Mangal Chandika Stotram:मंगल चण्डिका स्तोत्र

Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र: मंगल चंडिका स्तोत्र की सहायता से विवाह और कार्य बाधा दूर करने के लिए यह स्तोत्र मांगलिक जातकों के लिए मंगल के कारण विवाह, कार्य संबंधी बाधाओं को दूर करने का एक अनिवार्य उपाय है। मंगल चंडिका स्तोत्र का वर्णन ब्रह्मवर्त पुराण में मिलेगा। मंगल चंडिका स्तोत्र पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मंगल चंडिका स्तोत्र का एक लाख बार जाप करने से उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

चंडिका देवी को महात्म्य की सर्वोच्च देवी माना जाता है। दुर्गा सप्तशती में चंडिका देवी को चामुंडा या माता दुर्गा कहा गया है। चंडिका देवी महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती का मिश्रित रूप हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करता है, उसे धन, व्यापार, आवास आदि की समस्या नहीं होती है। जिस व्यक्ति के विवाह में समस्या आ रही हो, कहा जाता है कि नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करने से विवाह संबंधी परेशानी दूर होती है। मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है,

जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। मंगल चंडिका स्तोत्र के लाभ: कर्ज से मुक्ति पाने के लिए या कर्ज के जाल में फंसने से बचने के लिए।

लक्ष्मी स्थिर रखने और अपनी आर्थिक स्थिति को स्थिर बनाने के लिए और कभी भी धन की कमी का सामना न करने और भौतिक कष्टों का सामना किए बिना संतुष्ट और खुशहाल जीवन जीने के लिए। घरेलू कलह को दूर करें और परिवार के भीतर बहस, लड़ाई, मतभेद और असहमति से बचें। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र किसी भी तरह के पति-पत्नी के विवाद को दूर करने में बहुत प्रभावी है। घर, जमीन और संपत्ति से जुड़े किसी भी तरह के विवाद को टालने के लिए। Mangal Chandika Stotram घर से वास्तु दोष को दूर करने और अन्य हानिकारक और बुरी ऊर्जाओं को बाहर निकालने तथा घर के माहौल को खुशहाल और समृद्ध बनाने के लिए।

विवाह में बाधा या देरी पैदा करने वाली किसी भी बाधा या समस्या को दूर करें।

मंगल चंडिका स्तोत्र विशेष रूप से मांगलिक दोष को दूर करने में प्रभावी है, जो विवाह योग्य आयु के किसी भी लड़के या लड़की के लिए उपयुक्त वर को समाप्त करने में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है।

पारंपरिक भारतीय और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ मंगल के हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए मंगल चंडिका स्तोत्र की उपासना सबसे अधिक लाभकारी है।

Mangal Chandika Stotram:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ:

विवाह या किसी भी विवाहेतर संबंध में समस्याओं का सामना करने वाले व्यक्ति को नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

‘चण्डी’ शब्द का प्रयोग ‘दक्षा’ (चतुरा) के अर्थ में होता है Mangal Chandika Stotram और ‘मंगल′शब्द कल्याण का वाचक है। जो मंगल-कल्याण करने में दक्ष हो, वही “मंगल-चण्डिका” कही जाती है। ‘दुर्गा’ के अर्थ में भी चण्डी शब्द का प्रयोग होता है और मंगल शब्द भूमि-पुत्र मंगल के अर्थ में भी आता है। अतः जो मंगल की अभीष्ट देवी है, उन देवी को ‘मंगल-चण्डिका’ कहा गया है।

मनुवंश में ‘मंगल′नामक राजा थे। सप्त-समुन्द्र पर्यन्त पृथ्वी उनके शासन में थी। उन्होंने इन देवी को अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिए भी ये ‘मंगल-चण्डी’ नाम से विख्यात हुई। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी ‘दुर्गा’ कहलाती हैं, Mangal Chandika Stotram उन्हीं का यह रुपान्तर है। ये देवी कृपा की मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियों की ये इष्टदेवी हैं।

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Mangal Chandika Stotram:मंगल-चण्डिका-स्तोत्र

मन्त्र –

॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ॥

 (२१ अक्षर)(देवीभागवत,नवम स्कन्ध, अध्याय 47 के अनुसार मन्त्र इस प्रकार है –

॥ ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा ॥

ध्यान –

देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ।
सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं  मनोहराम् ॥

श्वेतचम्पकवर्णाभा चन्द्रकोटि-समप्रभाम् ।
वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ॥

बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् ।
विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् ।
जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥

संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे ।
देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने ।
प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः ॥

‘अर्थात’ सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चण्डिका सदा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। Mangal Chandika Stotram ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं।

बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।

शंकर उवाच –

रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि  मंगलचण्डिके ।
हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके ॥

हर्ष–मंगल–दक्षे चहर्ष-मंगल-चण्डिके ।
शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके ॥

मंगले मंगलार्हे चसर्व-मंगल-मंगले ।
सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥

पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते ।
पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥

मंगलाधिष्ठातृदेविमंगलानां च मंगले ।
संसार-मंगलाधारे मोक्ष–मंगल-दायिनी ॥

सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ।
प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे ॥

स्तोत्रेणानेनशम्भुश्चस्तुत्वा मंगलचण्डिकाम् ।
प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ॥

देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः ।
तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमंगलम् ॥

॥ इति मंगल चण्डिका स्तोत्र सम्पूर्णंम् 

(ब्रह-वैवर्त्त-पुराण। प्रकृतिखण्ड। ४४। २०-३६) महादेवजी ने कहा –

‘जगन्माता भगवती Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और Mangal Chandika Stotram मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चण्डिका, मंगला, मंगला तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो। देवि ! साधु-पुरुषों को मंगल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मंगल का आश्रय हो। देवि! तुम मंगलग्रह की इष्ट-देवी हो। मंगलवार के दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिए।

मनुवंश में उत्पन्न राजा मंगल की पूजनीया देवी हो। मंगलाधिष्ठात्री देवि! तुम मंगलों के लिए भी मंगल हो। Mangal Chandika Stotram जगत् के समस्त मंगल तुम पर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मंगल प्रदान करती हो। मंगलवार के दिन सुपूजित होने पर मंगलमय सुख प्रदान करने वाली देवि! तुम संसार की सारभूता मंगलधारा तथा समस्त कर्मों से परे हो।’इस स्तोत्र से स्तुति करके भगवान् शंकर ने देवी मंगल-चण्डिका की उपासना की। वे प्रति मंगलवार के दिन उनका पूजन करके चले जाते हैं।

ये भगवती सर्वमंगला सर्वप्रथम भगवान् शंकर से पूजित हुई। उनके दूसरे उपासक मंगल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मंगल ने तथा चौथी बार मंगलवार के दिन कुछ सुन्दर स्त्रियों ने इन देवी की पूजा की। पाँचवीं बार मंगल कामना रखने वाले बहुसंख्यक मनुष्यों ने मंगलचण्डिका का पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकर से सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्व में सदा पूजित होने लगी।

मुने ! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव – सभी सर्वत्र इन परमेश्वरी की पूजा करने लगे।जो पुरुष मन को एकाग्र करके भगवती मंगल-चण्डिका के इस मंगलमय स्तोत्र का श्रवण करता है, Mangal Chandika Stotram उसे सदा मंगल प्राप्त होता है। अमंगल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रों में वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मंगल ही दृष्टिगोचर होता है।

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