Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री व्रत इन चीजों के बिना रह जाएगा अधूरा, अभी देख लें पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट

Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाओं के द्वारा रखा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रखने का विधान है। इस दिन महिलाएं व्रत रखकर सुखी दांपत्य जीवन और पारिवारिक सुख की कामना करती हैं। इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करके आपकी सभी कामनाएं पूरी हो सकती हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे वट सावित्री व्रत की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के बारे में।  वट सावित्री व्रत पूजा सामग्री Vat Savitri Vrat Pooja Material Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री व्रत की पूजा विधि वट सावित्री के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रतियों को स्नान-ध्यान करना चाहिए। इसके बाद वट वृक्ष के पास पहुंचकर सबसे पहले सत्यवान, सावित्री की तस्वीर या प्रतिमा वट वृक्ष की जड़ पर स्थापित करनी चाहिए। इसके बाद धूप, दीप जलाना चाहिए और उसके बाद फूल, अक्षत आदि आर्पित करना चाहिए। इस के उपरांत कच्चे सूत को लेकर कवट वृक्ष की 7 बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद अपने हाथ में भीगा हुआ चना आपको लेना चाहिए और वट सावित्री व्रत की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपको वस्त्र और भीगा हुआ चना अपनी सास को भेंट करना चाहिए, और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। इसके बाद वट वृक्ष का फल खाकर व्रत आपको तोड़ना चाहिए। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi व्रत तोड़ने के बाद सामर्थ्य अनुसार आपको दान भी करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि वट सावित्री व्रत के बाद दान करने से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं।  इस व्रत में क्यों होती है बरगद की पूजा Why is banyan tree worshiped during this fast?  Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट वृक्ष (बरगद) एक देव वृक्ष माना जाता है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश और ,सावित्री भी वट वृक्ष में रहते हैं. प्रलय के अंत में श्री कृष्ण भी इसी वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे. तुलसीदास ने वट वृक्ष को तीर्थराज का छत्र कहा है. ये वृक्ष न केवल अत्यंत पवित्र है बल्कि काफी ज्यादा दीर्घायु वाला भी है. लंबी आयु, शक्ति, धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर इस वृक्ष की पूजा होती है. पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इस वृक्ष को ज्यादा महत्व दिया गया है.  क्या करें विशेष? What to do special ? Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:एक बरगद का पौधा जरूर लगवाएं. बरगद का पौधा लगाने से पारिवारिक और आर्थिक समस्या नहीं होगी. निर्धन सौभाग्यवती महिला को सुहाग की सामग्री का दान करें. बरगद की जड़ को पीले कपड़े में लपेटकर अपने पास रखें. वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा का महत्व Importance of worshiping banyan tree in Vat Savitri fast पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमराज ने माता सावित्री के पति के पाण वट वृक्ष के नीचे ही लौटाये थे। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi इसके साथ ही यमराज ने सावित्री को 100 पुत्रों की प्राप्ति का वरदान भी दिया था। माना जाता है कि तब से ही वट सावित्री व्रत रखने की परंपरा शुरू हई और साथ ही वट वृक्षी की भी पूजा की जाने लगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति वट सावित्री का व्रत रखता है और इस दिन वट वृक्ष की परिक्रमा करता है उसे यमराज की कृपा के साथ ही त्रिदेवों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन तो सुखी रहता ही है, साथ ही योग्य संतान की प्राप्ति भी होती है। इसलिए आज भी महिलाओं के द्वारा इस दिन व्रत रखा जाता है। Vat Savitri Vrat Katha Hindi: इस कथा के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत,वट वृक्ष का क्या है महत्व जान लीजिए ? Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट

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श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश , भारत

श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर मुख्य रूप से भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के अरेरा कॉलोनी में एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर मुख्य रूप से भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। दक्षिण भारत के ​मंदिर की तरह बना यह मंदिर देखने में काफी खूबसूरत लगता है। मलाई मंदिर से कई लोग अंदाजा लगाते हैं कि यहां भगवान को मलाई का भोग लगाया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि तमिल भाषा में पहाड़ी को मलाई कहा जाता है। श्री मध्य स्वामी मंदिर पहाड़ी पर बने होने के कारण इसके नाम के साथ मलाई शब्द जोड़ा गया है। मंदिर में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यह मंदिर खासतौर पर दक्षिण भारतीय समुदाय द्वारा पुजनीय है। मंदिर में ज्यादातर तमिल, तेलगू, मलयालम व कन्नड़ समुदाय के लोग पूजन व दर्शन करने आते हैं। मंदिर में दिव्य भावनाएं व शांति का अनुभव होता है। Sri Madhya Swami Malai Temple:मंदिर का इतिहास बताया जाता है कि श्री मध्य स्वामीमलाई मंदिर की नींव श्री कांची कामकोटि पीठम के पूज्यश्री जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीजी के आशीर्वाद से साल 1978 में रखी गई थी। 6 साल में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ। साल 1984 में मंदिर को कुंभाभिषेकम के साथ पवित्र किया गया। इसके बाद साल 1997 व 2008 में मंदिर में कुंभाभिषेकम किए गए। कुंभाभिषेकम का अर्थ है अभिषेक समारोह, जोकि हिंदू मंदिरों में किया जाता है। इसका आध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व होता है। आमतौर पर कुंभाभिषेकम 12 साल में एक बार आयोजित किया जाता है। इसमें भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर का महत्व माना जाता है कि भगवान कार्तिकेय के आशीर्वाद से मनुष्य अपने शत्रु पर विजय हासिल करता है। मंदिर में दर्शन-पूजन से कार्यों में आ रही सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती है। मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय के इस मंदिर में दर्शन से भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मिलता है। भगवान कार्तिकेय का दूध से अभिषेक कराने पर शारीरिक कष्‍ट दूर हो जाते हैं। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर की वास्तुकला श्री मध्य स्वामीमलाई मंदिर को चोला शैली के अनुरूप बनाया गया है, जिसमें दक्षिण भारतीय वास्तुकला की झलक दिखाई देती है। मंदिर में स्थापित सभी मुख्य प्रतिमाएं काले ग्रेनाइट पत्थर से बनाई गई हैं। मंदिर की दीवारों पर छतों पर अद्भुत कलाकृतियां की गई हैं। दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमा व परिसर में लगे खंभों पर दक्षिण भारतीय कला का प्रदर्शन किया गया है। श्री मध्य स्वामी मलाई भगवान स्वामीनाथ या कार्तिकेय मंदिर के पीठासीन देवता हैं। आमतौर पर भगवान स्वामीनाथ को भगवान मुरुगन के रूप में जाना जाता है। हिंदू धर्म में मोर को भगवान स्वामीनाथ का वाहन माना जाता है इसलिए मंदिर में मोरों को पाला जाता है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर परिसर में अन्य देवी देवताओं के भी मंदिर हैं। इनमें गणेश जी, शिवजी, कामाक्षी देवी, नौ दिव्य ग्रह, हनुमान जी, भगवान वेंकटेश्वर, नाग देवता, श्रीकृष्ण व पादुका मंदिर शामिल है। श्री मध्य स्वामी मलाई मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 PM मंगलवार को भगवान कार्तिकेय विशेष अभिषेक का समय 09:30 AM – 10:00 AM एकादशी के दिन भगवान बालाजी के विशेष अभिषेक का समय 08:30 AM – 09:00 AM पूर्णिमा के दिन देवी कामाक्षी के विशेष अभिषेक का समय 06:00 PM – 06:30 PM मंदिर का प्रसाद भगवान कार्तिकेय का दूध से अभिषेक किया जाता है। भक्त भगवान को फूल व दक्षिण भारतीय परंपररागत कपड़ों में शामिल शॉल अर्पित करते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिर में स्थापित अन्य देवी देवताओं को नारियल, लड्डू, बताशा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai:इन सपनों को देखने से होता है भाग्योदय, कहीं आपको तो नहीं आते ऐसे सपने ?

Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai:स्वप्न शास्त्र के अनुसार, कुछ सपने ऐसे होते हैं जो आपके अच्छा समय का संकेत देते हैं। स्वप्न शास्त्र में सपनों में चार चीजों को देखने बहुत ही शुभ माना गया है। इस तरह के शुभ सपने आपके जीवन में धन संपत्ति और सुख समृद्धि का संकेत देते हैं। आइए जानते हैं सपने में किन चीजों को देखना है धन लाभ का संकेत। Shubh Sapne: सपनों की विचित्र दुनिया को समझना सरल नही है। सपने व्यक्ति को भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत देते हैं। कुछ सपने शुभ और कुछ सपने अशुभ फल देने वाले होते हैं। स्वप्न शास्त्र में कुछ ऐसे सपनों के बारे में बताया गया है जिन्हें देखने से आप अंदाजा लगा सकता है कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में कुछ चीजों का दिखाई देना बहुत ही शुभ फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं ऐसे सपनों के बारे में जिन्हें देखने पर आप पता लगा सकते हैं कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai:स्वप्न शास्त्र के अनुसार, बेहद शुभ हैं ये सपने – सपने में आम का दिखना (Sapne me mango dekhna) स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में आम का दिखना बेहद शुभ माना जाता है। इस सपने का अर्थ है कि आपके जीवन की समस्याओं का अंत होने वाला है। साथ ही आपके उन्नति के मार्ग खुलने वाले हैं। इसके अलावा आप जिस कार्य के लिए लंबे समय से परेशान थे, वो अब जल्द पूरा होने वाला है।   सपने में कौआ देखना (Sapne Me crow Dekhna) स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में कौआ को उड़ते हुए देखना बहुत अच्छा माना जाता है। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai ऐसा कहा जाता है कि यह सपना जातक के बुरे दिनों के अंत और अच्छे भविष्य की ओर संकेत देता है। अगर आपको भी ऐसा सपना आया है, तो आपको खुश हो जाना चाहिए। साथ ही इसे दूसरे व्यक्ति से बताने से बचना चाहिए।   सपने में कमल का फूल दिखना (Sapne me louts ka fool dekhna) स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में कमल का फूल दिखना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में कमल को माता लक्ष्मी और धन  का प्रतीक माना जाता है। इस सपने का अर्थ है कि आपके जीवन की मुश्किलें समाप्त होने वाली हैं। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai साथ ही आपको मनचाहा कारोबार प्राप्त होने वाला है। अगर आपको ऐसा कोई सपना आता है, तो समझ जाइए कि धन की देवी आप पर मेहरबान हैं। सपने में बांसुरी का स्वर सुनाई देना (Sapne me flute ka music sunai dena) ऐसा कहा जाता है कि यदि आपको कभी सपने में बांसुरी का स्वर सुनाई दे या फिर आप खुद को बांसुरी बजाते हुए देखते हैं, तो यह एक शुभ संकेत है, क्योंकि बांसुरी को शुभता और मधुरता का प्रतीक माना जाता है। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai अगर कभी आपको ऐसा सपना आता है, तो इसका मतलब कि आपके रिश्ते मधुर होने वाले हैं। साथ ही आपके जीवन में खुशहाली आने वाली है। सपने में दूध से स्नान करते हुए देखना (Sapne me doodh se snan karte huye dekha) सपने में खुद को दूध से स्नान करते हुए यदि कोई व्यक्ति देखता है तो यह बहुत ही शुभ माना गया है। इस तरह का सपने आने का मतलब है कि आपको कोई बड़ी धन लाभ मिल सकता है। इस तरह के सपने आपके अच्छे करियर की तरफ भी इशारा करते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आने पर आपके लिए तरक्की के द्वार खुलते हैं। साथ ही आपको उन्नति मिलने लगती है। इस तरह के सपने आपकी अच्छी आर्थिक स्थिति की तरफ भी इशारा करते हैं। सपने में बरसात देखना (Sapne me barsat dekhna) Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai अक्सर लोगों को सपने में बारिश होती दिखाई देती है। स्वप्न शास्त्र में इस तरह के सपनों को भी बहुत शुभ और धनवान बनाने वाला बताया गया है। इस तरह का सपने आने पर आपको अचानक धन लाभ मिल सकता है। Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai आपको अपने किसी पुराने निवेश से लाभ मिलने का संकेत भी इस तरह के सपने देते हैं। साथ ही बारिश का दिखना आपके जीवन में आपके लव पार्टनर के आने का इशारा भी करता है। सपने में अच्छा खाना देखना (sapne me achha khana dekhna) सपने में यदि आपको अच्छा-अच्छा खाना दिखाई देता है जिसका सेवन आप कर रहे हों। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आपके अच्छे समय शुरू होने का संकेत देते हैं। इस तरह का सपना दिखाई देने का अर्थ है Kaun Sa Sapna Dekhna Shubh Hota Hai कि आपको बड़ी मात्रा में धन लाभ हो सकता है। साथ ही आपको कोई शुभ समाचार भी सुनने को मिल सकता है। साथ ही इस तरह के सपने मन में संतुष्टि के भाव को दर्शाते हैं।

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Vat Savitri Vrat Katha Hindi: इस कथा के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत,वट वृक्ष का क्या है महत्व जान लीजिए ?

