VRAT KATHA

Durga ashtami 2024:अगस्त माह में कब रखा जाएगा मासिक दुर्गाष्टमी व्रत? जानें तिथि और मां दुर्गा की पूजा विधि

Durga Ashtami 2024: दुर्गा अष्टमी को माता की अराधना से हर मनोकामना पूरी होती है. माता की कृपा से जीवन में आने वाले सभी प्रकार के कष्ट टल जाते हैं. इस दिन मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस व्रत का विशेष महत्व होता है और इसे रखने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Masik Durgashtami Vrat 2024: धार्मिक मान्यता के अनुसार, हर एक माह की प्रत्येक तिथि किसी न किसी देवी-देवताओं को समर्पित होती है, जिस दिन खासतौर पर उनकी उपासना की जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाता है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूजा की जाती है। इसी के साथ व्रत भी रखा जाता है। चलिए जानते हैं मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूजा विधि और माता को प्रसन्न करने के उपायों के बारे में। Durga Ashtami 2024 मां दुर्गा की पूजा का शुभ मुहूर्त अगस्त महीने में मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत 13 अगस्त, मंगलवार को मनाया जायेगा। अष्टमी तिथि का समय 12 अगस्त 07:55 पूर्वाह्न से शुरू होकर 13 अगस्त को सुबह 09:31 तक है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत 13 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन देवी दुर्गा के हथियारों की पूजा की जाती है और इस उत्सव को ‘अस्त्र पूजा’ के रूप में जाना जाता है। हथियारों और मार्शल आर्ट के अन्य रूपों के प्रदर्शन के कारण इस दिन को लोकप्रिय रूप से ‘विराष्टमी’ भी कहा जाता है। हिंदू भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उनका दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए सख्त उपवास रखते हैं। भारत के उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों में दुर्गा अष्टमी व्रत पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में, दुर्गा अष्टमी को ‘बथुकम्मा पांडुगा’ के रूप में मनाया जाता है। दुर्गा अष्टमी व्रत हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत का महत्व संस्कृत भाषा में ‘दुर्गा’ शब्द का अर्थ है ‘अपराजेय’ और ‘अष्टमी’ का अर्थ है ‘आठवां दिन’। हिंदू किंवदंतियों के अनुसार देवी दुर्गा का उग्र और शक्तिशाली रूप, जिसे ‘देवी भद्रकाली’ के नाम से जाना जाता है, Durga ashtami 2024 अवतरित हुई थीं। दुर्गा अष्टमी का दिन ‘महिषासुर’ नामक राक्षस पर देवी दुर्गा की जीत के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी पूर्ण समर्पण के साथ दुर्गा अष्टमी व्रत का पालन करता है उसे जीवन में खुशी और सौभाग्य प्राप्त होता है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत के दौरान अनुष्ठान मासिक दुर्गा अष्टमी के दिन भक्त देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं। वे सुबह जल्दी उठते हैं और देवी को फूल, चंदन और धूप के रूप में कई चीजें अर्पित करते हैं। कुछ स्थानों पर दुर्गा अष्टमी व्रत के दिन कुमारी पूजा भी की जाती है। हिंदू 6-12 वर्ष की आयु की लड़कियों को देवी दुर्गा के कन्या रूप के रूप में पूजते हैं। देवी को अर्पित करने के लिए विशेष ‘नैवेद्यम’ तैयार किया जाता है। उपवास दिन