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 क्या आपको पता है हनुमान जी के पांच भाईयो के बारे में ?

ब्रह्मांडपुराण के अनुसार, हनुमान जी के पांच भाई थे, जिनके नाम हैं: इन सभी भाइयों का जन्म अंजना और केसरी के गर्भ से हुआ था। हनुमान जी इन सबमें बड़े थे। मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान सभी विवाहित थे और सभी संतान से युक्त थे। हनुमान जी के इन भाइयों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। केवल उनके नाम ही ब्रह्मांडपुराण में उल्लिखित हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि हनुमान जी के ये भाई भी भगवान शिव के अवतार थे। हालांकि, इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। हनुमान जी के भाइयों के नाम और उनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए और शोध की आवश्यकता है। देवराज इंद्र के लोक में एक अप्सरा कुंजीस्थली रहती थी जब एक बार दुर्वासा ऋषि इंद्र की सभा में उपस्थित थे जब अप्सरा बार-बार अंदर बाहर आकर सभा में विघ्न उत्पन्न कर रही थी जिससे दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने उस अप्सरा को बंदरिया हो जाने का श्राप दे दिया इसके बाद अप्सरा ने ऋषि से श्राप वापस लेने के लिए बहुत प्रार्थना की तब दुर्वासा ऋषि ने उन्हें इच्छा अनुसार रूप धारण करने का वरदान दिया कुछ वर्षों बाद अप्सरा कुंजीस्थली ने वानर श्रेष्ठ ब्रज के यहां वानरी रूप में जन्म लिया और उनका नाम अंजनी रखा गया विवाह योग्य होने पर उनके पिता ने अपनी पुत्री अंजनी का विवाह महान पराक्रमी, शिरोमणि वानरराज केसरी से कर दिया बहुत समय तक जब अंजनी मां को संतान नहीं हुई तब उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया फिर एक बार वानर राज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट थे तब उन्होंने देखा की वहां बहुत से साधु ध्यान लगाकर पूजा अर्चना कर रहे हैं तभी एक विशाल हाथी आया और उसने वहां बैठे ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया वहीं ऋषि भरद्वाज Bhardwaj अपने आसन पर ध्यान लगाकर बैठे थे वह हाथी उनकी ओर बढ़ रहा था तभी वानर राज केसरी ने बलपूर्वक हाथी के दांतो को पकड़कर उसे मार डाला तब सभी ऋषियों ने प्रसन्न होकर राजा केसरी को वरदान मांगने को कहा,तब उन्होंने इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाला पवन के समान तेज तथा रूद्र के समान पुत्र प्राप्त करने का वरदान मांगा था इसके बाद सभी ऋषि उन्हें यह वरदान देकर वहां से चले गए | बजरंगबली क्यों कहा जाता है  हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार है जो सबसे बलशाली और बुद्धिमान है हनुमान जी का जन्म श्री राम और श्री राम भक्तों की सहायता करने के लिए हुआ है इस संपूर्ण कलयुग में हनुमान जी उपस्थित रहकर श्री राम भक्तों की सहायता अवश्य करते हैं जो सच्चे मन, कर्म, और वचन से श्री राम जी का भक्त हैं स्वयं हनुमान जी की कृपा उस पर हमेशा बनी रहती है इस पृथ्वी पर जिन 7 ऋषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें हनुमान जी भी