नीलेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव यहां पर लंबे समय तक रहे थे। नीलेश्वर महादेव मंदिर भारत के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है हरिद्वार। यह स्थान आध्यात्मिक और धार्मिक भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व रखता है। यह वह जगह है जहां पवित्र गंगा नदी पहाड़ों से आने के बाद सबसे पहले हरिद्वार में अवतरित होती है। यह शहर आश्रमों, मंदिरों और राजसी घाटों से सुशोभित है। पवित्र शहर ऋषिकेश निकट होने के कारण इसका आध्यात्मिक आकर्षण और भी बढ़ जाता है। हरिद्वार और ऋषिकेश में कई शिव मंदिर है। परन्तु नीलेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव के सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय स्थानों में से एक है। नील पर्वत की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि आसपास की प्राकृतिक सुंदरता के मनमोहक दृश्य को भी प्रदर्शित करता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जो नील पर्वत के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सभी भक्तों की इस मंदिर के प्रति अपार आस्था और विश्वास है। शिव भक्तों के के लिए यह स्थान बहुत ही महत्त्व रखता है। यह मंदिर चंडी देवी मंदिर के करीब स्थित है। मंदिर का इतिहास हरिद्वार के नील पर्वत पर नीलेश्वर महादेव मंदिर का अस्तित्व आदिकाल से माना गया है। इस मंदिर का उल्लेख शिव महापुराण में मिलता है। प्राचीन किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास सत्य युग से मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर में भगवान शिव और देवी पार्वती के पवित्र विवाह के दौरान, बारात नीलेश्वर महादेव मंदिर में रुकी थी। इसके अतिरिक्त ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव यहां लंबे समय तक रहे थे, जिससे मंदिर की पवित्रता और बढ़ गई। मंदिर का महत्व नीलेश्वर महादेव मंदिर में उपस्थित स्वयंभू शिवलिंग को एक हजार शिवलिंग का रूप मानते है। सावन के महीनों में श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहाँ गंगा नदी से जल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता के अनुसार सावन में जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मान्यता के अनुसार भगवान भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकले विष को इसी स्थान पर पीया था। विष पीने के बाद यहीं से भोलेनाथ ने नीलकंठ में जाकर विश्राम किया था। ऐसा बताया जाता है कि भोलेनाथ ने जब समुद्र मंथन से निकाला विष पीया, तो यह पर्वत और गंगा का जल भी नीला हो गया था। इस कारण आज भी इस पर्वत को नील पर्वत और गंगा को नील गंगा के नाम से जानते हैं। मंदिर की वास्तुकला वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर पारंपरिक भारतीय शैली में बना हुआ है। यहाँ पर भक्तों को परम शांति का अनुभव होता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नंदी बैल जी की मूर्ति है। इसके बाद एक विशाल प्रांगण है जहाँ शांतिपूर्ण वातावरण का अनुभव होता है। आंतरिक गर्भगृह में एक स्वयं निर्मित शिवलिंग और एक अन्य नंदी जी की मूर्ति स्थापित है। इसके अलावा यहां एक बड़ा सभा कक्ष भी है जहां भक्त विभिन्न त्योहारों और पवित्र अवसरों को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं। नीलेश्वर महादेव मंदिर से चंडी देवी मंदिर की निकटता तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाजनक है। मंदिर का समय नीलेश्वर महादेव मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद नीलेश्वर महादेव मंदिर में भगवान को नारियल, चना चिरौंजी, परमल आदि का भोग लगाया जाता है।

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पागल बाबा मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

