भूतेश्वर मंदिर:मथुरा, उत्तरप्रदेश, भारत Bhuteshwar Temple: Mathura, Uttar Pradesh, India

भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर दिव्य शिवलिंग के रूप में भी जाना जाता है। भूतेश्वर मंदिर भगवान श्री कृष्ण की पावन नगरी मथुरा में स्थित है भूतेश्वर मंदिर। यह मंदिर शहर के प्राचीन शिव मंदिर में शामिल है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर दिव्य शिवलिंग के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा भूतेश्वर महादेव को मथुरा का रक्षक और क्षेत्रपाल भी कहते है। आपको बता दे कि मथुरा में महादेव मंदिर चार हैं। इन्हें मथुरा नगरी के रक्षक माना जाता है। पूर्व में पिघलेश्वर, पश्चिम में भूतेश्वर, उत्तर में गोकर्णेश्वर और दक्षिण में रंगेश्वर दिशा के क्षेत्रपाल माने जाते हैं । प्रतिवर्ष इस मंदिर में भाद्रपद मास के दौरान बृज चौरासी कोस की परिक्रमा आरम्भ होती है और यहीं पर समाप्त होती है। शहर की सीमा के भीतर स्थित यह मंदिर लोकप्रिय तीर्थ स्थल है। भूतेश्वर मंदिर का इतिहास प्राचीन मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, मंदिर की उत्पत्ति मथुरा की स्थापना से ही मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मथुरा की स्थापना तब हुई जब शत्रुघ्न ने राक्षस मधु का वध किया। शत्रुघ्न भगवान राम के छोटे भाई थे। इस महत्वपूर्ण घटना की स्मृति में भूतेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया, जिससे यह शहर का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि भूतेश्वर महादेव के इस प्राचीन शिवलिंग को नाग शासकों द्वारा स्थापित किया था। भूतेश्वर मंदिर का महत्व भूतेश्वर महादेव मंदिर स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के लिए धार्मिक महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि भूतेश्वर महादेव मथुरा शहर को बुरी ताकतों से बचाते हैं। मथुरा के लोगों, ब्रजवासियों द्वारा रक्षक के रूप में भूतेश्वर भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भूतेश्वर भगवान हर संकटों से उनकी रक्षा करते हैं। भूतेश्वर मंदिर एक शक्तिपीठ है ऐसा कहा जाता है कि यह वह जगह है जहाँ पर माता सती के शरीर के नष्ट होने के बाद उनकी अंगूठी गिरी थी। यह मंदिर सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के पाताल देवी गुफा में राजा कंस द्वारा पूजा की जाती थी। भूतेश्वर मंदिर की वास्तुकला भूतेश्वर मंदिर अद्भुत स्थापत्य शैली द्वारा निर्मित है। इस मंदिर में एक मुख्य गर्भगृह और पाताल देवी गुफा है। मंदिर का गर्भगृह 100 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। मंदिर में एक नाली है, जो साइड गेट के बाहरी हिस्से को अंदर से जोड़ती है, जिससे भक्त शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं। इसके अलावा मुख्य प्रवेश द्वार के बाईं ओर कई छोटे-छोटे शिवलिंग हैं। जहाँ भक्त बिना किसी परेशानी के फूल चढ़ा सकते है। मंदिर परिसर में पाताल देवी, काली देवी, गिरिराज महाराज और अन्य सुंदर मंदिर स्थित हैं। मंदिर का समय भूतेश्वर मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 01:00 PM सुबह की आरती का समय 07:00 AM – 08:00 AM शाम को भूतेश्वर मंदिर खुलने का समय 04:30 PM – 10:30 PM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद भूतेश्वर महादेव को दूध, दही, शहद, जल और पेड़े का भोग लगाया जाता है। साथ ही मंदिर में शिवलिंग पर फूल भी अर्पित किए जाते हैं।

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काल भैरव मंदिर, इंदौर मध्य प्रदेश, भारत:Kaal Bhairav ​​Temple, Indore Madhya Pradesh, India

यहां हादसों के पहरेदार हैं भैंरव बाबा काल भैरव मंदिर मध्य प्रदेश के इंदौर में भैरव घाट, खण्डवा रोड पर काल भैरव मंदिर स्थित है। यह मंदिर बहुत ही चमत्कारिक है। भैरव अष्टमी पर इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है। जिस दौरान विशाल भंडारा और महा आरती का आयोजन किया जाता है। जिसमें हजारों संख्या में लोग शामिल होते है। वहीं भैंरव बाबा को छप्पन भोग भी लगाए जाते हैं। काल भैरव मंदिर का इतिहास भैरव घाट के भैरव मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु मंदिर के पुजारियों द्वारा बताया जाता है कि काल भैरव के इस मंदिर का इतिहास करीब 500 वर्ष पुराना है। यह प्राचीन काल से ही अपनी चमत्कारिक शक्तियों के लिए जाना जाता है। इन्हें यहां के रक्षक के रूप में भी पूजते हैं। काल भैरव मंदिर का महत्व भैरव घाट एक ऐसा खतरनाक घाट है। जहाँ पर अधिकांशत: दुर्घटनाएं होती रहती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इस घाट पर जाने से पहले भैरव मंदिर में रूककर दर्शन करते हैं, तो बाबा उन्हें दुर्घटनाओं से बचाते हैं। भैरव मंदिर में दर्शन करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यह घाट बहुत ही सुन्दर है साथ ही आपको रोड के दोनों तरफ प्राकृतिक नज़ारे भी देखने को मिलेंगे। खासकर बारिश के मौसम में यहाँ का वातावरण बहुत शानदार होता है। ऐसा भी बताया जाता है कि इस घाट पर दुर्घटनाओं के कारण कई नकारात्मक शक्तियां भटकती रहती हैं। जो दुर्घटनाओं का कारण बनती है। इसलिए भैरव बाबा के दर्शन के बाद ही इस घाट की चढ़ाई करनी चाहिए। भैरव घाट पर स्थित भगवान भैरव को हादसों का पहरेदार भी कहते है। काल भैरव मंदिर की वास्तुकला इस मंदिर में भगवान भैरव की विशाल पत्थर पर प्रतिमा स्थापित है। जो देखने में बहुत ही आकर्षक है। काल भैरव एक छोटे से पुल नुमा रास्ते से होते हुए मंदिर के दर्शन के लिए भक्त यहां पहुंचते है। भैंरव बाबा की प्रतिमा का रंग सिंदूरी रहता है। प्रतिदिन इनका शृंगार भी किया जाता है। जिसमें बाबा के कई रूपों के दर्शन अलग अलग दिन करने को मिलते हैं। मंदिर में भैंरव बाबा की प्रतिमा के ठीक सामने उनके वाहन श्वान की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। काल भैरव मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 09:00 PM सायंकाल आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद भैंरव बाबा को दही-इमरती का भोग लगाया जाता है। साथ ही भक्त लोग पान, तंबाकू, सिगरेट, शराब जैसी सभी चीजें भैंरव बाबा को अर्पण करते है। साथ ही नारियल और अगरबत्ती भी बाबा को चढ़ाई जाती है।

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Story of Kedarnath Temple :भगवान शिव ने भैंसे का रूप बनाकर पांडवों को किया था पाप मुक्त, ऐसी है केदारनाथ मंदिर की कथा

