रविवार की कहानी | रविवार (इतवार) व्रत कथा | Sunday vrat katha in hindi

(Sunday vrat katha in hindi ) एक बूढ़ी औरत थी जो सूर्य देवता की पूजा करती थी। हर सुबह मैं अपना घर साफ करती और गाय के गोबर से लिपटी। इसके बाद ही वह खाना बनाती है और खाती थी पूर्णविराम वह अपने पड़ोसी के घर से गोबर इकट्ठा करती थी। पड़ोसी की पत्नी को यह पसंद नहीं था। एक दिन उसने अपनी गाय घर के अंदर बांध दी। अगले दिन बूढ़ी औरत को गोबर नहीं मिला और वह अपना घर नहीं लिप पाई। उसका घर साफ नहीं हो सका था, इसलिए उसने उस दिन भोजन नहीं किया। सूर्यकवचस्तोत्रम् २ Suryakavachastotram 2 उस रात सूर्य देवता उसके सपनों में आए। उन्होंने उसे एक गाय देने का वचन दिया। अगले दिन उसने अपने घर में एक गाय और बछड़े को पाया। पड़ोसी की पत्नी नहीं है देखा तो वह जल भुन गई। उसने यह भी देखा कि बुढ़िया की गाय तो सोने का गोबर करती है। उसके मन में लालच आ गया और उसने सोने का गोबर उठाकर उसकी जगह साधारण गोबर रख दिया। सूर्य देवता ने यह देख लिया। उन्होंने उस रात नगर में तूफान ला दिया। बूढ़ी औरत ने गाय को अपने घर के अंदर बांध लिया जिससे सोने का गोबर उसे ही मिल गया। पड़ोसी की पत्नी ने सोने का गोबर देने वाली गाय की बात जाकर राजा को बता दी। राजा ने वह जादुई गाय ले ली और अपने महल पर सोने के गोबर काले करा दिया। रात में सूर्य देवता राजा के सपने में आए और बोले कि वह गाय उन्होंने बूढ़ी औरत को भेज की है। जब राजा जागा तो उसने पाया कि उसके महल से दुर्गंध आ रही है। उसने देखा तो महल की दीवारों पर किया गया सोने के गोबर का लेप साधारण गोबर के लेप में बदल चुका था। उसे अपने कृत्य पर दुख हुआ और उसने बूढ़ी औरत को वह गाय लौटा दी। उसने पड़ोसी की चालाक पत्नी को दंड भी दिया। उसने यह घोषणा भी करा दी की उसके राज्य में हर कोई रविवार के दिन सूर्य की पूजा करेगा और उपवास रखेगा।

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कैसे हुआ सरस्वती का जन्म | saraswati ka janam kaise hua | माता सरस्वती के जन्म की कहानी |

