nAmAvali

Ekadantasharanagatistotram:एकदन्तशरणागतिस्तोत्रम्

Ekadantasharanagatistotram:एकदन्तशरणागतिस्तोत्रम्श्रीगणेशाय नमः । देवर्षय ऊचुः ।सदात्मरूपं सकलादिभूतममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम् ।अनादिमध्यान्तविहीनमेकं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १॥ अनन्तचिद्रूपमयं गणेशमभेदभेदादिविहीनमाद्यम् ।हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २॥ समाधिसंस्थं हृदि योगिनां यं प्रकाशरूपेण विभातमेतम् ।सदा निरालम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ३॥ स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तां प्रत्यक्षमायां विविधस्वरूपाम् ।स्ववीर्यकं तत्र ददाति यो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ४॥ त्वदीयवीर्येण समर्थभूतस्वमायया संरचितं च विश्वम् ।तुरीयकं ह्यात्मप्रतीतिसंज्ञं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ५॥ स्वदीयसत्ताधरमेकदन्तं गुणेश्वरं यं गुणबोधितारम् ।भजन्तमत्यन्तमजं त्रिसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ६॥ ततस्वया प्रेरितनादकेन सुषुप्तिसंज्ञं रचितं जगद्वै ।समानरूपं ह्युभयत्रसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ७॥ तदेव विश्वं कृपया प्रभूतं द्विभावमादौ तमसा विभान्तम् ।अनेकरूपं च तथैकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ८॥ ततस्त्वया प्रेरितकेन सृष्टं बभूव सूक्ष्मं जगदेकसंस्थम् ।सुसात्विकं स्वप्नमनन्तमाद्यं तमेकदन्तं शरण व्रजामः ॥ ९॥ तदेव स्वप्नं तपसा गणेश सुसिद्धरूपं विविधं बभूव ।सदैकरूपं कृपया च तेऽद्य तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १०॥ त्वदाज्ञया तेन त्वया हृदिस्थं तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम् ।विभिन्नजाग्रन्मयमप्रमेयं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ ११॥ तदेव जाग्रद्रजसा विभातं विलोकितं त्वत्कृपया स्मृतेन ।बभूव भिन्नं च सदैकरूपं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १२॥ सदेव सृष्ट्वा प्रकृतिस्वभावात्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम् ।धियः प्रदाता गणनाथ एकस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १३॥ त्वदाज्ञया भान्ति ग्रहाश्च सर्वे प्रकाशरूपाणि विभान्ति खे वै ॥ भ्रमन्ति नित्यं स्वविहारकार्यास्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १४॥ त्वदाज्ञया सृष्टिकरो विधाता त्वदाज्ञया पालक एव विष्णुः ।त्वदाज्ञया संहरको हरोऽपि तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १५॥ यदाज्ञया भूमिजलेऽत्र संस्थे यदाज्ञयापः प्रवहन्ति नद्यः ।स्वतीर्थसंस्थश्च कृतः समुद्रस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः॥ १६॥ यदाज्ञया देवगणा दिविस्था ददन्ति वै कर्मफलानि नित्यम् ।यदाज्ञया शैलगणाः स्थिरा वै तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १७॥ यदाज्ञया शेषधराधरो वै यदाज्ञया मोहप्रदश्च कामः ।यदाज्ञया कालधरोऽर्यमा च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १८॥ यदाज्ञया वाति विभाति वायुर्यदाज्ञयाग्निर्जठरादिसंस्थः ।यदाज्ञयेदं सचराचरं च तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ १९॥ यदन्तरे संस्थितमेकदन्तस्तदाज्ञया सर्वमिदं विभाति ।अनन्तरूपं हृदि बोधकं यस्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २०॥ सुयोगिनो योगबलेन साध्यं प्रकुर्वते कः स्तवनेन स्तौति ।अतः प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ॥ २१॥ गृत्समद उवाच ।एवं स्तुत्वा गणेशानं देवाः समुनयः प्रभुम् ॥ तूष्णीम्भावं प्रपद्यैव ननृतुर्हर्षसंयुताः ॥ २२॥ स तानुवाच प्रीतात्मा देवर्षीणां स्तवेन वै ॥ एकदन्तो महाभागो देवर्षीन् भक्तवत्सलः ॥ २३॥ एकदन्त उवाच ।स्तोत्रेणाऽहं प्रसन्नोऽस्मि सुराः सर्षिगणाः किल ।वरदं भो वृणुत वो दास्यामि मनसीप्सितम् ॥ २४॥ भवत्कृतं मदीयं यत्स्तोत्रं प्रीतिप्रदं च तत् ।भविष्यति न सन्देहः सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २५॥ यं यमिच्छति तं तं वै दास्यामि स्तोत्रपाठतः ।पुत्रपौत्रादिकं सर्वं कलत्रं धनधान्यकम् ॥ २६ ।गजाश्वादिकमत्यन्तं राज्यभोगादिकं ध्रुवम् ।भुक्तिं मुक्तिं च योगं वै लभते शान्तिदायकम् ॥ २७॥ मारणोच्चाटनादीनि राज्यबन्धादिकं च यत् ।पठतां श‍ृण्वतां नॄणां भवेच्च बन्धहीनताम् ॥ २८॥ एकविंशतिवारं यः श्लोकानेवैकविंशतीन् ।पठेच्च हृदि मां स्मृत्वा दिनानि त्वेकविंशतिः ॥ २९॥ न तस्य दुर्लभं किञ्चित्रिषु लोकेषु वै भवेत् ।असाध्यं साधयेन्मर्त्यः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३०॥ नित्यं यः पठति स्तोत्रं ब्रह्मभूतः स वै नरः ।तस्य दर्शनतः सर्वे देवाः पूता भवन्ति च ॥ ३१॥ इति श्रीमुद्गलपुराणे एकदन्तशरणागतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

