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Lohri 2024: लोहड़ी के दिन क्या करें और क्या न करें? यहां जानें

लोहड़ी एक लोकप्रिय हिंदू त्योहार है जो पंजाबी समुदाय द्वारा मनाया जाता है। यह त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है। लोहड़ी का अर्थ है “लौ”। इस दिन लोग एकत्र होकर आग जलाते हैं और उसमें गेहूं की बालियां, रेवड़ी, मूंगफली, खील, चिक्की, गुड़ आदि सामग्री अर्पित करते हैं। इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य नई फसल की खुशी मनाना और भगवान सूर्य का आभार व्यक्त करना है। लोहड़ी के शुभ अवसर पर लोग एक-दूसरे को मिठाइयां देकर लोहड़ी (Lohri) की शुभकामनाएं देते हैं। यह पर्व नए फसल के तैयार होने की खुशी में मनाया जाता है। इस दिन शाम को सब लोग एक जगह इकट्ठा होकर आग जलाते हैं। इस अलाव में अग्नि में गेहूं की बालियां रेवड़ी मूंगफली खील चिक्की गुड़ से निर्मित चीजें अर्पित करते हैं। Lohri 2024 लोहड़ी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर नए वस्त्र धारण करें। फिर घर के आंगन में अग्नि जलाकर उसमें गेहूं की बालियां, रेवड़ी, मूंगफली, खील, चिक्की, गुड़ आदि सामग्री अर्पित करें। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करें और भगवान सूर्य की आराधना करें। हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी Lohri का पर्व मनाया जाता है। इस त्योहार को पंजाबी समुदाय के लोग बेहद उत्साह के साथ मनाते हैं। इस शुभ अवसर पर लोग एक-दूसरे को मिठाइयां देकर लोहड़ी की शुभकामनाएं देते हैं। इस दिन कुछ कार्यों को करने की सख्त मनाही है, जिनको करने से व्यक्ति को जीवन में परेशानियों को सामना करना पड़ता है। चलिए आपको बताते हैं लोहड़ी के दिन क्या करें और क्या न करें। लोहड़ी के दिन क्या करें लोहड़ी के अवसर पर गरीब कन्याओं को रेवडी खिलानी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से अन्न की कमी नहीं होती है। Calendar 2024 : साल 2024 के व्रत-त्योहार की तारीखें, होली से लेकर रामनवमी, नवरात्रि, दिवाली और छठ पूजा तक सनातन धर्म में अग्नि शुभता और पवित्रता की प्रतीक है। लोहड़ी के दिन अग्नि देव की पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है। आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के लिए लाल रंग के कपड़े में गेहूं बांधकर किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दें। माना जाता है कि ऐसा करने से सदैव मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। लोहड़ी की पूजा करें। अग्नि को प्रणाम करें। गरीबों को दान दें। गरीब कन्याओं को रेवड़ी खिलाएं। एक-दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं दें। Lohri 2024: लोहड़ी के दिन क्या न करें लोहड़ी के दिन तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा इस दिन किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। काले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए। लोहड़ी में अर्पित करने वाले चीजें जैसे कि मूंगफली और रेवड़ी आदि की पहले पूजा करें। लोहड़ी Lohri की अग्नि में झूठी चीजें अर्पित करनी चाहिए। लहसुन, प्याज और मीट का सेवन न करें। काले रंग के कपड़े न पहनें। लड़ाई-झगड़ा न करें। झूठ न बोलें। Lohri 2024:लोहड़ी की पूजा: लोहड़ी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर नए वस्त्र धारण करें। फिर घर के आंगन में अग्नि जलाकर उसमें गेहूं की बालियां, रेवड़ी, मूंगफली, खील, चिक्की, गुड़ आदि सामग्री अर्पित करें। अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करें और भगवान सूर्य की आराधना करें। डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।’

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Saphala Ekadashi 2024: सफला एकादशी व्रत 7 जनवरी को, श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए करें इन मंत्रों का जाप

