हनुमान जयंती 2025: 11 या 12 अप्रैल, कब है हनुमान जयंती? शुभ मुहूर्त और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट देखें!

हनुमान जयंती 2025: 11 या 12 अप्रैल, कब है हनुमान जयंती? शुभ मुहूर्त और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट देखें! हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) हिंदू धर्म में एक प्रमुख पर्व है, जो भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, और संकटमोचन का प्रतीक माना जाता है। लेकिन साल 2025 में हनुमान जयंती को लेकर भक्तों के मन में एक सवाल है – क्या यह 11 अप्रैल को है या 12 अप्रैल को? इस लेख में हम आपको सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट बताएंगे, ताकि आप इस पावन दिन की तैयारी पूरी भक्ति के साथ कर सकें। हनुमान जयंती 2025: सही तारीख – 11 या 12 अप्रैल? Hanuman Jayanti 2025 Date हनुमान जयंती हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। पंचांग के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा तिथि 2025 में इस प्रकार रहेगी: हिंदू धर्म में उदया तिथि (सूर्योदय के समय जो तिथि हो) को मान्यता दी जाती है। चूंकि 12 अप्रैल 2025 को सुबह पूर्णिमा तिथि प्रभावी रहेगी, इसलिए हनुमान जयंती 2025 की सही तारीख 12 अप्रैल 2025 (शनिवार) होगी। यह दिन शनिवार को पड़ रहा है, जो हनुमान जी की पूजा के लिए और भी शुभ माना जाता है, क्योंकि शनिवार को उनकी भक्ति से शनि दोष से मुक्ति मिलती है। हनुमान जयंती 2025: शुभ मुहूर्त हनुमान जयंती की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। 12 अप्रैल 2025 के लिए पूजा का शुभ समय इस प्रकार है: मान्यता है कि हनुमान जी का जन्म सूर्योदय के समय हुआ था, इसलिए सुबह की पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। हनुमान जयंती का महत्व हनुमान जयंती भगवान हनुमान के जन्म का उत्सव है, जो त्रेतायुग में माता अंजनी और वानरराज केसरी के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। वे भगवान राम के परम भक्त और शिव के 11वें रुद्र अवतार माने जाते हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से: हनुमान जयंती पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट Hanuman Jayanti Puja Samagri हनुमान जयंती की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री तैयार करें: हनुमान जयंती पूजा विधि हनुमान जयंती के दिन क्या करें? निष्कर्ष हनुमान जयंती 2025 का पावन पर्व 12 अप्रैल 2025 (शनिवार) को मनाया जाएगा। इस दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने और उपरोक्त सामग्री के साथ विधि-विधान से भक्ति करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होगी। यह पर्व आपके जीवन में शक्ति, साहस, और समृद्ध…

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Masik Durgashtami 2025: कल करें मां दुर्गा की पूजा इस शुभ मुहूर्त में, जीवन भर बनी रहेगी सुख-समृद्धि!

हिंदू धर्म में मासिक दुर्गाष्टमी (Masik Durgashtami) का विशेष महत्व है। यह पवित्र दिन हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और मां दुर्गा को समर्पित होता है। साल 2025 में मासिक दुर्गाष्टमी का अगला अवसर कल, 5 अप्रैल 2025 को है। मान्यता है कि इस दिन मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं, और सुख, समृद्धि, और शांति का आगमन होता है। इस लेख में हम आपको मासिक दुर्गाष्टमी 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, और इसके महत्व के बारे में विस्तार से बताएंगे। तो आइए, जानते हैं कि कैसे आप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं! मासिक दुर्गाष्टमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 4 अप्रैल 2025 को रात 8 बजकर 12 मिनट से शुरू होगी और 5 अप्रैल 2025 को शाम 7 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए मासिक दुर्गाष्टमी 5 अप्रैल 2025 को मनाई जाएगी। इस शुभ मुहूर्त में मां दुर्गा की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व | Masik Durgashtami Significance मासिक दुर्गाष्टमी मां दुर्गा के भक्तों के लिए एक खास दिन है। मां दुर्गा को शक्ति, साहस, और सुरक्षा की देवी माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से: मान्यता है कि मां दुर्गा अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं और उन्हें संकटों से मुक्ति दिलाती हैं। खासकर महिलाएँ इस दिन व्रत रखकर अपने परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करती हैं। मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि Masik Durgashtami 2025 मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा को विधि-विधान से करना जरूरी है। नीचे दी गई पूजा विधि का पालन करें: मासिक दुर्गाष्टमी व्रत के नियम मां दुर्गा की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत और पूजा करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह दिन न केवल धार्मिक, बल्कि आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति को बढ़ाने वाला भी है। जो भक्त नियमित रूप से इस व्रत को करते हैं, उनके जीवन में कभी सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती। मां दुर्गा की भक्ति से नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। निष्कर्ष मासिक दुर्गाष्टमी 2025 का यह पावन अवसर आपके जीवन में नई ऊर्जा और समृद्धि लाने का मौका है। 5 अप्रैल 2025 को शुभ मुहूर्त में मां दुर्गा की पूजा करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुखमय बनाएं। मां दुर्गा की कृपा से आपका हर संकट दूर हो और परिवार में खुशहाली बनी रहे। इस लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें, ताकि वे भी इस शुभ दिन का लाभ उठा सकें। जय माता दी!

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हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं? एक गहन विश्लेषण

हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं? एक गहन विश्लेषण हिंदू धर्म विश्व के सबसे प्राचीन और समृद्ध धर्मों में से एक है। इसकी एक खास विशेषता है इसके असंख्य देवी-देवताओं की मौजूदगी। भगवान शिव, विष्णु, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, हनुमान जैसे अनेक नामों से लेकर 33 करोड़ देवी-देवताओं की बात तक होती है। लेकिन सवाल उठता है कि हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवता क्यों हैं? क्या यह बहुदेववाद का प्रमाण है या इसके पीछे कोई गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है? इस लेख में हम इस प्रश्न का जवाब विस्तार से देंगे, जिसमें धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ और तर्क शामिल होंगे। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की संख्या: मिथक या सत्य? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “33 करोड़ देवी-देवता” का आंकड़ा एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। वेदों में “33 कोटि” देवताओं का उल्लेख मिलता है। संस्कृत में “कोटि” का अर्थ “करोड़” ही नहीं, बल्कि “प्रकार” भी होता है। इस संदर्भ में विद्वानों का मानना है कि वेदों में 33 प्रकार के देवताओं की बात की गई है, न कि 33 करोड़। ऋग्वेद (1.139.11) में इन 33 देवताओं को इस तरह वर्गीकृत किया गया है: इसलिए, यह संख्या वास्तव में प्रतीकात्मक है और हिंदू धर्म की व्यापकता को दर्शाती है। एक ईश्वर, अनेक रूप: अद्वैत दर्शन हिंदू धर्म का मूल दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित है, जो कहता है कि ईश्वर एक है, लेकिन उसके अनेक रूप हैं। भगवद्गीता (अध्याय 10, श्लोक 40) में भगवान कृष्ण कहते हैं, “न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।” अर्थात, “न तो देवता और न ही महर्षि मेरे मूल को जानते हैं, क्योंकि मैं सभी देवताओं और ऋषियों का आदि कारण हूँ।” यह दर्शाता है कि सभी देवी-देवता उसी एक परमात्मा के विभिन्न पहलू हैं। उदाहरण के लिए: ये सभी एक ही ब्रह्मांड शक्ति के अलग-अलग रूप हैं, जो मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करते हैं। प्रकृति और मानव जीवन से जुड़ाव हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की विविधता प्रकृति और मानव जीवन के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है। सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, नदियाँ जैसे गंगा और यमुना—ये सभी प्राकृतिक तत्वों को देवता के रूप में पूजा जाता है। इसका कारण यह है कि हिंदू धर्म प्रकृति को ईश्वर का अभिन्न अंग मानता है। उदाहरण के लिए: इस तरह, हर देवता मानव जीवन के किसी न किसी पहलू को संचालित करता है। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं का होना मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति की अपनी जरूरतें, भावनाएँ और विश्वास होते हैं। कोई विद्या के लिए सरस्वती की पूजा करता है, तो कोई धन के लिए लक्ष्मी की। यह विविधता लोगों को अपनी आस्था के अनुसार ईश्वर से जुड़ने की आजादी देती है। सामाजिक रूप से, ये देवी-देवता विभिन्न समुदायों और परंपराओं को एक सूत्र में बाँधते हैं। जैसे, दक्षिण भारत में मुरुगन की पूजा प्रमुख है, तो उत्तर भारत में हनुमान लोकप्रिय हैं। यह सांस्कृतिक एकता में विविधता का प्रतीक है। क्या हिंदू धर्म बहुदेववादी है? कई लोग हिंदू धर्म को बहुदेववादी (Polytheistic) मानते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। हिंदू धर्म में एकेश्वरवाद (Monotheism), बहुदेववाद (Polytheism), और सर्वेश्वरवाद (Pantheism) का अनूठा मिश्रण है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई भक्त किस दृष्टिकोण से अपनी आस्था को देखता है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “हिंदू धर्म वह धर्म है जो हर व्यक्ति को उसके स्तर के अनुसार ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग देता है।” निष्कर्ष हिंदू धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं का होना Ascendancy इसलिए है क्योंकि यह धर्म जीवन के हर पहलू को ईश्वर का रूप मानता है। ये देवता केवल मूर्तियाँ या काल्पनिक चरित्र नहीं, बल्कि उस एक परम शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं जो ब्रह्मांड को संचालित करती है। 33 कोटि देवताओं का उल्लेख वेदों में प्रतीकात्मक है और प्रकृति, मानव जीवन, और दार्शनिक सत्य को समझाने का एक तरीका है। यह विविधता हिंदू धर्म की समृद्धि और लचीलेपन का प्रमाण है, जो हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार मार्ग चुनने की स्वतंत्रता देता है। संदर्भ

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Batuk Bhairav Stotra | बटुक भैरव स्तोत्र

