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मंगलवार को इस मुहूर्त में करें Hanuman Ji की पूजा-आराधना, पूरी होगी हर मनोकामना

 बजरंगबली (bajrangbali) या यूं कहें हनुमान जी (hanuman ji) का दिन है. कई लोग इस दिन व्रत भी रखते है तो वहीं कई लोग इस दिन बड़े ही भक्ति भाव (hanuman ji bhakt) से हनुमान जी की पूजा भी करते है. लेकिन, अगर आप पूजा भी करना चाहते है तो क्यों ना शुभ मुहूर्त में करें जिससे बजरंगबली प्रसन्न हो जाए. तो चलिए आपको आज के दिन का शुभ मुहूर्त बता देते है. जिसमें पूजा करने से आपको बहुत लाभ होंगे.   हनुमान जी की पूजा का शुभ मुहूर्त (shubh muhurat) या सही समय  वैसे तो मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा सुबह करें या शाम दोनों ही समय में करना फलदायी माना जाता है. इस दिन आप सूरज के उगने के बाद और शाम को सूरज डूबने के बाद हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं. वैसे तो पूरे दिन में सूरज डूबने के बाद ही पूजा का शुभ मुहूर्त (hanuman ji puja shubh muhurat) होता है.  Hanuman Ji:जब जीवन में मिले ये संकेत, तो समझ लीजिए आप पर बनी हुई है हनुमान जी की कृपा चलिए, आपको कुछ इसके शुभ मुहूर्त बता देते है-अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 40 मिनट तकविजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 02 मिनट से 02 बजकर 44 मिनट तकनिशीथ काल- मध्‍यरात्रि 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तकगोधूलि बेला- शाम 05 बजकर 19 मिनट से 05 बजकर 43 मिनट तकअमृत काल- शाम 07 बजकर 45 मिनट से 09 बजकर 32 मिनट तकत्रिपुष्कर योग- सुबह 07 बजकर 10 मिनट से दोपहर 02 बजकर 53 मिनट तक अब, शुभ मुहूर्त तो बता दिए इसके साथ ही अशुभ भी बता देते है जिसमें पूजा नहीं करनी चाहिए –  राहुकाल- दोपहर 03 बजे से 04 बजकर 30 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल- सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकदुर्मुहूर्त काल सुबह 09 बजकर 14 मिनट से 09 बजकर 55 मिनट तकभद्रा- अगली सुबह 03 बजकर 55 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक हनुमान जी की पूजा विधि (hanuman ji puja vidhi)इस दिन सही विधि के साथ हनुमान जी की पूजा करना शुभ माना जाता है. कहते हैं कि हनुमान जी की पूजा जितनी साधारण है उतनी ही मुश्किल भी है. आज के दिन सुबह उठकर नहा-धोकर लाल रंग के कपड़े पहन लें. आप घर या मंदिर कहीं भी पूजा कर सकते हैं. घर में पूजा करने के लिए ईशान कोष को साफ करके वहां पर एक चौकी की स्थापना करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं. इसके बाद उस पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करें. इसके साथ ही भगवान श्री राम और माता सीता की मूर्ति रखना न भूलें. इसके बाद बजरंग बली के आगे घी का दीपक जलाएं. दीप, धूप जलाकर सुंदर कांड का पाठ करें और हनुमान जी के मंत्रों का जाप करें. उसके बाद लाल फूल, लाल सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाएं.  इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी की आरती करें. मंगलवार के दिन भगवान को गुड़, केले और लड्डू का भोग लगाएं और परिवार के सदस्यों को प्रसाद बांटे. अगर आपने मंगलवार का व्रत रखा है तो इस बात का ध्यान रखें कि इसमें शाम के समय एक बार ही खाना खाना होता है. इस दौरान खाने में सिर्फ मीठा भोजन ही शामिल करें. इसके साथ ही दिन में केले, दूध और मीठे फलाहार शामिल किया जा सकता है. 

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Hanuman Ji:जब जीवन में मिले ये संकेत, तो समझ लीजिए आप पर बनी हुई है हनुमान जी की कृपा

Hanuman Ji: हनुमान जी को भगवान राम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है। तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में भगवान हनुमान के कई गुणों का विस्तृत वर्णन किया है। उनके चरित्र के चलते ही गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान जी को ‘सकल गुण निधानं’ कहा है। कुछ ऐसे संकेत बताए गए हैं जिनके मिलने पर आप यह जान सकते हैं कि आपके ऊपर हनुमान जी की कृपा बनी हुई है। आइए जानते हैं वह कौन-से संकेत हैं। निर्भय होता है जीवन अगर आपके जीवन में किसी प्रकार का डर नहीं है और आप पूरी सच्चाई के साथ अपना जीवन जी रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आपके ऊपर संकटमोचन हनुमान जी की विशेष कृपा बनी हुई है। क्योंकि जिस भक्त पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं उसका जीवन भयमुक्त बीतता है। Hanuman ji:रामभक्‍त हनुमान को किसने दिया था अमर होने का वरदान? पढ़ें ये पौराणिक कथा काम में नहीं आती कोई बाधा जब व्यक्ति के किसी काम में बाधा न आए। साथ ही उसे हर कार्य में सफलता की प्राप्ति हो रही है तो, यह भी इस बात की ओर संकेत करता है कि हनुमान जी की कृपा आपके ऊपर बनी हुई है। जब हाथ में दिखे मंगल रेखा अगर आपके हाथों में मंगल रेखा साफ दिखाई देने लगे तो इसका अर्थ है कि बजरंगबली आपसे प्रसन्न हैं। ऐसा होने पर कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होंगी। घर के किसी भी सदस्य को किसी प्रकार का रोग या पीड़ा नहीं होगी।   शनि दशा का नहीं होता प्रभाव अगर व्यक्ति पर किसी प्रकार से शनि की साढ़े साती, ढैया या अन्य किसी भी प्रकार की शनि पीड़ा का असर नहीं होता तो समझा जाता है कि उस व्यक्ति पर हनुमान जी की विशेष कृपा बनी हुई है। जगन्नाथ का मंदिर : जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। कहावत है कि महाप्रभु जगन्नाथ में वीर मारुति को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे, सम्प्रति समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता। केसरीनंदन की इस आदत से परेशान हो जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमान को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया।

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Hanuman ji:रामभक्‍त हनुमान को किसने दिया था अमर होने का वरदान? पढ़ें ये पौराणिक कथा

Hanuman Ji Puja: हिंदू धर्म में हनुमान जी भगवान श्री राम के सबसे बड़े भक्त और समर्पण के प्रतीक हैं. हनुमान जी ने अपना पूरा जीवन श्री राम को समर्पित कर दिया था. हनुमान जी को महावीर, बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनेय समेत कई नामों से पुकारा जाता है. राम भक्त हनुमान की वीरता और साहस की कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. मान्यता है कि कलयुग में अगर धरती पर कोई ईश्वर है, तो वे केवल हनुमान जी है. हनुमान जी को चिरंजीवी होने का वरदान मिला हुआ है. वाल्मीकि रामायण में हनुमान के अमर होने का वर्णन किया गया है. आइये जानते हैं हनुमान जी को किसने अमर होने का वरदान दिया था. Hanuman ji:हनुमानजी बंदर या वानर थे या किसने दिया हनुमान को अमर होने का वरदान? वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रभु श्री राम अयोध्या लौटे, तब उन्होंने युद्ध में साथ देने वाले सभी वीरों को उपहार दिया. विभीषण, अंगद और सुग्रीव समेत कई वीरों को उपहार मिला. इस दौरान हनुमान जी ने भगवान श्री राम से याचना करते हुए कहा कि ‘यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।। यानि, हे राम! इस लोक पर जब तक राम कथा प्रचलित रहे, तब तक मेरे प्राण शरीर में बसे रहें.

