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What is Karma? – Explained by Hindu Scriptures (Vedas, Gita & Upanishads)

🔱 Introduction: More Than “What Goes Around Comes Around” In today’s spiritual circles, “karma” is often misunderstood as mere cause and effect. But in Hindu Dharma, Karma (कर्म) is a vast and profound concept — one that shapes your birth, actions, destiny, and liberation. Let’s decode what ancient Hindu scriptures say about Karma — not just as a law, but as a spiritual truth governing the soul’s journey. 📖 What is Karma in Hinduism? Karma means “action” in Sanskrit. It comes from the root ‘Kri’ which means to do.In simple terms: Every action (physical, verbal, or mental) creates an energy imprint that influences future experiences. 🔹 3 Types of Karma (As per the Bhagavad Gita): 🪔 “You are not punished for your karma, you are punished by your karma.” 📜 What Hindu Scriptures Say: 🕉️ 1. Vedas on Karma: The Rigveda (10.117.6) says: “One who gives, receives back; one who helps, is helped.”→ This shows that even the Vedas emphasized reciprocal cosmic justice. 📚 2. Bhagavad Gita on Karma Yoga: Lord Krishna says in Chapter 2, Verse 47: “Karmanye vadhikaraste, Ma phaleshu kadachana”(You have a right to perform your duty, but not to the fruits of your actions) ✅ The Gita teaches selfless action (Karma Yoga) as the path to liberation.🚫 Action with desire (Kama) binds you. Action with surrender (Bhakti) liberates you. 🔮 3. Upanishads on Karma: The Brihadaranyaka Upanishad (4.4.5) states: “As a man acts, so does he become. A man of good acts will become good; a man of bad acts, bad.” 💡 Here, karma is not just about rewards — it is about soul transformation. 🌿 Why Understanding Karma Matters Today 🔔 Karma in Daily Life – A Vedic Approach 🌺 In Sanatan Dharma, Karma is not fate — it is freedom through awareness. 🙏 How to Purify Your Karma? 🌍 KARMASU’s Vedic Karma Services (For Global Audience) ✨ Karmic Healing Puja✨ Personalized Karma Report (Birth Chart Analysis)✨ Maha Mrityunjaya Jaap for Karma Shuddhi✨ Guided Karma Yoga Routine with Mantras 🕉️ Join our Global Digital Satsang & Puja Experience – Only on KARMASU.

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हनुमान जयंती 2025: 11 या 12 अप्रैल, कब है हनुमान जयंती? शुभ मुहूर्त और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट देखें!

हनुमान जयंती 2025: 11 या 12 अप्रैल, कब है हनुमान जयंती? शुभ मुहूर्त और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट देखें! हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) हिंदू धर्म में एक प्रमुख पर्व है, जो भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, और संकटमोचन का प्रतीक माना जाता है। लेकिन साल 2025 में हनुमान जयंती को लेकर भक्तों के मन में एक सवाल है – क्या यह 11 अप्रैल को है या 12 अप्रैल को? इस लेख में हम आपको सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट बताएंगे, ताकि आप इस पावन दिन की तैयारी पूरी भक्ति के साथ कर सकें। हनुमान जयंती 2025: सही तारीख – 11 या 12 अप्रैल? Hanuman Jayanti 2025 Date हनुमान जयंती हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। पंचांग के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा तिथि 2025 में इस प्रकार रहेगी: हिंदू धर्म में उदया तिथि (सूर्योदय के समय जो तिथि हो) को मान्यता दी जाती है। चूंकि 12 अप्रैल 2025 को सुबह पूर्णिमा तिथि प्रभावी रहेगी, इसलिए हनुमान जयंती 2025 की सही तारीख 12 अप्रैल 2025 (शनिवार) होगी। यह दिन शनिवार को पड़ रहा है, जो हनुमान जी की पूजा के लिए और भी शुभ माना जाता है, क्योंकि शनिवार को उनकी भक्ति से शनि दोष से मुक्ति मिलती है। हनुमान जयंती 2025: शुभ मुहूर्त हनुमान जयंती की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। 12 अप्रैल 2025 के लिए पूजा का शुभ समय इस प्रकार है: मान्यता है कि हनुमान जी का जन्म सूर्योदय के समय हुआ था, इसलिए सुबह की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। हनुमान जयंती का महत्व हनुमान जयंती भगवान हनुमान के जन्म का उत्सव है, जो त्रेतायुग में माता अंजनी और वानरराज केसरी के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। वे भगवान राम के परम भक्त और शिव के 11वें रुद्र अवतार माने जाते हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से: हनुमान जयंती पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट Hanuman Jayanti Puja Samagri हनुमान जयंती की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री तैयार करें: हनुमान जयंती पूजा विधि हनुमान जयंती के दिन क्या करें? निष्कर्ष हनुमान जयंती 2025 का पावन पर्व 12 अप्रैल 2025 (शनिवार) को मनाया जाएगा। इस दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने और उपरोक्त सामग्री के साथ विधि-विधान से भक्ति करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी। यह पर्व आपके जीवन में शक्ति, साहस, और समृद्ध…

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Masik Durgashtami 2025: कल करें मां दुर्गा की पूजा इस शुभ मुहूर्त में, जीवन भर बनी रहेगी सुख-समृद्धि!