श्री कृष्ण की लीलास्थली के प्रति लोगों को प्रेरित करने के लिए इस मंदिर की स्थापना की गई। पागल बाबा मंदिर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के वृन्दावन शहर में स्थित एक ऐतिहासिक मंदिर है। भगवान श्री कृष्ण की प्रेममय लीलास्थली के प्रति लोगों को प्रेरित करने के लिए इस नौ मंजिला मंदिर की स्थापना की गई। 221 फीट ऊँचे, सफेद पत्थरों वाले पागल बाबा मंदिर इस मंदिर की स्थापना श्रीमद लीलानंद ठाकुर जी (पागलबाबा) द्वारा की गई। श्रीमद लीलानंद ठाकुर जी महाराज स्वयं पागलबाबा के नाम से प्रसिद्ध थे अतः इस श्री राधा-कृष्ण मंदिर को लोग पागलबाबा मंदिर के नाम से पुकारते हैं। यह अनूठा मंदिर भारतवासियों को तो आकर्षित करता ही है, पागल बाबा मंदिर विदेशी पर्यटकों को भी मुग्ध करता है और भक्ति प्रधान देश की महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिद्ध भी करता है। मंदिर की देख रेख के लिए पांच लोगों का बोर्ड है। डीएम इसके चेयरमैन हैं। 20 लोगों की कार्य समिति भी है। मंदिर का इतिहास सन् 1969 में श्रीमद लीलानंद ठाकुर जी महाराज ने देश विदेश के पर्यटकों का ध्यान वृंदावन की ओर आकर्षित करने के लिए एक भव्य मंदिर बनाने की परियोजना बनाई। पागल बाबा मंदिर वृंदावन मथुरा मार्ग पर एक विशाल भू-खंड लेकर अल्पावधि में ही, जहाँ केवल सूखा खेत था, वहाँ एक विशाल संगमरमर के नौ मंज़िला मंदिर लीलाधाम की स्थापना की। 24 जुलाई 1980 को लीलानंद ठाकुर जी महाराज ने शरीर का त्याग कर समाधि ले ली। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में सब की इच्छाएं पूरी होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि बांके बिहारी खुद अपने भक्त के लिए गवाही देने के लिए चले आए थे। खासतौर पर पूर्णिमा के अवसर पर इस मंदिर में हजारो की तादाद में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता है। दावा है कि विश्व में यह अपने किस्म का नौ मंजिल वाला पहला मंदिर है। आठ बीघे में मंदिर तो पांच बीघे में यहीं पर गौशाला है। मंदिर परिसर में ही पागल बाबा हॉस्पिटल भी बना है। यहां हजारों रोगियों का रोजाना उपचार किया जाता है। पागलबाबा मंदिर में रोजाना हजारों लोगों की खिचड़ी सेवा की जाती है। मंदिर की वास्तुकला पागलबाबा मंदिर को नागरा शैली में बनाया गया है। पागलबाबा मंदिर मॉडर्न वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है। चारों तरफ शस्य श्यामला हरित भूमिपर श्वेत प्रस्तर जडित अतुलनीय मंदिर भारतवर्ष में अपने ढंग का प्रथम मंदिर है। पागल बाबा मंदिर श्वेत प्रस्तर जड़ित 18 हजार वर्ग फीट और 221 फीट की ऊंचाई वाले इस मंदिर की प्रत्येक मंजिल पर देव प्रतिमा स्थापित हैं। पागल बाबा मंदिर बाबा ने ऐतिहासिक गोपेश्वर महादेव के पास स्थित भूतगली में लीला कुंज का भी निर्माण किया। कालांतर में लीलाकुंज पुराने पागल बाबा के रूप से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 11:30 AM शाम मंदिर खुलने का समय 03:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद पागलबाबा मंदिर में भक्त श्री कृष्ण को माखन मिश्री, पंचामृत और पंजीरी का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा भक्त प्रभु को अपनी श्रद्धा के अनुसार पेड़े, बर्फी का भी भोग लगाते हैं।

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श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर:गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, भारत

गोरखपुर की सबसे ऊँची प्रतिमा वाला मंदिर श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। यह गोरखपुर के बरगदवा में बना हुआ है। इस मंदिर में संकट मोचन हनुमान जी की करीब 31 फुट ऊंची पंचमुखी मूर्ति स्थापित है, जिसका मुंह दक्षिण दिशा की ओर है, इसलिए इसे दक्षिणमुखी पंचमुखी हनुमान मंदिर भी कहा जाता है। स्थानीय श्रद्धालु बताते हैं कि गोरखपुर में पंचमुखी हनुमान जी की ये सबसे ऊंची मूर्ति है। पंचमुखी हनुमान का ये मंदिर बहुत चमत्कारी माना जाता है। मंदिर का इतिहास श्री पंचमुखी हनुमान जी का यह विशालकाय मंदिर 2012 में स्थापित हुआ। तीन मंजिल बने इस मंदिर में हनुमान जी की 31 फुट की प्रतिमा स्थापित है। इसे सर्व कार्य सिद्धक मंदिर ही कहा जाता है। श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर अपने आप में अलग और अनोखा है। इस ऐतिहासिक मंदिर में हनुमानजी के दर्शन के लिए सुबह से शाम तक भक्तों की भीड़ लगी रहती है। मंदिर का महत्व श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर में हनुमान जी की 11 परिक्रमा लगाने पर भक्तों की सभी परेशानियां खत्म हो जाती हैं और उनकी सारी इच्छाएं पूरी होती है। हनुमान मंदिर के इस मंदिर को सर्व कार्य सिद्धक मंदिर भी कहा जाता है, श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर ऐसा बताया जाता है जो भक्त सच्ची श्रद्धा से प्रभु की साधना करता है उसका कार्य जरूर सफल होता है। मंदिर की वास्तुकला गोरखपुर में बने श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर में अंजनीसुत जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। संकट मोचन महराज कि मूर्ति के हृदय के ठीक सामने श्री राम और माता सीता की मूर्ति विद्यमान है, ऐसा प्रतीत होता है कि संकट मोचन महाराज के हृदय में श्री राम, सीता जी विराजमान है। मंदिर में प्रवेश करते ही वायुपुत्र के चरणों के दर्शन होते हैं, फिर मंदिर के दूसरी मंजिल पर जाते ही समाने रामेष्ट के ह्रदय स्थल के दर्शन होते हैं, जहां सिया-राम विराजमान हैं। मंदिर के तीसरे स्थल से सीधे प्रभु के पंचमुखी स्वरूप के दर्शन होते हैं। मंदिर प्रांगण में महालक्ष्मी नारायण, शिव गौरी, गणेश, कार्तिकेय, नंदी, राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 12:00 AM – 12:00 AM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद हनुमान जी को प्रसाद के रूप में शुद्ध घी के बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू चढ़ाए जाते हैं। हनुमान के गले में गेंदे व तुलसी की माला सुशोभित रहती हैं। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार पंचमुखी हनुमान जी के चरणों में भोग लगाते हैं।

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Masik Shivratri 2025: चैत्र माह में कब है मासिक शिवरात्रि, जानिए शुभ मुहूर्त और शिव जी की पूजा विधि

