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Navratri Day 1 2025: Maa Shailputri Puja Vidhi, Katha, Mantra & Importance

Navratri 2025 का पहला दिन बेहद खास माना जाता है। इस दिन माँ शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजा की जाती है। शारदीय नवरात्रि (Sharadiya Navratri) की शुरुआत इसी दिन से होती है। माँ शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। आइए जानते हैं Navratri Day 1 puja vidhi, story, mantra और महत्व विस्तार से। Navratri Day 1 Puja Vidhi (नवरात्रि प्रथम दिन पूजा विधि) 1. कलश स्थापना (Ghatasthapana): सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। मिट्टी के बर्तन में जौ/गेहूं बोकर उस पर जल से भरा कलश रखें। कलश पर नारियल, आम के पत्ते और मौली बाँधें। 2. माँ शैलपुत्री की पूजा: माँ शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा शैलपुत्री स्तुति का पाठ करें। 3. विशेष भोग: माँ को घी का भोग चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इस दिन घी अर्पित करने से जीवन में निरोगिता और शक्ति प्राप्त होती है। Navratri Day 1 Story (माँ शैलपुत्री की कथा) माँ शैलपुत्री का जन्म हिमालय के घर हुआ था, इसलिए इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा गया।पिछले जन्म में ये सती थीं, जिन्होंने भगवान शिव के अपमान को सह न पाने के कारण अपने प्राण त्याग दिए थे। अगले जन्म में हिमालय की पुत्री बनकर इनका पुनर्जन्म हुआ। माँ शैलपुत्री ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त किया।इनका वाहन वृषभ (बैल) है और इनके हाथों में त्रिशूल तथा कमल सुशोभित रहते हैं। Navratri Day 1 Maa Shailputri Mantra ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥ इस मंत्र का जप करने से मन को स्थिरता, शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। Navratri Day 1 Importance (महत्व) नवरात्रि के प्रथम दिन की पूजा से संकल्प शक्ति मजबूत होती है। माँ शैलपुत्री साधना से जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा आती है। कलश स्थापना करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। Navratri Day 1 Puja Vidhi Maa Shailputri Puja Vidhi 2025 Navratri First Day Story in Hindi Navratri 2025 Ghatasthapana Maa Shailputri Mantra Benefits Navratri Day 1 Importance

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Rishikrita Katyayani Stutih: ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः

Rishikrita Katyayani Stutih: ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः अन्य दुर्गाध्यानानि । ॥ कात्यायनी ॥ कात्यायनी दशभुजा देवी ही महिषासुर मर्दिनी है । प्रथम कल्पमें उग्रचण्डा रूप में, द्वितीय कल्प में १६ भुजा भद्रकाली रूप मेंतथा तृतीय कल्प में कात्यायनी ने दश भुजा रूप धारण करकेमहिषासुर का वध किया । कात्यायनी मुनि के द्वारा स्तुति करने परबिल्व वृक्ष के पास देवी प्रकट हुई थी । आश्विन कृष्णा १४ कोभगवती प्रकट हुई थी । शुक्ला सप्तमी को देवी की तेजोमयी मूर्तिने शोभनरूप धारण किया । अष्टमी को समलङ्कृत की गई तथानवमी को उपहारों से पूजित हुई एवं उसने महिषासुर का वध कियातथा दशमी को देवी विदा हुई (इति कालिका पुराणे) । नमस्कार ध्यान ।चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।कात्यायनी शुभं दद्याद् देवि दानव घातिनी ॥ कात्यायनी गायत्री –ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी धीमहि तन्नो दुर्गेः प्रचोदयात् । कात्यायनी ध्यानम् ।चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी ॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद, प्रसीद। मातर्जगतोऽखिलस्य ।प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ॥ कात्यायनीस्तुतिः ऋषिकृता ॥ (महाकाल संहितायाम्)जगदम्ब जयानन्ते सर्वेकसाक्षिणि ।सङ्कटोद्धारिणि शिवे भक्तानामभयङ्करे ॥ समस्त जगताधारभूते ब्रह्मस्वरूपिणि ।विधीश हरि शक्रादि देवा विदित वैभवे ॥ सृष्टि स्थिति प्रलयकृत् त्रिगुणात्मक विग्रहे ।परापरेशि प्रणतमनुज-प्राणदायिनि ॥ मदुपास्यतया ख्यातनाम्नि त्रिभुवनेश्वरि ।कात्यायनि जगद्वन्द्ये महाकालि नमोस्तुते ॥ मत्प्राणरक्षणकृते भीनाशय दिवौकसाम् ।स्वरूपं दर्शयामुष्मै विल्ववृक्षाद् विनिःसृता ॥ दशभुजा कात्यायनी ध्यानम् ।जटाजूटसमायुक्तामर्धेन्दुकृत लक्षणाम् ।नेत्रत्रयसमायुक्तां पद्मेन्दुसदृशाननाम् ॥ अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम् ।नवयौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् ॥ सुचारुदशनां तद्वत्पीनोन्नतपयोधराम् ।त्रिभङ्गस्थान संस्थानां महिषासुरमर्दिनीम् ॥ त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः ।तीक्ष्णं बाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत ॥ खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुश मूर्ध्वतः ।घण्टां वा परशुं चापि वामतः सन्निवेशयेत् ॥ अधस्तान्महिषं तद्वधि शिरस्कं प्रदर्शयेत् ।शिरश्चेदोद्भवं तद्वद्दानवं खड्गपाणिनम् ॥ ॥ षोडशभुजा दुर्गा ध्यानम् ॥ महिषासुर मर्दिनी षोडशभुजा दुर्गा भद्रकाली ही है । क्षीरोदस्योत्तरे तीरे विभ्रती विपुलां तनुम् ।अतसीपुष्पवर्णाभा ज्वलत्काञ्चनकुण्डलाम् ॥ जटाजूटमखण्डेन्दुमुकुटत्रय भूषिता ।नागहारेण सहिता स्वर्णहार विभूषिता ॥ शूलं खड्गं च शङ्ख च चक्रं बाणं तथैव च ।शक्तिं वज्रं च दण्डं च नित्यं दक्षिणबाहुभिः ॥ विभ्रती सततं देवी विकाशिनयनोज्ज्वला ।खेटकं चर्म चापं च पाशञ्चाङ्कुशमेव च ॥ घण्टां परशुं मुशलं विभ्रतो वामपाणिभिः ।सिंहस्था नयनै रक्तवर्णैस्त्रिभिरभिज्ज्वला ॥ शूलेन महिषं भित्त्वा तिष्ठती परमेश्वरी ।वामपादेन चाक्रम्य तत्र देवी जगन्मयी ॥ अष्टादशभुजा दुर्गा ध्यानम् ।अष्टादशभुजा दुर्गा उग्रचण्ड स्वरूपा है ।कल्पभेद महिषासुरमर्दिनि का महालक्ष्मी स्वरूपा भेद भी यही है । ध्यानम् ।अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुःकुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ॥। १॥ शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मी सरोजस्थिताम् ॥ २॥ अन्यच्च ।ततो ध्यायेन्महालक्ष्मी महिषासुरमर्दिनीम् ।समस्तदेवता तेजोजातां पद्मासन स्थिताम् ॥ अष्टादशभुजामक्षमालां पद्मं च शायकान् ।खड्गं वज्रं गदां चक्रं दक्षहस्ते कमण्डलुम् ॥ खड्गं च दधतीं वामे शक्तिं च परशुं धनुः ।चर्मदण्डौ सुरापात्रं घण्टां पाशं त्रिशूलकम् ॥ अष्टादशभुजा ध्यानम् ।धम्मिल्लसंयतकचा विधोश्चाधोमुखीं कलाम् ।केशान्ते तिलकस्योद्धे दधती सुमनोहरा ॥ मणिकुण्डल सन्धृष्टगण्डा मुकुटमण्डिता ।सज्ज्योतिः कर्णपूराभ्यां कर्णावापूर्य सङ्गता ॥ ससुवर्णमणिमाणिक्य नागहार विराजिता ।सदासुधिभिः पद्मैरम्लानैरति सुन्दरी ॥ मालां विभर्ति ग्रीवायां रत्नकेयूरधारिणी ।मृणालायत वृत्तैस्तु बाहुभिः कोमलै शुभैः ॥ राजन्ती कञ्जुकोपेता पीनोन्नत पयोधरा ।क्षीणमध्या पीतवस्त्रा त्रिवलोमध्यभूषिता ॥ अष्टादशभुजैका तु दक्षे मुण्डं च खेटकम् ।आदर्शं तर्जनीं चाप ध्वजं डमरुकं चर्मं च ॥ पाशं वामे विभ्रती च शक्ति मुद्गर शूलकम् ।वज्र खड्गाङ्कुश शरांश्चक्रं देवी शलाकया ॥ सिंहोस्योपरि तिष्ठन्ती व्याघ्रचर्मणि कौशिकी ।विभ्रती रूपममतुलं ससुरासुर मोहनम् ॥ (अस्त्रों का क्रम पुरश्चर्यार्णव में अधूरा है अतः अस्त्रक्रमअग्निपुराण में से दिया है ।) वैकृति रहस्य में अस्त्रों का क्रम इस प्रकार से है । अक्षमाला च कमलं वाणोऽसि कुलिशं गदा ।चक्रं त्रिशूलं परशुः शङ्खो घण्टा च पाशकः ॥ शक्तिर्दण्डश्चर्म चापं पानपात्रं कमण्डलुः ।अलङ्कृतभुजामेभिरायुधैः कमलासनम् ॥ इसी तरह मध्यम चरित में १८ भुजा का ध्यान अलग है । इति कात्यायनीऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः समाप्ता ।

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Rishi Panchami Katha PDF Download | ऋषि पंचमी व्रत कथा, विधि और महत्व