हिंदू धर्म में मासिक दुर्गाष्टमी (Masik Durgashtami) का विशेष महत्व है। यह पवित्र दिन हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और मां दुर्गा को समर्पित होता है। साल 2025 में मासिक दुर्गाष्टमी का अगला अवसर कल, 5 अप्रैल 2025 को है। मान्यता है कि इस दिन मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं, और सुख, समृद्धि, और शांति का आगमन होता है। इस लेख में हम आपको मासिक दुर्गाष्टमी 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, और इसके महत्व के बारे में विस्तार से बताएंगे। तो आइए, जानते हैं कि कैसे आप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं! मासिक दुर्गाष्टमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 4 अप्रैल 2025 को रात 8 बजकर 12 मिनट से शुरू होगी और 5 अप्रैल 2025 को शाम 7 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए मासिक दुर्गाष्टमी 5 अप्रैल 2025 को मनाई जाएगी। इस शुभ मुहूर्त में मां दुर्गा की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व | Masik Durgashtami Significance मासिक दुर्गाष्टमी मां दुर्गा के भक्तों के लिए एक खास दिन है। मां दुर्गा को शक्ति, साहस, और सुरक्षा की देवी माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से: मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं और उन्हें संकटों से मुक्ति दिलाती हैं। खासकर महिलाएँ इस दिन व्रत रखकर अपने परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करती हैं। मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि Masik Durgashtami 2025 मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा को विधि-विधान से करना जरूरी है। नीचे दी गई पूजा विधि का पालन करें: मासिक दुर्गाष्टमी व्रत के नियम मां दुर्गा की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत और पूजा करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह दिन न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाने वाला भी है। जो भक्त नियमित रूप से इस व्रत को करते हैं, उनके जीवन में कभी सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती। मां दुर्गा की भक्ति से नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। निष्कर्ष मासिक दुर्गाष्टमी 2025 का यह पावन अवसर आपके जीवन में नई ऊर्जा और समृद्धि लाने का मौका है। 5 अप्रैल 2025 को शुभ मुहूर्त में मां दुर्गा की पूजा करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुखमय बनाएं। मां दुर्गा की कृपा से आपका हर संकट दूर हो और परिवार में खुशहाली बनी रहे। इस लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें, ताकि वे भी इस शुभ दिन का लाभ उठा सकें। जय माता दी!

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हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं? एक गहन विश्लेषण

हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं? एक गहन विश्लेषण हिंदू धर्म विश्व के सबसे प्राचीन और समृद्ध धर्मों में से एक है। इसकी एक खास विशेषता है इसके असंख्य देवी-देवताओं की मौजूदगी। भगवान शिव, विष्णु, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, हनुमान जैसे अनेक नामों से लेकर 33 करोड़ देवी-देवताओं की बात तक होती है। लेकिन सवाल उठता है कि हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवता क्यों हैं? क्या यह बहुदेववाद का प्रमाण है या इसके पीछे कोई गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है? इस लेख में हम इस प्रश्न का जवाब विस्तार से देंगे, जिसमें धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ और तर्क शामिल होंगे। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की संख्या: मिथक या सत्य? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “33 करोड़ देवी-देवता” का आंकड़ा एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। वेदों में “33 कोटि” देवताओं का उल्लेख मिलता है। संस्कृत में “कोटि” का अर्थ “करोड़” ही नहीं, बल्कि “प्रकार” भी होता है। इस संदर्भ में विद्वानों का मानना है कि वेदों में 33 प्रकार के देवताओं की बात की गई है, न कि 33 करोड़। ऋग्वेद (1.139.11) में इन 33 देवताओं को इस तरह वर्गीकृत किया गया है: इसलिए, यह संख्या वास्तव में प्रतीकात्मक है और हिंदू धर्म की व्यापकता को दर्शाती है। एक ईश्वर, अनेक रूप: अद्वैत दर्शन हिंदू धर्म का मूल दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित है, जो कहता है कि ईश्वर एक है, लेकिन उसके अनेक रूप हैं। भगवद्गीता (अध्याय 10, श्लोक 40) में भगवान कृष्ण कहते हैं, “न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।” अर्थात, “न तो देवता और न ही महर्षि मेरे मूल को जानते हैं, क्योंकि मैं सभी देवताओं और ऋषियों का आदि कारण हूँ।” यह दर्शाता है कि सभी देवी-देवता उसी एक परमात्मा के विभिन्न पहलू हैं। उदाहरण के लिए: ये सभी एक ही ब्रह्मांड शक्ति के अलग-अलग रूप हैं, जो मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करते हैं। प्रकृति और मानव जीवन से जुड़ाव हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की विविधता प्रकृति और मानव जीवन के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है। सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, नदियाँ जैसे गंगा और यमुना—ये सभी प्राकृतिक तत्वों को देवता के रूप में पूजा जाता है। इसका कारण यह है कि हिंदू धर्म प्रकृति को ईश्वर का अभिन्न अंग मानता है। उदाहरण के लिए: इस तरह, हर देवता मानव जीवन के किसी न किसी पहलू को संचालित करता है। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं का होना मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति की अपनी जरूरतें, भावनाएँ और विश्वास होते हैं। कोई विद्या के लिए सरस्वती की पूजा करता है, तो कोई धन के लिए लक्ष्मी की। यह विविधता लोगों को अपनी आस्था के अनुसार ईश्वर से जुड़ने की आजादी देती है। सामाजिक रूप से, ये देवी-देवता विभिन्न समुदायों और परंपराओं को एक सूत्र में बाँधते हैं। जैसे, दक्षिण भारत में मुरुगन की पूजा प्रमुख है, तो उत्तर भारत में हनुमान लोकप्रिय हैं। यह सांस्कृतिक एकता में विविधता का प्रतीक है। क्या हिंदू धर्म बहुदेववादी है? कई लोग हिंदू धर्म को बहुदेववादी (Polytheistic) मानते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। हिंदू धर्म में एकेश्वरवाद (Monotheism), बहुदेववाद (Polytheism), और सर्वेश्वरवाद (Pantheism) का अनूठा मिश्रण है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई भक्त किस दृष्टिकोण से अपनी आस्था को देखता है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “हिंदू धर्म वह धर्म है जो हर व्यक्ति को उसके स्तर के अनुसार ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग देता है।” निष्कर्ष हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं का होना Ascendancy इसलिए है क्योंकि यह धर्म जीवन के हर पहलू को ईश्वर का रूप मानता है। ये देवता केवल मूर्तियाँ या काल्पनिक चरित्र नहीं, बल्कि उस एक परम शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं जो ब्रह्मांड को संचालित करती है। 33 कोटि देवताओं का उल्लेख वेदों में प्रतीकात्मक है और प्रकृति, मानव जीवन, और दार्शनिक सत्य को समझाने का एक तरीका है। यह विविधता हिंदू धर्म की समृद्धि और लचीलेपन का प्रमाण है, जो हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार मार्ग चुनने की स्वतंत्रता देता है। संदर्भ