Saraswati जब सृष्टि का निर्माण हुआ तो हर और अव्यवस्था थी। ब्रह्मा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि सृष्टि में व्यवस्था कैसे बनाई जाए। समस्या पर विचार करते समय उन्हें एक आवाज सुनाई पड़ी कि ज्ञान ही सृष्टी में व्यवस्था बनाने में सहायता कर सकता है। तभी ब्रह्मा के मुख से सरस्वती (Saraswati) की चमत्कारी आकृति प्रकट हुई जो ज्ञान और बुद्धि की देवी थी, श्वेत वस्त्र धारण किए वह हंस पर सवार थी। उसके एक हाथ में पुस्तक और दूसरे में वीणा थी। विचार, समझ और संवाद के जरिए उन्होंने ब्रह्मा को यह समझाने में सहायता की की किस तरह से सृष्टि में व्यवस्था कायम की जाए। जब उसने वीणा बजाई तो हल्ला गुल्ला शांत होने लगा सूर्य, चंद्रमा और तारों का जन्म हुआ। समुंद्र भर गए और ऋतु परिवर्तन होने लगा। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सरस्वती का नाम वाग्देवी रख दिया जिसका अर्थ शब्द और ध्वनि की देवी होता है। इस प्रकार ब्रह्मा, सरस्वती के ज्ञान की बदौलत सृष्टि के रचयिता बन गए। सरस्वती जी के जन्म की कथा हिंदू धर्म में बहुत प्रसिद्ध है। इस कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का कार्य संपन्न कर दिया तो उन्होंने पाया कि सृष्टि में सबकुछ है, लेकिन सब मूक, शांत और नीरस है। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल निकाला और छिड़क दिया, जिससे मां सरस्वती वहां पर प्रकट हो गईं। उन्होंने अपने हाथों में वीणा, माला और पुस्तक धारण कर रखा था। सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा वीणा से निकलने वाले मधुर स्वर से सृष्टि में ध्वनि का संचार हुआ। माला से निकलने वाले सुगंध से सृष्टि में सुगंध का संचार हुआ। और पुस्तक से निकलने वाले ज्ञान से सृष्टि में ज्ञान का संचार हुआ। मां सरस्वती को ज्ञान, कला, संगीत, और विद्या की देवी माना जाता है। वे सृष्टि में ज्ञान और कला का प्रसार करती हैं। मां सरस्वती का जन्म वसंत पंचमी के दिन हुआ था। इसलिए वसंत पंचमी को सरस्वती (saraswati )पूजा का पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन लोग मां सरस्वती की पूजा करते हैं और उनसे ज्ञान, कला और सफलता की कामना करते हैं। सरस्वती जी के जन्म की कुछ अन्य कथाएँ भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि का निर्माण किया तो उन्होंने देखा कि सृष्टि में ज्ञान और कला का अभाव है। तब उन्होंने अपने नाभि से एक कमल उत्पन्न किया, जिस पर विराजमान होकर मां सरस्वती प्रकट हुईं। एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सृष्टि का निर्माण किया तो उन्होंने देखा कि सृष्टि में ज्ञान और कला का विकास नहीं हो रहा है। तब उन्होंने अपने-अपने तेज से एक शक्ति उत्पन्न की, जिससे मां सरस्वती प्रकट हुईं। इन सभी कथाओं से स्पष्ट है कि मां सरस्वती ज्ञान, कला और विद्या की देवी हैं। वे सृष्टि में ज्ञान और कला का प्रसार करती हैं।

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रोहिणी व्रत Rohini Vrat 2023

रोहिणी व्रत एक हिंदू और जैन व्रत है जो हर महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र होता है। रोहिणी नक्षत्र को देवी लक्ष्मी का नक्षत्र माना जाता है। इसलिए इस व्रत को देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए किया जाता है। Rohini Vrat रोहिणी व्रत का महत्व रोहिणी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से विवाहित महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही उनके पति की लंबी उम्र होती है। नवविवाहित महिलाएं इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से भी करती हैं। Rohini Vrat 2023: रोहिणी व्रत पर हो रहा है दुर्लभ ‘भद्रावास’ योग का निर्माण, प्राप्त होगा अक्षय फल Rohini Vrat रोहिणी व्रत की पूजा विधि रोहिणी व्रत की पूजा विधि निम्नलिखित है: Rohini Vrat रोहिणी व्रत का पारण रोहिणी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। पारण के समय एक बार फिर देवी लक्ष्मी की पूजा करें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। Rohini Vrat रोहिणी व्रत के नियम रोहिणी व्रत के दौरान निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: रोहिणी (Rohini) व्रत एक पवित्र व्रत है जो महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है। इस व्रत को विधि-विधान से करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंगलवार, 28 नवंबर 2023प्रारंभ: 27 नवंबर 2023 दोपहर 01:52 बजेसमाप्त : 28 नवंबर 2023 अपराह्न 01:58 बजे रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों का महत्वपूर्ण व्रत है इस व्रत को जैन समुदाय के लोग करते है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता हैं। इसलिए इसे व्रत को रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर रोहिणी व्रत का पारण किया जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। रोहिणी व्रत एक वर्ष में 12 होते है अर्थात् यह प्रत्येक महीनें में आता है। फलाहार सूर्यास्त से पहले किया जाता है क्योंकि रात को भोजन नहीं किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। जैन समुदाय में यह मान्यता है कि यह व्रत विशेष फल देता है तथा कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता हे।