Story of Kedarnath Temple:धार्मिक मान्यतानुसार केदारनाथ (Kedarnath Temple) को द्वादश ज्योतिर्लिंगों (Jyotirlinga) में 11वां माना जाता है. साथ ही यह सबसे पवित्र तीर्थस्थलों (Holy Pilgrimage) में से एक है. कहा जाता है कि केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की कहानी बेहद अनोखी और दिलचस्प है. History of Kedarnath Dham : द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम में भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव द्वारा धारण किए गए भैंसे के रूप के पिछले भाग की पूजा की जाती है। वहीं केदारनाथ मंदिर के इतिहास से जुड़ी अन्‍य कहानियां भी प्रचलित हैं। केदारनाथ धाम में हर वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। धाम के कपाट हर वर्ष अप्रैल या मई में खोले जाते हैं और भैयादूज पर शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। शीतकाल में बाबा केदार की चल विग्रह उत्सव डोली को ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर लाया जाता है। छह माह के लिए बाबा यहीं विराजमान रहते हैं।केदारनाथ धाम का उल्लेख स्कंद पुराण के केदार खंड में मिलता है। Story of Kedarnath Temple कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण कत्यूरी शैली में हुआ है। पांडवों के वंशज जन्मेजय ने यहां इस मंदिर की स्थापना की थी। बाद में आदि शंकराचार्य द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया था। Story of Kedarnath Temple:केदारनाथ धाम की प्राचीन मान्यता मंदिर के संबंध में कई मान्‍यताएं प्रचलित हैं। मान्‍यता है कि महाभारत के बाद पांडव अपने गोत्र बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की शरण में जाना चाहते थे। और इसके लिए वह भगवान शिव की खोज करने हिमालय की ओर गए। तब भगवान शिव अंतर्ध्यान होकर केदार में जा बसे। पांडव भी उनके पीछे केदार पर्वत पहुंच गए। Story of Kedarnath Temple तब भगवान शिव ने पांडवों को आता देख भैंसे का रूप धारण कर लिया और पशुओं के बीच में चले गए। भगवान शिव के दर्शन पाने के लिए पांडवों ने एक योजना बनाई और भीम ने विशाल रूप धारण कर अपने दोनों पैर केदार पर्वत के दोनों और फैला दिए। सभी पशु भीम के पैरों के बीच से गुजर गए, लेकिन भैंसे के रूप में भगवान शिव भीम के पैर के नीचे से निकले। तभी भगवान शिव को पहचान कर भीम ने भैंसे को पकड़ना चाहा तो वह धरती में समाने लगा। तब भीम ने भैंसे का पिछला भाग कस कर पकड़ लिया। भगवान शिव पांडवों की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्‍हें दर्शन देकर पाप से मुक्त कर दिया। कहा जाता है कि तभी से भगवान शिव की यहां भैंसे की पीठ की आकृति के रूप में पूजे जाते हैं। मान्‍यता है Story of Kedarnath Temple कि इस भैंसे का मुख नेपाल में निकला, जहां भगवान शिव की पूजा पशुपतिनाथ के रूप में की जाती है। 12वीं-13वीं शताब्दी का है मंदिर:The temple is from 12th-13th century राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12वीं-13वीं शताब्दी का है। Story of Kedarnath Temple ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार यह उनके द्वारा बनाया गया मंदिर है। वह राजा 1076-99 काल के थे। नर और नारायण ऋषि ने की थी तपस्या:Sage Nar and Narayan did penance यह भी कहा जाता है कि हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार तपस्वी नर और नारायण ऋषि ने तपस्या की थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। जिसके बाद नर और नारायण ऋषि ने भगवान शिव से ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्राप्‍त किया। 2013 आपदा में क्षतिग्रस्‍त हो गया था धाम:The temple was damaged in the 2013 disaster. 2013 में आपदा के दौरान केदारनाथ धाम में मंदिर को छोड़ बाकी पूरा परिसर क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके बाद से अब तक धाम में पुनर्निर्माण का कार्य चल रहा है। वहीं केदारनाथ पुनर्निर्माण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में भी शामिल है। Story of Kedarnath Temple धाम में हो रहे पुनर्निर्माण कार्यों पर वह स्वयं नजर रखते हैं। केदारनाथ में 225 करोड़ रुपये से ज्‍यादा की लागत से प्रथम चरण के कार्य पूरे किए जा चुके हैं। जिसमें शंकराचार्य की समाधि का पुनर्निर्माण, सरस्वती व मंदाकिनी नदी और उसके घाटों की सुरक्षा, तीर्थ पुरोहितों के आवासों का निर्माण किया गया है। मंदाकिनी नदी पर 60 मीटर लंबे पुल का निर्माण के साथ ही आस्था पथ का निर्माण किया गया है। अब दूसरे चरण में 184 करोड़ रुपये के निर्माण कार्य चल रहे हैं। केदारनाथ मंदिर की कथा (Kedarnath Temple Story) Story of Kedarnath Temple केदारनाथ मंदिर के विषय में प्रचलित कथा के अनुसार, पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव नें उन्हें हत्या के पाप से मुक्त कर दिया था. मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव अपने भाईयों की हत्या से मुक्ति के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे. परंतु, भगवान उनसे कर्म से खुश नहीं थे, इसलिए वे केदारनाथ चले गए. पांडव भी उनके दर्शन के लिए केदारनाथ पहुंच गए. पांडवों को वहां पहुंचने पर भगवान शिव में भैंसे का रूप धारण कर लिया. जिसके बाद वे अन्य पशुओं के बीच में चले गए ताकि पांडल भगवान शिव के उस रूप को ना पहचान पाए. कहते हैं कि भीम ने विशालकाय शरीर धारण कर दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला दिए. जिसके बाद उस पहाड़ के नीचे से सभी पशु तो निकल गए, लेकिन वहां मौजूद एक भैंस ने ऐसा नहीं किया. जिसके बाद भीम पूरी शक्ति से भैंस की ओर झपटे, लेकिन वह जमीन में समाने लगा. तभी भीम ने उसकी की पीठ का पिछला हिस्सा पकड़ लिया. कहा जाता है Story of Kedarnath Temple कि भगवान शिव ने भैंसे का रूप बनाया था. मान्यता है Story of Kedarnath Temple कि भगवान शिव पांडवों की ईच्छाशक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन देकर हत्या के पाप से मुक्त होने का आशीर्वाद दिया. धार्मिक मान्यता है कि उसी समय से केदारानाथ में भैंस की पीठ को शिव का रूप मानकर पूजा होने लगी.