Masik Shivratri 2025:इस बार मासिक शिवरात्रि दुर्लभ संयोग में मनाई जाने वाली है। शिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग बनने जा रहे हैं। Masik Shivratri 2025:शिवरात्रि व्रत साल मे 12/13 बार आने वाला मासिक व्रत का त्यौहार है, अतः इस व्रत को मासिक शिवरात्रि भी कहा जाता है। जोकि अमावस्या से पहिले कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन आता है। Masik Shivratri 2025 मासिक शिवरात्रियों में से दो सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं, फाल्गुन त्रियोदशी महा शिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध है और दूसरी सावन शिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। यह त्यौहार भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है, इस दिन भक्तभगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते हैं। यह लोकप्रिय हिंदू व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। कोई भी व्रत या पूजा तभी उत्तम फल देती है जब उसे सही विधि से किया जाता है। तो आइए जानते हैं क्या है Masik Shivratri 2025 मासिक शिवरात्रि व्रत करने की सही विधि और अनुष्ठान। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने में आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती जी की पूजा-अर्चना की जाती है। चैत्र माह की शुरुआत हो चुकी है। Masik Shivratri 2025 ऐसे में चलिए जानते हैं कि इस माह में मासिक शिवरात्रि कब मनाई जाएगी और इसका पूजा मुहूर्त क्या रहने वाला है। मासिक शिवरात्रि शुभ मुहूर्त (Masik Shivratri Puja Muhurat) Masik Shivratri 2025:पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी 27 मार्च को रात 11 बजकर 03 मिनट पर शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 28 मार्च को शाम 07 बजकर 55 मिनट पर होगा। ऐसे में चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि का व्रत गुरवार, 27 मार्च 2025 को किया जाएगा। मासिक शिवरात्रि की पूजा मध्य रात्रि में की जाती है। इसलिए इस दिन शिव जी की पूजा का मुहूर्त इस प्रकार रहेगा – मासिक शिवरात्रि पूजा मुहूर्त – रात्रि 12 बजकर 03 से 28 मार्च 12 बजकर 49 मिनट तक शिव जी की पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवितृ हो जाएं। मंदिर की साफ-सफाई कर गंगाजल का छिड़काव करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर शिव जी और पार्वती माता की मूर्ति स्थापित करें। कच्चे दूध, गंगाजल, और शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक करें। शिव जी को बेलपत्र, धतूरा, और भांग आदि अर्पित करें। भगवान शिव को मखाने की खीर, फल, हलवा या फिर चावल की खीर का भोग लगाएं। साथ ही माता पार्वती को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें। दीपक जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। शिव चालीसा और शिव जी के मंत्रों का जप करें। अंत में सभी लोगों में पूजा का प्रसाद बांटें। शिव जी के मंत्र – शिव मूल मंत्र – ॐ नमः शिवाय॥ भगवान शिव का गायत्री मंत्र – ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ महामृत्युंजय मंत्र – ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् || ध्यान मंत्र – करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा। श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधं। विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व। जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ रुद्र मंत्र – ॐ नमो भगवते रुद्राये।। शीघ्र विवाह के लिए मंत्र – ओम कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥

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Matsya Jayanti 2025: कब है मत्स्य जयंती? 3 शुभ योग में होगी ​विष्णु पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