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Dev Diwali 2023: देव दिवाली का शिव से है गहरा संबंध

देव दिवाली 2023 मुहूर्त (Dev Diwali 2023 Muhurat) कार्तिक पूर्णिमा तिथि शुरू – 26 नवंबर 2023, दोपहर 03.53 कार्तिक पूर्णिमा तिथि समाप्त – 27 नवंबर 2023, दोपहर 02.45 प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त – शाम 05:08 – रात 07:47 अवधि – 02 घण्टे 39 मिनट्स इस दिन प्रदोष काल में देव दीपावली मनाई जाती है. इस दिन वाराणसी में गंगा नदी के घाट और मंदिर दीयों की रोशनी से जगमग होते हैं. काशी में देव दिवाली की रौनक खास होती है. देव दिवाली की कथा Dev Diwali ki katha त्रिपुरासुर का वध पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए तारकासुर के तीनों बेटे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अमरत्व का वरदान मांगा। ब्रह्म देव ने उन्हें यह वरदान देने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें एक अन्य वरदान दिया कि जब तीनों के सोने, चांदी और लोहे के तीन नगर अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में होंगे और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत होकर असंभव रथ पर सवार असंभव बाण से मारना चाहे, तब ही उनकी मृत्यु होगी। इस वरदान से त्रिपुरासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गए और उन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे त्रिपुरासुर के वध के लिए प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने देवताओं को बताया कि त्रिपुरासुर का वध केवल भगवान शिव ही कर सकते हैं। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया। उन्होंने सभी देवताओं से अपना आधा बल प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एक असंभव रथ तैयार किया। इस रथ का रथनी सूर्य, चक्रचित्रकार चंद्रमा, सारथी ब्रह्मा जी, बाण भगवान विष्णु, धनुष मेरू पर्वत और डोर वासुकी नाग थे। अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में आने पर त्रिपुरासुर के तीन नगरों को भगवान शिव ने अपने बाण से भस्म कर दिया। इस प्रकार त्रिपुरासुर का वध हुआ और देवताओं को उनसे मुक्ति मिली। त्रिपुरासुर के वध का महत्व त्रिपुरासुर के वध का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह हिंदू धर्म में अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह भी बताता है कि भगवान शिव हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। Ganesh bhagwan:भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है? त्रिपुरासुर के वध से जुड़े कुछ अन्य तथ्य त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरासुर के वध की कथा को शिवपुराण में विस्तार से वर्णित किया गया है। काशी से देव दिवाली का संबंध काशी से देव दिवाली का संबंध त्रिपुरासुर के वध से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद, सभी देवता भगवान शिव के आशीर्वाद के लिए काशी पहुंचे। उन्होंने गंगा नदी में स्नान किया और भगवान शिव की पूजा की। इसके बाद उन्होंने गंगा नदी के तट पर दिवे जलाए और खुशियां मनाईं। इसी दिन से काशी में देव दीपावली मनाई जाने लगी। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है। इसलिए, देव दीपावली काशी में विशेष रूप से मनाई जाती है। देव दीपावली के दिन, काशी के घाटों पर लाखों दिवे जलाए जाते हैं। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। इस दिन, गंगा नदी में महाआरती भी की जाती है। देव दीपावली काशी के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार है। यह त्योहार अच्छाई की बुराई पर विजय और भगवान शिव की कृपा का प्रतीक है।

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Ganesh bhagwan:भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है?