Batuk Bhairav Stotra:बटुक भैरव स्तोत्र: जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव देवता की पूजा का बहुत महत्व है। यदि आप बटुक भैरव के वचनों का पाठ करते हैं, खासकर यदि आप भैरव अष्टमी के दिन या शनिवार को भैरव अष्टमी का पाठ कर रहे हैं, तो आप निश्चित रूप से अपने सभी कार्यों को सफल और सार्थक बनाने में सक्षम होंगे, साथ ही आपके व्यापार, व्यवसाय और जीवन में आने वाली समस्याएं, मुकदमे, बाधा, शत्रु, कोर्ट केस आदि में पूर्ण सफलता प्राप्त होगी। बटुक भैरव जी दुर्गा के पुत्र हैं जो तुरंत प्रसन्न होते हैं। Batuk Bhairav Stotra बटुक भैरव की साधना से व्यक्ति अपने जीवन में सांसारिक बाधाओं को दूर करके सांसारिक लाभ उठा सकता है। भैरव को शिव का रुद्र अवतार माना गया है। तंत्र साधना में भैरव के आठ रूप भी अधिक प्रचलित हैं: 1. स्वीकार करने वाला भैरव, 2. रू-रू भैरव, 3. चंड भैरव, 4. क्रोधोन्मत्त भैरव, 5. भयंकर भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. लोभी भैरव और 8. भैरव आदि शंकराचार्य ने ‘प्रपंच-सार’ तंत्र में अष्ट-भैरव के नाम भी लिखे हैं। तंत्र शास्त्र में भी इनका उल्लेख मिलता है। Batuk Bhairav Stotra इसके अलावा सप्तुविशांति रहस्य में सात भैरव हैं। इस ग्रंथ में दस वीर-भैरवों का भी उल्लेख है। इसमें तीन बटुक-भैरवों का उल्लेख मिलता है। रुद्रयामला तंत्र में 52 भैरवों के नामों का उल्लेख है। ‘बटुक भैरव’ अनुष्ठान, इस अनुष्ठान को संपन्न करके साधक अपनी मनचाही इच्छा पूरी कर सकता है। बटुक भैरव स्तोत्र अनुष्ठान रवि-पुष्य नक्षत्र, होली की पूर्णिमा, ग्रहण काल, दुर्गाष्टमी तक ही सम्पन्न करना चाहिए। Batuk Bhairav Stotra आवश्यकतानुसार गुरु-पुष्य और सर्वसिद्धि योग में भी इसे सम्पन्न किया जा सकता है। यह अनुष्ठान रात्रि में सम्पन्न करना श्रेयस्कर है। बटुक भैरव स्तोत्र लाभ: Batuk Bhairav Stotra बटुक भैरव स्तोत्र के पाठ से निश्चय ही आपके सभी कार्य सफल और सार्थक होंगे तथा आपको अपने व्यापार, कारोबार और जीवन में पूर्ण सफलता मिलेगी, परेशानियां, बाधाएं, शत्रु, कोर्ट-कचहरी आदि दूर होंगी।बटुक भैरव के स्तोत्र से व्यक्ति अपने जीवन में सांसारिक बाधाओं को दूर कर सांसारिक लाभ उठा सकता है। बटुक भैरव स्तोत्र | Batuk Bhairav Stotra Batuk Bhairav Stotra जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव आराधना का बहुत महत्व है। खास तौर पर भैरव अष्टमी के दिन या किसी भी शनिवार को श्री बटुक-भैरव-अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र का पाठ करें, तो निश्चित ही आपके सारे कार्य सफल और सार्थक हो जाएंगे, साथ ही आप अपने व्यापार, व्यवसाय और जीवन में आने वाली समस्या, विघ्न, बाधा, शत्रु, कोर्ट कचहरी, और मुकदमे में पूर्ण सफलता प्राप्त करेंगे। यह बटुक भैरव स्तोत्र 52 भैरव का स्वरूप है, जैसे काल भैरव, कापली भैरव, चंड भैरव, रुरु भैरव, भीषण भैरव, उन्मंत भैरव, क्रोध भैरव, बटुक भैरव आदि, यह बहुत ही शक्ति बटुक भैरव स्तोत्र है, Batuk Bhairav Stotra इस स्तोत्र का पाठ करने से आप पूरी से सुरक्षित हो जाते है, आपके उपर किसी भी प्रकार का कोई भी तंत्र प्रयोग, इल्म, मुठ, नकारात्मक उर्जा का प्रभाव नही होता, क्योंकि आपकी रक्षा 52 भैरव करते है। भैरव ध्यान: वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः॥दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्॥ मानसिक पूजन करे:       ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये घ्रापयामि नमः।ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये निवेदयामि नमः।ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः। बटुक भैरव स्तोत्र: ॐ  भैरवो भूत-नाथश्च,  भूतात्मा   भूत-भावनः।क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च,   क्षेत्रदः     क्षत्रियो  विराट् ॥श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।रक्तपः पानपः सिद्धः,  सिद्धिदः   सिद्धि-सेवितः॥कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।त्रि-नेत्रो     बहु-नेत्रश्च,   तथा     पिंगल-लोचनः॥शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।अभीरुर्भैरवी-नाथो,   भूतपो    योगिनी –  पतिः॥धनदोऽधन-हारी च,   धन-वान्   प्रतिभागवान्।नागहारो नागकेशो,   व्योमकेशः   कपाल-भृत्॥कालः कपालमाली च,    कमनीयः कलानिधिः।त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत्॥त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।बटुको   बटु-वेषश्च,    खट्वांग   -वर – धारकः॥भूताध्यक्षः      पशुपतिर्भिक्षुकः      परिचारकः।धूर्तो दिगम्बरः   शौरिर्हरिणः   पाण्डु – लोचनः॥प्रशान्तः  शान्तिदः  शुद्धः  शंकर-प्रिय-बान्धवः।अष्ट -मूर्तिर्निधीशश्च,  ज्ञान- चक्षुस्तपो-मयः॥अष्टाधारः  षडाधारः,  सर्प-युक्तः  शिखी-सखः।भूधरो        भूधराधीशो,      भूपतिर्भूधरात्मजः॥कपाल-धारी मुण्डी च ,   नाग-  यज्ञोपवीत-वान्।जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा॥शुद्द – नीलाञ्जन – प्रख्य – देहः मुण्ड  -विभूषणः।बलि-भुग्बलि-भुङ्- नाथो,  बालोबाल  –  पराक्रम॥सर्वापत् – तारणो  दुर्गो,   दुष्ट-   भूत-  निषेवितः।कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी    वश-कृद्वशी॥ जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया – मन्त्रौषधी -मयः।सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः,   प्रभ –   विष्णुरितीव  हि॥ फल–श्रुति: अष्टोत्तर-शतं नाम्नां, भैरवस्य महात्मनः।मया ते कथितं   देवि, रहस्य  सर्व-कामदम्॥य इदं पठते स्तोत्रं, नामाष्ट-शतमुत्तमम्।न तस्य दुरितं किञ्चिन्न च भूत-भयं तथा॥ न शत्रुभ्यो भयंकिञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः॥मारी-भये राज-भये,  तथा  चौराग्निजे   भये। औत्पातिके भये चैव, तथा दुःस्वप्नज भये॥बन्धने च महाघोरे, पठेत् स्तोत्रमनन्य-धीः।सर्वं प्रशममायाति, भयं भैरव-कीर्तनात्॥ क्षमा-प्रार्थना: आवाहन न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।पूजा-कर्म न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर॥मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं, भक्ति-हीनं सुरेश्वर।मया यत्-पूजितं देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥ ।। इति बटुक भैरव स्तोत्रम् ।।

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गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोविंद देवी जी मंदिर श्री कृष्ण की नगरी मथुरा उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में स्थित है। यह मंदिर वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इस मंदिर को “राधा गोविंद देव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर वृंदावन के प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह भगवान कृष्ण के गोविंद देव जी स्वरूप को समर्पित मंदिर है।  Govind Dev Ji Temple:मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण सन् 1590 में राजा मानसिंह ने करवाया था। इस मंदिर का निर्माण गुरु और महान कृष्णभक्त श्री कल्याणदास जी की निगरानी में किया गया। मंदिर का पूर्ण खर्च राजा मानसिंह द्वारा ही किया गया था। गोविंद देवी जी मंदिर जब यह मंदिर बना था तो यह सात मंजिला मंदिर था। इस मंदिर के सबसे ऊपरी भाग पर एक विशाल दीपक बनवाया गया था। यह दीपक इतना विशाल था कि इसमें हर रोज 50 किलोग्राम से ज्यादा देसी घी का इस्तेमाल कर इसे जलाया जाता था। इस दीपक की लौ कई किमी तक से भी दिखाई देती थी। मंदिर में जलते इस लौ को देखकर औरंगजेब के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी और वह इस मंदिर की सुंदरता को नष्ट करने का विचार करने लगा। अपनी सेना को भेजकर मंदिर को तुड़वाना चाहा। गोविंद देवी जी मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत भगवान की कृपा से मंदिर के पुजारी को इस बात का अंदेशा हो गया। उन्होंने तुरंत ही भगवान गोविंद की पुरातन प्रतिमा को वहां से हटा दिया और बहुत दूर ले गए। जयपुर के गोविंद वल्लभ मंदिर में वास्तविक प्रतिमाओं को स्थानांतरित कर दिया गया था। औरंगजेब की सेना इस मंदिर के 4 मंजिल को ही गिरा सकी। मंदिर को खंडित करने का भी प्रयास किया गया। 1873 तक मंदिर उसी अवस्था में रहा। औरंगजेब के जाने के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि जब औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ दिया था। उसके बाद उस मंदिर में कोई भी भक्त दर्शन करने नहीं जाता था। इस कारण मंदिर खंडहर बन गया था। गोविंद देवी जी मंदिर वहां पर भूतों का निवास हो गया था। परन्तु इन भूत प्रेतों ने किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर का पुनः निर्माण भव्यता के साथ करना बहुत ही मुश्किल था। गोविंद देवी जी मंदिर इस मंदिर के निर्माण में यहाँ रहने वाले भूतों का भी योगदान है। वह इसलिए क्योंकि इस मंदिर की कारीगरी इस तरह की है जो कोई भी मनुष्य पांच से दस साल में नहीं बना सकता। मंदिर की वास्तुकला गोविंद देव जी मंदिर की वास्तुकला अन्य मंदिरों से अलग है। गोविंद देवी जी मंदिर यह मंदिर पहले सात मंजिला ईमारत थी। मंदिर में दोनों तरफ शानदार खम्भे बने हुए है जो गर्भगृह तक जाते है। यह मंदिर बहुत ही खूबसूरती से बनाया गया है। मंदिर का समय गर्मियों में मंदिर खुलने का समय 04:30 AM – 12:00 PM सर्दियों में गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:30 PM गर्मियों में मंगल आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गर्मियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:30 PM – 09:30 PM सर्दियों में शाम को गोविंद देव जी का मंदिर खुलने का समय 05:00 PM – 08:30 PM सर्दियों में मंगला आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM मंदिर का प्रसाद गोविंद देव जी मंदिर में लड्डू ,माखन और मिश्री का भोग लगाया जाता है।