का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। दुर्गा अष्टमी व्रत का पालनकर्ता पूरे दिन खाने या पीने से परहेज करता है। यह व्रत पुरुषों और महिलाओं द्वारा समान रूप से रखा जाता है। दुर्गा अष्टमी व्रत आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने और देवी दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए मनाया जाता है। Durga ashtami 2024 कुछ भक्त केवल दूध पीकर या फल खाकर व्रत रखते हैं। इस दिन मांसाहारी भोजन और शराब का सेवन सख्त वर्जित है। दुर्गा अष्टमी व्रत करने वाले को फर्श पर सोना चाहिए और आराम और विलासिता से दूर रहना चाहिए। आश्विन शुक्ल पक्ष की दुर्गाष्टमी सबसे लोकप्रिय है और इसे महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में जौ के बीज बोने की भी प्रथा है। जब बीज 3-5 इंच की ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं तो उन्हें देवी को अर्पित किया जाता है और बाद में परिवार के सभी सदस्यों के बीच वितरित किया जाता है। इस दिन भक्त विभिन्न देवी मंत्रों का जाप करते हैं। इस दिन दुर्गा चालीसा का पाठ करना भी फलदायी माना जाता है। पूजा के अंत में, भक्त दुर्गा अष्टमी व्रत कथा भी पढ़ते हैं। हिंदू भक्त पूजा अनुष्ठान पूरा करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन और संतर्पण या दक्षिणा प्रदान करते हैं। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गाष्टमी व्रत की पूजा विधि मासिक दुर्गाष्टमी के दिन प्रात: काल उठने के बाद स्नान आदि करके शुद्ध कपड़े धारण करें। घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव करके शुद्ध करें। मंदिर में माता दुर्गा को फोटो या मूर्ति को स्थापित करें। मां का रोली या हल्दी से तिलक करें। साथ ही उन्हें माला, फूल, फल और श्रृंगार के पांच सामान अर्पित करें। इसी के साथ माता को पूरी, चने और हलवे का भोग लगाएं। इस दौरान मां दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। अंत में माता दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और आरती करें। मां दुर्गा के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र: माता दुर्गा को प्रसन्न करने के उपाय Durga ashtami 2024 माता दुर्गा का लाल रंग अति प्रिय है। इसलिए मासिक दुर्गाष्टमी के दिन लाल रंग के कपड़े धारण करें। इससे आपको मां की विशेष कृपा प्राप्त होगी। मासिक दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा को बर्फी, पूरी, चने और हलवे का भोग लगाना शुभ होता है। इससे मां प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा को एक चांदी का सिक्का जरूर अर्पित करें। Durga ashtami 2024 व्रत का पारण करने के बाद उस सिक्के को घर की तिजोरी में छुपाकर रख दें। इस उपाय को करने से आपको व आपके परिवारवालों को माता दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होगी, जिससे आर्थिक तंगी धीरे-धीरे दूर होने लगेगी। माता दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मिट्टी से बना घर खरीदकर घर लाएं। इससे घर में सुख-शांति, समृद्धि, धन-धान्य और खुशहाली का वास होगा। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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वट सावित्री व्रत कथा: सच्चे प्रेम और पतिव्रता का प्रतीक

