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Ekadanta Stuti Naradamunikrita: नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः

Ekadanta Stuti Naradamunikrita: नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥नारद उवाच ।नमामि गणनाथं तं सर्वविघ्नविनाशिनम् ।वेदान्तागोचरं तज्ज्ञैर्गम्यं ब्रह्मैव संस्थितम् ॥ ४०॥मनोवाणीविहीनं नो मनोवाणीमयं न च ।ब्रह्मेशानं कथं स्तौमि सिद्धिबुद्धिपतिं परम् ॥ ४१॥त्वद्दर्शनेन हेरम्ब कृतकृत्योऽहमञ्जसा ।इत्युक्त्वा पूजयामास भक्तिभावसमन्वितः ॥ ४२॥पूजयित्वा गणेशानं पुनस्तुष्टाव नारदः ।रोमाञ्चितशरीरोऽसौ भावयुक्तो महामुनिः ॥ ४३॥नमो नमो गणेशाय विघ्नराजाय ते नमः ।भक्तानां विघ्नहन्त्रे चाभक्तानां विघ्नकारिणे ॥ ४४॥ अमेयमायया चैव संयुक्ताय नमो नमः ।योगरूपाय वै तुभ्यं योगिभ्यो मोहदाय ते ॥ ४५॥विनायकाय सर्वेश नमश्चिन्तामणे नमः ।अनन्तमहिमाधार नमस्ते चन्द्रमौलये ॥ ४६॥एकदन्ताय देवाय मायिभ्यो मोहदाय ते ।नमो नमः परेशाय परात्परतमाय ते ॥ ४७॥निर्गुणाय नमस्तुभ्यं गुणाकाराय साक्षिणे ।महाखुवाहनायैव मूषकध्वजधारिणे ॥ ४८॥अनादये नमस्तुभ्यं ज्येष्ठराजाय ढुण्ढये ।हर्त्रे कर्त्रे सदा पात्रे नानाभेदमयाय च ॥ ४९॥त्वद्दर्शनसुधापानाद्धतं मे भ्रान्तिजं महत् ।मरणं भिन्नभावाख्यं गणेशोऽहं कृतस्त्वया ॥ ५०॥न भिन्नं परिपश्यामि त्वदृते गणनायक ।शान्तिदं योगमासाद्य प्रसादात्ते न संशयः ॥ ५१॥भक्तिं देहि गणाधीश परां त्वत्पादपद्मयोः ।कुरु मां गाणपत्यं त्वं प्रेमयुक्तं च ते पदि ॥ ५२॥इत्युक्त्वा विररामाथ तं पुनर्गणपोऽवदत् ।मदीया भक्तिरत्यन्तं भविष्यति सदाऽचला ॥ ५३॥ (फलश्रुतिः)एकदन्त उवाच ।न योगाच्चलनं क्वापि भविष्यति महामुने ।सदा योगीन्द्रपूज्यस्त्वं सर्वमान्यो भविष्यसि ॥ ५४॥त्वया कृतमिदं स्तोत्रं शान्तियोगप्रदं भवेत् ।पठते श‍ृण्वते चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ ५५॥इत्युक्त्वा तस्य हृदये ययौ लीनो गजाननः ।सदा हृदि गणेशानं पश्यति स्म मुनिः स्वयम् ॥ ५६॥इत्याख्यानं नारदीयं कथितं ते प्रजापते ।श‍ृणुयाद्यः पठेद्वा यः सोऽपि सद्गतिमाप्नुयात् ॥ ५७॥ इति नारदमुनिकृता एकदन्तस्तुतिः सम्पूर्णा ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ३ । २.३ ४०-५७॥

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Shri Ashtavinayaka Stotram: श्री अष्टविनायकस्तोत्रम्

Shri Ashtavinayaka Stotram: श्री अष्टविनायकस्तोत्रम् स्वस्ति श्रीगणनायको गजमुखो मोरेश्वरः सिद्धिदः बल्लाळस्तु विनायकस्तथ मढे चिन्तामणिस्थेवरे ।लेण्याद्रौ गिरिजात्मजः सुवरदो विघ्नेश्वरश्चोझरे ग्रामे रांजणसंस्थितो गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥ इति अष्टविनायकस्तोत्रं सम्पूर्णम् । स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदं बल्लाळं मुरुडं विनायकं मढं चिन्तामणीस्थेवरम् ।लेण्याद्रिं गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरं ग्रामे रांजणसंस्थितं गणपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥

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haridrAgaNeshakavacham: हरिद्रागणेशकवचम्