Rishi Panchami Katha PDF Download: हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है ऋषि पंचमी व्रत, जो सप्तऋषियों को समर्पित होता है। यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल वर्तमान जन्म बल्कि पिछले जन्म के पाप भी समाप्त हो जाते हैं। इस बार ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:05 एएम से 01:39 पीएम तक रहेगा। ऋषि पंचमी का महत्व Rishi Panchami Vrat महिलाओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने और कथा पढ़ने से महिला को ऋतुकाल में हुई भूलों और अज्ञानता से हुए दोषों से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा कर उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी कथा (Rishi Panchami Katha Pdf) प्राचीन समय में विदर्भ देश में उत्तक नाम का एक सदाचारी ब्राह्मण निवास किया करता थे। जिसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी और उन दोनों की दो संतानें थीं एक पुत्र और एक पुत्री। उसके पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया और कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया गया लेकिन कुछ ही दिनों में कन्या विधवा हो गई। जिसके बाद वह अपने मायके में रहने लगी। एक दिन कन्या अपने माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी कि तभी रात भर में उसके शरीर में कीड़े पड़ गए। सुबह के समय कुछ शिष्यों ने उस कन्या को इस हालत में देखा तो उन्होंने उसकी जानकारी उसकी माता सुशीला को दी। अपनी पुत्री की यह दशा देख के माता विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई। ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर कहा- महाराज! यह क्या कारण है कि मेरी पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए हैं? तब ब्राह्मण ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि उसकी पुत्री ने सात जन्म पहिले अजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री को छू लिया था और ऋषि पंचमी व्रत का भी अनादर किया था उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए क्योंकि रजस्वला वाली स्त्री का पहला दिन चांडालिनी के बराबर, दूसरा दिन ब्रह्मघातिनी के समान, तीसरा दिन धोबिन के समान होता है। ब्राह्मण ने बताया कि कन्या ने ऋषि पंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये जिससे उसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं । ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) इस प्रकार व्रत करने से स्त्रियां सुंदरता, सौभाग्य, धन और संतान सुख प्राप्त करती हैं और पापों से मुक्ति पाकर उत्तम लोक को प्राप्त होती हैं। ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) तब सुशीला ने कहा- महाराज! ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे सभी प्राणी इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले- यह व्रत भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान कर व्रत धारण करके सायंकाल सप्तऋषियों का पूजन करना चाहिए, भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीपने के बाद उस पर अष्ट कमल दल बनाकर नीचे लिखे सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए। इस पूजा में महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ महर्षियों की मूर्ति की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत का उद्यापन भी विधि विधान करना चाहिए। चतुर्थी के दिन एक समय भोजन करके पंचमी को व्रत आरम्भ करें। सुबह नदी में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बांधकर पूजा – सामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल पर सप्तऋषियों की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद षोडषोपचार से पूजन कर रात्रि को इसकी कथा का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण करें। इस प्रकार से इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यवती होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है। Rishi Panchami Katha PDF Download क्यों करें? 👉 [Download Rishi Panchami Katha PDF Here]

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हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें

हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें हरतालिका तीज सुहागिन और अविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने कठोर तप करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इसलिए इस दिन का व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। हरतालिका तीज 2025 कब है? यह व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। हरतालिका तीज का महत्व हरतालिका तीज पूजा विधि (Step by Step) हरतालिका तीज पर क्या न करें हरतालिका तीज 2025 FAQ Q1. हरतालिका तीज कब है?26 अगस्त 2025, मंगलवार को। Q2. इस व्रत को कौन रख सकता है?विवाहित और अविवाहित महिलाएँ दोनों। Q3. क्या निर्जला व्रत ही करना ज़रूरी है?नहीं, स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार भी किया जा सकता है। Q4. हरतालिका तीज किसके लिए की जाती है?अखंड सौभाग्य और मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए। निष्कर्ष हरतालिका तीज 2025 का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। यह व्रत न सिर्फ़ वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने में सहायक है बल्कि अविवाहित कन्याओं को अच्छे पति की प्राप्ति भी कराता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-पूजन करने से माता पार्वती और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। हरतालिका तीज 2025, Hartalika Teej 2025 Date, हरतालिका तीज व्रत, हरतालिका तीज का महत्व, हरतालिका तीज पूजा विधि, Hartalika Teej Vrat Katha, हरतालिका तीज क्या करें क्या न करें सखा, क्या चाहोगे मैं इस

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पितृपक्ष 2025: गीता पाठ कराने से मिलती है पितरों को शांति, जानें 7 अद्भुत लाभ