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Hanuman ji:दोपहर में क्यों नहीं करते हनुमान जी की पूजा? क्या है सही समय? यहां जानें सब कुछ

Lord Hanuman Puja: हिंदू धर्म में लगभग सभी देवी देवताओं की पूजा पाठ के लिए समय निश्चित किया गया है. माना जाता है कि सही समय पर पूजा पाठ करने से व्यक्ति को शुभता प्राप्त होती है. हनुमान जी की पूजा का समय भी निश्चित है. बहुत से लोगों के मन में यह सवाल रहता है, कि हनुमान जी की पूजा किस समय करनी चाहिए? जिससे पूजा का शुभ फल प्राप्त हो. हिंदू धर्म शास्त्रों में बताया गया है, कि हनुमान जी की पूजा सुबह अथवा शाम के वक्त ही करनी चाहिए. हिंदू धर्म पुराणों के अनुसार बजरंगबली की पूजा करने से कुंडली में मौजूद निर्बल ग्रह प्रबल होते हैं, और शुभ फल देते हैं. शनि की महादशा और साढ़ेसाती को दूर करने के लिए भी हनुमान जी की पूजा करना लाभकारी होता है, लेकिन दोपहर के समय हनुमान जी की पूजा कभी भी ना करें, शास्त्रों में इसके पीछे की रोचक कथा बताई जाती है. Hanuman ji :हनुमानजी के 108 नाम, लेकिन जानिए 11 खास नामों का रहस्य प्रातःकाल ऐसे लें हनुमानजी का नाम रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी कहते हैं “प्रात नाम जो लेई हमारा, तेहि दिन ताहि न मिलहि आहारा।” यानी प्रातः काल में जो उनका नाम लेता है उसे दिनभर आहार नहीं मिलता. असल में हनुमान जी वानर रूप धारी हैं, और साथ ही देवता भी हैं, और देवताओं का नाम बिना स्नान और पवित्र हुए बिना नहीं लिया जाना चाहिए. इसलिए हनुमान जी का नाम लेना और पूजन करना है तो प्रातः काल स्नान करके पवित्र होने के बाद ही पवित्र भाव से ही उनका नाम लिया जाना चाहिए. ऐसा करने से कोई दोष नहीं लगता और हनुमान जी की कृपा भी प्राप्त होती है. हनुमानजी की पूजा का समय और लाभहनुमानजी की पूजा संध्या के समय करना भी शुभ मंगलकारी होता है। ज्योतिषीय उपायों में बताया जाता है कि रात में 8 बजे के बाद घी का दीप जलाकर हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकांड का पाठ किया जाए तो यह बहुत ही शुभ फलदायी होता है। हनुमान जन्मोत्सव यानी हनुमान जयंती का दिन हो या अन्य दिन शाम के समय हनुमानजी की पूजा करें तो मन में किसी प्रकार का क्लेश और भय नहीं रहता है। प्रतिकूल ग्रह दशाओं से निकला भी व्यक्ति के लिए आसान हो जाता है। इसलिए दोपहर में हनुमानजी की पूजा नहीं होतीहनुमानजी की पूजा के बारे में ऐसी मान्यता है कि दोपहर के समय हनुमानजी की पूजा करने से पूजा का फल नहीं मिलता है। क्योंकि इस समय की गई पूजा को हनुमानजी स्वीकार नहीं करते हैं। इसकी वजह यह है कि हनुमानजी दोपहर के समय भारत में नहीं रहते हैं। इस समय विभीषणजी को दिए वचन के अनुसार हनुमानजी लंका चले जाते हैं। इसलिए इनकी पूजा दोपहर के समय नहीं की जाती है। इसलिए दोपहर की पूजा नहीं स्वीकारते हनुमानजीविभीषणजी हनुमानजी से बड़ा स्नेह रखते थे। इन्होंने हनुमानजी से आग्रह किया, हे हनुमानजी आप हमारे साथ लंका में ही निवास कीजिए। लेकिन राम भक्त हनुमानजी भगवान राम से दूर कैसे रह सकते थे। इसलिए इन्होंने लंका में रहने से मना कर दिया। लेकिन विभीषणजी को एक वचन दे दिया, क्योंकि वह विभीषणजी के स्नेह को भी ठुकराना नहीं चाहते थे। हनुमानजी ने विभीषणजी से कहा कि वह नियमित रूप से दिन में दोपहर के समय लंका आएंगे और फिर वापस चले जाएंगे। शाम के समय हनुमानजी लंका से लौटकर आ जाते हैं। इसलिए शाम के समय हनुमानजी की पूजा फलदायी होती है।

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Hanuman ji :हनुमानजी के 108 नाम, लेकिन जानिए 11 खास नामों का रहस्य