haridrAgaNeshakavacham: हरिद्रागणेशकवचम् श्रीगणेशाय नमः ।ईश्वर उवाच ।श‍ृणु वक्ष्यामि कवचं सर्वसिद्धिकरं प्रिये ।पठित्वा पाठयित्वा च मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ १॥ अज्ञात्वा कवचं देवि गणेशस्य मनुं जपेत् ।सिद्धिर्नजायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ॥ २॥ ॐ आमोदश्च शिरः पातु प्रमोदश्च शिखोपरि ।सम्मोदो भ्रूयुगे पातु भ्रूमध्ये च गणाधिपः ॥ ३॥ गणाक्रीडो नेत्रयुग्मं नासायां गणनायकः ।गणक्रीडान्वितः पातु वदने सर्वसिद्धये ॥ ४॥ जिह्वायां सुमुखः पातु ग्रीवायां दुर्मुखः सदा ।विघ्नेशो हृदये पातु विघ्ननाथश्च वक्षसि ॥ ५॥ गणानां नायकः पातु बाहुयुग्मं सदा मम ।विघ्नकर्ता च ह्युदरे विघ्नहर्ता च लिङ्गके ॥ ६॥ गजवक्त्रः कटीदेशे haridrAgaNeshakavacham एकदन्तो नितम्बके ।लम्बोदरः सदा पातु गुह्यदेशे ममारुणः ॥ ७॥ व्यालयज्ञोपवीती मां पातु पादयुगे सदा ।जापकः सर्वदा पातु जानुजङ्घे गणाधिपः ॥ ८॥ हारिद्रः सर्वदा पातु सर्वाङ्गे गणनायकः ।य इदं प्रपठेन्नित्यं गणेशस्य महेश्वरि ॥ ९॥ कवचं सर्वसिद्धाख्यं सर्वविघ्नविनाशनम् ।सर्वसिद्धिकरं साक्षात्सर्वपापविमोचनम् ॥ १०॥ सर्वसम्पत्प्रदं साक्षात्सर्वदुःखविमोक्षणम् ।सर्वापत्तिप्रशमनं सर्वशत्रुक्षयङ्करम् ॥ ११॥ ग्रहपीडा ज्वरा रोगा ये चान्ये गुह्यकादयः ।पठनाद्धारणादेव नाशमायन्ति तत्क्षणात् ॥ १२॥ धनधान्यकरं देवि कवचं सुरपूजितम् ।समं नास्ति महेशानि त्रैलोक्ये कवचस्य च ॥ १३॥ हारिद्रस्य महादेवि विघ्नराजस्य भूतले ।किमन्यैरसदालापैर्यत्रायुर्व्ययतामियात् ॥ १४॥ ॥ इति विश्वसारतन्त्रे हरिद्रागणेशकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lalita Saptami 2025

Lalita Saptami 2025 Date: ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि !

Lalita Saptami 2025 Date:ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Lalita Saptami 2025: हिंदू धर्म में भाद्रपद मास का विशेष महत्व है, क्योंकि इस माह में जन्माष्टमी, राधा अष्टमी और गणेश उत्सव जैसे कई प्रमुख त्योहार आते हैं। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है ललिता सप्तमी, जो श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। ललिता देवी, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की प्रिय सखी थीं। Lalita Saptami 2025 यह व्रत सुख, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं साल 2025 में ललिता सप्तमी कब है, इसका महत्व क्या है और पूजा की सही विधि क्या है। ललिता सप्तमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Lalita Saptami 2025 Date and Muhurat) हर साल ललिता सप्तमी, Lalita Saptami 2025 राधाष्टमी से ठीक एक दिन पहले भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। • ललिता सप्तमी 2025 की तिथि: इस वर्ष ललिता सप्तमी का पावन पर्व 30 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। • सप्तमी तिथि का आरंभ: 29 अगस्त 2025, शुक्रवार को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। • सप्तमी तिथि का समापन: 30 अगस्त 2025, शनिवार को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। • ललिता/संतान सप्तमी की पूजा दोपहर में करने का विधान है। ललिता सप्तमी का महत्व (Significance of Lalita Saptami) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी का त्योहार श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं – श्री राधा, श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री चंपकलता, श्री रंग देवी, श्री सुदेवी और श्री तुंगविद्या। इन सभी सखियों में से नंदलाल श्री राधा जी और ललिता जी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। देवी ललिता को राधा जी के प्रति सबसे समर्पित गोपी माना गया है और राधा व कृष्ण के प्रेम और रासलीला में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। मान्यता है कि ललिता सप्तमी का व्रत और पूजा करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Lalita Saptami 2025 इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं। नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा, यह व्रत संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी रखा जाता है। ललिता सप्तमी पूजा विधि (Lalita Saptami Puja Vidhi) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर श्री ललिता देवी, राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखें: 1. स्नान और ध्यान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। 2. देवताओं की स्थापना: इसके बाद, देवी ललिता देवी, राधा-कृष्ण या शालिग्राम की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। आप गणेश जी, देवी पार्वती, देवी षष्ठी, कार्तिक और शिव की भी पूजा कर सकते हैं। 3. सामग्री अर्पित करें: घी का दीपक जलाएँ और देवताओं को नारियल, चावल, हल्दी, चंदन, गुलाल, फूल और दूध प्रसाद के रूप में अर्पित करें। 4. भोग लगाएं: मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाना बेहद शुभ माना गया है। 5. धागा बांधें: पूजा क्षेत्र में एक लाल धागा या मौली रखें। प्रार्थना के बाद, इसे अपने दाहिने हाथ में पहनें। 6. अर्घ्य और प्रार्थना: अंत में, जल का अर्घ्य दें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 7. व्रत का पालन: उपवास सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक होता है, और दिन में केवल एक बार भोजन किया जाता है। 8. विशेष परिस्थितियों में: कामकाजी महिलाओं, पढ़ाई करने वालों और चिकित्सीय समस्याओं वाले लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए; उन्हें केवल प्रार्थना करनी चाहिए। 9. व्रत खोलना: अगले दिन सुबह प्रार्थना करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवताओं को चढ़ाए गए फल को प्रसाद के रूप में वितरित करें। ललिता सप्तमी व्रत कथा (Lalita Saptami Vrat Katha) ललिता सप्तमी से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ हैं: 1. राधा-कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं, जिनमें श्री राधा और श्री ललिता जी प्रमुख थीं। माना जाता है कि श्री कृष्ण इन दोनों से विशेष प्रेम करते थे। ललिता सप्तमी का व्रत श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री Lalita Saptami 2025 ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में लीन हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ललिता सप्तमी की पूजा करने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। 2. संतान सप्तमी (ललिता सप्तमी) की पौराणिक कथा: पौराणिक ग्रंथों में ऋषि लोमेश के मुख से संतान सप्तमी (जिसे ललिता सप्तमी भी कहा जाता है) की कथा सुनने को मिलती है। एक कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती (जो एक ब्राह्मण की पत्नी थी) दोनों में बहुत गहरा प्रेम था। Lalita Saptami 2025 एक बार वे सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं, जहाँ उन्होंने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ संतान सप्तमी का व्रत कर रही थीं। उन स्त्रियों से कथा सुनकर, चंद्रमुखी और रूपमती ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आकर वे दोनों इस बात को भूल गईं। कुछ समय बाद, दोनों की मृत्यु हो गई और उन्होंने पशु योनि में जन्म लिया। कई जन्मों के बाद, दोनों ने मनुष्य योनि में फिर से जन्म लिया। इस जन्म में चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी राजा की पत्नी बनीं और भूषणा ब्राह्मण की पत्नी थीं, और इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था। Lalita Saptami 2025 इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी, इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान से किया, जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए। लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण उसे भूषणा

