की क्या विधि है, यह सब विस्तारपूर्वक बताइए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! मैं आपसे एक कथा कहता हूँ, जिसे महर्षि वशिष्ठ ने श्री रामचंद्रजी से कही थी। एक समय श्रीराम बोले कि हे गुरुदेव! कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे समस्त पाप और दु:ख का नाश हो जाए। मैंने सीताजी के वियोग में बहुत दु:ख भोगे हैं। महर्षि वशिष्ठ बोले- हे राम! आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यंत शुद्ध तथा पवित्र है। यद्यपि आपका नाम स्मरण करने से मनुष्य पवित्र और शुद्ध हो जाता है तो भी लोकहित में यह प्रश्न अच्छा है। वैशाख मास में जो एकादशी आती है उसका नाम मोहिनी एकादशी है। Mohini Ekadashi इसका व्रत करने से मनुष्य सब पापों तथा दु:खों से छूटकर मोहजाल से मुक्त हो जाता है। मैं इसकी कथा कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा राज करता था। वहाँ धन-धान्य से संपन्न व पुण्यवान धनपाल नामक वैश्य भी रहता है। वह अत्यंत धर्मालु और विष्णु भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएँ, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे। सड़कों पर आम, जामुन, नीम आदि के अनेक वृक्ष भी लगवाए थे। उसके 5 पुत्र थे- सुमना, सद्‍बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। इनमें से पाँचवाँ पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। Mohini Ekadashi वह पितर आदि को नहीं मानता था। वह वेश्या, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता तथा मद्य-मांस का सेवन करता था। इसी प्रकार अनेक कुकर्मों में वह पिता के धन को नष्ट करता रहता था। इन्हीं कारणों से त्रस्त होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। घर से बाहर निकलने के बाद वह अपने गहने-कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब सबकुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख-प्यास से अति दु:खी रहने लगा। कोई सहारा न देख चोरी करना सीख गया। एक बार वह पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया। Mohini Ekadashi राजाज्ञा से इस बार उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसे अत्यंत दु:ख दिए गए। बाद में राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का कहा। वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहाँ वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। कुछ समय पश्चात वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुँच गया। Mohini Ekadashi उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा स्नान कर आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई। वह कौडिन्य मुनि से हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे मुने! मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। Mohini Ekadashi आप इन पापों से छूटने का कोई साधारण बिना धन का उपाय बताइए। उसके दीन वचन सुनकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी नामक एकादशी का व्रत करो। इससे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार व्रत किया। हे राम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया। इस व्रत से मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं। संसार में इस व्रत से श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है। इसके माहात्म्य को पढ़ने से अथवा सुनने से एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है।

Mohini Ekadashi Vrat Katha: मोहिनी एकादशी व्रत कथा….. Read More »

Ekadashi Vrat Katha

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: पापमोचिनी एकादशी  ब्रह्मांड का सबसे खौफनाक श्राप और पापों से मुक्ति का वह गुप्त रहस्य….

