Diwali 2024 Date and Time : दीपावली कब है, जानें धनतेरस, दिवाली, भाई दूज की सही तारीख

Diwali 2024:दिवाली 2024 का पांच दिवसीय पर्व 29 अक्टूबर से शुरू होगा और 3 नवंबर तक चलेगा। इस साल की सही तिथियों और पूजा के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं Diwali 2024:पूजा विधि में घर को साफ-सुथरा रखना, दीपक जलाना, और माता लक्ष्मी व गणेश की पूजा करना प्रमुख होता है। दीपावली का आध्यात्मिक महत्व अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दौरान नए वस्त्र पहनने और उपहार देने की परंपरा भी है। Diwali 2024:दिवाली 2024 पूजा विधि Diwali 2024:दिवाली का त्योहार हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखता है और इसे धन, समृद्धि, और सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। दिवाली की पूजा विधि इस प्रकार है Diwali 2024:दीपावली 2024:महत्व Diwali 2024:दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, भारत का सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है। 2024 में, यह पर्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल आध्यात्मिकता और आस्था का प्रतीक है, बल्कि लोगों को एकता और भाईचारे का संदेश भी देता है। दिवाली पर, लोग अपने घरों को दीयों और रंगोली से सजाते हैं, लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं, और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। Diwali 2024:दीपावली का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; यह जीवन में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संदेश भी देता है। 2024 में, जब दुनिया कई चुनौतियों से गुजर रही है, दिवाली हमें सकारात्मकता और आशा की दिशा में प्रेरित करती है। इस दिन को नए सिरे से शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, जहाँ पुराने दुखों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। दीपावली न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह त्योहार व्यापार में उन्नति और समृद्धि का प्रतीक है, खासकर भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। इस प्रकार, दीपावली 2024 हमें आध्यात्मिकता, सामाजिकता और आर्थिक प्रगति का संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। दिवाली 2024: क्या करें, क्या न करें दिवाली, जिसे हम दीपावली के नाम से भी जानते हैं, भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह न केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर खुशी मनाने का भी अवसर है। Diwali 2024:क्या करें Diwali 2024:क्या न करें इस दिवाली, खुशियों और सकारात्मकता को फैलाने का प्रयास करें और अपने आस-पास के लोगों के साथ मिलकर इस त्योहार का आनंद लें। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Karwa Chauth 2024: करवाचौथ व्रत के इन 6 विशेष नियमों के बिना अधूरा रह जाता है व्रत, अखंड सौभाग्य के लिए हर सुहागिन को करना चाहिए इनका पालन

Karwa Chauth:करवा चौथ 2024: करवाचौथ व्रत के 6 विशेष नियमों के बिना अधूरा है व्रत, अखंड सौभाग्य के लिए पालन जरूरी Karwa Chauth:करवा चौथ का व्रत हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। Karwa Chauth यह व्रत पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। करवाचौथ के दिन सुहागिन महिलाएं निर्जल व्रत करती हैं, और रात को चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है। Karwa Chauth इस पर्व की खास बात यह है कि इसके साथ कुछ विशिष्ट नियम जुड़े होते हैं, जिनके बिना व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं करवाचौथ व्रत के उन 6 प्रमुख नियमों के बारे में, जिनका पालन हर सुहागिन के लिए आवश्यक है। 1. निर्जल व्रत (बिना पानी के व्रत रखना) करवा चौथ का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि व्रती महिला को पूरे दिन बिना पानी और अन्न के रहना होता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी उम्र की कामना करना होता है, Karwa Chauth और यह तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक कि इसे निर्जल और निराहार रखा जाए। इस दिन सूर्योदय से पहले सरगी खाकर व्रत की शुरुआत की जाती है, और चंद्रमा के दर्शन के बाद पति के हाथों से पानी पीकर ही इसे समाप्त किया जाता है। 2. सरगी का सेवन सरगी करवाचौथ के दिन सुबह सूर्योदय से पहले किया जाने वाला भोजन है, जो विशेष रूप से व्रती महिला की सास द्वारा दिया जाता है। सरगी में हल्के और पौष्टिक आहार होते हैं, जैसे फल, मिठाइयाँ, सूखे मेवे, और कभी-कभी पराठा या हलवा भी। सरगी का सेवन करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह पूरे दिन के व्रत के दौरान शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।Karwa Chauth सरगी का सेवन शुभ माना जाता है और इसे आदर और प्रेम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। 3. सजधज कर व्रत करना करवा चौथ पर व्रत रखने वाली महिला को अपने सुहाग की निशानी के रूप में सजधज कर तैयार होना होता है। यह दिन खासतौर पर सुहागिनों के लिए होता है, इसलिए व्रत के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान, जैसे साड़ी या लहंगा, पहनती हैं। इसके अलावा, सोलह श्रृंगार जैसे सिंदूर, बिंदी, कंगन, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ आदि का महत्व होता है। यह माना जाता है कि सजधज कर व्रत करने से देवी पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और व्रत को पूर्णता मिलती है। 4. पूजा और करवा का विशेष महत्व करवा चौथ के दिन पूजा का विशेष महत्व होता है। शाम के समय महिलाएं एकत्र होकर करवा चौथ की कथा सुनती हैं और करवा की पूजा करती हैं। करवा एक विशेष मिट्टी का बर्तन होता है जिसे पूजा के दौरान प्रयोग किया जाता है। इस बर्तन में जल भरकर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की पूजा की जाती है। करवा का यह जल चंद्र दर्शन के बाद अर्पण किया जाता है, जो कि व्रत को पूरा करने का एक आवश्यक हिस्सा है। 5. चंद्र दर्शन के बिना व्रत अधूरा करवा चौथ का व्रत तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक कि चंद्रमा के दर्शन न हो जाएं। चंद्र दर्शन के बाद महिलाएं अपने पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर व्रत तोड़ती हैं। यह मान्यता है कि चंद्रमा के दर्शन से सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है, और इससे पति की दीर्घायु की कामना पूरी होती है। कई बार आसमान में बादल होने के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं देता, ऐसे में महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से व्रत तोड़ने के लिए चंद्रमा की दिशा में जल अर्पण करती हैं। 6. पति के हाथ से व्रत खोलना करवा चौथ के दिन एक और महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि व्रती महिला अपने पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर ही व्रत समाप्त करती है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस परंपरा का पालन करना जरूरी होता है, क्योंकि यह मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का रिश्ता और अधिक मजबूत होता है, और उनके बीच के संबंध में विश्वास और प्यार बढ़ता है। Karwa Chauth:करवा चौथ का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व Karwa Chauth:करवा चौथ का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है। इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं Karwa Chauth और अपने अनुभव साझा करती हैं, जिससे सामाजिक संबंध और भी प्रगाढ़ होते हैं। इसके अलावा, यह व्रत महिला के धैर्य, समर्पण और आत्मसंयम का प्रतीक है। करवा चौथ पर महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए तपस्या करती हैं, जो एक उच्चतम आध्यात्मिकता का प्रतीक है। निष्कर्ष करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और इसके साथ जुड़े ये 6 विशेष नियम इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इन नियमों का पालन करना हर सुहागिन के लिए जरूरी है।Karwa Chauth यह पर्व न केवल पति-पत्नी के बीच के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन के हर रिश्ते को समर्पण और आदर के साथ निभाने की सीख भी देता है। करवा चौथ का यह व्रत भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत उदाहरण है, और इसके साथ जुड़ी आस्थाएं और विश्वास इसे और भी खास बनाते हैं।