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Mahalakshmi Vrat

Mahalakshmi Vrat 2025 date:लक्ष्मी व्रत 2025 कब है? पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

Mahalakshmi Vrat 2025: महालक्ष्मी व्रत 2025: आर्थिक संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि का अचूक उपाय Mahalakshmi Vrat: क्या आप आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं? क्या धन, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं? यदि ऐसा है, तो महालक्ष्मी व्रत आपके लिए एक बहुत ही कारगर और अचूक उपाय साबित हो सकता है। यह 16 दिवसीय व्रत धन और समृद्धि की देवी, माता महालक्ष्मी को समर्पित है, जिनके प्रताप से कंगाल भी धनवान बन जाता है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि। महालक्ष्मी व्रत का महत्व ( Significance of Mahalaxmi Vrat) महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि से आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि तक 16 दिनों तक मनाया जाता है। इन 16 दिनों में माता महालक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। Mahalakshmi Vrat मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती है, Mahalakshmi Vrat और उनके जीवन से सभी दुख-दर्द और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं। Mahalakshmi Vrat यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो धन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। महालक्ष्मी व्रत 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Mahalaxmi Vrat 2025 Date and Muhurat) इस साल, महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 31 अगस्त 2025 से होगी और इसका समापन 14 सितंबर 2025 को होगा। • भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि: 30 अगस्त 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी। • अष्टमी तिथि का समापन: अगले दिन 1 सितंबर 2025 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर होगा। • चंद्रोदय का समय: दोपहर 1 बजकर 11 मिनट। कुल मिलाकर यह व्रत 16 दिनों का होता है, जिसमें से संपूर्ण व्रत के दिन 15 होते हैं। महालक्ष्मी पूजा विधि (Mahalaxmi Puja Vidhi) महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधिवत रूप से करने पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाती हैं। पूजा करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें: 1. सबसे पहले, भगवान गणेश के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। 2. मां के सामने गुलाब और कमल के फूल, साड़ी, सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, बिछिया, धूप, दीप और फल अर्पित करें। 3. एक गुलाबी या लाल रंग का धागा लें, उसमें 16 गांठें लगाएं और उसकी भी पूजा करें। यह प्रक्रिया आपको 15 दिनों तक करनी है। 4. इसके बाद, महालक्ष्मी मंत्र का जाप करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 5. व्रत के अंतिम दिन (आश्विन कृष्ण अष्टमी), मां लक्ष्मी की मूर्ति का विसर्जन कर दें। Mahalakshmi Vrat आप चाहें तो मूर्ति को अपने पूजा घर में भी स्थापित कर सकते हैं। 6. जब व्रत पूरा हो जाए, तो वस्त्र से एक मंडप बनवाएं और उसमें लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें। 7. प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। 8. सोलह प्रकार से पूजा करें। 9. रात्रि के समय तारागणों को पृथ्वी के प्रति अर्घ्य दें और लक्ष्मी जी की प्रार्थना करें। 10. व्रत रखने वाली स्त्रियाँ ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उनसे हवन करवाएं। हवन में खीर की आहुति दें। 11. चंदन, ताल, पत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल और नाना प्रकार के पदार्थ नए सूप में सोलह-सोलह की संख्या में रखें। 12. फिर दूसरे नए सूप से ढक कर निम्न मंत्र को पढ़कर लक्ष्मीजी को समर्पित करें: क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा। व्रतेनाप्नेन सन्तुष्टा भवर्तोद्वापुबल्लभा।। 13. इसके बाद, चार ब्राह्मण और सोलह ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करें। फिर घर में बैठकर स्वयं भोजन करें। नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ अगर 16 दिन व्रत न रख पाएं तो क्या करें? (What if you can’t fast for 16 days?) यह व्रत धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है। यदि किसी कारणवश आप पूरे 15 दिन का व्रत नहीं रख पाते हैं, Mahalakshmi Vrat तो आप व्रत के शुरुआत के 3 दिन या फिर आखिर के 3 दिन भी व्रत रख सकते हैं। Mahalakshmi Vrat माना जाता है कि ऐसा करने से भी व्रत पूरा हो जाता है और आपको महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार जो भक्त विधि-विधान से महालक्ष्मी व्रत Mahalakshmi Vrat करते हैं, वे इस लोक में सभी सुखों का भोग करते हैं और बहुत काल तक लक्ष्मी लोक में भी सुख पाते हैं। तो, इस साल महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लें और अपने जीवन में धन, सुख और समृद्धि का आह्वान करें!

