हरसिद्धि माता मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

51 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर भारत के मध्य प्रदेश की धर्मिक नगरी उज्जैन में हरसिद्धि माता का मंदिर स्थित है। जो कि उज्जैन के क्षिप्रा नदी के रामघाट के पास भैरव पर्वत पर स्थित है, माँ हरसिद्धि का यह मंदिर शक्तिपीठों में से एक है। माता सती के 52 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर है। इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। मंदिर परिसर में 51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभ स्थापित हैं। दोनों दीप स्तंभों में लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। बताया जाता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। मंदिर का इतिहास माता हरसिद्धि की साधना करने से सभी प्रकार की दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए हरसिद्धि माता को ‘मांगल-चाण्डिकी’ के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते हैं, हरसिद्धि माता मंदिर इन्हीं देवी की आराधना किया करते थे। इसलिए उन्हें भी हर प्रकार की दिव्य सिद्धियां प्राप्त हो गई थीं। हरसिद्धि माता मंदिर इसी कारण मांगल-चाण्डिकी देवी को हरसिद्धि अर्थात हर प्रकार की सिद्धि की देवी नाम दिया गया। विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार वर्ष पुराना है। इसलिए इस मंदिर को भी 2,000 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर का महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12 साल में अपना शीश काटकर उन्हें बलि चढ़ा देते थे और बार-बार उनका मस्तक लौट आता था। 11 बार उन्होंने ऐसा किया लेकिन हर बार उनका सिर वापस उनके शरीर पर आ जाता। राजा विक्रमादित्य ने जब 12वीं बार अपना शीश माता को अर्पित किया तो वह वापस नहीं आया और यह मान लिया गया कि उनका शासन पूर्ण हो गया है। हालांकि जिस मुंड को राजा विक्रमादित्य का बताया जाता है वह देवी वैष्णवी है जिनकी पूजा अर्चना मंदिर के पुजारी करते हैं। मंदिर की वास्तुकला हरसिद्धि मंदिर की चारदीवारी के अंदर चार प्रवेश द्वार हैं। वहीं मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है। द्वार पर सुंदर बंगले बने हुए हैं। बंगले के पास दक्षिण-पूर्व की और एक बावड़ी बनी हुई है, हरसिद्धि माता मंदिर जिसके अंदर एक स्तंभ है। यहां श्री यंत्र बना हुआ स्थान है। इसी स्थान के पीछे भगवती अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 07:00 PM सुबह आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM संध्या आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद हरसिद्धि माता मंदिर में श्रद्धालु देवी को देशी घी के लड्डू का भोग लगाते हैं। वहीं भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार इलायची दाना और बर्फी भी माँ को चढ़ाते हैं और उन्हें प्रसन्न करते हैं।

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मनकामेश्वर मंदिर:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

मनकामेश्वर मंदिर उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर:त्रिवेणी संगम की नगरी प्रयागराज को सनातन धर्म का केंद्र कहा जाता है। यहां पर कई ऐसे पौराणिक और आध्यात्मिक स्थल मौजूद हैं जो इस नगरी की प्राचीनता और महत्वई को बताते हैं। मनकामेश्वर मंदिर यहां के अनेकों मंदिर रामायण काल और महाभारत काल से जुड़े हैं और इनका वर्णन धर्म ग्रंथों में मिलता है। ऐसा ही एक पौराणिक गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम तट पर मौजूद बना है, जिसे मनकामेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले भक्तों की भगवान शिव हर मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसलिए यहां पर देश के अलग-अलग राज्यों से लोग आते हैं और भोलेनाथ से मनोकामना मांगते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने मनकामेश्वर मंदिर को एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया है। मनकामेश्वर मंदिर का इतिहास मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण 1542 ई. में हुआ था, इसका निर्माण राजपूत वंश के राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। मनकामेश्वर मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण और पदम पुराण में कामेश्वर पीठ के तौर पर मिलता है। ऐसा कहा जाता है मनकामेश्वर कि शिव जी कामदेव को भस्म करने के बाद यहां आकर लिंग के रूप में विराजमान हो गए थे। बताया जाता है कि त्रेता युग में भगवान श्री राम जब वनवास जा रहे थे तो प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे अपने भाई लक्ष्मण और माता सीता के साथ रूके थे। यहां से आगे बढ़ने से पहले प्रभु राम ने मंदिर पहुंच कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था और उन्होंने भगवान शिव से मार्ग में आने वाले बाधाओं से मुक्ति पाने की कामना भी की थी। 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्री राम वापस अयोध्या लौटने लगे तो पुनः यहां पर रुककर भोलेनाथ के दर्शन किये थे। मंदिर का महत्व मान्यता है कि मनकामेश्वर महादेव में 51 सोमवार पूजन अर्चन करने से जीवन में आने वाली सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। मनकामेश्वर मंदिर तंत्र साधना के लिए अलग पहचान है। मंदिर में श्री विद्या की तांत्रिक साधना की शिक्षा भी दी जाती है।ऐसा बताया जाता है कि ऐसा कई बार हुआ है, जब मंदिर परिसर में कोई न हो और वातावरण बिल्कुल शांत हो, उसके बाद भी भगवान शिव के जयकारे सुनाई देते हैं। उन्होंने कहा कि जब मनकामेश्वर भगवान की आरती के बाद सयन की अवस्था में होते हैं तब यहां आस-पास के दिव्य शक्तियां पहरा देती है। मंदिर की वास्तुकला मनकामेश्वर मंदिर का निर्माण हिंदू वास्तुकला के मानदंडों के अनुसार किया गया था और यह राजपूत वास्तुकला की भव्यता को दर्शाता है। मनकामेश्वर मंदिर अष्टकोणीय आकार का है और यह एक बड़े आयताकार प्रांगण से घिरा हुआ है। मंदिर के शीर्ष पर विशाल गुंबद बने हैं। मंदिर के गर्भ गृह में साढ़े तीन फुट का शिवलिंग विराजमान है, जिसे स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 04:30 AM – 05:30 AM मंदिर का प्रसाद मनकामेश्वर मंदिर में भगवान शिव को फल, दूध, दही लड्डू का भोग लगाया जाता है। साथ ही श्रद्धालु शिवलिंग पर बेलपत्र, भांग, धतूरा भी चढ़ाते हैं।