शामिल है हनुमान जी के पराक्रम की अनेक कथाएं रामायण एवं अन्य ग्रंथों में प्रचलित है इनका शरीर वज्र के समान होने के कारण इन्हें “बजरंगबली” और पवन के समान वेग होने के कारण इन्हें “मारुति” कहा जाता है बचपन में मां अंजनी और पिता केसरी ने इनका नाम मारुति रखा था लेकिन जब सूर्य को निगल लेने पर इंद्र ने मारुति पर वज्र प्रहार किया तब मारुति की टोडी का रूप बिगड़ गया जब से इनका नाम हनुमान पड़ गया हनुमान का अर्थ होता है बिगड़ी हुई टोंडी हनुमान जी के 108 और नाम है और हर नाम का अलग-अलग अर्थ है इन के 108 नामों का जप करने से समस्त दुख रोगों का नाश हो जाता है कहते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या में श्री राम नवमी पर सरयू नदी के किनारे साधु का वेश धारण कर ब्राह्मणों को भोजन कराने आते हैं |  Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा? हनुमान जी के पांच भाई  एक बार हनुमान जी ने श्रीराम की याद में अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया था क्योंकि उन्होंने 1 दिन माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देख लिया था जब उन्होंने माता सीता से इसका कारण पूछा तो माता सीता ने कहा यह सिंदूर श्री राम के प्रति प्रेम और सम्मान का प्रतीक है यह जानने के बाद हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया यह दर्शाने के लिए कि वह भी श्री राम से बहुत प्रेम करते हैं इस घटना के बाद हनुमान जी का लाल रंग में उनका रूप बहुत ही प्रचलित हुआ महाभारत काल में भीम Bheem अपने बल के कारण जाने जाते थे वह भी हनुमान जी के भाई थे  इनके अलावा हनुमान जी के पांच भाई और भी थे हनुमान जी के पांच सगे भाई और भी थे और वह सभी विवाहित थे इस बात का उल्लेख ब्रह्मांड पुराण में मिलता है पांचों भाइयों में बजरंगबली सबसे बड़े थे हनुमान जी को शामिल करने के बाद वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे सभी में सबसे बड़े बजरंगबली थे इनके बाद मति मान, श्रुति मान ,केतु मान, गतिमान धूती मान थे इन सभी की संताने भी थी जिसके कारण इनका वंश कई वर्षों तक चला था | हनुमान जी की सत्य घटना  जब बाली को यह वरदान मिला कि जो भी उस से युद्ध करने उसके सामने आएगा तो उसकी आदि शक्ति वाली में चली जाएगी और बाली हर युद्ध में जीत जाएगा सुग्रीव और बाली दोनों ब्रह्मा के औरस पुत्र थे बाली पर ब्रह्मा जी की सदैव कृपा बनी रहती थी बाली को अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड था उसका घमंड और भी अधिक बढ़ गया जब उसने तीनों लोकों के सबसे शक्तिशाली योद्धा रावण से युद्ध किया था बाली ने रावण को अपनी पूंछ से बांधकर पूरी दुनिया में भ्रमण किया था रावण जैसे योद्धा को हराकर बाली के घमंड की कोई सीमा नहीं रही थी इसके बाद बाली अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था 1 दिन बाली अपने घमंड में हरे भरे पौधों को तिनके के समान उखाड़ कर फेंक रहा था बाली अपनी ताकत के नशे में पूरे जंगल को उजाड़ रहा था और वह बार-बार युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था उसी जंगल में