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Shri Krishnamangalam:कृष्णमङ्गलम् २ (मङ्गलं यादवेन्द्राय)

Shri Krishnamangalam: श्रीकृष्णमङ्गलम् मङ्गलं यादवेन्द्राय महनीयगुणाब्धये । (महनीयगुणात्मने) ।वसुदेवतनूजाय वासुदेवाय मङ्गलम् ॥ १॥ किरीटकुण्डलभ्राजदलकैर्यन्मुखश्रिये ।श्रीवत्सकौस्तुभोद्भासि वक्षसे चास्तु मङ्गलम् ॥ २॥ नीलाम्बुदनिकाशाय विद्युत्सदृशवाससे ।देवकीवसुदेवाभ्यां संस्तुतायास्तु मङ्गलम् ॥ ३॥ ताभ्यां सम्प्रार्थितायाथ प्राकृतार्भकरूपिणे ।यशोदाय गृहं पित्रा प्रापितायास्तु मङ्गलम् ॥ ४॥ पूतनाऽसुपयःपानपेशलायाऽसुरारिणे ।शकटासुर विध्वंसि पादपद्माय मङ्गलम् ॥ ५॥ यशोदाऽऽलोकिते स्वास्ये विश्वरूपप्रदर्शिने ।मायामानुषरूपाय माधवायास्तु मङ्गलम् ॥ ६॥ तृणावर्तदनूजासु हारिणे शुभकारिणे ।वत्सासुरप्रभेत्रे च वत्सपालाय मङ्गलम् ॥ ७॥ दामोदराय वीराय यमलार्जुनपातिने ।धात्रा हृतानां वत्सानां रूपधर्त्रेऽस्तु मङ्गलम् ॥ ८॥ ब्रह्मस्तुताय कृष्णाय कालीयफणनृत्यते ।दावाग्निरक्षिताशेष गोगोपालाय मङ्गलम् ॥ ९॥ गोवर्धनाचलोद्घर्त्रे गोपी क्रीडाभिलाषिणे ।अञ्जल्याऽऽहृतवस्त्राणां सुप्रीतायास्तु मङ्गलम् ॥ १०॥ सुदर्शनाख्य गन्धर्व शापमोक्षणकारिणे ।शङ्खचूडशिरोहर्त्रे वृषभघ्नाय मङ्गलम् ॥ ११॥ गान्दिनीसुतसन्दृष्ट दिव्यरूपाय शौरिणे ।त्रिवक्रया प्रार्थिताय सुन्दराङ्गाय मङ्गलम् ॥ १२॥ गन्धमाल्याम्बराढ्याय गजराजविमर्दिने ।चाणूरमुष्टिकप्राणहारिणे चास्तु मङ्गलम् ॥ १३॥ कंसहन्त्रे जरासन्धबलमर्दन कारिणे ।मथुरापुरवासाय महाधीराय मङ्गलम् ॥ १४॥ मुचुकुन्द महानन्ददायिने परमात्मने ।रुक्मिणी परिणेत्रे च सबलायास्तु मङ्गलम् ॥ १५॥ द्वारकापुरवासाय हारनूपुरधारिणे ।सत्यभामासमेताय नरकघ्नाय मङ्गलम् ॥ १६॥ बाणासुरकरच्छेत्रे भूतनाथस्तुताय च ।धर्माहूताय यागार्थं शर्मदायास्तु मङ्गलम् ॥ १७॥ कारयित्रे जरासन्धवधं भीमेन राजभिः ।मुक्तैः स्तुताय तत्पुत्र राज्यदायास्तु मङ्गलम् ॥ १८॥ चैद्यतेजोपहर्त्रे च पाण्डवप्रियकारिणे ।कुचेलाय महाभाग्यदायिने तेऽस्तु मङ्गलम् ॥ १९॥ देव्यष्टक समेताय पुत्रपौत्रयुताय च ।षोडशस्त्री सहस्रैस्तु संयुतायास्तु मङ्गलम् ॥ २०॥ यश्शिष्टरक्षणपरः करुणाम्बुराशिः दुष्टासुरांशनृपतीन् विनिगृह्य शूरान् ।कष्टां दशां अपनुदन्तरसा पृथिव्याः पुष्टिं ददातु स हरिः कुलदैवतं नः ॥ २१॥ ॥ इति श्रीकृष्णमङ्गलं सम्पूर्णम् ॥

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 Shri Krishnamangalam:कृष्णमङ्गलम् १ (मङ्गलं बालकृष्णाय)