पितृपक्ष हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण समय होता है, जब हम अपने पितरों (पूर्वजों) को याद करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इस 16-दिन की अवधि में, लोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले। इन अनुष्ठानों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करवाना सबसे प्रभावी और पुण्यकारी माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गीता पाठ करवाना क्यों इतना महत्वपूर्ण है और इसके क्या-क्या लाभ हैं? यह ब्लॉग पोस्ट आपको बताएगा कि पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने से आपके पितरों को कैसे शांति मिलती है और आपके जीवन में इसके क्या-क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। गीता पाठ का महत्व: पितृपक्ष में क्यों है खास? श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक सार है। इसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, मोक्ष और जीवन के सत्य का उपदेश दिया है। जब किसी परिवार में पितृपक्ष के दौरान गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और शिक्षाएँ न केवल घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं, बल्कि पितरों की आत्मा को भी शांति प्रदान करती हैं। यह माना जाता है कि गीता पाठ से उत्पन्न होने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा पितरों की आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने में मदद करती है। पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने के 7 अद्भुत लाभ 1. पितरों को मिलती है शांति और मोक्ष: गीता पाठ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पितरों की आत्मा को परम शांति प्रदान करता है। माना जाता है कि इससे उनकी आत्मा को मोक्ष का मार्ग मिलता है, जिससे वे अपने अगले पड़ाव की ओर शांतिपूर्वक बढ़ पाते हैं। 2. पितृदोष से मिलती है मुक्ति: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष है, तो पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना इस दोष को शांत करने का एक शक्तिशाली उपाय है। यह दोष दूर होने पर जीवन में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। 3. घर में आती है सकारात्मकता: जब घर में गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और मंत्रों से एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में सुख-शांति बनाए रखने में मदद करता है। 4. धन और वैभव की प्राप्ति: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाता है, उसके जीवन में धन, वैभव और समृद्धि की वृद्धि होती है। यह परिवार को आर्थिक संकटों से बचाता है। 5. मानसिक और शारीरिक शांति: गीता के उपदेश हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने की शक्ति देते हैं। इसका पाठ सुनने से मन को शांति मिलती है, तनाव कम होता है और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। 6. पारिवारिक संबंधों में सुधार: जब परिवार के सदस्य मिलकर इस पुण्य कार्य में भाग लेते हैं, तो उनके आपसी संबंध मजबूत होते हैं। यह एक साथ आने और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाता है। 7. धर्म और आध्यात्मिकता का विकास: गीता का पाठ करवाने से व्यक्ति में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति रुचि बढ़ती है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है। निष्कर्ष पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का एक तरीका है। यह एक ऐसा कार्य है, जिससे पितरों की आत्मा को तो शांति मिलती ही है, साथ ही परिवार के सदस्यों को भी ढेरों लाभ प्राप्त होते हैं। यदि आप इस पितृपक्ष में अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए गीता पाठ करवाना चाहते हैं, तो आप Karmasu वेबसाइट के माध्यम से आसानी से ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। +919129388891

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कृतिका नक्षत्र में 16 अगस्त को मनाई जाएगी जन्माष्टमी है – रामदेव मिश्र शास्त्री

🌸 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌸 जन्माष्टमी—भगवान श्रीकृष्ण के प्रकट होने का पावन दिन—हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, धर्म, नीति, संगीत और संस्कृति का अद्भुत संगम है। इस वर्ष जन्माष्टमी 16 अगस्त को मनाई जाएगी। 15 अगस्त की रात 12:58 बजे अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी और 16 अगस्त रात 10:30 बजे तक रहेगी। सूर्योदय पर अष्टमी होने के कारण व्रत 16 अगस्त को होगा। रोहिणी मतावलंबियों के लिए 17 अगस्त का व्रत मान्य है। कथा के अनुसार, अत्याचारी कंस को आकाशवाणी से पता चला कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका अंत करेगी। उसने देवकी-वासुदेव को कारागार में बंद कर उनकी सात संतानों का वध कर दिया।लेकिन आठवीं संतान के जन्म की रात अद्भुत चमत्कार हुआ—पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और द्वार अपने आप खुल गए। वासुदेव जी शिशु कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल पहुँचे और नंद-यशोदा को सौंप आए। गोकुल में कृष्ण ने बाल लीलाएँ करते हुए असुरों का नाश किया और बड़े होकर कंस का वध कर धर्म की स्थापना की। संदेश: श्रीकृष्ण का जन्म अन्याय, अधर्म और अत्याचार के अंत का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। जय श्रीकृष्ण#जन्माष्टमी #ShriKrishnaJanmashtami #जयश्रीकृष्ण #HareKrishna #Bhakti #KrishnaBhakti #HinduFestival #Karmasu

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The Apex of Devotion: Understanding the Last Sawan Somwar and Udhyapan