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi: वट सावित्री व्रत कथा में बरगद के पेड़ का विशेषतौर पर उल्लेख मिलता है। सुहागिनें वट सावित्री व्रत कथा वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के नीचे सुनती हैं। इसके अलावा वट वृक्ष की पूजा भी की जाती है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में बरगद का महत्व क्या है। वट सावित्री पर सुहागिनें अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती हैं। वट सावित्री पर वट सावित्री के वृक्ष के साथ सत्यवान और सावित्री की पूजा भी की जाती है। साथ ही ही विधि-विधान के साथ पूजा करके वट सावित्री व्रत वट वृक्ष के नीचे कथा सुनी और सुनाई जाती है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि Vat Savitri Vrat Katha Hindi वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ का बहुत महत्व होता है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में वट वृक्ष का क्या महत्व होता है। Vat savitri vrat katha in hindi Vat Savitri Vrat Katha Hindi पुराणों में वर्णित सावित्री की कथा इस प्रकार है- राजा अश्वपति की अकेली संतान का नाम था सावित्री। सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के बेटे सत्यवान को से विवाह किया। विवाह से पहले उन्हें नारद जी ने बताया कि सत्यवान के आयु कम है, तो भी सावित्री अपने फैसले से डिगी नहीं। वह सत्यवान के प्रेम में सभी राजसी वैभव त्याग कर  उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में रहने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi जिस दिन सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था, उस दिन वह लकड़ियां काटने जंगल गए।  वहां मू्च्छिछत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। तीन दिन से उपवास में रह रही सावित्री उस घड़ी को जानती थीं, अत: बिना परेशान हुए  यमराज से सत्यवान के प्राण वापस देने की प्रार्थना करती रही, लेकिन यमराज नहीं माने। तब सावित्री उनके पीछे-पीछे ही जाने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानीं, तो सावित्री के साहस और त्याग से यमराज प्रसन्न हुए और कोई तीन वरदान मांगने को कहा। Vat Savitri Vrat Katha Hindi सावित्री ने सत्यवान के दृष्टिहीन  माता-पिता के नेत्रों की ज्योति मांगी, उनका छिना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए 100 पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने के बाद यमराज समझ गए कि सावित्री के पति को साथ ले जाना अब संभव नहीं। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से अंतर्धान हो गए। Vat Savitri Vrat Katha Hindi उस समय सावित्री अपने पति को लेकर वट वृक्ष के नीचे ही बैठी थीं।इसीलिए इस दिन महिलाएं अपने परिवार और जीवनसाथी की दीर्घायु की कामना करते हुए वट वृक्ष को भोग अर्पण करती हैं, उस पर धागा लपेट कर पूजा करती हैं।   Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट वट वृक्ष की पूजा करने से यमराज और त्रिदेवों की मिलती है कृपा (By worshiping banyan tree one gets blessings of Yamraj and Trinity.) वट सावित्री व्रत कथा बरगद के पेड़ के नीचे की जाती है। इसका कारण यह है मान्यतानुसार वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ पर यमराज निवास करते हैं। इससे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु के लिए यमराज से प्रार्थना करती है। साथ ही बरगद के पेड़ पर त्रिदेव भी निवास करते हैं। ऐसे में माना जाता है कि जिस व्यक्ति के सिर पर त्रिदेव का हाथ होता है, उसका मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। बरगद पेड़ की छाल में भगवान विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और इसकी शाखाओं में भगवान शिव वास करते हैं। ​यमराज ने वटवृक्ष के नीचे लौटाए थे सत्यवान के प्राण (Yamraj had returned Satyavan’s life under the banyan tree) जब सावित्री के पति सत्यवान के प्राण यमराज ने हर लिए थे, तो सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण लौटाने के लिए प्रार्थना की थी। पौराणिक मान्यता है कि तब यमराज ने वट वृक्ष के नीचे ही सत्यवान के प्राण लौटाकर सत्यवती को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। यमराज ने बरगद की जड़ों में सत्यवान के प्राण को जकड़कर रखा हुआ था। यमराज के प्राण लौटाए जाने के बाद से सुहाग की दीर्घायु के लिए वट वृक्ष के नीचे प्रार्थना की जाती है। ​वट वृक्ष में कलावा बांधने से टल जाती है अकाल मृत्यु (​Untimely death is averted by tying Kalawa to the banyan tree) वट सावित्री व्रत कथा के बाद वट वृक्ष में 7 बार कलावा लपेटकर बांधा जाता है। वट वृक्ष की 7 परिक्रमा करने को पति-पत्नी के सात जन्मों के सम्बधों से जोड़कर देखा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि बरगद के पेड़ में कलावा बांधने से अकाल मृत्यु भी टल जाती है। ​वट वृक्ष की पूजा करने से शनि की पीड़ा से मिलती है मुक्ति (By worshiping banyan tree one gets relief from the pain of Saturn) वट सावित्री के दिन शनि जयंती भी है। Vat Savitri Vrat Katha Hindi ऐसे में वट सावित्री का महत्व और भी बढ़ जाता है। वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार शनि की साढ़े साती की वजह से ही सत्यवान के प्राण शनिदेव के भाई यमराज ले गए थे, इसलिए वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की पूजा करने से शनिदेव की वक्री दृष्टि से भी मुक्ति मिलती है। शनिदेव की कृपा पाने के लिए भी वट सावित्री पर बरगद की पूजा की जाती है। ​बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है(Banyan tree is full of medicinal properties) Vat Savitri Vrat Katha Hindi बरगद के पेड़ का धार्मिक महत्व ही नहीं बल्कि बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके पत्तों से निकलने वाले दूध को चोट, मोच या सूजन पर दिन में दो से तीन बार लगाकर मालिश करने से चोट पूरी तरह से ठीक हो जाती है। आयुर्वेद में भी बरगद के पेड़ के औषधीय गुण बताए गए हैं।

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Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट