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कौन हैं हनुमान जी जानें संपूर्ण जानकारी

रामायण के अनुसार हनुमान जी माता जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिंदू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में प्रधान हैं। वह कुछ विचारों के अनुसार भगवान शिवजी के ११वें रुद्रावतार, सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से राक्षसों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है। हनुमान जी हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव के अवतार हैं और भगवान राम के सबसे भक्त हैं। उन्हें “बजरंगबली”, “पवनपुत्र”, “महावीर”, “अंजनीपुत्र” और “केसरीनंदन” जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। जन्म हनुमान जी का जन्म अंजना और केसरी के पुत्र के रूप में हुआ था। अंजना एक वानर थी और केसरी एक वानरराज था। हनुमान जी का जन्म अंजना की तपस्या के फलस्वरूप हुआ था। अंजना ने भगवान शिव से एक पुत्र की कामना की थी, और भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें हनुमान जी का वरदान दिया। शक्ति हनुमान जी को भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें अष्ट सिद्धियों और नव निधियों का स्वामी माना जाता है। हनुमान जी के पास कई चमत्कारिक शक्तियां हैं, जिनमें शामिल हैं: भक्ति हनुमान जी भगवान राम के सबसे भक्त हैं। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य भगवान राम की सेवा करना माना है। हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा में कई चमत्कारिक कार्य किए हैं, जिनमें शामिल हैं: Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा? पूजा हनुमान जी की पूजा हिंदू धर्म में बहुत लोकप्रिय है। उन्हें बुद्धि, शक्ति, और भक्ति का देवता माना जाता है। हनुमान जी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हनुमान जी की पूजा विधि हनुमान जी की पूजा करने के लिए सबसे पहले एक स्वच्छ स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। फिर, हनुमान जी को रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, और प्रसाद अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। अंत में, हनुमान जी से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करें। हनुमान जी के कुछ प्रसिद्ध मंत्र हनुमान जी के कुछ प्रसिद्ध मंदिर हनुमान जी हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव के अवतार हैं और भगवान राम के सबसे भक्त हैं। हनुमान जी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 58 हजार 112 वर्ष पहले तथा लोकमान्यता के अनुसार त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6.03 बजे भारत देश में आज के झारखंड राज्य के गुमला जिले के आंजन नाम के छोटे से पहाड़ी गाँव के एक गुफा में हुआ था। कौन थे हनुमान के पिता? भगवान हनुमान का जन्म वानर रूप में हुआ था। उनके पिता का नाम केसरी था, जो कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक बृहस्पति देव के पुत्र थे। हनुमान की माता ‘अंजनी’ एक अप्सरा थीं जो एक श्राप के चलते वानर रूप में धरती पर अपनी जीवन व्यतीत कर रही थीं। हनुमान का जन्म माता अंजनी की कोख से भगवान शिव से मिले वरदान के परिणाम से हुआ था।  भगवान हनुमान का जन्म अंजनी एक अप्सरा की पुत्री थी मगर एक ऋषि से मिले श्राप की वजह से वे धरती पर आ गई और एक साधारण वानर स्त्री के रूप में जीवन व्यतीत करने लगी। एक पुत्र को जन्म देने के बाद ही वह श्राप से मुक्त हो सकती थी। धरती पर आकर अंजनी का विवाह वानरों के राजा केसरी से हुआ। दोनों ने मिलकर भगवान शिव की अराधना की और वरदान हेतु अंजनी को पुत्र रूप में ‘मारुति’ (हनुमान) की प्राप्ति हुई। इस तरह हनुमान शिव के अंश बताए जाते हैं। वायु देव के पुत्र हनुमान ‘एकनाथ भावार्थ रामायण’ में दर्ज एक कथा के अनुसार हनुमान वायु देव के पुत्र थे। इसलिए उन्हें पवनपुत्र के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कथा के मुताबिक त्रेता युग में राजा दशरथ पुत्रों की प्राप्ति के लिए महायज्ञ (वायु देव को समर्पित) करवा रहे थे। उस यज्ञ में खास प्रकार का प्रसाद ‘पयासम’ तैयार किया गया था। यह प्रसाद राजा की तीनों पत्नियों को ग्रहण करना था। मगर अचानक ही एक पक्षी आया और उसने अपने पंजों में इस पवित्र प्रसाद का कुछ भाग दबोच लिया और वहा उड़ गया। वह पंछी उस जंगल के ऊपर से गुजरा जहां माता अंजनी तपस्या आकार रही थीं। उसके पंजों से प्रसाद छोट आज्ञा और सीधा माता अंजनी के हाथों में जाकर गिरा। अंजनी ने उसे शिव का प्रसाद समझ ग्रहण कर लिया। यही कारण है कि वायु देव को हनुमान का पिता बताया जाता है। और इसलिए हनुमान में वायु की तरह उड़ने की चमत्कारी शक्ति भी थी। भगवान हनुमान का परिवार केसरीनंदन हनुमान राजा केसरी और माता अंजनी की ज्येष्ठ संतान थे। उनके बाद केसरी और अंजनी के पांच पुत्र और हुए। इनके नाम इस प्रकार हैं – मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान। इन सभी का विवाह हुआ था और धार्मिक ग्रंथों में इनकी संतानों का उल्लेख भी मिलता है। पौराणिक कथाओं में भगवान हनुमान की संतान को ‘मकरध्वज’ के नाम से जाना जाता है। 