सफला एकादशी Saphala Ekadashi हिंदू धर्म में एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा की जाती है। हर माह एकादशी व्रत को पूरी आस्था और विश्वास के रखा जाता है। एकादशी व्रत के दौरान भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी कहा जाता है और साल 2024 की पहली एकादशी 7 जनवरी को है। इस दिन यदि पूरी आस्था के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तो भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। Saphala Ekadashi सफला एकादशी पर पूजा का मुहूर्त एकादशी सफला 7 जनवरी को मनाई जाएगी। पंचांग के मुताबिक, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 7 जनवरी को 12:41 AM पर होगा और इस तिथि का समापन 08 जनवरी सोमवार को 12:46 AM पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार व्रत भी 7 जनवरी को ही रखा जाएगा। 7 जनवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 07:15 बजे से रात 10:03 बजे तक है और इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ होगा। व्रत के पारण का समय 8 जनवरी को सुबह 07:15 बजे से सुबह 09:20 बजे के बीच रहेगा। Mokshada Ekadashi :क्यों करते हैं मोक्षदा एकादशी व्रत? जानिए व्रत कथा और इसका महत्व Saphala Ekadashi 2024 सफला एकादशी पर भोग में लगाएं ये चीजें सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की मूर्ति को पीले वस्त्र अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा पूजा के दौरान हल्दी, चंदन, दीप, धूप अर्पित करना चाहिए। प्रसाद में तुलसी की पत्तियां जरूर चढ़ाना चाहिए। भगवान विष्णु को खीर, फल और मिठाई का भोग लगाना चाहिए। इन मंत्रों का करें जाप त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।। Saphala Ekadashi 2024:सफला एकादशी का महत्व धार्मिक मत है कि सफला एकादशी का व्रत करने से कार्यों में सफलता (Saphala Ekadashi) मिलती है और इंसान को जीवन के दुखों से छुटकारा मिलता है। एकादशी व्रत करने से मृत्यु के बाद मोक्ष और जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।इसके अलावा साधक की मनचाही मनोकामना पूरी होती है। सफला व्रत की कथा पढ़ने या सुनने से पूजा सफल होती है। Saphala Ekadashi 2024:सफला एकादशी की पूजा विधि सफला एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी, बेलपत्र, फल, फूल, मिठाई आदि अर्पित करना चाहिए। पूजा के बाद भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। इस दिन व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। शाम के समय भगवान विष्णु की आरती करने के बाद पारण करना चाहिए। Saphala Ekadashi सफला एकादशी का व्रत करने के लाभ सफला एकादशी का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: Saphala Ekadashi सफला एकादशी की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय में महिष्मान नाम का एक राजा था। उसके चार पुत्र थे। उनमें से लुम्पक नाम का पुत्र बहुत ही दुष्ट था। वह भगवान, ब्राह्मण और वैष्णवों की निंदा किया करता था। एक दिन राजा महिष्मान ने लुम्पक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन लुम्पक नहीं माना। एक दिन राजा महिष्मान ने युधिष्ठिर से लुम्पक के उद्धार का उपाय पूछा। युधिष्ठिर ने कहा कि लुम्पक को सफला एकादशी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और वह भगवान का भक्त बन जाएगा। राजा महिष्मान ने लुम्पक को सफला एकादशी Saphala Ekadashi का व्रत करने के लिए कहा। लुम्पक ने व्रत करने की सहमति दे दी। व्रत के दिन लुम्पक ने विधिवत पूजा की और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने लुम्पक की प्रार्थना सुनी और उसे पापमुक्त कर दिया। लुम्पक भगवान का भक्त बन गया और उसने अपना जीवन धर्म-कर्म में व्यतीत किया।

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Kalashtami Kalabhairav Jayanti:कालाष्टमी कालभैरव 2024 जयंती, कथा, महत्व, पूजा विधि

कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली एक हिंदू त्यौहार है। इस दिन भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव की पूजा की जाती है। भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है। वे भगवान शिव के गण और भक्त भी हैं। कालाष्टमी के दिन भैरव देव का जन्म हुआ था, इसलिए इसे भैरव जयंती अथवा काल भैरव अष्टमी भी कहा जाता हैं . भैरव देव भगवान शिव का रूप माना जाता हैं . यह उनका एक प्रचंड रूप है . यह भैरव अष्टमी, भैरव जयंती, काला- भैरव अष्टमी, महाकाल भैरव अष्टमी और काल – भैरव जयंती के नाम से जाना जाता है. यह भैरव के भगवान के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं . भैरव रूप भगवान शिव का एक डरावना और प्रकोप व्यक्त करने वाला रूप हैं . काल का मतलब होता है समय एवं भैरव शिव जी का रूप का नाम है. कालाष्टमी काल भैरव जयंती 2024 (Kalashtami Kalabhairav Jayanti) हर माह की कृष्ण पक्ष की सभी अष्टमी को काल भैरव को समर्पित कर कालाष्टमी कहा जाता है. हर महीने की कालाष्टमी से ज्यादा महत्व कार्तिक माह की कालाष्टमी को दिया जाता है. कार्तिक के ढलते चाँद के पखवाड़े में आठवें चंद्र दिन पर पड़ता है, अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन कालाष्टमी पर्व मनाया जाता है. काल भैरव जयंती 2024 में कब है (Kalabhairav Jayanti 2024)  यह दिन पापियों को दंड देने वाला दिन माना जाता है, इसलिए भैरव को दंडपानी भी कहा जाता हैं. मान्यतानुसार काले कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता है, क्यूंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी है, इसलिए इनमे स्वस्वा भी कहा जाता है मान्यतानुसार काले कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता है, क्योंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी है, इसलिए इनमें स्वस्वा भी कहा जाता है। यह रूप देवताओं और इंसानों में जो भी पापी रहता है, उसे दंड देता है। उनके हाथों में जो डंडा होता है, उससे वो दण्डित करते हैं। Kalashtami 2024: कालाष्टमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना जीवन में मिलेंगे बुरे परिणाम कालाष्टमी की 2024 में तिथि (Kalashtami 2024 Dates) दिनांक महिना दिन   04 जनवरी गुरुवार कालाष्टमी 02 फरवरी शुक्रवार कालाष्टमी 03 मार्च रविवार कालाष्टमी 01 अप्रैल सोमवार कालाष्टमी 01 मई बुधवार कालाष्टमी 30 मई गुरुवार कालाष्टमी 28 जून शुक्रवार कालाष्टमी 27 जुलाई शनिवार कालाष्टमी 26 अगस्त सोमवार कालाष्टमी 24 सितम्बर मंगलवार कालाष्टमी 24 अक्टूबर गुरुवार कालाष्टमी 22 नवम्बर शुक्रवार कालभैरव जयन्ती 22 दिसम्बर रविवार कालाष्टमी काल भैरव जयंती कथा महत्व (Kalabhairav Jayanti Katha Mahatva) एक बार त्रिदेव, ब्रह्मा विष्णु एवम महेश तीनो में कौन श्रेष्ठ इस बात पर लड़ाई चल रही थी. इस बात पर बहस बढ़ती ही चली गई, जिसके बाद सभी देवी देवताओं को बुलाकर एक बैठक की गई. यहाँ सबसे यही पुछा गया कि कौन ज्यादा श्रेष्ठ है. सभी ने विचार विमर्श कर इस बात का उत्तर खोजा, जिस बात का समर्थन शिव एवं विष्णु ने तो किया लेकिन  तब ही ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को अपशब्द कह दिये जिसके कारण भगवान शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा. शिव जी ने उस क्रोध से अपने रूप भैरव का जन्म किया. इस भैरव का अवतार का वाहन काला कुत्ता था, जिसके एक हाथ में छड़ी थी. इस अवतार को महाकालेश्वर के नाम से भी बुलाया जाता है. इसलिए इनको ‘डंडाधिपति’ कहा गया. शिव जी के इस रूप को देख सभी देवी देवता घबरा गए.  भैरव ने क्रोध में ब्रह्मा जी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया तब ही से ब्रह्मा के पास चार मुख हैं . इस प्रकार ब्रह्मा जी के सर को काटने के कारण भैरव जी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया . ब्रह्मा जी ने भैरव बाबा से माफ़ी मांगी, तब शिव जी अपने असली रूप में आ जाते है. भैरव बाबा को उनके पाप के कारण दंड मिला इसलिए भैरव को कई समय तक एक भिखारी की तरह रहना पड़ा. इस प्रकार वर्षो बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता हैं . इसका एक नाम दंडपानी पड़ा इस प्रकार भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता हैं . काल भैरव जयंती पूजा कैसे की जाती हैं (Kalabhairav Jayanti puja vidhi) इस प्रकार यह पूजा संपन्न की जाती हैं. कहते है काल भैरव को पूजने वाली को वो परम वरदान देते है, उसके मन की हर इच्छा पूरी करते है.  जीवन में किसी तरह की परेशानी, डर, बीमारी, दर्द को कल भैरव दूर करते है. कश्मीर की पहाड़ी पर वैष्णव देवी का मंदिर हैं जिसके पास भैरव का मंदिर हैं. ऐसी मान्यता हैं कि जब तक भैरव नाथ के दर्शन नहीं किये जाते तब तक वैष्णव देवी के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता. मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी काल भैरव का एक मंदिर है, जहाँ प्रसाद के तौर पर देशी शराब चढ़ाई जाती है. यहाँ यह मान्यता है कि शराब काल भैरव  का प्रसाद है, जो वो आज भी वहां पीते है. मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकानों में ये आसानी से मिल जाती है.

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Kalashtami : कालाष्टमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना जीवन में मिलेंगे बुरे परिणाम