Ekadantasharanagatistotram:एकदन्तशरणागतिस्तोत्रम् Read More »

Dead in Dreams

Dead in Dreams:सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य

Dead in Dreams: सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य परिचय: हम सभी सपने देखते हैं, और कई बार ये इतने वास्तविक लगते हैं कि हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि इनका अर्थ क्या है। स्वप्न शास्त्र (Dream Interpretation) में सपनों में दिखने वाली हर चीज़ की व्याख्या की गई है। खास तौर पर, जब सपने में मृत व्यक्ति (deceased person) नज़र आते हैं, तो वे हमें भविष्य से जुड़े कई गहरे संकेत देते हैं। Dead in Dreams हमारे चाहने वाले, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, कभी-कभी सपनों के माध्यम से हमसे कुछ कहने की कोशिश करते हैं। आइए, स्वप्न शास्त्र के अनुसार जानते हैं कि सपने में मृत लोगों का दिखना शुभ है या अशुभ और इन सपनों का क्या मतलब हो सकता है। Why do dead people appear in dreams: सपने में मृत व्यक्ति क्यों दिखते हैं? मृत व्यक्तियों का सपने में आना कई कारणों से हो सकता है: 1. मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Reasons): मरे हुए लोगों की यादें और उनके साथ बीती बातें हमें अक्सर याद आती रहती हैं। यदि किसी की मृत्यु से हमें बहुत दुःख हुआ है और हम उसके बारे में सोचते रहते हैं, तो वह व्यक्ति सपने में आने लगता है। 2. आध्यात्मिक कारण (Spiritual Reasons): ऐसा माना जाता है कि यदि किसी की मृत्यु समय से पहले हो जाती है, तो वह अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के संकेत देने के लिए सपने में आता है। ऐसे में वे सपने में आपकी मदद की अपेक्षा रखते हैं। सपने में मृत व्यक्तियों के दिखने के शुभ संकेत (Positive Signs): कुछ सपने ऐसे होते हैं जब मृत व्यक्ति का दिखना शुभ माना जाता है: स्वस्थ और खुश दिखना: यदि कोई करीबी सदस्य बीमारी के कारण मरा हो, लेकिन वह आपको सपने में बिल्कुल स्वस्थ और खुश दिखाई देता है, तो इसका अर्थ है कि उसका जन्म किसी अच्छे स्थान पर हो चुका है या वे जहाँ भी हैं, खुश हैं। Dead in Dreams यह सपना आपको उस व्यक्ति को भुलाकर जीवन में आगे बढ़ने का संकेत देता है और जीवन में खुशहाली लाता है। खुश या मुस्कुराते हुए दिखना: सपने में किसी मृत व्यक्ति का खुश नज़र आना शुभ संकेत देता है। Dead in Dreams यह दर्शाता है कि आपका आने वाला समय काफी शुभ रहेगा। रोते हुए दिखना: मृत व्यक्ति का सपने में रोते हुए दिखना भी शुभ होता है। ऐसे में आपको लाभ होता है और आपकी मनोकामना पूरी होती है। आशीर्वाद देना: यदि मृत व्यक्ति सपने में आशीर्वाद दे रहा है, Dead in Dreams तो इसका मतलब आपको अपने किसी कार्य में बड़ी सफलता हासिल होने वाली है। आकाश में दूर दिखना: यदि मरा हुआ व्यक्ति बहुत दूर आकाश में दिखाई दे, तो इसका अर्थ है कि उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई है। सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने सपने में मृत व्यक्तियों के दिखने के अशुभ संकेत या चेतावनी (Negative Signs/Warnings): कुछ सपने चेतावनी या किसी अधूरी इच्छा की ओर इशारा करते हैं: खाने के लिए कुछ मांगना: मृत व्यक्ति का सपने में आकर खाने के लिए कुछ मांगना अशुभ होता है। ऐसा सपना आने पर आपको मंदिर में जाकर उस व्यक्ति की मनपसंद चीज़ का दान करना चाहिए जो सपने में आया है। गुस्से में या कुछ मांगते हुए दिखना: यदि मृत व्यक्ति सपने में गुस्से में दिखाई दे या आपसे कुछ मांग रहा हो, तो इसका मतलब है कि उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है, जिसे वह आपके माध्यम से पूरी कराना चाहता है। ऐसा सपना आने पर आत्मा की शांति के उपाय कर लेने चाहिए। बार-बार दिखना: यदि मृत व्यक्ति सपने में बार-बार दिखाई दे रहा है, तो इसका मतलब वह असंतुष्ट है। Dead in Dreams ऐसे में मृत व्यक्ति के परिवार वालों को किसी विशेषज्ञ की सलाह से उसकी आत्मा की शांति के उपाय करने चाहिए। शांत दिखना (गलत काम से रोकना): यदि मरा हुआ व्यक्ति सपने में शांत दिखाई दे, Dead in Dreams तो इसका मतलब आपको वो किसी गलत काम को करने से रोक रहा है। ऐसे में आपको तुरंत गलत राह छोड़ देनी चाहिए। बिना कपड़ों के, बिना जूते-चप्पल के या भूखा दिखना: अगर मृत व्यक्ति सपने में बिना कपड़ों के, बिना जूते-चप्पल के या फिर भूखा दिखाई दे, तो आपको वस्त्रों, खान-पान की वस्तुओं का और जूते-चप्पलों का दान कर देना चाहिए। निष्कर्ष: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, Dead in Dreams सपने में मृत व्यक्तियों का दिखना सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि अक्सर भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण संकेत लिए होता है। इन संकेतों को समझकर हम अपने जीवन में सही दिशा चुन सकते हैं या किसी अधूरी इच्छा को पूरा करने में मदद कर सकते हैं। यह जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है।