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कात्यायनी पीठ वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। कात्यायनी पीठ वृंदावन भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में मथुरा जिले के श्री वृंदावन धाम में स्थित है। भगवान कृष्ण की नगरी वृन्दावन में भी, देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक कात्यायनी पीठ स्थित है। यह एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ है जो राधाबाग के पास है। यहाँ माता सती ‘उमा’ तथा भगवन शंकर ‘भूतेश’ के नाम से जाने जाते है। ऐसा कहा जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में भी मिलता है। देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के 22वें अध्याय में उल्लेख किया है- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥ katyayani peeth:मंदिर का इतिहास कात्यायनी पीठ का निर्माण स्वामी केशवानंद ने फरवरी 1923 में करवाया था। इस मंदिर में मां कात्यायनी के साथ पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेशकी मूर्तियां हैं । कात्यायनी पीठ वृंदावन लोग मंदिर को मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण देखते ही श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और दिल और दिमाग में शांति पाते हैं। कात्यायनी पीठ में श्रद्धालुओं की भीड़ हमेशा लगी रहती है। बताया जाता है कि राधारानी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए इस शक्तिपीठ की पूजा की थी। कात्यायनी पीठ वृंदावन:मंदिर का महत्व कात्यायनी पीठ में अविवाहित युवक-युवती नवरात्र के मौके पर मनपसंद वर और वधु पाने के लिए कात्यायनी माता का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं और उनकी मन की मुराद पूरी भी होती है। ऐसा कहा जाता है श्री कृष्ण ने कात्यायनी पीठ वृंदावन अपने मामा कंस का वध करने से कात्यायनी मां की पूजा की थी। कंस वध से पहले यमुना किनारे श्री कृष्ण मां कात्यायनी को कुलदेवी मानकर बालू से उनकी प्रतिमा बनाई और पूजा की। उसके बाद कंस का वध किया था। जिन लड़कियों या लड़को की शादी में किसी कारण कोई विलंब हो रहा होता है। कात्यायनी मां की कृपा से उनका भी विवाह जल्द से जल्द हो जाता है। मंदिर की वास्तुकला कात्यायनी पीठ मंदिर एक शांत और वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत मंदिर है। मंदिर की बनावट में राजस्थानी शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर में एक विशाल परिसर है, जहां भक्त आकर मां की पूजा-अर्चना करते हैं। कात्यायनी पीठ वृंदावन उत्कृष्ट नक्काशी और पेंटिंग इसकी सुंदरता को और बढ़ाती हैं। मंदिर में कई स्तम्भ बने हैं, जिसपर कात्यायनी मां से जुड़े संस्कृत में मंत्र लिखे गए हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM सांय मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 07:30 PM

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Mahalaxmi Vrat Katha: महालक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा दृष्टि

Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत की शुरूआत राधा अष्टमी से शुरू होता है और 16वें दिन इस व्रत का समापन किया जाता है। इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों पर मां की कृपा दृष्टि बनी रहती है। महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ शुरू हो जाता है। इस दिन राधारानी के जन्मदिन के रूप में राधा अष्टमी का पर्व भी मनाया जाता है। Mahalaxmi Vrat Katha आज के दिन विधिपूर्वक और श्रद्धा से महालक्ष्मी व्रत रखा जाता है। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। पूजा-अर्चना के साथ ही इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का भी पाठ करना चाहिए। तो आइए पढ़ते हैं महालक्ष्मी व्रत कथा……. Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत कथा प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नियमानुसार भगवान विष्णु का पूजन प्रतिदिन करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिये और इच्छा अनुसार वरदान देने का वचन दिया। ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी का वास अपने घर मे होने का वरदान मांगा। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा यहाँ मंदिर मैं प्रतिदिन एक स्त्री आती है और वह यहाँ गोबर के उपले थापति है। वही माता लक्ष्मी हैं, Mahalaxmi Vrat Katha तुम उन्हें अपने घर में आमंत्रित करो। देवी लक्ष्मी के चरण तुम्हारे घर में पड़ने से तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। Laxmi Mata Aarti:लक्ष्मीजी आरती ऐसा कहकर भगवान विष्णु अदृश्य हो गए। अब दूसरे दिन सुबह से ही ब्राह्मण देवी लक्ष्मी के इंतजार मे मंदिर के सामने बैठ गया। जब उसने लक्ष्मी जी को गोबर के उपले थापते हुये देखा, तो उसने उन्हे अपने घर पधारने का आग्रह किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयीं कि यह बात ब्राह्मण को विष्णुजी ने ही कही है। तो उन्होने ब्राह्मण को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी। लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा कि तुम 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करो और व्रत के आखिरी दिन चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देने से तुम्हारा व्रत पूर्ण होजाएगा। ब्राह्मण ने भी महालक्ष्मी के कहे अनुसार व्रत किया और देवी लक्ष्मी ने भी उसकी मनोकामना पूर्ण की। उसी दिन से यह व्रत श्रद्धा से किया जाता है। शुक्रवार के ये उपाय बदल देंगे आपकी किस्मत! घर में दौड़ी आएंगी मां लक्ष्मी Mahalaxmi Vrat Katha:द्वतीय कथा एक बार महाभारत काल में हस्तिनापुर शहर में महालक्ष्मी व्रत के दिन महारानी गांधारी ने नगर की सारी स्त्रियों को पूजन के लिए आमंत्रित किया, परंतु उन्होने कुंती को आमंत्रण नहीं दिया। गांधारी के सभी पुत्रों ने पूजन के लिए अपनी माता को मिट्टी लाकर दी और इसी मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया गया और उसे महल के बीच मे स्थापित किया गया। Laxmi prapti upay : रूठी लक्ष्मी को मनाकर घर कैसे लाऐं, लक्ष्मी आओ हमारे द्वार, दूर करो दरिद्रता, भर दो घर को धन-धान्य से नगर की सारी स्त्रियाँ जब पूजन के लिए जाने लगी, तो कुंती उदास हो गयीं। Mahalaxmi Vrat Katha जब कुंती के पुत्रों ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बताई। इस पर अर्जुन ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कीजिये मैं आपके लिए हाथी लेकर आता हूँ। ऐसा कहकर अर्जुन इन्द्र देव के पास गये और अपनी माता के पूजन के लिए ऐरावत को ले आए। इसके पश्चात कुंती ने सारे विधि-विधान से पूजन किया। जब नगर की अन्य स्त्रियों को पता चला, कि कुंती के यहाँ इन्द्र देव की सारी ऐरावत आया है। Mahalaxmi Vrat Katha तो वे भी पूजन के लिए उमड़ पड़ी और सभी ने सविधि पूजन सम्पन्न किया। Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त दीपावली पर धन प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी के शक्तिशाली मंत्र – DIWALI MANTRA