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Holi Dream Meaning: सपने में होली देखने और खेलने का क्या है मतलब, जानें आपके लिए शुभ या अशुभ

Holi Dream Meaning:सपने में आप कुछ भी कभी भी देख सकते हैं। ऐसी ही अगर आप सपने में खुद को होली खेलते देखते हैं तो स्वप्न शास्त्र में इसके अलग-अलग मतलब बताए गए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं सपने में होली खेलने के क्या अलग अलग मतलब होते हैं। Sapne Mai Holi Dekhna: सपने हर मनुष्य को दिखाई देते हैं। हर सपने का कोई न कोई अर्थ जरुर होता है और स्वप्न शास्त्र में हर सपने का मतलब बताया गया है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने आपको भविष्य की घटनाओं को लेकर सचेत करते हैं। Holi Dream Meaning कई बार किसी त्योहार के आसपास भी व्यक्ति को उससे जुड़े सपने आने लगते हैं। जैसे अभी होली के पर्व पर कई लोगों को होली से जुड़े सपने आ रहे होंगे। तो आइए जानते हैं होली से संबंधित सपने शुभ होते है या अशुभ। ​सपने में होलिका दहन देखना अगर किसी व्यक्ति को सपने में होलिका दहन दिखाता है तो इस तरह का सपना आना अशुभ नहीं समझा जाता है Holi Dream Meaning बल्कि, यह इस बात संकेत है कि जल्द ही आपके घर में कोई खुशखबरी आने वाली है। इसके अलावा अगर आप किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह जल्द ही समाप्त हो जाएगी। सपने में होली खेलने का मतलब यदि आप सपने में देखते हैं कोई व्यक्ति सपने में होली खेलते हैं तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आना शुभ माने जाते हैं। इस तरह के सपने संकेत देते हैं की आपको आने वाले समय में कोई अच्छी खबर मिल सकती है। यदि इस तरह का सपने किसी अविवाहित को आता है तो इसका मतलब है कि उन्हें जल्द ही अपना पार्टनर मिल सकता है। खुद को होली खेलते देखना अंक ज्योतिष के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति खुद को सपने में होली खेलते देखता है तो उसका अलग-अलग मतलब होता है। अगर कोई व्यक्ति सपने में गुलाबी रंग से होली खेलते खुद को देखते हा तो इसका मतलब है कि आपको कोई अच्छी खबर मिलेगी। वहीं, अगर कोई खुद को लाल रंग से होली खेलते देखते हैं तो इस तरह के सपने का मतलब है कि आपको थोड़ा सजग रहने की जरुरत है। वरना आपको कोई बड़ा नुकसान हो सकता है। Holi Dream Meaning:काले रंग से होली खेलना का मतलब Holi Dream Meaning:सपने में खुद को काले रंग से होली खेलते देखने का मतलब अच्छा नहीं समझा जाता है। इस तरह का सपना आना अशुभ संकेत माना जाता है। इस तरह के सपने आने का मतलब है कि आप पर कोई बड़ी मुसीबत आ सकती है। या कोई आपको हानि पहुंचा सकता है। इस तरह के सपने आने पर आपको संभलकर रहने की जरूरत है।