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: समय का वह भ्रम जो आपके होश उड़ा देगा क्या आपने कभी हॉलीवुड की कोई ऐसी साइंस फिक्शन फिल्म देखी है जिसमें कोई इंसान किसी दूसरी दुनिया में जाता है, उसे लगता है कि उसने वहां सिर्फ कुछ घंटे बिताए हैं, लेकिन जब वह वापस आता है तो पृथ्वी पर दशकों बीत चुके होते हैं? ‘इन्सेप्शन’ (Inception) या ‘इंटरस्टेलर’ (Interstellar) जैसी फिल्मों का यह कंसेप्ट (Concept) हमें बहुत ही हैरान करने वाला और कन्फ्यूजिंग लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से हजारों साल पहले, हमारी ही पृथ्वी पर बिल्कुल ऐसा ही एक रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया असल में घटित हुआ था? जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा ! आज हम आपको जो Ekadashi Vrat Katha बताने जा रहे हैं, वह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि यह समय, कामुकता और एक भयंकर मायाजाल का ऐसा खौफनाक सच है जो आपके दिमाग की नसें फाड़ कर रख देगा। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे द्वारा किए गए छोटे-बड़े पापों का हिसाब कैसे होता होगा। Ekadashi Vrat Katha क्या कोई ऐसा ‘चीट कोड’ (Cheat Code) है जिससे हम अपने सारे बुरे कर्मों को एक ही झटके में डिलीट (Delete) कर सकें? इस सवाल का सबसे रहस्यमयी और चौंकाने वाला जवाब आपको इस विशेष Ekadashi Vrat Katha में मिलेगा। यह ब्रह्मांडीय रहस्य इतना शक्तिशाली है कि इसे द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। यह एक ऐसी घटना है जिसे सुनकर बड़े-बड़े विद्वानों का भी सिर चकरा जाता है। यदि आप इस लेख को बीच में छोड़ने की गलती करते हैं, Ekadashi Vrat Katha तो आप उस परम रहस्य से हमेशा के लिए वंचित रह जाएंगे जो रातों-रात आपकी किस्मत और आपके कर्मों का पूरा खाता बदल सकता है। तो अपनी सांसें थाम लीजिए और इस भूलभुलैया में हमारे साथ प्रवेश कीजिए! Papmochani Ekadashi Vrat Katha: ब्रह्मांड का सबसे खौफनाक श्राप और पापों से मुक्ति….. भाग 1: कामदेव का वह खतरनाक हनी ट्रैप जिसने स्वर्ग के सिंहासन को हिला दिया यह बात उस प्राचीन और रहस्यमयी समय की है जब अप्सराओं से सेवित और अत्यंत रमणीय ‘चैत्ररथ’ नामक एक विशाल वन हुआ करता था। Ekadashi Vrat Katha इस वन में चारों ओर गंधर्व कन्याएं और देवता स्वच्छंद रूप से विहार करते थे। इसी भयंकर और सुनसान जंगल के एक कोने में मुनिवर मेधावी अपनी घोर तपस्या में लीन थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और उनका आध्यात्मिक तेज इतना अधिक था कि स्वर्ग में बैठे देवताओं का सिंहासन भी डोलने लगा। Ekadashi Vrat Katha मुनि की इस असीम शक्ति को रोकने और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए ‘कामदेव’ ने अपना सबसे बड़ा और खतरनाक जाल बिछाया। इसी मायावी जाल को गहराई से समझने के लिए हर साधक को यह Ekadashi Vrat Katha गहराई से पढ़नी चाहिए। कामदेव ने ‘मंजुघोषा’ नामक एक अत्यंत सुंदर और मायावी अप्सरा को मुनि के पास भेजा। लेकिन यह कोई सीधा हमला नहीं था। यह इतना कन्फ्यूजिंग और मनोवैज्ञानिक (Psychological) हमला था कि मंजुघोषा मुनि के आश्रम से एक कोस (लगभग 3 किलोमीटर) दूर ही रुक गई। वहां उसने अपनी वीणा से एक ऐसी सम्मोहक और मधुर धुन बजानी शुरू की, Ekadashi Vrat Katha जिसने हवा के जरिए मुनि के दिमाग को पूरी तरह से हैक (Hack) कर लिया। मुनि मेधावी अपनी तपस्या छोड़कर उस आवाज के पीछे किसी कठपुतली की तरह खींचे चले गए। युवावस्था वाले मुनि अप्सरा के हाव-भाव, उसके नृत्य और कटाक्षों से ऐसे अंधे हो गए कि वे अपना सारा ज्ञान और ध्यान भूलकर उस अप्सरा के मोहपाश में पूरी तरह बंध गए। इस Ekadashi Vrat Katha का यह हिस्सा हमें यह डरावनी चेतावनी देता है कि इंसान का दिमाग कितना कमजोर है और वह पल भर में कैसे अपने सबसे बड़े लक्ष्य से भटक सकता है। भाग 2: 57 साल का वह खौफनाक ‘टाइम लूप’ और एक भयानक श्राप अब आता है इस कहानी का सबसे भयंकर और सस्पेंस से भरा हुआ मोड़, जो आपके पैरों तले जमीन खिसका देगा। मुनि मेधावी उस अप्सरा के साथ रमण करने लगे। Ekadashi Vrat Katha वे उस मायाजाल में इतने गहरे डूब चुके थे कि उन्हें दिन और रात का, सुबह और शाम का कोई होश ही नहीं रहा। उन्हें लग रहा था कि जैसे वे बस कुछ ही दिनों से उस अप्सरा के साथ हैं। लेकिन जब एक दिन मंजुघोषा ने देवलोक (स्वर्ग) वापस जाने के लिए मुनि से आज्ञा मांगी, तो जो हुआ वह किसी भी Ekadashi Vrat Katha के इतिहास की सबसे डरावनी घटना थी। मुनि ने मंजुघोषा से कहा, “हे देवी! अभी तो शाम होने वाली है, कम से कम कल सुबह की संध्या तक तो मेरे पास रुक जाओ।” यह सुनकर अप्सरा कांप उठी और उसने कहा, “विप्रवर! मुझ पर कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो कीजिए। न जाने कितनी ही संध्याएं बीत चुकी हैं!” जब मुनि ने अपने अतींद्रिय ज्ञान से समय का हिसाब लगाया, तो उनके होश उड़ गए। उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। Ekadashi Vrat Katha जिसे वे कुछ दिन समझ रहे थे, वास्तव में वह पूरे 57 साल (57 Years) का लंबा समय था! उनका पूरा जीवन, उनकी सारी तपस्या और उनका शिव-प्रेम सब कुछ एक झटके में मिट्टी में मिल चुका था। अपने इस भयंकर पतन को देखकर उनका खून खौल उठा और उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर उस सुंदर अप्सरा को श्राप दे दिया— “पापिनी! तूने मेरी तपस्या नष्ट की है, जा तू अभी के अभी एक खौफनाक पिशाचनी (भूतनी/राक्षसी) बन जा !” पलक झपकते ही स्वर्ग की वह सुंदर अप्सरा एक भयंकर और डरावनी पिशाचनी में बदल गई। इस श्राप का यह खौफनाक मंजर इस Ekadashi Vrat Katha को सबसे अद्वितीय और रहस्यमयी बनाता है। भाग 3: पापमोचिनी— ब्रह्मांड का वह गुप्त ‘डिलीट बटन’ जो सब कुछ मिटा सकता है श्राप की आग में जलते हुए वह पिशाचनी मुनि के पैरों में गिरकर कांपते हुए फूट-फूट कर रोने लगी। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “हे विप्रवर! मेरा इस भयानक श्राप से उद्धार कीजिए। शास्त्रों में कहा गया है कि सत्पुरुषों के साथ सात कदम चलने मात्र से ही मित्रता हो जाती है, मैंने तो

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: पापमोचिनी एकादशी  ब्रह्मांड का सबसे खौफनाक श्राप और पापों से मुक्ति का वह गुप्त रहस्य…. Read More »

Amalaki Ekadashi

Amalaki Ekadashi Vrat Katha & Puja Vidhi: पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महाव्रत, जानें संपूर्ण कथा और पूजा के नियम….