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शरद पूर्णिमा: महत्व, धार्मिक मान्यताएँ, मंत्र और वैदिक प्रमाण – SHARAD PURNIMA 2024

शरद पूर्णिमा: महत्व, धार्मिक मान्यताएँ, मंत्र और वैदिक प्रमाण शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन को चंद्रमा की विशेष महिमा के लिए जाना जाता है, और धार्मिक रूप से यह त्यौहार लक्ष्मी पूजन, भगवान कृष्ण के रास और अमृत वर्षा के लिए विशेष महत्व रखता है। शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व शरद पूर्णिमा की खीर और चंद्रमा की किरणें इस दिन रात को खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। मान्यता है कि चंद्रमा की किरणों से इस खीर में अमृत तत्व समाहित हो जाता है, जिसे खाने से स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है। आयुर्वेद में भी इस खीर को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है, विशेष रूप से यह पाचन तंत्र को सुधारने और शरीर को शीतलता प्रदान करने में सहायक होती है। शरद पूर्णिमा का वैदिक प्रमाण वेदों और पुराणों में शरद पूर्णिमा का उल्लेख मिलता है। शरद पूर्णिमा ऋग्वेद में चंद्रमा को औषधियों का स्वामी कहा गया है, जो जीवन के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए आवश्यक है। अथर्ववेद में चंद्रमा की महिमा का वर्णन है, जो इस दिन विशेष प्रभावकारी होती है। इसका अर्थ है, “चंद्रमा मन से उत्पन्न हुआ है।” यह शांति, सौम्यता और मानसिक संतुलन का प्रतीक है, जो शरद पूर्णिमा की रात विशेष रूप से प्रभावी होता है। शरद पूर्णिमा पर विशेष अनुष्ठान और पूजन विधि शरद पूर्णिमा की आधुनिक मान्यता आज के समय में शरद पूर्णिमा केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि यह स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ने का एक पर्व भी है। इस दिन को आध्यात्मिक शांति और मन की स्थिरता पाने के लिए उत्तम माना जाता है। इसके साथ ही चंद्रमा की किरणों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को भी आधुनिक विज्ञान ने स्वीकार किया है। निष्कर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व धर्म, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। वैदिक प्रमाण और मंत्रों के साथ इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस पर्व पर भगवान चंद्रमा और माता लक्ष्मी की आराधना से व्यक्ति को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

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Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा 

Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा: बाल गोपाल की भक्ति Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण के बाल रूप, गोपाल, की स्तुति करने वाला एक लोकप्रिय भजन है। यह चालीसा विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना करने वाले भक्तों द्वारा गाया जाता है। Gopal Chalisa माना जाता है कि गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का महत्व Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का पाठ कैसे करें Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा ॥ दोहा ॥श्री राधापद कमल रज,सिर धरि यमुना कूल।वरणो चालीसा सरस,सकल सुमंगल मूल॥ ॥ चौपाई ॥जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी।दुष्ट दलन लीला अवतारी॥जो कोई तुम्हरी लीला गावै।बिन श्रम सकल पदारथ पावै॥ श्री वसुदेव देवकी माता।प्रकट भये संग हलधर भ्राता॥मथुरा सों प्रभु गोकुल आये।नन्द भवन में बजत बधाये॥ जो विष देन पूतना आई।सो मुक्ति दै धाम पठाई॥तृणावर्त राक्षस संहार्यौ।पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ॥ खेल खेल में माटी खाई।मुख में सब जग दियो दिखाई॥गोपिन घर घर माखन खायो।जसुमति बाल केलि सुख पायो॥ ऊखल सों निज अंग बँधाई।यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई॥बका असुर की चोंच विदारी।विकट अघासुर दियो सँहारी॥ ब्रह्मा बालक वत्स चुराये।मोहन को मोहन हित आये॥बाल वत्स सब बने मुरारी।ब्रह्मा विनय करी तब भारी॥ काली नाग नाथि भगवाना।दावानल को कीन्हों पाना॥सखन संग खेलत सुख पायो।श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो॥ चीर हरन करि सीख सिखाई।नख पर गिरवर लियो उठाई॥दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों।राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों॥ नन्दहिं वरुण लोक सों लाये।ग्वालन को निज लोक दिखाये॥शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई।अति सुख दीन्हों रास रचाई॥ अजगर सों पितु चरण छुड़ायो।शंखचूड़ को मूड़ गिरायो॥हने अरिष्टा सुर अरु केशी।व्योमासुर मार्यो छल वेषी॥ व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये।मारि कंस यदुवंश बसाये॥मात पिता की बन्दि छुड़ाई।सान्दीपनि गृह विद्या पाई॥ पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी।प्रेम देखि सुधि सकल भुलानी॥कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी।हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी॥ भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये।सुरन जीति सुरतरु महि लाये॥दन्तवक्र शिशुपाल संहारे।खग मृग नृग अरु बधिक उधारे॥ दीन सुदामा धनपति कीन्हों।पारथ रथ सारथि यश लीन्हों॥गीता ज्ञान सिखावन हारे।अर्जुन मोह मिटावन हारे॥ केला भक्त बिदुर घर पायो।युद्ध महाभारत रचवायो॥द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो।गर्भ परीक्षित जरत बचायो॥ कच्छ मच्छ वाराह अहीशा।बावन कल्की बुद्धि मुनीशा॥ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो।राम रुप धरि रावण मार्यो॥ जय मधु कैटभ दैत्य हनैया।अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया॥ब्याध अजामिल दीन्हें तारी।शबरी अरु गणिका सी नारी॥ गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन।देहु दरश ध्रुव नयनानन्दन॥देहु शुद्ध सन्तन कर सङ्गा।बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रङ्गा॥ देहु दिव्य वृन्दावन बासा।छूटै मृग तृष्णा जग आशा॥तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद।शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद॥ जय जय राधारमण कृपाला।हरण सकल संकट भ्रम जाला॥बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी।जो सुमरैं जगपति गिरधारी॥ जो सत बार पढ़ै चालीसा।देहि सकल बाँछित फल शीशा॥ ॥ छन्द ॥गोपाल चालीसा पढ़ै नित,नेम सों चित्त लावई।सो दिव्य तन धरि अन्त महँ,गोलोक धाम सिधावई॥ संसार सुख सम्पत्ति सकल,जो भक्तजन सन महँ चहैं।‘जयरामदेव’ सदैव सो,गुरुदेव दाया सों लहैं॥ ॥ दोहा ॥प्रणत पाल अशरण शरण,करुणा-सिन्धु ब्रजेश।चालीसा के संग मोहि,अपनावहु प्राणेश॥

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Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा

Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा: गोवर्धन पर्वत की महिमा Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा हिंदू धर्म में गोवर्धन पर्वत की महिमा का वर्णन करने वाला एक भक्ति गीत है। गोवर्धन पर्वत को भगवान कृष्ण से गहरा संबंध है। Giriraj Chalisa जब इंद्र देव ने ब्रजवासियों पर प्रचंड वर्षा की थी, तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को बचाया था। Giriraj Chalisa इस घटना के बाद से गोवर्धन पर्वत को पूजनीय माना जाता है। Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का महत्व Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का पाठ कैसे करें Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दहुँ वीणा वादिनी,धरि गणपति को ध्यान।महाशक्ति राधा सहित,कृष्ण करौ कल्याण॥ सुमिरन करि सब देवगण,गुरु पितु बारम्बार।बरनौ श्रीगिरिराज यश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय हो जय बंदित गिरिराजा।ब्रज मण्डल के श्री महाराजा॥विष्णु रूप तुम हो अवतारी।सुन्दरता पै जग बलिहारी॥ स्वर्ण शिखर अति शोभा पामें।सुर मुनि गण दरशन कूं आमें॥शांत कन्दरा स्वर्ग समाना।जहाँ तपस्वी धरते ध्याना॥ द्रोणगिरि के तुम युवराजा।भक्तन के साधौ हौ काजा॥मुनि पुलस्त्य जी के मन भाये।जोर विनय कर तुम कूँ लाये॥ मुनिवर संघ जब ब्रज में आये।लखि ब्रजभूमि यहाँ ठहराये॥विष्णु धाम गौलोक सुहावन।यमुना गोवर्धन वृन्दावन॥ देख देव मन में ललचाये।बास करन बहु रूप बनाये॥कोउ बानर कोउ मृग के रूपा।कोउ वृक्ष कोउ लता स्वरूपा॥ आनन्द लें गोलोक धाम के।परम उपासक रूप नाम के॥द्वापर अंत भये अवतारी।कृष्णचन्द्र आनन्द मुरारी॥ महिमा तुम्हरी कृष्ण बखानी।पूजा करिबे की मन ठानी॥ब्रजवासी सब के लिये बुलाई।गोवर्द्धन पूजा करवाई॥ पूजन कूँ व्यञ्जन बनवाये।ब्रजवासी घर घर ते लाये॥ग्वाल बाल मिलि पूजा कीनी।सहस भुजा तुमने कर लीनी॥ स्वयं प्रकट हो कृष्ण पूजा में।माँग माँग के भोजन पामें॥लखि नर नारि मन हरषामें।जै जै जै गिरिवर गुण गामें॥ देवराज मन में रिसियाए।नष्ट करन ब्रज मेघ बुलाए॥छाँया कर ब्रज लियौ बचाई।एकउ बूँद न नीचे आई॥ सात दिवस भई बरसा भारी।थके मेघ भारी जल धारी॥कृष्णचन्द्र ने नख पै धारे।नमो नमो ब्रज के रखवारे॥ करि अभिमान थके सुरसाई।क्षमा माँग पुनि अस्तुति गाई॥त्राहि माम् मैं शरण तिहारी।क्षमा करो प्रभु चूक हमारी॥ बार बार बिनती अति कीनी।सात कोस परिकम्मा दीनी॥संग सुरभि ऐरावत लाये।हाथ जोड़ कर भेंट गहाये॥ अभय दान पा इन्द्र सिहाये।करि प्रणाम निज लोक सिधाये॥जो यह कथा सुनैं चित लावें।अन्त समय सुरपति पद पावें॥ गोवर्द्धन है नाम तिहारौ।करते भक्तन कौ निस्तारौ॥जो नर तुम्हरे दर्शन पावें।तिनके दुःख दूर ह्वै जावें॥ कुण्डन में जो करें आचमन।धन्य धन्य वह मानव जीवन॥मानसी गंगा में जो न्हावें।सीधे स्वर्ग लोक कूँ जावें॥ दूध चढ़ा जो भोग लगावें।आधि व्याधि तेहि पास न आवें॥जल फल तुलसी पत्र चढ़ावें।मन वांछित फल निश्चय पावें॥ जो नर देत दूध की धारा।भरौ रहे ताकौ भण्डारा॥करें जागरण जो नर कोई।दुख दरिद्र भय ताहि न होई॥ ‘श्याम’ शिलामय निज जन त्राता।भक्ति मुक्ति सरबस के दाता॥पुत्र हीन जो तुम कूँ ध्यावें।ताकूँ पुत्र प्राप्ति ह्वै जावें॥ दंडौती परिकम्मा करहीं।ते सहजहि भवसागर तरहीं॥कलि में तुम सम देव न दूजा।सुर नर मुनि सब करते पूजा॥ ॥ दोहा ॥जो यह चालीसा पढ़ै,सुनै शुद्ध चित्त लाय।सत्य सत्य यह सत्य है,गिरिवर करै सहाय॥ क्षमा करहुँ अपराध मम,त्राहि माम् गिरिराज।श्याम बिहारी शरण में,गोवर्द्धन महाराज॥