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बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

महादेव का यह एक ऐसा मंदिर है जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो भगवान शिव के कई मंदिर हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर लेकिन आज हम महादेव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं व कुंवारी कन्याओं को विवाह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माता पार्वती ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भोलेनाथ को पति के रूप में पाया था। हरिद्वार में बिल्व पर्वत पर स्थित है बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर। बिल्वकेश्वर महादेव बिल्व का अर्थ होता है (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के रूप में फल देने वाला स्थल। इसी पर्वत के नाम पर मंदिर का नाम पड़ा। नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है,बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जिसकी अराधना बिल्वकेश्वर या बिल्केश्वर महादेव के रूप में की जाती है। चारों तरफ हरे-भरे जंगलों से घिरे इस प्राचीन मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। सावन महीने में यहां जल चढ़ाने के लिए कांवड़ियों की भारी भीड़ आती है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का सबसे पहले जिक्र आया है। इसे माता पार्वती की तपोस्थली भी माना जाता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जैसा की प्रचलित है कि माता पार्वती दो बार भगवान शिव की अर्द्धांगिनी बनीं थीं, यानी 2 बार इनका विवाह हुआ था। पहला जब भगवान ने दक्षेश्वर के राजा दक्ष की पुत्री सती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। बिल्वकेश्वर महादेव जिसके बाद माता सती ने यज्ञ कुंड में भस्म होकर हिमालय राजा के घर पार्वती रूप में जन्म लिया था। माता पार्वती ने ऋषि नारद मुनि की सलाह पर बिल्व पर्वत पर आकर कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न कर दोबारा उनकी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। बताया जाता है कि माता पार्वती ने बिल्व पर्वत पर 3000 साल तक तपस्या की थी, जिसमें 1 हजार साल वो बिना अन्न व जल पीये रहीं थीं। माता की कठोर तपस्या देख महादेव ने उन्हें वृक्ष की शाखा के रूप में दर्शन दिए और माता पार्वती को विवाह का वरदान दिया। बेलपत्रों से घिरे मनोरम बिल्व पर्वत पर बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक गौरी कुंड है। इसको लेकर बताया जाता है बिल्वकेश्वर महादेव कि भगवान शिव की उपासना के दौरान माता पार्वती बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत की थी। लेकिन जब उन्हें प्यास लगी तो स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमंडल से पानी दिया, जोकि एक कुंड के रूप में आज भी है। बिल्वकेश्वर महादेव माता पार्वती के इस कुंड से पानी पीने के कारण इसका नाम गौरी कुंड पड़ा। कहते हैं कि इस कुंड का जल गंगा की तरह पवित्र है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का महत्व माना जाता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा इस मंदिर में बेलपत्र चढ़ाने से उनके विवाह की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के पास बने गौरी कुंड के जल को छू लेने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है कि मंदिर में मणिधारक अश्वतर नाम का महानाग रहता है, जो कभी कभी शिवलिंग के पास दिखाई देता है। माना जाता है कि महानाग के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ साल तक स्वर्ग में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला बिल्व पर्वत पर स्थित यह मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। मंदिर में नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। यानी इसे कहीं से लाकर स्थापित नहीं किया गया बल्कि यह अपने आप यहां प्रकट हुआ। नीम के पेड़ को काटे बिना मंदिर के गर्भगृह को बनाया गया है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में भगवान शंकर पार्वती के अलावा गणेश जी, हनुमानजी व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पीछे करीब 50 कदम पर गौरी कुंड है। उसी के ठीक बगल में एक गुफा भी है। बताया जाता है कि इसी गुफा में माता पार्वती विश्राम करती थीं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद महादेव की इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र चढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त पंचामृत, धतूरा, दूध, घी, शहर, फल व फूल भगवान को अर्पित करते हैं।

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खजराना गणेश मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

देश के सबसे धनी गणेश मंदिरों में खजराना गणेश मंदिर का नाम सबसे पहले आता है। खजराना गणेश मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में स्थित है। देश के सबसे धनी गणेश मंदिरों में खजराना गणेश मंदिर का नाम सबसे पहले आता है। यहां भक्तों की ओर से चढ़ाए हुए चढ़ावे के कारण मंदिर की कुल चल और अचल संपत्ति बेहिसाब है। श्रद्धालु खजराना गणेश मंदिर में ऑनलाइन दान भी करते हैं। हर साल मंदिर की दान पेटियों मे से विदेशी मुद्राएं भी निकलती हैं। मंदिर का इतिहास Khajrana Ganesh Mandir:खजराना गणेश मंदिर का निर्माण 1735 में होलकर वंश की महारानी अहिल्या बाई ने करवाया था, जिन्होंने भगवान गणेश की मूर्ति को एक कुएं से प्राप्त किया था। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर में प्राचीन मूर्ति एक स्थानीय पुजारी पंडित मंगल भट्ट के सपने में देखी गई थी। मंदिर का प्रबंधन आज भी भट्ट परिवार द्वारा किया जाता है। मंदिर का महत्व खजराना गणेश मंदिर में पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस मंदिर का मुख्य त्योहार विनायक चतुर्थी है और इसे अगस्त और सितंबर के महीने में भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि खजराना गणेश मंदिर में प्रभु अपने दरबार में मनोकामना लेकर आने वाले हर भक्त की इच्छा पूरी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब भी भक्त पर कोई विपत्ति आती है तो यहां पुजारियों के द्वारा एक विशेष अनुष्ठान और पूजन किया जाता है, जिससे भगवान गणेश अपने भक्त का विघ्न हर लेते हैं। मंदिर की वास्तुकला खजराना गणेश मंदिर की वास्तुकला में नागर शैली की झलक देखने को मिलती है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहरी गेट और दीवार का निर्माण चांदी से हुआ है। भगवान की प्रतिमा की आँख हीरे से बनी हुई है। खजराना गणेश मंदिर परिसर में 33 छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं। यहां भगवान राम, शिव, मां दुर्गा, साईं बाबा, हनुमान जी सहित अनेक देवी-देवताओं के मंदिर हैं। खजराना गणेश मंदिर के बारे में उलटे स्वास्तिक के आधार पर इच्छा पूर्ति की एक अलग महिमा है। इसके अनुसार जो भी भक्तगण गणेश जी की पीठ पर उल्टा स्वास्तिक बनाकर अपनी मन्नत बोलता है, कुछ ही समय में उसके मनोरथ पूर्ण होते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 12:00 PM सायंकाल मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM शयन आरती का समय 09:00 PM – 09:40 PM सायंकाल आरती का समय 08:00 PM – 08:40 PM सुबह की आरती 08:30 AM – 09:30 AM मंदिर का प्रसाद खजराना गणेश मंदिर में गणेश जी को लड्डू का भोग लगाया जाता है। जिन भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है,वे अपने वजन के बराबर लड्डू को दान देते हैं।

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Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:केदारनाथ कपाट खुलने से पहले सपने में हुए शिव शंकर के दर्शन, जानें किस शुभ घड़ी का है संकेत ?

Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:हिंदू धर्म में सपनों का बड़ा महत्व बताया गया है. शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि नींद में देखे गए सपनों का आपके जीवन से लेना देना होता है. आप इन सपनों को देखकर भविष्य में होने वाली अच्छी और बुरी घटना के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं और उससे बच सकते हैं. Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:हिंदू धर्म में सपनों का बड़ा महत्व बताया गया है. शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि नींद में देखे गए सपनों का आपके जीवन से लेना देना होता है. आप इन सपनों को देखकर भविष्य में होने वाली अच्छी और बुरी घटना के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं और उससे बच सकते हैं. आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे कि अगर आपने सपने में चारधाम यात्रा शुरू होने और केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले भगवान शंकर के दर्शन किए हैं, तो इसका क्या अर्थ होता है, सपने में शिव शंकर के दर्शन होने से आपके जीवन में क्या बड़े बदलाव होने वाले हैं. Doli festival tradition related to Kedarnath temple:डोली उत्सव केदारनाथ मंदिर से जुड़ी परंपरा  Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:इस साल केदारनाथ के कपाट 2 मई 2025 को खोले जाएंगे। बता दें कि केदारनाथ मंदिर के कपाट खोलने से पहले कई परंपराएं निभाया जाता है। कपाट खोलने से पहले बाबा भैरव नाथ की पूजा की जाती है। इसके बाद केदारनाथ की पंचमुखी डोली ऊखीमठ से केदारनाथ धाम ले जाया जाता है।  इसके बाद ही अगले दिन विधि विधान के साथ केदारनाथ मंदिक कपाट भक्तों के लिए खोले जाते हैं।  Did you see Mahadev in your dream:सपने में हुए महादेव के दर्शन? स्वप्न शास्त्र के जानकार बताते हैं कि सपने में शिव शंकर को देखना बेहद ही शुभ माना जाता है. जैसा कि आप जानते हैं ऐसे में अगर आपने सपने में महादेव के दर्शन कर लिए हैं, तो इसका अर्थ है कि शिवजी आपसे बहुत प्रसन्न हैं और आपके ऊपर अपनी कृपा बरसाने वाले हैं. उनकी कृपा से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियों से बहुत जल्द निजात मिलने वाली है Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna बनेंगे बिगड़े हुए काम अगर आपने सपने में शिवजी को ध्यान मुद्रा में देखता है, तो यह इस बात की ओर इशारा करता है कि बहुत जल्द शिक्षा के क्षेत्र में जबरदस्त सफलता मिलने वाली है. इसके साथ ही यह स्वप्न नौकरी में तरक्की का भी पूर्व संकेत देता है साथ ही आपके बिगड़े हुए काम बन जाएंगे और जल्द ही आपको धन प्राप्ति होने की संभावना बननी हुई है. Shivling seen in dream before opening of Kedarnath portals:केदारनाथ कपाट खुलने से पहले सपने में दिखे शिवलिंग Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:ये बात तो हम सब जानते हैं कि हमारे आराध्य देव शिव का पूजन शिवलिंग के रूप में होता है. आपको सपने में शिवलिंग दिखाई दे तो यह बहुत ही शुभ संकेत है Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna और अगर आपको चारधाम यात्रा शुरू होने से पहले सपने में शिवलिंग दिखाई दे रहे हैं, तो यह और भी ज्यादा ख़ुशी की बात है. स्वप्न शास्त्र के मुताबिक अगर आपके जीवन में मुश्किल समय चल रहा है और आप परेशानियों का सामना कर रहे हैं, तो उन सबका अंत होने वाला है.  Water Abhishek on Shivalinga शिवलिंग पर जल अभिषेक  वहीं अगर आपने केदारनाथ कपाट खुलने से पहले सपने में शिवलिंग पर जल अभिषेक करते देखा है, Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna तो यह संकेत देता है कि भगवान शिव प्रसन्न होंगे और उस व्यक्ति की सभी परेशानियों को जल्द ही दूर कर देंगे. यह सपना जीवन में खुशियों के आगमन का संकेत देता है. Visited Kedarnath temple in dream:सपने में हुए केदारनाथ मंदिर के दर्शन  अगर आपको सपने में केदारनाथ मंदिर दिखाई दे और आप मंदिर दर्शन के लिए जाएं, तो यह सपना शुभ माना जाता है. सपने में केदारनाथ मंदिर या चारधाम यात्रा के दर्शन होने का मतलब है Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna कि आपके जीवन में चल रही स्वास्थय संबंधी समस्याएं जल्द ही जड़ से खत्म होने वाली होने वाली हैं. अगर आपको सपने में शिव शंकर के दर्शन हुए हो, तो आप सोमवार को शिव जी को प्रसाद चढ़ाना चाहिए और उनको प्रसन्न रखना चाहिए. अगर आपको सपने में शिव दिखाई देते हैं, तो आप बहुत भाग्यशाली होते हैं. Panchmukhi Doli पंचमुखी डोली  बता दें कि जब केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं तब बाबा केदार अगले छह महीने गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ में विराजमान रहते हैं। भगवान केदारनाथ की डोली पांच मुख वाली होती है। इस डोली के अंदर बाबा केदार की चांदी की भोग मूर्ति विराजमान होती है। बाबा केदार की भोग मूर्ति को इसी पांचमुखी वाली डोली में शीतकालीन गद्दीस्थल लाया जाता है। Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna फिर कपाट खोलने के समय बाबा केदार की भोगमूर्ति को इसी डोली में केदारनाथ ले जाया जाता है। इस मूर्ति की पूजा छह माह तक केदारनाथ तो छह माह तक शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर में होती है।  When will Char Dham Yatra 2025 start:चार धाम यात्रा 2025 कब से शुरू होंगे Sapne Mai Kedarnath Dham Dekhna:इस साल चार धाम की यात्रा 30 अप्रैल 2025 से शुरू होगी। इस दिन गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलेंगे। वहीं 2 मई 2025 को केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलेंगे। इसके बाद भक्तों के लिए बद्रीनाथ के द्वार 4 मई 2025 को खुलेंगे। उत्तराखंड में स्थिति इन चार धामों के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। चार धाम में सबसे पहले यमुनोत्री की यात्रा की जाती है फिर गंगोत्री के। इसके बाद केदारनथा और आखिर में बद्रीनाथ के दर्शन किए जाते हैं।

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Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai:किस दिन मनाई जाएगी गंगा सप्तमी? जानें शुभ मुहूर्त से लेकर पूजा विधि और स्नान का महत्व

Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai:सनातन शास्त्रों में निहित है कि राजा भगीरथ के पूर्वजों को मोक्ष दिलाने हेतु मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। गंगा नदी में स्नान-ध्यान करने से साधक पर न केवल मां गंगा की कृपा बरसती है बल्कि सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। साधक श्रद्धा भाव से वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (Ganga Saptami 2025) तिथि पर मां गंगा की पूजा एवं साधना करते हैं। सनातन धर्म में गंगा सप्तमी का खास महत्व है। यह पर्व हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में साधक गंगा समेत पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान कर परम पुण्यदायिनी मां गंगा की पूजा करते हैं। सनातन शास्त्रों में निहित है कि वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर गंगा स्नान करने से साधक द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही आरोग्य जीवन का वरदान मिलता है। आइए, गंगा सप्तमी (Ganga Saptami 2025 Date) की तिथि, शुभ मुहूर्त एवं महत्व जानते हैं हर नदी सिर्फ जलधारा होती है, लेकिन गंगा सिर्फ नदी नहीं, बल्कि आस्था की अमृतधारा है। कहा जाता है कि जब पापों से थकी धरती ने शुद्धि की गुहार लगाई, तब स्वर्गलोक से मां गंगा ने कदम रखा हमारी धरती पर। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai और यही क्षण आज भी गंगा सप्तमी के रूप में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी का विशेष महत्व है। इस खास अवसर पर लोग पावन और पवित्र गंगा नदी में स्नान कर के अपने सारे पापों से निजात पाते हैं। इसके साथ ही मां गंगा की पूजा अर्चना करते हैं। इस साल यह पावन पर्व शनिवार, 3 मई 2025 को मनाया जाएगा। तो आज की इस खबर में हम आपको गंगा सप्तमी की तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में बताने जा रहे हैं। इसके साथ ही हम यह भी बताएंगे गंगा सप्तमी से जुड़ी कौन सी पौराणिक कथा शामिल है। आइए जानते हैं। गंगा सप्तमी शुभ मुहूर्त (Ganga Saptami Shubh Muhurat) पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 03 मई को सुबह 07 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन यानी 04 मई को सुबह 04 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि मान होने के चलते 03 मई को गंगा सप्तमी मनाई जाएगी। इस दिन गंगा स्नान हेतु मुहूर्त सुबह 10 बजकर 58 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 38 मिनट तक है। गंगा सप्तमी शुभ योग (Ganga Saptami Shubh Yoga) वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यानी 03 मई को दुर्लभ त्रिपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही रवि योग और शिववास योग का संयोग बन रहा है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai इन योग में गंगा स्नान कर मां गंगा और देवों के देव महादेव की पूजा करने से साधक को पृथ्वी लोक पर स्वर्ग समान सुखों की प्राप्ति होगी। इसके अलावा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र का भी संयोग है। What is the story related to Ganga Saptami क्या है गंगा सप्तमी से जुड़ी कथा? Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai गंगा सप्तमी को गंगा जयंती भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन स्वर्ग से धरती पर गंगा का दिव्य अवतरण हुआ था। ब्रह्मा द्वारा जन्मी, शिव की जटाओं में समाई और भगीरथ की तपस्या से बहती हुई  गंगा साक्षात मोक्ष का मार्ग बन गईं। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा स्नान से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और आत्मा को शांति व मुक्ति मिलती है। स्नान करने के बाद दान-पुण्य भी करें Do charity after taking bath गंगा सप्तमी पर स्नान का विशेष महत्व है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai अगर आप प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश या वाराणसी जैसे पवित्र तीर्थों में हैं, तो गंगा में डुबकी जरूर लगाएं। अगर गंगा तक पहुंचना संभव नहीं हो, तो घर में स्नान करते समय जल में कुछ बूंदें गंगाजल की मिला लें। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai हालांकि, कहा जाता है कि भावनाओं की पवित्रता ही सबसे बड़ा तप है। स्नान के बाद तिल, वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि का दान करने से पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।  दीपकों से की जाती है मां गंगा की आरती Aarti of Mother Ganga is done with lamps Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai गंगा सप्तमी पर गंगा घाटों पर एक अलग ही उल्लास देखने को मिलता है। हजारों दीपों से सजी गंगा आरती, मंत्रोच्चारण और शंख ध्वनि से गूंजते घाट। सब मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जो आत्मा तक को झकझोर देता है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai भक्तजन इस दिन मां गंगा की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और विशेष मंत्रों का जाप करते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्चा मोक्ष केवल गंगा में डुबकी से नहीं, बल्कि अपने कर्मों को पवित्र करने से मिलता है।

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Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye:वरूथिनी एकादशी इस दिन, जानें इस दिन क्या करें व क्या नहीं

Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye :वरूथिनी एकादशी व्रत के भी कुछ नियम हैं। वरूथिनी एकादशी पर कुछ चीजों को करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं और आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। Varuthini Ekadashi 2025, वरूथिनी एकादशी एकादशी इस दिन :वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि को जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार वैशाख माह में वरूथिनी एकादशी व्रत 24 अप्रैल को किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से साधक को जीवन में किसी भी चीज कमी नहीं होती है। साथ ही सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वरूथिनी एकादशी के दिन क्या करें (What to do on the day of Varuthini Ekadashi) द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करना चाहिए। वरूथिनी एकादशी (Varuthini ekadashi ke din kya karna chahie) के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। सच्चे मन से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें। पीले फल, मिठाई और तुलसी के पत्ते का भोग लगाएं। अन्न और धन समेत आदि चीजों का दान करना चाहिए। वरूथिनी एकादशी के दिन क्या न करें? तुलसी- तुलसी की पत्तियां विष्णु भगवान को बेहद प्रिय हैं, Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye जिसके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए वरूथिनी एकादशी के दिन तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन तुलसी जी व्रत रखती हैं। इसलिए इन्हें स्पर्श करने से बचना चाहिए। मास-मदिरा- वरूथिनी एकादशी के दिन मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं। काले वस्त्र- धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, वरूथिनी एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा दृष्टि बनाए रखने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। चावल- वरूथिनी एकादशी के दिन चावल का सेवन करने की मनाही है। मान्यता है वरूथिनी एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है। वरूथिनी एकादशी 2025 डेट और शुभ मुहूर्त (Varuthini Ekadashi 2025 Date and Shubh Muhurat) Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 23 अप्रैल को शाम 04 बजकर 43 मिनट से शुरू होगी और 24 अप्रैल को दोपहर 02 बजकर 32 मिनट पर तिथि खत्म होगी। ऐसे में वरूथिनी एकादशी व्रत 24 अप्रैल को किया जाएगा। वरूथिनी एकादशी पूजा विधि (Varuthini Ekadashi Puja Vidhi) Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye:विष्णु मंत्र 1. शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥2. दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया, लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।। वरूथिनी एकादशी 2025 पारण टाइम (Varuthini Ekadashi 2025 Paran time) Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है। वरूथिनी एकादशी का व्रत का पारण 25 अप्रैल को किया जाएगा। Varuthini Ekadashi Per Kya Karna Chahiye इस दिन व्रत पारण का टाइम सुबह 05 बजकर 46 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 23 मिनट तक है। व्रत का पारण करने के बाद विशेष चीजों का दान भी जरूर करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वादशी तिथि दान करने से एकादशी व्रत का पूरा फल मिलता है।

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Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती 2025: तिथि, महत्व

Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती महान भारतीय दार्शनिक और आध्यात्मिक सुधारक  जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के जन्म की याद में मनाई जाती है , जिन्होंने 8वीं शताब्दी के दौरान अद्वैत वेदांत को पुनर्जीवित किया और हिंदू दर्शन को एकीकृत किया। उनकी शिक्षाएँ भारतीय विचार, आध्यात्मिकता और संस्कृति को प्रभावित करती रहती हैं। 2025 में भारत इस पूज्य संत की 1237वीं जयंती मनाएगा जिन्होंने धर्म और आध्यात्मिक एकता स्थापित करने के लिए पूरे देश का भ्रमण किया था। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती 2025: तिथि और तिथि दिनांक : शुक्रवार, 2 मई 2025 तिथि : पंचमी तिथि , शुक्ल पक्ष , वैशाख मास पंचमी तिथि आरंभ : 1 मई 2025 को सुबह 11:23 बजे से पंचमी तिथि समाप्त : 2 मई 2025 को सुबह 09:14 बजे आदि शंकराचार्य की जीवन गाथा आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) के माता-पिता भगवान शिव के उपासक थे। एक बार भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तभी शंकराचार्य के पिता ने भगवान से एक ऐसे पुत्र का वरदान मांगा, जो सर्वज्ञानी हो और सतायु हो। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai तब भगवान शिव वे कहा कि तुम्हारा बालक या तो सर्वज्ञ हो सकता है, या फिर सतायु। दोनों नहीं हो सकता। तब शंकराचार्य (adi shankaracharya) के पिता ने सर्वज्ञ संतान का वरदान मांगा। भगवान के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम शंकर रखा गया। जब वह तीन वर्ष के थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई थी। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai बालक शंकर ही अपनी बुद्धिमत्ता के कारण आगे जाकर शंकराचार्य कहलाए। बालक शंकर का रूझान संन्यासी बनने की तरफ था। लेकिन इसको लेकर माता राजी नहीं थी। तभी एक दिन नदी में नहाते समय एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया, इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्यजी ने अपने मां से कहा कि, माँ मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे दीजिए, नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जाएगा। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत उन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी। फिर, उन्होंने दुनिया को प्रसिद्ध किया और अपने जीवन पथ पर चले गए। शंकराचार्य ने 16 और 32 वर्ष की आयु के बीच पूरे भारत की यात्रा की। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai उन्होंने यात्रा के दौरान वेदों के संदेशों को लोगों तक पहुंचाया। लोगों को हिंदू धर्म के प्रति जागरूक किया, हमारे ग्रंथों के बारे में लोगों को अवगत कराया। शंकराचार्य जी की शिक्षाएं आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) के कार्य आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) एक अभूतपूर्व कवि थे Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai और उन्होंने अपने हृदय में एक अति प्रेम के साथ परमात्मा को धारण किया। उनकी रचनाओं में 72 ध्यान और भक्तिपूर्ण भजन शामिल हैं। उनमें निर्वाण शाल्कम, सौंदर्य लहरी, मनीषा पंचकम और शिवानंद लहरी शामिल है। उन्होंने प्राथमिक ग्रंथों जैसे भगवद गीता, ब्रह्म सूत्र और 12 महत्वपूर्ण उपनिषदों पर 18 भाष्य भी लिखे हैं। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत दर्शन की मूल बातों पर एक विलक्षण या अविभाजित ब्रह्म के सत्य की व्याख्या करते हुए 23 पुस्तकें भी लिखीं। आत्म बोध, विवेक चूड़ामणि, उपदेश सहस्री और वाक्य वृत्ति उनमें से कुछ हैं। आदि शंकराचार्य के उद्धरण आइए आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) द्वारा दिए गए इन उद्धरणों के साथ उनकी जयंती मनाएं:- धन, सम्बन्ध, मित्र और यौवन पर अभिमान मत करो। पलक झपकते ही ये सब समय के साथ छीन लिया जाता है। इस मायावी संसार को त्याग कर परमात्मा को जानो और प्राप्त करो। किसी को मित्र या शत्रु, भाई या चचेरे भाई की दृष्टि से न देखें। मित्रता या शत्रुता के विचारों में अपनी मानसिक ऊर्जा को नष्ट न करें। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai सर्वत्र स्वयं को खोजते हुए, सबके प्रति मिलनसार और समान विचार वाले, सबके साथ समान व्यवहार वाले बनें । आसक्तियों और द्वेषों से भरे स्वप्न के समान जगत् जागरण तक सत्य प्रतीत होता है। यह जानते हुए कि मैं शरीर से भिन्न हूँ, Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai मुझे शरीर की उपेक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा वाहन है जिसका उपयोग मैं दुनिया के साथ लेन-देन करने के लिए करता हूं। यह वह मंदिर है जिसके भीतर शुद्ध आत्मा है। बंधनों से मुक्त होने के लिए बुद्धिमान व्यक्ति को एक-स्व और अहंकार-स्व के बीच भेदभाव का अभ्यास करना चाहिए। केवल उसी से आप स्वयं को शुद्ध सत्ता, चेतना और आनंद के रूप में पहचानते हुए आनंदमय जीवन जी सकते हैं। आनंद उन्हें ही मिलता है, जो आनंद की तलाश नहीं करते हैं। प्रत्येक वस्तु अपने स्वभाव की ओर बढ़ने लगती है। मैं हमेशा सुख की कामना करता हूं, Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai जो कि मेरा वास्तविक स्वरूप है। मेरा स्वभाव मेरे लिए कभी बोझ नहीं है। खुशी मेरे लिए कभी बोझ नहीं है, जबकि दुख है। मोती की मां में चांदी की उपस्थिति की तरह, दुनिया तब तक वास्तविक लगती है Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai जब तक कि आत्मा, अंतर्निहित वास्तविकता का एहसास नहीं हो जाता। शंकराचार्य जयंती का महत्व आदि शंकराचार्य की जयंती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है – यह भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण का उत्सव है । मुख्य महत्व: बौद्धिक जांच और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देता है । अद्वैत (आत्मा और ब्रह्म की एकता) के माध्यम से विविधता में एकता को सुदृढ़ करता है । वैदिक और उपनिषदिक ज्ञान को सरल रूप में पुनर्जीवित करता है । आदि शंकराचार्य की शिक्षाएँ 1. अद्वैत वेदांत “आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है।” 2. ब्रह्म सत्यं जगन मिथ्या “ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, संसार एक भ्रम है।” 3. आत्म-साक्षात्कार मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को कर्मकाण्डों से ऊपर उठकर आत्मसाक्षात्कार करना होगा। 4. अलगाव संसार में रहो, लेकिन अनासक्त रहो – भौतिकवाद की अपेक्षा ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करो। भारत भर में उत्सव केरल (कालडी) : मंदिर में जुलूस और वैदिक मंत्रोच्चार सहित भव्य आयोजन। कर्नाटक (श्रृंगेरी शारदा पीठम) : शारदा देवी और आचार्य पादुकाओं की औपचारिक पूजा। उत्तराखंड (ज्योतिर्मठ) : हिमालय में जुलूस, आध्यात्मिक सभाएं और हवन। ओडिशा (पुरी गोवर्धन पीठ) और गुजरात (द्वारका) : मठों और जगन्नाथ मंदिर में अनुष्ठान। आदि शंकराचार्य की आधुनिक प्रासंगिकता आध्यात्मिकता के प्रति उनका तर्क-आधारित

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Sapne Me Mango Dekhna:बेहद ही शुभ समाचार का संकेत देता है आम का पेड़, सपने में दिखे आम का पेड़ तो खुशियां मनाने के लिए हो जाएं तैयार