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Bhalchandra Sankashti Chaturthi:कब है चैत्र महीने की संकष्टी चतुर्थी, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Bhalchandra Sankashti Chaturthi:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। Bhalchandra Sankashti Chaturthi:सनातन धर्म में पूज्य भगवान श्री गणेश की आराधना के लिए हर माह में दो चतुर्थी तिथियां अत्यंत जरूरी मानी जाती हैं. इन्हीं में से चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी को विशेष शुभ और मंगलकारी माना जाता है. Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2025: चतुर्थी व्रत को हिंदू धर्म में अत्यंत मंगलकारी माना जाता है. यह व्रत भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित होता है. हर माह दो बार चतुर्थी तिथि आती है—शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी और Bhalchandra Sankashti Chaturthi कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी. हर संकष्टी (Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2025 Significance) चतुर्थी का अलग नाम और विशेष महत्व होता है. इस बार भालचंद्र संकष्टी (Bhalchandra Sankashti Chaturthi) चतुर्थी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में 17 मार्च 2025, सोमवार को मनाई जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश (Ganesh Puja on Sankashti Chaturthi) की विधिपूर्वक पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है. आइए, इस तिथि से जुड़ी कुछ खास जानकारी जानते हैं. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Sankashti Chaturthi 2025 Muhurat And Timings) हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 17 मार्च 2025 को रात 07:33 बजे होगी और इसका समापन 18 मार्च 2025 को रात 10:09 बजे होगा.इस दिन चंद्रोदय के समय भगवान गणेश की पूजा करने का विशेष महत्व होता है. इसलिए, भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 17 मार्च 2025, सोमवार को मनाई जाएगी. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: पूजा विधि (Sankashti Chaturthi March 2025 puja vidhi) भगवान गणेश जिन्हें रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि के देवता माना जाता है, उन्हें प्रसन्न करने के लिए हर माह लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी का व्रत और पूजन किया जाता है. विशेष रूप से, महिलाएं यह व्रत संतान की सलामती और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं. पूजा को पूर्ण और सफल बनाने के लिए सही और संपूर्ण पूजा सामग्री का होना जरूरी है. इसलिए, संकष्टी चतुर्थी की पूजा के लिए जरूरी सामग्रियां जान लें… इन सभी सामग्रियों के साथ विधिपूर्वक गणपति बप्पा की पूजा करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2025: शुभ योग (Bhalchandra Sankashti Chaturthi Shubh Yog) ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है, जो दोपहर 03:45 बजे तक रहेगा. इस योग में भगवान गणेश की पूजा करने से शुभ कार्यों में सफलता मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है.इसके अलावा, इस दिन भद्रावास योग भी बन रहा है, जो शाम 07:33 बजे तक रहेगा. साथ ही, भद्रावास योग के बाद शिव वास योग का संयोग बन रहा है. इन विशेष योगों में भगवान गणेश की पूजा करने से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. शुभ मुहूर्त भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी पर इन बातों का रखें ध्यान (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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Holi Kab Hai 2025: होली कब है 14 या 15, जानें क्यों है होली की तारीख को लेकर कन्फ्यूजन, देखें होलिका दहन और रंगोत्‍सव की सही डेट

Holi Kab Hai 2025:होली को लेकर लोगों में संशय की स्थिति बनी हुई है। Holi Kab Hai 2025 हिंदू पंचांग के अनुसार होली का त्योहार पूर्णिमा के अगले दिन यानि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि को मनाते हैं, जबकि होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को भद्रा रहित मुहूर्त में रात के समय करते हैं। होली का त्‍योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे वैसे इस बात की चर्चा और गरम होती जा रही है कि होली कब मनाई जाएगी। होली की सही डेट को लेकर लोगों के मन में भारी असमंजस बना है। होली 14 मार्च को होगी या फिर 15 मार्च को, इस बात को लेकर लोगों के बीच में आपस में भारी कन्फ्यूजन की स्थिति पैदा हो गई है। आइए हम आपको बताते हैं होली जलाने और होली खेलने की सही डेट। Holi 2025 Kab Hai :होली कब मनाई जाएगी, इस बात को लेकर हर साल की तरह इस साल भी भारी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है। होली 14 मार्च को मनाई जाएगी या फिर 15 मार्च को, इस वक्‍त यह काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ स्‍थानों पर होली 14 मार्च को मनाने की बात कर रहे हैं तो कुछ स्‍थानों पर होली 15 मार्च को मनाई जाएगी। आइए आपको बताते हैं कि होली को लेकर कन्फ्यूजन क्‍यों बना, साथ ही जानते हैं होलिका दहन और रंग खेलने की सही डेट क्‍या है। होलिका दहन पर करें ये काम Holi Kab Hai 2025 – होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजा के बाद उसमें आटा, गुड़, कपूर, तिल, धूप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डाल कर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता का ह्रास होता है। रोग-शोक से मुक्ति मिलती है व मनोकामना की पूर्ति होती है। होलिका के जलने के बाद उसमें चना या गेहूं की बाली को सेंक या पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से स्वास्थ्य अनुकूल होता है। Holi Kab Hai 2025:होली कब मनाई जाएगी होली के त्योहार को लेकर इस साल भी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है। कई स्थानों पर होली का त्योहार 14 मार्च और 15 मार्च को लेकर लोग उलझन में हैं। लेकिन आपको बता दें कि इस बार आपको इन उलझनों में फंसने की जरूरत नहीं है। होली का त्योहार यानी रंगोत्सव हर साल चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि को मनाया है। इस साल चैत्र कृष्‍ण प्रतिपदा तिथि का आरंभ 14 मार्च को दिन में 12 बजकर 25 मिनट के बाद हो जा रहा है। इससे पहले तक फाल्गुन पूर्णिमा तिथि रहेगी। ऐसे में 14 मार्च को दिन में प्रतिपदा तिथि लग जाने से रंगोत्सव इसी दिन मनाया जाएगा। जहां लोग होली रंगोत्सव की तारीख को लेकर कन्फ्यूज हैं वहीं उलझन की वजह यह है कि लोग उदया तिथि को मान रहे हैं। यानी 14 मार्च को सुबह 12 बजकर 25 मिनट तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। इसलिए लोग अगले दिन यानी 15 तारीख को उदया तिथि में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा होने से रंगोत्सव मनाने की बात कर रहे हैं। लेकिन आपको बता दें कि होली और रंगोत्सव का नियम है कि जिस दिन प्रदोष काल में फाल्गुन पूर्णिमा तिथि होती है उसी रात में होलिका दहन किया जाता है और उसके अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है। Holi Kab Hai 2025 इस नियम के अनुसार होलिका दहन इस वर्ष 13 मार्च को किया जाएगा और 14 मार्च को रंगोत्सव धुलैंडी का त्योहार मनाया जाएगा। प्रतिपदा में 15 मार्च को खेली जाएगी होली उदयातिथि के आधार पर होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में और होली फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा में मनाने का विधान है। जहां पर उदयातिथि के अनुसार पर्व मनाया जाता है वहां पर प्रतिपदा तिथि के अनुसार 15 मार्च को होली मनाई जाएगी। मिथिला क्षेत्र में भी होली 15 मार्च को मनाई जाएगी। 14 मार्च को इस बार आतर रहेगा। 14 मार्च शुक्रवार को उदयातिथि को लेकर दोपहर तक पूर्णिमा ही है, इस कारण रंगोत्सव होली नहीं मनायी जाएगी। इसलिए इस बार होली 15 मार्च को मनायी जाएगी।