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। साल भर में आने वाली सभी एकादशियां भगवान विष्णु को समर्पित होती हैं, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का अपना एक विशिष्ट और अलौकिक महत्व है। इसे हम Amalaki Ekadashi या रंगभरी एकादशी के नाम से जानते हैं। यह वह दिन है जब सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत न केवल व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्त करता है, बल्कि उसे हजारों गायों के दान के बराबर पुण्य भी प्रदान करता है। Amalaki Ekadashi क्या आप जानते हैं कि इस दिन आंवले के वृक्ष को छूने मात्र से ही दोगुना पुण्य मिलता है? आज के इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में हम Amalaki Ekadashi की पौराणिक व्रत कथा, इसकी उत्पत्ति का रहस्य, पूजा की विस्तृत विधि और रात्रि जागरण के महत्व पर चर्चा करेंगे। यदि आप मोक्ष और स्वर्ग की कामना रखते हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। Amalaki Ekadashi: क्या है इसका महत्व और अर्थ ? ‘आमलकी’ का अर्थ है आंवला। शास्त्रों में आंवले को साधारण फल नहीं, बल्कि ‘देव वृक्ष’ माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, Amalaki Ekadashi का व्रत करने से व्यक्ति को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस व्रत की विशेषता यह है कि इसमें भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के वृक्ष की पूजा अनिवार्य बताई गई है। ऐसा माना जाता है कि आंवले का वृक्ष सभी वृक्षों में श्रेष्ठ और आदि वृक्ष है। इसके स्मरण मात्र से गोदान (गाय का दान) का फल मिलता है। यदि कोई भक्त इस वृक्ष का स्पर्श करता है, तो उसे दोगुना फल मिलता है और यदि इसके फल का सेवन करता है, तो उसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। पौराणिक व्रत कथा : आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति का रहस्य Amalaki Ekadashi के संदर्भ में एक बहुत ही सुंदर और रहस्यमयी कथा प्रचलित है, जिसका वर्णन राजा मान्धाता और महर्षि वसिष्ठ के संवाद में मिलता है। एक बार राजा मान्धाता ने गुरु वसिष्ठ से पूछा, “हे ऋषिवर! Amalaki Ekadashi आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई और इसका इतना महत्व क्यों है?” तब महर्षि वसिष्ठ ने बताया कि जब सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु के मुख से चंद्रमा के समान एक अत्यंत चमकीला और कांतिमान बिंदु पृथ्वी पर गिरा, तो उसी बिंदु से आंवले के महान वृक्ष की उत्पत्ति हुई। यह वृक्ष भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया। इसी समय भगवान ब्रह्मा जी भी प्रकट हुए और उन्होंने सृष्टि की रचना शुरू की। जब देवताओं और ऋषियों ने पृथ्वी पर इस अद्भुत वृक्ष को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। वे इसे पहचान नहीं पा रहे थे। तब आकाशवाणी हुई। वह आकाशवाणी स्वयं भगवान विष्णु की थी। उन्होंने कहा, “यह आमलकी (आंवला) वृक्ष मुझे अत्यंत प्रिय है। यह सभी पापों का नाश करने वाला और सर्वदेवमय है।” इस कथा से स्पष्ट होता है कि Amalaki Ekadashi का व्रत सीधे तौर पर भगवान विष्णु की कृपा से जुड़ा हुआ है। आंवले के वृक्ष में देवताओं का वास: इस एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है, इसका उत्तर इसके कण-कण में बसे देवताओं में छिपा है। आकाशवाणी के अनुसार, इस वृक्ष के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास है: • मूल (जड़): वृक्ष की जड़ में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान हैं। • ऊपर का भाग: वृक्ष के ऊपरी हिस्से में ब्रह्मा जी का वास है। • स्कंध (तना): तने में भगवान रुद्र (शिव) निवास करते हैं। • शाखाएं: शाखाओं में मुनियों का वास है। • टहनियां: छोटी टहनियों में देवता रहते हैं। • पत्ते: पत्तों में आठों वसुओं का निवास है। • फूल: फूलों में मरुद्गण बसते हैं। • फल: फलों में सभी प्रजापति निवास करते हैं। यही कारण है कि Amalaki Ekadashi के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे की गई पूजा से सभी देवी-देवता एक साथ प्रसन्न हो जाते हैं। Amalaki Ekadashi पूजा विधि: स्नान और संकल्प इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए सही विधि का पालन करना आवश्यक है। शास्त्रों में बताई गई विधि इस प्रकार है: 1. प्रातःकाल की दिनचर्या: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले दांतून करना चाहिए। इसके बाद व्रत का संकल्प लें: “हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मैं आज एकादशी को निराहार रहकर व्रत का पालन करूंगा और कल भोजन ग्रहण करूंगा। आप मुझे अपनी शरण में लें।” 2. मृत्तिका स्नान (मिट्टी का स्नान): इस दिन स्नान का विशेष नियम है। स्नान से पहले शरीर पर पवित्र मिट्टी लगानी चाहिए। मिट्टी लगाते समय इस मंत्र का उच्चारण करें:    “अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम्।।”    अर्थ: हे वसुन्धरे! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चलते हैं और भगवान विष्णु ने वामन अवतार में तुम्हें नापा था। हे मृत्तिके! मेरे करोड़ों जन्मों के पापों को हर लो। 3. स्नान मंत्र: मिट्टी लगाने के बाद जल से स्नान करते समय वरुण देव का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि यह स्नान सभी तीर्थों के स्नान के समान फलदायी हो। पूजन का मुख्य भाग: परशुराम और कलश स्थापना Amalaki Ekadashi की पूजा दोपहर या शाम के समय आंवले के वृक्ष के नीचे की जाती है। इसकी विधि अत्यंत विस्तृत और रोचक है: 1. परशुराम प्रतिमा: विद्वान व्यक्ति को भगवान परशुराम (जो विष्णु के अवतार हैं) की सोने की प्रतिमा बनवानी चाहिए। 2. वृक्ष के नीचे स्थान: घर पर पूजा करने के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष के पास जाएं। वृक्ष के चारों ओर की जमीन को साफ करें, लीपें और शुद्ध करें। 3. कलश स्थापना: वहां एक नया कलश स्थापित करें। कलश में पंचामृत, सुगंध और जल भरें। उस पर चंदन लगाएं और फूलों की माला पहनाएं। 4. सामग्री: पूजा स्थल पर धूप-दीप जलाएं। एक विशेष बात का ध्यान रखें—पूजा में भगवान के लिए नया छाता, जूता और वस्त्र भी रखने चाहिए। 5. पात्र और प्रतिमा: कलश के ऊपर एक पात्र रखें जिसमें ‘लाजें’ (धान की खीलें) भरी हों। इस पात्र के ऊपर भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित करें। अंग पूजा और अर्घ्य का महत्व

Amalaki Ekadashi Vrat Katha & Puja Vidhi: पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महाव्रत, जानें संपूर्ण कथा और पूजा के नियम…. Read More »

Turtle in Dream

Turtle in Dream Meaning: सपने में कछुआ देखने का क्या मतलब होता है? जानें शुभ-अशुभ संकेत और भविष्य का रहस्य….