कालाष्टमी हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मत है कि भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस बारकालाष्टमी 4 जनवरी को है। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं सनातन धर्म में कालाष्टमी का विशेष महत्व है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी होती है। Kalashtami 2024 कालाष्टमी भगवान काल भैरव को समर्पित है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मत है कि भगवान काल भैरव की विधिपूर्वक पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस बार साल 2024 की पहली कालाष्टमी 4 जनवरी को है। कालाष्टमी के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही है, जिनको करने से साधक का जीवन परेशानियों से भरा रहता है और भगवान काल भैरव रुष्ट हो सकतें हैं। चलिए जानते हैं कालाष्टमी के दिन कौन से कार्यों को करने बचना चाहिए। Kalashtami 2024 कालाष्टमी के दिन न करें ये कार्य कालाष्टमी Kalashtami 2024: के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही है, जिनको करने से साधक का जीवन परेशानियों से भरा रहता है और भगवान काल भैरव रुष्ट हो सकते हैं। आइए जानते हैं कालाष्टमी के दिन कौन से कार्यों को करने बचना चाहिए। Kalashtami 2024 कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में कालाष्टमी Kalashtami 2024 पर्व का खास महत्व है। तंत्र विद्या सीखने वाले साधक बेहद धूमधाम से कालाष्टमी मनाते हैं। इस दिन भगवान काल भैरव की विधिपूर्वक पूजा-व्रत करने से इंसान के जीवन में खुशियों का आगमन होता है और सुख-शांति मिलती है और भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं। कालाष्टमी के अवसर पर उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर समेत कई मंदिरों में भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है और भजन-कीर्तन किया जाता है। भगवान काल भैरव मंत्र ॐ ब्रह्म काल भैरवाय फट ॐ तीखदन्त महाकाय कल्पान्तदोहनम्। भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुर्माहिसि ॐ ह्रीं बं बटुकाय मम आपत्ति उद्धारणाय। कुरु कुरु बटुकाय बं ह्रीं ॐ फट स्वाहा

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Calendar 2024: हिंदू कैलेंडर 2024, जानें सालभर के व्रत-त्योहारों की लिस्ट

नया साल अपने साथ नए उमंग-उत्साह के साथ ही कई सारे तीज और त्योहार भी लेकर आता है। ऐसे में हर कोई आने वाले साल में त्योहारों की तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में जानना चाहता है। यहां हम आपके लिए साल के प्रमुख तीज और त्योहारों की लिस्ट लेकर आए हैं, जहां से आप सभी की तिथियों के बारे में जान सकते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं जनवरी से लेकर दिसंबर 2024 तक कब और कौन से त्योहार और व्रत मनाए जाएंगे… 1 जनवरी 2024, सोमवार से नया साल शुरू हो रहा है. इस दिन पौष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, मघा नक्षत्र है. साल के पहले दिन आयुष्मान योग भी बनेगा. नए साल के आते ही लोग मुख्य व्रत-त्योहार की तारीख, शुभ मुहूर्त जानने को लेकर उत्सुक रहते हैं. साल 2024 के मुख्य व्रत-त्योहार (Hindu Calendar 2024 Festival and Vrat) जनवरी 2024 फरवरी 2024 मार्च 2024   अप्रैल 2024 मई 2024 जून 2024 जुलाई 2024 अगस्त 2024 सितंबर 2024 अक्टूबर 2024 नवंबर 2024 दिसंबर 2024 Disclaimer: यह सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यह बताना जरूरी है कि Karmasu.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Geeta Jayanti 2023: श्रीमद्भागवत गीता घर में है तो भूल से भी न करें ये काम, चली जाएगी बरकत

Geeta Jayanti 2023 श्रीमद्भागवत गीता एक पवित्र हिंदू ग्रंथ है जो हिंदुओं के बीच बहुत सम्मानित है। यह ग्रंथ भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद का वर्णन करता है, और यह जीवन के सभी पहलुओं पर मार्गदर्शन प्रदान करता है। यदि आपके घर में श्रीमद्भागवत गीता है, तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। इनमें शामिल हैं: गीता को साफ-सुथरे और पवित्र स्थान पर रखें। इसे किसी गंदगी या अपवित्र स्थान पर न रखें। गीता को बिना नहाए या गंदे हाथों से न छुएं। इससे गीता को अपवित्र माना जाता है। मासिक धर्म में गीता को न छुएं। यह भी गीता को अपवित्र माना जाता है। गीता को कभी भी उल्टा या नीचे की ओर न रखें। इसे हमेशा सीधा रखें। गीता को कभी भी जला न दें या न फाड़ें। यह गीता का अपमान माना जाता है। इन बातों का ध्यान रखकर आप श्रीमद्भागवत गीता के पवित्रता को बनाए रख सकते हैं और इसके पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं। घर में श्रीमद्भागवत गीता रखने के नियम घर में श्रीमद्भागवत गीता Geeta Jayanti को रखने और पाठ करते वक्त कुछ बातों का खयाल रखना चाहिए, तभी पूर्ण फल मिलता है. ये बहुत पवित्र ग्रंथ है इसलिए इसे साफ-पवित्र स्थान पर ही रखें. बिना नहाए, गंदे हाथों, या मासिक धर्म में गीता को स्पर्श न करें. इससे व्यक्ति पाप का भागी बनता है और मानसिक-आर्थिक तनाव होने लगते हैं. श्रीमद्भागवत गीता को जमीन पर रखकर न पढ़ें. इसके लिए पूजा चौकी या फिर काठ (लकड़ी से बना स्टेंड) का इस्तेमाल करें. साथ ही गीता को एक लाल कपड़े में बाधकर रखें. गीता पाठ करने के लिए अपने ही आसन का उपयोग करें.  दूसरों का आसन नहीं लेना चाहिए इससे पूजा-पाठ का प्रभाव कम हो जाता है.पाठ शुरू करने से पहले भगवान गणेश और श्री कृष्ण का स्मरण करें. दिन में किसी भी वक्त गीता का पाठ कर सकते हैं लेकिन अगर कोई अध्याय शुरू किया है तो उसे बीच में न छोड़े. पूरा अध्याय पढ़ने के बाद ही उठें गीता पाठ करने के लाभ geeta paat karne ke laabh पुराणों के अनुसार जिस घर में नियमित रूप से गीता का पाठ किया जाता है वहां खुशहाली बनी रहती है. गीता में धर्म, कर्म, नीति, सफलता, सुख का राज छिपा है. इसके पठन-पाठन से जीवन की हर समस्या का हल प्राप्त हो सकता है. गीता का पाठ करने से व्यक्ति में किसी भी परिस्थिति से लड़ने की काबिलियत आती है. घर में लक्ष्मी का वास होता है. मानसिक परेशानी और गृह क्लेश से मुक्ति, विरोधी का सामना करने के शक्ति गीता पाठ करने से प्राप्त होती है. इसमें लिखे श्लोक व्यक्ति को वास्तविकता से रूबरू करता हैं. गीता जयंती Geeta Jayanti के दिन गीता पाठ के साथ हवन किया जाए तो इससे वास्तु दोष समात् होता है. गीता का पाठ नियमित रूप से करने से मृत्यु के बाद पिशाच योनी से मुक्ति मिल जाती है.