Ganesh bhagwan भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है, इसके पीछे कई कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक राक्षस था जिसका नाम अनलासुर था। वह बहुत शक्तिशाली था और उसने देवताओं और ऋषियों को बहुत परेशान किया था। देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी। भगवान शिव ने कहा कि अनलासुर का वध केवल भगवान गणेश के द्वारा ही किया जा सकता है। गणेश जी की व्रत कथा |  Ganesh Chaturthi Vrat Katha In Hindi भगवान (Gansh)गणेश ने अनलासुर से युद्ध किया और उसे मार डाला। युद्ध के बाद, भगवान गणेश के पेट में बहुत जलन होने लगी। कश्यप ऋषि ने भगवान गणेश को दूर्वा खाने के लिए दी। दूर्वा खाने से भगवान गणेश के पेट की जलन दूर हो गई। तब से ही भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित की जाने लगी। एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश ने एक राक्षस का वध किया। उस राक्षस के शरीर से निकला विष भगवान गणेश के पेट में चला गया। विष के कारण भगवान गणेश के पेट में बहुत जलन होने लगी। देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी। भगवान शिव ने कहा कि भगवान गणेश को दूर्वा खाने के लिए दी जाए। दूर्वा खाने से भगवान गणेश के पेट की जलन दूर हो गई। तब से ही भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित की जाने लगी। भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करने के पीछे एक अन्य मान्यता भी है। मान्यता है कि दूर्वा एक पवित्र घास है जो भगवान गणेश को बहुत प्रिय है। दूर्वा को अमृता, अनंता और महौषधि भी कहा जाता है। दूर्वा अर्पित करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करते हैं।

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Shree Ram भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है, जानिए यह पौराणिक कथा

Shree Ram मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सनातन संस्कृति का आधार माना जाता है। भगवान श्री राम, विष्णु जी के अवतार हैं। रामचरित मानस के अनुसार, भगवान श्री राम के शासन काल को राम राज्य कहा जाता है। भगवान श्री राम ने अपने जीवन काल में हमेशा एक न्यायप्रिय और प्रजाप्रिय राजा की तरह शासन किया। भगवान श्री राम ने हमेशा “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।” के आधार पर अपना कर्तव्य निभाया। इसी कारण अपने पिता राजा दशरथ के कहने पर राज धर्म और वचन के पालन के लिए भगवान श्री राम 14 वर्षों के वनवास पर भी गए। अपने जीवन काल में भगवान श्री राम ने अपने वचन और धर्म को हमेशा अपने स्वार्थ से ऊपर रखा। Shree Ram मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। इसका अर्थ है कि वे मर्यादाओं के सर्वोच्च पुरुष हैं। भगवान श्री राम ने अपने जीवन में हमेशा मर्यादाओं का पालन किया। उन्होंने कभी भी अपने स्वार्थ के लिए मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया। भगवान श्री राम की मर्यादाओं के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं: भगवान श्री राम के गुण भगवान श्री राम में अनेक गुणों का समावेश है। वे एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श मित्र और आदर्श राजा थे। उनके कुछ प्रमुख गुण इस प्रकार हैं: भगवान श्री राम का महत्व भगवान श्री राम का जीवन सभी के लिए एक प्रेरणा है। उनके जीवन से हमें अनेक बातें सीखने को मिलती हैं। भगवान श्री राम हमें बताते हैं कि हमें हमेशा मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, अपने वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, दूसरों की मदद करनी चाहिए और क्षमाशील होना चाहिए। अयोध्या नगरी में हुआ श्री राम का जन्म राम चरित मानस और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में अयोध्या नगरी के रघुकुल वंश के राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या के घर में हुआ। राजा दशरथ कई वर्षों तक संतान सुख से वंचित रहे थे। इसके बाद ऋषि मुनियों द्वारा बताए गए उपायों को करने से राजा दशरथ की तीनों रानियों कौशल्या, केकैयी और सुमित्रा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माता कौशल्या के पुत्र भगवान श्री राम हुए जो श्री हरि के रूप थे। रानी केकैयी भरत की माता बनीं और माता सुमित्रा ने शेषनाग अवतार लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चार पुत्रों की प्राप्ति से राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पूरे अयोध्या नगरी में उत्सव मनाया और सभी अयोध्या वासियों को भी इस उत्सव का सहभागी बनाया। चंद्रमा को दिए वरदान के कारण कहलाए ‘रामचंद्र’ भगवान श्रीराम का रामचंद्र नाम भगवान श्री राम के जन्म के समय अयोध्या नगरी में अत्यधिक हर्षोल्लास था। स्वर्ग लोक के देवता भी भगवान विष्णु के धरती पर अवतार लेने से बहुत प्रसन्न थे। वे सभी अयोध्या नगरी में भगवान श्री राम के दर्शन करने के लिए आए थे। एक दिन भगवान विष्णु और अन्य देवताओं के साथ अयोध्या नगरी में एक उत्सव मनाया जा रहा था। इस उत्सव में भगवान सूर्य देव भी उपस्थित थे। उत्सव की शोभा देखकर भगवान सूर्य देव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अस्त होना भूल गए। इससे अयोध्या नगरी में रात नहीं हुई। रात ने भगवान विष्णु से कहा कि मैं भी आपके राम रूप के दर्शन करना चाहती हूं। तब भगवान विष्णु ने भगवान सूर्य देव से अस्त होने की प्रार्थना की। भगवान सूर्य देव ने भगवान विष्णु की प्रार्थना सुनकर अस्त होना शुरू किया। जब अयोध्या नगरी में रात हुई तब रात ने भगवान श्री राम से कहा कि सूर्य देव के कारण मुझे देरी से आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भगवान श्री राम ने इस देरी के फलस्वरूप रात को वरदान दिया कि इस जन्म में उनका रंग रात के रंग की तरह ही रहेगा। इसके बाद चंद्रदेव ने भी भगवान श्री राम से कहा कि सूर्यदेव के कारण मुझे भी आपके दर्शन पाने में देरी हो गई। भगवान श्री राम ने चंद्रदेव को भी यह वरदान दिया कि चंद्रदेव का नाम भगवान राम के नाम के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा। इसी कारण आज भी संसार में भगवान श्री राम को रामचंद्र जी के नाम से जाना जाता है। रामचंद्र ram नाम का अर्थ “राम” शब्द का अर्थ “सुख, शांति और आनंद” होता है। “चंद्र” शब्द का अर्थ “चाँद” होता है। अतः, रामचंद्र नाम का अर्थ हुआ “सुख, शांति और आनंद का चंद्रमा”। भगवान श्रीराम के इस नाम का अर्थ यह है कि वे संसार में सुख, शांति और आनंद के प्रतीक हैं। वे अपने भक्तों को सुख, शांति और आनंद प्रदान करते हैं। रामचंद्र नाम का महत्व Importance of name Ramchandra भगवान श्रीराम का रामचंद्र नाम बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह नाम उनके गुणों और उनकी लीलाओं को दर्शाता है। यह नाम उनके भक्तों के लिए आशीर्वाद और प्रेरणा का स्रोत है। भगवान श्री राम के रामचंद्र नाम का जाप करने से मन को शांति और आनंद प्राप्त होता है। यह नाम भक्तों को जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

