Sri Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा

Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा: एक विस्तृत दृष्टिकोण Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध स्तुति है जो देवी ललिता, शक्ति के एक रूप की स्तुति करती है। यह चालीसा देवी के विभिन्न रूपों, उनके गुणों और उनके भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करती है। ललिता चालीसा एक भक्ति गीत है जो ललिता माता पर आधारित है। Lalita Chalisa ललिता चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 40 छन्दों से बनी है। ललिता माता के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं। Lalita Chalisa:ललिता देवी कौन हैं? ललिता देवी को शक्ति का सर्वोच्च रूप माना जाता है। Lalita Chalisa उन्हें त्रिपुर सुंदरी, राजराजेश्वरी और शारदा के नाम से भी जाना जाता है। वे सृष्टि, पालन और संहार की देवी हैं। ललिता देवी को अत्यंत शक्तिशाली और दयालु माना जाता है। Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा का महत्व Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा का पाठ कैसे करें? Sri Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा ॥ चौपाई ॥जयति जयति जय ललिते माता।तव गुण महिमा है विख्याता॥तू सुन्दरी, त्रिपुरेश्वरी देवी।सुर नर मुनि तेरे पद सेवी॥ तू कल्याणी कष्ट निवारिणी।तू सुख दायिनी, विपदा हारिणी॥मोह विनाशिनी दैत्य नाशिनी।भक्त भाविनी ज्योति प्रकाशिनी॥ आदि शक्ति श्री विद्या रूपा।चक्र स्वामिनी देह अनूपा॥ह्रदय निवासिनी-भक्त तारिणी।नाना कष्ट विपति दल हारिणी॥ दश विद्या है रुप तुम्हारा।श्री चन्द्रेश्वरी नैमिष प्यारा॥धूमा, बगला, भैरवी, तारा।भुवनेश्वरी, कमला, विस्तारा॥ षोडशी, छिन्न्मस्ता, मातंगी।ललितेशक्ति तुम्हारी संगी॥ललिते तुम हो ज्योतित भाला।भक्त जनों का काम संभाला॥ भारी संकट जब-जब आये।उनसे तुमने भक्त बचाए॥जिसने कृपा तुम्हारी पायी।उसकी सब विधि से बन आयी॥ संकट दूर करो माँ भारी।भक्त जनों को आस तुम्हारी॥त्रिपुरेश्वरी, शैलजा, भवानी।जय जय जय शिव की महारानी॥ योग सिद्दि पावें सब योगी।भोगें भोग महा सुख भोगी॥कृपा तुम्हारी पाके माता।जीवन सुखमय है बन जाता॥ दुखियों को तुमने अपनाया।महा मूढ़ जो शरण न आया॥तुमने जिसकी ओर निहारा।मिली उसे सम्पत्ति, सुख सारा॥ आदि शक्ति जय त्रिपुर प्यारी।महाशक्ति जय जय, भय हारी॥कुल योगिनी, कुण्डलिनी रूपा।लीला ललिते करें अनूपा॥ महा-महेश्वरी, महा शक्ति दे।त्रिपुर-सुन्दरी सदा भक्ति दे॥महा महा-नन्दे कल्याणी।मूकों को देती हो वाणी॥ इच्छा-ज्ञान-क्रिया का भागी।होता तब सेवा अनुरागी॥जो ललिते तेरा गुण गावे।उसे न कोई कष्ट सतावे॥ सर्व मंगले ज्वाला-मालिनी।तुम हो सर्व शक्ति संचालिनी॥आया माँ जो शरण तुम्हारी।विपदा हरी उसी की सारी॥ नामा कर्षिणी, चिन्ता कर्षिणी।सर्व मोहिनी सब सुख-वर्षिणी॥महिमा तव सब जग विख्याता।तुम हो दयामयी जग माता॥ सब सौभाग्य दायिनी ललिता।तुम हो सुखदा करुणा कलिता॥आनन्द, सुख, सम्पत्ति देती हो।कष्ट भयानक हर लेती हो॥ मन से जो जन तुमको ध्यावे।वह तुरन्त मन वांछित पावे॥लक्ष्मी, दुर्गा तुम हो काली।तुम्हीं शारदा चक्र-कपाली॥ मूलाधार, निवासिनी जय जय।सहस्रार गामिनी माँ जय जय॥छ: चक्रों को भेदने वाली।करती हो सबकी रखवाली॥ योगी, भोगी, क्रोधी, कामी।सब हैं सेवक सब अनुगामी॥सबको पार लगाती हो माँ।सब पर दया दिखाती हो माँ॥ हेमावती, उमा, ब्रह्माणी।भण्डासुर कि हृदय विदारिणी॥सर्व विपति हर, सर्वाधारे।तुमने कुटिल कुपंथी तारे॥ चन्द्र- धारिणी, नैमिश्वासिनी।कृपा करो ललिते अधनाशिनी॥भक्त जनों को दरस दिखाओ।संशय भय सब शीघ्र मिटाओ॥ जो कोई पढ़े ललिता चालीसा।होवे सुख आनन्द अधीसा॥जिस पर कोई संकट आवे।पाठ करे संकट मिट जावे॥ ध्यान लगा पढ़े इक्कीस बारा।पूर्ण मनोरथ होवे सारा॥पुत्र-हीन संतति सुख पावे।निर्धन धनी बने गुण गावे॥ इस विधि पाठ करे जो कोई।दुःख बन्धन छूटे सुख होई॥जितेन्द्र चन्द्र भारतीय बतावें।पढ़ें चालीसा तो सुख पावें॥ सबसे लघु उपाय यह जानो।सिद्ध होय मन में जो ठानो॥ललिता करे हृदय में बासा।सिद्दि देत ललिता चालीसा॥ ॥ दोहा ॥ललिते माँ अब कृपा करो,सिद्ध करो सब काम।श्रद्धा से सिर नाय करे,करते तुम्हें प्रणाम॥