The Apex of Devotion: Understanding the Last Sawan Somwar and Udhyapan (भक्ति का शिखर: आखिरी सावन सोमवार और उद्यापन को समझना) The sacred month of Sawan, a period imbued with immense spiritual potency, is wholly dedicated to the veneration of Bhagwan Shiv and Devi Parvati. It is a time when the celestial energies align to bless devotees who observe the Sawan Somwar fasts with utmost faith and perform meticulous worship of Lord Shiva. It is widely believed that engaging in devotional practices during Sawan can manifest all desires. This year, the auspicious Sawan began on July 11th and extends until August 9th. Having already witnessed three powerful Sawan Somwars, we now stand at the threshold of the final Sawan Somwar, which falls on August 4th. For those dedicated souls who have diligently observed all the Sawan Somwar fasts, performing the Udhyapan ritual on this concluding day becomes not just important, but absolutely essential. Why, you ask? Because the complete fruition and full benefit of any fast are only truly realized upon the proper conclusion, known as Udhyapan. This final act is an Upaya (remedial measure) that ensures the spiritual energy accumulated throughout the fasting period is harmonized and effectively integrated into your life’s journey, aligning with your planetary combinations for positive outcomes. The Profound Significance of Sawan Somwar Fasting (सावन सोमवार व्रत का गहरा महत्व) Throughout the month of Sawan, devotees earnestly observe the Sawan Somwar fasts and meticulously perform the worship of Lord Shiva. There’s a deeply held belief that the worship of Lord Shiva during Sawan has the power to fulfill all the desires of devotees. This entire month holds a special sanctity, specifically consecrated to Bhagwan Shiva and Devi Parvati. Performing the Udhyapan: A Step-by-Step Guide for Full Benefits (उद्यापन विधि: पूर्ण लाभ के लिए चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका) To truly reap the entire benefits of your Sawan Somwar fasts, the Udhyapan on the last Somwar is paramount. Here’s how you can perform this sacred ritual with traditional reverence: Sacred Offerings for Lord Bholenath (भगवान भोलेनाथ के लिए पवित्र भोग) While completing your spiritual observances, offering a bhog (sacred food offering) to Lord Bholenath is an integral part of the ritual. This act symbolizes gratitude and devotion. Here are some traditional and beloved offerings:

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अगस्त 2025 के प्रमुख हिंदू पर्व: तिथि, महत्व और शुभ मुहूर्त – संपूर्ण मार्गदर्शिका