Shri Krishnamangalam:श्रीकृष्णमङ्गलम् मङ्गलं बालकृष्णाय दिव्यलीलाय मङ्गलम् ।मङ्गलं नीलवर्णाय मातृमान्याय मङ्गलम् ॥ १॥ मङ्गलं रुक्मिणीशाय जगदीशाय मङ्गलम् ।मङ्गलं यदुनाथाय दीननाथाय मङ्गलम् ॥ २॥ मङ्गलं देवदेवाय वासुदेवाय मङ्गलम् ।मङ्गलं नन्दपुत्राय सदानन्दाय मङ्गलम् ॥ ३॥ मङ्गलं पूतनाहन्त्रे लीलामर्त्याय मङ्गलम् ।मङ्गल शकटच्छेत्रे पद्मपादाय मङ्गलम् ॥ ४॥ मङ्गलं वत्सपालाय विश्वपालाय मङ्गलम् ।मङ्गलं योगिमृग्याय गोपमित्राय मङ्गलम् ॥ ५॥ मङ्गलं बालगोपाय ब्रह्मविद्याय मङ्गलम् ।मङ्गलं कमलाभर्त्रे गोपीकान्ताय मङ्गलम् ॥ ६॥ मङ्गलं मातृबद्धाय जडघ्नायास्तु मङ्गलम् ।मङ्गलं क्रीडते स्त्रीभिः कुन्दारूढाय मङ्गलम् ॥ ७॥ मङ्गलं द्विषते क्रूरान् प्रियाक्रूराय मङ्गलम् ।मङ्गलं वल्लवीभर्ने कंसघ्नायास्तु मङ्गलम् ॥ ८॥ मङ्गलं प्रीतभक्ताय विद्यावासाय मङ्गलम् ।मङ्गलं मागधजिते द्वारकेशाय मङ्गलम् ॥ ९॥ मङ्गलं पार्थसुहृदे जितदैत्याय मङ्गलम् ।मङ्गलं रुक्मिणीजाने रुक्मिणीशाय मङ्गलम् ॥ १०॥ मङ्गलं नैकरूपाय नरदैत्याय मङ्गलम् ।पुत्रिणे नित्यरूपाय ब्रह्माचार्याय मङ्गलम् ॥ ११॥ मङ्गलं द्रौपदीड्याय मानदायास्तु मङ्गलम् ।मङ्गलं प्रियभक्ताय भक्तपालाय मङ्गलम् ॥ १२॥ मङ्गलं दिशते कामान् विप्रप्रार्थ्याय मङ्गलम् ।मङ्गलं शिष्टपालाय भारघ्नायास्तु मङ्गलम् ॥ १३॥ मङ्गलं मायिनेऽमायसारथ्यायास्तु मङ्गलम ।मङ्गलं पूर्णरूपाय गीताचार्याय मङ्गलम् ॥ १४॥ मङ्गलं विश्वरूपाय योगिध्येयाय मङ्गलम् ।मङ्गलं विश्वगुरवे कृपावासाय मङ्गलम् ॥ १५॥ मङ्गलं ज्ञानरूपाय सर्वाभिज्ञाय मङ्गलम् ।मङ्गलं सर्वशक्ताय महासत्त्वाय मङ्गलम् ॥ १६॥ मङ्गलं दिव्यवीर्याय माहेश्वर्याय मङ्गलम् ।मङ्गलं तेऽच्युता य सत्कुलत्राणाय मङ्गलम् ॥ १७॥ इति श्रीकृष्णमङ्गलं सम्पूर्णम् ।

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Shri Krishna PrAtahsmarana Stotram: श्रीकृष्णप्रातःस्मरणस्तोत्रम्

Shri Krishna PrAtahsmarana Stotram: श्रीकृष्णप्रातःस्मरणस्तोत्रम् प्रातः स्मरामि युगकेलिरसाभिषिक्तं वृन्दावनं सुरमणीयमुदारवृक्षम् ।सौरीप्रवाहवृतमात्मगुणप्रकाशं युग्माङ्घ्रिरेणुकणिकाञ्चितसर्वसत्त्वम् ॥ १॥ प्रातः स्मरामि दधिघोषविनीतनिद्रं निद्रावसानरमणीयमुखानुरागम् ।उन्निद्रपद्मनयनं नवनीरदाभं हृदानवद्यललनाञ्चितवामभागम् ॥ २॥ प्रातर्भजामि शयनोत्थितयुग्मरूपं सर्वेश्वरं सुखकरं रसिकेशभूपम् ।अन्योन्यकेलिरसचिह्नसखीदृगौघं सख्यावृतं सुरतकाममनोहरं च ॥ ३॥ प्रातर्भजे सुरतसारपयोधिचिह्नं गण्डस्थलेन नयनेन च सन्दधानौ ।रत्याद्यशेषशुभदौ समुपेतकामौ श्रीराधिकावरपुरन्दरपुण्यपुञ्जौ ॥ ४॥ प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं युग्मस्वरूपमनिशं सुमनोहरं च ।लावण्यधाम ललनाभिरुपेयमानम् उत्थाप्यमानमनुमेयमशेषवेषैः ॥ ५॥ प्रातर्ब्रवीमि युगलावपि सोमराजौ राधामुकुन्दपशुपालसुतौ वरिष्ठौ ।गोविन्दचन्द्रवृषभानुसुतौ वरिष्ठौ सर्वेश्वरौ स्वजनपालनतत्परेशौ ॥ ६॥ प्रातर्नमामि युगलाङ्घ्रिसरोजकोशम् अष्टाङ्गयुक्तवपुषा भवदुःखदारम् ।वृन्दावने सुव्चरन्तमुदारचिह्नं लक्ष्म्याउरोजधृतकुङ्कुमरागपुष्टम् ॥ ७॥ प्रातर्नमामि वृषभानुसुतापदाब्जं नेत्रालिभिः परिणुतं व्रजसुन्दरीणाम् ।प्रेमातुरेण हरिणा सुविशारदेन श्रीमद्व्रजेशतनयेन सदाभिवन्द्यम् ॥ ८॥ सञ्चितनीयमनुमृत्यमभीष्टदोहं संसारतापशमनं चरणं महार्हम् ।नन्दात्मजस्य सततं मनसा गिरा च संसेवयामि वपुषा प्रणयेन रम्यम् ॥ ९॥ प्रातः स्तवमिमं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।सर्वकालं क्रियास्तस्य सफलाः स्युः सदा ध्रुवाः ॥ १०॥ इति श्रीनिम्बार्काचार्यविरचितं श्रीकृष्णप्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत्

Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत् निरञ्जनो निराख्यातो निर्विकल्पो नमो नमः ।पूर्णानन्दो हरिर्मायारहित पुरुषोत्तमः ॥ अष्टावष्टसहस्रे द्वे स्त्रियो जायन्ते पुरुषोत्तमात् । स्मृतिर्जायतेपुरुषोत्तमात् । षट्च्छास्त्राणि जायन्ते पुरुषोत्तमात् । छन्दोजायते पुरुषोत्तमात् । निगमो जायते पुरुषोत्तमात् । प्रजापतिर्जायतेपुरुषोत्तमात् । शशिरवी जायेते पुरुषोत्तमात् । सकलतीर्थानि जायन्तेपुरुषोत्तमात् । परशिवशक्तिर्जायते पुरुषोत्तमात् । ऋषयोऽनृषयोजायन्ते पुरुषोत्तमात् । इन्द्रो जायते पुरुषोत्तमात् । द्वादशादित्यारुद्राः सर्वा देवता ज्जयन्ते पुरुषोत्तमात् । देवा जायन्ते पुरुषोत्तमात् ।सप्त सागरा जायन्ते पुरुषोत्तमात् । सर्व आत्मा जायते पुरुषोत्तमात् ।मनःसर्वेन्द्रियाणि जायन्ते पुरुषोत्तमात् । अष्टादश ब्रह्माण्डानि जायन्तेपुरुषोत्तमात् । अष्टसिद्धिनवनिधयो जायन्ते पुरुषोत्तमात् । वनभाराअष्टादश जायन्ते पुरुषोत्तमात् । अमृतो जायते पुरुषोत्तमात् । अम्भोजायते पुरुषोत्तमात् ॥ ॐ निगमं शङ्करोऽब्रवीत् । गौः । ग्मा । ज्मा । क्ष्मा । क्षा । क्षमा ।क्षोणिः । क्षितिः । अवनिः । उर्वी । पृथ्वी । मही । रिपः । अदितिः ।इला । जीवामकालाशूता (९) “जीवामकालाशूता जीवः” इत्यारभ्य“पुष्प एवेदं सर्वम्” इत्येतत्पर्यन्तं अतीव विकला मातृकेतिसानुतापं यथास्थितं दीयते ऽजीवः जीवा अस्ताजीव्यामं सर्वमायुजीव्याप्तं (?) ।लोदङ्कञ्चनङ्कांञ्चानु अमृतं न भवति (?) पारमधाराणि (परमधर्माणि) जातवेदाः प्रोवाचैवेदं सर्वम् । शिवशक्तिपशुजीवोब्रह्मा भक्तः पशुवत् (?) । यन्नत्यादेव परं श्रत्को परशिवः अन्याअवतारातेहि व्यासवल्लश्रविठलेहरयस्तथा (?) । ललाटे ऊर्ध्वपुण्ड्रंमध्यच्छिद्रं चन्दनतिलकं शुभं हरिमन्दिरं मध्यपद्मंकण्ठेतुलसी शङ्खचक्रं गदा बाहुगोपीचन्दनचर्चनं परंगतिः जीवोत्तमस्य । ब्रह्मा शक्तिर्महादेवो जन्यते पुरुषोत्तमात् ।ॐ आपोऽमृतमर्त्यस्य मर्त्योऽपश्यत् यस्तु जन्यते पुरुषोत्तमात् ।अमृतात् प्राणाश्चाहो मम जायन्ते पुरुषोत्तमात् । मनसि निषण्णः श्रीप्राणायप्रज्ञानाय स्वराट् पुरुषोत्तमः । श्रीकृष्णभगवान् नारायणः परमात्मापुरुषोत्तमः त्रिगुणरहितः स्वयम् । कथम्? पुरुष एवेदं सर्वम् ॥ (वैष्णव-उपनिषदः) इति श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत् समाप्ता ।

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Daslakshan Parva

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व : आत्मशुद्धि और धर्म की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे आत्मा की शुद्धि और धर्म के दस मूल लक्षणों को आत्मसात करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर पर्युषण के तुरंत बाद शुरू होता है और लगातार 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान जैन अनुयायी आत्म-नियंत्रण, साधना, और तपस्या के माध्यम से अपने भीतर दिव्यता को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं। सुगंध दशै – Sugandh Dashain पर्व सुगंध दशै दिन जिनवर पूजै अति हरषाई,सुगंध देह तीर्थंकर पद की पावै शिव सुखदाई ॥ दिगंबर जैन धर्म में सुगंध दशमी का बहुत महत्‍व है। दसलक्षण पर्व के अंतर्गत भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आने वाली दशमी के दिन जैन समाज के सभी लोग सुगंध दशमी पर्व मनाते है। Daslakshan Parva इस व्रत को विधिपूर्वक करने से हमारे अशुभ कर्मों का क्षय होकर हमें पुण्‍यबंध, मोक्ष तथा उत्‍तम शरीर प्राप्ति होगी। सुगंध दशमी के दिन पांच पापों यानी हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्‍याग करें। सुगंध दशमी के दिन जैन समाज के भक्त जैन मंदिरों में जाकर चौबीस तीर्थंकरों को धूप अर्पित करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे भगवान! मैं आपके नाम का ध्यान धरकर मोक्ष प्राप्ति की कामना करता हूं। इससे वायुमंडल अत्यधिक सुगंधमय व स्‍वच्‍छ हो जाता है। दशमी के दिन खास तौर पर सभी मंदिरों में विशेष साज सज्जा के साथ आकर्षक मंडल विधान सजाएं जाते हैं तथा धर्म के बारे में समझाते हुए झांकियों का निर्माण किया जाता है। रात्रि को मदिरों में सुगंध दशमी कथा का वाचन भी किया जाता है। Daslakshan Parva सुगंध दशै को सुगंध दशमी, धूप दशमी तथा धूप दशै के नाम से भी जाना जाता है। सुगंध दशमी का अर्घ्यसुगंध दशमी को पर्व भादवा शुक्ल में,सब इन्द्रादिक देव आय मधि लोक में ।जिन अकृत्रिम धाम धूप खेवै तहां,हम भी पूजत आह्वान करिकै यहां ॥ क्षमा वाणी दिवस – Kshama Vani Diwas पर्युषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाता है। और उसके अगले दिन सभी व्यक्ति एक दूसरे से क्षमा माँगते हैं, यह दिन क्षमा दिवस के नाम से जाना जाता हैं। इसमें सभी जाने अनजाने होने वाली गलतियों के लिए सभी मनुष्य, जीव-जन्तुओ, पशु-पक्षियों से क्षमा मांगता हैं। क्षमा मांगना एवम करना यह दोनों ही धर्मो में श्रेष्ठ माने जाते हैं। Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व 2025 में लगभग 28 अगस्त से शुरू होकर 6–9 सितंबर तक चलेगा (अंतर हो सकता है परंपरा एवं पंचांग के अनुसार)। कृपया सुनिश्चित जानकारी के लिए अपने स्थानीय जैन मंदिर या पंचांग देखें।” गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि क्षमावाणी सन्देश:करबद्ध हैं नमनमित्र सखा सभी जीवंतहो अगर भूल कोई मुझसेतो क्षमाप्रार्थी हूँ मैं सबसेयह अनमोल भेंट देकर मुझेकृतज्ञ करे इस जीवन मैंउत्तम क्षमा दशलक्षण पर्व के दस धर्म लक्षण :Ten religious characteristics of Daslakshan Parva प्रत्येक दिन एक धर्म लक्षण को समर्पित होता है। Daslakshan Parva ये दस लक्षण आत्मा को निर्मल और पवित्र बनाने में सहायक माने जाते हैं पर्व का महत्व :importance of festival दसलक्षण पर्व का इस तरह होता है समापन Dasalakshan festival ends like this अनंत चतुर्दशी के दिन दसलक्षण पर्व Daslakshan Parva का समापन होता है और इस दिन शाम को मंदिर में सभी भक्त जन एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल में किये गए पाप और कटू वचन के लिए क्षमा याचना करते हैं। वह हर किसी से दिल से क्षमा मांगते हैं और एक-दूसरे से हाथ जोड कर व गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम कहते हैं, जिसका अर्थ है सबको क्षमा सबसे क्षमा। Daslakshan Parva यहां तक कि उस समय जो लोग उपस्थित नहीं थे, उनसे भी वह दूसरे दिन क्षमा याचना करते हैं। इस तरह दसलक्षण पर्व की समाप्ति होती है।