हनुमानजी के कई नाम है और हर नाम के पीछे कुछ ना कुछ रहस्य है। हनुमानजी के लगभग 108 नाम बताए जाते हैं। वैसे प्रमुख रूप से हनुमानजी के 12 नाम बताए जाते हैं। बलशालियों में सर्वश्रेष्ठ है हनुमानजी। कलिकाल में उन्हीं की भक्ति से भक्त का उद्धार होता है। जो जपे हनुमानजी का नाम संकट कटे मिटे सब पीड़ा और पूर्ण हो उसके सारे काम। तो आओ जानते हैं कि हनुमानजी के नामों का रहस्य। 1. मारुति : हनुमानजी का बचपना का यही नाम है। यह उनका असली नाम भी माना जाता है।  2. अंजनी पुत्र : हनुमान की माता का नाम अंजना था। इसीलिए उन्हें अंजनी पुत्र या आंजनेय भी कहा जाता है। 3. केसरीनंदन : हनुमानजी के पिता का नाम केसरी था इसीलिए उन्हें केसरीनंदन भी कहा जाता है। 4. हनुमान : जब बालपन में मारुति ने सूर्य को अपने मुंह में भर लिया था तो इंद्र ने क्रोधित होकर बाल हनुमान पर अपने वज्र से वार किया। वह वज्र जाकर मारुति की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगा। इससे उनकी ठोड़ी टूट गई इसीलिए उन्हें हनुमान कहा जाने लगा। 5. पवन पुत्र : उन्हें वायु देवता का पुत्र भी माना जाता है, इसीलिए इनका नाम पवन पुत्र हुआ। उस काल में वायु को मारुत भी कहा जाता था। मारुत अर्थात वायु, इसलिए उन्हें मारुति नंदन भी कहा जाता है। वैसे उनमें पवन के वेग के समान उड़ने की शक्ति होने के कारण भी यह नाम दिया गया। 6. शंकरसुवन : हनुमाजी को शंकर सुवन अर्थात उनका पुत्र भी माना जाता है क्योंकि वे रुद्रावतार थे। 7. बजरंगबली : वज्र को धारण करने वाले और वज्र के समान कठोर अर्थात बलवान शरीर होने के कारण उन्हें वज्रांगबली कहा जाने लगा। अर्थात वज्र के समान अंग वाले बलशाली। लेकिन यह शब्द ब्रज और अवधि के संपर्क में आकर बजरंगबली हो गया। बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली भी सुंदर शब्द है। जीवन के हर कष्ट को दूर करेंगे हनुमान जी के ये powerful मंत्र 8. कपिश्रेष्ठ : हनुमानजी का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। रामायणादि ग्रंथों में हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण प्रयुक्त किए गए। उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन इसका प्रमाण है कि वे वानर थे। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है। अत: सिद्ध होता है कि वे जाति से वानर थे। 9. वानर यूथपति : हनुमानजी को वानर यूथपति भी कहा जाता था। वानर सेना में हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। अंगद, दधिमुख, मैन्द- द्विविद, नल, नील और केसरी आदि कई यूथपति थे। 10.रामदूत : प्रभु श्रीराम का हर काम करने वाले दूत। 11. पंचमुखी हनुमान : पातल लोक में अहिरावण का वध करने जब वे गए तो वहां पांच दीपक उन्हें पांच जगह पर पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे। इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा इसी कारण हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाए तथा अहिरावण का वध कर राम,लक्ष्मण को उस से मुक्त किया। मरियल नामक दानव को मारने के लिए भी यह रूप धरा था। यहां पढ़ें हनुमानजी के 12 चमत्कारिक नाम हनुमान जी के 108 नाम 1.भीमसेन सहायकृते 2. कपीश्वराय 3. महाकायाय 4. कपिसेनानायक 5. कुमार ब्रह्मचारिणे 6. महाबलपराक्रमी 7. रामदूताय 8. वानराय 9. केसरी सुताय 10. शोक निवारणाय 11. अंजनागर्भसंभूताय 12. विभीषणप्रियाय 13. वज्रकायाय 14. रामभक्ताय 15. लंकापुरीविदाहक 16. सुग्रीव सचिवाय 17. पिंगलाक्षाय 18. हरिमर्कटमर्कटाय 19. रामकथालोलाय 20. सीतान्वेणकर्त्ता 21. वज्रनखाय 22. रुद्रवीर्य 23. वायु पुत्र 24. रामभक्त 25. वानरेश्वर 26. ब्रह्मचारी 27. आंजनेय 28. महावीर 29. हनुमत 30. मारुतात्मज 31. तत्वज्ञानप्रदाता 32. सीता मुद्राप्रदाता 33. अशोकवह्रिकक्षेत्रे 34. सर्वमायाविभंजन 35. सर्वबन्धविमोत्र 36. रक्षाविध्वंसकारी 37. परविद्यापरिहारी 38. परमशौर्यविनाशय 39. परमंत्र निराकर्त्रे 40. परयंत्र प्रभेदकाय 41. सर्वग्रह निवासिने 42. सर्वदु:खहराय 43. सर्वलोकचारिणे 44. मनोजवय 45. पारिजातमूलस्थाय 46. सर्वमूत्ररूपवते 47. सर्वतंत्ररूपिणे 48. सर्वयंत्रात्मकाय 49. सर्वरोगहराय 50. प्रभवे 51. सर्वविद्यासम्पत 52. भविष्य चतुरानन 53. रत्नकुण्डल पाहक 54. चंचलद्वाल 55. गंधर्वविद्यात्त्वज्ञ 56. कारागृहविमोक्त्री 57. सर्वबंधमोचकाय 58. सागरोत्तारकाय 59. प्रज्ञाय 60. प्रतापवते 61. बालार्कसदृशनाय 62. दशग्रीवकुलान्तक 63. लक्ष्मण प्राणदाता 64. महाद्युतये 65. चिरंजीवने 66. दैत्यविघातक 67. अक्षहन्त्रे 68. कालनाभाय 69. कांचनाभाय 70. पंचवक्त्राय 71. महातपसी 72. लंकिनीभंजन 73. श्रीमते 74. सिंहिकाप्राणहर्ता 75. लोकपूज्याय 76. धीराय 77. शूराय 78. दैत्यकुलान्तक 79. सुरारर्चित 80. महातेजस 81. रामचूड़ामणिप्रदाय 82. कामरूपिणे 83. मैनाकपूजिताय 84. मार्तण्डमण्डलाय 85. विनितेन्द्रिय 86. रामसुग्रीव सन्धात्रे 87. महारावण मर्दनाय 88. स्फटिकाभाय 89. वागधीक्षाय 90. नवव्याकृतपंडित 91. चतुर्बाहवे 92. दीनबन्धवे 93. महात्मने 94. भक्तवत्सलाय 95.अपराजित 96. शुचये 97. वाग्मिने 98. दृढ़व्रताय 99. कालनेमि प्रमथनाय 100. दान्ताय 101. शान्ताय 102. प्रसनात्मने 103. शतकण्ठमदापहते 104. योगिने 105. अनघ 106. अकाय 107. तत्त्वगम्य 108. लंकारि

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Hanuman ji:हनुमानजी बंदर या वानर थे या कुछ और, क्या आज भी मिलते हैं ऐसे लोग