Matsya Jayanti 2025:मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों मे से पहले अवतार हैं, जो राक्षस हयग्रीव से ब्रह्मांड को बचाने के लिए अवतरित हुए थे। मत्स्य जयन्ती चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। Matsya Jayanti 2025:मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन मत्स्य अवतार में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसे हयपंचमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु ने मध्याह्नोत्तर बेला में पुष्पभद्रा तट पर मत्स्यावतार धारण कर जगत् कल्याण किया था। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मत्स्य जयंती मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की पूजा करते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने सबसे पहला अवतार मत्स्य के रूप में लिया था. Matsya Jayanti 2025 इस अवतार में भगवान विष्णु ने एक मछली का रूप धारण किया था और संकट से संसार की रक्षा की थी. कि इस बार मत्स्य जयंती के दिन 3 शुभ योग बन रहे हैं. आइए जानते हैं कि इस साल मत्स्य जयंती कब है? मत्स्य जयंती पर पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? मत्स्य जयंती का महत्व क्या है? Matsya Jayanti 2025:मत्स्य जयंती के दौरान अनुष्ठान Matsya Jayanti 2025:इस दिन भक्त भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं। मत्स्य जयंती का व्रत पिछली रात से ही शुरू हो जाता है और इस व्रत को करने वाला व्यक्ति कुछ भी खाने या पानी का एक घूंट भी पीने से परहेज करता है। यह व्रत अगले दिन सूर्योदय तक जारी रहता है और भक्त भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद ही अपना व्रत तोड़ते हैं। मत्स्य जयंती के दिन पूरी रात जागकर वैदिक मंत्रों का जाप करना फलदायी माना जाता है। ‘मत्स्य पुराण’ और ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। मत्स्य पुराण के दिन दान-पुण्य करना बहुत लाभकारी होता है। Matsya Jayanti 2025 इस दिन ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना चाहिए तथा गरीबों और जरूरतमंदों में बांटना चाहिए। कब है मत्स्य जयंती 2025? मत्स्य जयन्ती 2025: सोमवार, 31 मार्च 2025मत्स्य जयन्ती मुहूर्त – 1:40 PM – 4:09 PM तृतीया तिथि : 31 मार्च 2025 9:11 AM – 1अप्रैल 2025 5:42 AM मत्स्य जयंती महत्व मत्स्य जयंती का हिंदू उत्सव भगवान मत्स्य के जन्मोत्सव का जश्न मनाता है , जिन्हें सत्य युग के दौरान मछली के रूप में भगवान विष्णु का मुख्य प्रतीक माना जाता है । हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ‘ मत्स्य अवतार ‘ एक सींग वाली मछली है जो ‘महाप्रलय’ के दौरान प्रकट हुई थी। हिंदू तिथि-पुस्तक में, मत्स्य जयंती ‘चैत्र’ के महीने में ‘शुक्ल पक्ष’ (चंद्रमा का उज्ज्वल पखवाड़ा) के दौरान ‘तृतीया’ (तीसरे दिन) को मनाई जाती है। यह त्यौहार ‘चैत्र नवरात्रि’ (देवी दुर्गा के लिए निर्धारित 9-दिवसीय समय अवधि) के बीच आता है और शानदार ‘गणगौर उत्सव’ से मेल खाता है। मत्स्य जयंती हिंदू भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन पूरे देश में Matsya Jayanti 2025 भगवान विष्णु के मंदिरों में विशेष अनुष्ठान और पूजा-अर्चना की जाती है। आंध्र प्रदेश राज्य में तिरुपति के पास स्थित ‘नागलपुरम वेद नारायण स्वामी मंदिर’ Matsya Jayanti 2025 भारत का एकमात्र मंदिर है जो भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार को समर्पित है। यहां के त्यौहार अत्यंत भव्य होते हैं और इस दिन असाधारण परियोजनाएं आयोजित की जाती हैं। मत्स्य जयंती के दौरान अनुष्ठान इस दिन भक्त भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं। मत्स्य जयंती का व्रत पिछली रात से ही शुरू हो जाता है और इस व्रत को करने वाला व्यक्ति कुछ भी खाने या पानी का एक घूंट भी पीने से परहेज करता है। यह व्रत अगले दिन सूर्योदय तक जारी रहता है और भक्त भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद ही अपना व्रत तोड़ते हैं। मत्स्य जयंती के दिन पूरी रात जागकर वैदिक मंत्रों का जाप करना फलदायी माना जाता है। ‘मत्स्य पुराण’ और ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। मत्स्य पुराण के दिन दान-पुण्य करना बहुत लाभकारी होता है। Matsya Jayanti 2025 इस दिन ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना चाहिए तथा गरीबों और जरूरतमंदों में बांटना चाहिए। मत्स्य जयंती का महत्व हिंदू किंवदंतियों के अनुसार, मत्स्य अवतार श्री हरि विष्णु के दस अवतारों (दशावतार) में से पहला था। मत्स्य एक सींग वाली मछली का प्रतिनिधित्व करते थे, और इस अवतार में भगवान विष्णु ने राजा मनु को ब्रह्मांडीय जलप्रलय के बारे में चेतावनी दी और यहां तक ​​कि ब्रह्मांड को ‘दमनका’ नामक राक्षस से भी बचाया। Matsya Jayanti 2025 हिंदू धर्म के गैर-धर्मनिरपेक्ष अभिलेखों के अंदर, मत्स्य अवतार की पूजा में किए जाने वाले अनुष्ठानों, परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन मत्स्य जयंती के दिन हिंदू भक्त भगवान विष्णु के इस स्वरूप की अपार श्रद्धा और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ पूजा करते हैं। यह त्यौहार पूरे देश में भगवान विष्णु के मंदिरों में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। वैष्णव और इस्कॉन मंदिरों में उत्सव बहुत भव्य होता है। भगवान विष्णु ने क्यों ​लिया मत्स्य अवतार? पौराणिक कथा में बताया गया है कि भगवान श्री हरि विष्णु ने अपना सबसे पहला अवतार मछली के रूप में लिया था. उन्होंने मत्स्य अवतार पुष्पभद्रा नदी के किनारे लिया था. इस अवतार में भगवान विष्णु एक विशाल मछली के रूप में थे. उनके मुख पर एक बड़ी सी सींग थी. उस समय सृष्टि को प्रलय से खतरा था. तब उस संकट की घड़ी में वे संकटमोचन बनकर आए. सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए एक बड़ी नाव बनाई गई. उसमें सभी जीव, जंतु, पशु, पक्षी, पेड़, पौधों को रखा गया. प्रलय के समय भगवान विष्णु ने अपने मत्स्य अवतार से उस नाव की सुरक्षा की, जिससे जीवन आगे बढ़ा.