Dead in Dreams:सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य Read More »

Hartalika Teej

Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

Hartalika Teej: हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पावन व्रत मनाया जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन, सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले मां पार्वती ने ही हरतालिका तीज का व्रत रखकर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। हरतालिका तीज Hartalika Teej का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत रखने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होती हैं, साथ ही उन्हें मनचाहा वर भी मिलता है। Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम When is Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज 2025 कब है? इस साल हरतालिका तीज का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को रखा जाएगा। हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रातःकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त – सुबह 05:56 बजे से 08:31 बजे तक अवधि – 02 घंटे 35 मिनट पहला हरतालिका तीज का व्रत ससुराल में क्यों नहीं करना चाहिए? हरतालिका तीज का व्रत काफी नियमों के साथ किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान शुभ परिणाम को विपरीत परिणाम में बदल सकता है। हरतालिका तीज को लेकर लंबे समय से एक परंपरा चली आ रही है कि नवविवाहित कन्या के द्वारा यह व्रत अपने मायके में ही शुरू किया जाता है। तीज का पहला व्रत ससुराल से नहीं रखा जाता है। इस दौरान नवविवाहित कन्याएं अपने मायके आती हैं और भगवान भोलेनाथ की पूरे धूमधाम से पूजा-आराधना करती हैं। एक बार मायके से व्रत की शुरुआत करने के बाद, आप ससुराल में हों या मायके में, कहीं भी यह व्रत कर सकती हैं। हरतालिका तीज व्रत का रहस्य- बारहवें सतयुग की कथा Hartalika Teej Puja Method:हरतालिका तीज पूजा विधि हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर सभी देवी-देवताओं को धूप-दीप दिखाएं और व्रत का संकल्प लें। पूजा के दौरान, महिलाओं को मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनानी चाहिए। माता गौरी ने भी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर ही भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए, व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वे गंगा नदी या आसपास के किसी बहते हुए जलाशय से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं। हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा कर सकती हैं। इसके बाद, मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। Hartalika Teej हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें और सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और अखंड सौभाग्य की कामना करें। भगवान को भोग भी लगाएं। हरतालिका तीज पूजन सामग्री की सूची:List of Hartalika Teej puja materials मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए पूजा के दौरान इन सामग्री का विशेष ध्यान रखें: फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले का पत्ता। यह व्रत जीवन भर रखा जाता है, लेकिन अगर किसी कारणवश इसे रख पाना संभव न हो तो इसका उद्यापन अवश्य करना चाहिए। हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए। मिट्टी से बनानी चाहिए भोलेनाथ की प्रतिमा:Bholenath’s statue should be made of clay ज्योतिषाचार्य ने बताया कि तीज करने के दौरान महिलाओं को चाहिए कि वह मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं. उन्होंने बताया कि सबसे पहले माता गौरी ने हरतालिका तीज का व्रत रखा था और उन्होंने मिट्टी की ही प्रतिमा बनाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वह गंगा नदी या आसपास के किसी जलाशय जिसका पानी बह रहा हो वहां से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ के प्रतिमा बनाएं. हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा करती हैं. ऐसे में हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए.

Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम Read More »