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Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

Diwali 2025 Date: दिवाली का त्योहार कार्तिक अमावस्या पर मनाया जाता है. अगले साल 2025 में दिवाली कब मनाई जाएगी, इसकी सही तारीख क्या है, पांच दिन का दिवाली कैलेंडर सब यहां देखें. Diwali 2025 Date: हिंदू धर्म में दिवाली के त्योहार को विशेष माना गया है. Diwali 2025 Date कार्तिक अमावस्या के दिन दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का विधान है. कहा जाता है कि इस दिन लक्ष्मी मां की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन श्रीराम 14 साल का वनवास कर अयोध्या लौटे थे इस खुशी में दीपावली मनाई गई. दिवाली के 5 दिन का त्योहार धनतेरस से शुरू हो जाता है और भाई दूज तक रहता है. 2025 में दिवाली कब मनाई जाएगी, अभी से जान लें सही तारीख मुहूर्त. दिवाली 2025 में कब है (Diwali 2025 date in India) दिवाली 20 अक्टूबर 2025 में है. इस दिन लक्ष्मी पूजा सूर्यास्त के बाद करने का विधान है. दीपावली को दीप उत्सव भी कहा जाता है, क्योंकि दीपावली का मतलब होता है दीपों की अवली यानि पंक्ति। दिवाली का त्यौहार अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है. दिवाली 2025 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (Diwali 2025 Muhurat) पंचागं के अनुसार कार्तिक अमावस्या (Kartik amavasya) तिथि 20 अक्टूबर 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 21 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 54 मिनट पर समाप्त होगी. दिवाली 2025 कैलेंडर (Diwali 2025 Calendar) Diwali 2025 Date दिवाली के दिन करें ये शुभ काम दीवाली या लक्ष्मी पूजा के दिन, हिन्दु अपने घरों और दुकानों को गेंदे के फूल की लड़ियों व अशोक, आम तथा केले के पत्तों से सजाते हैं. इस दिन कलश में नारियल स्थापित कर, उसे घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर रखने को शुभ माना जाता है. दिवाली के दिन सफाई का भी विशेष महत्व है. क्योंकि लक्ष्मी मां भी उसी घर में प्रवेश करती हैं जिस घर में साफ-सफाई होती है. लक्ष्मी पूजा के लिए, पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर, Diwali 2025 Date उस पर श्री गणेश और देवी लक्ष्मी की सुन्दर रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित मूर्तियों को स्थापित किया जाता है और फिर पूजन करें. शाम को लक्ष्मी पूजा के साथ ही जलते हुए दीपकों की भी पूजा की जाती है. घर और आंगन में सब जगह दीपक लगाएं. कैसे करें लक्ष्मी जयंती की पूजा: लक्ष्मी जयंती Diwali 2025 Date के दिन भक्त प्रातः काल स्नानादि समाप्त कर देवी लक्ष्मी की मूर्ति को वेदी पर रखें और चार बत्तियों का दीपक जलाएं, वेदी के ऊपर शंख भी रखे जाते हैं।फिर लक्ष्मी मां का अभिषेक रोली और चावल से करें और फूल माला अर्पित करें।देवी लक्ष्मी की स्तुति गान करके देवी की आरती करें। इसके बाद देवी लक्ष्मी को भोग के रूप में मिठाई चढ़ाएं और प्रार्थना के बाद भोग सभी भक्तों में वितरित करें।लक्ष्मी जयंती पर भक्त लक्ष्मी होमम करते हैं, होम के दौरान देवी लक्ष्मी सहस्रनामावली और श्री सूक्तम के 1008 नामों का पाठ किया जाता है।लक्ष्मी जयंती के दिन महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए आहुति के लिए कमल के फूलों को शहद में डुबोकर उपयोग किया जाता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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गुफा मंदिर:भोपाल, मध्‍यप्रदेश , भारत

यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। गुफा मंदिर मध्‍यप्रदेश के भोपाल शहर में लालघाटी पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यह भोपाल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। इस मंदिर को पहाड़ काटकर बनाया गया है। यह 7 प्राकृतिक गुफाओं से घिरा है, जिसके कारण इसका नाम गुफा मंदिर पड़ा। इन 7 गुफाओं में से एक गुफा में स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन होते हैं। भगवान शिव के साथ उनका परिवार माता पार्वती, पुत्र गणेश जी, कार्तिकेय व नंदी जी की प्रतिमा भी विराजित है। माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन से भाग्य खुल जाता है। सावन, महाशिवरात्रि व नवरात्रि पर यहां बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर का इतिहास गुफा मंदिर की खोज साल 1949 में महंत नारायण दासजी त्यागी द्वारा की गई थी। उस समय यहां आसपास घना जंगल व सिर्फ 2 गांव थे। बताया जाता है कि गुफा की खोज करने के बाद महंत गुफा में ही आध्यात्मिक तपस्या में लीन हो गए। आसपास के लोगों को जब इसका पता चला तो वे सभी महंत से मिलने गए। गुफा के अंदर स्वयंभू देख गांव वालों ने यहां एक मंदिर निर्माण की इच्छा जताई। जिसके बाद महंत नारायण दासजी त्यागी ने मंदिर की नींव रखी। 2 अप्रैल 1965 को महंत द्वारा इसका पुनर्निर्माण भी कराया गया। मंदिर में पहाड़ के नीचे प्राकृतिक रूप से गुफा निर्मित गृर्भ गृह में भगवान भोलेनाथ स्वयंभू पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर का महत्व कहा जाता है कि गुफा में विराजित शिवलिंग स्वयंभू यानी अपने आप प्रकट हुए थे । गुफा में विराजित ​शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से पानी की बूंदे लगातार गिरती रहती है। माना जाता है कि गुफा मंदिर में सावन माह में ​स्वयंभू शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भक्तों के हर कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला बाहर से देखने में गुफा मंदिर दक्षिण भारत के किसी मंदिर जैसा प्रतीत होता है। एक मीनार की तरह 3 खंड ऊंचे शिखर शैली में दिखाई देता है, जोकि अलग-अलग रंगों से की गई सुंदर कलाकृतियों के कारण काफी आकर्षक लगता है। हालांकि, अंदर से मंदिर सिर्फ एक ही खंड यानी प्रथम खंड में निर्मित है। गर्भगृह से गुफा के अलावा यहां एक प्राचीन गुफा है, जहां शिवलिंग विराजित है। यह गुफा सालभर जल से भरी रहती है। गुफा के बाहर लक्ष्मीनारायण जी की सुंदर प्रतिमा है, जहां भगवान विष्णु अपने बैकुण्ड निवास में माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। – मुख्य गुफा में प्रवेश से पहले बाईं ओर भगवान सीताराम का एक सुंदर मंदिर है, जिसमें पूरा राम दरबार सुशोभित है। परिसर में हनुमान जी की एक प्रतिमा है, जिसमें आदीवासी मूर्तिकला की झलक देखने को मिलती है। – मंदिर की दीवारों पर श्रीराधाकृष्ण, हनुमान जी व गणेश जी की सुंदर छवियां चित्रित की गई हैं। परिसर में भगवान परशुराम जी की भी विशाल प्रतिमा विराजमान है। मंदिर का समय गुफा मंदिरन खुलने का समय 06:30 AM – 07:00 PM महादेव के श्रंगार व आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद शिवलिंग पर परंपरा अनुसार शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी व बेलपत्र का अर्पण किया जाता है।

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राम घाट:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

राम घाट क्षिप्रा नदी के तट पर बना है राम घाट भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर के क्षिप्रा नदी के किनारे बना है। मोक्षदायिनी और उत्तरवाहिनी क्षिप्रा नदी को भगवान महाकाल की गंगा के रूप में जाना जाता है। जानकारों की माने तो भगवान श्रीराम राम घाट ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का यहां पर तर्पण किया था। इसलिए क्षिप्रा नदी के तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के मोक्ष की प्राप्ति के लिए यहां पर तर्पण और पूजा करने के लिए आते हैं। यहां पर कालसर्प और पितृ दोष पूजा होती है। राहु-केतु को शांत करने के लिए भी यहां पूजा की जाती है। मंदिर का इतिहास हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अमृत मंथन के दौरान क्षिप्रा नदी के समीप स्थित एक सुंदर कुंड में अमृत की कुछ बूंदे गिरी थी, इसलिए क्षिप्रा नदी का महत्व और भी बढ़ जाता है। साथ ही यहां पर भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था, राम घाट इसलिए क्षिप्रा नदी के इस प्रमुख तट को रामघाट के रूप में जाना जाता है। इस हिसाब से रामघाट का इतिहास भारत के पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर का महत्व -रामघाट कुंभ समारोह के संबंध में सबसे पुराने स्नान घाटों में से एक माना जाता है। मेगा कुंभ उत्सव के दौरान लाखों लोग इस स्थान पर आते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है राम घाट कि कि यहां एक डुबकी लगाने से आपके सभी पाप धूल जाते हैं। -रामघाट में ही भगवान श्रीराम ने अपने पिता दशरथ और माता कौशल्या का तर्पण किया था। तब से रामघाट पर पितृ दोष की पूजा होती जा रही है। मंदिर की वास्तुकला रामघाट घाट ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्राचीन भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं रामघाट में कई सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, जो क्षिप्रा नदी तक जाती हैं। रामघाट के आरती स्थल पर एक भव्य द्वार भी बना हुआ है, जिसकी सुंदरता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर का समय प्रतिदिन होने वाली सायंकाल घाट में संध्या आरती का समय 07:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद रामघाट पर मुख्य रूप से श्रद्धालु कालसर्प पूजा और पितृ दोष पूजा करवाने आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद चढ़ाते हैं।