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Sapne me bichhu dekhna:सपने में बिच्छू सहित दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए चमकने वाली है आपकी किस्मत

Sapne me bichhu dekhna:सपने में हम कुछ भी देख सकते हैं। सपनों पर किसी का वश नहीं होता है। लेकिन, स्वप्न शास्त्र में कुछ सपने ऐसे बताए गए हैं जिनका आना बहुत ही शुभ माना गया है। इस तरह के सपनों का अर्थ है Sapne me bichhu dekhna कि आपको आने वाले समय में मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होगा। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में गुलाब का फूल समेत 5 चीजे दिखाई देना आपके अमीर बनने का संकेत हो सकता है। आइए जानते हैं सपने में यदि नीचे बताई गई 5 चीजें दिखाई दे रही हैं तो इसका अर्थ क्या है। Sapne me bichhu dekhna:हर किसी का सपना होता है कि वह बहुत अमीर बन जाए। इसके लिए व्यक्ति काफी मेहनत भी करता है। मेहनत के साथ साथ किस्मत का साथ देना भी बहुत जरूरी है। कई बार व्यक्ति को जो सपने दिखाई देते हैं Sapne me bichhu dekhna वह भी धन लाभ और अमीर बनने के संकेत देते हैं। स्वप्न शास्त्र में ऐसे सपनों के बारे में विस्तार से बताया गया है। जिन्हें देखने से पता चलता है कि आपके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में यदि ये 5 चीजें दिखाई दे जाएं तो इसका अर्थ है कि आपकी किस्मत चमकने वाली है। मां लक्ष्मी का आपके घर में वास होने जा रहा है। Devi Devtao Ko Sapne Me Dekhna:देवी-देवताओं को सपने में देखना सपने में अगर आप देवी- देवताओं को देखते हैं, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। Sapne me bichhu dekhna इसका मतलब है कि आपको कोई शुभ समाचार मिल सकता है। साथ ही धनलाभ हो सकता है। किसी योजना में सफलता मिल सकती है। Sapne me Madumakhi ka Chhata ka Dikhna:सपने में मधुमक्खी का छत्ता का दिखना स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में मधुमक्खी का छत्ता दिखना बेहद शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि आपकी इनकम में जबदस्त बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही आप कारोबार हैं तो आपके व्यापार का विस्तार हो सकता है। पेड़ पर फल देखना:Sapne me fruit Dekhna सपने में फल से लदा पेड़ देखना शुभ माना जाता है। साथ ही इसका मतलब है कि आपको कही से धन की प्राप्ति हो सकती है। साथ ही घर में कोई मांगलिक या धार्मिक कार्यक्रम हो सकता है। वहीं आपका कोई अटका हुआ काम बन सकता है। सपने में काला बिच्छू देखना Sapne Me Kala Bichhu Dekhna कुछ लोग सपने में बिच्छू या सांप देखकर डर जाते हैं। लेकिन स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में बिच्छु को देखना बेहद शुभ माना जाता है। साथ ही इसका मतलब है कि आपको इस सपने को देखने के बाद रुके हुए कार्य पूरे होने के भी आसार रहते हैं। तोता सपने में दिखना Sapne Me Tota Dikhna Sapne me bichhu dekhna:स्वप्न शास्त्र अनुसार सपने में तोता का दिखना शुभ फलदायी माना जाता है। इसका मतलब है कि आपको नौकरी और व्यापार में तरक्की मिलेगी। साथ ही जीवन में आपको सभी तरह कि सुख समृद्धि प्राप्त होगी।

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 Kamala Stotram:कमला स्तोत्रम्

