विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र: (Vipareet Pratyangira Stotra) विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र माँ प्रत्यंगिरा भद्रकाली या महाकाली का ही एक विशाल रूप है। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र का गुप्त रूप से पाठ करने से बड़े-बड़े और प्रतिष्ठित लोगों में बड़ा अंतर आ जाता है। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र चाहे कितना भी बड़ा काम हो या कितना भी बड़ा शत्रु क्यों न हो, विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र के पाठ से सभी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र प्रत्यक्ष रूप से सामने आए शत्रु से निपटना आसान है, लेकिन हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु हैं जो मित्रवत होते हैं, विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र लेकिन वे पीठ पीछे बुराई करके हमें नुकसान पहुंचाते हैं विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र और ज्यादातर हमारी छवि खराब करते हैं, और हमारे परिवार के सदस्यों से बदला लेते हैं। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र के प्रयोग से न केवल शत्रुओं का नाश होता है बल्कि उनके परिवार के सदस्यों पर भी प्रभाव पड़ता है। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र की पहचान कभी-कभी भद्रकाली और सिद्धिलक्ष्मी से की जाती है। वैसे तो देवी की पूजा काली, कमलात्मिका, तारा, त्रिपुरसुंदरी आदि किसी एक रूप में करना कहीं अधिक अच्छा है। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र प्रत्यंगिरा साधना या विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र मुख्य रूप से काले जादू के आक्रमणों से बचने और अपने जीवन में समृद्धि लाने के लिए किया जाता है। यदि आपके शत्रु आपसे शत्रुता की भावना रखते हैं और बार-बार आप पर तांत्रिक आक्रमण करते हैं विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र या अन्य प्रकार के जादू-टोने करते हैं और विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र आर्थिक, शारीरिक नुकसान पहुंचाते हैं और विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र आपका भविष्य नष्ट कर रहे हैं, तो इस समय आप मां भद्रकाली के इस रूप की पूजा करें और शत्रु द्वारा किए गए किसी भी प्रकार के द्वेष, टोना-टोटका, यातना, रुमाल, घाव आदि को मां भगवती नष्ट कर देंगी। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र इतना ही नहीं, आप पर किए गए टोने-टोटके आदि के अनेक प्रयोग भी मां द्वारा दुगुनी तीव्रता से शत्रु पर लौटा दिए जाएंगे। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र कुछ अन्य प्रयोग भी शत्रु को लौटा देते हैं और विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र शत्रु की सारी शक्ति और आक्रमण को भी नष्ट कर देते हैं। Vipareet Pratyangira Stotra:विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र के लाभ विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र देवी प्रत्यंगिरा को बुलाने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र साधना यहां दी गई है। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र का प्रयोग ऐसे शत्रु के मन को नष्ट करने के लिए किया जाता है जो किसी निर्दोष और विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र असहाय व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान और विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र नुकसान पहुंचाने पर तुला हुआ हो। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र यह शत्रु की हानिकारक और विनाशकारी सोच को नष्ट करके और उसके मन को भ्रमित करके उसे भ्रमित करता है। Vipareet Pratyangira Stotra:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र शत्रुओं द्वारा किए गए टोने-टोटके, बुरी नजर, काले जादू से प्रभावित और अपने जीवन को परेशान करने वाले व्यक्तियों को विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र का पाठ किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करना चाहिए ताकि इसका तुरंत परिणाम मिल सके। विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र | Vipareet Pratyangira Stotra नमस्कार मन्त्रः- श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा-काल्यै नमः । ।। पूर्व-पीठिका-महेश्वर उवाच ।। श्रृणु देवि, महा-विद्यां, सर्व-सिद्धि-प्रदायिकां ।यस्याः विज्ञान-मात्रेण, शत्रु-वर्गाः लयं गताः ।। विपरीता महा-काली, सर्व-भूत-भयंकरी ।यस्याः प्रसंग-मात्रेण, कम्पते च जगत्-त्रयम् ।। न च शान्ति-प्रदः कोऽपि, परमेशो न चैव हि ।देवताः प्रलयं यान्ति, किं पुनर्मानवादयः ।। पठनाद्धारणाद्देवि, सृष्टि-संहारको भवेत् ।