विवाहित महिलाओं के बीच अत्यधिक प्रचलित ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाले सावित्री व्रत कथा निम्न प्रकार से है: भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि: राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन! यह क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए। सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु हैं। तुम्हे किसी और को अपना जीवन साथी बनाना चाहिए। इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं, राजा एक बार ही आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। वट सावित्री सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी। राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। समय बीतता चला गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया। हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गये साथ में सावित्री भी गईं। जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गये। तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा, दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गये। सावित्री अपना भविष्य समझ गईं। सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगीं। तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है। लेकिन सावित्री नहीं मानी। सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी, तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो। सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे। अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है।

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Mokshada Ekadashi :क्यों करते हैं मोक्षदा एकादशी व्रत? जानिए व्रत कथा और इसका महत्व

Mokshada Ekadashi: हिन्दू कलैंडर के मुताबिक, मार्गशीर्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी Mokshada Ekadashi कहा जाता हैं. इस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती हैं साथ ही यह धनुर्मास की एकादशी कहलाती हैं, जिस कारण इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता हैं.  Mokshada Ekadashi ka mahatv मोक्षदा एकादशी का महत्व Mokshada Ekadashi 2023: इस साल कब है मोक्षदा एकादशी? जानें पूजा विधि, मुहूर्त का सही समय मोक्षदा एकादशी व्रत कथा mokshada Ekadashi vrat katha एक समय की बात है, एक धर्मात्मा राजा था जिसका नाम वैखानस था। एक दिन राजा को स्वप्न में अपने पिता के दर्शन हुए। पिता ने बताया कि वे नरक में हैं और कष्ट भोग रहे हैं। राजा ने अपने विद्वानों से इस बारे में पूछा। विद्वानों ने बताया कि राजा के पिता ने अपने जीवनकाल में कई पाप किए थे, जिसके कारण उन्हें नरक में कष्ट भोगना पड़ रहा है। राजा ने अपने पिता को नरक से मुक्त कराने का संकल्प लिया। राजा आश्रम गए. वहाँ कई सिद्ध गुरु थे, सभी अपनी तपस्या में लीन थे. महाराज पर्वत मुनि के पास गए उन्हें प्रणाम किया और समीप बैठ गए. पर्वत मुनि ने मुस्कुराकर आने का कारण पूछा. राजा अत्यंत दुखी थे उनकी आंखों से अश्रु की धार लग गई. तब पर्वत मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टी से सम्पूर्ण सत्य देखा और राजा के सर पर हाथ रखा और यह भी कहा तुम एक पुण्य आत्मा हो, जो अपने पिता के दुःख से इतने दुखी हो. तुम्हारे पिता को उनके कर्मो का फल मिल रहा हैं. उन्होंने तुम्हारी माता को तुम्हारी सौतेली माता के कारण बहुत यातनाएं दी. इसी कारण वे इस पाप के भागी बने और नरक भोग रहे हैं. राजा ने पर्वत मुनि से इस दुविधा के हल पूछा इस पर मुनि ने उन्हें मोक्षदा एकादशी व्रत पालन करने एवम इसका फल अपने पिता को देने का कहा राजा ने मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi )का व्रत रखा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की। व्रत के प्रभाव से राजा के पिता को नरक से मुक्ति मिल गई और वे स्वर्गलोक में चले गए। राजा ने भी व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति की।

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Shani Pradosh Vrat Katha Puja Vidhi:शनि प्रदोष व्रत कथा, पूजा विधि, उद्यापन विधि

शनि प्रदोष व्रत कथा | Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi शनि प्रदोष व्रत कथा Shani Pradosh Vrat Katha एक समय की बात है। एक नगर में एक सेठ रहता था। वह बहुत धनी और दयालु था। वह दूसरों की मदद करने में हमेशा तत्पर रहता था। लेकिन सेठ और उसकी पत्नी को कोई संतान नहीं थी। इससे वे दोनों बहुत दुखी थे। एक दिन, सेठ और उसकी पत्नी तीर्थयात्रा पर गए। रास्ते में उन्हें एक साधु मिले। साधु ने सेठ और उसकी पत्नी को शनि प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत को करने से उनके संतान प्राप्ति की कामना पूरी होगी। सेठ और उसकी पत्नी ने साधु की बात मान ली और शनि प्रदोष Shani Pradosh व्रत करने लगे। व्रत के दौरान वे नियमपूर्वक पूजा-पाठ करते थे और शनि देव की वंदना करते थे। श्री शनिदेव चालीसा Sri Shani Dev Chalisa कुछ समय बाद, सेठ की पत्नी को एक पुत्र हुआ। सेठ और उसकी पत्नी बहुत खुश हुए। उन्होंने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकर एक बुद्धिमान और कर्मठ व्यक्ति था। उसने अपने माता-पिता की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। शंकर के जन्म से सेठ और उसकी पत्नी की सभी समस्याएं दूर हो गईं। वे दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि SHANI PRADOSH BRAT KI PUJA BIDHI शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय की जाती है। पूजा के लिए सबसे अच्छा समय शाम 4:30 बजे से 7:00 बजे तक का होता है। पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है: पूजा विधि: PUJA BIDHI शनि प्रदोष व्रत का महत्व SHANI PRADOSH BRAT KA mahatv शनि प्रदोष Shani Pradosh व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस व्रत को करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है। शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता है। वे अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का फल देते हैं। शनि प्रदोष व्रत करने से शनि देव के क्रोध से मुक्ति मिलती है। साथ ही, इस व्रत को करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। शनि प्रदोष व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: शनि प्रदोष व्रत के नियम SHANI PRADOSH BRAT KE NIYAM शनि प्रदोष Shani Pradosh व्रत को करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: शनि प्रदोष व्रत करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

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Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत में रात को ही क्यों की जाती है भोलेनाथ की पूजा? जानिए वजह

( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत को रखने से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति, रोगों से मुक्ति, और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत की मान्यताओं के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। इसलिए इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। इसके अलावा, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव का विवाह चतुर्दशी तिथि को हुआ था। इसलिए इस दिन का विशेष महत्व है। मासिक शिवरात्रि व्रत रखने वाले भक्तों को इस दिन निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए: Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत रखने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं: मासिक शिवरात्रि व्रत हर महीने किया जा सकता है। यह व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है। मासिक शिवरात्रि का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मासिक शिवरात्रि का व्रत असंभव को भी संभव कर सकता है और इस व्रत को रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस व्रत में रात्रि के समय में पूजा करने के बाद रात को जागरण करते हुए भोलेनाथ की अराधना करनी चाहिए. यदि कुंवारे लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत व पूजन करते हैं तो जल्द ही उन्हें अच्छा जीवनसाथी मिलता है. रात को क्यों होती है भोलेनाथ की पूजा पौराणिक कथाओं के अनुसार चतुर्दशी तिथि की रात्रि में भगवान शिव का विवाह हुआ था, इसलिए भोलेनाथ को रात्रि प्रिय है. यही वजह है कि मासिक शिवरात्रि के दिन अगर रात्रि के समय भगवान शिव का पूजन किया जाए तो वह प्रसन्न होते हैं. इसके अलावा शिव को संहार का देवता भी कहा गया है और रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है. इसलिए मासिक शिवरात्रि की रात को विधि-विधान के साथ भगवान शिव का पूजन करने से जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है. मासिक शिवरात्रि का व्रत करने पर जातक रात्रि के चार प्रहर में भगवान शिव का पूजन करता है. बता दें ​कि प्रत्येक प्रहर 3 घंटे का होता है. एक प्रहर में भोलेनाथ का दूध से अभिषेक किया जाता है, फिर दही और फिर शहद से ​अभिषेक होता है.

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Masik Shivratri 2023: इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि, जानें तिथि और पूजा विधि

मासिक शिवरात्रि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि Masik Shivratri 2023 Masik Shivratri 2023 मासिक शिवरात्रि 11 दिसबंर के दिन शनिवार को सुबह 7 बजकर 10 मिनट से शुरू होगी। साथ ही इस तिथि की समाप्ति 12 दिसंबर, रविवार सुबह 6 बजकर 24 मिनट पर होगी। ऐसे में इस बार मासिक शिवरात्रि की उपासना 11 दिसंबर को की जाएगी। पूजा विधि मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह उठकर सबसे पहले स्नानादि से निवृत हो जाएं। इसके बाद महादेव की पूजा करें। ऐसा कहा जाता है औघड़दानी को बेलपत्र, भांग, धतूरा अति प्रिय है। व्रती को सुबह स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर मंदिर में जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाओं को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान शिव को दूध, दही, घी, शहद, फल, फूल, धूप, दीप आदि अर्पित करें। भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। भगवान शिव की आरती करें। अंत में प्रसाद वितरित करें। इसलिए इन चीजों को अपनी पूजा में जरूर शामिल करें। इसके साथ व्रत कथा का पाठ करें या सुनें। अंत में कपूर की आरती से पूजा का समापन करें। मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। शिव स्तुति आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ निर्विकार ओमकार अविनाशी, तुम्ही देवाधि देव, जगत सर्जक प्रलय करता, शिवम सत्यम सुंदरा ॥ निरंकार स्वरूप कालेश्वर, महा योगीश्वरा, दयानिधि दानिश्वर जय, जटाधार अभयंकरा ॥ शूल पानी त्रिशूल धारी, औगड़ी बाघम्बरी, जय महेश त्रिलोचनाय, विश्वनाथ विशम्भरा ॥ नाथ नागेश्वर हरो हर, पाप साप अभिशाप तम, महादेव महान भोले, सदा शिव शिव संकरा ॥ जगत पति अनुरकती भक्ति, सदैव तेरे चरण हो, क्षमा हो अपराध सब, जय जयति जगदीश्वरा ॥ जनम जीवन जगत का, संताप ताप मिटे सभी, ओम नमः शिवाय मन, जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥ आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।

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रविवार की कहानी | रविवार (इतवार) व्रत कथा | Sunday vrat katha in hindi

