Krishna Keelak Stotra

Shree Krishna Keelak Stotra: श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र

Shree Krishna Keelak Stotra: श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र: श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र का केवल 31 बार पाठ करने से मन को अद्भुत शांति और विचारों में सकारात्मकता का अनुभव होता है। लेकिन इसकी एक शर्त है: सबसे पहले गणेश जी के किसी भी सरल मंत्र का जाप करें। Krishna Keelak Stotra उसके बाद, पूर्ण एकाग्रता के साथ श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र का पाठ करें। जब तक आप अपनी आँखें बंद न कर लें, तब तक अपने मन को ध्यानस्थ न मानें। वे लोग जिनका शरीर ज्ञान से पवित्र है, जिनके पास दिव्य दृष्टि (तीसरी आँख) है—जो केवल लोक-कल्याण के लिए है—

और जो अपने मस्तक पर इस स्तोत्र को धारण करते हैं; जो इन ऋषियों और मुनियों के महत्व से परिचित हैं—केवल ऐसे व्यक्ति का ही कल्याण होता है। Krishna Keelak Stotra जो भक्त अन्य मंत्रों का जाप किए बिना, केवल ‘दुर्गा सप्तशती’ स्तोत्र के माध्यम से ही देवी की स्तुति और पूजा करते हैं, Krishna Keelak Stotra उन्हें देवी की पूर्ण कृपा और सिद्धि प्राप्त होती है; उन्हें अपने कार्यों की सिद्धि के लिए किसी अन्य ध्यान या साधना की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनके समस्त कार्य बिना किसी अन्य मंत्र के जाप के ही पूर्ण हो जाते हैं। इस स्तोत्र के संबंध में समाज में कई भ्रांतियाँ (गलत धारणाएँ) प्रचलित हैं।

अक्सर यह कहा जाता है कि यदि इस ‘कीलक स्तोत्र’ का पाठ या स्तुति, इसकी सही विधि अथवा इसके अर्थ को ठीक से समझे बिना की जाए, तो यह निष्फल रहती है—बल्कि इससे हानि होने की भी आशंका रहती है। महर्षि मार्कण्डेय जी ने यह स्थापित किया है कि—अन्य मंत्रों का जाप किए बिना, केवल ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करके देवी की स्तुति करने से ही भक्त को ‘सत्, चित् और आनंद’ (सच्चिदानंद) स्वरूप देवी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। Krishna Keelak Stotra ऐसे भक्तों को अपने कार्यों की सिद्धि के लिए किसी भी मंत्र, औषधि अथवा अन्य किसी भी उपाय की आवश्यकता नहीं पड़ती।

श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र के लाभ:Benefits of Shri Krishna Kilak Stotra

जो मनुष्य नियमित रूप से इस ‘सप्तशती’ का पाठ और अध्ययन करता है, यह सिद्ध हो जाता है कि वह देवताओं की सभा में बैठने योग्य है और वह ‘गंधर्व’ तुल्य है। Krishna Keelak Stotra भले ही वह स्वभाव से भयभीत रहने वाला व्यक्ति हो, किंतु इस संसार में उसे कहीं भी किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता। Krishna Keelak Stotra वह मृत्यु के अधीन नहीं होता, और अंततः उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है; परंतु ‘कीलक’ (कीलित करने की विधि) के रहस्य को जानकर ही ‘सप्तशती’ का पाठ करना चाहिए।

जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता, उसका पतन हो जाता है। ‘कीलन’ (कीलित करने की विधि) और ‘विनियोग’ (प्रयोग विधि) का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात्, विद्वान और पवित्र आचरण वाले मनुष्य इस पावन ‘श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र’ का पाठ करना आरंभ करते हैं। स्त्रियों में जो भी सौभाग्य दिखाई देता है, वह इसी पाठ का आशीर्वाद है; इसलिए इस कल्याणकारी स्तोत्र का पाठ सदैव करना चाहिए।

इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए:Who should recite this stotra

जिन व्यक्तियों को पारिवारिक मामलों में हानि हो रही हो या रिश्तों में समस्याएं आ रही हों, उन्हें ‘श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए।

ॐ गोपिका-वृन्द-मध्यस्थं, रास-क्रीडा-स-मण्डलम् ।
क्लम प्रसति केशालिं, भजेऽम्बुज-रूचि हरिम् ।।

विद्रावय महा-शत्रून्, जल-स्थल-गतान् प्रभो ।
ममाभीष्ट-वरं देहि, श्रीमत्-कमल-लोचन ।।

भवाम्बुधेः पाहि पाहि, प्राण-नाथ, कृपा-कर ।
हर त्वं सर्व-पापानि, वांछा-कल्प-तरोर्मम ।।

जले रक्ष स्थले रक्ष, रक्ष मां भव-सागरात् ।
कूष्माण्डान् भूत-गणान्, चूर्णय त्वं महा-भयम् ।।

शंख-स्वनेन शत्रूणां, हृदयानि विकम्पय ।
देहि देहि महा-भूति, सर्व-सम्पत्-करं परम् ।।

वंशी-मोहन-मायेश, गोपी-चित्त-प्रसादक ।
ज्वरं दाहं मनो दाहं, बन्ध बन्धनजं भयम् ।।

निष्पीडय सद्यः सदा, गदा-धर गदाऽग्रजः ।
इति श्रीगोपिका-कान्तं, कीलकं परि-कीर्तितम् ।
यः पठेत् निशि वा पंच, मनोऽभिलषितं भवेत् ।
सकृत् वा पंचवारं वा, यः पठेत् तु चतुष्पथे ।।

शत्रवः तस्य विच्छिनाः, स्थान-भ्रष्टा पलायिनः ।
दरिद्रा भिक्षुरूपेण, क्लिश्यन्ते नात्र संशयः ।।

ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय स्वाहा ।।

।। इति श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र विशेषताएँ:

एक बार माता पार्वती कृष्ण बनी तथा श्री शिवजी माँ राधा बने। उन्हीं पार्वती रूप कृष्ण की उपासना हेतु उक्त ‘कृष्ण-कीलक’ की रचना हुई। यदि रात्रि में घर पर इसके 5 पाठ करें, तो मनोकामना पूरी होगी। दुष्ट लोग यदि दुःख देते हों, तो सूर्यास्त के बाद चैराहे पर एक या पाँच पाठ करे, तो शत्रु विच्छिन होकर दरिद्रता एवं व्याधि से पीड़ित होकर भाग जायेगें।

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