सपने भविष्य का वो आईना होते हैं, जो हमें आने वाले कल की झलक दिखाते हैं। Turtle in Dream Meaning: हम सभी रात को सोते समय सपनों की दुनिया में खो जाते हैं। कभी-कभी हम ऐसे सपने देखते हैं जो सुबह उठते ही हम भूल जाते हैं, लेकिन कुछ सपने ऐसे होते हैं जो हमारे दिमाग में छप जाते हैं और हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं। क्या आपने कभी सपने में कछुआ देखा है? अगर हाँ, तो यह साधारण बात नहीं है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हर सपने का एक गहरा अर्थ होता है। आज के इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में, हम Turtle in Dream के हर पहलू पर चर्चा करेंगे। Turtle in Dream चाहे आपने कछुए को पानी में देखा हो, उसे पकड़ते हुए देखा हो, या फिर कछुए का जोड़ा देखा हो—हर दृश्य का अपना एक विशेष संकेत है। तो चलिए, स्वप्न शास्त्र के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं कि आखिर यह शांत जीव आपके भविष्य के बारे में क्या इशारा कर रहा है। Turtle in Dream Meaning: सपने में कछुआ देखने का क्या मतलब होता है…. 1. स्वप्न शास्त्र और कछुए का महत्व (Introduction to Dream Science) भारतीय संस्कृति और स्वप्न शास्त्र में कछुए को बहुत ही पवित्र और शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कछुआ भगवान विष्णु के ‘कच्छप अवतार’ का प्रतीक है। इसलिए, जब भी किसी को Turtle in Dream दिखाई देता है, तो इसे अक्सर ईश्वरीय कृपा और सकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है। बहुत से लोग सुबह उठकर चिंतित हो जाते हैं कि उन्होंने एक जानवर का सपना देखा, लेकिन कछुए के मामले में आपको घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। यह सपना आपके जीवन में स्थिरता, धैर्य और धन के आगमन का सूचक है। यह सपना बताता है कि आपके जीवन की गाड़ी अब पटरी पर आने वाली है और आप जिस भी समस्या से जूझ रहे हैं, उसका समाधान जल्द ही निकलने वाला है। 2. सपने में कछुआ देखना: शुभ या अशुभ ? (Good or Bad Sign) सबसे पहला सवाल जो मन में आता है, वो यही है कि क्या यह सपना शुभ है? इसका सीधा जवाब है—हाँ। स्वप्न शास्त्र और ज्योतिषीय विश्लेषण के अनुसार, Turtle in Dream देखना 99% मामलों में शुभ संकेत ही लेकर आता है। कछुआ अपनी धीमी चाल लेकिन निरंतरता के लिए जाना जाता है। सपने में इसे देखना यह बताता है कि भले ही आपकी सफलता की गति धीमी हो, लेकिन वह पक्की है। यह सपना विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो लंबे समय से आर्थिक तंगी या मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। यह संकेत देता है कि अब बुरा वक्त बीत चुका है और ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं। Turtle in Dream यह आपके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि (Prosperity) के द्वार खुलने का इशारा है। 3. आर्थिक स्थिति पर प्रभाव: धन लाभ के संकेत क्या आप कर्जे से परेशान हैं या बिजनेस में घाटा हो रहा है? अगर ऐसे समय में आपको Turtle in Dream दिखाई दे, तो समझ लीजिए कि मां लक्ष्मी आप पर मेहरबान होने वाली हैं। स्रोतों के अनुसार, सपने में कछुआ देखने का सीधा संबंध आपकी ‘आर्थिक स्थिति’ (Financial Status) से है। अचानक धन लाभ: यह सपना बताता है कि निकट भविष्य में आपको कहीं से रुका हुआ धन मिल सकता है या आय के नए स्रोत बन सकते हैं। कर्ज से मुक्ति: यदि आप कर्ज के बोझ तले दबे हैं, तो कछुए का सपना यह संकेत देता है कि जल्द ही आप इस परेशानी से बाहर निकल आएंगे। गरीबी का नाश: स्वप्न शास्त्र स्पष्ट करता है कि कछुआ देखना दरिद्रता दूर होने और संपन्नता आने का प्रतीक है। 4. सपने में कछुए को पकड़ना (Catching a Turtle) सपनों की व्याख्या में ‘क्रिया’ (Action) का बहुत महत्व होता है। आप कछुए के साथ क्या कर रहे थे? यदि आपने सपने में देखा है कि आप कछुए को अपने हाथों से पकड़ रहे हैं, तो यह एक अत्यंत दुर्लभ और भाग्यशाली सपना है। Turtle in Dream जिसमें आप उसे पकड़ रहे हैं, इसका मतलब है: 1. सफलता मुट्ठी में: इसका अर्थ है कि आप जिस भी लक्ष्य के पीछे भाग रहे थे, Turtle in Dream अब वह आपकी पकड़ में आने वाला है। सफलता अब आपसे दूर नहीं है। 2. परिस्थितियों पर नियंत्रण: यह सपना दर्शाता है कि अब तक जो परिस्थितियां आपके खिलाफ थीं, अब वे आपके नियंत्रण (Control) में होंगी। आप अपने जीवन के फैसले खुद ले पाएंगे। 3. नया बिजनेस: अगर आप कोई नया स्टार्टअप या व्यापार शुरू करने की सोच रहे हैं Turtle in Dream और ऐसा सपना आता है, तो यह ‘ग्रीन सिग्नल’ है। यह बताता है कि आपका आइडिया सफल होगा। 5. पानी में तैरता हुआ कछुआ देखना (Turtle in Water) कछुआ एक उभयचर (Amphibian) प्राणी है, जो जमीन और पानी दोनों में रहता है। लेकिन अगर आपको Turtle in Dream पानी में तैरता हुआ दिखाई दे, तो इसके मायने बदल जाते हैं। पानी ‘गति’ और ‘प्रवाह’ का प्रतीक है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार: लंबी यात्रा के योग: यह सपना इशारा करता है कि आप जल्द ही किसी लंबी यात्रा पर निकल सकते हैं। यह यात्रा जल मार्ग से या हवाई जहाज से भी हो सकती है। घर से दूरी: हो सकता है Turtle in Dream कि किसी प्रोजेक्ट या काम के सिलसिले में आपको कुछ दिनों या महीनों के लिए अपने घर और परिवार से दूर रहना पड़े। करियर में बदलाव: यह सपना संकेत देता है कि आप किसी बड़े काम या प्रोजेक्ट में व्यस्त होने वाले हैं, जिससे आपको एकांत में रहना पड़ सकता है। यह व्यस्तता आपके सुनहरे भविष्य की नींव रखेगी। 6. सपने में कछुए की मूर्ति देखना (Statue of Turtle) अक्सर हम जीवित कछुआ न देखकर उसकी मूर्ति या फोटो देखते हैं। वास्तु शास्त्र और फेंगशुई में भी कछुए की मूर्ति को बहुत शुभ माना गया है। यदि आपको सपने में कछुए की मूर्ति दिखाई दे, तो इसका सीधा संबंध ‘स्थायित्व’ और ‘धैर्य’ से है। इस तरह का Turtle in Dream बताता है कि: आर्थिक सुरक्षा: यह सपना इस बात का पक्का सबूत है कि आपका बैंक

Turtle in Dream Meaning: सपने में कछुआ देखने का क्या मतलब होता है? जानें शुभ-अशुभ संकेत और भविष्य का रहस्य…. Read More »

Somvar Vrat Katha

Somvar Vrat Katha:सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा, मिलेगी श‍िव-पार्वती की कृपा