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श्री जुगल किशोर जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

श्री जुगल किशोर मंदिर भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर:भारत के उत्तर प्रदेश का वृंदावन शहर पौराणिक कथाओं में डूबा हुआ है। इसे भगवान श्री कृष्ण के बचपन और उनकी लीलाओं के लिए जाना जाता है। भगवान श्री कृष्णा और राधा जी की लीलाओ का साक्षी श्री धाम वृन्दावन आज भी अपने आप में अनेकों रहस्यों को समाये हुए है। श्री जुगल किशोर मंदिर वृन्दावन में केशी घाट पर स्थित है, श्री जुगल किशोर जी मंदिर जहां भगवान श्री कृष्ण और राधा जी जुगल रूप में विराजमान है। श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय दीपक जलाया जाता है, जिससे इस मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर का इतिहास india’s famous temple श्री जुगल किशोर मंदिर की इतिहास हजारों साल पुराना है। वृन्दावन में सबसे पुराने मंदिरों में से एक श्री जुगल किशोर मंदिर है, इसका निर्माण वर्ष 1627 में किया गया था। इसका निर्माणकर्त्ता नानकरन था। श्री जुगल किशोर मंदिर एक वैष्णव संप्रदाय का मन्दिर है। श्री जुगल किशोर मंदिर गोविन्द देव, मदनमोहन और गोपीनाथ मन्दिर की ही श्रृंखला में चौथा मंदिर है, जो वृन्दावन के निचले सिरे पर प्रसिद्ध केशी घाट के बगल में स्थित है। मंदिर का महत्व यमुना नदी के किनारे श्री कृष्ण ने अश्व दानव केशी का वध किया था, जिस स्थान पर उन्होंने दानव का वध किया उस स्थान पर केशी घाट बना और यहीं श्री जुगल किशोर मंदिर स्थापना हुई। – श्री जुगल किशोर जी मंदिर का मुख्य आकर्षण केशी घाट है, जो वृंदावन में श्रद्धालुओं के लिए पसंदीदा और पवित्र स्नान/स्नान स्थलों में से एक है। – श्री जुगल किशोर मंदिर में शाम के समय केशी घाट पर आए भक्त सैकड़ों की संख्या में दीपक जलातें हैं, जिससे इस घाट और मंदिर की सुंदरता और बढ़ जाती है। मंदिर की वास्तुकला श्री जुगल किशोर जी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित एक सुंदर संरचना है, ये मंदिर इतना ऊंचा है कि इसे यमुना नदी के पार से भी देखा जा सकता है। श्री जुगल किशोर जी मंदिर की वास्तुकला मदन मोहन मंदिर, श्री जुगल किशोर जी मंदिर श्री गोविंद देव मंदिर और श्री मदन मोहन मंदिर से मिलती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए और अपनी प्रिय सखियों से घिरे हुए भगवान श्री कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति है। प्रवेश द्वार को पुष्प और पक्षी रूपांकनों से सजाया गया है। मंदिर का शिखर और वास्तुकला सौंदर्य की दृष्टि से मनभावन हैं।श्री जुगल किशोर जी मंदिर इसका सभा कक्ष अन्य मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा है, जिसका क्षेत्रफल 25 वर्ग फुट है और यह पूर्वी दिशा में स्थित है। उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर छोटे प्रवेश द्वार हैं। श्री जुगल किशोर जी मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सुबह दर्शन का समय 08:30 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 11:45 AM – 12:00 PM शाम का भोग का समय 05:30 PM – 06:00 PM शयन आरती का समय 08:10 PM – 08:30 PM सुबह की आरती और परिक्रमा 05:00 AM – 06:00 AM सुबह भोग का समय 11:30 AM – 11:45 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:30 PM शाम की परिक्रमा का मसय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद श्री जुगल किशोर जी को फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

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Bhaum Pradosh Vrat:भौम प्रदोष व्रत कथा, इस कथा के पढ़ने व सुनने से भगवान शिव और हनुमानजी की मिलेगी कृपा