nAmAvali

ShrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम्

shrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम् मूलाधारे सुयोन्याख्ये चिदग्निवरमण्डले ।समासीनं पराशक्तिविग्रहं गणनायकम् ॥ १॥ रक्तोत्पलसमप्रख्यं नीलमेघसमप्रभम् ।रत्नप्रभालसद्दीप्तमुकुटाञ्चितमस्तकम् ॥ २॥ करुणारससुधाधारास्रवदक्षित्रयान्वितम् ।अक्षिकुक्षिमहावक्षः गण्डशूकादिभूषणम् ॥ ३॥ पाशाङ्कुशेक्षुकोदण्डपञ्चबाणलसत्करम् ।नीलकान्तिघनीभूतनीलवाणीसुपार्श्वकम् ॥ ४॥ सुत्रिकोणाख्यनीलाङ्गरसास्वादनतत्परम् ।पत्न्यालिङ्गतवामाङ्गं सप्तमातृनिषेवितम् ॥ ५॥ ब्रह्मविष्णुमहेन्द्रादिसम्प्रपूजितपादुकम् ।महद्द्वयपदोवाच्यपादुकामन्त्रसारकम् ॥ ६॥ नवावरणयज्ञाख्य वरिवस्याविधिप्रियम् ।पञ्चावरणयज्ञाख्य विधिसम्पूज्यपादुकम् ॥ ७॥ अखण्डकोटिब्रह्माण्डामण्डलेश्वरमव्ययम् ।रदनाक्षरसम्पूर्णमन्त्रराजस्वरूपिणम् ॥ ८॥ गिरिव्याहृतिवर्णात्ममन्त्रतत्वप्रदर्शकम् ।अरुणारुणतनुच्छायमहाकामकलात्मकम् ॥ ९॥ महागोप्यमहाविद्या प्रकाशितकलेवरम् ।चिच्छिवं चिद्भवं शान्तं त्रिगुणादिविवर्जितम् ॥ १०॥ अष्टोत्तरशताभिख्यकलान्यासविधिप्रियम् ।चिदाकारमहाद्वीपमध्यवाससुविग्रहम् ॥ ११॥ चिदब्धिमथनोत्पन्नचित्सारघनविग्रहम् ।वाचामगोचरं शान्तं शुद्धचैतन्यरूपिणम् ॥ १२॥ मूलकन्दस्थचिद्देशनवताण्डवपण्डितम् ।षडम्बुरुहसंस्थायिपरचिव्द्योमभासुरम् ॥ १३॥ अकारादिक्षकारान्तवर्णलक्षितचित्सुखम् ।अकाराक्षरनिर्दिष्टप्रकाशमयविग्रहम् ॥ १४॥ हकाराख्यविमर्शात्मप्रभादीप्तजगत्त्रयम् ।महाहंसजपध्यानविधिज्ञातस्वरूपकम् ॥ १५॥ सदोदितमहाप्रज्ञाकारं संसारतारकम् ।मोक्षलक्ष्मीप्रदातारं कालातीतमहाप्रभुम् ॥ १६॥ नामरूपादिसम्भिन्ननित्यपूर्णचिदुत्तमम् ।प्रत्यग्भूतमहाप्रज्ञागात्रगोचरविग्रहम् ॥ १७॥ महाकुण्डलिनीरूपं षट्च्क्रनगरेश्वरम् ।अप्राकृतमहादिव्यचैतन्यात्मस्वरूपिणम् ॥ १८॥ नादबिन्दुकलातीतं कार्यकारणवर्जितम् ।षडम्बुरुहचक्रान्तः स्फुरत्सौदामिनीप्रभम् ॥ १९॥ तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थपरिबोधनपण्डितम् ।ब्रह्मादिकीटपर्यन्तव्याप्तसंवित्सुधारसम् ॥ २०॥ इच्छाज्ञानक्रियानन्दसर्वतन्त्र स्वतन्त्रिणम् ।हृदयग्रन्थिभिद्विद्यादर्शनोत्सुकमानसम् ॥ २१॥ पञ्चकृत्यपरेशानं महात्रैपुरविग्रहम् ।श्रीचक्रराजमध्यस्थशून्यग्राममहेश्वरम् ॥ २२॥ ब्रह्मविद्यास्वरूपश्रीललितारूपधारिणम् ।वशिन्याद्यावृतं साध्यं अद्वयानन्दवर्धनम् ॥ २३॥ आदिशङ्कररूपेशदक्षिणामूर्तिपूजितम् ।असंस्पृष्टमहाप्रज्ञाभिख्याद्वैतस्थितिप्रभम् ॥ २४॥ एवं सञ्चितयेद्देवं उच्छिष्टगणनायकम् ।नीलतारासमेतं तु सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥ २५॥

ShrI uchChiShTamahAgaNapati dhyAnam: श्रीउच्छिष्टमहागणपति ध्यानम् Read More »