कमला स्तोत्रम् | Kamala Stotram कमला स्तोत्रम् (Kamala Stotram) ओंकाररूपिणी देवि विशुद्धसत्त्वरूपिणी।देवानां जननी त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी लक्ष्मी! आप ओंकारस्वरूपिणी हैं, आप विशुद्धसत्त्व गुणरूपिणीऔर देवताओं की माता हैम्। हे सुंदरी! आप हम पर प्रसन्न होम्। तन्मात्रंचैव भूतानि तव वक्षस्थलं स्मृतम्।त्वमेव वेदगम्या तु प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे सुंदरी! पंचभूत और पंचतन्मात्रा आपके वक्षस्थल हैं,केवल वेद द्वारा ही आपको जाना जाता है। आप मुझ पर कृपा करें। देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिन्नरः।स्तूयसे त्वं सदा लक्ष्मि प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी लक्ष्मी! देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस्और किन्नर सभी आपकी स्तुति करते हैम्। आप हम पर प्रसन्न होम्। लोकातीता द्वैतातीता समस्तभूतवेष्टिता।विद्वज्जनकीर्त्तिता च प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे जननी! आप लोक और द्वैत से परे और सम्पूर्ण भूतगणों सेघिरी हुई रहती हैं। विद्वान लोग सदा आपका गुण-कीर्तन करते हैं।हे सुंदरी! आप मुझ पर प्रसन्न होम्। परिपूर्णा सदा लक्ष्मि त्रात्री तु शरणार्थिषु।विश्वाद्या विश्वकत्रीं च प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी लक्ष्मी! आप नित्यपूर्णा शरणागतों का उद्धार करने वाली,विश्व की आदि और रचना करने वाली हैं। हे सुन्दरी! आप मुझ परप्रसन्न होम्। ब्रह्मरूपा च सावित्री त्वद्दीप्त्या भासते जगत्।विश्वरूपा वरेण्या च प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे माता! आप ब्रह्मरूपिणी, सावित्री हैं। आपकी दीप्ति से ही त्रिजगतप्रकाशित होता है, आप विश्वरूपा और वर्णन करने योग्य हैं।हे सुंदरी! आप मुझ पर कृपा करें। क्षित्यप्तेजोमरूद्धयोमपंचभूतस्वरूपिणी।बन्धादेः कारणं त्वं हि प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे जननी! क्षिति, जल, तेज, मरूत् और व्योमपंचभूतों की स्वरूप आप ही हैं। गंध, जल का रस,तेज का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश में शब्द आप ही हैं।आप इन पंचभूतों के गुण प्रपंच का कारण हैं, आप हमपर प्रसन्न होम्। महेशे त्वं हेमवती कमला केशवेऽपि च।ब्रह्मणः प्रेयसी त्वं हि प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे देवी! आप शूलपाणि महादेवजी की प्रियतमा हैं। आप केशव कीप्रियतमा कमला और ब्रह्मा की प्रेयसी ब्रह्माणी हैं, आप हम परप्रसन्न होम्। चंडी दुर्गा कालिका च कौशिकी सिद्धिरूपिणी।योगिनी योगगम्या च प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप चंडी, दुर्गा, कालिका, कौशिकी,सिद्धिरूपिणी, योगिनी हैं। आपको केवल योग से ही प्राप्त किया जाता है।आप हम पर प्रसन्न होम्। बाल्ये च बालिका त्वं हि यौवने युवतीति च।स्थविरे वृद्धरूपा च प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप बाल्यकाल में बालिका, यौवनकाल में युवती औरवृद्धावस्था में वृद्धारूप होती हैं। हे सुन्दरी! आप हम परप्रसन्न होम्। गुणमयी गुणातीता आद्या विद्या सनातनी।महत्तत्त्वादिसंयुक्ता प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे जननी! आप गुणमयी, गुणों से परे, आप आदि, आप सनातनीऔर महत्तत्त्वादिसंयुक्त हैं। हे सुंदरी!आप हम पर प्रसन्न होम्। तपस्विनी तपः सिद्धि स्वर्गसिद्धिस्तदर्थिषु।चिन्मयी प्रकृतिस्त्वं तु प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे माता! आप तपस्वियों की तपःसिद्धि स्वर्गार्थिगणों कीस्वर्गसिद्धि, आनंदस्वरूप और मूल प्रकृति हैं।हे सुंदरी! आप हम पर प्रसन्न होम्। त्वमादिर्जगतां देवि त्वमेव स्थितिकारणम्।त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारा त्वमेवहि॥ हे जननी! आप जगत् की आदि, स्थिति का एकमात्र कारण हैं। देह केअंत में जीवगण आपके ही निकट जाते हैं। आप स्वेच्छाचारिणी हैं।आप हम पर प्रसन्न होम्। चराचराणां भूतानां बहिरन्तस्त्वमेव हि।व्याप्यव्याकरूपेण त्वं भासि भक्तवत्सले॥ हे भक्तवत्सले! आप चराचर जीवगणों के बाहर और भीतर दोनोंस्थलों में विराजमान रहती हैं, आपको नमस्कार है। त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः।गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा॥ हे माता! जीवगण आपकी माया से ही अज्ञानी और चेतनारहित होकरपुण्य के वश से बारम्बार इस संसार में आवागमन करते हैं। तावन्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा।यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसा नान्वगामिनी॥ जैसे सीपी में अज्ञानतावश चांदी का भ्रम हो जाता है और फिरउसके स्वरूप का ज्ञान होने पर वह भ्रम दूर हो जाता है, वैसेही जब तक ज्ञानमयी चित्त में आपका स्वरूप नहीं जाना जाता है,तब तक ही यह जगत् सत्य भासित होता है, परन्तु आपके स्वरूपका ज्ञान हो जाने से यह सारा संसार मिथ्या लगने लगता है। त्वज्ज्ञानात्तु सदा युक्तः पुत्रदारगृहादिषु।रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुखप्रदान् ध्रुवम्॥ जो मनुष्य आपके ज्ञान से पृथक रहते हुए जगत् को ही सत्यमानकर विषयों में लगे रहते हैं, निःसंदेह अंत में उनकोमहादुख मिलता है। त्वदाज्ञया तु देवेशि गगने सूर्यमण्डलम्।चन्द्रश्च भ्रमते नित्यं प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवेश्वरी! आपकी आज्ञा से ही सूर्य और चंद्रमा आकाश मण्डलमें नियमित भ्रमण करते हैम्। आप हम पर प्रसन्न होम्। ब्रह्मेशविष्णुजननी ब्रह्माख्या ब्रह्मसंश्रया।व्यक्ताव्यक्त च देवेशि प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवेश्वरी! आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की भी जननी हैं।आप ब्रह्माख्या और ब्रह्मासंश्रया हैं, आप ही प्रगट और गुप्त रूपसे विराजमान रहती हैम्। हे देवी! आप हम पर प्रसन्न होम्। अचला सर्वगा त्वं हि मायातीता महेश्वरि।शिवात्मा शाश्वता नित्या प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप अचल, सर्वगामिनी, माया से परे,शिवात्मा और नित्य हैम्। हे देवी! आप हम पर प्रसन्न होम्। सर्वकायनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरी।अनन्ता निष्काला त्वं हि प्रसन्ना भवसुन्दरि॥ हे देवी! आप सबकी देह की रक्षक हैं। आप सम्पूर्ण जीवों कीईश्वरी, अनन्त और अखंड हैम्। आप हम पर प्रसन्न होम्। सर्वेश्वरी सर्ववद्या अचिन्त्या परमात्मिका।भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे माता! सभी भक्तिपूर्वक आपकी वंदना करते हैं। आपकी कृपासे ही भुक्ति और मुक्ति प्राप्त होती है। हे सुंदरि! आप हम परप्रसन्न होम्। ब्रह्माणी ब्रह्मलोके त्वं वैकुण्ठे सर्वमंगला।इंद्राणी अमरावत्यामम्बिका वरूणालये॥ हे माता! आप ब्रह्मलोक में ब्रह्माणी, वैकुण्ठ में सर्वमंगलाअमरावती में इंद्राणी और वरूणालय में अम्बिकास्वरूपिणी हैं।आपको नमस्कार है। यमालये कालरूपा कुबेरभवने शुभा।महानन्दाग्निकोणे च प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप यम के गृह में कालरूप, कुबेर के भवन मेंशुभदायिनी और अग्निकोण में महानन्दस्वरूपिणी हैं, हे सुन्दरी! आप हम पर प्रसन्न होम्।नैरृत्यां रक्तदन्ता त्वं वायव्यां मृगवाहिनी।पाताले वैष्णवीरूपा प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप नैरृत्य में रक्तदन्ता, वायव्य कोण में मृगवाहिनीऔर पाताल में वैष्णवी रूप से विराजमान रहती हैं। हे सुंदरी!आप हम पर प्रसन्न होम्। सुरसा त्वं मणिद्वीपे ऐशान्यां शूलधारिणी।भद्रकाली च लंकायां प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप मणिद्वीप में सुरसा, ईशान कोण में शूलधारिणी औरलंकापुरी में भद्रकाली रूप में स्थित रहती हैं। हे सुंदरी! आपहम पर प्रसन्न होम्। रामेश्वरी सेतुबन्धे सिंहले देवमोहिनी।विमला त्वं च श्रीक्षेत्रे प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप सेतुबन्ध में रामेश्वरी, सिंहद्वीप में देवमोहिनीऔर पुरूषोत्तम में विमला नाम से स्थित रहती हैं। हे सुंदरी!आप हम पर प्रसन्न होम्। कालिका त्वं कालिघाटे कामाख्या नीलपर्वत।विरजा ओड्रदेशे त्वं प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे देवी! आप कालीघाट पर कालिका, नीलपर्वत पर कामाख्या औरऔड्र देश में विरजारूप में विराजमान रहती हैं। हे सुंदरी!आप हम पर प्रसन्न होम्। वाराणस्यामन्नपूर्णा अयोध्यायां महेश्वरी।गयासुरी गयाधाम्नि प्रसन्ना भव सुंदरि॥ हे देवी! आप वाराणसी क्षेत्र में अन्नपूर्णा, अयोध्या नगरी मेंमाहेश्वरी और गयाधाम में गयासुरी रूप से विराजमान रहती हैं।हे सुंदरी! आप हम पर प्रसन्न होम्। भद्रकाली कुरूक्षेत्रे त्वंच कात्यायनी व्रजे।माहामाया द्वारकायां प्रसन्ना भव सुन्दरि॥ हे देवी! आप कुरूक्षेत्र में भद्रकाली, वज्रधाम में कात्यायनी औरद्वारकापुरी में महामाया रूप में विराजमान रहती हैं। हे देवी! आपहम पर प्रसन्न होम। क्षुधा त्वं सर्वजीवानां वेला

