Papankusha Ekadashi 2024 Date : पापांकुशा एकादशी कब है, इस दिन क्‍यों नहीं देते तुलसी को जल, जानें महत्‍व, पूजाविधि…….

Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी हिंदू धर्म के 24 एकादशी व्रतों में से एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आता है। 2024 में पापांकुशा एकादशी 13 अक्टूबर को पड़ रही है। इस व्रत को करने से व्यक्ति अपने जीवन में किए गए पापों से मुक्ति पाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी की पूजा विधि, व्रत विधि, और क्या करें व क्या न करें। मान्‍यता है कि इस दिन भगवाव विष्‍णु को सबसे प्रिय तुलसी भी उनके लिए व्रत करती हैं। Papankusha Ekadashi यही वजह है कि इस दिन तुलसी को जल नहीं दिया जाता है। कहते हैं कि इस दिन तुलसी को जल देने से उनका व्रत खंडित हो जाता है, इसलिए पापांकुशा एकादशी के दिन तुलसी में जल नहीं देना चाहिए। इस दिन भगवान विष्‍णु को तुलसी दल अर्पित करने से वह बेहद प्रसन्‍न होते हैं और मनचाहा फल देते हैं। Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी का महत्व पापांकुशा एकादशी का महत्व हिंदू धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, Papankusha Ekadashi और उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में इसका उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, वह अपने जीवन के हर प्रकार के दुखों से मुक्ति पाता है और उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त, यह व्रत धन, समृद्धि, शांति, और संतोष प्रदान करने वाला माना गया है। Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी व्रत की पूजा विधि 1. व्रत की तैयारी: पापांकुशा एकादशी का व्रत करने के लिए भक्तों को एक दिन पूर्व (दशमी तिथि) से ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और मन को शांत रखते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करें। 2. संकल्प: पूजा से पहले, भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। संकल्प के दौरान कहें कि “मैं पापांकुशा एकादशी व्रत का पालन करूंगा/करूंगी और भगवान विष्णु की पूजा करूंगा/करूंगी। भगवान मुझे सभी पापों से मुक्त करें और मोक्ष का मार्ग दिखाएं।” 3. भगवान विष्णु की पूजा: पापांकुशा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पूजा की सामग्री में फूल, तुलसी के पत्ते, धूप, दीपक, चंदन, और फल शामिल करें। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को अपने पूजा स्थल पर रखें। Papankusha Ekadashi सबसे पहले भगवान को गंगाजल या स्वच्छ पानी से स्नान कराएं, फिर उन्हें चंदन, अक्षत (चावल), पुष्प और तुलसी अर्पित करें। दीपक जलाकर भगवान की आरती करें और विष्णु सहस्रनाम या अन्य विष्णु स्तोत्रों का पाठ करें। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 4. तुलसी पूजा: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व होता है। तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। अतः पूजा में तुलसी के पत्तों का अर्पण अवश्य करें। 5. व्रत का पालन: इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, Papankusha Ekadashi तो कुछ फलाहार करते हैं। व्रत रखने वाले व्यक्ति को तामसिक और मांसाहारी भोजन से दूर रहना चाहिए। व्रती को दिनभर उपवास रखकर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए और उनकी लीलाओं का चिंतन करना चाहिए। 6. रात्रि जागरण: पापांकुशा एकादशी पर रात्रि जागरण का भी महत्व है। इस दिन रातभर जागकर भगवान विष्णु की स्तुति करें और भजन-कीर्तन में लीन रहें। ऐसा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 7. द्वादशी का पालन: व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को किया जाता है। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने का विशेष महत्व होता है। अन्न, वस्त्र, और दक्षिणा का दान करना चाहिए और इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। Papankusha Ekadashi:व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें क्या करें: क्या न करें: Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी का फल पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है Papankusha Ekadashi और वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, उसे भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। इस व्रत का फल अन्य सभी व्रतों की तुलना में अधिक पुण्यदायक और प्रभावी माना जाता है।

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Dussehra 2024: कब है दशहरा, यहां देखें सही तारीख और इसके अलग-अलग रूप

दशहरा (Dussehra) 2024, जिसे विजयादशमी (Vijayadashami) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख हिंदू त्योहारों में से एक है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसे रावण पर भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार की तारीख हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार तय होती है और यह अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। 2024 में, दशहरा 12 अक्टूबर को मनाया जाएगा। Dussehra 2024:दशहरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व Dussehra 2024:दशहरा का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है और इसे मुख्यतः दो प्रमुख धार्मिक कथाओं से जोड़ा जाता है: Dussehra 2024:दशहरा का आयोजन और परंपराएँ Dussehra 2024:भारत के विभिन्न हिस्सों में दशहरा को विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। लेकिन सभी स्थानों पर इसका मूल उद्देश्य एक ही है, जो है बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव। Dussehra 2024:दशहरे का सामाजिक और नैतिक संदेश Dussehra 2024:दशहरा का त्योहार केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक और नैतिक संदेश भी है। इस त्योहार के माध्यम से हमें यह संदेश मिलता है कि चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, अंततः सच्चाई और धर्म की जीत होती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें हमेशा अपने जीवन में नैतिकता, सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए और बुराई के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। दशहरा बुराई के खिलाफ अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसका संदेश आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन समय में था। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हमें अपने अंदर की बुरी आदतों, जैसे कि अहंकार, लालच, क्रोध आदि का त्याग करना चाहिए और सच्चाई, प्रेम, करुणा और दया के रास्ते पर चलना चाहिए। Dussehra 2024:दशहरे की वैश्विक पहचान भारत के अलावा, दशहरा दुनिया के कई अन्य देशों में भी मनाया जाता है, विशेष रूप से उन देशों में जहां भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया, मॉरिशस और फिजी में भी यह त्योहार विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। इनमें से कुछ देशों में रामलीला का आयोजन भी किया जाता है और रावण दहन की परंपरा भी निभाई जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि दशहरा केवल भारत का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का वैश्विक स्वरूप भी है। निष्कर्ष दशहरा 2024 में 12 अक्टूबर को मनाया जाएगा और यह पर्व हर भारतीय के लिए खास महत्व रखता है। यह त्योहार हमें हमारे सांस्कृतिक धरोहरों की याद दिलाता है और हमें सिखाता है कि जीवन में अच्छाई और सच्चाई का हमेशा सम्मान करना चाहिए। चाहे यह त्योहार धार्मिक आस्था का प्रतीक हो या समाजिक संदेश का, इसका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है और हमें हमारे जीवन के संघर्षों में मार्गदर्शन करता है।