Vat Savitri Vrat 2025 Date:ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अमावस्या पर वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat 2025) किया जाता है। इस पर्व के आने का सुहागिन महिलाएं बेसब्री से इंतजार करती हैं। Vat Savitri Vrat 2025 Date:यह त्योहार वट यानी बरगद के पेड़ से जुड़ा है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को भूलकर भी काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए। साथ ही व्रत के नियम का पालन करना चाहिए। Vat Savitri 2025 date : हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है. ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है और जीवन में सुख-समृद्धि (sukh samridhi) बनी रहती है. इस साल वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि यानी 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. ऐसे में आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत (vat savitri vrat kab hai ) का मुहूर्त और पूजा (vat savitri puja vidhi) विधि.  Vat Savitri vrat 2025 : वट सावित्री का व्रत कैसे रखें जानिए यहां पर विधि और मुहूर्त कब है वट सावित्री – when is Vat Savitri Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस साल आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत का मुहूर्त और पूजा विधि.  ज्येष्ठ माह के अमावस्या तिथि यानी 26 मई 2025 को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट पर शुरु होगी, जो मई 27 को रात 8 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. उदयातिथि के अनुसार, वट सावित्री का व्रत 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. पंचांग (panchag) सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 27 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 07 बजकर 11 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 44 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 36 मिनट से 03 बजकर 31 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 07 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 36 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर से 58 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त- 11 बजकर 52 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक वट सावित्री व्रत कैसे रखें – How to keep Vat Savitri fast इस दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और फिर सूर्य को अर्घ्य दीजिए. इसके बाद व्रती महिलाएं श्रृंगार करके वट वृक्ष के नीचे साफ-सफाई करके और पूजा की शुरूआत करें. अब आप धूप, अगरबत्ती जलाएं और वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और Vat Savitri Vrat 2025 Date वट सावित्री व्रत का पाठ करिए. इसके बाद भोग लगाइए, अंत में गरीब लोगों में अन्न और धन का दान करिए, इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है. वट सावित्री व्रत के दौरान किसी से वाद-विवाद न करिए और किसी के बारे में गलत न सोचिए और न ही अपमान करिए.  वट सावित्री व्रत के लिए (Vat Savitri Vrat samagri List) आप देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, सिंदूर, हल्दी और मिठाई शामिल करिए.   वट सावित्री व्रत सामग्री लिस्ट (Vat Savitri Vrat Samagri List) Vat Savitri Vrat 2025 Date:देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, पान, सिंदूर, हल्दी और मिठाई आदि। वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi) Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। Vat Savitri Vrat 2025 Date इसके बाद शृंगार करें। अब वट वृक्ष के पेड़ की सफाई कर पूजा की शुरुआत करें। धूप, अगरबत्ती आदि जलाएं। वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा लगाएं। Vat Savitri Vrat 2025 Date व्रत कथा का पाठ करें। आरती कर भोग लगाएं। आखिरी में मंदिर या गरीब लोगों में अन्न और धन समेत आदि चीजों का दान करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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शीतला माता मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

Sheetla Mata Mandir:शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। Sheetla Mata Mandir:शीतला माता मंदिर इंदौर से 55 किमी की दूरी पर मानपुर के रामपुरिया बुजर्ग गांव में स्थित है शीतला माता मंदिर। इस मंदिर से केवल 3 किमी की दूरी पर है शीतला माता जलप्रपात। जो भक्त यहाँ माता के दर्शन करने आते हैं। वह दर्शन के साथ साथ प्रकृति का भी आनंद लेते हैं। माता का यह मंदिर अति प्राचीन है और यह हजारों फ़ीट नीचे खाई में एक गुफा में स्थित है। शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास शीतला माता मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। मंदिर के स्थापत्य की कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि माता की प्रतिमा स्वयं से प्रकट हुई हैं। यह प्रतिमा 1000 साल पुरानी है। किदवंती यह भी है कि इस मंदिर का जीर्वोद्धार सन् 1857 में किया गया था। मंदिर का महत्व इस मंदिर कि ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर माता के दर्शन करने के लिए शेर आता है और वह माता के दर्शन करके चला जाता है। कहा जाता है कि माता भक्तों के दुःख और मुसीबतों को दूर करती हैं। इस स्थान पर तीन खूबसूरत गुफाएं भी हैं और यह भी माना जाता है कि होल्कर राज्य के पिंडारी यहीं छिपे थे। स्कंद पुराण के अनुसार शीतला माता चेचक रोग की देवी हैं, जो सभी भक्तों के चेचक रोग को हर लेती हैं। मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो मंदिर बहुत ही प्राचीन है और यह एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। इस कारण यहाँ पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकता है। वहीं पाषाण रूप में शीतला माता विराजित है। उनका रंग सिंदूरी है। गुफा में प्रवेश करने पर आप माता के दर्शन कर सकते है। मंदिर के पास ही बहुत खूबसूरत झरनें भी है। मंदिर में भगवान शिव की पिंडी भी विराजित हैं। साथ ही नंदी जी भी विराजमान हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव का यह रूप नेपाल के पशुपतिनाथ के जैसा ही है। मंदिर का समय शीतला माता मंदिर खुलने का समय 08:00 AM – 05:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में चना चिरौंजी ,लड्डू का भोग लगाया जाता है। आप माता को चुनरी भी चढ़ा सकते है। पुष्प भी अर्पण किये जाते है।

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Matsya Stotram:मत्स्य स्तोत्रम्