nAmAvali

Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः

Uchchishta Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः श्री गणेशाय नमः ।देव्युवाच ।पूजान्ते ह्यनया स्तुत्या स्तुवीत गणनायकम् ।नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम् ।गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभवासनं च ॥ १॥ केयुरिणंहारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानि ।सृणिं च हस्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम् ॥ २॥ सृणिंवहन्तं षडक्षरात्मानमनल्पभूषं मुनीश्वरैर्भार्गवपूर्वकैश्च ।संसेवितं देवमनाथकल्पं रूपं मनोज्ञं शरणं प्रपद्ये ॥ ३॥ वेदान्तवेद्यं जगतामधीशं देवादिवन्द्यं सुकृतैकगम्यम् ।स्तम्बेरमास्यं ननु चन्द्रचूडं विनायकं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ४॥ नव चन्द्रचूडं भवाख्यदावानलदह्यमानं भक्तं स्वकीयं परिषिञ्चते यः ।गण्डस्रुताम्भोभिरनन्यतुल्यं वन्दे गणेशं च तमोऽरिनेत्रम् ॥ ५॥ तमालनीलम् शिवस्य मौलाववलोक्य चन्द्रं सुशुण्डया मुग्धतया स्वकीयम् ।भग्नं विषाणं परिभाव्य चित्ते आकृष्टचन्द्रो गणपोऽवतान्नः ॥ ६॥ पितुर्जटाजूटतटे सदैव भागीरथीं तत्र कुतूहलेन । विलोक्य भागीरथींविहर्तुकामः स महीध्रपुत्र्या निवारितः पातु सदा गजास्यः ॥ ७॥ लम्बोदरो देवकुमारसङ्घैः क्रीडन्कुमारं जितवान्निजेन ।करेण चोत्तोल्य ननर्त रम्यं दन्तावलास्यो भयतः स पायात् ॥ ८॥ आगत्य योच्चैर्हरिनाभिपद्मं ददर्श तत्राशु करेण तच्च ।उद्धर्तुमिच्छन्विधिवादवाक्यं मुमोच भूत्वा चतुरो गणेशः ॥ ९॥ विधिचाटुवाक्यंनिरन्तरं संस्कृतदानपट्टे लग्नां तु गुञ्जद्भ्रमरावलीं वै ।तं श्रोत्रतालैरपसारयन्तं स्मरेद्गजास्यं निजहृत्सरोजे ॥ १०॥ विश्वेशमौलिस्थितजह्नुकन्याजलं गृहीत्वा निजपुष्करेण ।हरं सलीलं पितरं स्वकीयं प्रपूजयन्हस्तिमुखः स पायात् ॥ ११॥ स्तम्बेरमास्यं घुसृणाङ्गरागं सिन्दूरपूरारुणकान्तकुम्भम् ।कुचन्दनाश्लिष्टकरं गणेशं ध्यायेत्स्वचित्ते सकलेष्टदं तम् ॥ १२॥ स भीष्ममातुर्निजपुष्करेण जलं समादाय कुचौ स्वमातुः ।प्रक्षालयामास षडास्यपीतौ स्वार्थं मुदेऽसौ कलभाननोऽस्तु ॥ १३॥ सिञ्चाम नागं शिशुभावमाप्तं केनापि सत्कारणतो धरित्र्याम् ।वक्तारमाद्यं नियमादिकानां लोकैकवन्द्यं प्रणमामि विघ्नम् ॥ १४॥ विघ्नं विघ्ननाशनमित्यर्थः आलिङ्गितं चारुरुचा मृगाक्ष्या सम्भोगलोलं मदविह्वलाङ्गम् ।विघ्नौघविध्वंसनसक्तमेकं नमामि कान्तं द्विरदाननं तम् ॥ १५॥ हेरम्ब उद्यद्रविकोटिकान्तः पञ्चाननेनापि विचुम्बितास्यः ।मुनीन्सुरान्भक्तजनांश्च सर्वान्स पातु रथ्यासु सदा गजास्यः ॥ १६॥ द्वैपायनोक्तानि स निश्चयेन स्वदन्तकोट्या निखिलं लिखित्वा । द्वैपायनोक्तं सुविचार्य येनदन्तं पुराणं शुभमिन्दुमौलिस्तपोभिरुग्रं मनसा स्मरामि ॥ १७॥ सुतमिन्दुमौलेस्तमग्र्यरूपं क्रीडातटान्ते जलधाविभास्ये वेलाजले लम्बपतिः प्रभीतः ।विचिन्त्य कस्येति सुरास्तदा तं विश्वेश्वरं वाग्भिरभिष्टुवन्ति ॥ १८॥ वाचां निमित्तं स निमित्तमाद्यं पदं त्रिलोक्यामददत्स्तुतीनाम् ।सर्वैश्च वन्द्यं न च तस्य वन्द्यः स्थाणोः परं रूपमसौ स पायात् ॥ १९॥ इमां स्तुतिं यः पठतीह भक्त्या समाहितप्रीतिरतीव शुद्धः ।संसेव्यते चेन्दिरया नितान्तं दारिद्र्यसङ्घं स विदारयेन्नः ॥ २०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे हरगौरीसंवादेउच्छिष्टगणेशस्तोत्रं समाप्तम् ॥ विनायकलीलास्तुतिः

Ganesha Stavarajah: उच्छिष्टगणेशस्तवराजः अथवा विनायकलीलास्तुतिः Read More »

Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Read More »

Durva Ashtami

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व Read More »