अगस्त: हिंदू पर्वों का पावन महीना अगस्त माह हिंदू कैलेंडर में एक विशेष स्थान रखता है, क्योंकि यह भारत में त्योहारों के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है. यह महीना विविध और जीवंत उत्सवों से भरा होता है, जो आध्यात्मिक विकास और पारिवारिक जुड़ाव के अवसर प्रदान करते हैं. इस अवधि में कई महत्वपूर्ण हिंदू पर्व मनाए जाते हैं, जो देश भर में भक्तों के लिए उत्साह और श्रद्धा का माहौल बनाते हैं. यह शोध-आधारित ब्लॉग पोस्ट अगस्त 2025 में आने वाले प्रमुख हिंदू पर्वों – रक्षा बंधन, जन्माष्टमी, हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी – का विस्तृत विवरण प्रदान करेगी. इसमें प्रत्येक पर्व की तिथि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथाएँ, महत्व और पालन किए जाने वाले अनुष्ठान शामिल होंगे. इसका उद्देश्य पाठकों को सटीक और व्यावहारिक जानकारी प्रदान करना है ताकि वे इन पावन अवसरों को पूर्ण श्रद्धा और उत्साह के साथ मना सकें. अगस्त 2025 के प्रमुख हिंदू पर्व: एक नज़र अगस्त 2025 में कई महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार मनाए जाएंगे, जो भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं. यह तालिका इन प्रमुख पर्वों का एक त्वरित अवलोकन प्रस्तुत करती है, जिससे पाठकों को पूरे महीने के त्योहारों की तिथियों और मुख्य महत्व को एक ही स्थान पर देखने में मदद मिलती है. यह जानकारी उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो अपने उत्सवों की योजना बना रहे हैं या इन त्योहारों के बारे में त्वरित संदर्भ चाहते हैं. Table 1: अगस्त 2025 के प्रमुख हिंदू पर्व पर्व का नाम तिथि मुख्य महत्व श्रावण पुत्रदा एकादशी 5 अगस्त, मंगलवार संतान प्राप्ति, पापों से मुक्ति रक्षा बंधन 9 अगस्त, शनिवार भाई-बहन का प्रेम और सुरक्षा का बंधन कजरी तीज 12 अगस्त, मंगलवार वैवाहिक सुख, अच्छे पति की कामना, गायों की पूजा जन्माष्टमी 15/16 अगस्त, शुक्र/शनि भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव, धर्म के सिद्धांत सिंह संक्रांति 17 अगस्त, रविवार सूर्य का सिंह राशि में प्रवेश, पवित्र स्नान, दान हरतालिका तीज 26 अगस्त, मंगलवार वैवाहिक सुख, अखंड सौभाग्य, देवी पार्वती की तपस्या गणेश चतुर्थी 27 अगस्त, बुधवार बुद्धि, समृद्धि, नई शुरुआत, बाधाओं का निवारण Export to Sheets रक्षा बंधन: भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व रक्षा बंधन, जिसे राखी के नाम से भी जाना जाता है, भाई-बहन के बीच के पवित्र और अनूठे बंधन का सम्मान करने वाला एक विशेष हिंदू त्योहार है. “रक्षा” का अर्थ है सुरक्षा और “बंधन” का अर्थ है बंधन. यह त्योहार देखभाल और जिम्मेदारी पर आधारित रिश्ते का प्रतीक है. तिथि और शुभ मुहूर्त भारत में, रक्षा बंधन मुख्य रूप से शनिवार, 9 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा. हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे कुछ स्थानों पर, पूर्णिमा तिथि के आरंभ और अंत के आधार पर यह शुक्रवार, 8 अगस्त 2025 को भी मनाया जा सकता है. पूर्णिमा तिथि 8 अगस्त 2025 को दोपहर 02:12 बजे (भारत) या सुबह 04:42 बजे (पूर्वी समय, यूएसए) शुरू होगी और 9 अगस्त 2025 को दोपहर 01:24 बजे (भारत) या सुबह 03:54 बजे (पूर्वी समय, यूएसए) समाप्त होगी. राखी बांधने का सबसे शुभ समय 9 अगस्त को सुबह 05:47 बजे से दोपहर 01:24 बजे तक है , जिसकी अवधि 7 घंटे 37 मिनट है. अपराह्न मुहूर्त (देर दोपहर) को पारंपरिक रूप से सबसे शुभ माना जाता है. 9 अगस्त 2025 को अपराह्न मुहूर्त लगभग 01:41 बजे से 02:54 बजे तक है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भद्रा काल में राखी बांधने से बचना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है और यह नकारात्मक परिणाम ला सकता है. 2025 में, भद्रा 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी. यह एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि इसका अर्थ है कि राखी बांधने के लिए पूरा सुबह का समय शुभ और सुरक्षित हो जाएगा, जिससे भक्तों को अपने अनुष्ठानों की योजना बनाने में आसानी होगी. Table 2: रक्षा बंधन 2025: शुभ मुहूर्त विवरण तिथि/समय (भारत) तिथि/समय (पूर्वी समय, यूएसए) पर्व की तिथि 9 अगस्त 2025 (शनिवार) 8 अगस्त 2025 (शुक्रवार) पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 8 अगस्त 2025, दोपहर 02:12 बजे 8 अगस्त 2025, सुबह 04:42 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त 9 अगस्त 2025, दोपहर 01:24 बजे 9 अगस्त 2025, सुबह 03:54 बजे राखी बांधने का शुभ मुहूर्त 9 अगस्त 2025, सुबह 05:47 बजे से दोपहर 01:24 बजे तक 8 अगस्त 2025, अपराह्न मुहूर्त – 04:18 PM से 05:14 PM तक अपराह्न मुहूर्त 9 अगस्त 2025, दोपहर 01:41 बजे से 02:54 बजे तक (उपरोक्त यूएसए समय में शामिल) भद्रा काल की समाप्ति 9 अगस्त 2025 को सूर्योदय से पहले 9 अगस्त 2025 को सूर्योदय से पहले (स्थानीय समय के अनुसार) Export to Sheets महत्व और पौराणिक कथाएँ रक्षा बंधन केवल एक अनुष्ठान नहीं है; यह साझा बचपन, गुप्त चुटकुलों और अनकहे समर्थन को एक पवित्र धागे में समेटने का एक क्षण है. यह भाई-बहन के बीच के भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है. यह सार्वभौमिक प्रेम और एकता का भी प्रतिनिधित्व करता है, ऐतिहासिक रूप से सैनिकों, दोस्तों और पड़ोसियों तक भी सम्मान और एकजुटता के भाव के रूप में विस्तारित होता है. इस त्योहार से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं. महाभारत की एक कहानी में, भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी चोट पर बांध दिया था. उनके इस भाव से द्रवित होकर कृष्ण ने हमेशा उनकी रक्षा करने का वचन दिया, जिसे उन्होंने चीर-हरण के दौरान पूरा किया. महाभारत के एक अन्य प्रसंग में, रानी कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु के युद्ध में जाने से पहले उसकी कलाई पर एक पवित्र धागा बांधा था, जिसे प्रेम और सुरक्षा के रूप में देखा जाता है. एक अन्य लोकप्रिय कथा इंद्र और इंद्राणी से संबंधित है. देवताओं और असुरों के बीच युद्ध के दौरान, इंद्र को असुर राजा बलि ने अपमानित किया था. गुरु बृहस्पति ने श्रावण पूर्णिमा की सुबह एक रक्षा विधान किया, जिसमें इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा, जिससे उन्हें असुरों को हराने में मदद मिली. चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर मदद मांगी थी, और हुमायूँ ने राखी का सम्मान करते हुए उनकी रक्षा के लिए सेना भेजी थी. एक अन्य कथा के अनुसार, देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर राखी बांधी थी. ये कथाएँ त्योहार के गहरे

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Kamika Ekadashi 2025: Online Puja Booking, Vrat Date, and Significance (Live Puja for NRIs)