Matsya Stotram मत्स्य स्तोत्रम्: मत्स्य पुराण में देवताओं और असुरों के बीच निरंतर युद्ध की कहानी बताई गई है। देवता हमेशा असुरों को हरा देते थे। अपमानित होकर, असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने असुरों को अजेय बनाने के लिए मृत्युंजय स्तोत्र या मंत्र प्राप्त करने के लिए शिव के पास जाने का फैसला किया। इस बीच, उन्होंने असुरों से अपने पिता भृगु के आश्रम में शरण लेने के लिए कहा। देवताओं ने शुक्राचार्य की अनुपस्थिति को एक बार फिर असुरों पर हमला करने का सबसे उपयुक्त समय पाया। भृगु स्वयं दूर थे, इसलिए असुरों ने उनकी पत्नी की मदद मांगी। अपनी शक्तियों का उपयोग करके, उसने इंद्र को स्थिर कर दिया। बदले में, Matsya Stotram इंद्र ने भगवान विष्णु से उससे छुटकारा पाने की अपील की। ​​विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काटकर उसकी इच्छा पूरी की। जब ऋषि भृगु ने देखा कि उनकी पत्नी के साथ क्या हुआ है, तो उन्होंने श्राप दिया कि विष्णु पृथ्वी पर कई बार जन्म लेंगे और सांसारिक जीवन के कष्टों को भोगेंगे। इसलिए, विष्णु ने अवतारों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया। मत्स्य स्तोत्रम एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “स्तुति, स्तुति या स्तुति का भजन”। यह भारतीय धार्मिक ग्रंथों की एक साहित्यिक शैली है जिसे मधुरता से गाया जाता है, शास्त्रों के विपरीत जो सुनाए जाने के लिए रचे जाते हैं। ब्रह्मांड के नवीनतम पुनर्निर्माण से पहले जलप्रलय के दौरान, ब्रह्मा द्वारा पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक चार वेद (पवित्र शास्त्र) गहरे पानी में डूब गए थे। भगवान विष्णु ने पवित्र शास्त्रों को पुनः प्राप्त करने के लिए एक मछली का रूप धारण किया। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, अपने मत्स्य अवतार में विष्णु ने मनु (प्रत्येक सृष्टि में मानव जाति के पूर्वज) को एक विशाल नाव बनाने और उसमें सभी प्रजातियों के नमूने इकट्ठा करने का निर्देश दिया। फिर मत्स्य स्तोत्रम ने जलप्रलय और बाढ़ के बीच जहाज को सुरक्षित निकाला ताकि ब्रह्मा पुनर्निर्माण का काम शुरू कर सकें। एक महान जलप्रलय की कहानी पृथ्वी भर में कई सभ्यताओं में पाई जाती है। Matsya Stotram यह अक्सर बाढ़ और नूह के जहाज़ की उत्पत्ति कथा से संबंधित है। मछली की आकृति और शास्त्रों को राक्षस से बचाना हिंदू कथा में जोड़ा गया है। प्राचीन सुमेर और बेबीलोनिया, ग्रीस, अमेरिका के माया और अफ्रीका के योरूबा की कहानियों में भी बाढ़ के ऐसे ही मिथक मौजूद हैं। मत्स्य स्तोत्रम के लाभ उनकी पूजा करने से, उनकी कृपा से आम तौर पर व्यक्ति को स्वास्थ्य, धन, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है और मत्स्य स्तोत्रम् विशेष रूप से व्यक्ति दुर्लभ त्वचा रोगों से ठीक हो जाता है Matsya Stotram और प्रचुर धन प्राप्त करता है। जहाँ भी भगवान श्री मत्स्यनारायण की उपस्थिति होती है, वहाँ सभी वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं। किसको इस स्तोत्रम का पाठ करना चाहिए जो लोग त्वचा रोगों से पीड़ित हैं, गरीबी का सामना कर रहे हैं और वास्तु दोष से प्रभावित हैं, Matsya Stotram उन्हें इस मत्स्य स्तोत्रम का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। मत्स्य स्तोत्रम् हिंदी पाठ Matsya Stotram in Hindi श्रीगणेशाय नमः । नूनं त्वं भगवान् साक्षाद्धरिर्नारायणोऽव्ययः ।अनुग्रहायभूतानां धत्से रूपं जलौकसाम् ॥ १ ॥ नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ स्थित्युत्पत्यप्ययेश्वर ।भक्तानां नः प्रपन्नानां मुख्यो ह्यात्मगतिर्विभो ॥ २ ॥ सर्वे लीलावतारास्ते भूतानां भूतिहेतवः ।ज्ञातुमिच्छाम्यदो रूपं यदर्थं भवता धृतम् ॥ ३ ॥ न तेऽरविन्दाक्षपदोपसर्पणंमृषा भावेत्सर्व सुहृत्प्रियात्मनः ।यथेतरेषां पृथगात्मनां सतां-मदीदृशो यद्वपुरद्भुतं हि नः ॥ ४ ॥ ॥ इति मत्स्य स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Mangal Chandika Stotram:मंगल चण्डिका स्तोत्र

Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र: मंगल चंडिका स्तोत्र की सहायता से विवाह और कार्य बाधा दूर करने के लिए यह स्तोत्र मांगलिक जातकों के लिए मंगल के कारण विवाह, कार्य संबंधी बाधाओं को दूर करने का एक अनिवार्य उपाय है। मंगल चंडिका स्तोत्र का वर्णन ब्रह्मवर्त पुराण में मिलेगा। मंगल चंडिका स्तोत्र पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मंगल चंडिका स्तोत्र का एक लाख बार जाप करने से उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चंडिका देवी को महात्म्य की सर्वोच्च देवी माना जाता है। दुर्गा सप्तशती में चंडिका देवी को चामुंडा या माता दुर्गा कहा गया है। चंडिका देवी महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती का मिश्रित रूप हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करता है, उसे धन, व्यापार, आवास आदि की समस्या नहीं होती है। जिस व्यक्ति के विवाह में समस्या आ रही हो, कहा जाता है कि नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करने से विवाह संबंधी परेशानी दूर होती है। मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। मंगल चंडिका स्तोत्र के लाभ: कर्ज से मुक्ति पाने के लिए या कर्ज के जाल में फंसने से बचने के लिए। लक्ष्मी स्थिर रखने और अपनी आर्थिक स्थिति को स्थिर बनाने के लिए और कभी भी धन की कमी का सामना न करने और भौतिक कष्टों का सामना किए बिना संतुष्ट और खुशहाल जीवन जीने के लिए। घरेलू कलह को दूर करें और परिवार के भीतर बहस, लड़ाई, मतभेद और असहमति से बचें। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र किसी भी तरह के पति-पत्नी के विवाद को दूर करने में बहुत प्रभावी है। घर, जमीन और संपत्ति से जुड़े किसी भी तरह के विवाद को टालने के लिए। Mangal Chandika Stotram घर से वास्तु दोष को दूर करने और अन्य हानिकारक और बुरी ऊर्जाओं को बाहर निकालने तथा घर के माहौल को खुशहाल और समृद्ध बनाने के लिए। विवाह में बाधा या देरी पैदा करने वाली किसी भी बाधा या समस्या को दूर करें। मंगल चंडिका स्तोत्र विशेष रूप से मांगलिक दोष को दूर करने में प्रभावी है, जो विवाह योग्य आयु के किसी भी लड़के या लड़की के लिए उपयुक्त वर को समाप्त करने में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है। पारंपरिक भारतीय और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ मंगल के हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए मंगल चंडिका स्तोत्र की उपासना सबसे अधिक लाभकारी है। Mangal Chandika Stotram:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ: विवाह या किसी भी विवाहेतर संबंध में समस्याओं का सामना करने वाले व्यक्ति को नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। मंगल चण्डिका स्तोत्र हिंदी पाठ:Mangal Chandika Stotra in Hindi ‘चण्डी’ शब्द का प्रयोग ‘दक्षा’ (चतुरा) के अर्थ में होता है Mangal Chandika Stotram और ‘मंगल′शब्द कल्याण का वाचक है। जो मंगल-कल्याण करने में दक्ष हो, वही “मंगल-चण्डिका” कही जाती है। ‘दुर्गा’ के अर्थ में भी चण्डी शब्द का प्रयोग होता है और मंगल शब्द भूमि-पुत्र मंगल के अर्थ में भी आता है। अतः जो मंगल की अभीष्ट देवी है, उन देवी को ‘मंगल-चण्डिका’ कहा गया है। मनुवंश में ‘मंगल′नामक राजा थे। सप्त-समुन्द्र पर्यन्त पृथ्वी उनके शासन में थी। उन्होंने इन देवी को अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिए भी ये ‘मंगल-चण्डी’ नाम से विख्यात हुई। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी ‘दुर्गा’ कहलाती हैं, Mangal Chandika Stotram उन्हीं का यह रुपान्तर है। ये देवी कृपा की मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियों की ये इष्टदेवी हैं। Mangal Chandika Stotram:मंगल-चण्डिका-स्तोत्र मन्त्र – ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ॥  (२१ अक्षर)(देवीभागवत,नवम स्कन्ध, अध्याय 47 के अनुसार मन्त्र इस प्रकार है – ॥ ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा ॥ ध्यान – देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ।सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं  मनोहराम् ॥ श्वेतचम्पकवर्णाभा चन्द्रकोटि-समप्रभाम् ।वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ॥ बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् ।विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥ ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् ।जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥ संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे ।देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने ।प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः ॥ ‘अर्थात’ सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चण्डिका सदा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। Mangal Chandika Stotram ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ। शंकर उवाच – रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि  मंगलचण्डिके ।हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके ॥ हर्ष–मंगल–दक्षे चहर्ष-मंगल-चण्डिके ।शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके ॥ मंगले मंगलार्हे चसर्व-मंगल-मंगले ।सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते ।पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥ मंगलाधिष्ठातृदेविमंगलानां च मंगले ।संसार-मंगलाधारे मोक्ष–मंगल-दायिनी ॥ सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ।प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे ॥ स्तोत्रेणानेनशम्भुश्चस्तुत्वा मंगलचण्डिकाम् ।प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ॥ देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः ।तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमंगलम् ॥ ॥ इति मंगल चण्डिका स्तोत्र सम्पूर्णंम् ॥ (ब्रह-वैवर्त्त-पुराण। प्रकृतिखण्ड। ४४। २०-३६) महादेवजी ने कहा – ‘जगन्माता भगवती Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और Mangal Chandika Stotram मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चण्डिका, मंगला, मंगला तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो।