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Charak Jayanti 2025 Date Hindi:आज चरक जयंती, आयुर्वेद में आचार्य चरक का है विशेष योगदान, जानें इतिहास और महत्व

Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक पूजा, एक हिंदू लोक उत्सव है जो भगवान शिव के सम्मान में आयोजित किया जाता है जिसे नील पूजा के नाम से भी जाना जाता है । यह त्योहार भारत में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। बांग्लादेश में इस त्योहार को चैत्र महीने के आखिरी दिन के रूप में गिना जाता है। यह त्योहार बंगाली कैलेंडर में चैत्र महीने के आखिरी दिन चैत्र संक्रांति की आधी रात को मनाया जाता है Charak Jayanti 2025: आज चरक जयंती मनाई जा रही है. आचार्य चरक ही आयुर्वेद के चिकित्सक माने जाते हैं. आइए विस्तार से जानते हैं आचार्य चरक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी. Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक पूजा कैसे मनाई जाती है: लोगों का मानना ​​है कि चरक पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और यह पर्व पिछले वर्ष के दुखों और कष्टों को दूर कर समृद्धि लाता है।तैयारी आमतौर पर एक महीने पहले शुरू होती है। Charak Jayanti 2025 Date Hindi उत्सव की व्यवस्था करने वाली टीम गाँव-गाँव जाकर धान, तेल, चीनी, नमक, शहद, धन और अनुष्ठान के लिए आवश्यक अन्य वस्तुओं की खरीद करती है। संक्रांति की आधी रात को, पूजा करने वाले एक साथ सफलता के लिए शिव और मां दुर्गा की पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं और पूजा के बाद प्रसाद बांटा जाता है। Bhagwan Shiv:भगवान शिव का जन्म नहीं हुआ है तो फिर क्या है उनकी अवतरण कथा… Charak Jayanti 2025 Date Hindi:इसे हजरा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं पूजा से पहले भोजन नहीं करती हैं।कभी-कभी इस त्योहार में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक मानव `चरक` तैयार किया जाता है। चरक को उसकी पीठ पर एक हुक के साथ बांधा जाता है और फिर उसे एक लंबी रस्सी के सहारे एक पट्टी के चारों ओर घुमाया जाता है। हालांकि यह जोखिम भरा है, वे इसकी व्यवस्था करते हैं। महाराष्ट्र में इसी तरह के त्योहार को बगड़ कहा जाता है, जबकि विजयनगरम, आंध्र प्रदेश में इसे सिरिमानु उत्सवम कहा जाता है। बगड़ चरक पूजा, गजान या मैक्सिकन डेंज़ा डे लॉस वोलाडोर्स के भारतीय समानांतर की एक समान अवधारणा है। Swapna Shastra Ke Mutabik Durga Mata Ko Sapne Me Dekhna:पने में मां दुर्गा को देखने से मिलते हैं ये शुभ संकेत, जीवन में हो सकते हैं ये बदलाव कौन थे आचार्य चरक ? (Who is Rishi Charak) Charak Jayanti 2025 Date Hindi:चरक कुषाण राज्य के राजवैद्य थे. आचार्य चरक आयुर्वेद की जनक माने गए हैं. भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में प्रसिद्ध हैं. महा ऋषि चरक की जन्म तिथि के बारे में कुछ निश्चित तथ्य मौजूद नहीं हैं लेकिन माना जाता है कि 2300-2400 साल पहले उनका जन्म हुआ था. चरक ऐसे पहले चिकित्सक थे जिन्होंने पाचन, चयापचय और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दी थी.चरक के अनुसार शरीर में पित्त, कफ और वायु के कारण दोष उत्पन्न हो जाते है और यही बीमारियों की जड़ बनते हैं. Charak Jayanti 2025 Date Hindi आयुर्वेदाचार्य चरक मानव कल्याण के लिए आयुर्वेद ग्रंथ ‘चरक संहिता’ लिखा था. इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के लिए आयुर्वेदिक औषधियों की व्याख्या की गई है, जिन्हें सही मात्रा और तरीके से प्रयोग करने के उपाय भी दिए गए हैं.  Lord Shiva in Dream:सपने में भगवान शिव को देखने का क्या होता है मतलब, जानिए इससे जीवन पर कैसा पड़ता है प्रभाव आयुर्वेद का अमूल्य ग्रंथ है चरक संहिता (Charak Samhita) ‘चरक संहिता’ में आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों, औषधियों, और रोगों के कारणों वर्णन किया गया है. Charak Jayanti 2025 Date Hindi इस पुस्तक को आज भी चिकित्सा जगत में बहुत सम्मान दिया जाता है. यह ग्रन्थ ऋषि आत्रेय तथा पुनर्वसु के ज्ञान का संग्रह है जिसे चरक ने कुछ संशोधित कर अपनी शैली में प्रस्तुत किया. Sapne me bichhu dekhna:सपने में बिच्छू सहित दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए चमकने वाली है आपकी किस्मत ‘इलाज नहीं बीमारी से बचाना ही चिकित्सक का कर्तव्य’ Charak Jayanti 2025 Date Hindi:आचार्य चरक कहते हैं कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है की व्यक्ति को बीमारी से बचाना न की इलाज करना ”. जो चिकित्सक अपने ज्ञान और समझ का दीपक लेकर बीमार के शरीर को नहीं समझता, वह बीमारी कैसे ठीक कर सकता है. इसलिए सबसे पहले उन सब कारणों का अध्ययन करना चाहिए जो रोगी को प्रभावित करते है, फिर उसका इलाज करना चाहिए.