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Geeta Jayanti 2023: गीता जयंती आज, जानिए क्या है इस दिन का महत्व

Geeta Jayanti गीता जयंती, जिसे भगवद् गीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन, भगवद् गीता के उपदेश की स्मृति में कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भगवद् गीता हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक है। यह महाभारत के युद्ध के मैदान में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का संग्रह है। गीता में जीवन, धर्म, कर्म, मोक्ष और अन्य कई विषयों पर गहन ज्ञान दिया गया है। गीता जयंती Geeta Jayanti 2023 के दिन, हिंदू मंदिरों में गीता के पाठ और व्याख्या के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई लोग इस दिन गीता का व्रत रखते हैं और गीता के उपदेशों का पालन करने का संकल्प लेते हैं। 22 दिसंबर 2023 को गीता जयंती मनाई जाएगी । मान्यता है कि जिस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था उस दिन मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी, इसीलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उपवास करने की भी मान्यता है। गीता जयंती के दिन उपवास करने से मन पवित्र होता है और शरीर स्वस्थ रहता है। साथ ही समस्त पापों से भी छुटकारा मिलता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म और कर्म को समझाते हुए उपदेश दिया था। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण के द्वारा जो उपदेश दिए गए उसे गीता कहा जाता है। गीता के उपदेश में जीवन जीने, धर्म का अनुसरण करने और कर्म के महत्व को समझाया गया है। Geeta Jayanti 2023 गीता जयंती का महत्व Geeta Jayanti 2023 गीता जयंती का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह त्योहार हिंदू धर्म के आध्यात्मिक और दार्शनिक मूल्यों को याद दिलाता है। गीता के उपदेशों को जीवन के हर क्षेत्र में लागू किया जा सकता है। वे हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद कर सकते हैं। Geeta Jayanti गीता जयंती का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है: Geeta Jayanti 2023 गीता जयंती पर किए जाने वाले कुछ कार्य Geeta Jayanti गीता जयंती पर निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं: गीता जयंती एक ऐसा अवसर है जब हम सभी को भगवद् गीता के उपदेशों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। गीता के उपदेशों का पालन करने से हम एक बेहतर इंसान बन सकते हैं और अपने जीवन को सफल और सुखमय बना सकते हैं।

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Shree Ram श्री राम जन्म कथा | श्री राम और उनके भाइयों का जन्म |