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Vrat 2025 :Mohini Ekadashi जीवन में नहीं चाहते कोई कमी? तो मोहिनी एकादशी के दिन करें इन चीजों का दान

Mohini Ekadashi:आपको बता दें कि एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाले सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है. आप 8 मई को पड़ने वाली मोहिनी एकादशी के दिन विधिवत रूप से तुलसी की पूजा करते हैं, तो इससे आपको धन-समृद्धि का आशीर्वाद मिल सकता है. हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की सभी तिथि को बेहद खास माना जाता है, जिनमें एकादशी तिथि भी शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) का व्रत करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। Mohini Ekadashi 2025 : हिन्दू धर्म के मानने वालों के लिए एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है. यह व्रत महीने में दो बार आता है यानी 1 साल में 24 एकादशी व्रत रखा जाता है. वहीं, अगर अधिकमास होता है तो 26 एकादशी पड़ती है. आपको बता दें कि एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाले सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है. आप 8 मई को पड़ने वाली मोहिनी एकादशी के दिन विधिवत रूप से तुलसी की पूजा करते हैं, तो इससे आपको धन-समृद्धि का आशीर्वाद मिल सकता है. मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है और विशेष दान चीजों का दान भी जरूर करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि Mohini Ekadashi मोहिनी एकादशी के दिन दान करने से आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है और धन लाभ के योग बनते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि मोहिनी एकादशी के दिन किन चीजों का दान करना चाहिए? Bada Mangal 2025 Mai Kab Hai: कब शुरू होगा बड़ा मंगल? जानें इसका महत्व, पूजा विधि और डेट मोहिनी एकादशी पर कैसे करें तुलसी की पूजा- How to worship Tulsi on Mohini Ekadashi इन बातों का रखें ख्याल(take care of these things) आप इस दिन तुलसी के पौधे में जल जरूर अर्पित करिए. हालांकि धार्मिक मान्यता है कि तुलसी में जल अर्पित करने से व्रत खंडित हो सकता है क्योंकि तुलसी देवी निर्जला व्रत रखती हैं.  मोहिनी एकादशी पारण का समय 2025 – Mohini Ekadashi Parana Time 2025 मोहिनी एकादशी व्रत के पारण का समय 09 मई, 2025 को रखा जाएगा. पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 5:34 मिनट से सुबह 8:16 मिनट तक रहेगा. इस दौरान आप भगवान विष्णु का ध्यान करके व्रत खोल सकते हैं.  बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा(Goddess Lakshmi’s blessings will remain) धार्मिक मान्यता के अनुसार, Mohini Ekadashi मोहिनी एकादशी के दिन गरीब लोगों में कपड़ों का दान करने का खास महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी तिथि पर कपड़ों का दान करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। घर में बनी रहेगी सुख-शांति(There will be peace and happiness in the house) सनातन धर्म में तुलसी का पौधा पूजनीय है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पौधे में धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होता है। ऐसे में तुलसी को मोहिनी एकादशी के दिन दान कर सकते हैं। तुलसी दान करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है। Mohini Ekadashi साथ ही साधक पर मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। हमेशा पैसों से तिजोरी भरी रहेगी। वैवाहिक जीवन होगा खुशहाल(Married life will be happy) अगर आप वैवाहिक जीवन में खुशियों का आगमन चाहते हैं, तो मोहिनी एकादशी की पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को सिंदूर, बिंदी और चूड़ियां समेत आदि चीजों का दान करें। इसके बाद इन चीजों को किसी सुहागिन महिलाओं को दान में दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मोहिनी एकादशी के दिन इन चीजों का दान करने से वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और साथ पति-पत्नी के रिश्ते मजबूत होते हैं। साल की सभी एकादशी का नाम – Name of all Ekadashi of the year तुलसी मंत्र(Tulsi Mantra)

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Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:आज बगलामुखी जयंती पर करें इस विशेष स्तोत्र का पाठ, पाएं चमत्कारी फल

Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:बगलामुखी जयंती इस साल 5 मई, सोमवार के दिन पड़ रही है। इस दिन माता पार्वती के बगलामुखी स्वरूप की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मां बगलामुखी की पूजा से नकारात्मकता दूर हो जाती है और व्यक्ति में शक्ति का संचार होता है। इसके अलावा, मां बगलामुखी की पूजा के दौरान उनके स्तोत्र का पाठ करना भी बहुत लाभकारी माना जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से कि मां बगलामुखी के स्तोत्र और उससे मिलने वाले लाभों के बारे में विस्तार से। Baglamukhi Jayanti 2025: हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती का आयोजन किया जाता है. इस वर्ष यह जयंती 5 मई 2025, सोमवार को मनाई जा रही है. Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 बगलामुखी जयंती देवी बगलामुखी की पूजा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. यह दिन तंत्र साधना, शत्रुओं का नाश और विजय प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में आठवीं शक्ति के रूप में जानी जाती हैं, जिन्हें “स्तंभन शक्ति” का स्वरूप माना जाता है. इनकी पूजा से शत्रुओं का नाश, वाणी में प्रभाव और जीवन में विजय की प्राप्ति होती है. Baglamukhi Jayanti 2025: मां बगलामुखी की आराधना से नकारात्मकता समाप्त होती है और व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होता है. इसके अतिरिक्त, मां बगलामुखी की पूजा के समय उनके स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है. Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:बगलामुखी जयंती 2025 मां बगलामुखी स्तोत्र का पाठ इस पावन अवसर पर यदि “बगलामुखी स्तोत्र” का श्रद्धा भाव से पाठ किया जाए, Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 तो साधक को अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं. नीचे प्रस्तुत है एक प्रभावशाली स्तोत्र, जिसका जयंती पर पाठ अवश्य करना चाहिए: Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा बगलामुखी स्तोत्र (संक्षिप्त रूप) (Bagalamukhi Stotra (short form)) मां बगलामुखी की आराधना से नकारात्मकता समाप्त होती है और व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होता है. इसके अतिरिक्त, मां बगलामुखी की पूजा के समय उनके स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है. बगलामुखी जयंती आज, इस शुभ मुहूर्त में करें पूजा (Baglamukhi Jayanti today, worship at this auspicious time) ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भयजिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा. देवि सर्वे भवेत्‍वाम् शरणं प्रपन्‍नाः.शत्रुन्मुखे वाणीं तव प्रभावेन स्तम्भय.न्यायालये विवादे, रणभूमौ वा समराङ्गणे.जयं दत्वा रक्ष मां, स्तम्भय शत्रूनसङ्गमे॥ पीताम्बरा धारिणीं, वज्र-नख-कटाक्षिणीम्.स्तम्भिनीं शत्रुहन्त्रीं, बगलां शरणं व्रजे॥ Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 भक्तों को इस स्तोत्र का पाठ स्नान के बाद, पीले वस्त्र धारण करके, Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 हल्दी की माला से पीले आसन पर बैठकर करना चाहिए. देवी को पीले फूल, चने की दाल, और हल्दी से निर्मित प्रसाद अर्पित करें. बगलामुखी जयंती के अवसर पर इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक के जीवन से भय, विघ्न और शत्रुओं की बाधाएं समाप्त होती हैं. वाणी में सिद्धि, निर्णयों में विजय और आत्मबल की वृद्धि होती है. देवी बगलामुखी की कृपा से साधक को जीवन में उन्नति, सुरक्षा और शक्ति प्राप्त होती है. मां बगलामुखी की पूजा क्यों है फायदेमंद (Why is worship of Maa Baglamukhi beneficial?) Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 इस दिन की उपासना विशेष रूप से वकील, राजनेता, अधिकारी और न्याय संबंधी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है. ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः — इस मंत्र का 108 बार जप अवश्य करें. हिंदू धर्म में बगलामुखी माता का महत्व (Importance of Baglamukhi Mata in Hinduism) Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 बगलामुखी माता की पूजा अक्सर भक्त विपरीत परिस्थितियों से रक्षा, वाक् और बुद्धि पर नियंत्रण, तथा शत्रु बाधाओं को दूर करने के लिए करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को भी मां बगलामुखी की साधना करने को कहा था ताकि वे विजय प्राप्त कर सकें और उनके शत्रुओं का अंत हो। पांडवों ने बगलामुखी माता की पूजा की भी थी। बगलामुखी माता की पूजा विधि (Method of worship of Baglamukhi Mata) बगलामुखी जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र भक्तों को धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल पर पीला आसन बिछाकर मां बगलामुखी की मूर्ति या चित्र को वहां स्थापित करना चाहिए। पूजा में पीले फूल, हल्दी, पीले फल, चने की दाल और मिठाई का प्रयोग आपको करना चाहिए। धूप, दीपक और कपूर दिखाकर आपको माता की पूजा करनी चाहिए। इस दिन पूजा के समय माता के मंत्र- “ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय, जिह्वां कीलय, बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा।” का कम से कम 108 बार जप करें।  Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 इसके बाद बगलामुखी चालीसा का पाठ और आरती भी आपको करनी चाहिए। यदि संभव हो तो रात में साधना करें, क्योंकि यह समय मां की कृपा पाने के लिए अधिक शुभ और प्रभावशाली माना जाता है। बगलामुखी जयंती पर माता की पूजा के लाभ (Benefits of worshiping Mother Goddess on Baglamukhi Jayanti) बगलामुखी माता की पूजा करने से शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है वाद-विवाद व न्यायिक मामलों में भी आप सफल होते हैं  आत्मबल, साहस व आत्मविश्वास की वृद्धि होती है जिससे समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ता है मानसिक शांति व आध्यात्मिक शक्ति भी माता की पूजा करने से आपको प्राप्त होती है।

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मंगला गौरी स्तोत्र:Mangla Gauri Stotram

मंगला गौरी स्तोत्र:Mangla Gauri Stotram ॐ रक्ष-रक्ष जगन्माते देवि मङ्गल चण्डिके ।हारिके विपदार्राशे हर्षमंगल कारिके ॥ हर्षमंगल दक्षे च हर्षमंगल दायिके ।शुभेमंगल दक्षे च शुभेमंगल चंडिके ॥ मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले ।सता मंगल दे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ पूज्ये मंगलवारे च मंगलाभिष्ट देवते ।पूज्ये मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥ मंगला धिस्ठात देवि मंगलाञ्च मंगले ।संसार मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ॥ देव्याश्च मंगलंस्तोत्रं यः श्रृणोति समाहितः ।प्रति मंगलवारे च पूज्ये मंगल सुख-प्रदे ॥ तन्मंगलं भवेतस्य न भवेन्तद्-मंगलम् ।वर्धते पुत्र-पौत्रश्च मंगलञ्च दिने-दिने ॥ मामरक्ष रक्ष-रक्ष ॐ मंगल मंगले । ॥ इति मंगला गौरी स्तोत्र सम्पूर्णं ॥ Mangla Gauri Stotram:मंगला गौरी स्तोत्र विशेषताए Mangla Gauri Stotram:मंगला गौरी स्तोत्र के साथ-साथ यदि शिव परद गौरी गनेशकि पुजा कि जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे|