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Batuk Bhairav Ashtottara Stotra | बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम्

Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम्: बटुक भैरव भगवान रुद्र के अवतार हैं। भगवान भैरव की पूजा-अर्चना से सभी तांत्रिक क्रियाओं में सफलता मिलती है। दस भैरवों में जहां कालभैरव को सबसे विकराल रूप माना जाता है, वहीं बटुक भैरव को सबसे शांत और सौम्य रूप में पूजा जाता है। अघोरिया और तांत्रिक लोगों के लिए काल भैरव की पूजा बताई गई है, वहीं आम लोगों के लिए बटुक भैरव की पूजा उपयुक्त मानी गई है। भैरव तंत्र के अनुसार भय से मुक्ति दिलाने वाले को भैरव कहा जाता है। इनकी आराधना से जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। श्री भैरव की वटुक रूप में आराधना के बिना श्री शिव मंत्र सिद्धि संभव नहीं है। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra वे क्रिया शक्ति के रूप हैं, जो साधक को सात्विकता में प्रवृत्त कर शिव और शक्ति की ओर आकर्षित करते हैं। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति शिव साधना में लग जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। भैरव तांत्रिकों के लिए सबसे पसंदीदा देवताओं में से एक हैं। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र की पूजा करने के लिए कुछ रोचक मंत्र हैं जो भय को दूर करने, रोगों को ठीक करने, शत्रुओं को नष्ट करने और समृद्धि प्रदान करने के लिए जाने जाते हैं। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र भगवान भैरव को समर्पित एक गुप्त स्तोत्र है। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र को पढ़ने या सुनने से कई लाभ और सिद्धियाँ मिलती हैं जैसे वाक सिद्धि (आप जो भी बोलेंगे वह सच हो जाएगा), बुद्धि, भय से मुक्ति, शत्रुओं का नाश और लंबी आयु प्राप्त होती है। एक बार नियमित अभ्यास करने के बाद, Batuk Bhairav Ashtottara Stotra बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र जप करने वाले पर अनंत आशीर्वाद प्रदान कर सकता है और उसे भगवान का दिव्य आशीर्वाद दिला सकता है जिससे समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए, लोग बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ पाठ करते हैं। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र के लाभ जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने के लिए भैरव देवता की पूजा में बहुत महत्व है। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra यदि आप बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र के शब्दों का पाठ करते हैं, खासकर भैरव अष्टमी की पूर्व संध्या पर या शनिवार को, तो आप निश्चित रूप से अपने सभी कामों को सफल और सार्थक बनाने में सक्षम होंगे, साथ ही आपके व्यवसाय, व्यापार और जीवन में पूर्ण सफलता, परेशानियाँ, बाधाएँ, शत्रु, कोर्ट-कचहरी आदि से मुक्ति मिलेगी। Batuk Bhairav Ashtottara Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ जो व्यक्ति तुरंत समृद्धि चाहते हैं, Batuk Bhairav Ashtottara Stotra उन्हें नियमित रूप से बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। बटुक भैरव अष्टोत्तर स्तोत्रम् | Batuk Bhairav Ashtottara Stotra सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे। विनियोग:- ॐ अस्य श्रीबटुक भैरव स्तोत्र मन्त्रस्य, कालाग्नि रूद्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आपदुद्धारक बटुक भैरवो देवता, ह्रीं बीजम्, भैरवी वल्लभः शक्तिः, नील वर्णों दण्ड पाणि: कीलकं, समस्त शत्रु दमने समस्ता-पन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगः।  ऋष्यादि न्यास: ॐ कालाग्नि ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे। आपदुद्धारक श्रीबटुक भैरव देवतायै नमः हृदये। ह्रीं बीजाय नमः गुह्यये। भैरवी वल्लभ शक्तये नमः पादयोः नील वर्णों दण्ड-पाणि: कीलकाय नमः नाभौ। समस्त शत्रु दमने समस्तापन्निवारणे सर्वाभीष्ट प्रदाने च विनियोगाय नमः सर्वांगे। मूल-मन्त्र: ॐ ह्रीं बं बटुकाय क्षौं क्षौं आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय स्वाहा । ध्यान: नील-जीमूत-संकाशो जटिलो रक्त-लोचनः । दंष्ट्रा कराल वदनः सर्प यज्ञोपवीत-वान् ।। दंष्ट्राSSयुधालंकृतश्च कपाल-स्त्रग्-विभूषितः । हस्त-न्यस्त-करो टीका-भस्म-भूषित-विग्रहः ।। नाग-राज-कटि-सूत्रों बाल-मूर्तिर्दिगम्बरः । मञ्जु-सिञ्जान-मञ्जरी-पाद-कम्पित-भूतलः ।। भूत-प्रेत-पिशाचैश्च सर्वतः परिवारितः । योगिनी-चक्र-मध्यस्थो मातृ-मण्डल-वेष्टितः ।। अट्टहास-स्फुरद्-वक्त्रो भृकुटी-भीषणाननः । भक्त-संरक्षणार्थ हि दिक्षु भ्रमण-तत्परः ।। मूल स्तोत्र: ॐ ह्रीं बटुकों वरदः शूरो भैरवः काल भैरवः । भैरवी वल्लभो भव्यो दण्ड पाणिर्दया निधिः ।।1 वेताल वाहनों रौद्रो रूद्र भृकुटि सम्भवः । कपाल लोचनः कान्तः कामिनी वश कृद् वशी ।।2 आपदुद्धारणो धीरो हरिणाङ्क शिरोमणिः । दंष्ट्रा-करालो दष्टोष्ठौ धृष्टो-दुष्ट-निवर्हणः ।।3 सर्प-हारः सर्प-शिरः सर्प-कुण्डल-मण्डितः । कपाली करुणा-पूर्णः कपालैक-शिरोमणिः ।।4 श्मशान-वासी मासांशी मधु-मत्तोSट्टहास-वान् । वाग्मी वाम-व्रतो वामो वाम-देव-प्रियंङ्करः ।।5 वनेचरो रात्रि-चरो वसुदो वायु-वेग-वान् । योगी योग-व्रत-धरो योगिनी-वल्लभो युवा ।।6 वीर-भद्रो विश्वनाथो विजेता वीर-वन्दितः । भूताध्यक्षो भूति-धरो भूत-भीति-निवरणः ।।7 कलङ्क-हीनः कंकाली क्रूरः कुक्कुर-वाहनः । गाढ़ो गहन-गम्भीरो गण-नाथ-सहोदरः ।।8 देवी-पुत्रो दिव्य-मूर्तिर्दीप्ति-मान् दिवा-लोचनः । महासेन-प्रिय-करो मान्यो माधव-मातुलः ।।9 भद्र-काली -पतिर्भद्रो भद्रदो भद्र-वाहनः । पशूपहार-रसिकः पाशी पशु-पतिः पतिः ।।10 चण्डः प्रचण्ड-चण्डेशश्चण्डी-हृदय-नन्दनः । दक्षो दक्षाध्वर-हरो दिग्वासा दीर्घ-लोचनः ।।11 निरातङ्को निर्विकल्पः कल्पः कल्पान्त-भैरवः । मद-ताण्डव-कृन्मत्तो महादेव-प्रियो महान् ।।12 खट्वांग-पाणिः खातीतः खर-शूलः खरान्त-कृत् । ब्रह्माण्ड-भेदनो ब्रह्म-ज्ञानी ब्राह्मण-पालकः ।।13 दिक्-चरो भू-चरो भूष्णुः खेचरः खेलन-प्रियः , सर्व-दुष्ट-प्रहर्त्ता च सर्व-रोग-निषूदनः । सर्व-काम-प्रदः शर्वः सर्व-पाप-निकृन्तनः ।।14  फल-श्रुति: इत्थमष्टोत्तर-शतं नाम्ना सर्व-समृद्धिदम् । आपदुद्धार-जनकं बटुकस्य प्रकीर्तितम् ।। एतच्च श्रृणुयान्नित्यं लिखेद् वा स्थापयेद् गृहे । धारयेद् वा गले बाहौ तस्य सर्वा समृद्धयः ।। न तस्य दुरितं किञ्चिन्न चौर-नृपजं भयम् । न चापस्मृति-रोगेभ्यो डाकिनीभ्यो भयं नहि ।। न कूष्माण्ड-ग्रहादिभ्यो नापमृत्योर्न च ज्वरात् । मासमेकं त्रि-सन्ध्यं तु शुचिर्भूत्वा पठेन्नरः ।। सर्व-दारिद्रय-निर्मुक्तो निधि पश्यति भूतले । मास-द्वयमधीयानः पादुका-सिद्धिमान् भवेत् ।। अञ्जनं गुटिका खड्गं धातु-वाद-रसायनम् । सारस्वतं च वेताल-वाहनं बिल-साधनम् ।। कार्य-सिद्धिं महा-सिद्धिं मन्त्रं चैव समीहितम् । वर्ष-मात्रमधीनः प्राप्नुयात् साधकोत्तमः ।। एतत् ते कथितं देवि ! गुह्याद् गुह्यतरं परम् । कलि-कल्मष-नाशनं वशीकरणं चाम्बिके ! ।।