भगवान राम को 14 वर्ष का जब वनवास हुआ तो वनवास के दौरान उन्होंने देश के सभी वन में रहने वाले लोगों को संगठित करने और शिक्षित करने का कार्य किया। भगवान राम की सेना में आदिवासी, भील, वानर, भालू, गिद्ध सभी थे। उल्लेखनीय है कि ओरांव आदिवासी से संबद्ध लोगों द्वारा बोली जाने वाली कुरुख भाषा में ‘टिग्गा’ एक गोत्र है जिसका अर्थ वानर होता है। कंवार आदिवासियों में एक गोत्र है जिसे हनुमान कहा जाता है। इसी प्रकार, गिद्ध कई अनुसूचित जनजातियों में एक गोत्र है। भगवान राम जी एवं उनके परम भक्त महाबलशाली हनुमान जी के बारे में पूर्ण जानकारी वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीकृत रामचरित्रमानस में ही मिल सकती है। वाल्मीकि रामायण में तो भगवान राम के अलावा सबसे अधिक सबसे अधिक गुणी और बलवान श्री हनुमान जी को ही बताया गया है। जिन्होंने बड़े-बड़े कार्यों को बहुत ही सरलता से पलभर में समपन्न किया है। शास्त्रों के अनुसार जानें क्या हनुमान जी वास्तव में बंदर थे या नहीं? प्राचीन काल की जातियां बहुत प्राचीनकाल में लोग हिमालय के आसपास ही रहते थे। वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, पिशाच, सिद्ध, मरुदगण, किन्नर, चारण, भाट, किरात, रीछ, नाग, विद्‍याधर, मानव, वानर आदि। मानवों से अलग थे वानर वानर का शाब्दिक अर्थ होता है ‘वन में रहने वाला नर।’ लेकिन मानव से अलग। क्योंकि वन में ऐसे भी नर रहते थे जिनको पूछ निकली हुई थी। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम कपि था। हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। Hanuman Jayanti : यहां हुआ था हनुमान जी का जन्‍म, आज भी मौजूद हैं ये स्‍थान वर्तमान में कहां हैं वानर दरअसल, आज से 9 लाख वर्ष पूर्व मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। ये सभी पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है। क्या सचमुच वानर थे हनुमानजी  रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण पढ़कर उनके बंदर प्रजाति का होने का उदाहरण देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन का प्रत्यक्ष चमत्कार इसका प्रमाण है। यह भी कि उनकी सभी जगह सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनके पशु या बंदर जैसा होना सिद्ध होता है। रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहीं उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है। हनुमानजी जब मानव नहीं थे तो फिर वे मानवों की किसी भी जाति से संबंध नहीं रखते हैं। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान में उनकी जाति के लोग लुप्त हो गए हैं। अब जहां तक सवाल आदिवासी शब्द का है तो यह समझना जरूर है कि आदिवासी मानव भी होते हैं और वानर भी। आदि का अर्थ प्रारंभिक मानव या वानरों के समूह। वानर साम्राज्य भारत में वानरों के साम्राज्य की राजधानी किष्किंधा थी। सुग्रीव और बालि इस सम्राज्य के राजा थे। यहां पंपासरोवर नामक एक स्थान है जिसका रामायण में जिक्र मिलता है। ‘पंपासरोवर’ अथवा ‘पंपासर’ होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। हनुमानजी की माता का नाम अंजना और पिता का नाम केसरी है, जो वानर जाति के थे। केसरीजी को कपिराज कहा जाता था, क्योंकि वे कपि क्षेत्र के राजा थे। सेंट्रल अमेरिका के मोस्कुइटीए (Mosquitia) में शोधकर्ता चार्ल्स लिन्द्बेर्ग ने एक ऐसी जगह की खोज की है जिसका नाम उन्होंने ला स्यूदाद ब्लैंका (La Ciudad Blanca) दिया है जिसका स्पेनिश में मतलब व्हाइट सिटी (The White City) होता है, जहां के स्थानीय लोग बंदरों की मूर्तियों की पूजा करते हैं। चार्ल्स का मानना है कि यह वही खो चुकी जगह है जहां कभी हनुमान का साम्राज्य हुआ करता था। आदिम जातियों पर शोध पृथ्वी पर आदिम दौर में चार मानव प्रजातियों का अस्तित्व था। तब तक आधुनिक इंसान का पता नहीं चला था। यूरोप में मिले इन अवशेषों को निएंडरथल कहते हैं, जबकि एशिया में रह रहे आदिम इंसानों को डेनिसोवांस कहते थे। एक प्रजाति इंडोनेशिया में मिले आदिम इंसानों की भी है, जिसे हॉबिट कहते हैं। इनके अलावा एक रहस्यमय चौथा समूह भी था, जो यूरोप और एशिया में रहते थे। यह समूह डेनिसोवांस का संकर समूह माना जाता था। अब चीन में नए जीवाश्म मिलने से शोध की दिशा बदल गई है। इस जीवाश्म का पता पहली बार 1976 में शूजियाओ के गुफाओं में मिला। इसमें कुछ खोपड़ियों के टुकड़े और चार लोगों के नौ दांतों के जीवाश्म मिले थे। इसका पूरा विवरण अमेरिकी फिज़िकल एंथ्रापोलॉजी जर्नल में छपा है। यह विचित्र किस्म का जीवाश्म है, जो अब तक मालूम मानव प्रजाति के जीवाश्म से मेल नहीं खाता। मुमकिन है कि ये जीवाश्म किन्हीं दो मालूम प्रजातियों के बीच रूपांतरण काल का हो सकता है। हालांकि इतना साफ है कि ये जीवाश्म किसी आधुनिक मानव प्रजाति के दांतों से मेल नहीं खाते। मगर कुछ गुण निश्चित ही आदिम प्रजाति के इंसानों से मिलते हैं। कुछ अंश निएंडरथल से मेल खाते हैं। इसके डीएनए की जांच से पता चला कि निएंडरथल और आधुनिक मानवों से अलग हैं लेकिन इसमें दोनों की खूबियां शामिल हैं। इस बात का सबूत है कि प्राचीनकाल में दो भिन्न-भिन्न प्रजातियों के मेल से विचित्र किस्म के

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जीवन के हर कष्ट को दूर करेंगे हनुमान जी के ये powerful मंत्र

बचपन में सूर्य को फल समझकर खा जाने वाले, बड़े-बड़े पर्वत उठाने वाले और स्वयं प्रभु का कार्य संवारने वाले महाबली हनुमान की पूजा के लिए मंगलवार का दिन उत्तम माना जाता है। मंगलवार के दिन बजरंगबली की पूजा अर्चना करने से सभी विघ्न बाधाओं का अंत होता है। साथ ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इसके अलावा यदि किसी जातक की कुंडली में मंगल दोष है तो उसे हनुमान जी की आराधना जरूर करनी चाहिए। इससे मंगल दोष दूर होता है। प्रभु श्री राम के परम भक्त भगवान हनुमान को अमरता का वरदान प्राप्त है। कहा जाता है कि हनुमान जी ऐसे देवता हैं जो हमारे बीच धरती पर मौजूद हैं। आठों सिद्धियों और नौ निधियों के दाता की कृपा पाने के लिए मंगलवार के दिन पूजा के साथ ही हनुमान जी के कुछ चमत्कारी मंत्रों का भी जाप करना चाहिए। इसके अलावा संकट मोचन हनुमान के कुछ चमत्कारी मंत्र हैं, जिनका जाप करने से भय, संकट और शत्रुओं का नाश हो जाता है। तो आइए जानते हैं हनुमान जी के प्रभावशाली मंत्रों के बारे में… ‘ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।’रोगों से ग्रस्त व्यक्ति अगर बीमारियों से जल्द छुटकारा पाना चाहता है तो उसे इस मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। ये मंत्र सारी बीमारियों को व्यक्ति से दूर रखता है। ‘ॐ हं पवननन्दनाय स्वाहा।’संकटमोचन का जल्द से जल्द आशीर्वाद पाने की चाह है तो ये मंत्र सबसे ज्यादा लाभदायक है। सच्चे मन से इस मंत्र का जाप करने से हनुमान जी की विशेष कृपा बनी रहती है। Hanuman Mantra: प्रत्येक मंगलवार को जपें हनुमान जी के ये मंत्र, जीवन की सभी परेशानियां होंगी दूर ओम नमो भगवते हनुमते नम: यदि घर-परिवार में हमेशा क्लेश होता है, परिवार के लोगों की आपस में बनती नहीं है तो ऐसे में आपको हनुमान जी के इस मंत्र का जाप करना चाहिए। मान्यता है कि इस मंत्र के प्रभाव से लोगों के जीवन में सुख एवं शांति आ सकती है।  ओम हं हनुमते नम: हनुमान जी का यह मंत्र बहुत चमत्कारी माना जाता है। इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को कोर्ट से जुड़े मामलों में लाभ मिलता है। कहा जाता है कि इस मंत्र के प्रभाव से फैसला आपके पक्ष में आ सकता है या फिर आपको कोर्ट की तरफ से कोई राहत मिल सकता है। मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥ मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से बजरगंबली आपसे प्रसन्न होते हैं और वे अपने भक्तों को सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। साथ ही अपने भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।  ओम हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट राम भक्त हनुमान के इस मंत्र का जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होता है। साथ ही उनसे उत्पन्न संकटों को दूर करने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है।  ओम नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा। महाबली हनुमान के इस मंत्र का जाप करने से शत्रु परास्त होते हैं। साथ ही रोगों को दूर करने और संकटों से रक्षा के लिए भी इस मंत्र का जाप किया जाता है। 