Somvar Vrat Katha: सोमवार का दिन शंकर भगवान को समर्पित होता है. आज के दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. कुछ लोग आज के दिन व्रत भी रखते हिन्दू धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवता को समर्पित होता है, और सोमवार का दिन देवों के देव महादेव, भगवान शंकर को समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव बहुत ही भोले हैं, इसलिए उन्हें ‘भोलेनाथ’ भी कहा जाता है वे अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा और क्षणिक मात्र की भक्ति से प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं जो भक्त शिव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, वे सोमवार का व्रत रखते हैं। हालांकि, शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि आप यह उपवास रखते हैं, तो आपको Somvar vrat katha पढ़ना या सुनना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना व्रत का फल अधूरा माना जाता है इस विस्तृत लेख में हम Somvar vrat katha के महत्व, व्रत रखने की सही विधि और उस प्राचीन कहानी के बारे में जानेंगे जिसने सदियों से भक्तों के विश्वास को अटूट बनाए रखा है। Somvar Vrat Katha:सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा…… 1. सोमवार व्रत का महत्व और शिव कृपा:Importance of Monday fast and grace of Shiva सोमवार के व्रत को लेकर यह दृढ़ मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से भगवान शिव अपने भक्तों की मुरादें बहुत जल्दी पूरी करते हैं। चूँकि महादेव को किसी विशेष तामझाम या कठिन पूजन की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए वे केवल जल और बेलपत्र चढ़ाने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। सावन के सोमवार हों या सामान्य सोमवार, इस व्रत का फल साधक को मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और संतान सुख के रूप में प्राप्त होता है। 2. सोमवार व्रत के प्रकार:types of monday fast नारद पुराण और अन्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का व्रत मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है: 1. साधारण प्रति सोमवार व्रत: यह हर सप्ताह सोमवार को रखा जाता है। 2. सौम्य प्रदोष व्रत: यह विशेष तिथियों पर महादेव की पूजा के लिए रखा जाता है। 3. सोलह सोमवार का व्रत (Solah Somvar): यह कठिन संकल्प के साथ लगातार 16 सोमवारों तक किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी व्रतों की पूजा विधि और Somvar vrat katha सुनने की प्रक्रिया लगभग एक समान ही होती है। 3. सोमवार व्रत की सम्पूर्ण पूजन विधि:Complete worship method of Monday fast किसी भी व्रत की सफलता उसकी विधि पर निर्भर करती है। सोमवार व्रत की विधि इस प्रकार है: • स्नान और शुद्धि: व्रत के दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • शिव-गौरी पूजन: मंदिर या घर के देवालय में भगवान शिव और माता पार्वती (शिव-गौरी) की विधिवत पूजा करें। • अभिषेक और अर्पण: महादेव को शुद्ध जल, गंगाजल और उनका प्रिय बेलपत्र अर्पित करें। • कथा का श्रवण: पूजन के पश्चात Somvar vrat katha को श्रद्धापूर्वक पढ़ें या सुनें। • भोजन के नियम: सोमवार का व्रत साधारण रूप से दिन के तीसरे पहर (शाम) तक रखा जाता है। Somvar Vrat Katha इसके बाद केवल एक समय ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। 4. सम्पूर्ण पौराणिक Somvar Vrat Katha प्राचीन समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह संतान न होने के कारण बहुत दुखी रहता था। पुत्र की प्राप्ति की इच्छा लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था और पूरी निष्ठा के साथ शिव मंदिर जाकर शिव-पार्वती की पूजा करता था। माता पार्वती का आग्रह और शिव का वरदान साहूकार की अटूट भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। इस पर भगवान शिव ने कहा, “हे पार्वती! इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल भुगतना पड़ता है और भाग्य में जो लिखा है, वही होता है”। Somvar Vrat Katha परंतु माता पार्वती के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने अपना निर्णय बदला और साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि उस बालक की आयु केवल 12 वर्ष ही होगी साहूकार भगवान शिव और माता पार्वती की यह बातचीत सुन रहा था। उसे न तो वरदान की बहुत खुशी हुई और न ही पुत्र की अल्पायु का दुख। वह पहले की तरह ही भक्ति भाव से Somvar vrat katha सुनता रहा और शिवजी की पूजा करता रहा। बालक का जन्म और काशी की यात्रा समय बीतने पर साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। जब वह बालक 11 वर्ष का हुआ, तो उसे विद्या प्राप्त करने के लिए काशी भेजने का निर्णय लिया गया। साहूकार ने बालक के मामा को बुलाकर बहुत सारा धन दिया और निर्देश दिया कि रास्ते में जगह-जगह यज्ञ करवाते जाना और ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देते हुए जाना। मामा और भांजा दोनों इसी मार्ग पर चल पड़े। राजकुमारी का विवाह और साहूकार के पुत्र की ईमानदारी रास्ते में एक नगर पड़ा जहाँ के राजा की पुत्री का विवाह था। जिस राजकुमार से विवाह तय हुआ था, वह एक आँख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपनी कमी छुपाने के लिए साहूकार के पुत्र को दूल्हा बनाकर विवाह मंडप में बिठा दिया और सोचा कि विवाह के बाद इसे विदा कर देंगे और असली राजकुमार के साथ राजकुमारी को भेज देंगे। साहूकार का पुत्र बहुत ईमानदार था। उसे यह छल पसंद नहीं आया, इसलिए उसने राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिख दिया कि “तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है, लेकिन तुम्हें जिस राजकुमार के साथ भेजा जा रहा है, वह एक आँख से काना है”। जब राजकुमारी ने यह पढ़ा, तो उसने उस राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और बारात वापस लौट गई। इधर साहूकार का पुत्र और उसके मामा काशी पहुँच गए। 12 वर्ष की आयु और शिव का चमत्कार काशी पहुँचकर उन्होंने यज्ञ शुरू किया। जिस दिन बालक 12 वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था। बालक की तबीयत खराब हुई और वह अंदर जाकर सो गया। शिवजी के

Somvar Vrat Katha:सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा, मिलेगी श‍िव-पार्वती की कृपा Read More »

Vrat Katha

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा….