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Nuakhai

Nuakhai 2025 Date: नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ

Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ परिचय: नुआखाई (Nuakhai) केवल एक त्योहार नहीं है; यह पश्चिम ओडिशा की आत्मा है, जो कृषि समाज में प्रकृति, कृतज्ञता और एकता का प्रतीक है। ‘नुआ’ का अर्थ है नया और ‘खाई’ का अर्थ है खाना। यह नए चावल का त्योहार है, जहाँ किसान अपनी पहली फसल देवताओं को अर्पित करके आभार व्यक्त करते हैं। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। नुआखाई का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि नुआखाई Nuakhai वैदिक युग से जुड़ा हुआ है, जहाँ नए अन्न को अर्पित करने की परंपरा थी। प्राचीन समय में, राजा भी राज्य की एकता और समृद्धि के लिए इस पर्व को मनाते थे, Nuakhai जिससे यह एक बड़े सामाजिक पर्व के रूप में विकसित हुआ। Nuakhai पश्चिम ओडिशा के संबलपुर, बोलंगीर और कालाहांडी जैसे क्षेत्रों में यह एक महत्वपूर्ण सामूहिक उत्सव है। यह भोजन से कहीं बढ़कर, सम्मान और प्रेम का पर्व है, जहाँ मनुष्य प्रकृति और अपनी परंपराओं से जुड़ता है। नुआखाई 2025 की शुभ तिथि और मुहूर्त: नुआखाई के लिए शुभ मुहूर्त का निर्धारण ज्योतिषियों द्वारा किया जाता है। साल 2025 में, माँ समलेश्वरी को नए अन्न की पहली पेशकश के लिए नुआखाई का लग्न 28 अगस्त, गुरुवार को तय किया गया है। • तिथि: भाद्रव शुक्ल पक्ष पंचमी • शुभ मुहूर्त: सुबह 10 बजकर 33 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट के बीच। • लग्न: तुला लग्न, मीन राशि में। Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव Nuakhai नुआखाई यह मुहूर्त संबलपुर के ब्रह्मपुरा मंदिर परिसर में पंडित मंडली द्वारा निर्धारित किया गया था। निर्धारण के बाद, लग्न पत्र ब्रह्मपुरा मंदिर ट्रस्ट कमेटी के सदस्यों द्वारा मंदिर के पुजारियों को प्रदान किया गया, और फिर माँ समलेश्वरी को अर्पित किया गया। इस लग्न के अनुसार, सबसे पहले माँ समलेश्वरी को नया अन्न अर्पित किया जाएगा, जिसके बाद पूरे पश्चिम ओडिशा में नुआखाई मनाया जाएगा। नुआखाई के मुख्य अनुष्ठान और उत्सव: नुआखाई की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। घर की साफ-सफाई की जाती है, पारंपरिक व्यंजन जैसे पीठा बनाए जाते हैं, और नए कपड़े खरीदे जाते हैं। 1. पूजा और अन्न अर्पण (नवाखाई अनुकूल मुहूर्त): निर्धारित शुभ मुहूर्त पर, नया अन्न (नवान्न) सबसे पहले देवी समलेश्वरी सहित अन्य देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र क्षण होता है, जहाँ यह माना जाता है कि देवता इस शुभ क्षण में प्रसाद स्वीकार करते हैं और वर्ष भर समृद्धि बनी रहती है। 2. परिवार का मिलन: देवताओं को भोग लगाने और प्रार्थना करने के बाद, परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। यह परिवार के लिए एकजुट होने और बंधन का एक महत्वपूर्ण क्षण होता है। 3. नुआखाई जोहार (भेदघाट): प्रसाद ग्रहण करने के बाद, त्योहार का सामाजिक पहलू शुरू होता है, जिसे ‘नुआखाई जोहार’ या ‘भेदघाट’ कहा जाता है। लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं, दोस्तों और पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते हैं। बच्चे और युवा बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, जो सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। ओडिशा से बाहर भी नुआखाई: यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज की व्यस्त जीवनशैली में भी, नुआखाई की परंपरा को लोग संजो कर रखे हुए हैं। ओडिशा के बाहर, यहाँ तक कि विदेशों में भी, पश्चिम ओडिशा के लोग इस पर्व को मनाते हैं। भुवनेश्वर, बेंगलुरु, दिल्ली, या दुबई में भी लोग