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Poranik katha:श्री राम के अलावा इन 4 से भी हार गया था रावण

Ram:अधिकतर लोग यही जानते हैं कि रावण सिर्फ श्रीराम से ही हारा था, लेकिन ये सच नहीं है। रावण श्रीराम के अलावा शिवजी, राजा बलि, बालि और सहस्त्रबाहु से भी पराजित हो चुका था। यहां जानिए इन चारों से रावण कब और कैसे हारा था…… Poranik katha बालि से रावण की हार एक बार रावण (rawan) बालि से युद्ध करने के लिए पहुंच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकार रहा था, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न हो रही थी। जब रावण नहीं माना तो बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से आजाद नहीं हो पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था। Pauranik katha : कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो सहस्त्रबाहु ने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। सहस्त्रबाहु ने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और पानी छोड़ दिया, जिससे रावण पूरी सेना के साथ ही नर्मदा में बह गया था। इस पराजय के बाद एक बार फिर रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंच गया था, तब सहस्त्रबाहु ने उसे बंदी बनाकर जेल में डाल दिया था। Poranik katha राजा बलि के महल में रावण की हार दैत्यराज बलि पाताल लोक के राजा थे। एक बार रावण (rawan) राजा बलि से युद्ध करने के लिए पाताल लोक में उनके महल तक पहुंच गया था। वहां पहुंचकर रावण ने बलि को युद्ध के लिए ललकारा, उस समय बलि के महल में खेल रहे बच्चों ने ही रावण को पकड़कर घोड़ों के साथ अस्तबल में बांध दिया था। इस प्रकार राजा बलि के महल में रावण की हार हुई। shiv ji शिवजी से रावण की हार रावण (rawan) बहुत शक्तिशाली था और उसे अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड भी था। रावण इस घमंड के नशे में शिवजी को हराने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंच गया था। रावण ने शिवजी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन महादेव तो ध्यान में लीन थे। रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगा। तब शिवजी ने पैर के अंगूठे से ही कैलाश का भार बढ़ा दिया, इस भार को रावण उठा नहीं सका और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया। बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका। तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्रोत रच दिया। शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए और उसने रावण को मुक्त कर दिया।  मुक्त होने के पश्चात रावण ने शिवजी को अपना गुरु बना लिया।