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दुर्गा मन्दिर गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, भारत

यहाँ श्रद्धालु करते हैं माँ दुर्गा को रक्त अर्पित Durga Mandir:दुर्गा मन्दिर गोरखपुर भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक अद्रभुत माँ दुर्गा का मंदिर स्थित है। गोरखपुर शहर के बांसगांव में बने इस दुर्गा मंदिर में देवी को खुश करने के लिए श्रद्धालुओं द्वारा माँ को रक्त अर्पित किया जाता है। दुर्गा मन्दिर गोरखपुर माँ दुर्गा के इस मंदिर की अनोखी परंपरा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों साल पूर्व से है। वैसे तो पूरे साल दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां रक्त चढ़ाने की विशेष परंपरा है। नवमी के दिन माँ दुर्गा को रक्त अर्पित करने की परंपरा को निभाने के लिए देश-विदेश में रहने वाले लोग भी आते हैं। नवजात बच्चों को भी लेकर श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं और उनके ललाट से रक्त लेकर माँ को अर्पित करते हैं। मंदिर का इतिहास गोरखपुर के बांसगांव तहसील स्थित दुर्गा मंदिर में पिछले 300 वर्षों से माँ दुर्गा को रक्‍त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा क्षेत्रियों के श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत 12 दिन के नवजात से लेकर 100 वर्ष के बुजुर्ग तक का रक्त चढ़ाया जाता है। उपनयन संस्कार के पहले तक एक जगह ललाट और जनेऊ धारण करने के बाद युवकों, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर अधेड़ों व बुजुर्गों के शरीर से नौ जगहों पर एक ही उस्तरे से चीरा लगाकर खून निकाला जाता है। रक्त को बेलपत्र में लेकर माँ दुर्गा के चरणों में अर्पित किया जाता है और शरीर के कटे हुए हिस्से पर भभूत लगाई जाती है। मंदिर का महत्व माँ दुर्गा के इस मंदिर से जुड़ी ऐसी मान्यता है कि जिन नवजातों के ललाट से रक्त चढ़ाया जाता है, दुर्गा मन्दिर गोरखपुर उन्हें दुर्गा माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है दुर्गा मन्दिर गोरखपुर कि ये माँ के आशीर्वाद का ही फल है कि आज तक किसी को न तो टिटनेस हुआ और न ही घाव भरने के बाद कहीं कटे का निशान पड़ा। मंदिर की वास्तुकला दुर्गा मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सुंदर है। मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। सम्पूर्ण मंदिर को वर्गाकार और एक विशाल चबूतरे पर बनाया गया है। दुर्गा मंदिर में माँ के दर्शन के लिए एक प्रवेश द्वार है। वर्ष 2021 में माँ दुर्गा के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला का भी निर्माण किया गया। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सायंकाल आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 05:00 AM – 06:00 AM

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गोपीनाथ मंदिर वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वैष्णव संप्रदाय के इस मंदिर को “राधा गोपीनाथ मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोपीनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश मथुरा के वृन्दावन नगरी में स्थित है। सप्तदेवालयों में शामिल यह मंदिर यमुना नदी के केशीघाट के समीप बना हुआ है। वैष्णव संप्रदाय के इस मंदिर को “राधा गोपीनाथ मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। गोपीनाथ मंदिर का इतिहास Mandir Shri Gopinath Ji : गोपीनाथ मंदिर में मूर्तियों की पूजा मधुपंडित गोस्वामी द्वारा की जाती थी जो गुरु चैतन्य के बहुत करीबी सहयोगियों में से एक थे। पौराणिक कथा के अनुसार, गोपीनाथजी की मूर्ति लंबे समय तक खोयी हुयी थी। ऐसा कहा जाता है कि परमानंद भट्टाचार्य नाम के एक महान भक्त ने खोई हुई मूर्ति को पुनर्जीवित किया था। एक रात को भगवान गोपीनाथ परमानंद भट्टाचार्य के स्वप्न में आए और उन्होंने वामशीवट नामक पेड़ के नीचे अपने रहने के स्थान का पता बताया। स्वप्न के अनुसार परमानंद उस पेड़ के पास गए और वहां पर मूर्ति को पुनर्जीवित किया। उन्होंने मूर्ति की पूजा करना शुरू कर दिया और बाद में मूर्ति मधुपंडितगोस्वामी को सौंप दी। मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि गोपीनाथ मंदिर में विराजित भगवान कृष्ण की मूर्ति चमत्कारी है। इनके दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। इस मंदिर का मनमोहक और शांत वातावरण भक्तों को भगवान की ओर आकर्षित करता है। मंदिर की वास्तुकला गोपीनाथ मंदिर लाल पत्थर से निर्मित है। नदी के किनारे होने के कारण मंदिर की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा बांसुरी बजाते हुए स्थापित है। भगवान के दाये तरफ प्रिय राधा जी और बाये तरफ अनंग-मंजरी खड़े हुए हैं। उनका साथ देने के लिए ललिता और विशाखा भी है। इस मंदिर में ही आचार्य मधु पंडित की समाधि भी है। यदि आप वृन्दावन गए है एक बार इस मंदिर के दर्शन जरूर करने चाहिए। मंदिर का समय गोपीनाथ मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 01:00 PM श्रृंगार आरती 08:30 AM – 09:00 AM शाम में गोपीनाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 09:00 PM शयन आरती 08:00 PM – 08:30 PM मंगला आरती 05:00 AM – 05:30 AM राजभोग आरती 11:30 AM – 12:00 PM संध्या आरती 06:00 PM – 06:30 PM