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महाकुंभ में वस्त्र दान का महत्व (वैदिक साक्ष्य सहित)

महाकुंभ में वस्त्र दान का महत्व (वैदिक साक्ष्य सहित) महाकुंभ का महत्व महाकुंभ मेला भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का सबसे बड़ा आयोजन है। यह 12 वर्षों के अंतराल पर चार पवित्र स्थानों – प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक – में आयोजित होता है। इसमें लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर अपने पापों से मुक्ति की कामना करते हैं। साथ ही, दान और पुण्य के कार्यों का महत्व इस अवसर पर और भी अधिक बढ़ जाता है। विशेष रूप से वस्त्र दान का कार्य महाकुंभ में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। महाकुंभ में वस्त्र दान का धार्मिक महत्व वैदिक साक्ष्य वस्त्र दान के सामाजिक और आध्यात्मिक लाभ महाकुंभ में वस्त्र दान कैसे करें? निष्कर्ष महाकुंभ में वस्त्र दान केवल एक धार्मिक कर्म नहीं है, बल्कि यह समाज सेवा और आत्मिक शुद्धि का एक माध्यम भी है। वैदिक शास्त्रों और पुराणों में इसे अत्यंत पुण्यदायी कार्य बताया गया है। यह न केवल दाता को ईश्वरीय कृपा दिलाता है, बल्कि समाज में दया, करुणा और समानता की भावना को भी बढ़ावा देता है। इस प्रकार, महाकुंभ में वस्त्र दान करने का हर श्रद्धालु को प्रयास करना चाहिए ताकि उसका जीवन धर्ममय और पुण्यमय बने। आयेएं, इस महाकुंभ में वस्त्र दान करें और इसे अपनी धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं।