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Radha Chalisa राधा चालीसा

Radha Chalisa:राधा चालीसा, देवी राधा के प्रति समर्पित एक भक्ति स्तोत्र है, जिसे विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में पढ़ा जाता है। इसे पढ़ने से भक्तों को मां राधा और भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, राधा चालीसा विशेष रूप से अधिक प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन राधा रानी की भक्ति में अन्य प्रार्थनाएं और स्तोत्र अधिक प्रचलित हैं। Radha Chalisa:चालीसा, एक प्रकार का स्तोत्र होता है जिसमें 40 छंद होते हैं। अगर आप Radha Chalisa राधा चालीसा या इस से संबंधित किसी विशेष पाठ के लाभ के बारे में जानना चाहते हैं, Radha Chalisa तो आपको निम्न लाभ मिल सकते हैं: Radha Chalisa:अगर आप राधा चालीसा या कोई और राधा से संबंधित पाठ चाहते हैं, Radha Chalisa तो मैं वह भी उपलब्ध करा सकता हूँ। Radha Chalisa राधा चालीसा ॥ दोहा ॥श्री राधे वुषभानुजा,भक्तनि प्राणाधार ।वृन्दाविपिन विहारिणी,प्रानावौ बारम्बार ॥ जैसो तैसो रावरौ,कृष्ण प्रिया सुखधाम ।चरण शरण निज दीजिये,सुन्दर सुखद ललाम ॥ ॥ चौपाई ॥जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥ नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।अमित मोद मंगल दातारा ॥ रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥ नित्य किशोरी राधा गोरी ।श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥ करुणा सागर हिय उमंगिनी ।ललितादिक सखियन की संगिनी ॥ दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥ नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।राधा राधा कहि हरषावैं ॥ मुरली में नित नाम उचारें ।तुव कारण लीला वपु धारें ॥ प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥ नवल किशोरी अति छवि धामा ।द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥१० गौरांगी शशि निंदक बदना ।सुभग चपल अनियारे नयना ॥ जावक युत युग पंकज चरना ।नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥ संतत सहचरि सेवा करहीं ।महा मोद मंगल मन भरहीं ॥ रसिकन जीवन प्राण अधारा ।राधा नाम सकल सुख सारा ॥ अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥ उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥ नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥ शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥ राधा शुभ गुण रूप उजारी ।निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥ ब्रज जीवन धन राधा रानी ।महिमा अमित न जाय बखानी ॥२० प्रीतम संग देइ गलबाँही ।बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥ राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा ।एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥ श्री राधा मोहन मन हरनी ।जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥ कोटिक रूप धरें नंद नंदा ।दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥ रास केलि करि तुम्हें रिझावें ।मान करौ जब अति दुःख पावें ॥ प्रफुलित होत दर्श जब पावें ।विविध भांति नित विनय सुनावें ॥ वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा ।नाम लेत पूरण सब कामा ॥ कोटिन यज्ञ तपस्या करहु ।विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥ तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें ।जब लगि राधा नाम न गावें ॥ वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा ।लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३० स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।और तुम्हें को जानन हारा ॥ श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।सादर गान करत नित वेदा ॥ राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।ते सपनेहुँ जग जलधि न तरि हैं ॥ कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥ नाम अमंगल मूल नसावन ।त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥ राधा नाम लेइ जो कोई ।सहजहि दामोदर बस होई ॥ राधा नाम परम सुखदाई ।भजतहिं कृपा करहिं यदुराई ॥ यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं ।जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥ रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।करहु कृपा बरसाने वारी ॥ वृन्दावन है शरण तिहारी ।जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४० ॥ दोहा ॥श्री राधा सर्वेश्वरी,रसिकेश्वर धनश्याम ।करहुँ निरंतर बास मैं,श्री वृन्दावन धाम ॥॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

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Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा 

Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा: धन और समृद्धि की देवी का स्तोत्र Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा हिंदू धर्म में धन, समृद्धि और सुख की देवी माता लक्ष्मी की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। माना जाता है कि इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, वैभव और सुख की वृद्धि होती है। Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का महत्व Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का पाठ कब करें? Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय श्री महालक्ष्मी,करूँ मात तव ध्यान।सिद्ध काज मम किजिये,निज शिशु सेवक जान॥ ॥ चौपाई ॥नमो महा लक्ष्मी जय माता।तेरो नाम जगत विख्याता॥आदि शक्ति हो मात भवानी।पूजत सब नर मुनि ज्ञानी॥ जगत पालिनी सब सुख करनी।निज जनहित भण्डारण भरनी॥श्वेत कमल दल पर तव आसन।मात सुशोभित है पद्मासन॥ श्वेताम्बर अरू श्वेता भूषण।श्वेतही श्वेत सुसज्जित पुष्पन॥शीश छत्र अति रूप विशाला।गल सोहे मुक्तन की माला॥ सुंदर सोहे कुंचित केशा।विमल नयन अरु अनुपम भेषा॥कमलनाल समभुज तवचारि।सुरनर मुनिजनहित सुखकारी॥ अद्भूत छटा मात तव बानी।सकलविश्व कीन्हो सुखखानी॥शांतिस्वभाव मृदुलतव भवानी।सकल विश्वकी हो सुखखानी॥ महालक्ष्मी धन्य हो माई।पंच तत्व में सृष्टि रचाई॥जीव चराचर तुम उपजाए।पशु पक्षी नर नारी बनाए॥ क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए।अमितरंग फल फूल सुहाए॥छवि विलोक सुरमुनि नरनारी।करे सदा तव जय-जय कारी॥ सुरपति औ नरपत सब ध्यावैं।तेरे सम्मुख शीश नवावैं॥चारहु वेदन तब यश गाया।महिमा अगम पार नहिं पाये॥ जापर करहु मातु तुम दाया।सोइ जग में धन्य कहाया॥पल में राजाहि रंक बनाओ।रंक राव कर बिमल न लाओ॥ जिन घर करहु माततुम बासा।उनका यश हो विश्व प्रकाशा॥जो ध्यावै से बहु सुख पावै।विमुख रहे हो दुख उठावै॥ महालक्ष्मी जन सुख दाई।ध्याऊं तुमको शीश नवाई॥निज जन जानीमोहीं अपनाओ।सुखसम्पति दे दुख नसाओ॥ ॐ श्री-श्री जयसुखकी खानी।रिद्धिसिद्ध देउ मात जनजानी॥ॐह्रीं-ॐह्रीं सब व्याधिहटाओ।जनउन विमल दृष्टिदर्शाओ॥ ॐक्लीं-ॐक्लीं शत्रुन क्षयकीजै।जनहित मात अभय वरदीजै॥ॐ जयजयति जयजननी।सकल काज भक्तन के सरनी॥ ॐ नमो-नमो भवनिधि तारनी।तरणि भंवर से पार उतारनी॥सुनहु मात यह विनय हमारी।पुरवहु आशन करहु अबारी॥ ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै।सो प्राणी सुख सम्पत्ति पावै॥रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई।ताकी निर्मल काया होई॥ विष्णु प्रिया जय-जय महारानी।महिमा अमित न जाय बखानी॥पुत्रहीन जो ध्यान लगावै।पाये सुत अतिहि हुलसावै॥ त्राहि त्राहि शरणागत तेरी।करहु मात अब नेक न देरी॥आवहु मात विलम्ब न कीजै।हृदय निवास भक्त बर दीजै॥ जानूं जप तप का नहिं भेवा।पार करो भवनिध वन खेवा॥बिनवों बार-बार कर जोरी।पूरण आशा करहु अब मोरी॥ जानि दास मम संकट टारौ।सकल व्याधि से मोहिं उबारौ॥जो तव सुरति रहै लव लाई।सो जग पावै सुयश बड़ाई॥ छायो यश तेरा संसारा।पावत शेष शम्भु नहिं पारा॥गोविंद निशदिन शरण तिहारी।करहु पूरण अभिलाष हमारी॥ ॥ दोहा ॥महालक्ष्मी चालीसा,पढ़ै सुनै चित लाय।ताहि पदारथ मिलै,अब कहै वेद अस गाय॥

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Surya Chalisa सूर्य चालीसा

Surya Chalisa:सूर्य चालीसा: सूर्य देव की भक्ति का एक अद्भुत स्तोत्र Surya Chalisa:सूर्य चालीसा हिंदू धर्म में सूर्य देव की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। सूर्य देव को सृष्टि का कारण माना जाता है और वे सभी जीवों को जीवन प्रदान करते हैं। सूर्य चालीसा में सूर्य देव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन किया गया है। Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का महत्व Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का पाठ कब करें? Surya Chalisa:सूर्य चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Surya Chalisa सूर्य चालीसा श्री सूर्य देव चालीसा ॥॥ दोहा ॥कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥ ॥ चौपाई ॥जय सविता जय जयति दिवाकर,सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥ भानु पतंग मरीची भास्कर,सविता हंस सुनूर विभाकर॥ विवस्वान आदित्य विकर्तन,मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥ अम्बरमणि खग रवि कहलाते,वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 4 सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥ अरुण सदृश सारथी मनोहर,हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥ मंडल की महिमा अति न्यारी,तेज रूप केरी बलिहारी॥ उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,देखि पुरन्दर लज्जित होते॥8 मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥ पूषा रवि आदित्य नाम लै,हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥ द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,मस्तक बारह बार नवावैं॥ चार पदारथ जन सो पावै,दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥12 नमस्कार को चमत्कार यह,विधि हरिहर को कृपासार यह॥ सेवै भानु तुमहिं मन लाई,अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥ बारह नाम उच्चारन करते,सहस जनम के पातक टरते॥ उपाख्यान जो करते तवजन,रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥16 धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,प्रबल मोह को फंद कटतु है॥ अर्क शीश को रक्षा करते,रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥ सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥ भानु नासिका वासकरहुनित,भास्कर करत सदा मुखको हित॥20 ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥ कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥ पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥ युगल हाथ पर रक्षा कारन,भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥24 बसत नाभि आदित्य मनोहर,कटिमंह, रहत मन मुदभर॥ जंघा गोपति सविता बासा,गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥ विवस्वान पद की रखवारी,बाहर बसते नित तम हारी॥ सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,रक्षा कवच विचित्र विचारे॥28 अस जोजन अपने मन माहीं,भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥ दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,जोजन याको मन मंह जापै॥ अंधकार जग का जो हरता,नव प्रकाश से आनन्द भरता॥ ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥32 मंद सदृश सुत जग में जाके,धर्मराज सम अद्भुत बांके॥ धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,किया करत सुरमुनि नर सेवा॥ भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥ परम धन्य सों नर तनधारी,हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥36 अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥ भानु उदय बैसाख गिनावै,ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥ यम भादों आश्विन हिमरेता,कातिक होत दिवाकर नेता॥ अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥40 ॥ दोहा ॥भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