(Sunday vrat katha in hindi ) एक बूढ़ी औरत थी जो सूर्य देवता की पूजा करती थी। हर सुबह मैं अपना घर साफ करती और गाय के गोबर से लिपटी। इसके बाद ही वह खाना बनाती है और खाती थी पूर्णविराम वह अपने पड़ोसी के घर से गोबर इकट्ठा करती थी। पड़ोसी की पत्नी को यह पसंद नहीं था। एक दिन उसने अपनी गाय घर के अंदर बांध दी। अगले दिन बूढ़ी औरत को गोबर नहीं मिला और वह अपना घर नहीं लिप पाई। उसका घर साफ नहीं हो सका था, इसलिए उसने उस दिन भोजन नहीं किया। सूर्यकवचस्तोत्रम् २ Suryakavachastotram 2 उस रात सूर्य देवता उसके सपनों में आए। उन्होंने उसे एक गाय देने का वचन दिया। अगले दिन उसने अपने घर में एक गाय और बछड़े को पाया। पड़ोसी की पत्नी नहीं है देखा तो वह जल भुन गई। उसने यह भी देखा कि बुढ़िया की गाय तो सोने का गोबर करती है। उसके मन में लालच आ गया और उसने सोने का गोबर उठाकर उसकी जगह साधारण गोबर रख दिया। सूर्य देवता ने यह देख लिया। उन्होंने उस रात नगर में तूफान ला दिया। बूढ़ी औरत ने गाय को अपने घर के अंदर बांध लिया जिससे सोने का गोबर उसे ही मिल गया। पड़ोसी की पत्नी ने सोने का गोबर देने वाली गाय की बात जाकर राजा को बता दी। राजा ने वह जादुई गाय ले ली और अपने महल पर सोने के गोबर काले करा दिया। रात में सूर्य देवता राजा के सपने में आए और बोले कि वह गाय उन्होंने बूढ़ी औरत को भेज की है। जब राजा जागा तो उसने पाया कि उसके महल से दुर्गंध आ रही है। उसने देखा तो महल की दीवारों पर किया गया सोने के गोबर का लेप साधारण गोबर के लेप में बदल चुका था। उसे अपने कृत्य पर दुख हुआ और उसने बूढ़ी औरत को वह गाय लौटा दी। उसने पड़ोसी की चालाक पत्नी को दंड भी दिया। उसने यह घोषणा भी करा दी की उसके राज्य में हर कोई रविवार के दिन सूर्य की पूजा करेगा और उपवास रखेगा।

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Chhath Vrat Katha छठ पूजा की पौराणिक तथा व्रत कथा: द्रौपदी ने रखा था छठ का व्रत

Chhath Vrat Katha छठ व्रत कथा  दिवाली के 6 दिन बाद छठ मनाया जाता है। छठ के महाव्रत को करना अत्यंत पुण्यदायक है। छठ व्रत सबसे महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को होता है। सूर्योपासना का यह महापर्व चार दिनों तक मनाया जाता है। छठ पर्व के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं, किन्तु पौराणिक शास्त्रों में इसे देवी द्रोपदी से जौड़कर देखा जाता है।मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इसी तरह छठ का व्रत करने से लोगों के घरों में समृद्धि और सुख आता है। छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित कई क्षेत्रों में छठ का महत्व है। छठ पूजा या सूर्य षष्ठी या छठ व्रत में सूर्य भगवान की पूजा होती है और धरती पर लोगों के सुखी जीवन के लिए सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। सूर्य देव को ऊर्जा और जीवन शक्ति का देवता माना जाता है। इसलिए छठ पर्व पर समृद्धि के लिए पूजा की जाती है।  सूर्य की पूजा से विभिन्न बीमारियों का इलाज संभव है। सूर्य पूजा के साथ स्नान किया जाता है। इससे कुष्ठ रोग जैसी गंभीर रोग भी दूर हो जाते हैं। छठ पर्व परिवार के सदस्यों और मित्रों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए भी मनाया जाता है। * एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: नवंबर में छठ पूजा कब है? जानें नहाए खाय, खरना की डेट व अर्घ्य टाइमिंग * एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। * कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। * एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।  इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।  Chhath Vrat Katha छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है।  छठ व्रत पूजा विधि छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं। जिनकी पूजा के लिए छठ मनाया जाता है। छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। छठी मैया का ध्यान करते हुए लोग मां गंगा-यमुना या किसी नदी के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इसमें सूर्य की पूजा अनिवार्य है साथ ही किसी नदी में स्नान करना भी। इस पर्व में पहले दिन घर की साफ सफाई की जाती है। छठ पर्व पर गांवों में अधिक सफाई देखने को मिलती है। छठ के चार दिनों तक शुद्ध शाकाहारी भोजन किया जाता है, दूसरे दिन खरना का कार्यक्रम होता है, तीसरे दिन भगवान सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन भक्त उदियमान सूर्य को उषा अर्घ्य देते हैं। छठ के दिन अगर कोई व्यक्ति व्रत को करता है तो  वह अत्यंत शुभ और मंगलकारी होता है। पूरे भक्तिभाव और विधि विधान से छठ व्रत करने वाला व्यक्ति सुखी और साधनसंपन्न होता है। साथ ही निःसंतानों को संतान प्राप्ति होती है। छठ व्रत अनुष्ठान विधि छठ के दिन सूर्योदय में उठना चाहिए।  व्यक्ति को अपने घर के पास एक झील, तालाब या नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद नदी के किनारे खड़े होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता को नमन करें और विधिवत पूजा करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सूर्य को धुप और फूल अर्पण करें। छठ पूजा में सात प्रकार के फूल, चावल, चंदन, तिल आदि से युक्त जल को सूर्य को अर्पण करें। सर झुका कर प्रार्थना करते हुए ॐ घृणिं सूर्याय नमः, ॐ घृणिं सूर्य: आदित्य:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा,  या फिर ॐ सूर्याय नमः 108 बार बोलें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन

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Kartik Maas:कार्तिक मास व्रत कथा, इसके पाठ से मिलती है लक्ष्मी नारायण की कथा

कार्तिक मास में भगवान विष्णु धरती पर जल में वास करते हैं। इसलिए इस महीने में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का विशेष महत्व है। 29 अक्टूबर से कार्तिक मास का आरंभ हो गया है। कार्तिक मास में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको इस कथा का रोजाना पाठ करना चाहिए। नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी हजार सनकादि ऋषियों से कहा: अब मैं आपको कार्तिक मास (Kartik Maas )की कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूं, जिसका श्रवण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त समय में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। सूतजी ने कहा: श्रीकृष्ण जी से अनुमति लेकर देवर्षि नारद के चले जाने के पश्चात। सत्यभामा प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण से बोली: हे प्रभु! मैं धन्य हुई, मेरा जन्म सफल हुआ, मुझ जैसी त्रौलोक्य सुन्दरी के जन्मदाता भी धन्य हैं, जो आपकी सोलह हजार स्त्रियों के बीच में आपकी परम प्यारी पत्नी बनी। मैंने आपके साथ नारद जी को वह कल्पवृक्ष आदिपुरुष विधिपूर्वक दान में दिया, परन्तु वही कल्पवृक्ष मेरे घर लहराया करता है। यह बात मृत्युलोक में किसी स्त्री को ज्ञात नहीं है। Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त हे त्रिलोकीनाथ! मैं आपसे कुछ पूछने की इच्छुक हूं। आप मुझे कृपया कार्तिक माहात्म्य की कथा विस्तारपूर्वक सुनाइये जिसको सुनकर मेरा हित हो और जिसके करने से कल्पपर्यन्त भी आप मुझसे विमुख न हों।सूतजी आगे बोले: सत्यभामा के ऐसे वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने हंसते हुए सत्यभामा का हाथ पकड़ा और अपने सेवकों को वहीं रुकने के लिए कहकर विलासयुक्त अपनी पत्नी को कल्पवृक्ष के नीचे ले गये फिर हंसकर बोले: हे प्रिये! सोलह हजार रानियों में से तुम मुझे प्राणों के समान प्यारी हो। तुम्हारे लिए मैंने इन्द्र और देवताओं से विरोध किया था। हे कान्ते! जो बात तुमने मुझसे पूछी है, उसे सुनो। Kartik Maas एक दिन मैंने(श्रीकृष्ण) तुम्हारी(सत्यभामा) इच्छापूर्ति के लिए गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक जाकर कल्पवृक्ष मांगा। इन्द्र द्वारा मना किए जाने पर इन्द्र और गरुड़ में घोर युद्ध हुआ और गौ लोक में भी गरुड़ जी गौओं से युद्ध किया। गरुड़ की चोंच की चोट से उनके कान एवं पूंछ कटकर गिरने लगे जिससे तीन वस्तुएं उत्पन्न हुई। कान से तम्बाकू, पूँछ से गोभी और रक्त से मेहंदी बनी। इन तीनों का प्रयोग करने वाले को मोक्ष नहीं मिलता तब गौओं ने भी क्रोधित होकर गरुड़ पर वार किया जिससे उनके तीन पंख टूटकर गिर गये। इनके पहले पंख से नीलकण्ठ, दूसरे से मोर और तीसरे से चकवा-चकवी उत्पन्न हुए। हे प्रिये! इन तीनों का दर्शन