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा…. Saphala Ekadashi Vrat Katha: महाराज युधिष्ठिर ने पूछा- हे जनार्दन! पौष कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी क्या विधि है? कृपया मुझे बताएँ। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि धर्मराज, मैं तुम्हारे स्नेह के कारण तुमसे कहता हूँ कि एकादशी व्रत के अतिरिक्त मैं अधिक से अधिक दक्षिणा पाने वाले यज्ञ से भी प्रसन्न नहीं होता हूँ। अत: इसे अत्यंत भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर करें। हे राजन! द्वादशीयुक्त पौष कृष्ण एकादशी का माहात्म्य तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। इस एकादशी का नाम सफला एकादशी है। इस एकादशी के देवता श्रीनारायण हैं। विधिपूर्वक इस व्रत को करना चाहिए। जिस प्रकार नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, सब ग्रहों में चंद्रमा, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, Vrat Katha उसी तरह सब व्रतों में एकादशी का व्रत श्रेष्ठ है। जो मनुष्य सदैव एकादशी का व्रत करते हैं, वे मुझे परम प्रिय हैं। अब इस व्रत की विधि कहता हूँ। मेरी पूजा के लिए ऋतु के अनुकूल फल, नारियल, नींबू, नैवेद्य आदि सोलह वस्तुओं का संग्रह करें। इस सामग्री से मेरी पूजा करने के बाद रात्रि जागरण करें। Vrat Katha इस एकादशी के व्रत के समान यज्ञ, तीर्थ, दान, तप तथा और कोई दूसरा व्रत नहीं है। पाँच हजार वर्ष तप करने से जो फल मिलता है, उससे भी अधिक सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। हे राजन! अब आप इस एकादशी की कथा सुनिए। चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। Vrat Katha उन सबमें लुम्पक नामवाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह पापी सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। Vrat Katha सदैव ही देवता, बाह्मण, वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को अपने बड़े पुत्र के ऐसे कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। तब वह विचारने लगा कि कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? अंत में उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन में वह वन में रहता और रात्रि को अपने पिता की नगरी में चोरी करता तथा प्रजा को तंग करने और उन्हें मारने का कुकर्म करता। कुछ समय पश्चात सारी नगरी भयभीत हो गई। वह वन में रहकर पशु आदि को मारकर खाने लगा। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते। वन के एक अतिप्राचीन विशाल पीपल का वृक्ष था। लोग उसकी भगवान के समान पूजा करते थे। उसी वृक्ष के नीचे वह महापापी लुम्पक रहा करता था। Vrat Katha इस वन को लोग देवताओं की क्रीड़ास्थली मानते थे। Vrat Katha कुछ समय पश्चात पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह वस्त्रहीन होने के कारण शीत के चलते सारी रात्रि सो नहीं सका। उसके हाथ-पैर अकड़ गए। Saphala Ekadashi 2025 Vrat Niyam: सफला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें, ताकि श्रीहरि की कृपा बनी रहे ? सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अत: पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दु:ख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई। उसके इस उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। दूसरे दिन प्रात: एक ‍अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुअओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए। Vrat Katha अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके ‘भगवान आपकी जय हो’ कहकर अपने पिता के पास गया। उसके पिता ने प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन का रास्ता लिया। अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। उसके स्त्री, पुत्र आदि सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का परम भक्त हो गया। Vrat Katha वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ। अत: जो मनुष्य इस परम पवित्र सफला एकादशी का व्रत करता है उसे अंत में मुक्ति मिलती है। जो नहीं करते वे पूँछ और सींगों से रहित पशुओं के समान हैं। इस सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने से अथवा श्रवण करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा…. Read More »

Ekadashi Vrat

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा….. Saphala Ekadashi Vrat Katha Hindi : महाराज युधिष्ठिर ने पूछा- हे जनार्दन! पौष कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी क्या विधि है? कृपया मुझे बताएँ। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि धर्मराज, मैं तुम्हारे स्नेह के कारण तुमसे कहता हूँ कि Ekadashi Vrat एकादशी व्रत के अतिरिक्त मैं अधिक से अधिक दक्षिणा पाने वाले यज्ञ से भी प्रसन्न नहीं होता हूँ। अत: इसे अत्यंत भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर करें। हे राजन! द्वादशीयुक्त पौष कृष्ण एकादशी का माहात्म्य तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। इस एकादशी का नाम सफला एकादशी है। इस एकादशी के देवता श्रीनारायण हैं। विधिपूर्वक इस Ekadashi Vrat व्रत को करना चाहिए। जिस प्रकार नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, सब ग्रहों में चंद्रमा, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी तरह सब व्रतों में एकादशी का व्रत श्रेष्ठ है। जो मनुष्य सदैव एकादशी का व्रत करते हैं, वे मुझे परम प्रिय हैं। अब इस व्रत की विधि कहता हूँ। मेरी पूजा के लिए ऋतु के अनुकूल फल, नारियल, नींबू, नैवेद्य आदि सोलह वस्तुओं का संग्रह करें। इस सामग्री से मेरी पूजा करने के बाद रात्रि जागरण करें। इस एकादशी के व्रत के समान यज्ञ, तीर्थ, दान, तप तथा और कोई दूसरा व्रत नहीं है। Ekadashi Vrat पाँच हजार वर्ष तप करने से जो फल मिलता है, उससे भी अधिक सफला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। हे राजन! अब आप इस एकादशी की कथा सुनिए। चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन सबमें लुम्पक नामवाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह पापी सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। सदैव ही देवता, बाह्मण, वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को अपने बड़े पुत्र के ऐसे कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। तब वह विचारने लगा कि कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? अंत में उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन में वह वन में रहता और रात्रि को अपने पिता की नगरी में चोरी करता तथा प्रजा को तंग करने और उन्हें मारने का कुकर्म करता। कुछ समय पश्चात सारी नगरी भयभीत हो गई। वह वन में रहकर पशु आदि को मारकर खाने लगा। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते। Saphala Ekadashi 2025 Date And Time: जानिए सफला एकादशी कब है 2025 में, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके लाभ वन के एक अतिप्राचीन विशाल पीपल का वृक्ष था। लोग उसकी भगवान के समान पूजा करते थे। उसी वृक्ष के नीचे वह महापापी लुम्पक रहा करता था। इस वन को लोग देवताओं की क्रीड़ास्थली मानते थे। Ekadashi Vrat कुछ समय पश्चात पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह वस्त्रहीन होने के कारण शीत के चलते सारी रात्रि सो नहीं सका। उसके हाथ-पैर अकड़ गए। सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अत: पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दु:ख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई। उसके इस उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। दूसरे दिन प्रात: एक ‍अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुअओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके ‘भगवान आपकी जय हो’ कहकर अपने पिता के पास गया। Ekadashi Vrat उसके पिता ने प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन का रास्ता लिया। अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। Ekadashi Vrat उसके स्त्री, पुत्र आदि सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का परम भक्त हो गया। वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ। अत: जो मनुष्य इस परम पवित्र सफला एकादशी का व्रत करता है उसे अंत में मुक्ति मिलती है। जो नहीं करते वे पूँछ और सींगों से रहित पशुओं के समान हैं। इस सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने से अथवा श्रवण करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा Read More »

Aja Ekadashi Vrat Katha

Aja Ekadashi Vrat Katha In Hindi: अजा एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा ,इसके पाठ से अश्वमेध यज्ञ का मिलता फल