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नवरात्रि का नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि नवम दिन – मां सिद्धिदात्री नवरात्रि का नवम और अंतिम दिन देवी दुर्गा के नवम रूप, मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना को समर्पित होता है। मां सिद्धिदात्री का नाम दो शब्दों “सिद्धि” और “दात्री” से मिलकर बना है। “सिद्धि” का अर्थ है विशेष उपलब्धियां या अद्वितीय शक्तियां, और “दात्री” का अर्थ है देने वाली। अर्थात, मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन उनकी पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं, जिससे वे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं। नवरात्रि मां सिद्धिदात्री का स्वरूप मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली देवी हैं, जिन्हें सामान्यतः कमल के फूल पर विराजित दर्शाया जाता है। उनके एक हाथ में गदा, दूसरे में चक्र, तीसरे में शंख और चौथे में कमल का फूल होता है। नवरात्रि मां का रंग हल्का लाल या गुलाबी होता है, जो सौम्यता और दिव्यता का प्रतीक है। उनकी सुंदरता, शांति और कांति से संसार भरपूर हो जाता है। मां सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। मां सिद्धिदात्री की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब संसार की रचना हो रही थी और देवता, ऋषि, मुनि अपनी आध्यात्मिक शक्तियों की खोज कर रहे थे, तब भगवान शिव ने भी सिद्धियों की प्राप्ति के लिए मां सिद्धिदात्री की पूजा की। मां ने भगवान शिव को अष्ट सिद्धियों से विभूषित किया। यही कारण है नवरात्रि कि भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप में भी पूजा जाता है, जिसमें आधा भाग देवी का और आधा भाग शिव का होता है। मां सिद्धिदात्री ने ही देवताओं और ऋषियों को भी इन अष्ट सिद्धियों का ज्ञान दिया था। अष्ट सिद्धियों के नाम हैं: आध्यात्मिक महत्ता मां सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है, और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हो सकता है। नवरात्रि इस दिन का ध्यान विशेष रूप से ध्यान और समाधि में लीन साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन साधक के सभी चक्र जाग्रत हो जाते हैं, और वह पूर्ण रूप से आत्मा और परमात्मा के मिलन की ओर बढ़ता है। कुंडलिनी जागरण के संदर्भ में भी मां सिद्धिदात्री की पूजा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जब साधक की कुंडलिनी शक्ति सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होती है, तब मां सिद्धिदात्री की कृपा से उसे ब्रह्मांडीय शक्ति की प्राप्ति होती है, जिससे उसे सभी सिद्धियों और दिव्य शक्तियों का अनुभव होता है। भक्तों के लिए लाभ मां सिद्धिदात्री की पूजा करने वाले भक्तों को कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। ये लाभ न केवल भौतिक जीवन में होते हैं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी सुनिश्चित करते हैं। भक्त को स्वास्थ्य, धन, वैभव और सफलता प्राप्त होती है। इसके अलावा, मां सिद्धिदात्री की कृपा से जीवन के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं, और व्यक्ति के भीतर एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। साधक को मानसिक शांति, धैर्य और संतुलन की प्राप्ति होती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है। पूजा विधि नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा विशेष रूप से की जाती है। भक्त प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं और मां की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप जलाते हैं। इसके बाद फूल, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। मां को सफेद फूल अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके अलावा, मां को मिठाई, विशेषकर खीर, अर्पित की जाती है। मां के मंत्र का जाप भी इस दिन किया जाता है: “ॐ सिद्धिदात्री नमः“ इस मंत्र का जाप करने से भक्त को सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सुखमय और समृद्धिशाली हो जाता है। मां सिद्धिदात्री और नवमी का महत्व नवमी का दिन देवी की पूर्णता का प्रतीक होता है। नवरात्रि के नौ दिन, एक साधक के लिए आत्मशुद्धि, ध्यान और साधना के दिन होते हैं। यह दिन साधक की यात्रा का अंतिम चरण होता है, जहां उसे मां सिद्धिदात्री की कृपा से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है और वह जीवन के हर पहलू में संतुलन और सफलता प्राप्त करता है। नवमी के दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है। मां सिद्धिदात्री को कन्याओं का रूप माना जाता है, इसलिए इस दिन छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह पूजा इस बात का प्रतीक है कि हर कन्या में देवी का वास होता है और उनकी सेवा से देवी की कृपा प्राप्त होती है। निष्कर्ष मां सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के अंतिम दिन भक्तों को आध्यात्मिक शांति, सिद्धियों की प्राप्ति और सांसारिक सुखों की प्राप्ति का मार्ग प्रदान करती है। मां सिद्धिदात्री की कृपा से भक्त अपने जीवन के सभी कठिनाइयों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। उनकी भक्ति और उपासना से साधक को मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और संतुलित जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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Bhagavad Gita:क्या आपने सपने में गीता पढ़ते देखा ? मिल सकता है शुभ समाचार