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Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा

Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा: एक संक्षिप्त परिचय रामदेव चालीसा हिंदू धर्म के एक लोकप्रिय भजन है, जो रामदेव पीर के प्रति समर्पित है। Ramdev Chalisa रामदेव पीर को राजस्थान के एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। यह चालीसा उनके जीवन, चमत्कारों और शिक्षाओं का वर्णन करती है। Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा का महत्व Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा का पाठ कैसे करें Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा ॥ दोहा ॥श्री गुरु पद नमन करि,गिरा गनेश मनाय ।कथूं रामदेव विमल यश,सुने पाप विनशाय ॥द्वार केश से आय कर,लिया मनुज अवतार ।अजमल गेह बधावणा,जग में जय जयकार ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय रामदेव सुर राया।अजमल पुत्र अनोखी माया॥विष्णु रूप सुर नर के स्वामी।परम प्रतापी अन्तर्यामी॥ ले अवतार अवनि पर आये।तंवर वंश अवतंश कहाये॥संत जनों के कारज सारे।दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥ परच्या प्रथम पिता को दीन्हा।दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥कुमकुम पद पोली दर्शाये।ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥ परचा दूजा जननी पाया।दूध उफणता चरा उठाया॥परचा तीजा पुरजन पाया।चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥ परच्या चौथा भैरव मारा।भक्त जनों का कष्ट निवारा॥पंचम परच्या रतना पाया।पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥ परच्या छठा विजयसिंह पाया।जला नगर शरणागत आया॥परच्या सप्तम् सुगना पाया।मुवा पुत्र हंसता भग आया॥ परच्या अष्टम् बौहित पाया।जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥भंवर डूबती नाव उबारी।प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥ नवमां परच्या वीरम पाया।बनियां आ जब हाल सुनाया॥दसवां परच्या पा बिनजारा।मिश्री बनी नमक सब खारा॥ परच्या ग्यारह किरपा थारी।नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥परच्या द्वादश ठोकर मारी।निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥ परच्या तेरहवां पीर परी पधारया।ल्याय कटोरा कारज सारा॥चौदहवां परच्या जाभो पाया।निजसर जल खारा करवाया॥ परच्या पन्द्रह फिर बतलाया।राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥परच्या सोलह हरबू पाया।दर्श पाय अतिशय हरषाया॥ परच्या सत्रह हर जी पाया।दूध थणा बकरया के आया॥सुखी नाडी पानी कीन्हों।आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥ परच्या अठारहवां हाकिम पाया।सूते को धरती लुढ़काया॥परच्या उन्नीसवां दल जी पाया।पुत्र पाय मन में हरषाया॥ परच्या बीसवां पाया सेठाणी।आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा।उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥ परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया।हो अन्धा करनी फल पाया॥परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां।सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥ परच्या तेईसवां बादशाह पाया।फेर भक्त को नहीं सताया॥परच्या चैबीसवां बख्शी पाया।मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥ जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां।तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥भक्त टेर सुन आतुर धाते।चढ़ लीले पर जल्दी आते॥ जो जन प्रभु की लीला गावें।मनवांछित कारज फल पावें॥यह चालीसा सुने सुनावे।ताके कष्ट सकल कट जावे॥ जय जय जय प्रभु लीला धारी।तेरी महिमा अपरम्पारी॥मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ।कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥ नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा।मती अनुसार रची चालीसा॥दास सभी शरण में तेरी।रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥

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Karwa Chauth 2024: करवा चौथ की पूजा थाली में जरूर करें ये चीजें शामिल, वरना पूजा रह जाएगी अधूरी