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आजीवन ब्रह्मचारी रहे Hanuman Ji का था बेटा, पसीने की बूंद से हुआ था पैदा

भगवान हनुमान ने आजीवन विवाह नहीं किया था, लेकिन उनका एक बेटा था मकरध्‍वज. पुत्र मकरध्‍वज के जन्‍म के पीछे एक रोचक कथा है. हनुमान जी (Hanuman Ji) ब्रह्मचारी थे, ये बात सभी जानते हैं लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि आजीवन अविवाहित (Unmarried) रहने के बाद भी उनका एक पुत्र पैदा हुआ था. श्रीराम के अनन्य भक्त, अनंत बलशाली, समुद्र को एक छलांग मे लांघ जाने वाले, सोने की लंका जलाने वाले बजरंगबली को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. हालांकि उनके पुत्र के जन्‍म (Birth Story) की कथा कम ही लोग जानते हैं. आइए जानते हैं हनुमान जी के पुत्र का जन्‍म कैसे हुआ था.  अहिरावण ने रखा था हनुमान का रूप  जब रावण भगवान राम (Lord Ram) से युद्ध में हारने लगा तो उसने पाताल लोक के स्वामी अहिरावण को श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण करने के लिए मजबूर किया. अहिरावण अत्यंत मायावी राक्षस राजा था, उसने हनुमान का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण किया और उन्‍हें पाताल लोक ले गए. जब इस बात का पता चला तो भगवान राम के शिविर में हाहाकार मच गया और उनकी खोज होने लगी. बजरंगबली श्रीराम और लक्ष्मण को ढूंढते हुए पताल में जाने लगे. पाताल लोक के सात द्वार थे और हर द्वार पर एक पहरेदार था. सभी पहरेदारों को हनुमान जी ने परास्त कर दिया, लेकिन अंतिम द्वार पर उन्हीं के समान बलशाली एक वानर पहरा दे रहा था. पाताल लोक में हनुमान जी को मिला अपना पुत्र  दिखने में एकदम अपने जैसे वानर को देखकर हनुमान जी को आश्चर्य हुआ. उन्‍होंने जब उस वानर से परिचय पूछा, तो उसने अपना नाम मकरध्वज (Makardhwaj) बताया और अपने पिता का नाम हनुमान बताया. मकरध्वज के मुंह से पिता के रूप में अपना नाम सुनकर हनुमान अत्यंत क्रोधित हो गए और बोले कि यह असंभव है, क्योंकि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहा हूं. फिर मकरध्वज ने बताया कि जब हनुमान जी लंका जला कर समुद्र में आग बुझाने को कूदे थे, तब उनके शरीर का तापमान बहुत ज्‍यादा था. जब वह सागर के ऊपर थे, तब उनके शरीर के पसीने की एक बूंद सागर में गिर गई थी, जिसे एक मकर ने पी लिया था, और उसी पसीने की बूंद से वह गर्भावस्था को प्राप्त हो गई. उसने ही मकरध्‍वज को जन्‍म दिया था. पूर्व जन्म में अप्सरा थी मछली ऐसा माना जाता है कि वह मछली पूर्व जन्म में कोई थी लेकिन श्राप के कारण वह मछली बन गई थी। बाद में उसी मछली को अहिरावण उसके मछुआरों ने पकड़ लिया और मार दिया था। आपको बता दें कि अहिरावण एक मायावी राक्षस राजा था। कुछ समय बाद वह अप्सरा श्राप से मुक्त हो गई था। यह सब सुनकर हनुमान जी ने मकरध्वज को अपने गले से लगा लिया। लेकिन अपने पिता के रूप में हनुमान जी को पहचानने के बाद भी मकरध्वज ने हनुमान जी को अंदर नहीं जाने दिया था। इससे हनुमान जी प्रसन्न भी हुए थे। बाद में हनुमान जी और मकरध्वज के बीच युद्ध भी हुआ और अंत में हनुमान जी ने अपनी पूंछ से उसे बांधकर दरवाजे से हटा दिया था और फिर श्री राम और लक्ष्मण को बंधन से मुक्त कराया था। बाद में भगवान श्री राम ने ही मकरध्वज को ही पाताल का नया राजा घोषित किया था।  

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Hanuman Jayanti : यहां हुआ था हनुमान जी का जन्‍म, आज भी मौजूद हैं ये स्‍थान

भगवान राम और हनुमानजी के जीवन पर रचे गए महाकाव्‍य रामायण में हनुमानजी को भगवान राम का सबसे बड़ा भक्‍त बताया गया है। पुराणों में बजरंगबली को रुद्रावतार यानी भोले बाबा का 11वां अवतार बताया गया है। हनुमान जयंती को उनके जन्‍मदिवस के रूप में मनाया जाता है। हनुमान जयंती साल में दो बार मनाई जाती है। पहली जयंती चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है और दूसरी कार्तिक मास में दीपावली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी के दिन भी हनुमान जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर आपको बताते हैं कि बजरंगबली का जन्‍म कहां हुआ था और अभी कहां स्थित हैं ये स्‍थान… ऐसे कहलाए अंजनि पुत्र हनुमानजी की माता का नाम अंजना था। जो अपने पूर्व जन्म में एक अप्सरा थीं। अंजना ब्रह्मा लोक की एक अप्‍सरा थीं, उन्हें एक ऋषि ने बंदरिया बनने का शाप दिया था। शाप के अनुसार जिस दिन अंजना को किसी से प्रेम हो जाएगा, उसी क्षण वह बंदरिया बन जाएगी और उनका पुत्र भगवान शिव का रूप होगा। अंजना को अपनी युवा अवस्था में केसरी से प्रेम हो गया और दोनों का विवाह हो गा। ऐसे हुआ हनुमान जी का जन्‍म उड़ते-उड़ते वह पक्षी देवी अंजना के आश्रम चला गया. यहां माता अंजना तपस्या कर रही थी. उस दौरान पक्षी के मुंह से खीर माता अंजना के हाथ में गिर गई. देवी ने इसे भोलेनाथ का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया. इस प्रसाद के प्रभाव और ईश्वर की कृपा से माता अंजना ने शिव के अवतार बाल हनुमान को जन्म दिया. उस दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी. जन्मस्थान का पहला मत बजरंग बली के पिता केसरी कपि क्षेत्र के राजा थे। कपिस्थल कुरु साम्राज्य का एक प्रमुख भाग था। हरियाणा का कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। यह कैथल ही पहले कपिस्थल था। कुछ शास्त्रों में ऐसा वर्णन आता है कि कैथल ही हनुमानजी का जन्म स्थान है। यहां हनुमानजी का बहुत बड़ा मंदिर भी स्थित है। जन्मस्थान का दूसरा मत गुजरात स्थित डांग जिला रामायण काल में दंडकारण्य प्रदेश के रूप में पहचाना जाता था। मान्यता के अनुसार यहीं भगवान राम व लक्ष्मण को शबरी ने बेर खिलाए थे। आज यह स्थल शबरी धाम के नाम से जाना जाता है। अंजनी पर्वत पर स्थित अंजनी गुफा में ही हनुमानजी का भी जन्म हुआ था। कहा जाता है कि अंजना माता ने अंजनी पर्वत पर ही कठोर तपस्या की थी और इसी तपस्या के फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न यानी हनुमान जी की प्राप्ति हुई थी। माता अंजना ने अंजनी गुफा में ही हनुमानजी को जन्म दिया था। जन्मस्थान का तीसरा मत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमानजी का जन्म झारखंड राज्य के गुमला जिला के आंजन गांव की एक गुफा में हुआ था। आंजन गांव में ही माता अंजनी निवास करती थीं और इसी गांव की एक पहाड़ी पर स्थित गुफा में रामभक्त हनुमान का जन्म हुआ था। इसी विश्वास के साथ यहां की जनजाति भी बड़ी संख्या में भक्ति और श्रद्धा के साथ माता अंजना और भगवान महावीर की पूजा करते हैं। जन्मस्थान का चौथा मत पंपासरोवर अथवा पंपासर होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। यहां स्थित एक पर्वत में एक गुफा भी है जिसे रामभक्तनी शबरी के नाम पर शबरी गुफा कहते हैं। इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि का आश्रम था और कहते हैं कि इसी आश्रम में बजरंगबली जन्‍मे थे।

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Hanuman:हनुमानजी भगवान राम के परम भक्त कैसे बने?