Bhagavad Gita:स्वप्नों का संसार हमारे मन की गहराइयों से जुड़ा होता है। स्वप्न मनुष्य के विचारों, अनुभवों और भावनाओं का एक प्रतिबिंब हो सकते हैं। यदि आपने किसी सपने में गीता देखी है या खुद को Bhagavad Gita भगवद् गीता पढ़ते हुए देखा है, तो यह आपके अंदर की आत्मिक, आध्यात्मिक, या मानसिक स्थिति को दर्शा सकता है। Bhagavad Gita:भगवद् गीता को हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान दिया है। इसे आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा का एक स्रोत माना जाता है, और इसके विभिन्न श्लोक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरा प्रभाव डालते हैं। Bhagavad Gita:सपने में काले वस्त्र में दिखी महिला, जानिए अर्थ कानपुर से जयमंगल शर्मा लिखते हैं कि उन्हें सपने में एक महिला दिखाई है. वह काले वस्त्र में है, वह अपना चेहरा ढंकी हुई है. उसका चेहरा मैं नहीं देख पाया. इसके क्या संकेत हैं? इस पर आचार्य विक्रमादित्य कहते हैं कि सपने में अगर कोई महिला अपना चेहरा ढंकी हुई दिखाई दे. या वह नकाब पहनी हुई हो. तो इसका अर्थ है कि आपका कोई घनिष्ट मित्र, संबंधी, आपके साथ बहुत बड़ा विश्वासघात करने वाला है. Bhagavad Gita:सपने में गीता देखना या पढ़ना:प्रतीक और अर्थ Bhagavad Gita:आध्यात्मिक जागरूकता: यदि आप सपने में गीता को देखते हैं या उसे पढ़ते हुए खुद को पाते हैं, Bhagavad Gita तो यह एक संकेत हो सकता है कि आपकी आत्मा आध्यात्मिक ज्ञान की ओर अग्रसर हो रही है। यह आपके अंदर किसी गहरी प्रश्नात्मकता, सत्य की खोज, या ईश्वर की ओर खिंचाव का प्रतीक हो सकता है। Bhagavad Gita गीता की शिक्षा जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं, जैसे कर्म, धर्म, मोक्ष, और भक्ति पर आधारित होती है, और सपने में इसे देखना इस ओर संकेत कर सकता है कि आप अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर विचारशील हो रहे हैं। आत्म-निरीक्षण और मार्गदर्शन: गीता के श्लोक जीवन की कठिनाइयों और संदेहों के समय मार्गदर्शन देने वाले माने जाते हैं। यह सपना दर्शा सकता है कि आपके जीवन में किसी ऐसे समय का आगमन हो रहा है जहां आपको सही निर्णय लेने में सहायता की आवश्यकता है। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जीवन के संघर्षों से निपटने और सही दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इसी तरह, यह सपना आपको अपने जीवन में आत्म-निरीक्षण करने और सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर सकता है। धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूकता: भगवद् गीता में धर्म और कर्तव्य को जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सपने में गीता का दिखना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको अपने जीवन में धर्म और कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। यह सपना आपको यह समझने की प्रेरणा दे सकता है कि आपके जीवन में कौन से कार्य या जिम्मेदारियां आपके लिए महत्वपूर्ण हैं और आपको उन्हें किस प्रकार निभाना चाहिए। आंतरिक शांति और स्थिरता: गीता की शिक्षा आत्मा की शांति और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए एक मार्गदर्शन का काम करती है। यदि आप अपने जीवन में किसी प्रकार के तनाव, संदेह, या अस्थिरता का अनुभव कर रहे हैं, तो गीता का सपना आपको आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यह सपना आपको यह बताने का प्रयास कर सकता है कि मानसिक शांति केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और आध्यात्मिक ज्ञान से प्राप्त होती है। नैतिक संघर्ष और समाधान: अर्जुन के नैतिक संघर्ष और उसके समाधान के रूप में गीता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। अगर आप अपने जीवन में किसी प्रकार के नैतिक या व्यक्तिगत संघर्ष का सामना कर रहे हैं, तो गीता का सपना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको उस संघर्ष से निपटने के लिए किसी उच्च मार्गदर्शन की आवश्यकता है। गीता के श्लोक आपके लिए वह समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं, जो आपको सही निर्णय लेने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे। Bhagavad Gita:व्यक्तिगत जीवन से जुड़ाव Bhagavad Gita:गीता का सपना व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति से गहरे रूप में जुड़ा हो सकता है। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई स्थिति होती है जो उसे अपने जीवन के गहरे अर्थों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। हो सकता है कि यह सपना आपके जीवन के किसी ऐसे मोड़ का संकेत हो, जहां आप अपने वर्तमान निर्णयों पर पुनर्विचार कर रहे हों। यह संभव है कि आप अपने जीवन के किसी महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हों और यह सपना आपको उन विचारों को स्पष्ट करने में मदद कर रहा हो। Bhagavad Gita:क्या करना चाहिए? निष्कर्ष कुल मिलाकर, सपने में गीता देखना या गीता पढ़ते हुए देखना एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। यह सपना आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर आपको ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकता है, चाहे वह आध्यात्मिक जागरूकता हो, आत्म-निरीक्षण, या नैतिक संघर्ष। गीता का सपना जीवन के उस गूढ़ ज्ञान को आपके सामने लाने का प्रयास हो सकता है, जिसे आप अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। ऐसे सपने जीवन में आत्मिक उन्नति के लिए एक संकेत हो सकते हैं, जो आपको अपने जीवन के गहरे उद्देश्यों को समझने में सहायता कर सकते हैं। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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नवरात्रि का आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप, माँ महागौरी की पूजा की जाती है। माँ महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और उज्ज्वल है। उनके इस स्वरूप को पवित्रता, शुद्धता, और तप की देवी के रूप में जाना जाता है। माँ महागौरी की पूजा अष्टमी तिथि को की जाती है, जिसे “महाअष्टमी” भी कहते हैं। इस दिन को अत्यधिक शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह दिन भक्तों के लिए जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला और मनोवांछित फल देने वाला होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का स्वरूप नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का वर्ण अत्यंत गोरा और चमकदार है, जिसके कारण उन्हें ‘गौरी’ कहा जाता है। उनकी चार भुजाएँ हैं—एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरू और अन्य दो हाथ वरदान और अभय मुद्रा में हैं। वे सफेद रंग के वस्त्र धारण करती हैं और उनकी सवारी बैल है। उनका यह रूप शांति, पवित्रता और शक्ति का प्रतीक है। माँ महागौरी के इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों के जीवन से अज्ञान, अंधकार और अशांति का नाश होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का महत्व नवरात्रि माँ महागौरी की उपासना का महत्व अत्यधिक है। मान्यता है कि माँ महागौरी की पूजा करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। उनका यह स्वरूप भक्तों के मन की शांति, संयम, और संतोष को बढ़ाता है। जो व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों और दुखों से गुजर रहे होते हैं, वे माँ महागौरी की पूजा से समस्त संकटों का समाधान पाते हैं। माँ महागौरी को आठवीं तिथि पर पूजने से व्यक्ति की समृद्धि, ऐश्वर्य, और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। उनके भक्तों को धन, वैभव और सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, माँ महागौरी का आशीर्वाद विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है, खासकर उन कन्याओं के लिए जो विवाह योग्य हैं। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आ रही हों, वे भी माँ की कृपा से संतान सुख प्राप्त करते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन व्रत का महत्व माँ महागौरी के दिन व्रत रखना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस दिन उपवास करने से साधक के मन में शुद्धता और साधना में दृढ़ता आती है। अष्टमी का व्रत रखने से जीवन की सभी कठिनाइयों का अंत होता है और घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। जिन लोगों को आर्थिक समस्याएं हैं, वे इस व्रत को रखने से धन की प्राप्ति करते हैं। अष्टमी व्रत विशेष रूप से कन्या पूजन के लिए भी प्रसिद्ध है। इस दिन घर में कन्या पूजन करके उन्हें भोजन कराना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह पूजन न केवल नारी शक्ति का सम्मान है बल्कि माँ महागौरी की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम भी है। कन्या पूजन करने से घर में सुख और शांति का वास होता है और घर के सभी सदस्य निरोगी रहते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी पूजा विधि माँ महागौरी की पूजा करने के लिए भक्तों को शुद्ध मन और तन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन पूजा विधि इस प्रकार है: नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी को भोग माँ महागौरी को सफेद वस्त्र और सफेद मिठाइयों का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेष रूप से खीर, नारियल, और हलवे का भोग चढ़ाने से माँ प्रसन्न होती हैं। सफेद रंग की मिठाइयों का भोग उनकी शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। उपासना के विशेष लाभ माँ महागौरी की पूजा से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होते हैं: निष्कर्ष नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी की पूजा और व्रत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी उपासना से जीवन की सभी समस्याओं का अंत होता है और भक्तों को शांति, समृद्धि, और संतोष की प्राप्ति होती है। माँ महागौरी की कृपा से भक्तों का जीवन सुख-शांति से भर जाता है, और उनके सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