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श्री राधा वल्लभ मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इसे राधा वल्लभलाल जी मंदिर भी कहा जाता है। श्री राधा वल्लभ मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के वृन्दावन शहर में एक ऐतिहासिक मंदिर है। इसे राधा वल्लभलाल जी मंदिर भी कहा जाता है, जो मथुरा आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। श्री राधा वल्लभ मंदिर मंदिर के केंद्रीय देवता श्री कृष्ण हैं, जिन्हें श्री राधा वल्लभ के नाम से पूजा जाता है। राधावल्लभ मंदिर में श्री कृष्ण के साथ, एक मुकुट रखा गया है श्री राधा वल्लभ मंदिर जो देवी राधा की उपस्थिति का प्रतीक है। यह मंदिर राधा वल्लभ संप्रदाय से संबंधित है और इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में वृंदावन के संत हित हरिवंश महाप्रभु के मार्गदर्शन में किया गया था। राधावल्लभ मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्थल की सूची में भी है। मंदिर का इतिहास राधावल्लभ मंदिर को हित मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1585 में हित हरिवंश महाप्रभु के पुत्र श्री वनचंद्र के शिष्य सुंदरदास भटनागर ने करवाया था। श्री राधा वल्लभ मंदिर इतिहासकारों की माने तो राजा मान सिंह ने सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण कराने का निर्णय लिया था। लेकिन यह अफवाह सुनकर कि जो कोई भी इस मंदिर का निर्माण करेगा उसकी एक वर्ष के भीतर मृत्यु हो जाएगी, वह पीछे हट गया। हालांकि मंदिर का निर्माण पूरा होने के एक वर्ष के भीतर ही सुंदरदास भटनागर की मृत्यु हो गई और ये अफवाह सच हो गई। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है की राधावल्लभ मंदिर में प्रभु उसी भक्त को दर्शन देते हैं जो सारे पाप कर्मों को त्याग कर निष्कपट होकर सच्चे मन के साथ मंदिर में प्रवेश करता है और जिस भक्त के हृद्य में सच्चे प्रेम और भक्ति की भावना नहीं होती वे लाख कोशिश कर ले उसे कभी दर्शन प्राप्त नही होते। मंदिर की वास्तुकला राधावल्लभ मंदिर वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर के पास चट्टान पर स्थित है। यह अपनी आकर्षक वास्तुकला और भव्य सजावट के कारण अलग दिखता है। राधा वल्लभ मंदिर सबसे पुराने और लंबे समय तक जीवित रहने वाले मंदिरों में से एक है। श्री राधा वल्लभ मंदिर राधावल्लभ मंदिर में हिंदू और मुगल वास्तुकला की मिलीजुली शैली देखने को मिलती है। यह राजसी मंदिर लाल सैंडस्टोन के साथ बनाया गया है जो तब केवल शाही इमारतों, उच्च महलों और शाही किलों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता था। राधावल्लभ मंदिर उदार शैली में बनाया गया है, इसकी दीवार 10 फुट मोटी और 2 चरणों में बनी है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 06:00 PM – 09:00 PM मंगला आरती का समय 05:30 AM – 06:00 AM मंदिर का प्रसाद राधावल्लभ मंदिर में प्रभु को फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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राधा रमण मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर में श्री कृष्ण के राधा रमण रूप की पूजा की जाती है। राधा रमण मंदिर उत्तर प्रदेश मथुरा के वृंदावन धाम में स्थित है राधा रमण मंदिर। यह हिन्दू मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर में श्री कृष्ण के राधा रमण रूप की पूजा की जाती है। यह मंदिर सप्त देवालय में शामिल है जिसमे राधा वल्लभ मंदिर, राधा मदनमोहन मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर, राधा गोकुलनंदन मंदिर और राधा गोविंदजी मंदिर भी शामिल है। मंदिर का इतिहास यह मंदिर 500 साल पूर्व का है। इसकी स्थापना गोपाल भट्ट स्वामी ने की थी। गोपाल भट्ट स्वामी जब 30 वर्ष के थे तब वह वृन्दावन आये। चैतन्य महाप्रभु के अचानक चले जाने के बाद उन्होंने सपने में देखा कि भगवान उन्हें उनके दर्शन प्राप्त करने हेतु नेपाल जाने का निर्देश दे रहे है। इस लिए गोपाल भट्ट स्वामी नेपाल चले गए और वहां उन्होंने काली गंडकी नदी में स्नान किया। इस नदी में उन्होंने अपने पानी के बर्तन को डुबोया परन्तु उन्होंने देखा कि कई शालिग्राम उनके बर्तन आ गए है। उन्हें वापस नदी में गिराने की कोशिश भी की लेकिन वह बर्तन में ही रहे। उन्हें 12 शालिग्राम शिलाएँ मिलीं और वे उन्हें अपने साथ वृंदावन ले आये। वही शालिग्राम वृंदावन में स्थापित है। वर्तमान राधा रमन मंदिर का निर्माण 1826 में लखनऊ के शाह बिहारी लालजी के करवाया था। मंदिर का महत्व इस मंदिर में आज भी भगवान कृष्ण के असली सालिग्राम उपस्थित है जो राधारानी के साथ है। राधा रमण मंदिर में राधा जी का विग्रह नहीं है। क्योंकि राधा-रमण का यह विग्रह स्वयंभू है। इस मंदिर में त्योहारों को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। जिसे देखने के लिए लोग दूर दूर से आते है। पौराणिक कथा के मुताबिक चैतन्य महाप्रभु के शिष्य गोपाल भट्ट गोस्वामी हुआ करते थे उन्होंने अपनी भक्ति और तप द्वारा राधा रमण जी के विग्रह रूप को प्रकट किया। ऐसा भी बताया जाता है कि जब भगवान प्रकट हुए तो गोपाल भट्ट जी ने उनके लिए भोग बनाया। भोग बनाने के लिए उन्होंने हवन की लकड़ियों को रख कर मंत्रोच्चार से ही अग्नि प्रज्वलित की। तब से लेकर आज तक यह अग्नि ऐसे ही प्रज्जवलित हो रही है। राधा रमण मंदिर किसी भी प्रकार से इस अग्नि को बुझाया नहीं जा सका है। आज भी इस मंदिर में राधा रमन जी के लिए भोग इसी अग्नि पर पकाया जाता है। इस मंदिर में माचिस का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। मंदिर की वास्तुकला राधा रमण मंदिर की वास्तुकला आधुनिक हिंदू शैली में बनायीं गयी है। इस मंदिर के अंदर सालिग्राम पत्थर की एक मूल स्वयं-प्रकट मूर्ति है। यह विशाल मंदिर नदी किनारे स्थित है जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाता है। परिसर के भीतर गोपाल भट्ट गोस्वामी की समाधि भी है जो इस मंदिर के निर्माता है। कहा जाता है कि राधा रमण मंदिर में गुरु चैतन्य द्वारा उपयोग किए गए कपड़े भी है। मंदिर का समय गर्मियों में राधारमण जी मन्दिर वृन्दावन खुलने का समय 05:00 AM – 12:15 PM गर्मियों में सुबह मंगला आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM गर्मियों में शाम को राधारमण जी मंदिर खुलने का समय 06:00 PM – 09:00 PM सर्दियों में राधारमण जी मन्दिर वृन्दावन खुलने का समय 05:30 AM – 12:15 PM सर्दियों में शाम को राधारमण जी मंदिर खुलने का समय 06:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद राधा रमण मंदिर में खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। साथ ही पुष्प भी चढ़ाये जाते है।