उत्तर देने या ईश्वरीय सत्य को जानने के लिए मुझे थोड़ा शोध करना पड़ा। इस प्रश्न को पोस्ट करने के लिए धन्यवाद, इसने मुझे अज्ञात दिव्यता में गहराई से उतरने का अवसर दिया। श्री हनुमान: जन्म से वे वानर (बंदर) जाति के थे – एक पशु जनजाति। वह श्री राम, नरोत्तम या मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ के साथ थे। श्रीहनुमान वास्तव में भगवान हैं। संस्कृत में एक कहावत है, जो यह घोषणा करती है कि यदि कोई श्री हनुमान की पूजा करता है, तो सभी देवताओं की पूजा हो जाती है (अंजनेयः पूजितश्चेत् पूजिता ससर्व देवताः)। श्री हनुमान को अप्रतिम बुद्धि भी प्रदान की गई है। उन्हें बुद्धिमान लोगों में सर्वश्रेष्ठ और आध्यात्मिक विकासकर्ताओं में प्रथम बताया गया है। (बुद्धि मातम वरिष्ठ, ज्ञानेन अग्रगण्य) श्री राम ने स्वयं पहली मुलाकात में ही श्री हनुमान की योग्यता की बौद्धिक प्रतिभा को पहचान लिया था। भगवान हनुमान कौन हैं? एक बार “गर्दबा निस्वाना” नाम का एक राक्षस, जो भगवान शिव का परम भक्त था, ऋषियों और उनकी पवित्र गतिविधियों को परेशान कर रहा था, उसे भगवान शिव से वरदान मिला था कि कोई भी देवता, दानव या यक्ष उसे नहीं मार पाएगा। चूँकि दुष्कर्मों ने स्वर्ग और अन्य ग्रहों को परेशान करना जारी रखा, भगवान शिव चिंतित थे और राक्षस को खत्म करने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान शिव की इस घोषणा के बाद कि यदि राक्षस विष्णु द्वारा मारा जाता है, तो वह एक सेवक के रूप में उनकी सेवा करेंगे, अन्यथा विष्णु अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के साथ रहेंगे। अपना दांव हारने के बाद, भगवान शिव भगवान विष्णु की सेवा करने के लिए तैयार हो गए। भगवान विष्णु ने भगवान शिव को यह कहते हुए मना कर दिया कि उनका दांव ब्रह्मांड के कल्याण के लिए है। भगवान विष्णु ने कहा, “जब मैं त्रेता युग में श्री राम के रूप में अवतार लूंगा तो आप कपि वीर (वानर नायक) के रूप में अवतार लेकर मेरी सेवा करेंगे।” इस प्रकार भगवान शिव ने भगवान विष्णु की सेवा करने के अपने वचन को पूरा करने के लिए, श्री राम की सेवा करने के लिए श्री हनुमान के रूप में अवतार लिया अब मैं भगवान हनुमान के जन्म पर वापस नहीं जाऊंगा क्योंकि हममें से ज्यादातर लोग उनके माता-पिता के बारे में जानते होंगे। श्री हनुमान का जन्म कहाँ हुआ था? यह तिरुमाला में था. पुराण इस मत का समर्थन करते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण में कहा गया है कि चूंकि अंजना ने पहाड़ी पर कड़ी तपस्या के माध्यम से एक बच्चे को जन्म दिया था, इसलिए पहाड़ी को “अंजनाद्रि” के नाम से जाना जाने का आशीर्वाद मिला। अंजनाद्रि वास्तव में उन सात पहाड़ियों में से एक है जो तिरुमाला पहाड़ियों को बनाती हैं। किष्किंधा कांड: वाल्मिकी रामायण । अपनी शिक्षा पूरी होने पर, हनुमान ने अपनी माँ से प्रार्थना की कि वह उन्हें भविष्य की कार्ययोजना के बारे में सलाह दें। वह अपने बेटे के अच्छे इरादों से प्रसन्न थी। उसने कहाः “बेटा! मैं अहल्या और गौतम ऋषि की पुत्री हूं। इन्द्र और सूर्य द्वारा ठगी गयी मेरी माता के दो पुत्र हुए। मेरे पिता, जो सच्चाई जानते थे, उन्होंने बच्चों को नदी में फेंक दिया और उन्हें बंदर के आकार का होने का श्राप दिया। शापित जोड़ी बाली और सुग्रीव हैं। बाली का जन्म इंद्र के कारण और सुग्रीव का जन्म सूर्य के कारण हुआ। दोनों मेरे भाई हैं. सुग्रीव धर्मात्मा है. बाली ने सुग्रीव को गलत समझा और सुग्रीव की पत्नी को छीन लिया। बाली दुष्ट मार्ग पर चल रहा है और वह सुग्रीव को मारने का इरादा रखता है। तुम सुग्रीव के पास जाओ और उसके मंत्री तथा रक्षक बनो। “मेरा बच्चा! अपने कर्तव्य की पुकार में, आप अपने भगवान से मिलेंगे। आप उसे तुरंत पहचान लेंगे, क्योंकि उसकी दृष्टि ही आपमें एक अज्ञात भावना उत्पन्न कर देगी। आप उनकी सेवा करें और अपने जीवन का उद्देश्य पूरा करें।” अंजना की सलाह ने अंजनेय को अपने मिशन, अपने भगवान के मिशन और अपने शिक्षक सूर्य के मिशन पर स्थापित किया। चूँकि सुग्रीव सूर्य की संतान थे, इसलिए सुग्रीव की सेवा करना उनके गुरु की सेवा करने के समान था। अपनी माँ की सलाह के अनुसार, अंजनेय सुग्रीव के मंत्री बने। रावण ने सीता का हरण किया। श्री राम और लक्ष्मण उनकी खोज में निकल पड़े। उन्होंने जटायु को देखा, जो मरने वाला था। जटायु ने उन्हें रावण के दुष्कर्म के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि रावण ने दक्षिण की ओर यात्रा की। तदनुसार श्री राम और लक्ष्मण ने दक्षिण की यात्रा की और पंपा नदी के तट पर पहुँचे। यह ऐसा था जैसे सुग्रीव ने उन्हें देखा था। उसने सोचा: “क्या वे बाली द्वारा भेजे गए थे?” वह परेशान हो गया। उन्होंने अपनी चिंता हनुमान से साझा की। हनुमान ने सुग्रीव को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा: “वे खतरनाक प्रतीत नहीं होते हैं। इसके अलावा वली या उसके अनुयायी हमारे यहाँ नहीं आ सकते। आप वानर जाति के विशिष्ट ढुलमुल रवैये से पीड़ित हैं।” सुग्रीव बेचैन थे. वह चाहते थे कि हनुमान एक भिक्षुक के भेष में उन दो अजनबियों के पास जाएँ। अजनबी श्री राम और लक्ष्मण गृहस्थ (विवाहित पुरुष) थे। हनुमान भिक्षुक के भेष में थे। स्थापित प्रथा के अनुसार, विवाहित पुरुषों को भिक्षुक का सम्मान करना चाहिए, लेकिन अन्यथा बुद्धिमान का नहीं। परंपरा के विपरीत, भिक्षुक के भेष में हनुमान ने हाथ जोड़कर श्री राम और लक्ष्मण को सम्मान दिया। श्री राम के दर्शन मात्र से ही हनुमान अत्यंत प्रसन्न हो गये। उन्हें अजीब सी भक्ति भावना का अनुभव हो रहा था. उसे तुरंत अपनी माँ की बातें याद आ गईं। हनुमान ने श्री राम में अपने भगवान को पहचान लिया । उन्होंने बोलना प्रारम्भ कियाः “महापुरुषों! आप साधुओं की तरह कपड़े पहने हुए हैं, लेकिन तलवार, धनुष और तीर पहनते हैं। आपके कंधे बताते हैं कि वे शाही प्रतीक चिन्ह के पात्र हैं। कृपया मुझे बताएं कि आप कौन हैं? मैं वायु देवता, वायु देवता के आशीर्वाद से केसरी और उनकी पत्नी अंजना नाम के एक वानर वंश में पैदा हुआ हूं। मेरा नाम हनुमंत है. मैं सुग्रीव का अनुयायी हूं।” अपने बारे में सब कुछ बताने के बाद, हनुमान कहते हैं: “मैंने इतना कुछ कहा है और आप जवाब नहीं देते हैं”। हनुमान की बातें श्रीराम को आश्चर्यचकित कर देती हैं। वह लक्ष्मण के साथ अपना आश्चर्य साझा करते हुए कहते हैं: “लक्ष्मण, केवल चार वेदों में पारंगत व्यक्ति ही इस तरह की बात कर सकता है। यदि वह नौ प्रकार के व्याकरणों का विद्वान न