Sapne Me Mango Dekhna:इंसान और उसके सपनों के बीच एक बहुत गहरा रिश्ता होता है. सपने आते क्यों हैं? इसका जवाब बहुत पेचीदा और गूढ़ है. हम सभी सपने देखते हैं, ये सपने हम खुली आंखों के साथ-साथ सोते हुए भी देखते हैं. खुली आंखों से सपने देखना असल में सोच-विचार होता है. जब हम किसी विषय पर विचार कर रहे होते हैं और हमारे मन में जो चीजें आती हैं, उन्हें खुली आंखों से सपने देखना कहा जाता है. जबकि सोते समय सपने देखना ही असली सपने कहलाते हैं और ये खुली आंखों से देखे गए सपनों से कई मायनों में अलग होते हैं. इस बात को ऐसे भा समझा जा सकता है कि खुली आंखों से आप अपने मन मुताबिक कुछ भी सोच सकते हैं जबकि सोते समय आने वाले सपनों पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता. कहने का सीधा मतलब ये है कि आप सोते समय अपने मन मुताबिक सपने नहीं देख सकते, ये कुछ भी हो सकते हैं. इंसान और सपनों के बीच है गहरा रिश्ता There is a deep relationship between humans and dreams इंसान और उसके सपनों के बीच एक बहुत गहरा रिश्ता होता है. सपने आते क्यों हैं? इसका जवाब बहुत पेचीदा और गूढ़ है. सपने का विश्लेषण करने का प्रयास करना जरूरी है, तभी हम इनके अर्थ और निहित उद्देश्यों को बेहतर समझ सकते हैं. फ्रॉयड आदि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों की मानें तो स्वप्न मानव मन की दबी हुई अतृप्त इच्छाओं का प्रकाशन है. जाग्रत अवस्था में जो इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पातीं हैं वे स्वप्न में साकार होकर मानसिक संतुष्टि व तृप्ति देती हैं. Sapne Me Mango Dekhna धर्म शास्त्र में स्वप्न की है विशिष्ट व्याख्या  भारतीय धर्म शास्त्रों में स्वप्नों को भविष्य दर्शन की भाषा मानते हुए उनकी विशिष्ट व्याख्या की गई है. सपनों के माध्यम से भविष्य के पूर्वाभास की घटनाएं फ्रायडवादी पाश्चात्य मनोविज्ञान को सिरे से खारिज कर देती हैं. Sapne Me Mango Dekhna दिलचस्प यह भी है कि प्राचीन ग्रीक कथाओं में भी स्वप्नों को देवताओं का संदेश माना गया है. शोधकर्ताओं के अनुसार मनोविज्ञान और अध्यात्म के समन्वित दृष्टिकोण से ही सपनों की पहेली को सुलझाया जा सकता है. शुभ समाचार का संकेत देता है सपने में दिखने वाला आम का पेड़ Mango tree seen in dream indicates good news स्वप्न शास्त्र के मुताबिक हम सोते हुए जो सपने देखते हैं, वे काफी खास होते हैं. Sapne Me Mango Dekhna ऐसे सपने हमें भविष्य के बारे में कई अहम संकेत देते हैं. इसी सिलसिले में आज हम आपके सपने में देखे जाने वाले आम के पेड़ के बारे में बताने जा रहे हैं. सपने में आम का पेड़ देखना कोई मामूली बात नहीं है. सपने में सभी लोगों को आम का पड़े नहीं दिखता है. यदि आप कभी अपने सपने में Sapne Me Mango Dekhna आम का पेड़ देखते हैं तो ये एक बेहद ही शुभ समाचार का संकेत देता है. ज्योतिषाचार्य राजेश शुक्ला जी के मुताबिक सपने में दिखने वाला आम का पेड़ संतान सुख का संकेत देता है. सोते समय यदि आपको आम का पेड़ दिखाई देता है तो समझिए आप जल्द ही मां या पिता बनने वाले हैं. सपने में आम का पेड़ देखने का क्या मतलब होता है? What does it mean to see a mango tree in a dream? यदि आप कभी अपने सपने में आम का पेड़ देखते हैं Sapne Me Mango Dekhna तो ये एक बेहद ही शुभ समाचार का संकेत देता है. जानकारों के मुताबिक, सपने में दिखने वाला आम का पेड़ संतान सुख का संकेत देता है. सोते समय यदि आपको आम का पेड़ दिखाई देता है तो समझिए आप जल्द ही मां या पिता बनने वाले हैं. सपने में कच्चा आम देखने का क्या मतलब होता है? What does it mean to see raw mango in a dream? अगर कोई शख्स अपने सपने में कच्चा आम देखता है Sapne Me Mango Dekhna तो उसका मतलब यह होता है कि आपको बहुत जल्द कोई सफलता मिलने वाली है. यह सपना बहुत शुभ माना जाता है. साथ ही यह सपना पुत्र प्राप्ति की ओर संकेत करता है. सपने में पका आम देखने का क्या मतलब होता है? What does it mean to see ripe mango in a dream? अगर कोई सपने में पका हुआ आम देखता है. तो यह भी एक शुभ सपना माना जाता है. माना जाता है, कि सपने में पका हुआ आम देखना सकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है. अर्थात अगर कोई ऐसा कार्य कर रहे हैं सपने में फल देखने का क्या मतलब होता है? What does it mean to see fruits in a dream? सपने में फलों का दिखना सुख समृद्धि और धन वैभव से जोड़कर देखा जाता है. Sapne Me Mango Dekhna यह आपकी लाइफ में गुडलक और खुशियों के आने का सूचक माना जाता है. सपने में फलों का दिखना आपकी आर्थिक स्थिति के सुखद होने का संकेत देता है. What does it mean to dream of yourself climbing a tree? सपने में खुद को पेड़ पर चढ़ते हुए देखने का क्या मतलब है? ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सपने में सामान्य अवस्था में रोता है, Sapne Me Mango Dekhna उसे जीवन में जल्द ही कुछ बड़ी उपलब्धि हासिल होती है. अगर आप सपने में खुद को किसी पहाड़ या किसी पेड़ पर चढ़ते हुए देखते हैं तो यह काफी शुभ माना जाता है. इस तरह के सपने दिखने का सीधा सा मतलब होता है कि करियर में आपको जल्द ही तरक्की मिलने वाली है.

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Vaishakh Purnima 2025 Mai Kab Hai:जानें कब है वैशाख पूर्णिमा? जानें इसका महत्व, व्रत और पूजा विधि |

Vaishakh Purnima 2025: हिन्दू धर्म मे वैशाख पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व है। हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को वैशाख पू्णिमा मनाई जाती जाती है। और वैसाख पुर्णिमा को सत्य विनायक पुर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व बतलाया गया है। ऐसी मान्यता है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का तेइसवां अवतार महात्मा बुद्ध के रूप में हुआ था। इसलिए वैसाख पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध की जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। शास्त्रो के अनुसार बैसाख पर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा-पाठ आदि करने का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि वैसाख पूर्णिमा के दिन भगवान की पूजा आराधना करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। Vaishakh Purnima 2025 और उसके उलार भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान धर्मराज की पूजा करने का विधान है। इसलिए इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के बचपन के साथी सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे। तो भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सत्य विनायक पूर्णिमा व्रत करने का विधान बतलाया था। Vaishakh Purnima 2025 इसलिए वैसाख पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता दूर हो गयी। इसलिए वैशाख पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने के बाद व्रत और पुण्य कर्म करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आईये जानते है साल 2025 में वैशाख पूर्णिमा कब है ? 11 या 12 मई, जाने शुभ मुहूर्त, पूजा विधि महत्व और इस दिन किये जाने वाले उपाय Vaishakh Purnima 2025 वैशाख पूर्णिमा 2025 तिथि व मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार साल 2025 में वैशाख पूर्णिमा 12 मई को है। Vaishakh Purnima 2025 इस दिन पूर्णिमा उपवास रखा जायेगा। इस वर्ष वैशाख पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण भी लगेगा। तथा  साथ में भगवान बुद्ध जयंती भी वैशाख पूर्णिमा है।  12 मई 2025, सोमवार (वैशाख पूर्णिमा व्रत, वैशाख पूर्णिमा) पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 11 मई, रात 08:01 बजे से पूर्णिमा तिथि समाप्त – 12 मई, रात 10:25 बजे तक Keep Satya Vinayak fast on Vaishakh Purnima वैशाख पूर्णिमा पर रखें सत्य विनायक व्रत  वैशाख पूर्णिमा पर सत्य विनायक व्रत रखने का भी विधान है। मान्यता है कि इस दिन सत्य विनायक व्रत रखने से व्रती की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है। मान्यता है कि अपने पास मदद के लिये आये भगवान श्री कृष्ण ने अपने यार सुदामा (ब्राह्मण सुदामा) को भी इसी व्रत का विधान बताया था जिसके पश्चात उनकी गरीबी दूर हुई। Vaishakh Purnima 2025 वैशाख पूर्णिमा को धर्मराज की पूजा करने का विधान है मान्यता है कि धर्मराज सत्यविनायक व्रत से प्रसन्न होते हैं। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्रती को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता ऐसी मान्यता है। Vaishakh Purnima fast and worship method वैशाख पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि वैशाख पूर्णिमा के दिन अपने स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर ही स्नान करें।  तत्पश्चात साफ सुथरे वस्त्र धारण करके पूजा स्थल पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। फिर व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करें। एक साफ चौकीपर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।  प्रतिमा पर जलाभिषेक करें और भगवान श्रीहरि पर पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, चंदन, तुलसी, पंचामृत, फल आदि अर्पित करें।  इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने तिल के तेल का दीपक जलाएं और Vaishakh Purnima 2025 ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें। हो सके तो विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करें और आखिर में भगवान विष्णु की आरती गाएं। तत्पश्चात किसी योग्य ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा दान करना चाहिये। Vaishakh Purnima 2025 ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को भोजन करवाने के पश्चात ही स्वयं अन्न ग्रहण करना चाहिये। सामर्थ्य हो तो स्वर्णदान भी इस दिन करना चाहिये। रात्रि के समय दीप, धूप, पुष्प, अन्न, गुड़ आदि से पूर्ण चंद्रमा की पूजा करनी चाहिये और जल अर्पित करना चाहिये।