करवा चौथ 2024 का व्रत 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं में विशेष स्थान रखता है। इस व्रत में महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और समृद्धि की कामना करते हुए दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं। करवा चौथ की पूजा विधि में पूजा थाली का विशेष महत्व होता है। अगर पूजा की थाली में सही सामग्री शामिल नहीं होती है, तो पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं कि करवा चौथ की पूजा थाली में कौन-कौन सी चीजें जरूर होनी चाहिए ताकि पूजा का फल प्राप्त हो सके। करवा चौथ की पूजा थाली: महत्व और सामग्री करवा चौथ की पूजा थाली पूरी तरह से शुभ और पवित्र होती है, और इसमें सभी जरूरी चीजों का होना आवश्यक होता है। यह न केवल एक धार्मिक कृत्य है बल्कि पति-पत्नी के बीच के प्रेम और आपसी समर्पण का प्रतीक भी है। इस दिन महिलाएं अपनी पूजा की थाली सजाती हैं, जिसमें कुछ विशेष सामग्रियों का होना जरूरी होता है। करवा चौथ की पूजा थाली में आवश्यक वस्तुएं 1. दीया (दीपक) पूजा थाली में दीया एक महत्वपूर्ण वस्तु है, क्योंकि दीये को प्रकाश और जीवन का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ की रात जब महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, तब दीये का प्रकाश उन्हें शक्ति और आशीर्वाद प्रदान करता है। दीये का इस्तेमाल व्रत के दौरान अंधकार को दूर करने और सकारात्मकता लाने के लिए किया जाता है। 2. करवा (मिट्टी का बर्तन) करवा चौथ का नाम ही “करवा” से आया है, जो एक मिट्टी का बर्तन होता है। करवा को पानी से भरकर चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह करवा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसे सुहागिन स्त्रियां पूजा के दौरान भगवान को अर्पित करती हैं और इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। Karwa Chauth:का व्रत इन कार्यों से हो सकता है खंडित, जानें इस दिन क्या करें और क्या न करें 3. चावल और गेहूं के दाने पूजा थाली में चावल और गेहूं के दाने रखना अनिवार्य होता है। चावल को शुद्धता का प्रतीक माना जाता है और इसका प्रयोग हर शुभ कार्य में किया जाता है। गेहूं के दाने समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक होते हैं, जो जीवन में उन्नति और प्रगति का संकेत देते हैं। 4. सिंदूर और कुमकुम सिंदूर और कुमकुम का प्रयोग हिन्दू विवाहिता स्त्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। करवा चौथ की पूजा में इसे जरूर शामिल किया जाता है। यह स्त्री के सौभाग्य और पति की लंबी उम्र का प्रतीक होता है। पूजा थाली में सिंदूर और कुमकुम से सुहागिन स्त्रियां अपनी मांग भरती हैं और अपने पति की सुरक्षा की कामना करती हैं। 5. जल से भरा हुआ कलश जल से भरा हुआ कलश भी पूजा की थाली में रखना आवश्यक होता है। इसे जीवन और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। जब महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं, तो जल का प्रयोग किया जाता है। इसे घर की समृद्धि और खुशहाली के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। 6. मिठाई (मिठास का प्रतीक) मिठाई का प्रयोग हर पूजा में किया जाता है, और करवा चौथ की पूजा में भी इसका विशेष महत्व है। इसे पूजा के बाद चंद्रमा और भगवान को अर्पित किया जाता है, और फिर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। मिठाई रिश्तों में मिठास और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है। 7. धूप और अगरबत्ती धूप और अगरबत्ती का प्रयोग पूजा के दौरान वातावरण को शुद्ध और पवित्र करने के लिए किया जाता है। इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। करवा चौथ की पूजा में इसे जरूर शामिल करना चाहिए, ताकि पूजा विधि पूर्ण हो सके। 8. फूल (प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक) फूलों का इस्तेमाल हर पूजा में होता है, और करवा चौथ की पूजा थाली में भी ताजे फूलों का विशेष महत्व होता है। फूल भगवान को अर्पित किए जाते हैं और इसे सौंदर्य, पवित्रता और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। लाल और पीले रंग के फूल विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। 9. करवा माता की मूर्ति या चित्र करवा चौथ की पूजा में करवा माता की पूजा की जाती है, इसलिए पूजा थाली में करवा माता की मूर्ति या चित्र जरूर होना चाहिए। करवा माता की पूजा से महिलाओं को संतान सुख, समृद्धि और पति की लंबी उम्र का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 10. सुपारी, पान के पत्ते और द्रव्य (रूपया/सिक्का) पान के पत्ते, सुपारी और सिक्का भी करवा चौथ की पूजा थाली में रखा जाता है। पान और सुपारी का प्रयोग हर शुभ कार्य में किया जाता है और यह देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह पूजा को पूर्ण और सफल बनाने के लिए आवश्यक होता है। करवा चौथ की पूजा थाली सजाते समय ध्यान रखने योग्य बातें निष्कर्ष करवा चौथ की पूजा थाली में हर सामग्री का विशेष महत्व है। यह पूजा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह पति-पत्नी के रिश्ते को भी और मजबूत बनाती है। पूजा थाली में अगर सभी सामग्रियां ठीक से रखी जाती हैं और पूजा सही तरीके से की जाती है, तो यह व्रत अवश्य फलदायी होता है।

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Karwa Chauth:का व्रत इन कार्यों से हो सकता है खंडित, जानें इस दिन क्या करें और क्या न करें

Karwa Chauth:करवा चौथ का व्रत भारतीय महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यह व्रत खासकर उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए उपवास करती हैं। इस व्रत में संपूर्ण निष्ठा और श्रद्धा का होना जरूरी माना जाता है। व्रत का पालन करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि यह खंडित न हो। आइए जानते हैं कि Karwa Chauth करवा चौथ व्रत में कौन-कौन से कार्य व्रत को खंडित कर सकते हैं और इस दिन क्या करें और क्या न करें। Karwa Chauth:करवा चौथ व्रत को खंडित करने वाले कार्य Karwa Chauth:करवा चौथ के दिन क्या करें Karwa Chauth:करवा चौथ के दिन क्या न करें निष्कर्ष Karwa Chauth:करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें पतिव्रता स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु और समृद्धि के लिए उपवास करती हैं। इस व्रत का पालन करते समय सही विधियों और नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है। व्रत के दौरान नकारात्मकता से दूर रहना, पूजा विधि को पूरी निष्ठा से करना, और चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलना महत्वपूर्ण है।

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Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 14/10/2024