अभिचारादिकाः सर्वेया या साध्य-तमाः क्रियाः ।। स्मरेणन महा-काल्याः, नाशं जग्मुः सुरेश्वरि ।सिद्धि-विद्या महा काली, परत्रेह च मोदते ।। सप्त-लक्ष-महा-विद्याः, गोपिताः परमेश्वरि ।महा-काली महा-देवी, शंकरस्येष्ट-देवता ।। यस्याः प्रसाद-मात्रेण, पर-ब्रह्म महेश्वरः ।कृत्रिमादि-विषघ्ना सा, प्रलयाग्नि-निवर्तिका ।। त्वद्-भक्त-दशंनाद् देवि, कम्पमानो महेश्वरः ।यस्य निग्रह-मात्रेण, पृथिवी प्रलयं गता ।। दश-विद्याः सदा ज्ञाता, दश-द्वार-समाश्रिताः ।प्राची-द्वारे भुवनेशी, दक्षिणे कालिका तथा ।। नाक्षत्री पश्चिमे द्वारे, उत्तरे भैरवी तथा ।ऐशान्यां सततं देवि, प्रचण्ड-चण्डिका तथा ।। आग्नेय्यां बगला-देवी, रक्षः-कोणे मतंगिनी ।धूमावती च वायव्वे, अध-ऊर्ध्वे च सुन्दरी ।। सम्मुखे षोडशी देवी, सदा जाग्रत्-स्वरुपिणी ।वाम-भागे च देवेशि, महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।। अंश-रुपेण देवेशि, सर्वाः देव्यः प्रतिष्ठिताः ।महा-प्रत्यंगिरा सैव, विपरीता तथोदिता ।। महा-विष्णुर्यथा ज्ञातो, भुवनानां महेश्वरि ।कर्ता पाता च संहर्ता, सत्यं सत्यं वदामि ते ।। भुक्ति-मुक्ति-प्रदा देवी, महा-काली सुनिश्चिता ।वेद-शास्त्र-प्रगुप्ता सा, न दृश्या देवतैरपि ।। अनन्त-कोटि-सूर्याभा, सर्व-शत्रु-भयंकरी ।ध्यान-ज्ञान-विहीना सा, वेदान्तामृत-वर्षिणी ।। सर्व-मन्त्र-मयी काली, निगमागम-कारिणी ।निगमागम-कारी सा, महा-प्रलय-कारिणी ।। यस्या अंग-घर्म-लवा, सा गंगा परमोदिता ।महा-काली नगेन्द्रस्था, विपरीता महोदयाः ।। यत्र-यत्र प्रत्यंगिरा, तत्र काली प्रतिष्ठिता ।सदा स्मरण-मात्रेण, शत्रूणां निगमागमाः ।। नाशं जग्मुः नाशमायुः सत्यं सत्यं वदामि ते ।पर-ब्रह्म महा-देवि, पूजनैरीश्वरो भवेत् ।। शिव-कोटि-समो योगी, विष्णु-कोटि-समः स्थिरः ।सर्वैराराधिता सा वै, भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिनी ।। गुरु-मन्त्र-शतं जप्त्वा, श्वेत-सर्षपमानयेत् ।दश-दिशो विकिरेत् तान्, सर्व-शत्रु-क्षयाप्तये ।। भक्त-रक्षां शत्रु-नाशं, सा करोति च तत्क्षणात् ।ततस्तु पाठ-मात्रेण, शत्रुणां मारणं भवेत् ।। गुरु-मन्त्रः- “ॐ हूं स्फारय-स्फारय, मारय-मारय, शत्रु-वर्गान् नाशय-नाशय स्वाहा ।” विनियोगः- ॐ अस्य श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा-स्तोत्र-माला-मन्त्रस्य श्रीमहा-काल-भैरव ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा देवता, हूं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा-प्रसादात् सर्वत्र सर्वदा सर्व-विध-रक्षा-पूर्वक सर्व-शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त-फल-प्राप्त्यर्थे वा पाठे विनियोगः । ऋष्यादि-न्यासः- शिरसि श्रीमहा-काल-भैरव ऋषये नमः । मुखे त्रिष्टुप् छन्दसे नमः । हृदि श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा देवतायै नमः । गुह्ये हूं बीजाय नमः । पादयोः ह्रीं शक्तये नमः । नाभौ क्लीं कीलकाय नमः । सर्वांगे मम श्रीमहा-विपरीत-प्रत्यंगिरा-प्रसादात् सर्वत्र सर्वदा सर्व-विध-रक्षा-पूर्वक सर्व-शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त-फल-प्राप्त्यर्थे वा पाठे विनियोगाय नमः । कर-न्यासः- हूं ह्रीं क्लीं ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ तर्जनीभ्यां नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ मध्यमाभ्यां नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ अनामिकाभ्यां नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ कनिष्ठिकाभ्यां नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ कर-तल-द्वयोर्नमः । हृदयादि-न्यासः- हूं ह्रीं क्लीं ॐ हृदयाय नमः । हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिरसे स्वाहा । हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिखायै वषट्। हूं ह्रीं क्लीं ॐ कवचाय हुम् । हूं ह्रीं क्लीं ॐ नेत्र-त्रयाय वौषट् । हूं ह्रीं क्लीं ॐ अस्त्राय फट् । ।। मूल स्तोत्र-पाठ ।। ॐ नमो विपरीत-प्रत्यंगिरायै सहस्त्रानेक-कार्य-लोचनायै कोटि-विद्युज्जिह्वायै महा-व्याव्यापिन्यै संहार-रुपायै जन्म-शान्ति-कारिण्यै । मम स-परिवारकस्य भावि-भूत-भवच्छत्रून् स-दाराऽपत्यान् संहारय संहारय, महा-प्रभावं दर्शय दर्शय, हिलि हिलि, किलि किलि, मिलि मिलि, चिलि चिलि, भूरि भूरि, विद्युज्जिह्वे, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, ध्वंसय ध्वंसय, प्रध्वंसय प्रध्वंसय, ग्रासय ग्रासय, पिब पिब, नाशय नाशय, त्रासय त्रासय, वित्रासय वित्रासय, मारय मारय, विमारय विमारय, भ्रामय भ्रामय, विभ्रामय विभ्रामय, द्रावय द्रावय, विद्रावय विद्रावय हूं हूं फट् स्वाहा ।। २४ ।। हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत-प्रत्यंगिरे, हूं लं ह्रीं लं क्लीं लं ॐ लं फट् फट् स्वाहा । हूं लं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत-प्रत्यंगिरे।