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Mangal Stotram:मंगल स्तोत्र

Mangal Stotra मंगल स्तोत्र: मंगल एक आक्रामक ग्रह है। यह मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी है। मकर राशि में मंगल उच्च और कर्क राशि में नीच का होता है। यह सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति के साथ मित्रवत है। यह शुक्र, शनि और राहु के साथ सम है। बुध और केतु मंगल के शत्रु हैं। सूर्य और बुध के गोचर के दौरान मंगल शुभ परिणाम देता है। Mangal Stotra सूर्य और शनि के गोचर के दौरान मंगल अशुभ परिणाम देता है। राहु से प्रभावित होने पर मंगल कमजोर होता है। खगोल विज्ञान के अनुसार, मंगल हमारे सौरमंडल का चौथा ग्रह है, जो हमारी पृथ्वी के बाद दूसरा ग्रह है। ज्योतिष में, मंगल अन्य चीजों के अलावा साहस, शक्ति, घर, ज़मीन-जायदाद और दुश्मनों का प्रतिनिधित्व करता है। चिकित्सा ज्योतिष में, मंगल रक्त संबंधी समस्याओं, रक्तचाप और दुर्घटनाओं सहित अन्य चीजों को नियंत्रित करता है। Mangal Stotra भगवान मंगल भी क्षत्रिय हैं और मेढ़े पर विराजमान हैं। मंगल को एक सुंदर युवक के रूप में चित्रित किया गया है जिसका कद छोटा है और उसकी 4 भुजाएँ हैं, जिनमें से 2 में गदा और एक त्रिशूल है। उनका शरीर पतला और युवा जैसा है तथा उनकी रक्त-लाल आँखें भयंकर रूप से जलती हैं। संस्कृत में मंगल का अर्थ भौम होता है। वे युद्ध के देवता हैं तथा ब्रह्मचारी हैं। वे स्वभाव से तमस गुण वाले हैं तथा ऊर्जावान क्रिया, अहंकार और आत्मविश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं। मंगल युद्ध के देवता हैं तथा ब्रह्मचारी हैं। Mangal Stotra वे वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं तथा गुप्त विद्याओं के शिक्षक हैं। ज्योतिष के अनुसार, मंगल या मंगल शक्ति, पराक्रम, साहस और आक्रामकता का ग्रह है। ज्योतिष की दृष्टि से मंगल को क्रूर ग्रह माना जाता है। स्वभाव से मंगल ऊर्जावान और कामुक, साहसी, क्रोधी और उदार है। मंगल अत्यंत क्रोधी हैं तथा अपने भक्तों के अहंकार के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। वे वित्तीय लाभ प्रदान करते हैं तथा अपने भक्तों की सभी कठिनाइयों, विशेषकर बीमारी, ऋण और शत्रुओं से मुक्ति दिलाते हैं। Mangal Stotra वे भूमि-संपत्ति, कार्य में समृद्धि आदि के अधिग्रहण में सहायक होते हैं। वैदिक ज्योतिष में, मंगल को मंगल, अंगारक और कुज के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत में इन नामों का अर्थ है, “शुभ, जलता हुआ कोयला, और निष्पक्ष”। मंगल स्तोत्र के लाभ मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ मन की शांति देता है और आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है Mangal Stotra और आपको स्वस्थ, धनी और समृद्ध बनाता है।इस शक्तिशाली और प्रभावशाली मंगल स्तोत्र में जीवन की सभी इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति है। मंगल स्तोत्र किसी भी तरह के कर्ज को दूर करता है और आपको भगवान मंगल के सकारात्मक कंपन के साथ जोड़ता है।मंगल की विशेषताओं में दृढ़ संकल्प, विवेक और इच्छा शक्ति शामिल हैं। Mangal Stotra यद्यपि सूर्य सार्वभौमिक शक्ति का स्रोत है, वह उस शक्ति की ओर से कार्य करने वाली कार्यकारी शाखा है, यही कारण है कि वह कल्याण का वाहक है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो लोग घरेलू उद्देश्यों के कारण उदासीन स्थितियों और तनावों के कारण मन की शांति खो देते हैं, उन्हें मंगल स्तोत्र का जाप करना चाहिए। मंगल स्तोत्र हिंदी पाठ:Mangal Stotra in Hindi रक्ताम्बरो रक्तवपु: किरीटी चतुर्मुखो मेघगदी गदाधृक् ।धरासुत: शक्तिधरश्र्वशूली सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त: ।। 1 ।। ॐमंगलो भूमिपुत्रश्र्व ऋणहर्ता धनप्रद: ।स्थिरात्मज: महाकाय: सर्वकामार्थसाधक: ।। 2 ।। लोहितो लोहिताऽगश्र्व सामगानां कृपाकर: ।धरात्मज: कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दन: ।। 3 ।। अऽगारकोतिबलवानपि यो ग्रहाणंस्वेदोदृवस्त्रिनयनस्य पिनाकपाणे: ।आरक्तचन्दनसुशीतलवारिणायोप्यभ्यचितोऽथ विपलां प्रददातिसिद्धिम् ।। 4 ।। भौमो धरात्मज इति प्रथितः प्रथिव्यांदुःखापहो दुरितशोकसमस्तहर्ता ।न्रणाम्रणं हरित तान्धनिन: प्रकुर्याध: पूजित: सकलमंगलवासरेषु ।। 5 ।। एकेन हस्तेन गदां विभर्ति त्रिशूलमन्येन ऋजुकमेण ।शक्तिं सदान्येन वरंददाति चतुर्भुजो मंगलमादधातु ।। 6 ।। यो मंगलमादधाति मध्यग्रहो यच्छति वांछितार्थम् ।धर्मार्थकामादिसुखं प्रभुत्वं कलत्र पुत्रैर्न कदा वियोग: ।। 7 ।। कनकमयशरीरतेजसा दुर्निरीक्ष्यो हुतवह समकान्तिर्मालवे लब्धजन्मा ।अवनिजतनमेषु श्रूयते य: पुराणो दिशतु मम विभूतिं भूमिज: सप्रभाव: ।। 8 ।। ॥ इति मंगल स्तोत्र संपूर्णम्‌ ॥

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