bhavAnIstuti

Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली

Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली ॐ अस्यश्री अम्बिकामहामन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः उष्णिक् छन्दःअम्बिका दुर्गा देवता ॥ [ श्रां – श्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत् ]ध्यानम्या सा पद्मासनस्था विपुलकटतटी पद्मपत्रायताक्षीगम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया ।लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैःनित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥ मन्त्रः – ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ ॥ ॥अथ श्री अम्बिकायाः नामावलिः ॥ ॐ अम्बिकायै नमः ।ॐ सिद्धेश्वर्यै नमः ।ॐ चतुराश्रमवाण्यै नमः ।ॐ ब्राह्मण्यै नमः ।ॐ क्षत्रियायै नमः ।ॐ वैश्यायै नमः ।ॐ शूद्रायै नमः ।ॐ वेदमार्गरतायै नमः ।ॐ वज्रायै नमः ।ॐ वेदविश्वविभागिन्यै नमः । १०ॐ अस्त्रशस्त्रमयायै नमः ।ॐ वीर्यवत्यै नमः ।ॐ वरशस्त्रधारिण्यै नमः । ॐ सुमेधसे नमः ।ॐ भद्रकाल्यै नमः ।ॐ अपराजितायै नमः ।ॐ गायत्र्यै नमः ।ॐ संकृत्यै नमः ।ॐ सन्ध्यायै नमः ।ॐ सावित्र्यै नमः । २०ॐ त्रिपदाश्रयायै नमः ।ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः ।ॐ त्रिपद्यै नमः ।ॐ धात्र्यै नमः ।ॐ सुपथायै नमः ।ॐ सामगायन्यै नमः ।ॐ पाञ्चाल्यै नमः ।ॐ कालिकायै नमः ।ॐ बालायै नमः ।ॐ बालक्रीडायै नमः । ३० ॐ सनातन्यै नमः ।ॐ गर्भाधारायै नमः ।ॐ आधारशून्यायै नमः ।ॐ जलाशयनिवासिन्यै नमः ।ॐ सुरारिघातिन्यै नमः ।ॐ कृत्यायै नमः ।ॐ पूतनायै नमः ।ॐ चरितोत्तमायै नमः ।ॐ लज्जारसवत्यै नमः ।ॐ नन्दायै नमः । ४०ॐ भवायै नमः ।ॐ पापनाशिन्यै नमः ।ॐ पीतम्बरधरायै नमः ।ॐ गीतसङ्गीतायै नमः ।ॐ गानगोचरायै नमः ।ॐ सप्तस्वरमयायै नमः ।ॐ षद्जमध्यमधैवतायै नमः ।ॐ मुख्यग्रामसंस्थितायै नमः ।ॐ स्वस्थायै नमः ।ॐ स्वस्थानवासिन्यै नमः । ५०ॐ आनन्दनादिन्यै नमः । ॐ प्रोतायै नमः ।ॐ प्रेतालयनिवासिन्यै नमः ।ॐ गीतनृत्यप्रियायै नमः ।ॐ कामिन्यै नमः ।ॐ तुष्टिदायिन्यै नमः ।ॐ पुष्टिदायै नमः ।ॐ निष्ठायै नमः ।ॐ सत्यप्रियायै नमः ।ॐ प्रज्ञायै नमः । ६०ॐ लोकेशायै नमः ।ॐ संशोभनायै नमः ।ॐ संविषयायै नमः ।ॐ ज्वालिन्यै नमः ।ॐ ज्वालायै नमः ।ॐ विमूर्त्यै नमः ।ॐ विषनाशिन्यै नमः ।ॐ विषनागदम्न्यै नमः ।ॐ कुरुकुल्लायै नमः । ॐ अमृतोद्भवायै नमः । ७०ॐ भूतभीतिहरायै नमः ।ॐ रक्षायै नमः ।ॐ राक्षस्यै नमः ।ॐ रात्र्यै नमः ।ॐ दीर्घनिद्रायै नमः ।ॐ दिवागतायै नमः ।ॐ चन्द्रिकायै नमः ।ॐ चन्द्रकान्त्यै नमः ।ॐ सूर्यकान्त्यै नमः ।ॐ निशाचरायै नमः । ८०ॐ डाकिन्यै नमः ।ॐ शाकिन्यै नमः ।ॐ हाकिन्यै नमः ।ॐ चक्रवासिन्यै नमः ।ॐ सीतायै नमः ।ॐ सीताप्रियायै नमः ।ॐ शान्तायै नमः ।ॐ सकलायै नमः ।ॐ वनदेवतायै नमः । ॐ गुरुरूपधारिण्यै नमः । ९०ॐ गोष्ठ्यै नमः ।ॐ मृत्युमारणायै नमः ।ॐ शारदायै नमः ।ॐ महामायायै नमः ।ॐ विनिद्रायै नमः ।ॐ चन्द्रधरायै नमः ।ॐ मृत्युविनाशिन्यै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलसङ्काशायै नमः ।ॐ चन्द्रमण्डलवर्तिन्यै नमः ।ॐ अणिमाद्यै नमः । १००ॐ गुणोपेतायै नमः ।ॐ कामरूपिण्यै नमः ।ॐ कान्त्यै नमः ।ॐ श्रद्धायै नमः ।ॐ पद्मपत्रायताक्ष्यै नमः ।ॐ पद्महस्तायै नमः ।ॐ पद्मासनस्थायै नमः ।ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः । १०८॥ॐ॥

Shri ambikAShTottarashatanAmAvalI: श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली Read More »

bhavAnIstuti

aparAdhakShamApaNastotram:अपराधक्षमापणस्तोत्रम्

aparAdhakShamApaNastotram: अपराधक्षमापणस्तोत्रम् ॐ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ १॥ सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २॥ अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ३॥ कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ ४॥ सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् ।अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम् ॥ ५॥ यदक्षरं परिभ्रष्टं मात्राहीनञ्च यद्भवेत् ।पूर्णं भवतु तत् सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥ ६॥ यदत्र पाठे जगदम्बिके मया विसर्गबिन्द्वक्षरहीनमीरितम् ।तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रसादतः सङ्कल्पसिद्धिश्व सदैव जायताम् ॥ ७॥ यन्मात्राबिन्दुबिन्दुद्वितयपदपदद्वन्द्ववर्णादिहीनंभक्त्याभक्त्यानुपूर्वं प्रसभकृतिवशात् व्यक्त्तमव्यक्त्तमम्ब ।मोहादज्ञानतो वा पठितमपठितं साम्प्रतं ते स्तवेऽस्मिन्तत् सर्वं साङ्गमास्तां भगवति वरदे त्वत्प्रसादात् प्रसीद ॥ ८॥ प्रसीद भगवत्यम्ब प्रसीद भक्तवत्सले ।प्रसादं कुरु मे देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ९॥ ॥ इति अपराधक्षमापणस्तोत्रं समाप्तम्॥

aparAdhakShamApaNastotram:अपराधक्षमापणस्तोत्रम् Read More »