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Kilkari Bhairav Jayanti:किलकारी भैरव जयंती 2025: आस्था, भक्ति और जागरण का पर्व

Kilkari Bhairav Jayanti:भैरव जयंती त्यौहार भगवान शिव के भयानक रूप बाबा भैरव नाथ को समर्पित है। पौष शुक्ला द्वितिया के दिन होने के कारण, इस त्यौहार भैरव द्वितिया भी कहा जाता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में भैरव जयंती विभिन्न तिथियों के साथ मनाई जाती है। Kilkari Bhairav Jayanti:किलकारी भैरव जयंती तिथि: बुधवार, 1 जनवरी 2025 इसे भैरवाष्टमी, भैरव जयंती, काल-भैरव अष्टमी और काल-भैरव जयंती के रूप में भी जाना जाता है। भैरव जी की पूजा विशेष रूप से सफलता, धन, स्वास्थ्य और बाधा दूर करने के लिए की जाती है। भक्त को भैरव अष्टमी का व्रत करने से पाप और मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी में इस उत्सव को द्वितीय के दिन या बाद वाले अगले रविवार को मनाया जाता है। और आस-पास के क्षेत्र मे भैरव जयंती किलकरी भैरव मंदिर के अनुसार मनाई जाती है। Kilkari Bhairav Jayanti:किलकारी भैरव जयंती 2025: आस्था, भक्ति और जागरण का पर्व किलकारी भैरव जयंती, जो उत्तर भारत में विशेष महत्व रखती है, एक धार्मिक और आध्यात्मिक उत्सव है जो प्रत्येक वर्ष भैरव जयंती के दिन मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन किलकारी में स्थित भैरव मंदिर में भक्तों का उत्साह और श्रद्धा देखते ही बनती है। Kilkari Bhairav Jayanti:किलकारी भैरव जयंती का महत्व

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Chhath Puja 2024: छठ पूजा कब है, डेट, कहानी, सूर्योदय का…..