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Gudi Padwa 2025: कब है गुड़ी पड़वा? क्यों खास है ये पर्व ? जानिए इससे जुड़े रोचक तथ्य

Gudi Padwa 2025: गुड़ी पड़वा केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सभी पहलु जुड़े हुए हैं।ह दिन न केवल महाराष्ट्र में रह रहे लोगों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक नई शुरुआत, खुशी और समृद्धि के आगमन का संदेश लेकर आता है। Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा का महत्व गुड़ी पड़वा Gudi Padwa 2025 हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखता है। ऐसा माना जाता है कि गुड़ी को घर पर फहराने से घर से नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और जीवन में सौभाग्य और समृद्धि आती है। यह दिन वसंत की शुरुआत का भी प्रतीक है और इसे फसल उत्सव के रूप में माना जाता है। कई अन्य राज्यों में इस पर्व को संवत्सर पड़वो, उगादि, चेती, नवारेह, साजिबु नोंगमा पानबा चीरोबा आदि नामों से जाना जाता है। कई लोगों का मानना ​​है कि इस दिन सोना या नई कार खरीदना शुभ होता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला गुड़ी पड़वा भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो खासतौर पर महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा वसंत ऋतु का त्यौहार है Gudi Padwa 2025 जो मराठी हिंदुओं के लिए पारंपरिक नए साल का प्रतीक है। यह चैत्र महीने (मार्च-अप्रैल) के पहले दिन चंद्र-सौर हिंदू कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुआत को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार रंगोली, एक विशेष गुड़ी ध्वज (फूलों, आम और नीम के पत्तों की माला, ऊपर से उलटे हुए मुकुट) के साथ मनाया जाता है। यह पर्व न केवल हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, बल्कि इसमें कई सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी छिपा हुआ है।  Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा 2025: तिथि और मुहूर्त गुड़ी पड़वा 30 मार्च 2025, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन को खास बनाती है इसकी तिथि, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक नए साल की शुरुआत होती है। यह दिन न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी बेहद अहम है, क्योंकि यह मराठी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 29 मार्च को सायं  04 बजकर 27 मिनट पर होगी और 30 मार्च को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि गणना अनुसार 30 मार्च को गुड़ी पड़वा मनाया जाएगा। इस दिन से चैत्र नवरात्र भी प्रारंभ होगा। Gudi Padwa 2025 गुड़ी पड़वा की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता गुड़ी पड़वा के दिन के साथ जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं। इनमें से एक प्रमुख कथा है छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी, जो इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाने का कारण बनती है। कहा जाता है कि इसी दिन शिवाजी महाराज ने विदेशी घुसपैठियों को पराजित कर विजय प्राप्त की थी। विजय के प्रतीक स्वरूप उन्होंने विजय ध्वज फहराया, जो गुड़ी पड़वा के दिन की परंपरा बन गई। क्यों मनाया जाता है गुड़ी पड़वा? Gudi Padwa 2025:गुड़ी पड़वा का महत्व न केवल धार्मिक रूप से है, बल्कि यह जीवन के हर पहलु में शुभता और समृद्धि की प्रतीक भी है। इस दिन घरों में पताका (झंडा) फहराया जाता है, जो यह दर्शाता है कि इस घर में समृद्धि और सुख का आगमन होने वाला है। इस दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है, जिसमें देवी भगवती की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान ब्रह्मा की पूजा करना भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वह सृष्टि के रचयिता माने जाते हैं।इस दिन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, और लोग इस दिन को हर्षोल्लास, परिवार के साथ समय बिताने और नए साल के साथ जीवन में नई ऊर्जा और आशा लेकर मनाते हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।

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Vinayak Chaturthi 2025: विनायक चतुर्थी व्रत की जनवरी से दिसंबर की लिस्ट, देखें गणेश उत्सव कब होगा शुरू