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Matangi Jayanti 2025 Mai Kab Hai : कब है मातंगी जयंती 2025 में, जाने डेट टाइम, पूजा शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व उपाय

Matangi Jayanti 2025: हिन्दू धर्म मे माता मातंगी जयंती का विशेष महत्व है। माता मातंगी दशमहाविद्याओ में से नौंवी महाविद्या है। हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के दिन माता मातंगी की जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि आज के दिन ही माता मातंगी का धरती पर प्राकट्य हुआ था। इस लिए आज के दिन माता मातंगी की जयंती पूरे हर्सोल्लास के साथ मनाई जाती है। माता को राजमातांगी, सुमुखी माताजी, उच्छिष्ट माताजी, वश्यमातांगी तथा कर्णमाताजी आदि नामो से जानी जाती है। माता मातंगी वाणी, संगीत और ज्ञान की अधिष्ठात्री मॉनी जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो कोई माता मातंगी का व्रत रखता है और सच्चे मन से पूजा अर्चना करता है तो उसके दांपत्य जीवन को सुखी एवं समृद्ध होने का आशीर्वाद प्रदान करती है। Matangi Jayanti 2025 और गृहस्थ जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं। मां मातंगी की पूजा करने से व्यक्ति को वाणी, संगीत और कला में सिद्धि प्राप्त होती है। Matangi Jayanti 2025 उनकी कृपा से वशीकरण और आकर्षण शक्ति बढ़ती है। मान्यता है कि यह पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है। आइये जानते है साल 2025 में मातंगी जयंती कब मनाई जाएगी? 29 या 30 अप्रैल, जानिए पूजा शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किये जाने वाले उपाय 2025 में मातंगी जयंती कब है? When is Matangi Jayanti in 2025? Matangi Jayanti 2025 Date Time Muhurat: साल 2025 में बैसाख मास की शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि प्रारम्भ हो रही है 29 अप्रैल 2025 को शाम 05 बजकर 31 मिनट पर और तृतीया तिथि की समाप्ति होगी 30 अप्रैल 2025 को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर इसलिए इस तिथि के अनुसार मातंगी जयंती 30 अप्रैल 2025 दिन बुधवार को मनाई जाएगी। Matangi Jayanti Puja Method मातंगी जयंती पूजा विधि Matangi Jayanti Puja Vidhi: मातंगी जयंती के दिन व्रती को सुबह जल्दी उठकर नित्य क्रिया से निवृत्र होकर स्नान आदि करके साफ व शुद्ध वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प ले। इसके बाद पूजस स्थल की अच्छे से साफ सफाई करके पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित करके गंगाजल से शुद्ध करे। इसके उस चौकी पर माता की मूर्ति या फ़ोटो स्थापित करे। Matangi Jayanti 2025 और माता के समक्ष धूप, दिप जलाए और माता को लाल फूल, अक्षत, आदि अर्पित करे। इसके बाद माता के इस मंत्र ‘ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा’ बोलते हुए जाप करें। Matangi Jayanti 2025 इसके बाद कथा पढे या फिर सुने और पूजा के अंत मे माता की आरती करके माता से मनोकामना पूर्ति की विनती करे। Matangi Jayanti Remedies मातंगी जयंती उपाय Matangi Jayanti Upay: मातंगी जयंती के दिन माता के करुणामयी रूप का ध्यान करते हुए 108 बिल्व पत्र और 108 ही कमल के पुष्प लेकर इन मंत्रों ॐ ही ऐं भगवती मतेंगश्वरी श्रीं स्वाहा। का उच्चारण करते हुए अर्पित करने से दांपत्य जीवन में चल रही हर समस्या से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा यदि आप के आर्थिक जीवन मे किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या आ रही है Matangi Jayanti 2025 तो माता मातंगी को अनार अर्पित करे और कमलगट्टे की लेकर इन ॐ हीं हीं हीं महा मातंगी प्रचिती दायिनी, लक्ष्मी दायिनी नमो नमः मंत्रो का जाप करने से आर्थिक संकटो से मुक्ति मिलती है। story of matangi jayanti:मातंगी जयंती की कहानी भगवान शिव के रूप में, देवी मातंगी अपने माथे पर एक अर्धचंद्राकार चंद्रमा पहनती हैं, और उनके अग्रभाग चारों दिशाओं की ओर निर्देशित होते हैं। इसलिए उन्हें वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है। Matangi Jayanti 2025 हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी मातंगी भी देवी सरस्वती का एक रूप है। ब्रह्मयाल के अनुसार मतंग नाम के एक मुनि ने कांडबवन में बहुत तपस्या और कठिनाइयाँ कीं, जिसके कारण उनकी आँखों से एक दिव्य और उज्ज्वल प्रकाश आया और उन्होंने एक महिला का रूप धारण किया। तब से, इस महिला को ऋषि मतंग की बेटी के रूप में माना जाता है और इस तरह इसे मातंगी के नाम से जाना जाने लगा। Importance of Matangi Jayanti:मातंगी जयंती का महत्व ऐसा माना जाता है कि देवी मातंगी की पूजा करने से भक्तों को जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं, Matangi Jayanti 2025 सभी भय और कष्टों से मुक्ति मिलती है और उनकी सभी मनोकामनाएं और इच्छाएं पूरी होती हैं। ललित कला, नृत्य और संगीत में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए भक्त देवी मातंगी की पूजा करते हैं। Rituals of Matangi Jayanti:मातंगी जयंती का अनुष्ठान इस दिन, भक्तों द्वारा देवी की पूजा करने के लिए मूर्ति को वेदी पर रखा जाता है। एक बार यह हो जाने के बाद, उन्होंने एक दीया जलाया और अनुष्ठान शुरू किया। भक्तों द्वारा पवित्र भोजन तैयार किया जाता है और फूल, नारियल और माला के साथ देवता को चढ़ाया जाता है। फिर भक्त आरती करते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं, बाद में भक्तों में प्रसाद वितरण किया जाता है।

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