छठ पूजा 2024 Chhath Puja 2024 Date: छठ पूजा प्रकृति को समर्पित पर्व है जिसमें सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा होती है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है जिसका आरंभ चतुर्थी तिथि से हो जाता है और समापन सप्तमी तिथि पर होता है। Chhath Puja 2024 छठ पर्व पर व्रती कमर तक जल में प्रवेश कर सूर्यदेव को अर्घ्य देते है। आइए जानते हैं छठ पर्व की हर छोटी बड़ी बातें और मान्यताएं। क्यों, कब और कैसे मनाते हैं छठ पर्व। छठ महापर्व षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व है जो बेहद कठिन है। यह पर्व नियम संयम और तपस्या का पर्व है जो चारों दिनों तक चलता है, लेकिन इसकी तैयारी हफ्ते पहले से ही शुरू हो जाती है। आपको बता दें कि, छठ पर्व मूल रूप से बिहार और पूर्वांचल से शुरू हुआ माना जाता है। लेकिन अब यह भारत के अलग अलग राज्यों में और विदेशों में भी मनाया जाने लगा है और बिहार और पूर्वांचलवासी ही नहीं अन्य क्षेत्रों में रहन वाले लोग भी अब Chhath Puja 2024 छठ पर्व के प्रति आस्थावान होकर छठ व्रत करने लगे हैं। छठ पर्व और छठ मैया की मान्यता छठ पर्व मुख्य रूप कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को मनाते हैं लेकिन इसके अलावा चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि का छठ पर्व जिसे चैती छठ कहते हैं यह भी काफी प्रचलित है। इस तरह दो छठ व्रत विशेष रूप से महत्व है।Chhath Puja 2024 दोनों ही छठ पर्व भगवान सूर्य को और षष्ठी माता को समर्पित है। इसलिए छठ पर्व में भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और छठ मैया की पूजा कथा की जाती है। छठ पूजा की मान्यता छठ मैया के बारे में कथा है कि यह ब्रह्माजी की मानस पुत्री हैं और सूर्यदेव की बहन हैं। छठ मैया को संतान की रक्षा करने वाली और संतान सुख देने वाली देवी के रूप में शास्त्रों में बताया गया है जबकि सूर्यदेव अन्न और संपन्नता के देवता है। Chhath Puja 2024 इसलिए जब रवि और खरीफ की फसल कटकर आ जाती है तो छठ का पर्व सूर्य देव का आभार प्रकट करने के लिए चैत्र और कार्तिक के महीने में किया जाता है। Chhath Puja 2024:छठ पर्व के चार दिनों का खास महत्व छठ पर्व मुख्य रूप से षष्ठी तिथि को किया जाता है। लेकिन इसका आरंभ नहाय खाय से हो जाता है यानी Chhath Puja 2024 छठ पर्व शुरुआत में पहले दिन व्रती नदियों में स्नान करके भात,कद्दू की सब्जी और सरसों का साग एक समय खाती है।Chhath Puja 2024 दूसरे दिन खरना किया जाता है जिसमें शाम के समय व्रती गुड़ की खीर बनाकर छठ मैय्या को भोग लगाती हैं और पूरा परिवार इस प्रसाद को खाता है। तीसरे दिन छठ का पर्व मनाया जाता है जिसमें अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पर्व को समापन किया जाता है। छठ पूजा की तिथियाँ (Chhath Puja 2024 Date) नहाय खाय (5 नवंबर 2024): छठ पूजा के पहले दिन, श्रद्धालु नदी या तालाब में स्नान करते हैं और केवल शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। खरना (6 नवंबर 2024): दूसरे दिन, व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में खीर, रोटी और फल खाए जाते हैं। संध्या अर्घ्य (7 नवंबर 2024): तीसरे दिन, व्रती सूर्यास्त के समय नदी या तालाब के किनारे जाकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। यह छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। प्रातःकालीन अर्घ्य (8 नवंबर 2024): चौथे दिन, उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, Chhath Puja 2024 जिसके बाद व्रती अपना व्रत तोड़ते हैं और प्रसाद वितरण करते हैं। छठ पूजा की महिमा छठ पूजा को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इस दौरान श्रद्धालुओं को कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है। यह व्रत परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु और रोगमुक्त जीवन के लिए किया जाता है। इस त्योहार के दौरान सूर्य की आराधना से हमें ऊर्जा और शक्ति मिलती है, जो जीवन में सकारात्मकता का संचार करती है। Chhath Puja 2024:छठ पूजा का प्रसाद Chhath Puja 2024 छठ पूजा के दौरान प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, चावल के लड्डू, फलों और नारियल का प्रयोग किया जाता है। ये सभी प्रसाद शुद्ध सामग्री से बनाए जाते हैं और सूर्य देवता को अर्पित किए जाते हैं। छठ पूजा के पारंपरिक गीत (Chhath Puja Geet) “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाये…” कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जायेबहंगी लचकत जाये, हमार सुगवा धनुष भइलनसुगवा धनुष भइलन, अस मनवा काहे डोलेकांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाये। “उग हो सूरज देव, भइल अर्घ के बेर…” उग हो सूरज देव, भइल अर्घ के बेरबहंगी के पिटारा, सजल डोलियाउग हो सूरज देव, भइल अर्घ के बेर। “केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव…” केलवा के पात पर उगेलन सूरज देवमोरा मनवा में आनंद भईलउगेलन सूरज देव। “पटना के घाट पर, भोर के बेला…” पटना के घाट पर, भोर के बेलाउग हो सूरज देव, छठी मैया की महिमा। “हे छठी मैया, हम बानी तोहार पुजारी…” हे छठी मैया, हम बानी तोहार पुजारीअर्घ के दिनवा हम तोहके देहबहे छठी मैया, हम बानी तोहार पुजारी। छठ पूजा के आधुनिक गीत “पार करो हे गंगा मइया…” पार करो हे गंगा मइया, हमके पार करोउगेला सुरज देव, हे माई, हमके तार दियो। “छठी मईया आओ, अर्घ ले लो…” छठी मईया आओ, अर्घ ले लोहमार विनती सुन लो, हे मैया, जीवन धन्य करो। “सूरज देव जी हे, आशीष दीजिये…” सूरज देव जी हे, आशीष दीजियेभक्त जनों का जीवन सुखमय कर दीजिये छठ पूजा पर शुभकामनाएँ (Chhath Puja Wishes in Hindi) छठ पूजा के कुछ सामान्य प्रश्न उत्तर

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छठ पर्व के 5 सूर्य मंत्र : अर्घ्य देते समय पढ़ना न भूलें

छठ पर्व पर सूर्य मंत्र का 108 बार जाप करने से अवश्य लाभ मिलता है। छठ पूजा ये सूर्य मंत्र यश, सुख, समृद्धि, संतान, वैभव, सफलता, कीर्ति, पराक्रम, ऐश्वर्य, सौभाग्य, धन, संपदा और सुंदरता का वरदान देते हैं।  भगवान सूर्य के सरल मंत्र 1. ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य: 2. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।। 3. ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:। 4. ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ । 5. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः ।  . ॐ सूर्याय नम: ।  . ॐ घृणि सूर्याय नम: ।   इसके साथ ही अगर छठ पूजा भाषा व उच्चारण शुद्ध हो तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।  आदित्य ह्रदय स्तोत्र के पाठ से मिलेगा छठ पूजा का पूरा फल आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ नियमित करने से अप्रत्याशित लाभ मिलता है।छठ पूजा आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। हर मनोकामना सिद्ध होती है। सरल शब्दों में कहें तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र हर क्षेत्र में चमत्कारी सफलता देता है। विशेषकर छठ पूजा पर यह पाठ हर तरह के शत्रु से मुक्ति दिलाता है। यहां पढ़ें संपूर्ण पाठ…   ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥ राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥ सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥ पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥ आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥ हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥ हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥ व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥ आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥ नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥ नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥ जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥ नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥ ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥ तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥ तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥ नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥ एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥ देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥ एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥ पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥ अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥ एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥ आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥ रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥ अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥ ।।संपूर्ण।। Chhath Puja 2024: छठ पूजा पर भूल कर भी ना करें ये चीजें

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Bhai Dooj Tilak Shubh Muhurat: भाई दूज: भाई-बहन के अटूट बंधन का पर्व