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Poranik katha : जब सत्यभामा को हुआ रूप का घमंड

श्रीकृष्ण भगवान द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों  ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु! आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरूड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है? इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि भगवान! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है? Poranik katha भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट करने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़  से कहा कि हे गरूड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले  गए। इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी! आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते  हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।  Poranik katha भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए। गरूड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे  मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।  हनुमान ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा? खैर मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। पर यह क्या? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया।  तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र! तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?  हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु! आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें।  भगवान मन ही मन मुस्कुराने लगे।  हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया- हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है?  अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़जी तीनों का गर्व चूर-चूर  हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।  अद्भुत लीला है प्रभु की! अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त द्वारा ही दूर किया उन्होंने।

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काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ Masik Kalashtami Vrat 2023

काला अष्टमी कब है? | 2023 में कालाष्टमी व्रत तिथियाँ | Masik Kalashtami Vrat 2023 दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे Kalashtami 2023 Date:  सनातन धर्म में कालाष्टमी (kalashtami ) का बेहद ही महत्व होता है. हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन इसे मनाया जाता है. कालाष्टमी व्रत हर माह किया जाता है. कालभैरव के उपासक इस दिन भगवान काल भैरव का पूजन करते है. मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित कालभैरव मंदिर में विशेष अनुष्ठान किया जाता है. उपासक इन दिन उपवास रखते हैं. बिहार में इसे कालाष्टमी को कालभैरव जयन्ती के नाम से जाना जाता है, उत्तरी भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष के महीने में पड़ती है जबकि दक्षिणी भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक माह में पड़ती है. कालाष्टमी पूजा विधि (Kalashtami Puja Vidhi)भगवान काल भैरव को मानने वाले लोगों को इस दिन अलसुबह उठकर स्न्नान करना चाहिए. जिसके बाद भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. इस पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराने से घर में सुख समृद्धि आती है. इतना ही नहीं श्वान को भोजन कराने से भैरव बाबा सदा प्रसन्न होते हैं. कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं. Kalashtami 2023 december कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का एक रौद्र रूप माना जाता है. बाबा भैरव का पूजन करने से समस्त पापों और रोगों से छुटकारा मिलता है. सनातन शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा ताउम्र बनी रहती है.इस दिन व्रत रखने से कुंडली में मौजूद राहु के दोषों से भी छुटकारा मिलता है.

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Dev Uthani Ekadashi 2023:देवउठनी एकादशी इस बार बन रहे हैं ये तीन शुभ संयोग, भूलकर ना करें ये काम, विष्णु भगवान हो जायेंगे नाराज