(Shree Ram’s Birth story in Hindi) श्री राम का जन्म कैसे हुआ था। श्री राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन का जन्म राजा दशरथ वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के इक्ष्वाकु कुलोत्पन्न राजा थे। वे राजा अज व इन्वदुमतीके के पुत्र थेे तथा इक्ष्वाकु कुल मे जन्मे थे। वे श्रीराम के पिता थे। उनके चरित्र को आदर्श महाराजा, पुत्रों को प्रेम करने वाले पिता और अपने वचनों के प्रति पूर्ण समर्पित व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। दशरथ का जन्म दशरथ का जन्म अयोध्या के राजा अज व इंदुमती के घर हुआ था। उनके पिता अज एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी माता इंदुमती एक सुंदर और गुणवान रानी थीं। दशरथ का विवाह दशरथ ने तीन विवाह किए। उनका पहला विवाह कौशल्या से हुआ। कौशल्या से उनका पुत्र श्रीराम हुआ। उनका दूसरा विवाह सुमित्रा से हुआ। सुमित्रा से उनका पुत्र भरत और लक्ष्मण हुए। उनका तीसरा विवाह कैकेयी से हुआ। कैकेयी से उनका पुत्र शत्रुघ्न हुआ। पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न होना राजा दशरथ पैदल वन में श्रृंग मुनि के पास जाते हैं तथा उनसे आग्रह करते हैं कि संतान सुख के लिए व्याकुल हैं। कृपया करके मेरी समस्या का समाधान कीजिए। राजा दशरथ की सादगी तथा विनम्र आदर भाव के कारण श्रृंग मुनि प्रसन्न हुए और उन्होंने दशरथ का वचन दिया कि वह उनका पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाएंगे। उसके पश्चात शुभ मुहूर्त देखकर उन्होंने दशरथ का पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न करवाया यज्ञ संपन्न होने के बाद हवन कुंड में से अग्निदेव एक खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए और राजा दशरथ से बोले। हे राजन, यह खीर ले जाओ और अपनी तीनों रानियों को बराबर खिला दो इससे तुम्हे संतान प्राप्ति अवश्य होगी। Shree Ram श्रीराम तथा उनके भाइयों का जन्म राजा दशरथ खीर का पात्र ले जाकर रानी कौशल्या तथा रानी कैकई को दे देते हैं। रानी कौशल्या तथा रानी कैकई अपने अपने पात्र में से एक एक निवाला सबसे छोटी रानी सुमित्रा को खिला देते हैं जिसके प्रभाव से कुछ समय बाद राजा दशरथ के घर में एक साथ चार पुत्रों का जन्म होता है। रानी कौशल्या सबसे बड़े पुत्र राम को जन्म देती है। उसके कुछ ही समय बाद हैरानी कैकई राजा दशरथ के दूसरे पुत्र भरत को जन्म देती हैं। कुछ है घड़ी बीतने के पश्चात रानी सुमित्रा राजा दशरथ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण को जन्म देती है तथा कुछ ही क्षण बाद वह दशरथ के चौथे पुत्र शत्रुघ्न को जन्म देती हैं।  और इस प्रकार पृथ्वी पर बढ़े हुए पाप, अत्याचार को मिटाने के लिए भगवान नारायण स्वयं राजा दशरथ के पहले पुत्र श्री राम के रूप में जन्म लेते हैं। भगवान विष्णु के राम अवतार का साथ देने के लिए शेषनाग लक्ष्मण के अवतार में जन्म लेते हैं। तथा उनके साथ ही भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र भारत के अवतार में जन्म लेते हैं तथा शत्रुघ्न भगवान विष्णु के शंख शैल के  अवतार होते है। श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को चार पुरुषार्थ का रूप माना गया है। जिसमें श्री राम धर्म का रूप होते हैं तथा भारत मोक्ष का रूप होते हैं। उसके साथ ही लक्ष्मण जी को काम का प्रतीक माना गया है तथा शत्रुघ्न जी को धन का रूप माना गया है ।

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Vivah Panchami 2023: कब है विवाह पंचमी? जानें इस दिन विवाह करना क्यों माना जाता है अशुभ