Aaj Ka Panchang:🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞⛅दिनांक – 14 अक्टूबर 2024⛅दिन – सोमवार⛅विक्रम संवत् – 2081⛅अयन – दक्षिणायन⛅ऋतु – शरद⛅मास – आश्विन⛅पक्ष – शुक्ल⛅तिथि – एकादशी प्रातः 06:41 तक तत्पश्चात द्वादशी रात्रि 03:42 अक्टूबर 15 तक⛅नक्षत्र – शतभिषा रात्रि 12:43 अक्टूबर 15 तक तत्पश्चात पूर्व भाद्रपद⛅योग – गण्ड शाम 06:01 तक, तत्पश्चात वृद्धि Aaj Ka Panchang ⛅राहु काल – प्रातः 08:03 से प्रातः 09:31 तक⛅सूर्योदय – 06:36⛅सूर्यास्त – 06:16⛅दिशा शूल – पूर्व दिशा में⛅ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:57 से 05:47 तक⛅अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:02 से दोपहर 12:49 तक⛅निशिता मुहूर्त- रात्रि 12:01 अक्टूबर 15 से रात्रि 12:50 अक्टूबर 15 तक⛅ व्रत पर्व विवरण – पापांकुशा एकादशी, पद्मनाभ द्वादशी⛅विशेष – एकादशी को सिम्बी (सेम) व द्वादशी को पूतिका (पोई) खाने से पुत्र का नाश होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) Aaj Ka Panchang 🔹पापांकुशा एकादशी – 14 अक्टूबर 2024🔹 Aaj Ka Panchang 🔹एकादशी में क्या करें, क्या न करें ?🔹 🌹1. एकादशी को लकड़ी का दातुन तथा पेस्ट का उपयोग न करें । नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ शुद्ध कर लें । वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है, अत: स्वयं गिरे हुए पत्ते का सेवन करें । 🌹2. स्नानादि कर के गीता पाठ करें, श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ करें । 🌹हर एकादशी को श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है ।राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ।। Aaj Ka Panchang एकादशी के दिन इस मंत्र के पाठ से श्री Aaj Ka Panchang विष्णुसहस्रनाम के जप के समान पुण्य प्राप्त होता है l 🌹3. `ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादश अक्षर मंत्र अथवा गुरुमंत्र का जप करना चाहिए । 🌹4. चोर, पाखण्डी और दुराचारी मनुष्य से बात नहीं करना चाहिए, यथा संभव मौन रहें । 🌹5. एकादशी के दिन भूल कर भी चावल नहीं खाना चाहिए न ही किसी को खिलाना चाहिए । इस दिन फलाहार अथवा घर में निकाला हुआ फल का रस अथवा दूध या जल पर रहना लाभदायक है । 🌹6. व्रत के (दशमी, एकादशी और द्वादशी) – इन तीन दिनों में काँसे के बर्तन, मांस, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चने, कोदो (एक प्रकार का धान), शाक, शहद, तेल और अत्यम्बुपान (अधिक जल का सेवन) – इनका सेवन न करें । 🌹7. फलाहारी को गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि सेवन नहीं करना चाहिए । आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करना चाहिए । 🌹8. जुआ, निद्रा, पान, परायी निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा झूठ, कपटादि अन्य कुकर्मों से नितान्त दूर रहना चाहिए । 🌹9. भूलवश किसी निन्दक से बात हो जाय तो इस दोष को दूर करने के लिए भगवान सूर्य के दर्शन तथा धूप-दीप से श्रीहरि की पूजा कर क्षमा माँग लेनी चाहिए । 🌹10. एकादशी के दिन घर में झाडू नहीं लगायें । इससे चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है । 🌹11. इस दिन बाल नहीं कटायें । 🌹12. इस दिन यथाशक्ति अन्नदान करें किन्तु स्वयं किसीका दिया हुआ अन्न कदापि ग्रहण न करें । 🌹13. एकादशी की रात में भगवान विष्णु के आगे जागरण करना चाहिए (जागरण रात्र 1 बजे तक) । 🌹14. जो श्रीहरि के समीप जागरण करते समय रात में दीपक जलाता है, उसका पुण्य सौ कल्पों में भी नष्ट नहीं होता है । 🔹 इस विधि से व्रत करनेवाला उत्तम फल को प्राप्त करता है । 🌞🚩🚩 ” ll जय श्री राम ll ” 🚩🚩🌞

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Batuk Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा

Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा: भैरव देवता का स्तुतिगान Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जो भैरव देवता के बाल रूप, बटुक भैरव की स्तुति करता है। भैरव देवता शिव के क्रोध रूप माने जाते हैं Bhairav ​​Chalisa और उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। Bhairav ​​Chalisa बटुक भैरव को विशेष रूप से युवाओं और छात्रों द्वारा पूजा जाता है। Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा का महत्व Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा कैसे पढ़ें? बटुक भैरव चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी: बटुक भैरव चालीसा (Batuk Bhairav ​​Chalisa) ॥ दोहा ॥विश्वनाथ को सुमिर मन,धर गणेश का ध्यान।भैरव चालीसा रचूं,कृपा करहु भगवान॥ बटुकनाथ भैरव भजू,श्री काली के लाल।छीतरमल पर कर कृपा,काशी के कुतवाल॥ ॥ चौपाई ॥जय जय श्रीकाली के लाला।रहो दास पर सदा दयाला॥भैरव भीषण भीम कपाली।क्रोधवन्त लोचन में लाली॥ कर त्रिशूल है कठिन कराला।गल में प्रभु मुण्डन की माला॥कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला।पीकर मद रहता मतवाला॥ रुद्र बटुक भक्तन के संगी।प्रेत नाथ भूतेश भुजंगी॥त्रैलतेश है नाम तुम्हारा।चक्र तुण्ड अमरेश पियारा॥ शेखरचंद्र कपाल बिराजे।स्वान सवारी पै प्रभु गाजे॥शिव नकुलेश चण्ड हो स्वामी।बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥ अश्वनाथ क्रोधेश बखाने।भैरों काल जगत ने जाने॥गायत्री कहैं निमिष दिगम्बर।जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥ क्षेत्रपाल दसपाण कहाये।मंजुल उमानन्द कहलाये॥चक्रनाथ भक्तन हितकारी।कहैं त्र्यम्बक सब नर नारी॥ संहारक सुनन्द तव नामा।करहु भक्त के पूरण कामा॥नाथ पिशाचन के हो प्यारे।संकट मेटहु सकल हमारे॥ कृत्यायु सुन्दर आनन्दा।भक्त जनन के काटहु फन्दा॥कारण लम्ब आप भय भंजन।नमोनाथ जय जनमन रंजन॥ हो तुम देव त्रिलोचन नाथा।भक्त चरण में नावत माथा॥त्वं अशतांग रुद्र के लाला।महाकाल कालों के काला॥ ताप विमोचन अरि दल नासा।भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा॥श्वेत काल अरु लाल शरीरा।मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥ काली के लाला बलधारी।कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी॥शंकर के अवतार कृपाला।रहो चकाचक पी मद प्याला॥ शंकर के अवतार कृपाला।बटुक नाथ चेटक दिखलाओ॥रवि के दिन जन भोग लगावें।धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥ दरशन करके भक्त सिहावें।दारुड़ा की धार पिलावें॥मठ में सुन्दर लटकत झावा।सिद्ध कार्य कर भैरों बाबा॥ नाथ आपका यश नहीं थोड़ा।करमें सुभग सुशोभित कोड़ा॥कटि घूँघरा सुरीले बाजत।कंचनमय सिंहासन राजत॥ नर नारी सब तुमको ध्यावहिं।मनवांछित इच्छाफल पावहिं॥भोपा हैं आपके पुजारी।करें आरती सेवा भारी॥ भैरव भात आपका गाऊँ।बार बार पद शीश नवाऊँ॥आपहि वारे छीजन धाये।ऐलादी ने रूदन मचाये॥ बहन त्यागि भाई कहाँ जावे।तो बिन को मोहि भात पिन्हावे॥रोये बटुक नाथ करुणा कर।गये हिवारे मैं तुम जाकर॥ दुखित भई ऐलादी बाला।तब हर का सिंहासन हाला॥समय व्याह का जिस दिन आया।प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥ विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ।तीन दिवस को भैरव जाओ॥दल पठान संग लेकर धाया।ऐलादी को भात पिन्हाया॥ पूरन आस बहन की कीनी।सुर्ख चुन्दरी सिर धर दीनी॥भात भेरा लौटे गुण ग्रामी।नमो नमामी अन्तर्यामी॥ ॥ दोहा ॥जय जय जय भैरव बटुक,स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिए,शंकर के अवतार॥ जो यह चालीसा पढे,प्रेम सहित सत बार।उस घर सर्वानन्द हों,वैभव बढ़ें अपार॥

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Shri Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा

Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा: भक्तों का प्रिय स्तोत्र Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय स्तोत्र है Balaji Chalisa जो भगवान हनुमान के एक विशेष अवतार, बालाजी को समर्पित है। बालाजी को मेहंदीपुर बालाजी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा का महत्व Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा कैसे पढ़ें? Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी: बालाजी चालीसा (Shri Balaji Chalisa) ॥ दोहा ॥श्री गुरु चरण चितलाय,के धरें ध्यान हनुमान।बालाजी चालीसा लिखे,दास स्नेही कल्याण॥ विश्व विदित वर दानी,संकट हरण हनुमान।मैंहदीपुर में प्रगट भये,बालाजी भगवान॥ ॥ चौपाई ॥जय हनुमान बालाजी देवा।प्रगट भये यहां तीनों देवा॥प्रेतराज भैरव बलवाना।कोतवाल कप्तानी हनुमाना॥ मैंहदीपुर अवतार लिया है।भक्तों का उध्दार किया है॥बालरूप प्रगटे हैं यहां पर।संकट वाले आते जहाँ पर॥ डाकनि शाकनि अरु जिन्दनीं।मशान चुड़ैल भूत भूतनीं॥जाके भय ते सब भाग जाते।स्याने भोपे यहाँ घबराते॥ चौकी बन्धन सब कट जाते।दूत मिले आनन्द मनाते॥सच्चा है दरबार तिहारा।शरण पड़े सुख पावे भारा॥ रूप तेज बल अतुलित धामा।सन्मुख जिनके सिय रामा॥कनक मुकुट मणि तेज प्रकाशा।सबकी होवत पूर्ण आशा॥ महन्त गणेशपुरी गुणीले।भये सुसेवक राम रंगीले॥अद्भुत कला दिखाई कैसी।कलयुग ज्योति जलाई जैसी॥ ऊँची ध्वजा पताका नभ में।स्वर्ण कलश हैं उन्नत जग में॥धर्म सत्य का डंका बाजे।सियाराम जय शंकर राजे॥ आन फिराया मुगदर घोटा।भूत जिन्द पर पड़ते सोटा॥राम लक्ष्मन सिय ह्रदय कल्याणा।बाल रूप प्रगटे हनुमाना॥ जय हनुमन्त हठीले देवा।पुरी परिवार करत हैं सेवा॥लड्डू चूरमा मिश्री मेवा।अर्जी दरखास्त लगाऊ देवा॥ दया करे सब विधि बालाजी।संकट हरण प्रगटे बालाजी॥जय बाबा की जन जन ऊचारे।कोटिक जन तेरे आये द्वारे॥ बाल समय रवि भक्षहि लीन्हा।तिमिर मय जग कीन्हो तीन्हा॥देवन विनती की अति भारी।छाँड़ दियो रवि कष्ट निहारी॥ लांघि उदधि सिया सुधि लाये।लक्ष्मन हित संजीवन लाये॥रामानुज प्राण दिवाकर।शंकर सुवन माँ अंजनी चाकर॥ केशरी नन्दन दुख भव भंजन।रामानन्द सदा सुख सन्दन॥सिया राम के प्राण पियारे।जब बाबा की भक्त ऊचारे॥ संकट दुख भंजन भगवाना।दया करहु हे कृपा निधाना॥सुमर बाल रूप कल्याणा।करे मनोरथ पूर्ण कामा॥ अष्ट सिद्धि नव निधि दातारी।भक्त जन आवे बहु भारी॥मेवा अरु मिष्ठान प्रवीना।भैंट चढ़ावें धनि अरु दीना॥ नृत्य करे नित न्यारे न्यारे।रिद्धि सिद्धियां जाके द्वारे॥अर्जी का आदेश मिलते ही।भैरव भूत पकड़ते तबही॥ कोतवाल कप्तान कृपाणी।प्रेतराज संकट कल्याणी॥चौकी बन्धन कटते भाई।जो जन करते हैं सेवकाई॥ रामदास बाल भगवन्ता।मैंहदीपुर प्रगटे हनुमन्ता॥जो जन बालाजी में आते।जन्म जन्म के पाप नशाते॥ जल पावन लेकर घर जाते।निर्मल हो आनन्द मनाते॥क्रूर कठिन संकट भग जावे।सत्य धर्म पथ राह दिखावे॥ जो सत पाठ करे चालीसा।तापर प्रसन्न होय बागीसा॥कल्याण स्नेही, स्नेह से गावे।सुख समृद्धि रिद्धि सिद्धि पावे॥ ॥ दोहा ॥मन्द बुद्धि मम जानके,क्षमा करो गुणखान।संकट मोचन क्षमहु मम,दास स्नेही कल्याण॥