Aja Ekadashi Vrat Katha in Hindi: अजा एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति दिलाने वाला है। पद्म पुराण में वर्णित अजा एकादशी की कथा के अनुसार, इस कथा का पाठ करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। अजा एकादशी का व्रत रखने वालों को इस कथा का पाठ जरुर करना चाहिए। तभी व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। Aja Ekadashi Vrat Katha Sunne Ka Fayda :अजा एकादशी की कथा सुनने से फायदा सनातन धर्म(Sanatan Dharma) में अजा एकादशी(Aja Ekadashi) का अपना महत्व है. इस दिन व्रत रखने से कई प्रकार के दुखों से राहत मिलती है. माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से इस व्रत को रखता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है. आइए जानते है Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी से जुड़ी वास्तविक कथा, जिससे पढ़ने और सुनने मात्र से आपके सभी पाप खत्म हो सकते हैं.  Aja Ekadashi Vrat Katha:अजा एकादशी की व्रत कथा, भगवान राम के पूर्वज से जुड़ी है दरासल अजा एकादशी व्रत की कथा भगवान श्रीराम (Ram) के पूर्वंज इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चन्द्र(Raja Harishchandra) की है. राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी राजा थे. जो अपने मुख से निकले वचनों और अपनी कही वाणी को पूरा करने के लिए अपनी अर्धांगिनी तारामती(Taramati) और पुत्र राहुल रोहिताश्व तक को बेच देते हैं और खुद भी एक चाण्डाल(Chanadala) की सेवा करने लग जाते हैं. अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है गौतम ऋषि(Gautam Rishi) के कहने पर राजा हरिश्चन्द्र ने Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी का व्रत किया, तब जाकर उन्हें कष्टों से छुटकारा मिला. आइए जानते हैं इस कथा को विस्तार से, जिसे भगवान श्रीकृष्ण(Shri Krishna) ने युधिष्ठिर(yudhishthir) समेत पांडवों को सुनाई थी.  Aja Ekadashi Vrat Katha: अजा एकादशी की व्रत कथा युधिष्ठिर ने कहा, “हे वासुदेव!  मैनें पुत्रदा एकादशी के बारे में सविस्तार वर्णन सुना. अब कृपा करके मुझे अजा एकादशी के बारे में विस्तार से बताएं. इस एकादशी(Ekadashi) को क्या कहते हैं और इस व्रत को करने के नियम हैं? इस व्रत को करने से किस तरह का फल मिलता है?  श्रीकृष्ण ने कहा कि, “हे कुंती पुत्र! भाद्रपद की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं. इस व्रत को करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है. इस लोक और परलोक में कल्याण करने वाली इस एकादशी व्रत के समान दुनिया में कोई दूसरा व्रत नहीं है. Aja Ekadashi Vrat Katha अब ध्यान से इस कथा को सुनिए. “पौराणिक काल में भगवान राम के वंशज में अयोध्या नगरी के राजा हरिश्चन्द्र नाम का एक राजा था. अपनी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के कारण राजा के दूर-दूर तक चर्चे थे.  एक बार सभी देवताओं ने राजा की परीक्षा लेने की योजना बनाई, राजा ने सपना देखा की ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना सारा वैभव दे दिया है. अगली सुबह राजा जब उठा तो सच में विश्वामित्र राजा के द्वार पर खड़े थे. Aja Ekadashi Vrat Katha विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से कहा, कल रात जो तुमने सपने में मुझे अपना सारा राज-पाठ दान कर दिया है.  राजा ने सत्यनिष्ठा की भावना के साथ अपनी तमाम संपत्ति विश्वामित्र को दान कर दी. दान दक्षिणा देने के लिए राजा हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्नी, बेटा और खुद को बेच दिया. राजा हरिश्चन्द्र को डोम जात के एक व्यक्ति ने खरीद लिया, जो श्मशान घाट में दाह-संस्कार का काम करवाता था. राजा हरिश्चन्द्र एक चाण्डाल के सेवक बन गए. Aja Ekadashi Vrat Katha राजा ने चाण्डाल के लिए कफन लेने का कार्य भी किया, किंतु इस आपत्तिजनक काम करने के बाद भी उन्होंने कभी सच का मार्ग नहीं छोड़ा.  इस काम को करते-करते कई वर्ष बीत जाने के बाद राजा हरिश्चन्द्र को काम पर काफी अफसोस होने लगा, और वह उसे निकालने का रास्ता तलाशने लगे. राजा हरिश्चन्द्र हर वक्त इस काम से मुक्ति के रास्ते तलाशने की कोशिश करते. एक बार राजा की मुलाकात गौतम ऋषि से हुई, राजा ने गौतम ऋषि को प्रणाम कर उन्हें अपनी दुःख-भरी बात बताई.  राजा की दुःख-भरी बातों को सुनकर गौतम ऋषि को भी दुःख हुआ और उन्होंने राजा को बताया,“हे राजन! भादो माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी आती है जिसे अजा एकादशी भी कहा जाता है. तुम उस व्रत को विधि-विधान के साथ करो और रात के वक्त जागरण भी, इससे तुम्हारे सभी तरह के पाप का नाश हो जाएगा. गौतम ऋषि इतनी बात कहकर अंतर्धान हो गए.   अजा एकादशी के आने पर राजा ने महर्षि गौतम के कहे के मुताबिक ही नियमपूर्वक व्रत और रात को जागरण किया. इस व्रत को करने से राजा को सभी पापों से मुक्ति मिल गई. उस वक्त स्वर्ग में जश्न मनाया जाने लगा फूलों की बारिश होने लगी. Aja Ekadashi Vrat Katha राजा हरिश्चन्द्र ने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देवेन्द्र देवताओं को अपने सामने पाया. राजा ने अपने मृत पुत्र और पत्नी को वस्त्रों और आभूषणों से लदा देखा.  व्रत की वजह से राजा को दोबारा उसका राज्य मिल गया, असल में एक ऋषि के द्वारा राजा की परीक्षा लेने के लिए ये सब खेल रचा गया था, लेकिन अजा एकादशी के व्रत के कारण ऋषि द्वारा रची गई माया खत्म हो गई और आखिरी वक्त में हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक में चले गए.  इस कथा को सुनने के बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा,“हे राजन! ये सब Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी व्रत का असर था. जो भी मनुष्य इस व्रत कथा का विधि-विधान के साथ पालन करता है और रात के वक्त जागरण तो उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में वे स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है. कहा जाता है कि इस एकादशी को करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है.