भाई दूज: भाई-बहन के अटूट बंधन का पर्व भाई दूज, जिसे यम द्वितीया भी कहा जाता है, भारत में भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, जो इस साल 3 नवंबर को है। इस दिन बहनें अपने भाई को तिलक करती हैं और उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि, और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। रक्षाबंधन की तरह ही भाई-बहन के स्नेह को दर्शाने वाला पर्व है, परंतु इसकी परंपराएं और विधियां थोड़ी भिन्न हैं। भाई दूज का महत्व और पौराणिक कथा भाई दूज का महत्व बहुत ही विशेष है, और इसके पीछे एक पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, यमराज (मृत्यु के देवता) अपनी बहन यमुनाजी से मिलने गए। यमुनाजी ने अपने भाई का स्वागत किया और उनका सत्कार कर तिलक किया। यमराज ने प्रसन्न होकर अपनी बहन से वरदान मांगा, और यमुनाजी ने अपने भाई से यह वरदान मांगा कि इस दिन जो भाई अपनी बहन से तिलक करवाएगा, उसे कभी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा। तभी से दिन बहनें अपने भाई की दीर्घायु की कामना के साथ उसे तिलक करती हैं। इस त्योहार को यमराज और यमुनाजी के रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। तिलक का मुहूर्त और चौघड़िया मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार, इस वर्ष भाई दूज का शुभ मुहूर्त सुबह 10:41 से दोपहर 12 बजे तक है, जो तिलक करने का सबसे उत्तम समय माना गया है। इस दौरान अमृत चौघड़िया भी रहेगा, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि बहनें इस समय अपने भाई को तिलक नहीं कर पाती हैं, तो शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक के बीच शुभ और अमृत चौघड़िया में तिलक कर सकती हैं। लेकिन ध्यान रखें कि राहुकाल शाम 4:30 से 6 बजे के बीच रहेगा, जिसमें कोई भी शुभ कार्य करना अशुभ माना जाता है, इसलिए इस समय तिलक करने से बचें। भाई दूज तिलक करने की विधि और सावधानियां भाई दूज के दिन तिलक करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए। माना जाता है कि इस दिन बहन की अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) में अमृत तत्व प्रवाहित होता है, इसलिए भाई को तिलक करते समय बहन को अपनी रिंग फिंगर का ही उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही, तिलक करते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। तिलक के साथ-साथ अक्षत (चावल) का प्रयोग भी अवश्य करें, क्योंकि इसे शुभ और मंगलकारी माना गया है। भाई दूज के दिन की अन्य परंपराएं और कहानियां भाई दूज की परंपराओं में भोजन का भी विशेष महत्व है। बहनें इस दिन अपने भाई को विशेष पकवान बनाकर खिलाती हैं। यह माना जाता है कि भाई दूज के दिन बहन द्वारा प्रेमपूर्वक परोसा गया भोजन भाई की लंबी उम्र और खुशियों का प्रतीक होता है। एक और प्रचलित कहानी के अनुसार, एक बार एक राजा की बेटी ने अपने भाई को तिलक करते समय उसकी लंबी उम्र की कामना की और उसे खीर खिलाई। इसने उनके रिश्ते को इतना मजबूत बना दिया कि वह समय आने पर अपने भाई के लिए किसी भी तरह का बलिदान देने के लिए तैयार थी। ऐसी कथाएं इस त्योहार को और भी खास बनाती हैं। Conclusion भाई दूज केवल एक त्योहार नहीं है, यह भाई-बहन के प्यार और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाई की सलामती और दीर्घायु की कामना करती हैं, और भाई अपनी बहनों की सुरक्षा और उनका सम्मान बनाए रखने का वचन देते हैं। इस भाई दूज पर, अपने भाई-बहन के साथ इस अटूट रिश्ते को मनाएं और एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम और समर्थन को और मजबूत करें। Happy Bhai Dooj!

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Govardhan Puja 2024: गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से क्यों बनता है गोवर्धन पर्वत?

Govardhan Puja 2024: गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से क्यों बनता है गोवर्धन पर्वत? गोवर्धन पूजा का पर्व दीवाली के अगले दिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन गोवर्धन पर्वत और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। खासतौर पर इस पूजा में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गोवर्धन पर्वत को बनाने के लिए गाय के गोबर का ही उपयोग क्यों किया जाता है? चलिए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व। गोवर्धन पूजा का महत्व गोवर्धन पूजा का पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रजवासियों को इंद्र देव की कठोर वर्षा से बचाने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर पर्वत उठाकर गांववासियों को सुरक्षा प्रदान की थी। इसलिए गोवर्धन पूजा के दिन इस पर्वत का प्रतीकात्मक निर्माण किया जाता है और उसकी पूजा कर श्रीकृष्ण को धन्यवाद दिया जाता है। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने का कारण 1. गोबर का धार्मिक महत्व 2. प्राकृतिक तत्वों का प्रतीक 3. गाय का विशेष महत्व 4. वैज्ञानिक दृष्टिकोण 5. सांस्कृतिक परंपरा गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त 2024 इस वर्ष गोवर्धन पूजा 2 नवंबर, 2024 को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है: गोवर्धन पूजा के अन्य महत्वपूर्ण उपाय निष्कर्ष गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने का महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह पूजा न केवल श्रीकृष्ण के प्रति हमारी श्रद्धा को प्रदर्शित करती है बल्कि प्रकृति और संस्कृति से हमारा जुड़ाव भी बनाए रखती है। पूजा का यह पर्व हमारी परंपरा और विश्वास को मजबूत करता है और हमें जीवन में समृद्धि, सुख और शांति का संदेश देता है। इस पूजा पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से आपके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे।

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