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Sharda Chalisa:शारदा चालीसा

Sharda Chalisa:श्री शारदा चालीसा: ज्ञान की देवी का स्तुतिगान Sharda Chalisa:श्री शारदा चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्तोत्र है जो ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। माँ सरस्वती को विद्या, बुद्धि और कला की देवी माना जाता है। यह चालीसा विद्यार्थियों, लेखकों, कलाकारों और सभी ज्ञान चाहने वालों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। Sharda Chalisa:चालीसा का महत्व Sharda Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Sharda Chalisa:शारदा चालीसा Sharda Chalisa:शारदा चालीसा एक भक्ति गीत है जो शारदा माता पर आधारित है। ॥ दोहा ॥मूर्ति स्वयंभू शारदा,मैहर आन विराज।माला, पुस्तक, धारिणी,वीणा कर में साज॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय शारदा महारानी।आदि शक्ति तुम जग कल्याणी॥रूप चतुर्भुज तुम्हरो माता।तीन लोक महं तुम विख्याता॥ दो सहस्र बर्षहि अनुमाना।प्रगट भई शारद जग जाना॥मैहर नगर विश्व विख्याता।जहाँ बैठी शारद जग माता॥ त्रिकूट पर्वत शारदा वासा।मैहर नगरी परम प्रकाशा॥शरद इन्दु सम बदन तुम्हारो।रूप चतुर्भुज अतिशय प्यारो॥ कोटि सूर्य सम तन द्युति पावन।राज हंस तुम्हारो शचि वाहन॥कानन कुण्डल लोल सुहावहि।उरमणि भाल अनूप दिखावहिं॥ वीणा पुस्तक अभय धारिणी।जगत्मातु तुम जग विहारिणी॥ब्रह्म सुता अखंड अनूपा।शारद गुण गावत सुरभूपा॥ हरिहर करहिं शारदा बन्दन।बरुण कुबेर करहिं अभिनन्दन॥शारद रूप चण्डी अवतारा।चण्ड-मुण्ड असुरन संहारा॥ महिषा सुर वध कीन्हि भवानी।दुर्गा बन शारद कल्याणी॥धरा रूप शारद भई चण्डी।रक्त बीज काटा रण मुण्डी॥ तुलसी सूर्य आदि विद्वाना।शारद सुयश सदैव बखाना॥कालिदास भए अति विख्याता।तुम्हारी दया शारदा माता॥ वाल्मीक नारद मुनि देवा।पुनि-पुनि करहिं शारदा सेवा॥चरण-शरण देवहु जग माया।सब जग व्यापहिं शारद माया॥ अणु-परमाणु शारदा वासा।परम शक्तिमय परम प्रकाशा॥हे शारद तुम ब्रह्म स्वरूपा।शिव विरंचि पूजहिं नर भूपा॥ ब्रह्म शक्ति नहि एकउ भेदा।शारद के गुण गावहिं वेदा॥जय जग बन्दनि विश्व स्वरुपा।निर्गुण-सगुण शारदहिं रुपा॥ सुमिरहु शारद नाम अखंडा।व्यापइ नहिं कलिकाल प्रचण्डा॥सूर्य चन्द्र नभ मण्डल तारे।शारद कृपा चमकते सारे॥ उद्भव स्थिति प्रलय कारिणी।बन्दउ शारद जगत तारिणी॥दु:ख दरिद्र सब जाहिं नसाई।तुम्हारी कृपा शारदा माई॥ परम पुनीति जगत अधारा।मातु शारदा ज्ञान तुम्हारा॥विद्या बुद्धि मिलहिं सुखदानी।जय जय जय शारदा भवानी॥ शारदे पूजन जो जन करहीं।निश्चय ते भव सागर तरहीं॥शारद कृपा मिलहिं शुचि ज्ञाना।होई सकल विधि अति कल्याणा॥ जग के विषय महा दु:ख दाई।भजहुँ शारदा अति सुख पाई॥परम प्रकाश शारदा तोरा।दिव्य किरण देवहुँ मम ओरा॥ परमानन्द मगन मन होई।मातु शारदा सुमिरई जोई॥चित्त शान्त होवहिं जप ध्याना।भजहुँ शारदा होवहिं ज्ञाना॥ रचना रचित शारदा केरी।पाठ करहिं भव छटई फेरी॥सत्–सत् नमन पढ़ीहे धरिध्याना।शारद मातु करहिं कल्याणा॥ शारद महिमा को जग जाना।नेति-नेति कह वेद बखाना॥सत्–सत् नमन शारदा तोरा।कृपा दृष्टि कीजै मम ओरा॥ जो जन सेवा करहिं तुम्हारी।तिन कहँ कतहुँ नाहि दु:खभारी॥जो यह पाठ करै चालीसा।मातु शारदा देहुँ आशीषा॥ ॥ दोहा ॥बन्दउँ शारद चरण रज,भक्ति ज्ञान मोहि देहुँ।सकल अविद्या दूर कर,सदा बसहु उरगेहुँ॥ जय-जय माई शारदा,मैहर तेरौ धाम।शरण मातु मोहिं लीजिए,तोहि भजहुँ निष्काम॥

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Ravidas Chalisa:रविदास चालीसा

Ravidas Chalisa:श्री रविदास चालीसा: भक्ति और समता का प्रतीक Ravidas Chalisa:श्री रविदास चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्तोत्र है जो संत रविदास जी को समर्पित है। संत रविदास जी एक महान संत और कवि थे जिन्होंने भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। Ravidas Chalisa उनकी शिक्षाएं समता, भाईचारे और ईश्वर भक्ति पर केंद्रित थीं। Ravidas Chalisa:चालीसा का महत्व Ravidas Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Ravidas Chalisa:रविदास चालीसा ॥ दोहा ॥ बंदौं वीणा पाणि को,देहु आय मोहिं ज्ञान।पाय बुद्धि रविदास को,करौं चरित्र बखान॥ मातु की महिमा अमित है,लिखि न सकत है दास।ताते आयों शरण में,पुरवहु जन की आस॥ ॥ चौपाई ॥ जै होवै रविदास तुम्हारी।कृपा करहु हरिजन हितकारी॥राहू भक्त तुम्हारे ताता।कर्मा नाम तुम्हारी माता॥ काशी ढिंग माडुर स्थाना।वर्ण अछूत करत गुजराना॥द्वादश वर्ष उम्र जब आई।तुम्हरे मन हरि भक्ति समाई॥ रामानन्द के शिष्य कहाये।पाय ज्ञान निज नाम बढ़ाये॥शास्त्र तर्क काशी में कीन्हों।ज्ञानिन को उपदेश है दीन्हों॥ गंग मातु के भक्त अपारा।कौड़ी दीन्ह उनहिं उपहारा॥पंडित जन ताको लै जाई।गंग मातु को दीन्ह चढ़ाई॥ हाथ पसारि लीन्ह चौगानी।भक्त की महिमा अमित बखानी॥चकित भये पंडित काशी के।देखि चरित भव भय नाशी के॥ रल जटित कंगन तब दीन्हाँ।रविदास अधिकारी कीन्हाँ॥पंडित दीजौ भक्त को मेरे।आदि जन्म के जो हैं चेरे॥ पहुँचे पंडित ढिग रविदासा।दै कंगन पुरइ अभिलाषा॥तब रविदास कही यह बाता।दूसर कंगन लावहु ताता॥ पंडित जन तब कसम उठाई।दूसर दीन्ह न गंगा माई॥तब रविदास ने वचन उचारे।पडित जन सब भये सुखारे॥ जो सर्वदा रहै मन चंगा।तौ घर बसति मातु है गंगा॥हाथ कठौती में तब डारा।दूसर कंगन एक निकारा॥ चित संकोचित पंडित कीन्हें।अपने अपने मारग लीन्हें॥तब से प्रचलित एक प्रसंगा।मन चंगा तो कठौती में गंगा॥ एक बार फिरि परयो झमेला।मिलि पंडितजन कीन्हों खेला॥सालिग राम गंग उतरावै।सोई प्रबल भक्त कहलावै॥ सब जन गये गंग के तीरा।मूरति तैरावन बिच नीरा॥डूब गईं सबकी मझधारा।सबके मन भयो दुःख अपारा॥ पत्थर मूर्ति रही उतराई।सुर नर मिलि जयकार मचाई॥रह्यो नाम रविदास तुम्हारा।मच्यो नगर महँ हाहाकारा॥ चीरि देह तुम दुग्ध बहायो।जन्म जनेऊ आप दिखाओ॥देखि चकित भये सब नर नारी।विद्वानन सुधि बिसरी सारी॥ ज्ञान तर्क कबिरा संग कीन्हों।चकित उनहुँ का तुम करि दीन्हों॥गुरु गोरखहि दीन्ह उपदेशा।उन मान्यो तकि संत विशेषा॥ सदना पीर तर्क बहु कीन्हाँ।तुम ताको उपदेश है दीन्हाँ॥मन महँ हार्योो सदन कसाई।जो दिल्ली में खबरि सुनाई॥ मुस्लिम धर्म की सुनि कुबड़ाई।लोधि सिकन्दर गयो गुस्साई॥अपने गृह तब तुमहिं बुलावा।मुस्लिम होन हेतु समुझावा॥ मानी नाहिं तुम उसकी बानी।बंदीगृह काटी है रानी॥कृष्ण दरश पाये रविदासा।सफल भई तुम्हरी सब आशा॥ ताले टूटि खुल्यो है कारा।माम सिकन्दर के तुम मारा॥काशी पुर तुम कहँ पहुँचाई।दै प्रभुता अरुमान बड़ाई॥ मीरा योगावति गुरु कीन्हों।जिनको क्षत्रिय वंश प्रवीनो॥तिनको दै उपदेश अपारा।कीन्हों भव से तुम निस्तारा॥ ॥ दोहा ॥ ऐसे ही रविदास ने,कीन्हें चरित अपार।कोई कवि गावै कितै,तहूं न पावै पार॥ नियम सहित हरिजन अगर,ध्यान धरै चालीसा।ताकी रक्षा करेंगे,जगतपति जगदीशा॥