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नवरात्रि का सातवां दिन: माँ कालरात्रि की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि का सातवां दिन: माँ कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप, माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत उग्र और भयानक है, परंतु वे भक्तों के लिए अत्यंत शुभकारी मानी जाती हैं। उनके इस स्वरूप को ‘काल का नाश करने वाली’ के रूप में जाना जाता है। उनका यह रूप विशेषतः तामसिक और आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिए प्रकट हुआ था। माँ कालरात्रि का स्वरूप नवरात्रि का सातवां दिन:माँ कालरात्रि का रंग काला है और उनके चार हाथ हैं। एक हाथ में तलवार, दूसरे में लोहे की कांटी (लौह शस्त्र), तीसरे हाथ से वे अभय मुद्रा में हैं, और चौथे हाथ से वरदान देती हैं। उनकी सवारी गधा है, और उनके गले में नरमुंडों की माला है। उनका यह उग्र स्वरूप विनाशकारी शक्तियों और दुष्ट आत्माओं को नष्ट करने वाला है, लेकिन उनके भक्तों को माँ हमेशा रक्षा का आश्वासन देती हैं। माँ कालरात्रि का दर्शन मात्र ही सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाता है। नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि का महत्व नवरात्रि का सातवां दिन :माँ कालरात्रि की पूजा जीवन से नकारात्मकता को दूर करती है। इस दिन पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि माँ कालरात्रि की उपासना से भक्त सभी प्रकार के भय, संकट और दु:खों से मुक्त हो जाता है। यह दिन भक्तों के लिए शक्ति, साहस और आत्म-नियंत्रण प्राप्त करने का समय होता है। माँ कालरात्रि उन भक्तों को विशेष आशीर्वाद देती हैं, जो निर्भय और दृढ़ निश्चयी होते हैं। उनका एक नाम “शुभंकरी” भी है, क्योंकि वे अपने भक्तों के लिए शुभ फल प्रदान करती हैं। माँ कालरात्रि की पूजा विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए लाभकारी मानी जाती है, जिन्हें अपने जीवन में भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनकी उपासना से सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। व्रत का महत्व नवरात्रि के सातवें दिन का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों को अन्न का त्याग करना चाहिए और फलाहार या केवल जल ग्रहण करके व्रत करना चाहिए। यह व्रत साधकों को मानसिक और शारीरिक शक्ति प्रदान करता है। माँ कालरात्रि की कृपा से भक्तों को कठिन परिस्थितियों में विजय प्राप्त होती है और उनका आत्मबल बढ़ता है। इस व्रत का पालन करने से बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति व सुख की प्राप्ति होती है। यह व्रत संयम, अनुशासन और दृढ़ संकल्प का प्रतीक होता है। नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि पूजा विधि माँ कालरात्रि की पूजा के लिए विशेष विधि अपनाई जाती है। आइए जानते हैं इस पूजा की विधि: नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि को भोग माँ कालरात्रि को विशेष रूप से गुड़ का भोग लगाया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाने से माँ शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। गुड़ के साथ इमरती या हलवा का भोग भी चढ़ाया जा सकता है। उपासना के विशेष लाभ माँ कालरात्रि की पूजा से जो विशेष लाभ प्राप्त होते हैं, वे इस प्रकार हैं: निष्कर्ष नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि की पूजा और उपासना के लिए समर्पित होता है। उनकी पूजा से न केवल मानसिक शांति और आत्मविश्वास मिलता है, बल्कि सभी प्रकार के भय और दु:खों से भी मुक्ति मिलती है। यह दिन शक्ति, साहस और साधना का प्रतीक है। माँ कालरात्रि की कृपा से भक्त जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते हैं और सभी संकटों का समाधान होता है।