Vinayak Chaturthi 2025:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। सभी देवताओं में गणेश जी का स्थान सर्वोपरि है। गणेश जी को सभी परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। भगवान गणेश की नियमित पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। Vinayak Chaturthi 2025: गणेश जी बुद्धि और विद्या के देवता हैं, Vinayak Chaturthi 2025 इनकी कृपा से व्यक्ति सुख, समृद्धि और ज्ञान पाता है. गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए विनायक चतुर्थी व्रत करना फलदायी माना गया है. Vinayak Chaturthi 2025: विनायकी चतुर्थी के दिन श्रद्वालू अपने बुरे समय व जीवन की कठिनाईओं को दूर करने के लिए भगवान गणेश की पूजा करते हैं. माना जाता है कि Vinayak Chaturthi 2025 विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है और साधक के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है. अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है.इस दिन लोग सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक व्रत करते हैं. शाम को गणेशजी के वरद Vinayak Chaturthi 2025 विनायक रुप की पूजा करने के बाद व्रत खोला जाता है.आज नए साल की पहली विनायक चतुर्थी है. आइए जानते हैं साल 2025 में विनायक चतुर्थी कब-कब है. Shri Ganesh Shendur Laal Chadhayo Aarti:श्री गणेश – शेंदुर लाल चढ़ायो आरती विनायक चतुर्थी 2025 लिस्ट (Vinayak Chaturthi 2025 List) 3 जनवरी 2025 – पौष विनायक चतुर्थी 1 फरवरी 2025 – माघ विनायक चतुर्थी (गणेश जयंती) 3 मार्च 2025 – फाल्गुन विनायक चतुर्थी 1 अप्रैल 2025 – चैत्र विनायक चतुर्थी 1 मई 2025 – वैशाख विनायक चतुर्थी 30 मई 2025 – ज्येष्ठ विनायक चतुर्थी 28 जून 2025 – आषाढ़ विनायक चतुर्थी 28 जुलाई 2025 – सावन विनायक चतुर्थी 27 अगस्त 2025 – भाद्रपद विनायक चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) 25 सितंबर 2025 – अश्विन विनायक चतुर्थी 25 अक्टूबर 2025 – कार्तिक विनायक चतुर्थी 24 नवंबर 2025 – मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी 24 दिसंबर 2025 – पौष विनायक चतुर्थी Vinayak Chaturthi 2025:विनायक चतुर्थी व्रत क्यों महत्वपूर्ण है गणपति की कृपा से उसे बल-बुद्धि, सुख-सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है. Vinayak Chaturthi 2025 गणपति की कृपा से उसके सारे काम सिद्ध होते हैं. इसके अलावा घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलता है. विनायक चतुर्थी गणपति के विनायक रूप को समर्पित है. इस दिन व्रत पूजन करने से उनका आशीर्वाद मिलता है. गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesha Shubh Labh Mantra) Vinayak Chaturthi 2025:विनायक चतुर्थी पर व्रत पूजा की विधि Vinayak Chaturthi 2025 Puja Mantra गणपति पूजा मंत्र प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्यमानमिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्। तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयो: शिवाय।। प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोकदावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्। अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाहमुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य।। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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राम जनार्दन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

भगवान श्रीराम वनवासी स्वरूप में हैं विराजमान राम जनार्दन मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में बना हुआ है। अंकपात क्षेत्र में स्थित राम जनार्दन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। इसमें श्री राम और जनार्दन (विष्णु) का मंदिर हैं। इसमें भगवान के वनवासी स्वरूप के दर्शन होते हैं। भगवान की दाड़ी-मूछ है और माता सीता के हाथ में पौधों को पानी देने वाली झारी और दूसरे हाथ में चवर दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान एक प्राचीन मंदिर स्थल रहा है क्योंकि यहां स्थापित कई प्रतिमाएं दसवीं और बारहवीं शताब्दी की हैं। इससे इस स्थल को परमारों के काल का माना जाना चाहिए। मंदिर का इतिहास राम जनार्दन मंदिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था, मंदिर का रथाकार निर्माण आकर्षक है। अठारहवीं शताब्दी में मराठा राजाओं ने मंदिरों में कुछ संरचनाएं जोड़ीं। मंदिरों की दीवारों पर लगी भव्य तस्वीरें मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। इन शानदार मंदिरों में कुछ अद्भुत मूर्तियां भी हैं जो 11वीं और 12वीं शताब्दी की हैं। गोवर्धनधारी कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की छवि उनकी स्थापत्य भव्यता और मूर्तिकला उत्कृष्टता के लिए बहुत प्रभावशाली हैं। मंदिर का महत्व राम जनार्दन मंदिर में श्रीराम की सांवले रंग के पत्थर की प्रतिमा है। यह देश में दूसरा ऐसा मंदिर है जहां काले रंग में राम जी की मूर्ति है, एक प्रतिमा नासिक के राम मंदिर में है। – होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्यादेवी ने राम जनार्दन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। मंदिर की वास्तुकला मराठा शैली में राम और कृष्ण के जीवन के दृश्यों को दर्शाने वाली पेंटिंग हैं। यह मराठा कला का एक सुंदर उदाहरण है। मराठा शासन के दौरान ही उज्जैन पूना और कांगड़ा शैली के चित्रकारों का मिलन स्थल बन गया। चित्रकला की दो अलग-अलग शैलियों का प्रभाव विशिष्ट है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद राम जनार्दन मंदिर में भक्त श्रद्धा के अनुसार दूध की बनी बर्फी, बूंदी के लड्डू चढ़ाते हैं। श्रद्धालु प्रभु को फल के साथ पूड़ी-खीर का भी भोग लगाते हैं।