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Shri Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा 

Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा: आपके पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का भाव Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो हमारे Pitar Chalisa पूर्वजों या पितरों को समर्पित है। यह चालीसा पितृ पक्ष के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक महत्वपूर्ण अवधि होती है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। Pitar Chalisa:पितर चालीसा का महत्व Pitar Chalisa:पितर चालीसा कैसे पढ़ें? Pitar Chalisa:पितर चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी श्री पितर चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री पितर पर आधारित है। कई लोग श्री पितर चालीसा का पाठ पितरों के श्राद्ध के दौरान करते हैं। पितर को पितृ, जो कि परिवार के मृतक पूर्वज होते हैं, के रूप में भी जाना जाता है। ॥ दोहा ॥हे पितरेश्वर आपको,दे दियो आशीर्वाद।चरणाशीश नवा दियो,रखदो सिर पर हाथ॥ सबसे पहले गणपत,पाछे घर का देव मनावा जी।हे पितरेश्वर दया राखियो,करियो मन की चाया जी॥ ॥ चौपाई ॥पितरेश्वर करो मार्ग उजागर।चरण रज की मुक्ति सागर॥परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा।मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा॥ मातृ-पितृ देव मनजो भावे।सोई अमित जीवन फल पावे॥जै-जै-जै पित्तर जी साईं।पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं॥ चारों ओर प्रताप तुम्हारा।संकट में तेरा ही सहारा॥नारायण आधार सृष्टि का।पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का॥ प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते।भाग्य द्वार आप ही खुलवाते॥झुंझुनू में दरबार है साजे।सब देवों संग आप विराजे॥ प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा।कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा॥पित्तर महिमा सबसे न्यारी।जिसका गुणगावे नर नारी॥ तीन मण्ड में आप बिराजे।बसु रुद्र आदित्य में साजे॥नाथ सकल संपदा तुम्हारी।मैं सेवक समेत सुत नारी॥ छप्पन भोग नहीं हैं भाते।शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते॥तुम्हारे भजन परम हितकारी।छोटे बड़े सभी अधिकारी॥ भानु उदय संग आप पुजावै।पांच अँजुलि जल रिझावे॥ध्वज पताका मण्ड पे है साजे।अखण्ड ज्योति में आप विराजे॥ सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी।धन्य हुई जन्म भूमि हमारी॥शहीद हमारे यहाँ पुजाते।मातृ भक्ति संदेश सुनाते॥ जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा।धर्म जाति का नहीं है नारा॥हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई।सब पूजे पित्तर भाई॥ हिन्दु वंश वृक्ष है हमारा।जान से ज्यादा हमको प्यारा॥गंगा ये मरुप्रदेश की।पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की॥ बन्धु छोड़ना इनके चरणाँ।इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा॥चौदस को जागरण करवाते।अमावस को हम धोक लगाते॥ जात जडूला सभी मनाते।नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते॥धन्य जन्म भूमि का वो फूल है।जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है॥ श्री पित्तर जी भक्त हितकारी।सुन लीजे प्रभु अरज हमारी॥निशदिन ध्यान धरे जो कोई।ता सम भक्त और नहीं कोई॥ तुम अनाथ के नाथ सहाई।दीनन के हो तुम सदा सहाई॥चारिक वेद प्रभु के साखी।तुम भक्तन की लज्जा राखी॥ नाम तुम्हारो लेत जो कोई।ता सम धन्य और नहीं कोई॥जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत।नवों सिद्धि चरणा में लोटत॥ सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी।जो तुम पे जावे बलिहारी॥जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे।ताकी मुक्ति अवसी हो जावे॥ सत्य भजन तुम्हारो जो गावे।सो निश्चय चारों फल पावे॥तुमहिं देव कुलदेव हमारे।तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे॥ सत्य आस मन में जो होई।मनवांछित फल पावें सोई॥तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।शेष सहस्र मुख सके न गाई॥ मैं अतिदीन मलीन दुखारी।करहु कौन विधि विनय तुम्हारी॥अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै।अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥ ॥ दोहा ॥पित्तरौं को स्थान दो,तीरथ और स्वयं ग्राम।श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां,पूरण हो सब काम॥ झुंझुनू धाम विराजे हैं,पित्तर हमारे महान।दर्शन से जीवन सफल हो,पूजे सकल जहान॥ जीवन सफल जो चाहिए,चले झुंझुनू धाम।पित्तर चरण की धूल ले,हो जीवन सफल महान॥

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