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Shri Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा

Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा: जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा जैन धर्म का एक प्रसिद्ध और भक्तिमय स्तोत्र है जो भगवान महावीर को समर्पित है। यह चालीसा भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है और उन्हें मोक्ष के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। Mahavir Chalisa:चालीसा का महत्व Mahavir Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? निष्कर्ष श्री Mahavir Chalisa महावीर चालीसा एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्रदान करता है। यदि आप जैन धर्म के अनुयायी हैं, तो आपको नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करना चाहिए। Shri Mahavir Chalisa:श्री महावीर चालीसा श्री महावीर चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री Mahavir Chalisa महावीर पर आधारित है। ॥ दोहा॥शीश नवा अरिहन्त को,सिद्धन करूँ प्रणाम।उपाध्याय आचार्य का,ले सुखकारी नाम॥ सर्व साधु और सरस्वती,जिन मन्दिर सुखकार।महावीर भगवान को,मन-मन्दिर में धार॥ ॥ चौपाई ॥जय महावीर दयालु स्वामी।वीर प्रभु तुम जग में नामी॥वर्धमान है नाम तुम्हारा।लगे हृदय को प्यारा प्यारा॥ शांति छवि और मोहनी मूरत।शान हँसीली सोहनी सूरत॥तुमने वेश दिगम्बर धारा।कर्म-शत्रु भी तुम से हारा॥ क्रोध मान अरु लोभ भगाया।महा-मोह तमसे डर खाया॥तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता।तुझको दुनिया से क्या नाता॥ तुझमें नहीं राग और द्वेश।वीर रण राग तू हितोपदेश॥तेरा नाम जगत में सच्चा।जिसको जाने बच्चा बच्चा॥ भूत प्रेत तुम से भय खावें।व्यन्तर राक्षस सब भग जावें॥महा व्याध मारी न सतावे।महा विकराल काल डर खावे॥ काला नाग होय फन-धारी।या हो शेर भयंकर भारी॥ना हो कोई बचाने वाला।स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला॥ अग्नि दावानल सुलग रही हो।तेज हवा से भड़क रही हो॥नाम तुम्हारा सब दुख खोवे।आग एकदम ठण्डी होवे॥ हिंसामय था भारत सारा।तब तुमने कीना निस्तारा॥जन्म लिया कुण्डलपुर नगरी।हुई सुखी तब प्रजा सगरी॥ सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे।त्रिशला के आँखों के तारे॥छोड़ सभी झंझट संसारी।स्वामी हुए बाल-ब्रह्मचारी॥ पंचम काल महा-दुखदाई।चाँदनपुर महिमा दिखलाई॥टीले में अतिशय दिखलाया।एक गाय का दूध गिराया॥ सोच हुआ मन में ग्वाले के।पहुँचा एक फावड़ा लेके॥सारा टीला खोद बगाया।तब तुमने दर्शन दिखलाया॥ जोधराज को दुख ने घेरा।उसने नाम जपा जब तेरा॥ठंडा हुआ तोप का गोला।तब सब ने जयकारा बोला॥ मन्त्री ने मन्दिर बनवाया।राजा ने भी द्रव्य लगाया॥बड़ी धर्मशाला बनवाई।तुमको लाने को ठहराई॥ तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी।पहिया खसका नहीं अगाड़ी॥ग्वाले ने जो हाथ लगाया।फिर तो रथ चलता ही पाया॥ पहिले दिन बैशाख वदी के।रथ जाता है तीर नदी के॥मीना गूजर सब ही आते।नाच-कूद सब चित उमगाते॥ स्वामी तुमने प्रेम निभाया।ग्वाले का बहु मान बढ़ाया॥हाथ लगे ग्वाले का जब ही।स्वामी रथ चलता है तब ही॥ मेरी है टूटी सी नैया।तुम बिन कोई नहीं खिवैया॥मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर।मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर॥ तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ।जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ॥चालीसे को चन्द्र बनावे।बीर प्रभु को शीश नवावे॥ ॥ सोरठा ॥नित चालीसहि बार,पाठ करे चालीस दिन।खेय सुगन्ध अपार,वर्धमान के सामने। होय कुबेर समान,जन्म दरिद्री होय जो।जिसके नहिं सन्तान,नाम वंश जग में चले।

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Shri Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा

Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा: भक्ति और आस्था का एक मंत्र Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक पाठ है, जिसे भक्तगण Baba Gangaram Chalisa बाबा गंगाराम जी की आराधना और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं। यह चालीसा बाबा के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों का वर्णन करती है, जो भक्तों को प्रेरणा और मार्गदर्शन देती है। Baba Gangaram Chalisa:चालीसा का महत्व Baba Gangaram Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Baba Gangaram Chalisa:श्री बाबा गंगाराम चालीसा श्री बाबा गंगाराम चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री बाबा गंगाराम पर आधारित है। ॥ दोहा ॥अलख निरंजन आप हैं,निरगुण सगुण हमेश।नाना विधि अवतार धर,हरते जगत कलेश॥ बाबा गंगारामजी,हुए विष्णु अवतार।चमत्कार लख आपका,गूँज उठी जयकार॥ ॥ चौपाई ॥गंगाराम देव हितकारी।वैश्य वंश प्रकटे अवतारी॥पूर्वजन्म फल अमित रहेऊ।धन्य-धन्य पितु मातु भयेउ॥ उत्तम कुल उत्तम सतसंगा।पावन नाम राम अरू गंगा॥बाबा नाम परम हितकारी।सत सत वर्ष सुमंगलकारी॥ बीतहिं जन्म देह सुध नाहीं।तपत तपत पुनि भयेऊ गुसाई॥जो जन बाबा में चित लावा।तेहिं परताप अमर पद पावा॥ नगर झुंझनूं धाम तिहारो।शरणागत के संकट टारो॥धरम हेतु सब सुख बिसराये।दीन हीन लखि हृदय लगाये॥ एहि विधि चालीस वर्ष बिताये।अन्त देह तजि देव कहाये॥देवलोक भई कंचन काया।तब जनहित संदेश पठाया॥ निज कुल जन को स्वप्न दिखावा।भावी करम जतन बतलावा॥आपन सुत को दर्शन दीन्हों।धरम हेतु सब कारज कीन्हों॥ नभ वाणी जब हुई निशा में।प्रकट भई छवि पूर्व दिशा में॥ब्रह्मा विष्णु शिव सहित गणेशा।जिमि जनहित प्रकटेउ सब ईशा॥ चमत्कार एहि भाँति दिखाया।अन्तरध्यान भई सब माया॥सत्य वचन सुनि करहिं विचारा।मन महँ गंगाराम पुकारा॥ जो जन करई मनौती मन में।बाबा पीर हरहिं पल छन में॥ज्यों निज रूप दिखावहिं सांचा।त्यों त्यों भक्तवृन्द तेहिं जांचा॥ उच्च मनोरथ शुचि आचारी।राम नाम के अटल पुजारी॥जो नित गंगाराम पुकारे।बाबा दुख से ताहिं उबारे॥ बाबा में जिन्ह चित्त लगावा।ते नर लोक सकल सुख पावा॥परहित बसहिं जाहिं मन मांही।बाबा बसहिं ताहिं तन मांही॥ धरहिं ध्यान रावरो मन में।सुखसंतोष लहै न मन में॥धर्म वृक्ष जेही तन मन सींचा।पार ब्रह्म तेहि निज में खींचा॥ गंगाराम नाम जो गावे।लहि बैकुंठ परम पद पावे॥बाबा पीर हरहिं सब भाँति।जो सुमरे निश्छल दिन राती॥ दीन बन्धु दीनन हितकारी।हरौ पाप हम शरण तिहारी॥पंचदेव तुम पूर्ण प्रकाशा।सदा करो संतन मँह बासा॥ तारण तरण गंग का पानी।गंगाराम उभय सुनिशानी॥कृपासिंधु तुम हो सुखसागर।सफल मनोरथ करहु कृपाकर॥ झुंझनूं नगर बड़ा बड़ भागी।जहँ जन्में बाबा अनुरागी॥पूरन ब्रह्म सकल घटवासी।गंगाराम अमर अविनाशी॥ ब्रह्म रूप देव अति भोला।कानन कुण्डल मुकुट अमोला॥नित्यानन्द तेज सुख रासी।हरहु निशातन करहु प्रकासी॥ गंगा दशहरा लागहिं मेला।नगर झुंझनूं मँह शुभ बेला॥जो नर कीर्तन करहिं तुम्हारा।छवि निरखि मन हरष अपारा॥ प्रात: काल ले नाम तुम्हारा।चौरासी का हो निस्तारा॥पंचदेव मन्दिर विख्याता।दरशन हित भगतन का तांता॥ जय श्री गंगाराम नाम की।भवतारण तरि परम धाम की॥‘महावीर’ धर ध्यान पुनीता।विरचेउ गंगाराम सुगीता॥ ॥ दोहा ॥सुने सुनावे प्रेम से,कीर्तन भजन सुनाम।मन इच्छा सब कामना,पुरई गंगाराम॥

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Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा कब है, जानें इस दिन का महत्‍व शुभ मुहूर्त और पूजाविधि 

Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा 2024: तिथि, महत्त्व, शुभ मुहूर्त और पूजाविधि Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा 2024 की तिथिSharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और इसे आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। Sharad Purnima 2024:में शरद पूर्णिमा की तिथि इसलिए, 17 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा का महत्त्व शरद पूर्णिमा का विशेष महत्त्व हिंदू धर्म में है क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी पूरी चमक और रूप में होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। इसे धन, आरोग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन कोजागरी व्रत करने और चंद्रमा की पूजा करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है। शरद पूर्णिमा का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन गोपियों के साथ महारास का आयोजन किया था। इसलिए, इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। यह दिन भक्ति और प्रेम का प्रतीक है और ब्रज में इसे विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन व्रत और पूजन का विशेष महत्त्व है। भक्तजन उपवास करते हैं और रात में चंद्रमा के प्रकाश में खीर बनाकर उसे बाहर रखते हैं ताकि चंद्रमा की किरणों का प्रभाव उस पर पड़ सके। मान्यता है कि इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। Sharad Purnima 2024:शुभ मुहूर्त और पूजा विधि शरद पूर्णिमा की पूजा के लिए सही समय का निर्धारण बहुत महत्वपूर्ण है। चंद्रमा का पूजन रात के समय किया जाता है, जब वह अपनी पूर्ण कलाओं में होता है। Sharad Purnima 2024:शुभ मुहूर्तरात के समय चंद्रमा की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए, रात्रि 11:45 बजे से लेकर 12:30 बजे के बीच चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा करना शुभ होता है। यह समय खासतौर से लक्ष्मी पूजन और चंद्र पूजन के लिए उपयुक्त माना गया है। Sharad Purnima 2024:पूजा विधि शरद पूर्णिमा की पूजा विधि में खास ध्यान देने वाली बात यह है कि इस दिन देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मां लक्ष्मी के 108 नामों का जाप किया जाता है और साथ ही विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा पर क्या करें Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा पर क्या न करें निष्कर्षशरद पूर्णिमा का त्योहार श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। इस दिन चंद्रमा की पूजा और देवी लक्ष्मी का आह्वान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा

Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा: एक शक्तिशाली स्तुति Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा हिंदू धर्म में एक लोकप्रिय और शक्तिशाली स्तुति है जो जाहरवीर जी को समर्पित है। जाहरवीर जी को एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है Shri Jaharveer Chalisa कि वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, रोग मुक्ति और अन्य कई लाभ प्राप्त होते हैं। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का महत्व Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का पाठ करने का समय आप जाहरवीर चालीसा का पाठ दिन में किसी भी समय कर सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा के लाभ Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा ॥ दोहा ॥सुवन केहरी जेवर,सुत महाबली रनधीर।बन्दौं सुत रानी बाछला,विपत निवारण वीर॥ जय जय जय चौहान,वन्स गूगा वीर अनूप।अनंगपाल को जीतकर,आप बने सुर भूप॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय जाहर रणधीरा।पर दुख भंजन बागड़ वीरा॥गुरु गोरख का है वरदानी।जाहरवीर जोधा लासानी॥ गौरवरण मुख महा विशाला।माथे मुकट घुंघराले बाला॥कांधे धनुष गले तुलसी माला।कमर कृपान रक्षा को डाला॥ जन्में गूगावीर जग जाना।ईसवी सन हजार दरमियाना॥बल सागर गुण निधि कुमारा।दुखी जनों का बना सहारा॥ बागड़ पति बाछला नन्दन।जेवर सुत हरि भक्त निकन्दन॥जेवर राव का पुत्र कहाये।माता पिता के नाम बढ़ाये॥ पूरन हुई कामना सारी।जिसने विनती करी तुम्हारी॥सन्त उबारे असुर संहारे।भक्त जनों के काज संवारे॥ गूगावीर की अजब कहानी।जिसको ब्याही श्रीयल रानी॥बाछल रानी जेवर राना।महादुःखी थे बिन सन्ताना॥ भंगिन ने जब बोली मारी।जीवन हो गया उनको भारी॥सूखा बाग पड़ा नौलक्खा।देख-देख जग का मन दुक्खा॥ कुछ दिन पीछे साधू आये।चेला चेली संग में लाये॥जेवर राव ने कुआ बनवाया।उद्घाटन जब करना चाहा॥ खारी नीर कुए से निकला।राजा रानी का मन पिघला॥रानी तब ज्योतिषी बुलवाया।कौन पाप मैं पुत्र न पाया॥ कोई उपाय हमको बतलाओ।उन कहा गोरख गुरु मनाओ॥गुरु गोरख जो खुश हो जाई।सन्तान पाना मुश्किल नाई॥ बाछल रानी गोरख गुन गावे।नेम धर्म को न बिसरावे॥करे तपस्या दिन और राती।एक वक्त खाय रूखी चपाती॥ कार्तिक माघ में करे स्नाना।व्रत इकादसी नहीं भुलाना॥पूरनमासी व्रत नहीं छोड़े।दान पुण्य से मुख नहीं मोड़े॥ चेलों के संग गोरख आये।नौलखे में तम्बू तनवाये॥मीठा नीर कुए का कीना।सूखा बाग हरा कर दीना॥ मेवा फल सब साधु खाए।अपने गुरु के गुन को गाये॥औघड़ भिक्षा मांगने आए।बाछल रानी ने दुख सुनाये॥ औघड़ जान लियो मन माहीं।तप बल से कुछ मुश्किल नाहीं॥रानी होवे मनसा पूरी।गुरु शरण है बहुत जरूरी॥ बारह बरस जपा गुरु नामा।तब गोरख ने मन में जाना॥पुत्र देन की हामी भर ली।पूरनमासी निश्चय कर ली॥ काछल कपटिन गजब गुजारा।धोखा गुरु संग किया करारा॥बाछल बनकर पुत्र पाया।बहन का दरद जरा नहीं आया॥ औघड़ गुरु को भेद बताया।तब बाछल ने गूगल पाया॥कर परसादी दिया गूगल दाना।अब तुम पुत्र जनो मरदाना॥ लीली घोड़ी और पण्डतानी।लूना दासी ने भी जानी॥रानी गूगल बाट के खाई।सब बांझों को मिली दवाई॥ नरसिंह पंडित लीला घोड़ा।भज्जु कुतवाल जना रणधीरा॥रूप विकट धर सब ही डरावे।जाहरवीर के मन को भावे॥ भादों कृष्ण जब नौमी आई।जेवरराव के बजी बधाई॥विवाह हुआ गूगा भये राना।संगलदीप में बने मेहमाना॥ रानी श्रीयल संग परे फेरे।जाहर राज बागड़ का करे॥अरजन सरजन काछल जने।गूगा वीर से रहे वे तने॥ दिल्ली गए लड़ने के काजा।अनंग पाल चढ़े महाराजा॥उसने घेरी बागड़ सारी।जाहरवीर न हिम्मत हारी॥ अरजन सरजन जान से मारे।अनंगपाल ने शस्त्र डारे॥चरण पकड़कर पिण्ड छुड़ाया।सिंह भवन माड़ी बनवाया॥ उसीमें गूगावीर समाये।गोरख टीला धूनी रमाये॥पुण्य वान सेवक वहाँ आये।तन मन धन से सेवा लाए॥ मनसा पूरी उनकी होई।गूगावीर को सुमरे जोई॥चालीस दिन पढ़े जाहर चालीसा।सारे कष्ट हरे जगदीसा॥ दूध पूत उन्हें दे विधाता।कृपा करे गुरु गोरखनाथ॥

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Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा

Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा: एक पवित्र स्तुति Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तुति है जो तुलसी माता को समर्पित है। Tulasi Chalisa तुलसी को हिंदू धर्म में एक पवित्र पौधा माना जाता है और इसे घरों में लगाने का विशेष महत्व है। तुलसी चालीसा का पाठ करने से धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का महत्व Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का समय Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का कोई विशेष समय नहीं है। Tulasi Chalisa आप इसे दिन में किसी भी समय पढ़ सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा के लाभ Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी ।नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी ॥ श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब ।जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ॥ ॥ चौपाई ॥धन्य धन्य श्री तलसी माता ।महिमा अगम सदा श्रुति गाता ॥ हरि के प्राणहु से तुम प्यारी ।हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी ॥ जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो ।तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ॥ हे भगवन्त कन्त मम होहू ।दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ॥ ४ ॥ सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी ।दीन्हो श्राप कध पर आनी ॥ उस अयोग्य वर मांगन हारी ।होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ॥ सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा ।करहु वास तुहू नीचन धामा ॥ दियो वचन हरि तब तत्काला ।सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला ॥ ८ ॥ समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा ।पुजिहौ आस वचन सत मोरा ॥ तब गोकुल मह गोप सुदामा ।तासु भई तुलसी तू बामा ॥ कृष्ण रास लीला के माही ।राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ॥ दियो श्राप तुलसिह तत्काला ।नर लोकही तुम जन्महु बाला ॥ १२ ॥ यो गोप वह दानव राजा ।शङ्ख चुड नामक शिर ताजा ॥ तुलसी भई तासु की नारी ।परम सती गुण रूप अगारी ॥ अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ ।कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ॥ वृन्दा नाम भयो तुलसी को ।असुर जलन्धर नाम पति को ॥ १६ ॥ करि अति द्वन्द अतुल बलधामा ।लीन्हा शंकर से संग्राम ॥ जब निज सैन्य सहित शिव हारे ।मरही न तब हर हरिही पुकारे ॥ पतिव्रता वृन्दा थी नारी ।कोऊ न सके पतिहि संहारी ॥ तब जलन्धर ही भेष बनाई ।वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई ॥ २० ॥ शिव हित लही करि कपट प्रसंगा ।कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ॥ भयो जलन्धर कर संहारा ।सुनी उर शोक उपारा ॥ तिही क्षण दियो कपट हरि टारी ।लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी ॥ जलन्धर जस हत्यो अभीता ।सोई रावन तस हरिही सीता ॥ २४ ॥ अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा ।धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा ॥ यही कारण लही श्राप हमारा ।होवे तनु पाषाण तुम्हारा ॥ सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे ।दियो श्राप बिना विचारे ॥ लख्यो न निज करतूती पति को ।छलन चह्यो जब पारवती को ॥ २८ ॥ जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा ।जग मह तुलसी विटप अनूपा ॥ धग्व रूप हम शालिग्रामा ।नदी गण्डकी बीच ललामा ॥ जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं ।सब सुख भोगी परम पद पईहै ॥ बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा ।अतिशय उठत शीश उर पीरा ॥ ३२ ॥ जो तुलसी दल हरि शिर धारत ।सो सहस्त्र घट अमृत डारत ॥ तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी ।रोग दोष दुःख भंजनी हारी ॥ प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।तुलसी राधा में नाही अन्तर ॥ व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा ।बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ॥ ३६ ॥ सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही ।लहत मुक्ति जन संशय नाही ॥ कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत ।तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ॥ बसत निकट दुर्बासा धामा ।जो प्रयास ते पूर्व ललामा ॥ पाठ करहि जो नित नर नारी ।होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।दीपदान करि पुत्र फल पावही बन्ध्यहु नारी ॥ सकल दुःख दरिद्र हरि हार ह्वै परम प्रसन्न ।आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ॥ लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम ।जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ॥ तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम ।मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ॥

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karwa chauth muhurat : करवा चौथ कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, मंत्र, चंद्रोदय और पूजा विधि

karwa chauth:करवा चौथ 2024 हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 20 अक्टूबर 2024 को पड़ रहा है। करवा चौथ व्रत का विशेष महत्व है, और विवाहित महिलाएँ इस दिन अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। व्रत के दिन महिलाएँ सरगी लेकर व्रत की शुरुआत करती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह उनके पति के जीवन और उनकी खुशहाली के लिए होता है। साथ ही, इस व्रत को रखने से घर में सुख-समृद्धि आती है और पारिवारिक जीवन में शांति बनी रहती है। आइए जानते हैं इस दिन का शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय, पूजा विधि, और मंत्र: करवा चौथ 2024 तिथि और शुभ मुहूर्त karwa chauth:करवा चौथ व्रत विधि करवा चौथ के व्रत में महिलाओं द्वारा सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करके व्रत की शुरुआत की जाती है। सरगी को सास द्वारा दिया जाता है, जिसमें सूखे मेवे, मिठाई, फल, और कुछ तरल पदार्थ होते हैं। इसके बाद पूरे दिन निर्जल व्रत रखा जाता है, यानी न तो कुछ खाया जाता है और न ही पानी पिया जाता है। शाम के समय विशेष पूजा अर्चना की जाती है, और फिर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। 1. सरगी का सेवन: सरगी का सेवन सूर्योदय से पहले किया जाता है। इसे खाने से व्रत रखने वाली महिलाओं को पूरे दिन ऊर्जा मिलती है। सरगी में आमतौर पर सूखे मेवे, फल, मिठाई, और कभी-कभी हल्का भोजन भी होता है। यह सास द्वारा अपनी बहू को आशीर्वाद स्वरूप दिया जाता है। 2. पूजा की तैयारी: शाम के समय महिलाएँ सज-धजकर करवा चौथ की पूजा की तैयारी करती हैं। पूजन स्थान को अच्छे से सजाया जाता है, और देवी पार्वती, शिव, गणेश और करवा माता की प्रतिमाओं या चित्रों की पूजा की जाती है। पूजन के लिए करवा (मिट्टी का पात्र) का विशेष महत्व होता है, जिसमें जल भरकर भगवान को अर्पित किया जाता है। 3. karwa chauth:करवा चौथ कथा: करवा चौथ के व्रत के दौरान करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। यह कथा विवाहिता महिलाओं को व्रत के महत्व और इसके पीछे के धार्मिक कारणों को समझने में मदद करती है। कथा सुनने के बाद सभी महिलाएँ एक साथ अपने-अपने करवे को एक-दूसरे के साथ घुमाकर देवी-देवताओं को अर्पित करती हैं। 4. karwa chauth:चंद्रमा को अर्घ्य देना: रात में जब चंद्रमा निकलता है, तब महिलाएँ चंद्र दर्शन करके उन्हें अर्घ्य देती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए एक थाली में दीपक, चावल, जल, और फूल रखकर उसे अर्पित किया जाता है। इसके बाद महिलाएँ छलनी से चंद्रमा और फिर अपने पति का दर्शन करती हैं। पति द्वारा जल पिलाने के बाद व्रत समाप्त होता है और महिलाएँ भोजन ग्रहण करती हैं। karwa chauth:करवा चौथ के मंत्र करवा चौथ की पूजा के दौरान कुछ विशेष मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। ये मंत्र देवी पार्वती और शिव जी की स्तुति के लिए होते हैं, जिससे व्रत का फल अधिक शुभकारी होता है। यहाँ कुछ प्रमुख मंत्र दिए गए हैं: 1. karwa chauth:करवा चौथ व्रत का मुख्य मंत्र: इस मंत्र का जाप करवा चौथ के व्रत के दौरान करने से शिव और पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 2. चंद्रमा को अर्घ्य देते समय मंत्र: चंद्रमा को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का जाप करने से चंद्रमा के शुभ प्रभाव से जीवन में शांति और समृद्धि आती है। 3. पूजन मंत्र: पूजन के समय इस मंत्र का उच्चारण करने से परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्राप्ति होती है। karwa chauth:करवा चौथ के दिन ध्यान रखने योग्य बातें निष्कर्ष करवा चौथ का व्रत हिन्दू समाज में पति-पत्नी के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखमय जीवन की कामना करती हैं। व्रत की पूजा और चंद्रोदय के समय का पालन करना आवश्यक होता है। साथ ही, विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और व्रत के नियमों का पालन करने से यह व्रत अत्यंत फलदायी होता है।