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जब हनुमान जी हारे एक तपस्वी से

श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को वीरों के वीर महावीर कहा जाता है। जिन्होंने अपने प्रभु राम की रक्षा करने के लिए बहुत से युद्ध किए और जीते। शास्त्रों में इन्हें संकटमोटन कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों को हर संकट से उबारते हैं। रामायण महाकाव्य में महर्षि वाल्मीकि ने राम चंद्र और हनुमान जी के कार्यो का बहूत ही सुंदर तरीके वर्णन किया है। रामायण के पान से यह पता चलता की हनुमान अपनी निस्वार्थ भक्ति से राम के मन मंदिर में बसे हुए हैं। राम जी के लिए बजरंगबली ने हर असंभव कार्य को भी संभव सिद्ध किया। इन्होंने अपने पराक्रम से बड़े-बड़ राक्ष्सों का नाश किया। इतना ही नहीं इन्होंने अपने पराक्रम से शनिदेव, बालि, अर्जुन, भीम जैसे बड़े-बड़े वीरों को युद्ध में पराजित करके उनका अभिमान चूर-चूर किया। लेकिन क्या आपको पता है कि संकटमोचन हनुमान ने अपने जीवन काल में अभिमान वश एक ऐसा भी युद्ध लड़ा जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं इस युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था। तो आईए जानें आख़िर कौन था ये राम भक्त दरअसल मच्छिंद्रनाथ नाम के बड़े तपस्वी थें, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो रामजी का निर्मित सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।’ ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ से पूछा, आप कौन हैं? जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं का परिचय दिया ‘मैं एक सिद्ध योगी हूं और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है। जिस पर हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा इस संसार में कोई नहीं है, पर कुछ समय उनकी सेवा करने के कारण, उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का एक प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी कहना बंद करें। इतना सुनते ही मच्छिंद्रनाथ ने उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके 7 बड़े पर्वत फेंके, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी सातों पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया। इन पानी की बूंदों का स्पर्श होते ही हनुमान का शरीर स्थिर हो गया और हलचल करने में भी असमर्थ हो गया, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे। तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए । इसके बाद उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा – हे मच्छिंद्रनाथ आप तो स्वयं में नारायण के अवतार हैं, ये मैं भलीभांति जानता था, फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को समझते हुए मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।

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जब प्रभु राम ने तोड़ा पवनपुत्र हनुमान का घमंड, पढ़ें यह रोचक कथा

मंगलवार का दिन पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना के लिए समर्पित है. कई बार हनुमान जी ने अपने प्रभु राम की मदद के लिए असंभव को भी संभव कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने ने राम नाम के महत्व के लिए प्रभु राम के क्रोध का सामना भी किया. हनुमान जी के आराध्य प्रभु राम हैं और राम जी को हनुमान जी सभी भक्तों में सबसे अधिक प्रिय हैं. हनुमान जी और प्रभु राम से जुड़ी कई कहानियां हैं. आज हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बता रहे हैं, जिसमें प्रभु राम ने हनुमान जी के घमंड को तोड़ा था. लंका युद्ध के पहले की बात है. समुद्र को पारकर लंका जाने के लिए सेतु बनाया जाना था. उससे पूर्व प्रभु राम चाहते थे कि सेतु पर एक शिवलिंग की स्थापना की जाए. प्रभु राम ने हनुमान जी से अपने मन की बात बताई और कहा कि काशी जाकर शिवलिंग लाएं और मुहूर्त से पूर्व आ जाएं. पवनपुत्र के लिए काशी जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. वे तो अतुलित बलशाली और वेगवान थे. वे पलभर में ही काशी पहुंच गए. अपने वेग पर उनको थोड़ा सा अभिमान हो गया. प्रभु राम तो अंतर्यामी हैं. उन्हें यह बात पता चल गई. उन्होंने सुग्रीव से कहा कि मुहूर्त बीत जाएगी, ऐसे में वे रेत की ही शिवलिंग सेतु पर स्थापित कर देते हैं. प्रभु राम ने वहां पर रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया. इसी बीच हनुमान जी काशी से शिवलिंग लेकर प्रभु राम के पास पहुंच गए. उन्होंने देखा कि प्रभु राम ने तो रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया है. हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा कि आपने मुझे काशी भेजकर यह शिवलिंग लाने को कहा था. यह लेकर आ गया, लेकिन आपने रेत का शिवलिंगस्थापित कर दिया. तब प्रभु राम ने कहा कि उनसे भूल हो गई है. ऐसा करो कि इस रेत वाले शिवलिंग को यहां से हटा दो. फिर वे काशी से लाए शिवलिंग को यहां स्थापित कर देंगे. हनुमान जी ने प्रभु आज्ञा पाकर अपनी पूंछ से रेत के शिवलिंग को पकड़ लिया और उसे उखाड़ने की कोशिश करने लगे. लेकिन वह शिवलिंग वहां से एक इंच भी नहीं हिला. हनुमान जी को पहले आश्चर्य हुआ, लेकिन थोड़े ही देर में उनको अपनी गलती का एहसास हो गया. उनका घमंड टूट गया. फिर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम से क्षमा मांगी.