Aja Ekadashi Vrat Katha In Hindi: अजा एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा ,इसके पाठ से अश्वमेध यज्ञ का मिलता फल Read More »

Vrat Katha

Kamika Ekadashi 2025 Vrat Katha: कामिका एकादशी व्रत कथा

Kamika Ekadashi 2025 Vrat Katha : कामिका एकादशी का व्रत हर वर्ष सावन मास की एकादशी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें जीवन के समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है. चूंकि एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस दिन का विशेष महत्व होता है. आइए जानते हैं कामिका एकादशी व्रत 2025 के नियम क्या हैं. कामिका एकादशी व्रत कथा (Kamika Ekadshi Vrat Katha) कुंती पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से कहा कि आपने देवशयनी एकादशी और चातुर्मास के महत्व के बारे में बता दिया है। Vrat Katha अब कृपया श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी के बारे में बताएं। श्रीकृष्ण ने कहा कि हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की कथा एक समय स्वयं ब्रह्माजी भी देवर्षि नारद से कह चुके है, अतः मैं भी तुमसे वहीं कहता हूं। नारदजी ने ब्रह्माजी से श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की इच्छा जताई थी। उस एकादशी का नाम, विधि और माहात्म्य जानना चाहा। ब्रह्मा ने कहा- “हे नारद! श्रावण मास की Vrat Katha कृष्ण एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। इस एकादशी व्रत को सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस तिथि पर शंख, चक्र एवं गदाधारी श्रीविष्णुजी का पूजन होता है। उनकी पूजा करने से जो फल मिलता है सो सुनो। गंगा, काशी, नैमिशारण्य और पुष्कर में स्नान करने से जो फल मिलता है, वह फल विष्णु भगवान के पूजन से भी मिलता है। सूर्य व चंद्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र और काशी में स्नान करने से, भूमि दान करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में आने के समय गोदावरी और गंडकी नदी में स्नान से भी जो फल प्राप्त नहीं होता, वह प्रभु भक्ति और पूजन से प्राप्त होता है। पाप से भयभीत मनुष्यों को Vrat Katha कामिका एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। एकादशी व्रत से बढ़कर पापों के नाशों का कोई उपाय नहीं है। स्वयं प्रभु ने कहा है कि कामिका व्रत से कोई भी जीव कुयोनि में जन्म नहीं लेता। जो इस एकादशी पर श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पण करते हैं, वे इस समस्त पापों से दूर रहते हैं। हे नारद! मैं स्वयं श्री हरी की प्रिय तुलसी को सदैव नमस्कार करता हूं। तुलसी के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और इसके स्पर्श से मनुष्य पवित्र हो जाता है।” व्रत के पीछे क्या है कथा: एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में किसी गांव में एक ठाकुर जी थे। क्रोधी ठाकुर का एक ब्राह्मण से झगडा़ हो गया और क्रोध में आकर ठाकुर से ब्राह्मण का खून हो जाता है। अत: अपने अपराध की क्षमा याचना हेतु ब्राह्मण की क्रिया उसने करनी चाही, परंतु पंडितों ने उसे क्रिया में शामिल होने से मना कर दिया और वह ब्रह्म हत्या का दोषी बन गया। Vrat Katha परिणामस्वरूप ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया। तब उन्होंने एक मुनि से निवेदन किया कि- हे भगवान, मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है, इस पर मुनि ने उसे कामिका एकादशी व्रत करने की प्रेरणा दी। ठाकुर ने वैसा ही किया जैसा मुनि ने उसे करने को कहा था। जब रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास वह शयन कर रहा था, तभी उसे स्वप्न में प्रभु दर्शन देते हैं और उसके पापों को दूर करके उसे क्षमा दान देते हैं। कामिका एकादशी Vrat Katha की रात्रि को दीपदान तथा जागरण के फल का माहात्म्य चित्रगुप्त भी नहीं कह सकते। जो इस एकादशी की रात्रि को भगवान के मंदिर में दीपक जलाते हैं उनके पितर स्वर्गलोक में अमृतपान करते हैं तथा जो घी या तेल का दीपक जलाते हैं, वे सौ करोड़ दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्य लोक को जाते हैं। ब्रह्माजी कहते हैं कि हे नारद! ब्रह्महत्या तथा भ्रूण हत्या आदि पापों को नष्ट करने वाली इस कामिका एकादशी का व्रत मनुष्य को यत्न के साथ करना चाहिए। कामिका एकादशी के व्रत का माहात्म्य श्रद्धा से सुनने और पढ़ने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है।

Kamika Ekadashi 2025 Vrat Katha: कामिका एकादशी व्रत कथा Read More »

What Not To Eat On Ekadashi: एकादशी व्रत के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? जान लें नियम नहीं तो हो जाएगा सब व्यर्थ

What Not To Eat On Ekadashi: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व है। शास्त्रों के अनुसार हर माह दो एकादशी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल कृष्ण पक्ष में। सभी धर्मों के नियम भी अलग-अलग होते हैं। खास कर हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना चाहिए। इन दिनों कुछ चीजों को सेवन निषेध माना गया है। आइए जानें… What Not To Eat On Ekadashi: एकादशी व्रत के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं एकादशी के दिन धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के लाइफ में सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं आती है। इस व्रत के समय जातक को कुछ नियमों का पालन करना चाहिए, जो बेहद अनिवार्य होते हैं। कहा जाता है कि यदि इन नियमों का पालन हो तो व्रत खंडित माना जाता है What Not To Eat On Ekadashi और जातक को लाभ की जगह हानि हो सकती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि एकादशी के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? What cannot be eaten during Ekadashi : एकादशी के दौरान क्या नहीं खा सकते? What Not To Eat On Ekadashi: हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक, एकादशी के दिन जातक और उसके परिवार को चावल बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए। साथ ही व्रत के दौरान किसी प्रकार अन्न और सादा नमक से जातक को परेहज करना चाहिए। इसके अलावा, किसी भी परिस्थिति में जातक को तामसिक भोजन जैसे- प्याज, लहसुन और मसूर की दाल का सेवन भी नहीं करना चाहिए। What can you eat during Ekadashi :एकादशी के दौरान क्या खा सकते? जातक व्रत के दौरान संपूर्ण फल प्राप्ति के लिए नियमों के मुताबिक, शकरकंद, कुट्टू के आटे की रोटी, दूध, दही और फल खा सकते हैं। इसके अलावा, भगवान को भोग लगाया गया पंचामृत भी ग्रहण कर सकते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। KARMASU.IN एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

What Not To Eat On Ekadashi: एकादशी व्रत के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? जान लें नियम नहीं तो हो जाएगा सब व्यर्थ Read More »