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द्वारकाधीश गोपाल मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की मूर्ति द्वारकाधीश गोपाल मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर उज्जैन का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। मुख्य मंदिर में चांदी लेपित संगमरमर से बनी भगवान कृष्ण की दो फुट ऊंची मूर्ति है। यहां जन्माष्टमी के अलावा ‘हरिहर का पर्व’ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है, तब यहां हरिहर मिलन अर्थात् विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहां पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है। मंदिर का इतिहास पुराणों के अनुसार द्वारकाधीश गोपाल मंदिर लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। इतिहासकारों की माने तो इस मंदिर का निर्माण दौलतराव सिंधिया की धर्मपत्नी बैजीबाई शिंदे ने 1844 में कराया था, जिसमें मूर्ति की स्थापना 1852 में की गई थी। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्थ था जहां पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर का महत्व कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर जहां देश भर में भक्त कान्‍हा की भक्ति में डूब जाते हैं, वहीं द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में कान्‍हा के जन्‍म के बाद उनकी आरती नहीं उतारने की परंपरा है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म (जन्माष्टमी) के बाद रोज होने वाली शयन आरती पांच दिनों तक नहीं होती है। मंदिर में पांच दिनों तक कोई भजन पाठ नहीं होता है। क्‍योंकि यह परंपरा करीब 110 सालों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि यहां जन्म के बाद कान्हा पांच दिनों तक सोते नहीं हैं। मंदिर की वास्तुकला द्वारकाधीश गोपाल मंदिर की वास्तुकला मराठा वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। गर्भगृह संगमरमर से जड़ा हुआ है और दरवाजे चांदी से मढ़े हुए हैं। द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वती और गरुड़ भगवान की मूर्तियां हैं। ये मूर्तियां अचल है और एक कोने में रानी बैजीबाई की भी ‍मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्न जड़ित द्वार दौलतराव सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ की लूट में वहां पहुंचा था। मंदिर के विशाल स्तम्भ और सुंदर नक्काशी देखने लायक हैं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:30 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:30 AM संध्या आरती का समय 08:00 PM – 08:30 PM मंदिर का प्रसाद द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में दूध, माखन आदि का नियमित भोग लगाया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार श्री कृष्ण को सूजी का हलवा और पंचामृत का भी भोग लगाते हैं।

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Papavimocani Ekadashi 2025:पापमोचनी एकादशी कब है? जानें डेट, पूजन व व्रत पारण मुहूर्त

Papavimocani Ekadashi 2025:हिंदू धर्म में हर महीने के कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को एकादशी व्रत रखा जाता है। जानें मार्च में पापमोचिनी एकादशी कब है- Papmochani ekadashi 2025 kab hai: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी व्रत रखा जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि पापमोचनी एकादशी व्रत करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी के दिन लक्ष्मीनारायण की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और घर में सुख-समृद्धि व धन-धान्य का वास रहता है। जानें मार्च में पापमोचनी एकादशी व्रत कब है, पूजन मुहूर्त व व्रत पारण मुहूर्त पापमोचनी एकादशी कब है 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 25 मार्च 2025 को सुबह 05 बजकर 05 मिनट पर प्रारंभ होगी और 26 मार्च 2025 को सुबह 03 बजकर 45 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि में Papavimocani Ekadashi 2025 पापमोचनी एकादशी व्रत 25 मार्च 2025, मंगलवार को रखा जाएगा पापमोचनी एकादशी शुभ योग (Papmochani Ekadashi Shubh Yoga) Papavimocani Ekadashi 2025 चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर शिव और सिद्ध योग का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शिव और सिद्ध योग को बेहद शुभ मानते हैं। इन योग में लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी। साथ ही शुभ काम में सफलता मिलेगी। साथ ही शिववास योग का भी संयोग बन रहा है। शिववास योग पूर्ण रात्रि तक है। इस दिन भगवान शिव कैलाश पर जगत की देवी मां पार्वती के साथ रहेंगे। पापमोचनी एकादशी 2025 पूजन मुहूर्त- ब्रह्म मुहूर्त- 04:45 ए एम से 05:32 ए एम अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:52 पी एम विजय मुहूर्त- 02:30 पी एम से 03:19 पी एम गोधूलि मुहूर्त- 06:34 पी एम से 06:57 पी एम सायाह्न सन्ध्या- 06:35 पी एम से 07:45 पी एम अमृत काल- 05:41 पी एम से 07:15 पी एम Papavimocani Ekadashi 2025:पापमोचनी एकादशी पारण समय Papavimocani Ekadashi 2025 साधक 26 मार्च को दोपहर 01 बजकर 41 मिनट से लेकर शाम 04 बजकर 08 मिनट के मध्य व्रत खोल सकते हैं। इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके पश्चात ब्राह्मणों को अन्न दान देकर व्रत खोलें। Papavimocani Ekadashi 2025 एकादशी व्रत नियम– हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इस दिन वाद-विवाद से दूरी बनाकर रखें। एकादशी के दिन ज्यादा से ज्यादा भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए। व्रत पारण के दिन सबसे पहले अनजाने में हुए पाप या गलतियों के लिए भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी से माफी मांगनी चाहिए।

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