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karwa chauth:करवा चौथ पर इन 10 कामों से अवश्य बचें तभी मिलेगा व्रत का फल

karwa chauth:करवा चौथ हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए मनाती हैं। इस व्रत को करने के दौरान कई धार्मिक नियम और परंपराएँ निभाई जाती हैं। करवा चौथ के व्रत का फल तभी प्राप्त होता है जब इसे पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाए। karwa chauth लेकिन कुछ ऐसी गलतियाँ या काम होते हैं जो इस व्रत के दौरान नहीं करने चाहिए, अन्यथा व्रत का फल नहीं मिलता या इसका प्रभाव कम हो सकता है। यहाँ हम उन 10 कामों के बारे में चर्चा करेंगे जिनसे करवा चौथ के दिन अवश्य बचना चाहिए: 1. Karwa chauth:सूर्योदय के बाद भोजन या जल ग्रहण न करें करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले ही सरगी का सेवन करना आवश्यक होता है। सरगी में सास द्वारा दी गई सामग्री का सेवन किया जाता है, लेकिन एक बार सूर्योदय के बाद कुछ भी खाना-पीना वर्जित होता है। karwa chauth अगर सूर्योदय के बाद गलती से कुछ खा या पी लिया, तो व्रत का फल प्राप्त नहीं होता। अत: पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। 2. क्रोध या झगड़ा करने से बचें व्रत के दिन मन और वचन को शांत रखना बहुत जरूरी होता है। यदि आप क्रोधित हो जाती हैं या किसी से झगड़ा करती हैं, तो इससे नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो व्रत के प्रभाव को कमजोर कर सकती है। शांति और संयम बनाए रखना व्रत की सफलता के लिए आवश्यक है। 3. झूठ न बोलें झूठ बोलना किसी भी धार्मिक कार्य में वर्जित होता है। karwa chauth करवा चौथ के दिन विशेष रूप से सच्चाई का पालन करना चाहिए। झूठ बोलने से व्रत की पुण्यता कम हो जाती है, इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार का झूठ बोलने से बचें। 4. सूर्य या चंद्र दर्शन से पहले व्रत न तोड़ें करवा चौथ का व्रत तभी पूर्ण माना जाता है जब आप चंद्रमा का दर्शन करने के बाद व्रत खोलें। चंद्र दर्शन से पहले जल ग्रहण या भोजन करने से व्रत अधूरा माना जाता है, और इसका फल नहीं मिलता। इसलिए चंद्रमा निकलने के बाद ही व्रत खोलें। 5. अशुद्ध वस्त्र न पहनें धार्मिक कार्यों में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। व्रत के दिन अशुद्ध या बिना धुले कपड़े पहनने से बचें। karwa chauth करवा चौथ के दिन साफ-सुथरे वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, खासकर लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ होता है। 6. सदाचार और नियमों का पालन न करना व्रत के दिन सदाचार, अनुशासन और नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक है। karwa chauth धार्मिक नियमों और मर्यादाओं का पालन न करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो सकता है। इस दिन हर काम को नियम और विधि-विधान के अनुसार करने का प्रयास करें। 7. व्रत के प्रति उदासीनता करवा चौथ का व्रत पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए। अगर आप व्रत के प्रति उदासीन रहती हैं karwa chauth या मन में असंतोष उत्पन्न होता है, तो इसका असर आपके व्रत पर पड़ सकता है। इस दिन सकारात्मकता और विश्वास बनाए रखना जरूरी है। 8. पति के प्रति नकारात्मक विचार न रखें करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इस दिन पति के प्रति मन में कोई नकारात्मक भावना या विचार रखना व्रत के उद्देश्यों के विपरीत होता है। इसलिए, इस दिन पति के प्रति आदर और प्रेम बनाए रखें। 9. अन्य महिलाओं की निंदा न करें धार्मिक परंपराओं के अनुसार, करवा चौथ के दिन किसी की निंदा या बुराई नहीं करनी चाहिए। निंदा या आलोचना करने से व्रत की सकारात्मक ऊर्जा कम हो सकती है। इसलिए इस दिन केवल अच्छे और सकारात्मक विचारों को ही मन में रखें। 10. अपशब्दों का प्रयोग न करें व्रत के दिन वचन का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। अपशब्दों का प्रयोग करना या किसी के प्रति कठोर शब्दों का इस्तेमाल करना व्रत की शुद्धता को भंग कर सकता है। इसलिए व्रत के दिन अपने वचन और भाषा पर संयम रखें और केवल मधुर और स्नेहपूर्ण शब्दों का प्रयोग करें। निष्कर्ष: करवा चौथ का व्रत एक पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे निभाने में पूरी श्रद्धा, भक्ति और नियमों का पालन करना चाहिए। इस व्रत से जुड़े नियमों का पालन करते हुए इन 10 कामों से बचें, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। व्रत का उद्देश्य पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है, और इसे सही तरीके से करने पर ही इसका शुभ परिणाम प्राप्त होता है।

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Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा

Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और उनकी महानता का वर्णन करती है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के निर्माता और शिल्पकला, वास्तुकला, और निर्माण कार्यों के देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें सभी प्रकार के शिल्पकारों, इंजीनियरों, और वास्तुकारों के आराध्य देव माना जाता है। विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करने से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनके जीवन में सुख, समृद्धि, और सफलता लेकर आते हैं। Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा के लाभ: निष्कर्ष: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ न केवल शिल्पकारों और तकनीकी कर्मियों के लिए बल्कि हर व्यक्ति के लिए लाभकारी होता है। यह पाठ जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुरक्षा, और समृद्धि प्रदान करता है। विश्वकर्मा जी की कृपा से व्यक्ति के कार्य सुचारू रूप से संपन्न होते हैं और उसे जीवन में यश, कीर्ति, और सम्मान प्राप्त होता है। Vishwakarma Chalisa विश्वकर्मा चालीसा ॥ दोहा ॥श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं,चरणकमल धरिध्यान ।श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण,दीजै दया निधान ॥ ॥ चौपाई ॥जय श्री विश्वकर्म भगवाना ।जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥ शिल्पाचार्य परम उपकारी ।भुवना-पुत्र नाम छविकारी ॥ अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर ।शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर ॥ अद्‍भुत सकल सृष्टि के कर्ता ।सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता ॥ ४ ॥ अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं ।कोई विश्व मंह जानत नाही ॥ विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा ।अद्‍भुत वरण विराज सुवेशा ॥ एकानन पंचानन राजे ।द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे ॥ चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे ।वारि कमण्डल वर कर लीन्हे ॥ ८ ॥ शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा ।सोहत सूत्र माप अनुरूपा ॥ धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे ।नौवें हाथ कमल मन मोहे ॥ दसवां हस्त बरद जग हेतु ।अति भव सिंधु मांहि वर सेतु ॥ सूरज तेज हरण तुम कियऊ ।अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ ॥ १२ ॥ चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका ।दण्ड पालकी शस्त्र अनेका ॥ विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं ।अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं ॥ इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा ।तुम सबकी पूरण की आशा ॥ भांति-भांति के अस्त्र रचाए ।सतपथ को प्रभु सदा बचाए ॥ १६ ॥ अमृत घट के तुम निर्माता ।साधु संत भक्तन सुर त्राता ॥ लौह काष्ट ताम्र पाषाणा ।स्वर्ण शिल्प के परम सजाना ॥ विद्युत अग्नि पवन भू वारी ।इनसे अद्भुत काज सवारी ॥ खान-पान हित भाजन नाना ।भवन विभिषत विविध विधाना ॥ २० ॥ विविध व्सत हित यत्रं अपारा ।विरचेहु तुम समस्त संसारा ॥ द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका ।विविध महा औषधि सविवेका ॥ शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला ।वरुण कुबेर अग्नि यमकाला ॥ तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ ।करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ ॥ २४ ॥ भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका ।कियउ काज सब भये अशोका ॥ अद्भुत रचे यान मनहारी ।जल-थल-गगन मांहि-समचारी ॥ शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही ।विज्ञान कह अंतर नाही ॥ बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा ।सकल सृष्टि है तव विस्तारा ॥ २८ ॥ रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा ।तुम बिन हरै कौन भव हारी ॥ मंगल-मूल भगत भय हारी ।शोक रहित त्रैलोक विहारी ॥ चारो युग परताप तुम्हारा ।अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा ॥ ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता ।वर विज्ञान वेद के ज्ञाता ॥ ३२ ॥ मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा ।सबकी नित करतें हैं रक्षा ॥ पंच पुत्र नित जग हित धर्मा ।हवै निष्काम करै निज कर्मा ॥ प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई ।विपदा हरै जगत मंह जोई ॥ जै जै जै भौवन विश्वकर्मा ।करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा ॥ ३६ ॥ इक सौ आठ जाप कर जोई ।छीजै विपत्ति महासुख होई ॥ पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा ।होय सिद्ध साक्षी गौरीशा ॥ विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे ।हो प्रसन्न हम बालक तेरे ॥ मैं हूं सदा उमापति चेरा ।सदा करो प्रभु मन मंह डेरा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥करहु कृपा शंकर सरिस,विश्वकर्मा शिवरूप ।श्री शुभदा रचना सहित,ह्रदय बसहु सूर भूप ॥

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Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा

Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा भगवान परशुराम की स्तुति और उनके गुणों की महिमा का वर्णन करती है। भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, जिन्होंने पृथ्वी को पापियों और अत्याचारियों से मुक्त किया। परशुराम चालीसा का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और जीवन में सकारात्मक लाभ मिलते हैं। आइए जानते हैं परशुराम चालीसा के लाभ: Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा के लाभ Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा श्री परशुराम पर आधारित एक भक्ति गीत है। Parshuram Chalisa कई लोगों ने श्री परशुराम को समर्पित त्योहारों पर परशुराम चालीसा का पाठ किया। ॥ दोहा ॥श्री गुरु चरण सरोज छवि,निज मन मन्दिर धारि।सुमरि गजानन शारदा,गहि आशिष त्रिपुरारि॥ बुद्धिहीन जन जानिये,अवगुणों का भण्डार।बरणों परशुराम सुयश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय प्रभु परशुराम सुख सागर।जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर॥भृगुकुल मुकुट विकट रणधीरा।क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥ जमदग्नी सुत रेणुका जाया।तेज प्रताप सकल जग छाया॥मास बैसाख सित पच्छ उदारा।तृतीया पुनर्वसु मनुहारा॥ प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा।तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा॥तब ऋषि कुटीर रूदन शिशु कीन्हा।रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा॥ निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े।मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े॥तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा।जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा॥ धरा राम शिशु पावन नामा।नाम जपत जग लह विश्रामा॥भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर।कांधे मुंज जनेऊ मनहर॥ मंजु मेखला कटि मृगछाला।रूद्र माला बर वक्ष विशाला॥पीत बसन सुन्दर तनु सोहें।कंध तुणीर धनुष मन मोहें॥ वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता।क्रोध रूप तुम जग विख्याता॥दायें हाथ श्रीपरशु उठावा।वेद-संहिता बायें सुहावा॥ विद्यावान गुण ज्ञान अपारा।शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा॥भुवन चारिदस अरु नवखंडा।चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा॥ एक बार गणपति के संगा।जूझे भृगुकुल कमल पतंगा॥दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा।एक दंत गणपति भयो नामा॥ कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला।सहस्रबाहु दुर्जन विकराला॥सुरगऊ लखि जमदग्नी पांहीं।रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं॥ मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई।भयो पराजित जगत हंसाई॥तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी।रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी॥ ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना।तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा॥लगत शक्ति जमदग्नी निपाता।मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता॥ पितु-बध मातु-रूदन सुनि भारा।भा अति क्रोध मन शोक अपारा॥कर गहि तीक्षण परशु कराला।दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला॥ क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा।पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा॥इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी।छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी॥ जुग त्रेता कर चरित सुहाई।शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई॥गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना।तब समूल नाश ताहि ठाना॥ कर जोरि तब राम रघुराई।बिनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई॥भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता।भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता॥ शास्त्र विद्या देह सुयश कमावा।गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा॥चारों युग तव महिमा गाई।सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई॥ दे कश्यप सों संपदा भाई।तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई॥अब लौं लीन समाधि नाथा।सकल लोक नावइ नित माथा॥ चारों वर्ण एक सम जाना।समदर्शी प्रभु तुम भगवाना॥ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी।देव दनुज नर भूप भिखारी॥ जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा।तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा॥पृर्णेन्दु निसि बासर स्वामी।बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी॥ ॥ दोहा ॥परशुराम को चारू चरित,मेटत सकल अज्ञान।शरण पड़े को देत प्रभु,सदा सुयश सम्मान॥ ॥ श्लोक ॥भृगुदेव कुलं भानुं,सहस्रबाहुर्मर्दनम्।रेणुका नयना नंदं,परशुंवन्दे विप्रधनम्॥

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