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Hanuman :श्री राम भक्त हनुमान जी के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र जो सभी प्रकार के कष्ट का निवारण

मंत्र श्री हनुमान मूल मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रं ह्रैं ह्रौं ह्रः॥द्वादशाक्षर हनुमान मंत्र: हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्.फल: से इस मंत्र के बारे शास्त्रो में वर्णित हैं की यह मंत्र स्वतंत शिवजी ने श्रीकृष्ण को बताया और श्रीकृष्ण नें यह मंत्र अर्जुन को सिद्ध करवाया था जिसे अर्जुन ने चर-अचर जगत् को जीत लिया था.प्रेत बाधा दूर करे चमत्कारी हनुमान मंत्र:हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार हनुमानजी का नाम लेने से भूत-प्रेत आदि सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं. यदि आप भी ऐसी ही किसी बाधा से पीडि़त हैं तो नीचे लिखे हनुमान मंत्र से इस समस्या का हल संभव है. यदि इस मंत्र का जप विधि-विधान से किया जाए तो कुछ ही समय में ऊपरी बाधा का निवारण हो सकता है. यह हनुमान मंत्र इस प्रकार हैमंत्र :हनुमन्नंजनी सुनो वायुपुत्र महाबल:। अकस्मादागतोत्पांत नाशयाशु नमोस्तुते।।जप विधि : स्वच्छ अवस्था में यानी स्नान आदि करने के बाद हनुमानजी की पूजा करें और उन्हें सिंदूर तथा गुड़-चना चढ़ाएं. इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश का आसन ग्रहण करें. तत्पश्चात लाल चंदन की माला से ऊपर लिखे मंत्र का जप करें. इस मंत्र का प्रभाव आपको कुछ ही समय में दिखने लगेगा.मुसीबतों को दूर करे हनुमान मंत्रहिन्दू धर्म शास्त्रों श्री हनुमान की इसी शक्ति और महिमा का गान करते हुए उनको शक्ति स्वरूपा माता सीता के शोक का नाश करने वाले देवता बताकर जानकी शोक नाशनम् कहकर पुकारा गया है. संकेत है कि श्री हनुमान की उपासना जीवन से हर शोक दूर रखती है. चूंकि श्री हनुमान मंगलमूर्ति भगवान शिव के अवतार भी हैं. यही कारण है कि संकट और शोक नाश के लिए श्री हनुमान की उपासना परंपराओं में शिव भक्ति की तरह आसान उपाय भी बताए गए हैं. इनको श्री हनुमान की उपासना में आचरण व विचारों की पवित्रता के साथ अपनाना निर्भय और बेदाग जीवन का मंत्र भी माना गया है. नीचे बताई पूजा सामग्री और विशेष छोटे-पर असरदार हनुमान मंत्र से श्री हनुमान की उपासना आज करना न चूकें !मंत्र : ॐ हं हनुमंताय नम:।जप विधि : स्नान के बाद श्री हनुमान मंदिर में जाकर श्री हनुमान की पूजा में केसर चंदन, अक्षत, लाल गुलाब के साथ अलावा विशेष रूप से चमेली का फूल आसान, किंतु अचूक हनुमान मंत्र के साथ अर्पित करें.इस मंत्र की 108 बार रुद्राक्ष की माला से जप भी संकटनाश में बहुत असरदार माने गए हैं. इसके साथ ही चमेली के तेल के साथ श्री हनुमान को सिंदूर चढ़ावें या चोला चढ़ाना भी शोक-पीड़ा मुक्ति की कामना के लिए मंगलकारी सिद्ध होगा. श्री हनुमान को यथाशक्ति भोग लगाकर गुग्गल धूप व गाय के घी के दीप से आरती करें व अक्षय सुख की कामना करें.संकटों को दूर करे ये हनुमान मंत्र!जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कभी कोई विरोधी परेशान करता है तो कभी घर के किसी सदस्य को बीमार घेर लेती है. इनके अलावा भी जीवन में परेशानियों का आना-जाना लगा ही रहता है. ऐसे में हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है. यदि आप चाहते हैं कि आपके जीवन में कोई संकट न आए तो नीचे लिखे मंत्र का जप हनुमान जयंती व प्रति मंगलवार को कर सकते हैं.मंत्र : ॐनमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा जप विधि := सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें. इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें. पारद हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करेंगे तो विशेष फल मिलता है. जप के लिए लाल हकीक की माला का प्रयोग करें.मनोकामना पूरी करे ये हनुमान मंत्र !हर सुबह बोलें यह हनुमान मंत्र !सांसारिक जीवन की आपाधापी में हर इंसान जीवन से जुड़े हर काम में अच्छे नतीजे ही चाहता है. लेकिन जीवन ही किसी प्रकार अच्छा बना लें? इस बारे में बिरले लोग ही विचार कर पाते हैं. अगर जीवन को ही अच्छे आचरण, अनुशासन और संकल्पों से जोड़ लिया जाए तो फिर किसी भी कार्य की सफलता में भय, संशय पैदा नहीं होता. हनुमान भक्ति जीवन में अच्छे आचरण को अपनाने के लिये सर्वश्रेष्ठ मानी गई है. शास्त्रों में हनुमान का स्मरण किसी भी वक्त अच्छे कामों व सोच की प्रेरणा ही देता है. इसलिए शास्त्रों में बताया गया विशेष हनुमान मंत्र हर रोज सुबह खासतौर पर हनुमान जयंती यानी चैत्र शुक्ल पूर्णिमा पर स्मरण किया जाए तो लक्ष्य की सफलता को लेकर पैदा होने वाले भय-संशय व बाधाएं खत्म हो जाते हैं. साथ ही अशुभ बातों से हमेशा रक्षा होती है. जानिए हैं यह मंत्र –जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कभी कोई विरोधी परेशान करता है तो कभी घर के किसी सदस्य को बीमार घेर लेती है. इनके अलावा भी जीवन में परेशानियों का आना-जाना लगा ही रहता है. ऐसे में हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है. यदि आप चाहते हैं कि आपके जीवन में कोई संकट न आए तो नीचे लिखे मंत्र का जप हनुमान जयंती या प्रतियेक मंगलवार को भी इस मंत्र का जप कर सकते हैं. मंत्र :  ॐ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहाजप विधि:  सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें. इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें. पारद हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करेंगे तो विशेष फल मिलता है. जप के लिए लाल हकीक की माला का प्रयोग करें.भय का नाश करता है यह हनुमान मंत्र !क्या आप किसी अज्ञात भय से ग्रसित हैं या आपको हर समय किसी का डर सताता रहता है. कुछ लोगों को इस प्रकार की समस्या रहती है. उन्हें हर समय किसी न किसी बात का डर सताता रहता है. जब यह भय अधिक बढ़ जाता है तो एक रोग का रूप ले लेता है. यदि आपके साथ भी यही समस्या है तो नीचे लिखे मंत्र का विधि-विधान से जप करने से इसका निदान संभव है.मंत्र : अंजनीर्ग सम्भूत कपीन्द्रसचिवोत्तम. राम प्रिय नमस्तुभ्यं हनुमते रक्ष सर्वदा।। विधि :  सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें उस के बाद अज्ञात भय से रक्षा के लिए इस