सनातन परंपरा में जिस कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की देवोत्थान या फिर कहें देवउठनी एकादशी पर श्रीहरि अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसमें शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है, उसकी तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्री विष्णु की पूजा के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है, लेकिन इसका महत्व तब और ज्यादा बढ़ जाता है, जब यह कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में पड़ती है और देवउठनी या फिर देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है. हिंदू धर्म में देवउठनी को इसलिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है क्योंकि इसी भगवान श्री विष्णु चार महीने बाद अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसी के बाद शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. आइए देवोत्थान एकादशी तिथि की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम के बारे में विस्तार से जानते हैं. देवउठनी एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त देश की राजधानी दिल्ली के पंचांग के अनुसार इस साल कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी 22 नवंबर 2023 की रात्रि 11:03 बजे से प्रारंभ होकर 23 नवंबर 2023 की रात्रि 09:01 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल देवोत्थान एकादशी का पावन पर्व 23 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन 24 नवंबर 2023 को प्रात:काल 06:51 से 08:57 बजे के बीच किया जा सकेगा. गौरतलब है कि एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना जाता है. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि देवउठनी एकादशी पर भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए व्यक्ति को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए फिर उसके बाद उगते हुए सूर्य देवता को अर्घ्य देना चाहिए. इसके बाद भगवान श्री विष्णु के व्रत एवं पूजन का संकल्प करना चाहिए और अपने घर के ईशान कोण में उनकी विधि-विधान से फल-फूल, धूप-दीप, चंदन-भोग आदि अर्पित करके पूजा करनी चाहिए. देवउठनी एकादशी की पूजा में एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण जरूर करना चाहिए और सबसे अंत में श्रीहरि और माता लक्ष्मी की आरती करना चाहिए तथा अधिक से अधिक लोगों को इस व्रत एवं पूजा का प्रसाद बांटना चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना गया है, इसलिए व्रत के अगले दिन शुभ समय में पारण जरूर करें. देवउठनी पूजा का अचूक उपाय देवउठनी एकादशी वाले दिन व्यक्ति को भगवान श्री विष्णु के सामने घी का दीया जलाना चाहिए और उसके बाद पूरे घर-आंगन, छत और मुख्य द्वार पर दीया जरूर रखना चाहिए. हिंदू मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के दिन घर में देशी घी का दीया जलाने से घर में हमेशा सुख-शांति और सौभाग्य बना रहता है.

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Chhath puja:छठ पर्व की पौराणिक लोक कथाएं

छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। Chhath puja: छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्ययुक्त मूर्तियों की। एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्घा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्घति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। Chhath puja एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्घि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

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Pauranik katha : कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

आज रविवार है और सूर्यदेव का दिन है। आज जागरण आध्यात्म के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि भगवान सूर्य की उत्पति कैसे हुई। पृथ्वी के दो साक्षात देव हैं सूर्य और चंद्र। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं। Pauranik katha आज रविवार है और सूर्यदेव का दिन है। आज जागरण आध्यात्म के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि भगवान सूर्य की उत्पति कैसे हुई। पृथ्वी के दो साक्षात देव हैं सूर्य और चंद्र। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों के अनुसार, सूर्य को जगत की आत्मा माना गया है। इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही है। हिंदू धर्म में लोग सूर्य को जल का अर्घ्य देते हैं। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मन्त्र इत्यादि के बारे में बताया गया है। नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। आइए जानते हैं कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति। नाग पंचमी पौराणिक कथा (Nag Panchami Pauranik Katha) Pauranik katha : हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही हैं हिंदू धर्म में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता हैं। हिंदू धर्म पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मंत्र आदि के बारे में बताया गया हैं नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद मिलता हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में सूर्य देव की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं। हिंदू धर्म के मार्कंडेय पुराण के मुताबिक सारा जगत पहले प्रकाश रहित था। उस वक्त कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मुंह से सबसे पहला शब्द जो निकला वो था ॐ, यह सूर्य का तेज रूप सूक्ष्म रूप था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए। यह चारों ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह विश्व का अविनाशी कारण हैं सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण हैं ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। वही सृष्टि की रचना की गई तब ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र ​ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अदिति ने घोर तप किया। फिर सुषुम्ना नाम की किरण ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति ने चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन किया। इस ऋषि राज कश्यप क्रोधित हो गए। उन्होंने अदिति से कहा कि तुम इस तरह व्रत रख कर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा रही हो। इस तरह तुम शिशु को क्यों करना चा​हती हो। वही जब देवी अदिति ने यह सुना तो अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। फिर सूर्य देव शिशु रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम अन्डम कहा जाता था। इसके चलते ही इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया हैं।

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