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कैसे हुआ हनुमान जी का जन्म, बेहद रोचक है कहानी, जानें

हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2023, गुरुवार को है. साल में दो बार हनुमान जयंती मनाई जाती है. उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा पर दूसरी बार कार्तिक महीने में. महावीर हनुमान को भगवान शिव का 11वां रूद्र अवतार कहा जाता है और वे प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं. इस दिन हनुमान जी ने वानर जाति में जन्म लिया. हनुमानजी एक ऐसे देवता हैं जो त्रेतायुग से लेकर आज तक सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं. मान्यता है कि जहां भी राम कथा होती है वहां हनुमानजी किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं. हनुमान जयंती पर हनुमान जी की जन्म कथा का श्रवण करने से बजरंगबली की कृपा बरसती है. हनुमान जयंती 2023 मुहूर्त चैत्र पूर्णिमा तिथि शुरू – 05 अप्रैल 2023, सुबह 09.19 चैत्र पूर्णिमा तिथि समाप्त – 06 अप्रैल 2023, सुबह 10.04 शुभ (उत्तम) – सुबह 06.06 – सुबह 07.40 लाभ (उन्नति) – दोपहर 12.24 – दोपहर 01.58 हनुमान जयंती कथा हनुमान जी को केसरीनंदन और आंजनाय पुत्र कहा जाता है, वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार इन्हें हनुमान जी के जन्म के पीछे पवन देव का भी योगदान था, इसलिए यह पवन पुत्र भी कहलाए गए. पौराणिक कथा के अनुसार त्रैतायुग में राजा दशरथ में पुत्र प्राप्ति के लिए एक हवन. हवन समाप्ति के बाद गुरुदेव ने प्रसाद की खीर राजा दशरथ की तीनों रानियों  कौशल्या, सुभद्रा और कैकेयी को बांटी. उस समय खीर का थोड़ा सा हिस्सा एक पक्षी ले गया. ऐसे हुआ हनुमान जी का जन्म उड़ते-उड़ते वह पक्षी देवी अंजना के आश्रम चला गया. यहां माता अंजना तपस्या कर रही थी. उस दौरान पक्षी के मुंह से खीर माता अंजना के हाथ में गिर गई. देवी ने इसे भोलेनाथ का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया. इस प्रसाद के प्रभाव और ईश्वर की कृपा से माता अंजना ने शिव के अवतार बाल हनुमान को जन्म दिया. उस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी. हनुमान जयंती पर कैसे करें पूजा हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली को चमेली के तेल में मिश्रित सिंदूर का चोला चढ़ाएं. अक्षत, कनेर, गुड़हल या गुलाब के पुष्प चढ़ाएं. नैवेद्य में मालपुआ, बेसन के लड्डू अर्पित करें. ‘ॐ हं हनुमते नम:‘ का 108 बार जाप करें. हनुमान चालीसा का पाठ करें. अब आरती के पश्चात गरीबों को दान दें. श्री हनुमान चालीसा दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।  चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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