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Shiv Chalisa:शिव चालीसा

Shiv Chalisa:शिव चालीसा: भोलेनाथ की स्तुति Shiv Chalisa:शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। भक्तगण भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं। Shiv Chalisa:शिव चालीसा का महत्व Shiv Chalisa:शिव चालीसा का पाठ कैसे करें Shiv Chalisa:शिव चालीसा के लाभ शिव चालीसा (Shiv Chalisa) ॥ दोहा ॥जय गणेश गिरिजा सुवन,मंगल मूल सुजान ।कहत अयोध्यादास तुम,देहु अभय वरदान ॥ ॥ चौपाई ॥जय गिरिजा पति दीन दयाला ।सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।कानन कुण्डल नागफनी के ॥ अंग गौर शिर गंग बहाये ।मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4 मैना मातु की हवे दुलारी ।बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ ।या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8 देवन जबहीं जाय पुकारा ।तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥ किया उपद्रव तारक भारी ।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ तुरत षडानन आप पठायउ ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥ आप जलंधर असुर संहारा ।सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12 त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ किया तपहिं भागीरथ भारी ।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ वेद नाम महिमा तव गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16 प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।जरत सुरासुर भए विहाला ॥ कीन्ही दया तहं करी सहाई ।नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ सहस कमल में हो रहे धारी ।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20 एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।कमल नयन पूजन चहं सोई ॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥ जय जय जय अनन्त अविनाशी ।करत कृपा सब के घटवासी ॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24 त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।संकट से मोहि आन उबारो ॥ मात-पिता भ्राता सब होई ।संकट में पूछत नहिं कोई ॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी ।आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28 धन निर्धन को देत सदा हीं ।जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥ अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ शंकर हो संकट के नाशन ।मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32 नमो नमो जय नमः शिवाय ।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ जो यह पाठ करे मन लाई ।ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।पाठ करे सो पावन हारी ॥ पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36 पण्डित त्रयोदशी को लावे ।ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ जन्म जन्म के पाप नसावे ।अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40 कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥ ॥ दोहा ॥नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

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Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini:माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी

Maa Maha Kali:काली चालीसा: शक्ति और तांत्रिक साधना का एक महत्वपूर्ण मंत्र Maa Maha Kali:काली चालीसा हिंदू धर्म में माता काली को समर्पित एक प्रसिद्ध स्तुति है। यह चालीसा माता काली के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। इसे भक्तगण माता काली की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ करते हैं। Maa Maha Kali:काली चालीसा का महत्व Maa Maha Kali:काली चालीसा का पाठ कैसे करें Maa Maha Kali:काली चालीसा के लाभ माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी! (Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini) ॥ दोहा ॥जय जय सीताराम के मध्यवासिनी अम्ब,देहु दर्श जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ॥जय तारा जय कालिका जय दश विद्या वृन्द,काली चालीसा रचत एक सिद्धि कवि हिन्द ॥प्रातः काल उठ जो पढ़े दुपहरिया या शाम,दुःख दरिद्रता दूर हों सिद्धि होय सब काम ॥ ॥ चौपाई ॥जय काली कंकाल मालिनी,जय मंगला महाकपालिनी ॥ रक्तबीज वधकारिणी माता,सदा भक्तन की सुखदाता ॥ शिरो मालिका भूषित अंगे,जय काली जय मद्य मतंगे ॥ हर हृदयारविन्द सुविलासिनी,जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनी ॥ ४ ॥ ह्रीं काली श्रीं महाकाराली,क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली ॥ जय कलावती जय विद्यावति,जय तारासुन्दरी महामति ॥ देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट,होहु भक्त के आगे परगट ॥ जय ॐ कारे जय हुंकारे,महाशक्ति जय अपरम्पारे ॥ ८ ॥ कमला कलियुग दर्प विनाशिनी,सदा भक्तजन की भयनाशिनी ॥ अब जगदम्ब न देर लगावहु,दुख दरिद्रता मोर हटावहु ॥ जयति कराल कालिका माता,कालानल समान घुतिगाता ॥ जयशंकरी सुरेशि सनातनि,कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ॥ १२ ॥ कपर्दिनी कलि कल्प विमोचनि,जय विकसित नव नलिन विलोचनी ॥ आनन्दा करणी आनन्द निधाना,देहुमातु मोहि निर्मल ज्ञाना ॥ करूणामृत सागरा कृपामयी,होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी ॥ सकल जीव तोहि परम पियारा,सकल विश्व तोरे आधारा ॥ १६ ॥ प्रलय काल में नर्तन कारिणि,जग जननी सब जग की पालिनी ॥ महोदरी माहेश्वरी माया,हिमगिरि सुता विश्व की छाया ॥ स्वछन्द रद मारद धुनि माही,गर्जत तुम्ही और कोउ नाहि ॥ स्फुरति मणिगणाकार प्रताने,तारागण तू व्योम विताने ॥ २० ॥ श्रीधारे सन्तन हितकारिणी,अग्निपाणि अति दुष्ट विदारिणि ॥ धूम्र विलोचनि प्राण विमोचिनी,शुम्भ निशुम्भ मथनि वर लोचनि ॥ सहस भुजी सरोरूह मालिनी,चामुण्डे मरघट की वासिनी ॥ खप्पर मध्य सुशोणित साजी,मारेहु माँ महिषासुर पाजी ॥ २४ ॥ अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका,सब एके तुम आदि कालिका ॥ अजा एकरूपा बहुरूपा,अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ॥ कलकत्ता के दक्षिण द्वारे,मूरति तोरि महेशि अपारे ॥ कादम्बरी पानरत श्यामा,जय माँतगी काम के धामा ॥ २८ ॥ कमलासन वासिनी कमलायनि,जय श्यामा जय जय श्यामायनि ॥ मातंगी जय जयति प्रकृति हे,जयति भक्ति उर कुमति सुमति हे ॥ कोटि ब्रह्म शिव विष्णु कामदा,जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ॥ जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी,सौदामिनी मध्य आलापिनि ॥ ३२ ॥ झननन तच्छु मरिरिन नादिनी,जय सरस्वती वीणा वादिनी ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे,कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ॥ जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता,कामाख्या और काली माता ॥ हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनी,अटठहासिनि अरु अघन नाशिनी ॥ ३६ ॥ कितनी स्तुति करूँ अखण्डे,तू ब्रह्माण्डे शक्तिजित चण्डे ॥ करहु कृपा सब पे जगदम्बा,रहहिं निशंक तोर अवलम्बा ॥ चतुर्भुजी काली तुम श्यामा,रूप तुम्हार महा अभिरामा ॥ खड्ग और खप्पर कर सोहत,सुर नर मुनि सबको मन मोहत ॥ ४० ॥ तुम्हारी कृपा पावे जो कोई,रोग शोक नहिं ताकहँ होई ॥ जो यह पाठ करै चालीसा,तापर कृपा करहिं गौरीशा ॥ ॥ दोहा ॥जय कपालिनी जय शिवा,जय जय जय जगदम्ब,सदा भक्तजन केरि दुःख हरहु,मातु अविलम्ब ॥

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नवरात्रि के चौथे दिन होती है माता कूष्मांडा की पूजा, नोट कर लें पूजा-विधि,मंत्र……

नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जिन्हें सृष्टि की रचनाकार और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। कूष्मांडा देवी को उनके मुस्कान से अंड (ब्रह्मांड) की उत्पत्ति करने वाली शक्ति के रूप में जाना जाता है। इनकी उपासना से भक्तों को लंबी आयु, समृद्धि, स्वास्थ्य, और उन्नति का वरदान मिलता है। नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप: नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप आठ भुजाओं वाला होता है, इसीलिए इन्हें “अष्टभुजा देवी” भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है। इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। पूजा-विधि: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन पूजा करते समय निम्न विधि अपनाई जाती है: नवरात्रि माता कूष्मांडा का मंत्र: माता कूष्मांडा का जाप करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं। निम्न मंत्र का जाप करें: ॐ देवी कूष्मांडायै नमः। यह मंत्र कम से कम 108 बार जपना चाहिए। यदि संभव हो तो मंत्र जाप के साथ दीप जलाकर पूजा करें। शुभ रंग: नवरात्रि के चौथे दिन हरा रंग शुभ माना जाता है। इस दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करना या पूजा में हरे रंग का कपड़ा इस्तेमाल करना विशेष फलदायी होता है। हरा रंग जीवन में उन्नति, समृद्धि, और स्वास्थ्य का प्रतीक है। माता कूष्मांडा की महिमा: माता कूष्मांडा सृष्टि की रचयिता मानी जाती हैं। कहते हैं कि जब संसार में कुछ भी नहीं था, तब देवी कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान के द्वारा ब्रह्मांड की रचना की। इनकी उपासना से हमारे सभी प्रकार के कष्ट, रोग, और शोक समाप्त होते हैं। विशेष रूप से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। उनकी कृपा से जीवन में उत्साह और सकारात्मकता आती है। नवरात्रि के चौथे दिन क्या करें और क्या न करें: क्या करें: क्या न करें: निष्कर्ष: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन बेहद महत्वपूर्ण होती है। उनकी उपासना से व्यक्ति के जीवन में रोग, भय और कष्टों का नाश होता है। माता की कृपा से साधक को समृद्धि, यश, और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उनका सान्निध्य हमारे जीवन में नई ऊर्जा और उमंग का संचार करता है।

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