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Sundar kand Path lyrics in hindi:संपूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी में, जामवंत के बचन सुहाए, सुनि हनुमंत हृदय अति भाए…

Sundar kand Path lyrics in hindi: Sundarkand का हर मंगलवार को करना चाहिए, ऐसा करने से जीवन में सभी दुख दूर हो जाते हैं। Sundar kand Path:रामचरित मानस का हिस्सा है जो सुंदरकांड बजरंगबली हनुमानजी को समर्पित है। सुंदरकांड हिंदू धर्म में रामचरितमानस का विशेष महत्व है, और उसके सुंदरकांड अध्याय को अत्यंत शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। सुंदरकांड श्रीराम कथा का वह भाग है जिसमें भगवान हनुमान की वीरता, भक्ति और बुद्धिमत्ता का अद्भुत वर्णन है। इस पाठ को नियमित रूप से पढ़ने से जीवन में कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं आध्यात्मिक, मानसिक, सुंदरकांड भावनात्मक और भौतिक रूप से। सुंदरकांड का पाठ करने से व्यक्ति का साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव भी कम हो जाता है। संपूर्ण सुंदरकांड पाठ: सुंदरकांड का पाठ नियमित करना चाहिए। हर दिन सुंदरकांड का पाठ नहीं कर सकते तो शनिवार और मंगलवार को जरूर इसका पाठ करना चाहिए। सुंदरकांड रामचरित मानस का हिस्सा है जो वीर हनुमानजी की महिमा का बखान करता है। इसके पाठ करने मात्र से मंगल की प्रतिकूल स्थिति और शनि की साढेसाती एवं ढैय्या का प्रभाव दूर हो जाता है। सुंदरकांड इतना ही नहीं यह संकट और परेशानी से भी उबारने वाला है। सुंदरकांड इसलिए सुंदरकांड हनुमान जयंती के अलावा हर शनिवार और मंगलवार को सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। सुंदरकांड तो आइए हनुमानजी का ध्यान करते हुए सुंदरकांड का पाठ आरंभ करते हैं। सुंदरकांड आसन।।कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।। सुंदरकांड पाठ से पहले करें हनुमानजी का ध्यानशान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।। नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीयेसत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मेकामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।। अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।। Sundar kand Path:सुंदरकांड का पाठ आरंभ जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।। जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।। निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।। कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।.मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।.प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।.लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।.सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

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Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi :मंगलवार को हनुमान जी के इन नामों का करें जप, सभी संकट जल्द होंगे दूर