विवाह पंचमी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह भगवान राम और देवी सीता के विवाह की जयंती है। यह त्योहार अगहन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल, विवाह पंचमी 17 दिसंबर 2023 को मनाई जाएगी। विवाह पंचमी के दिन, हिंदू मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान किए जाते हैं। देवी सीता और भगवान राम की मूर्तियों को सजाया जाता है और उन्हें फूल, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। अविवाहित लोग इस दिन भगवान राम और देवी सीता से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें एक सुयोग्य साथी मिल जाए। इस दिन, कुंवारी कन्याएं “ऊँ जानकी वल्लभाय नमः” मंत्र का जाप करती हैं। विवाह पंचमी के दिन, लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। इस दिन, नए कपड़े पहनना और नए काम शुरू करना शुभ माना जाता है। विवाह पंचमी एक खुशी का त्योहार है जो प्रेम, विवाह और समृद्धि का प्रतीक है। यह एक दिन है जब लोग एक-दूसरे के साथ खुशियां मनाते हैं और भगवान राम और देवी सीता से आशीर्वाद मांगते हैं। Vivah Panchami 2023 पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास (अगहन) के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी (Vivah Panchami) मनाई जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ दिन पर माता सीता और भगवान राम का विवाह मिथिलांचल में संपन्न हुआ था. इसलिए लोग इस दिन को भगवान राम और माता सीता के विवाहोत्सव या वैवाहिक वर्षगांठ के रूप में मनाते हैं. कहा जाता है कि, इसी दिन तुलसीदास जी के द्वारा रामचरितमानस भी पूरा किया गया था. विवाह पंचमी के दिन रामजी और माता सीता का विवाह कराया जाता है, पूजा पाठ किए जाते हैं. मान्यता है कि इससे घर पर खुशियों का आगमन होता है और वैवाहिक जीवन में प्यार बढ़ता है. ज्योतिष में विवाह पंचमी पर किए जाने वाले कुछ उपायों के बारे में भी बताया गया है. इन उपायों को करने से कुंवाली कन्याओं की शादी में आने वाली बाधाएं दूर होती है और उनके हाथ पीले होते हैं. कब है विवाह पंचमी 2023 (Vivah Panchami 2023 Date) इस साल विवाह पंचमी रिववार, 17 दिसंबर 2023 को पड़ रही है. इसी दिन भगवान राम और सीता जी का वैवाहिक वर्षगांठ मनाया जाएगा. खासकर अयोध्या और नेपाल में इस दिन भव्य आयोजन होता है और लोग राम-सीता के विवाह का आयोजन कराते हैं. हिंदू धर्म में विवाह पंचमी के दिन को बहुत ही शुभ माना गया है. लेकिन इसके बावजूद भी इस दिन माता-पिता अपनी कन्या का विवाह नहीं कराते. खासकर मिथिलांचल और नेपाल में इस दिन विवाह आयोजन नहीं होते. क्योंकि विवाह के लिए इस दिन को अशुभ माना जाता है. आइये जानते हैं आखिर इसका कारण क्या है? Vivah Panchami 2023 इसलिए विवाह पंचमी के दिन नहीं किया जाता विवाहराम और सीता की जोड़ी को आदर्शतम जोड़ी माना जाता है। भारतीय समाज में सुहागिन महिलाओं को राम-सीता की जोड़ी जैसा आशीर्वाद दिया जाता है। साथ ही आज भी भगवान राम और माता सीता के परिश्रम की कहानी सबको सुनाई जाती हैं। लेकिन फिर भी उनके विवाह की तिथि के दिन शादी करना अशुभ माना जाता है। दरअसल, इसके पीछे की वजह ये है कि विवाह के बाद भगवान राम और माता सीता के जीवन में ढेरों कष्ट आए थे। दोनों ने 14 साल का वनवास भी काटा। साथ ही माता सीता को अग्नि परीक्षा से भी गुजरना पड़ा। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार, सामाजिक मान्यताओं और अपने निष्पक्ष उसूलों के चलते भगवान राम ने गर्भवती सीता का परित्याग कर दिया। जिसके बाद माता सीता ने अकेले ही अपने आगे का जीवन वन में गुजारा था। उन्होंने अकेले ही अपने बच्चों का पालन पोषण किया। राम और सीता के वैवाहिक जीवन में इतने संघर्षों को देखते हुए ये लोग ये पर्व तो मनाते हैं, लेकिन इस दिन अपनी संतान का विवाह नहीं करते। ऐसा इसलिए ताकी  राम और सीता जितने दुख उनकी संतान को झेलने न पड़ें।

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रोहिणी व्रत Rohini Vrat 2023

रोहिणी व्रत एक हिंदू और जैन व्रत है जो हर महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र होता है। रोहिणी नक्षत्र को देवी लक्ष्मी का नक्षत्र माना जाता है। इसलिए इस व्रत को देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए किया जाता है। Rohini Vrat रोहिणी व्रत का महत्व रोहिणी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से विवाहित महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही उनके पति की लंबी उम्र होती है। नवविवाहित महिलाएं इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से भी करती हैं। Rohini Vrat 2023: रोहिणी व्रत पर हो रहा है दुर्लभ ‘भद्रावास’ योग का निर्माण, प्राप्त होगा अक्षय फल Rohini Vrat रोहिणी व्रत की पूजा विधि रोहिणी व्रत की पूजा विधि निम्नलिखित है: Rohini Vrat रोहिणी व्रत का पारण रोहिणी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। पारण के समय एक बार फिर देवी लक्ष्मी की पूजा करें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। Rohini Vrat रोहिणी व्रत के नियम रोहिणी व्रत के दौरान निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: रोहिणी (Rohini) व्रत एक पवित्र व्रत है जो महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है। इस व्रत को विधि-विधान से करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंगलवार, 28 नवंबर 2023प्रारंभ: 27 नवंबर 2023 दोपहर 01:52 बजेसमाप्त : 28 नवंबर 2023 अपराह्न 01:58 बजे रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों का महत्वपूर्ण व्रत है इस व्रत को जैन समुदाय के लोग करते है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता हैं। इसलिए इसे व्रत को रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर रोहिणी व्रत का पारण किया जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। रोहिणी व्रत एक वर्ष में 12 होते है अर्थात् यह प्रत्येक महीनें में आता है। फलाहार सूर्यास्त से पहले किया जाता है क्योंकि रात को भोजन नहीं किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। जैन समुदाय में यह मान्यता है कि यह व्रत विशेष फल देता है तथा कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता हे।

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Dev Diwali 2023: देव दिवाली का शिव से है गहरा संबंध