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Pana Sankranti 2025 Date Hindi : पना संक्रांति कहां मनाई जाती है, इस दिन क्या करते हैं

Pana Sankranti 2025 Date:हिंदू पंचांग के अनुसार, जिस दिन भगवान सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन मेष संक्रांति मनाई जाती है। ओडिशा में इसे पना संक्रांति कहा जाता है और इस दिन नए साल का त्योहार भी मनाया जाता है। Pana Sankranti 2025 Date इस वर्ष 14 अप्रैल पना संक्रांति है। इस अवसर पर, ओडिशा के लोग एक दूसरे को पना संक्रांति और नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। साथ ही इस दिन फल, दही, सत्तू और अन्य वस्तुओं से बने शर्बत पीने का भी विधान है। यह भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जहां उत्तर भारत में बैसाखी मनाई जाती है। वहीं, विशु इस दिन केरल और तमिलनाडु में पुथांडु में मनाया जाता है। जबकि बोहाग बिहू असम में मनाया जाता है। केवल इस दिन, सूरज पूरी तरह से दो अवसरों पर भूमध्य रेखा पर रहता है, जैसे कि मेष संक्रांति और तुला संक्रांति। दिन का नाम पना के नाम पर रखा गया है। यह दिन बहुत खुशी, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रदर्शनों के साथ मनाया जाता है। Pana Sankranti 2025 Date:पना संक्रांति क्यों कहा जाता है? Pana Sankranti 2025 Date:पना नाम उत्सव के मुख्य घटक से लिया गया है। मुख्य अनुष्ठानों में से एक में पके आम, नारियल, गुड़, दही और पानी जैसी विभिन्न सामग्रियों से बने “पना” नामक एक विशेष पेय की तैयारी और खपत शामिल है। पना को साझाकरण और सामुदायिक बंधन के प्रतीक के रूप में परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पड़ोसियों के बीच वितरित किया जाता है। June 2025 Hindu Calendar Vrat tyohar list:जून 2025 में पड़ने वाले प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची निम्नलिखित है Pana Sankranti ki pouranik katha:पना संक्रांति का पौराणिक कथा जिस दिन इसे मनाया जाता है उसका कारण यह है कि यह सौर वर्ष का पहला दिन है। Pana Sankranti 2025 Date केवल इस दिन, सूरज पूरी तरह से दो मौकों पर भूमध्य रेखा पर रहता है, जैसे कि मेष संक्रांति और तुला संक्रांति। मेष संक्रांति के बाद, सूर्य उत्तरी दिशा में उगता है जहां भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित है। इसलिए, इस वर्ष से सूर्य के पहले दिन, जो मिशा संक्रांति है। ओडिया की परंपरा के अनुसार, पना संक्रांति को हिंदू देवता हनुमान का जन्मदिन माना जाता है। रामायण में विष्णु अवतार राम के प्रति उनकी प्रेममयी भक्ति पौराणिक है। शिव और सूर्य (सूर्य) भगवान के साथ उनके मंदिर नए साल में पूजनीय हैं। इस दिन हिंदू भगवान मंदिरों में भी जाते हैं। पना संक्रांति का समारोह Pana Sankranti 2025 Date:इस दिन, लोग पना से भरे एक छोटे बर्तन का उपयोग करते हैं या मिश्री का मीठा पेय और तुलसी के पौधे पर पानी डाला जाता है। बर्तन के तल पर एक छेद बनाया जाता है, जो बारिश का प्रतिनिधित्व करते हुए पानी को गिरने देता है। यह त्योहार व्यापक रूप से कुछ शहरों और गांवों में, तटीय क्षेत्रों में, ओडिशा में एक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। पना संक्रांति का महत्व (Pana Sankranti Ka Mahatva) पना संक्रांति सौर वर्ष के पहले दिन मनाई जाती है। Pana Sankranti 2025 Date ओडिया की परंपरा के अनुसार पना संक्रांति के दिन ही हनुमान भगवान का जन्मदिन हुआ था। इसलिए इस दिन यहां हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन भगवान सूर्य उत्तरायण का आधा सफर पूरा कर लेते हैं। अन्य संक्रांति की तरह ही इस दिन भी स्नान-दान, पितरों का तर्पण और मधुसूदन भगवान की पूजा का महत्व बताया गया है। पना संक्रांति पर क्या करते हैं (Pana Sankranti Par Kya Karte Hai) Pana Sankranti 2025 Date:इस दिन सूर्य की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कहते हैं पना संक्रांति के दिन सूर्य की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सूर्य देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। Pana Sankranti 2025 Date इसलिए इस दिन सूर्य को अर्घ्य जरूर देना चाहिए। कहते हैं सूर्य की पूजा करने से व्यक्ति को मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। पना संक्रांति पर करें ये दान (Pana Sankranti Daan) मेष संक्रांति के दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन दान करने से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं। लेकिन दान करने से पहले पवित्र नदी में स्थान जरूर करें। लेकिन अगर नदियों में स्नान नहीं कर सकते हैं तो घर में स्नान के पानी में ही गंगाजल डालकर स्नान करें। Pana Sankranti 2025 Date:खास संदेश  इस पना संक्रांति पर भगवान जगन्नाथ का दिव्य आशीर्वाद आपके जीवन में प्रचुरता और समृद्धि लाए। आपको और आपके परिवार को प्रेम, खुशी और एकजुटता से भरी आनंदमय पना संक्रांति की शुभकामनाएं। जैसे ही सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, यह आपके जीवन में नई शुरुआत और अवसर लेकर आएगा। पण संक्रांति की शुभकामनाएं! आइए नए सौर माह की शुरुआत का जश्न कृतज्ञता और भक्ति के साथ मनाएं। पण संक्रांति की शुभकामनाएँ! पाना पेय का मीठा स्वाद आपके जीवन को मिठास और आनंद से भर दे। पण संक्रांति की शुभकामनाएँ! इस शुभ दिन पर, भगवान जगन्नाथ आप और आपके प्रियजनों पर अपना आशीर्वाद बरसाएं। पण संक्रांति की शुभकामनाएं! Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi : कामदा एकादशी के दिन क्या करें क्या नहीं? जानें जरूरी नियम

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