Bhaum Pradosh Vrat:माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहिले प्रारम्भ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट होता है। प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत कब है? – Pradosh Kab Hai फाल्गुन शुक्ल प्रदोष व्रत: मंगलवार, 11 मार्च 2025  भौम प्रदोष व्रत – ऋण मोचनभौम प्रदोष व्रत कथा प्रदोष काल – 6:27 PM से 8:53 PM फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी तिथि : 11 मार्च 2025 8:13 AM – 12 मार्च 2025 9:11 AM प्रदोष व्रत की पूजा कब करनी चाहिए? प्रदोष व्रत की पूजा अपने शहर के सूर्यास्त होने के समय के अनुसार प्रदोष काल मे करनी चाहिए। प्रदोष में क्या न करें? भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें. व्रत के समय में अन्न, नमक, मिर्च आदि का सेवन नहीं करें। प्रदोष व्रत मे पूजा की थाली में क्या-क्या रखें? पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती एवं फल के साथ पूजा करें। Bhaum Pradosh Vrat katha:भौम प्रदोष व्रत कथा Bhaum Pradosh Vrat:सूतजी बोले- अब मैं मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत का विधि विधान कहता हूं। मंगलवार का दिन व्याधियों का नाशक है। इस व्रत में एक समय व्रती को गेहूं और गुड़ का भोजन करना चाहिए। इस व्रत के करने से मनुष्य सभी पापों व रोगों से मुक्त हो जाता है इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है। अब मैं आपको उस बुढ़िया की कथा सुनाता हूं, जिसने यह व्रत किया व मोक्ष को प्राप्त हुई। अत्यन्त प्राचीन काल की घटना है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके मंगलिया नाम का एक पुत्र था। Bhaum Pradosh Vrat वृद्धा को हनुमानजी पर बड़ी श्रद्धा थी। वह प्रत्येक मंगलवार को हनुमानजी का व्रत रखकर यथाविधि उनका भोग लगाती थी। इसके अलावा मंगलवार को एक न तो घर लीपती थी और न ही मिट्टी खोदती थी। इसी प्रकार से व्रत रखते हुए जब उसे काफी दिन बीत गए तो हनुमानजी ने सोचा कि चलो आज इस वृद्धा की श्रद्धा की परीक्षा करें। वे साधु का वेष बनाकर उसके द्वार पर जा पहुंचे और पुकारा “है कोई हनुमान का भक्त जो हमारी इच्छा पूरी करे।” वृद्धा ने यह पुकार सुनी तो बाहर आई और महाराज क्या आज्ञा है? साधु वेषधारी हनुमान जी बोले कि ‘मैं बहुत भूखा हूं भोजन करूंगा। Bhaum Pradosh Vrat तू थोड़ी सी जमीन लीप दे।’ वृद्धा बड़ी दुविधा में पड़ गई। अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना की- हे महाराज! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त जो काम आप कहें वह मैं करने को तैयार हूं। साधु ने तीन बार परीक्षा करने के बाद कहा- “तू अपने बेटे को बुला मैं उसे औंधा लिटाकर, उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा।” वृद्धा ने सुना तो पैरों तले की धरती खिसक गई, मगर वह वचन हार चुकी थी। Bhaum Pradosh Vrat उसने मंगलिया को पुकार कर साधु महाराज के हवाले कर दिया। मगर साधु ऐसे ही मानने वाले न थे। उन्होंने वृद्धा के हाथों से ही मंगलिया को ओंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर, दुखी मन से वृद्धा अपने घर के अंदर जा घुसी। साधु जब भोजन को बुलाकर कहा कि वह मंगलिया को पुकारे ताकि वह भी आकर भोग लगा ले। वृद्धा में आंसू भरकर कहने लगी कि अब उसका नाम लेकर मेरे हृदय को और न दुखाओ, लेकिन साधु महाराज न माने वृद्धा को भोजन के लिए मंगलिया को पुकारना पड़ा। Bhaum Pradosh Vrat पुकारने की देर थी कि मंगलिया बाहर से हंसता हुआ घर में दौड़ा आया। मंगलिया को जीता जागता देखकर वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ। वह साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी। Bhaum Pradosh Vrat साधु महाराज ने उसे अपने असली रूप में दर्शन दिए। हनुमानजी को अपने आंगन में देखकर वृद्धा को लगा कि जीवन सफल हो गया। Bhaum Pradosh Vrat ki vidhi:प्रदोष व्रत की विधि प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें।इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है। पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है।अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है।प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए। प्रदोष व्रत का महत्व मान्यता और श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते हैं। कहा जाता है Bhaum Pradosh Vrat कि इस व्रत से कई दोषों की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्त्व भी रखता है।रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की Bhaum Pradosh Vrat सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।

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गढ़कालिका मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