देव दिवाली 2023 मुहूर्त (Dev Diwali 2023 Muhurat) कार्तिक पूर्णिमा तिथि शुरू – 26 नवंबर 2023, दोपहर 03.53 कार्तिक पूर्णिमा तिथि समाप्त – 27 नवंबर 2023, दोपहर 02.45 प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त – शाम 05:08 – रात 07:47 अवधि – 02 घण्टे 39 मिनट्स इस दिन प्रदोष काल में देव दीपावली मनाई जाती है. इस दिन वाराणसी में गंगा नदी के घाट और मंदिर दीयों की रोशनी से जगमग होते हैं. काशी में देव दिवाली की रौनक खास होती है. देव दिवाली की कथा Dev Diwali ki katha त्रिपुरासुर का वध पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए तारकासुर के तीनों बेटे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अमरत्व का वरदान मांगा। ब्रह्म देव ने उन्हें यह वरदान देने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें एक अन्य वरदान दिया कि जब तीनों के सोने, चांदी और लोहे के तीन नगर अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में होंगे और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत होकर असंभव रथ पर सवार असंभव बाण से मारना चाहे, तब ही उनकी मृत्यु होगी। इस वरदान से त्रिपुरासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गए और उन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे त्रिपुरासुर के वध के लिए प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने देवताओं को बताया कि त्रिपुरासुर का वध केवल भगवान शिव ही कर सकते हैं। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया। उन्होंने सभी देवताओं से अपना आधा बल प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एक असंभव रथ तैयार किया। इस रथ का रथनी सूर्य, चक्रचित्रकार चंद्रमा, सारथी ब्रह्मा जी, बाण भगवान विष्णु, धनुष मेरू पर्वत और डोर वासुकी नाग थे। अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में आने पर त्रिपुरासुर के तीन नगरों को भगवान शिव ने अपने बाण से भस्म कर दिया। इस प्रकार त्रिपुरासुर का वध हुआ और देवताओं को उनसे मुक्ति मिली। त्रिपुरासुर के वध का महत्व त्रिपुरासुर के वध का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह हिंदू धर्म में अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह भी बताता है कि भगवान शिव हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। Ganesh bhagwan:भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है? त्रिपुरासुर के वध से जुड़े कुछ अन्य तथ्य त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरासुर के वध की कथा को शिवपुराण में विस्तार से वर्णित किया गया है। काशी से देव दिवाली का संबंध काशी से देव दिवाली का संबंध त्रिपुरासुर के वध से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद, सभी देवता भगवान शिव के आशीर्वाद के लिए काशी पहुंचे। उन्होंने गंगा नदी में स्नान किया और भगवान शिव की पूजा की। इसके बाद उन्होंने गंगा नदी के तट पर दिवे जलाए और खुशियां मनाईं। इसी दिन से काशी में देव दीपावली मनाई जाने लगी। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है। इसलिए, देव दीपावली काशी में विशेष रूप से मनाई जाती है। देव दीपावली के दिन, काशी के घाटों पर लाखों दिवे जलाए जाते हैं। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। इस दिन, गंगा नदी में महाआरती भी की जाती है। देव दीपावली काशी के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार है। यह त्योहार अच्छाई की बुराई पर विजय और भगवान शिव की कृपा का प्रतीक है।

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काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ Masik Kalashtami Vrat 2023

काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ | Masik Kalashtami Vrat 2023 दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे Kalashtami 2023 Date:  सनातन धर्म में कालाष्टमी (kalashtami ) का बेहद ही महत्व होता है. हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन इसे मनाया जाता है. कालाष्टमी व्रत हर माह किया जाता है. कालभैरव के उपासक इस दिन भगवान काल भैरव का पूजन करते है. मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित कालभैरव मंदिर में विशेष अनुष्ठान किया जाता है. उपासक इन दिन उपवास रखते हैं. बिहार में इसे कालाष्टमी को कालभैरव जयन्ती के नाम से जाना जाता है, उत्तरी भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष के महीने में पड़ती है जबकि दक्षिणी भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक माह में पड़ती है. कालाष्टमी पूजा विधि (Kalashtami Puja Vidhi)भगवान काल भैरव को मानने वाले लोगों को इस दिन अलसुबह उठकर स्न्नान करना चाहिए. जिसके बाद भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. इस पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराने से घर में सुख समृद्धि आती है. इतना ही नहीं श्वान को भोजन कराने से भैरव बाबा सदा प्रसन्न होते हैं. कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं. Kalashtami 2023 december कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का एक रौद्र रूप माना जाता है. बाबा भैरव का पूजन करने से समस्त पापों और रोगों से छुटकारा मिलता है. सनातन शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा ताउम्र बनी रहती है.इस दिन व्रत रखने से कुंडली में मौजूद राहु के दोषों से भी छुटकारा मिलता है.

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