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Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा?

Hanuman Putra वह प्रभु राम और लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर चला गया था। तब हनुमान जी प्रभु राम और लक्ष्मण को खोजते हुए पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने अपने जैसे पहरेदार को देखकर अचंम्भा हो गए। भगवान हनुमान प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। हम सभी जानते हैं कि पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे। इसी वजह से उनका एक पुत्र होने की बात पर आश्चर्य होना स्वभाविक है। हालांकि महर्षि वाल्मीकि के रामायाण में बताया गया है कि भगवान हनुमान का एक पुत्र भी था। वाल्मीकि रामायण में इससे संबंधित एक प्रसंग का वर्णन भी मिलता है। आइए पढ़ते हैं उससे जुड़ी कथा के बारे में। हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा जब पाताल लोक के असुरराज अहिरावण ने भाई रावण के कहने पर प्रभु राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया था। वह प्रभु राम और लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर चला गया था। तब हनुमान जी प्रभु राम और लक्ष्मण को खोजते हुए पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने अपने जैसे पहरेदार को देखकर अचंभित हो गए। हनुमान जी की तरह दिखाई देने वाले पहरे पर खड़े हुए मकरध्वज ने स्वयं को हनुमान का पुत्र बताया। हनुमान जी इस बात को मानने को तैयार नहीं हुए, तो मकरध्वज Makardhwaj ने अपनी उत्पत्ति की कथा सुनाई। मकरध्वज ने हनुमान जी से बोला कि आप जब माता सीता की खोज में लंका पहुंचे। आपको मेघनाद द्वारा पकड़कर रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। वहां पर रावण ने आपकी पूंछ में आग लगवा दी थी, जिसके बाद आप अपनी जलती पूंछ की आग बुझाने के लिए समुद्र तट पर पहुंचे। आग बुझाते हुए आपके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी, जिसे एक बड़ी मछली ने पी लिया था। उसी एक बूंद की वजह से वह मछली गर्भवती हो गई।  क्या आपको पता है हनुमान जी के पांच भाईयो के बारे में ? एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने खाने के लिए उस मछली को पकड़ लिया। लेकिन जब उसका पेट चीर रहे थे, तभी उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला, जो कि मैं था। सेवक बालक को अहिरावण के पास लेकर गए। अहिरावण ने मुझे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। वह मैं ही हूं, जो मकरध्वज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया। इसके बाद उन्होंने अपने पुत्र मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त कर दिया। हनुमान जी ने मकरध्वज को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। हनुमान पुत्र मकरध्वज हनुमान जी के एक पुत्र थे, जिनका नाम मकरध्वज था। मकरध्वज का जन्म एक मछली के गर्भ से हुआ था। पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी ने लंका पर चढ़ाई की थी, तब उन्हें मेघनाद ने पकड़ लिया था। मेघनाद ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी थी। हनुमान जी अपनी जलती हुई पूंछ की आग बुझाने के लिए समुद्र तट पर पहुंचे। आग बुझाते हुए उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी, जिसे एक बड़ी मछली ने पी लिया था। उसी एक बूंद की वजह से वह मछली गर्भवती हो गई। जब मछली ने एक बच्चे को जन्म दिया, तो उसने उस बच्चे का नाम मकरध्वज रखा। मकरध्वज एक शक्तिशाली वानर था। उसने अपने पिता हनुमान जी की तरह ही भगवान राम की सेवा की। मकरध्वज की कथा का एक और संस्करण मकरध्वज की कथा का एक और संस्करण भी है। इस संस्करण के अनुसार, मकरध्वज हनुमान जी के पुत्र नहीं थे, बल्कि उनके शिष्य थे। मकरध्वज एक शक्तिशाली वानर थे, जिन्हें हनुमान जी ने अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। कथा का विश्लेषण हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा एक पौराणिक कथा है। इस कथा का कोई भी प्रमाण नहीं है। हालांकि, यह कथा हनुमान जी की भक्ति और शक्ति का एक प्रतीक है। कथा का महत्व हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा हिंदू धर्म में बहुत लोकप्रिय है। यह कथा हनुमान जी की भक्ति और शक्ति का एक प्रतीक है। यह कथा यह भी बताती है कि भगवान राम की भक्ति सभी को आशीर्वाद देती है, चाहे वह मनुष्य हो या पशु। कथा का नैतिक हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा से हमें यह नैतिक शिक्षा मिलती है कि हमें भगवान की भक्ति करनी चाहिए। भगवान की भक्ति से हमें सभी सुख और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। कथा का अंत मकरध्वज ने अपने पिता हनुमान जी की तरह ही भगवान राम की सेवा की। उसने रावण के साथ लड़ाई में भी हिस्सा लिया। मकरध्वज एक शक्तिशाली योद्धा था। उसने कई राक्षसों को मार डाला। अंत में, मकरध्वज ने रावण के पुत्र इंद्रजीत को भी मार डाला। इस तरह, मकरध्वज ने भगवान राम की मदद से रावण का वध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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