पारंपरिक संबलपुरी पोशाक पहनकर, संबलपुरी गीतों पर नाचकर, और ढोल-निशान बजाकर अपनी मिट्टी की खुशबू महसूस करने की कोशिश करते हैं। भले ही उनके पास धान के खेत न हों, लेकिन एकता, आनंद, और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना ही मुख्य है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि Nuakhai Kaise Manaya Jata:नुआखाई कैसे मनाया जाता है पश्चिमी ओडिशा की देवी, माँ समलेश्वरी को एक नई फसल या नबन्न का भोग लगाया जाता है। मुख्य पुजारी के आवास पर देवी के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है।देवी समलेश्वरी को नबन्न अर्पित करने के बाद, लोगों के बीच भोजन वितरित किया जाता है और वे इसे एक साथ खाते हैं। सभी रस्में पूरी करने के बाद, लोग स्वादिष्ट भोजन तैयार करते हैं और इस त्योहार को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।अनुष्ठान पहले क्षेत्र के देवता या ग्राम देवता के मंदिर में देखे जाते हैं। बाद में, लोग अपने-अपने घरों में पूजा करते हैं और अपने घरेलू देवता और हिंदू परंपरा में धन की देवी लक्ष्मी को अनुष्ठान करते हैं। इस दिन, परिवार के प्रत्येक सदस्य नए कपड़े पहनते हैं और वे एक दूसरे को बधाई देते हैं, स्नेह दिखाते हैं और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से आशीर्वाद लेते हैं। इस रस्म को Nuakhai नुआखाई जुहार के नाम से जाना जाता है।लोग रसकेली जैसे पारंपरिक संबलपुरी नृत्य गाते और करते हैं, नुआखाई त्योहार संबलपुरी संस्कृति का प्रतीक है और यह ओडिशा के लोगों को किसी के जीवन में कृषि के महत्व की याद दिलाता है। नुआखाई भारतीय राज्य ओडिशा में एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है। निष्कर्ष: नुआखाई सिर्फ नया चावल खाने का दिन नहीं है। Nuakhai यह वास्तव में बंधन का एक पर्व है – मिट्टी के साथ मनुष्य का बंधन, परिवार और समाज का बंधन, और अतीत के साथ वर्तमान का बंधन। यह कृतज्ञता और जीवन के उत्सव का एक विचारोत्तेजक त्योहार है। यह हमें उन मूल्यों को याद दिलाता है कि कैसे हम अपने लोगों और प्रकृति के साथ जुड़े रह सकते हैं, खासकर आधुनिक जीवन की दौड़-भाग में।

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Shri Krishnanamashtakam: श्रीकृष्णनामाष्टकम्

Shri Krishnanamashtakam: श्रीकृष्णनामाष्टकम् निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला द्युतिनीराजितपादपङ्कजान्त । अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि ॥ १॥ जय नामधेय मुनिवृन्दगेय हे जनरञ्जनाय परमाक्षराकृते । त्वमनादरादपि मनाग् उदीरितं निखिलोग्रतापपटलीं विलुम्पसि ॥ २॥ यदाभासोऽप्युद्यन् कवलितभवध्वान्तविभवो दृशं तत्त्वान्धानामपि दिशति भक्तिप्रणयिनीम् । जनस्तस्योदात्तं जगति भगवन्नामतरणे कृती ते निर्वक्तुं क इह महिमानं प्रभवति ॥ ३॥ यद् ब्रह्मसाक्षात्कृतिनिष्ठयापि विनाशमायाति विना न भोगैः । अपैति नाम स्फुरणेन तत् ते प्रारब्धकर्मेति विरौति वेदः ॥ ४॥ अघदमनयशोदानन्दनौ नन्दसूनो कमलनयनगोपीचन्द्रवृन्दावनेन्द्राः । प्रणतकरुणकृष्णावित्यनेकस्वरूपे त्वयि मम रतिरुच्चैर्वर्धतां नामधेय ॥ ५॥ वाच्यो वाचकमित्युदेति भवतो नाम स्वरूपद्वयं पूर्वस्मात् परमेव हन्त करुणा तत्रापि जानीमहे । यस्तस्मिन् विहितापराधनिवहः प्राणी समन्ताद् भवेद् आस्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदानन्दाम्बुधौ मज्जति ॥ ६॥ सूदिताश्रितजनार्तिराशये रम्यचिद्घनसुखस्वरूपिणे । नाम गोकुलमहोत्सवाय ते कृष्णपूर्णवपुषे नमो नमः ॥ ७॥ नारदवीणोज्जीवनसुधोर्मिनिर्यासमाधुरीपूर । त्वं कृष्णनाम कामं स्फुर मे रसने रसेन सदा ॥ ८॥ इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां श्रीनामाष्टकं सम्पूर्णम् ।

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