करने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त हो जाता है। यह सुनकर सत्यभामा ने कहा: हे प्रभो! कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों के विषय में बताइए कि मैंने पूर्व जन्म में कौन-कौन से दान, व्रत व जप नहीं किए हैं। मेरा स्वभाव कैसा था, मेरे जन्मदाता कौन थे और मुझे मृत्युलोक में जन्म क्यों लेना पड़ा। मैंने ऎसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मैं आपकी अर्द्धांगिनी हुई? श्रीकृष्ण ने कहा: हे प्रिये! अब मै तुम्हारे द्वारा पूर्व जन्म में किए गए पुण्य कर्मों को विस्तारपूर्वक कहता हूं, उसे सुनो। पूर्व समय में सतयुग के अन्त में मायापुरी में अत्रि-गोत्र में वेद-वेदान्त का ज्ञाता देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह प्रतिदिन अतिथियों की सेवा, हवन और सूर्य भगवान का पूजन किया करता था। वह सूर्य के समान तेजस्वी था। वृद्धावस्था में उसे गुणवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। उस पुत्रहीन ब्राह्मण ने अपनी कन्या का विवाह अपने ही चन्द्र नामक शिष्य के साथ कर दिया। वह चन्द्र को अपने पुत्र के समान मानता था और चन्द्र भी उसे अपने पिता की भांति सम्मान देता था। Kartik Maas एक दिन वे दोनों कुश व समिधा लेने के लिए जंगल में गये। जब वे हिमालय में भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें एक राक्षस आता हुआ दिखाई दिया। उस राक्षस को देखकर भय के कारण उनके अंग शिथिल हो गये और वे वहां से भागने में भी असमर्थ हो गये तब उस काल के समान राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। चूंकि वे धर्मात्मा थे इसलिए मेरे पार्षद उन्हें मेरे वैकुण्ठ धाम में मेरे पास ले आये। उन दोनों द्वारा आजीवन सूर्य भगवान की पूजा किये जाने के कारण मैं दोनों पर अति प्रसन्न हुआ। गणेश जी, शिवजी, सूर्य व देवी, इन सबकी पूजा करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मैं एक होता हुआ भी काल और कर्मों के भेद से पांच प्रकार का होता हूं। जैसे- एक देवदत्त, पिता, भ्राता, आदि नामों से पुकारा जाता है। जब वे दोनों विमान पर आरुढ़ होकर सूर्य के समान तेजस्वी, रूपवान, चन्दन की माला धारण किये हुए मेरे भवन में आये तो वे दिव्य भोगों को माता लक्ष्मी के प्रमुख मंदिर : पद्मावती मंदिर तिरुचुरा, लक्ष्मीनारायण मंदिर वेल्लूर, महालक्ष्मी मंदिर मुंबई, लक्ष्मीनारायण मंदिर दिल्ली, लक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर, अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई, अष्टलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद, लक्ष्मी-कुबेर मंदिर वडलूर (चेन्नई), लक्ष्मीनारायण मंदिर जयपुर, महालक्ष्मी मंदिर इंदौर, श्रीपुरम् का स्वर्ण मंदिर तमिलनाडु, पचमठा मंदिर जबलपुर आदि।

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Rama ekadashi vrat katha : रमा एकादशी के दिन जरूर करें व्रत कथा का पाठ, हर मनोकामना होगी पूरी

हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत रखा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस व्रत में विधिवत पूजा करने के साथ-साथ इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। रमा एकादशी Vrat katha एक समय की बात है कि मुचकुंद नाम का एक सत्यवादी तथा विष्णु भक्त राजा था। राजा ने अपनी प्यारी सी बेटी चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से किया था। राजा मुचुकुंद एकादशी का व्रत विधिवत तरीके से करता है। इतना ही नहीं उसकी प्रजा भी एकादशी के नियमों का अच्छी तरह से पालन करती थी। एक बार कार्तिक मास के दौरान सोभन ससुराल आया। उस दिन रमा एकादशी का व्रत था। राजा ने घोषणा कर दी कि सभी लोग रमा एकादशी का व्रत नियम पूर्वक करें। राजा की पुत्री चंद्रभागा को लगा कि ऐसे में उसके पति को अधिक पीड़ा होगी क्योंकि वह कमजोर हृदय का है। जब सोभन ने राजा का आदेश सुना तो पत्नी के पास आया और इस व्रत से बचने का उपाय पूछा। उसने कहा कि यह व्रत करने से वह मर जाएगा। इस पर चंद्रभागा ने कहा कि इस राज्य में रमा एकादशी के दिन कोई भोजन नहीं करता है। यदि आप व्रत नहीं कर सकते हैं तो दूसरी जगह चले जाएं। इस पर सोभन ने कहा कि वह मर जाएगा लेकिन दूसरी जगह नहीं जाएगा, वह व्रत करेगा। उसने रमा एकादशी व्रत किया, लेकिन भूख से उसका बुरा हाल हो गया था। रमा एकादशी की रात्रि के समय जागर भी ण था, वह रात सोभन के लिए असहनीय थी। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व ही भूखे सोभन की मौत हो गई। ऐसे में  राजा मुचकुंद ने अपने दामाद सोभन का शव को जल प्रवाह करा दिया था और अपनी बेटी को सती न होने का आदेश दिया। उसने बेटी से भगवान विष्णु पर आस्था रखने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर बेटी ने व्रत को पूरा किया। उधर रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से सोभन जीवित हो गया और उसे विष्णु कृपा से मंदराचल पर्वत पर देवपुर नामक उत्तम नगर मिला। राजा सोभन के राज्य में स्वर्ण, मणियों, आभूषण की कोई कमी न थी। एक दिन राजा मुचकुंद के नगर का एक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करते हुए सोभन के नगर में पहुंचा। जहां उसने राजा सोभन से मुलाकात की। राजा ने अपनी पत्नी चंद्रभागा तथा ससुर मुचकुंद के बारे में पूछा। ब्राह्मण ने कहा कि वे सभी कुशल हैं। आप बताएं, रमा एकादशी का व्रत करने के कारण आपकी मृत्यु हो गई थी। अपने बारे में बताएं। फिर आपको इतना सुंदर नगर कैसे प्राप्त हुआ? तब सोभन ने कहा कि यह सब रमा एकादशी व्रत का फल है, लेकिन यह अस्थिर है क्योंकि वह व्रत विवशता में किया था। जिस कारण अस्थिर नगर मिला, लेकिन चंद्रभागा इसे स्थिर कर सकती है। उस ब्राह्मण ने सारी बातें चंद्रभागा से कही। तब चंद्रभागा ने कहा कि यह स्वप्न तो नहीं है। ब्राह्मण ने कहा कि नहीं, वह प्रत्यक्ष तौर पर देखकर आया है। उसने चंद्रभागा से कहा कि तुम कुछ ऐसा उपाय करो, जिससे वह नगर स्थिर हो जाए। तब चंद्रभागा ने उसे देव नगर में जाने को कहा। उसने कहा कि वह अपने पति को देखेंगी और अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर कर देगी। तब ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत पर वामदेव के पास ले गया। वामदेव ने उसकी कथा सुनकर उसे मंत्रों से अभिषेक किया। फिर चंद्रभागा ने व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण किया और सोभन के पास गई। सोभन ने उसे सिंहासन पर अपने पास बैठाया। फिर चंद्रभागा ने पति को अपने पुण्य के बारे में सुनाया। उसने कहा कि वह अपने मायके में 8 वर्ष की आयु से ही नियम से एकादशी व्रत कर रही हैं। उस व्रत के प्रभाव से यह नगर स्थिर हो जाएगा तथा यह प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। दिव्य देह धारण किए चंद्रभागा अपने पति सोभन के साथ उस नगर में सुख पूर्वक रहने लगी।

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