bhavAnIstuti

Shri Chandika Stuti: श्रीचण्डिकास्तुतिः

Shri Chandika Stuti: श्रीचण्डिकास्तुतिः विविक्ततर-गोमती-जठर-मध्य-सिद्धाश्रमां पुरोगत-सरोवर-स्फुरदगाध-पाथश्छटाम् ।विशाल-तलतुङ्ग-भूलुलित-निम्बमूलालयां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ १॥ न लक्ष्य-घटनाश्रयां न च विशेष-वेश्मावहां घटानुकृति-गोमती-वहन-भाव्यमानास्पदाम् ।नमज्जन-मनोरथारचन-चारु-चिन्तामणिं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ २॥ निरन्तर-समुल्लसत्कमल-कीर्ण-पाथोजिनी- प्रतान-घनसम्पदा कमपि सम्मदं तन्वतीम् ।त्रिकोण-सरसीमयीं, परिणतिं पुरो बिभ्रतीं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ३॥ अनुग्रह-रसच्छटामिव सरःश्रियं यान्तिके विकासयति, पद्मिनीदल-सहस्रसन्दानिताम् ।प्रतिक्षण-समुन्मिषत्प्रमद-मेदुरां तामहं, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ४॥ प्रचण्डयति विक्रमं, झटिति खण्डयत्यापदः सुमण्डयति वाक्कलां, सदसि दण्डयत्युद्धतान् ।करण्डयति रोदसी, गुण-समृद्धिभिर्या हि तां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ५॥ श्रुताऽभिलषिता, मता, सुकलिता, समभ्यर्चिता सुधा-पृषत-वर्षिभिर्नवनवैर्वचोभिः स्तुता ।जयाय खलु कल्पते बहुविधादृता, तामहं भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ६॥ इतस्तत उदित्वर-व्रततिनद्ध-वृक्षावली- लुलद्विहग-मण्डली-मधुरराव-संसेविताम् ।स्खलत्कुसुम-सौरभ-प्रसर-पूर्यमाणाश्रमां भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ७॥ द्विषत्कुल-कृपाणिकां, कुटिलकाल-विध्वंसिकां, विपद्वन-कुठारिकां, त्रिविध-दुःख-निर्वासिकाम् ।कृपाकुसुम-वाटिकां, प्रणत-भारती-भासिकां, भजामि भयखण्डिकां सपदि चण्डिकामम्बिकाम् ॥ ८॥ ब्रह्माण्डाधिक-देहापि गोमती-तीर-चङ्क्रमा ।जयाय भजतां भूयाच्चण्डिका चण्ड-विक्रमा ॥ ९॥ इति दुर्गाप्रसादद्विवेदीविरचिता चण्डिकास्तुतिः समाप्ता ।

Shri Chandika Stuti: श्रीचण्डिकास्तुतिः Read More »

Love Dreams

Love Dreams: सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने

Love Dreams:स्वप्न शास्त्र: सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने! Love Dreams: क्या कभी आपको सपने में अपने प्रेमी या प्रेमिका दिखाई दिए हैं? अगर हाँ, तो आपने सोचा होगा कि इसका क्या मतलब हो सकता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हमारे सपने सिर्फ़ एक सामान्य घटना नहीं होते, बल्कि वे हमें हमारे भविष्य के बारे में शुभ या अशुभ संकेत दे सकते हैं. बहुत से लोग स्वप्न शास्त्र में लिखी बातों पर भरोसा करते हैं, जबकि कुछ इसे महज़ एक साधारण घटना समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं. हालांकि, Love Dreams ज्योतिष शास्त्र में भी सपनों को लेकर बहुत सी चीज़ों के बारे में बताया गया है. इस ब्लॉग पोस्ट में, हम जानेंगे कि सपने में अपने बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड को देखने का क्या मतलब हो सकता है, और यह किस अवस्था में देखा गया है, इस पर भी निर्भर करता है. सपने में प्रेमी या प्रेमिका का सामान्य रूप से दिखना: स्वप्न शास्त्र मानता है कि यदि सपने में आपको प्रेमी या प्रेमिका दिखाई देते हैं, Love Dreams तो इसका मतलब है कि आने वाले जीवन में आपके प्रेम प्रसंगों की शुरुआत होने वाली है. मुस्कुराते हुए प्रेमी या प्रेमिका को देखना: एक शुभ संकेत यदि आपको अपने सपने में प्रेमी या प्रेमिका मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं, तो इसे एक बहुत ही शुभ सपना माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इसका अर्थ है कि आपको अपने प्रेमी या प्रेमिका का प्रेम मिलने वाला है. साथ ही, यह संकेत देता है कि आपका रिश्ता विवाह तक भी पहुँच सकता है. Love Dreams: प्रेमिका को विशेष वेशभूषा या अवस्था में देखना: कुछ विशेष अवस्थाएँ या वेशभूषाएँ भी सपनों में महत्वपूर्ण अर्थ रखती हैं: • लाल रंग के कपड़े में: यदि सपने में आपकी प्रेमिका लाल रंग के कपड़े पहने नज़र आती है, तो आपको अपने प्रेम संबंधों में सफलता ज़रूर मिलेगी. • लहंगे में: यदि प्रेमिका लहंगे में नज़र आती है, तो उससे आपकी शादी होने की संभावना बढ़ जाएगी. • कंगन पहने हुए: अगर आप अपने सपनों में अपनी प्रेमिका को कंगन पहने हुए या कंगनों के साथ देखते हैं, Love Dreams तो इसका अर्थ है कि आपकी प्रेमिका ही आपके जीवनसाथी के लिए योग्य है. Love Dreams इसके अलावा, यह आपके जीवन में आने वाले धन की तरफ भी संकेत करता है. • मीठा खाते हुए: यदि सपने में आप अपनी प्रेमिका को मीठा खाते हुए देखते हैं, तो यह आपके जीवन में एक शुभ संकेत देता है. इसका मतलब है कि आपका पूरा जीवन प्रेम से भरा हुआ होगा. • परी के रूप में: सपने में प्रेमिका को किसी परी के रूप में देखना भी आपकी किस्मत बदलने वाला सपना है. • पालतू जानवर के साथ: यदि सपने में आपकी प्रेमिका किसी पालतू जानवर जैसे खरगोश या तोते के साथ दिखाई दे, तो यह इस बात की ओर इशारा है कि जल्दी ही आपकी प्रेमिका से मुलाकात होने वाली है.  सपने में अपने फोन के टूटने का सपना देखते हैं तो इसका क्या मतलब होता है ? अपने पार्टनर से शादी होते देखना: प्रेम विवाह की संभावना अगर आप सपने में अपनी शादी अपने पार्टनर से होते हुए देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आपके लव मैरिज की संभावना बन रही है. रोते हुए प्रेमी या प्रेमिका को देखना: सावधानी की आवश्यकता वहीं, अगर कोई व्यक्ति अपने सपने में अपने बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड को रोते हुए देखता है, तो इस प्रकार के सपने को शुभ नहीं माना गया है. Love Dreams स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ऐसा सपना आपको यह संकेत देता है कि आपका प्रेमी या प्रेमिका आपसे नाराज़ है या फिर आपसे विश्वासघात कर सकता है. ऐसा माना जाता है कि यह सपना संकेत करता है कि आने वाले समय में आपका अपने पार्टनर के साथ किसी बात को लेकर विवाद हो सकता है, जो आपके रिश्तों के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में आपको सचेत रहने की आवश्यकता है. सपने में झगड़ा करना: लव लाइफ में परेशानियां अगर आप सपने में अपने पार्टनर से झगड़ते हुए दिखाई देते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आपकी लव लाइफ में कुछ परेशानियाँ आ सकती हैं. ऐसे में आपको सावधान रहने की ज़रूरत है. पार्टनर से बात करते हुए देखना: जल्द खुशखबरी यदि कोई लड़का या लड़की सपने में अपने पार्टनर से बात कर रहा है, Love Dreams तो इसका अर्थ है कि आपकी लव लाइफ में जल्द ही कोई खुशखबरी आ सकती है. या फिर ये सपना इस बात की ओर भी संकेत करता है कि आपकी अपने लव पार्टनर के साथ शादी पक्की हो सकती है. प्रेमी-प्रेमिका की शादी होते देखना: आंतरिक कमज़ोरी का संकेत यदि आप अपने सपने में प्रेमी-प्रेमिका की शादी होते देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप अंदर से कमज़ोर हो रहे हैं या फिर आपका अपने प्रेमी के प्रति प्रेम कम हो रहा है. निष्कर्ष: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हमारे सपने हमारे जीवन और रिश्तों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं. चाहे आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को मुस्कुराते हुए देखें या रोते हुए, हर सपने का एक ख़ास अर्थ होता है, जो आपको भविष्य के लिए तैयार रहने में मदद कर सकता है. Love Dreams इन संकेतों को समझकर आप अपने रिश्तों को बेहतर बना सकते हैं और आने वाली परिस्थितियों के लिए स्वयं को तैयार कर सकते हैं. डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है. विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियाँ आप तक पहुँचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज़ सूचना पहुँचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज़ सूचना समझकर ही लें. इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की ज़िम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी

Love Dreams: सपने में प्रेमी या प्रेमिका को देखना – शुभ या अशुभ संकेत? जानिए क्या कहते हैं आपके सपने Read More »

nAmAvali

Shri Ganesha Stotram Shrishivakritam: श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रम्

Shri Ganesha Stotram Shrishivakritam: श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥श्रीशिव उवाच ।गणेशाय परेशाय धूम्रवर्णाय ढुण्ढये ।शिवात्मजाय सर्वेषां मात्रे पित्रे नमो नमः ॥ २२॥गणेशाय गुणानां ते स्रष्ट्रे पात्रे महात्मने ।संहर्त्रे देवदेवाय हेरम्बाय नमो नमः ॥ २३॥अनन्तविभवायैवानन्तमायाप्रचालक ।अनन्तोदरगायैव विघ्नेशाय नमो नमः ॥ २४॥ज्येष्ठराजाय ज्येष्ठाय ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपिणे ।सर्वपूज्याय ते सर्वादिपूज्याय नमो नमः ॥ २५॥स्वानन्दपतये तुभ्यं मूषकध्वजधारिणे ।सिद्धिबुद्धिपते नाथेक्षुसागरपते नमः ॥ २६॥मनोवाणीविहीनाय मनोवाणीमयाय ते ।योगेशाय महाविष्णुसुताय ते नमो नमः ॥ २७॥ शेषपुत्राय त्रैलोक्यक्षेत्रस्थाय नमो नमः ।दण्डकारण्यदेवाय ब्रह्मेशाय नमो नमः ॥ २८॥यत्र वेदादयो नाथ योगिनः शान्तिमाययुः ।तं पश्यामि गणाधीशं धन्योऽहं सर्वभावतः ॥ २९॥नेत्राणि धन्यरूपाणि प्रभो त्वत् दर्शनेन मे ।मस्तकानि नमस्कारात् स्तवनान् मे मुखानि ते ॥ ३०॥हस्ताः पूजनतस्ते मे धन्याः सर्वं मदीयकम् ।धन्यं ते पादपद्मस्य दर्शनेन गजानन ॥ ३१॥भक्तिं देहि त्वदीयां मे तयाऽहं गणनायक ।कृतकृत्यो भविष्यामि शान्तियोगपरायणः ॥ ३२॥त्रिपुरस्य वधार्थाय सामर्थ्यं देहि शाश्वतम् ।महेश त्वं गणाधीश सार्थकं कुरु नित्यदा ॥ ३३॥ इति श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं अष्टमः खण्डः । अध्यायः १२ । ८.१२ २२-३३॥

Shri Ganesha Stotram Shrishivakritam: श्रीशिवकृतं श्रीगणेशस्तोत्रम् Read More »