स्कन्दपुराण में वर्णित है यह मंदिर गढ़कालिका मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास रचित ‘श्यामला दंडक’ महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। यहाँ प्रत्येक वर्ष कालिदास समारोह के आयोजन के पूर्व माँ कालिका की आराधना की जाती है। ‘स्कन्दपुराण’ में चौबीस मातृकाओं में देवी गढ़कालिका का उल्लेख है। गढ़कालिका मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। मंदिर का इतिहास गढ़कालिका मंदिर के पास जब पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई थी, तो बड़ी ईंट, टकसाल और सकड़ें निकली थीं। अनुमान है कि यह स्थान ईसा पूर्व 500 साल पुराना है। कुछ इतिहासकार गढ़कालिका मंदिर को महाभारतकाल का बताते हैं, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि काकड़ा आरती के बाद मां बाल स्वरूप में दर्शन देती हैं इसलिए यहां रात 2.30 बजे से श्रद्धालुओं की दर्शन के लिए कतार लग जाती है। रावण दहन के बाद श्री राम लौटते समय रुद्रसागर के किनारे रुके थे, तब रात्रि के समय मां और हनुमान जी के बीच युद्ध हुआ था, उस वक्त माता का एक अंश गलित होकर गिर गया। माता का जो अंश गिर गया, वही अंश गढ़कालिका के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर की वास्तुकला परमार शासन काल में भी इसके जीर्णोद्धार के प्रमाण मिलते हैं रियासतकाल में सिंधिया राजवंश ने भी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। नौंवी सदी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हर्ष विक्रमादित्य ने करवाया था। ‘गढ़’ नामक स्थान पर होने के कारण देवी को गढ़कालिका कहा जाता है। मंदिर परिसर मे अति प्राचीन दीप स्तंभ है। इस दीप स्तंभ में 108 दीप विद्यमान है, इसे नवरात्रि के दिनों में प्रज्वलित किया जाता है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 03:00 AM – 11:00 AM काकड़ आरती का समय 04:00 AM – 05:00 AM महाआरती का समय 09:00 AM – 10:00 AM शयन आरती का समय 10:00 PM – 11:00 PM मंदिर का प्रसाद गढ़कालिका मंदिर में मां को हलवे और खीर-पूड़ी का भोग लगाते हैं। इसके अलावा श्रद्धालु पूरणपोली, दाल, चावल व सब्जी-रोटी का भोग भी लगाते हैं।

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इस्कॉन उज्जैन मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

इसे राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में स्थित इस्कॉन मंदिर आस्था और हिन्दू संस्कृति का एक अनुपम संगम है। इस मंदिर को राधा मदन मोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना पूरे संसार में भगवान श्रीकृष्ण के संदेश को पहुंचाने के लिए किया गया है। बता दें कि इस्कॉन का पूरा नाम अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ है। इस्कॉन को दुनियाभर में श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार और प्रसार करने के लिए जाना जाता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर का निर्माण सन् 2006 में हुआ। राजस्थान के मकराना शहर के सफेद संगमरमर से मंदिर का निर्माण किया गया है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके मित्र सुदामा ने उज्जैन में महर्षि सांदिपनी से शिक्षा प्राप्त की थी। इस वजह से भी उज्जैन में बने इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव है। यह उज्जैन और इस्कॉन संगठन का एकमात्र पूर्णतः सौर ऊर्जा से संचालित मंदिर है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर का महत्व इस्कॉन मंदिर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और समाज के दिए उनके संदेशों का प्रचार-पसार करता है। इस्कॉन मंदिर से भक्तों का विशेष जुड़ाव रहता है, खासकर विदेशी भक्त और श्रद्धालु श्री कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते हैं। इस्कॉन का सदस्य बनने से पहले श्रद्धालुओं को लहसुन, प्याज, मांस और मछली जैसे तामसिक भोजन का सेवन त्यागना होता है। साथ ही शराब का सेवन भी बंद करना होता है। – इस्कॉन के अनुयायियों के लिए रोजाना शाम के वक़्त करीबन एक घंटे गीता या अन्य किसी धार्मिक ग्रन्थ का पाठ करना अनिवार्य माना जाता है। इसके आलावा सदस्यों को अपनी क्षमता के अनुसार रुद्राक्ष की माला से ‘हरे कृष्णा-हरे रामा’ का जाप करना अनिवार्य होता है। इस्कॉन उज्जैन मंदिर की वास्तुकला इस्कॉन मंदिर, उज्जैन का निर्माण 2006 में किया गया था। मंदिर में तीन पवित्र स्थान हैं, जिनमें भगवान कृष्ण और राधा के साथ गोपियों, बलराम और कृष्ण और निताई गौर (कृष्ण और बलराम के अवतार) की मूर्तियां हैं। यहां मुरली मनोहर और उनकी प्रेमिका राधा की बेहद खूबसूरत प्रतिमा है। हर इस्कॉन मंदिर की तरह यहां तुलसी बगीचा है। मंदिर की छत पर कमल के फूल के ऊपर रासलीला में लीन श्रीकृष्ण और राधारानी का अद्‍भुत चित्रांकन है। मंदिर का समय 04:30 AM – 01:00 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुसली आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM जाप सत्र का समय 05:30 AM – 06:00 AM दर्शन आरती व गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM श्रीमद्भागवत कक्षा का समय 08:00 AM – 10:00 AM राजभोग आरती का समय 12:15 PM – 01:00 PM मंदिर बंद होने का समय 01:00 PM – 04:00 PM धुप आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM संध्या तुलसी आरती का समय 06:45 PM – 07:00 PM गौरा आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM शयन आरती का समय 09:00 AM – 09:15 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 09:15 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार बेसन और बूंदी के लड्डू का भोग भगवान श्री कृष्ण को लगाते हैं।

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