Hanuman Ji Ke 108 Name:मंगलवार के दिन राम जी के भक्त हनुमान की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही कार्यों में आ रही बाधा को दूर करने के लिए व्रत भी किया है। मान्यता है कि बजरंगबली की उपासना करने से कभी धन का अभाव नहीं रहता है और घर में खुशियों का आगमन होता है। ऐसे में मंगलवार के दिन बजरंगबली की पूजा के दौरान उनके Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi नामों का जप करें। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi:हनुमानजी के कई नाम है और हर नाम के पीछे कुछ ना कुछ रहस्य है। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi हनुमानजी के लगभग 108 नाम बताए जाते हैं। वैसे प्रमुख रूप से हनुमानजी के 12 नाम बताए जाते हैं। बलशालियों में सर्वश्रेष्ठ है हनुमानजी। कलिकाल में उन्हीं की भक्ति से भक्त का उद्धार होता है। Hanuman Ji Ke 108 Name जो जपे हनुमानजी का नाम संकट कटे मिटे सब पीड़ा और पूर्ण हो उसके सारे काम। तो आओ जानते हैं कि हनुमानजी के नामों का रहस्य। 1. मारुति : हनुमानजी का बचपना का यही नाम है। यह उनका असली नाम भी माना जाता है।  2. अंजनी पुत्र : हनुमान की माता का नाम अंजना था। इसीलिए उन्हें अंजनी पुत्र या आंजनेय भी कहा जाता है। 3. केसरीनंदन : हनुमानजी के पिता का नाम केसरी था इसीलिए उन्हें केसरीनंदन भी कहा जाता है। 4. हनुमान : जब बालपन में मारुति ने सूर्य को अपने मुंह में भर लिया था तो इंद्र ने क्रोधित होकर बाल हनुमान पर अपने वज्र से वार किया। वह वज्र जाकर मारुति की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगा। इससे उनकी ठोड़ी टूट गई इसीलिए उन्हें हनुमान कहा जाने लगा। 4. पवन पुत्र : उन्हें वायु देवता का पुत्र भी माना जाता है, इसीलिए इनका नाम पवन पुत्र हुआ। Hanuman Ji Ke 108 Name उस काल में वायु को मारुत भी कहा जाता था। मारुत अर्थात वायु, इसलिए उन्हें मारुति नंदन भी कहा जाता है। वैसे उनमें पवन के वेग के समान उड़ने की शक्ति होने के कारण भी यह नाम दिया गया। 6. शंकरसुवन : हनुमाजी को शंकर सुवन अर्थात उनका पुत्र भी माना जाता है क्योंकि वे रुद्रावतार थे। 7. बजरंगबली : वज्र को धारण करने वाले और वज्र के समान कठोर अर्थात बलवान शरीर होने के कारण उन्हें वज्रांगबली कहा जाने लगा। अर्थात वज्र के समान अंग वाले बलशाली। लेकिन यह शब्द ब्रज और अवधि के संपर्क में आकर बजरंगबली हो गया। बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली भी सुंदर शब्द है। 8. कपिश्रेष्ठ : हनुमानजी का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। रामायणादि ग्रंथों में हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण प्रयुक्त किए गए। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन इसका प्रमाण है कि वे वानर थे। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है। अत: सिद्ध होता है कि वे जाति से वानर थे। 9. वानर यूथपति : हनुमानजी को वानर यूथपति भी कहा जाता था। वानर सेना में हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। अंगद, दधिमुख, मैन्द- द्विविद, नल, नील और केसरी आदि कई यूथपति थे।  10. रामदूत : प्रभु श्रीराम का हर काम करने वाले दूत। 11. पंचमुखी हनुमान : पातल लोक में अहिरावण का वध करने जब वे गए तो वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख।  Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi :मंगलवार को हनुमान जी के इन नामों का करें जप, सभी संकट जल्द होंगे दूर इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम,लक्ष्मण को उस से मुक्त किया। मरियल नामक दानव को मारने के लिए भी यह रूप धरा था। दोहा :  उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥  स्तुति :  हनुमान अंजनी सूत् र्वायु पुत्रो महाबलः। रामेष्टः फाल्गुनसखा पिङ्गाक्षोऽमित विक्रमः॥ उदधिक्रमणश्चैव सीता शोकविनाशनः। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा॥ एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। सायंकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्॥ तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्। यहां पढ़ें हनुमानजी के 12 चमत्कारिक नाम 1. हनुमान हैं (टूटी हनु). 2. अंजनी सूत, (माता अंजनी के पुत्र). 3. वायुपुत्र, (पवनदेव के पुत्र). 4. महाबल, (एक हाथ से पहाड़ उठाने और एक छलांग में समुद्र पार करने वाले महाबली). 5. रामेष्ट (राम जी के प्रिय). 6. फाल्गुनसख (अर्जुन के मित्र). 7. पिंगाक्ष (भूरे नेत्र वाले). 8. अमितविक्रम, ( वीरता की साक्षात मूर्ति)  9. उदधिक्रमण (समुद्र को लांघने वाले). 10. सीताशोकविनाशन (सीताजी के शोक को नाश करने वाले). 11. लक्ष्मणप्राणदाता (लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले). 12.. दशग्रीवदर्पहा (रावण के घमंड को चूर करने वाले). Hanuman Ji Ke 108 Name in Hindi:हनुमान जी के 108 नाम 1.भीमसेन सहायकृते 2. कपीश्वराय 3. महाकायाय 4. कपिसेनानायक 5. कुमार ब्रह्मचारिणे 6. महाबलपराक्रमी 7. रामदूताय 8. वानराय 9. केसरी सुताय 10. शोक निवारणाय 11. अंजनागर्भसंभूताय 12. विभीषणप्रियाय 13. वज्रकायाय 14. रामभक्ताय 15. लंकापुरीविदाहक 16. सुग्रीव सचिवाय 17. पिंगलाक्षाय 18. हरिमर्कटमर्कटाय 19. रामकथालोलाय 20. सीतान्वेणकर्त्ता 21. वज्रनखाय 22. रुद्रवीर्य 23. वायु पुत्र 24. रामभक्त 25. वानरेश्वर 26. ब्रह्मचारी 27. आंजनेय 28. महावीर 29. हनुमत 30. मारुतात्मज 31. तत्वज्ञानप्रदाता 32. सीता मुद्राप्रदाता 33. अशोकवह्रिकक्षेत्रे 34. सर्वमायाविभंजन 35. सर्वबन्धविमोत्र 36. रक्षाविध्वंसकारी 37. परविद्यापरिहारी 38. परमशौर्यविनाशय 39. परमंत्र निराकर्त्रे 40. परयंत्र प्रभेदकाय 41. सर्वग्रह निवासिने 42. सर्वदु:खहराय 43. सर्वलोकचारिणे 44. मनोजवय 45. पारिजातमूलस्थाय 46. सर्वमूत्ररूपवते 47. सर्वतंत्ररूपिणे 48. सर्वयंत्रात्मकाय 49. सर्वरोगहराय 50. प्रभवे 51. सर्वविद्यासम्पत 52. भविष्य चतुरानन 53. रत्नकुण्डल पाहक 54. चंचलद्वाल 55. गंधर्वविद्यात्त्वज्ञ 56. कारागृहविमोक्त्री 57. सर्वबंधमोचकाय 58. सागरोत्तारकाय 59. प्रज्ञाय 60. प्रतापवते 61. बालार्कसदृशनाय

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