Parivartini Ekadashi

Parivartini Ekadashi 2025: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Parivartini Ekadashi 2025: सितंबर माह में आने वाली पहली एकादशी परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) के नाम से जानी जाती है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत शुभ और लाभकारी महत्व बताया गया है, और यह व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में करवट लेते हैं, जिससे इस एकादशी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यह व्रत करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी 2025 की सही तारीख, इसका महत्व, पूजा विधि और व्रत पारण का समय। Parsva Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और….. Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी की तिथि इस प्रकार है: • एकादशी तिथि का आरंभ: 3 सितंबर 2025, बुधवार को सुबह 03 बजकर 53 मिनट से होगा। • एकादशी तिथि का समापन: अगले दिन 4 सितंबर 2025, गुरुवार को सुबह 04 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। • व्रत का दिन: ऐसे में, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 सितंबर 2025, बुधवार को रखा जाएगा। यह सितंबर 2025 महीने का पहला एकादशी व्रत होगा। नोट: एकादशी व्रत 2025 की एक सामान्य सूची में परिवर्तिनी एकादशी की तारीख 14 सितंबर 2025 भी दी गई है। हालांकि, नवभारत टाइम्स और लाइव हिंदुस्तान जैसे प्रमुख स्रोतों ने 3 और 4 सितंबर 2025 को परिवर्तिनी एकादशी के रूप में विशेष रूप से विस्तृत जानकारी दी है। इसलिए, अधिक विशिष्ट जानकारी के आधार पर, 3 सितंबर को व्रत रखा जाएगा। Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी का महत्व परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi को पद्म एकादशी, पार्श्व एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान योग निद्रा में वास कर रहे भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं। यही वजह है कि इस दिन को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। अंत में, व्यक्ति वैकुंठ लोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन, धान्य, सुख और समृद्धि आती है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 पूजा विधि परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi का व्रत विधि-विधान से करने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं। यहाँ पूजा विधि के चरण दिए गए हैं: 1. सुबह उठें और संकल्प लें: परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्नान के बाद पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई और पंचामृत स्नान: इसके बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को प्रणाम करें। पूजा के लिए मंदिर की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएं। 3. सामग्री अर्पित करें: स्नान के बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, अक्षत (साबुत चावल), सुपारी और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। 4. मंत्र जप: इस दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का लगातार जप करते रहें। 5. व्रत कथा और आरती: इसके बाद परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। 6. व्रत पारण: एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में किया जाता है। शुभ योग और पूजन मुहूर्त परिवर्तिनी एकादशी 2025 पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें किए गए कार्य शुभ फलदायी होते हैं: • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 30 मिनट से सुबह 05 बजकर 15 मिनट तक। • रवि योग: सुबह 06 बजे से रात 11 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। • अन्य शुभ योग: इस दिन आयुष्मान योग और सौभाग्य योग का भी शुभ संयोग बन रहा है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 व्रत पारण का समय व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना चाहिए। परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 4 सितंबर 2025, गुरुवार को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 36 मिनट से शाम 04 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। पारण करने से पहले ब्राह्मणों को भोजन करवाने या अन्न का दान करने का विधान है। एकादशी व्रत के सामान्य नियम एकादशी व्रत के कुछ सामान्य नियम भी हैं जिनका पालन करना महत्वपूर्ण है: • चावल वर्जित: एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। • सात्विक भोजन: मांस-मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। • संयम: इस दिन स्त्री-पुरुष को संयम भाव से रहना चाहिए और मन तथा वाणी से किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए। • रात्रि जागरण: एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए रात्रि में जागरण करके भगवान का ध्यान और भजन करने का भी विधान है। • दान-पुण्य: एकादशी के दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। यह व्रत श्रद्धा और भक्तिभाव से करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

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Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय, गणपति बप्पा की कृपा से घर आएगी सुख-समृद्धि

Ganesh Chaturthi 2025 Upay: गणेश चतुर्थी पर कुछ उपायों को करने से जीवन में सुख-शांति व समृद्धि आती है। जानें भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी पर क्या उपाय करना चाहिए। Ganesh chaturthi remedies 2025: भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य के देवता गणपति बप्पा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करते हैं। Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। Ganesh Chaturthi भगवान गणेश की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लोग इस दिन कई तरह के उपाय करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ उपायों को करने से गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में धन-संपदा आती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जानें गणेश चतुर्थी के दिन क्या करें उपाय। Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय 1. भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय माने गए हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से मनवांछित फल मिलता है और धन-धान्य बढ़ता है। 4. अगर संभव हो सके हो तो, गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्यों की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। Ganesh Chaturthi इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें

हरतालिका तीज 2025: तिथि, महत्व, पूजा विधि, क्या करें और क्या न करें हरतालिका तीज सुहागिन और अविवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के मिलन की स्मृति में रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने कठोर तप करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इसलिए इस दिन का व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य और अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। हरतालिका तीज 2025 कब है? यह व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। हरतालिका तीज का महत्व हरतालिका तीज पूजा विधि (Step by Step) हरतालिका तीज पर क्या न करें हरतालिका तीज 2025 FAQ Q1. हरतालिका तीज कब है?26 अगस्त 2025, मंगलवार को। Q2. इस व्रत को कौन रख सकता है?विवाहित और अविवाहित महिलाएँ दोनों। Q3. क्या निर्जला व्रत ही करना ज़रूरी है?नहीं, स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार भी किया जा सकता है। Q4. हरतालिका तीज किसके लिए की जाती है?अखंड सौभाग्य और मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए। निष्कर्ष हरतालिका तीज 2025 का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। यह व्रत न सिर्फ़ वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने में सहायक है बल्कि अविवाहित कन्याओं को अच्छे पति की प्राप्ति भी कराता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-पूजन करने से माता पार्वती और भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। हरतालिका तीज 2025, Hartalika Teej 2025 Date, हरतालिका तीज व्रत, हरतालिका तीज का महत्व, हरतालिका तीज पूजा विधि, Hartalika Teej Vrat Katha, हरतालिका तीज क्या करें क्या न करें सखा, क्या चाहोगे मैं इस

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Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः

Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥दण्डकारण्यमुवाच ।नमस्ते गजवक्त्राय गणेशाय महोदर ।ब्रह्मणे ब्रह्मपालाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ३८॥हेरम्बाय चतुर्बाहुधराय कञ्जपाणये ।पाशाङ्कुशधरायैव परेशाय नमो नमः ॥ ३९॥अनादये च सर्वेषामादिरूपाय ते नमः ।ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपाय ज्येष्ठाय वै नमो नमः ॥ ४०॥स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च ।सिद्धिबुद्धिप्रदात्रे ते मूषकध्वजिने नमः ॥ ४१॥मूषकोपरिसंस्थाय गणेशाय परात्मने ।नानामायाप्रचालाय मयूरेशाय ते नमः ॥ ४२॥नायकानां विशेषेण नायकाय विनायक ।नायकैर्वर्जितायैव नायकत्वप्रदायिने ॥ ४३॥विघ्नेशाय महाविघ्नधारिणे सर्वदायिने ।पददात्रे तथा हन्त्रे विघ्नेशैस्ते नमो नमः ॥ ४४॥अमेयशक्तये तुभ्यं सर्वपूज्याय ते नमः ।किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगाकारस्वरूपिणम् ॥ ४५॥अधुना वरदोऽसि त्वं तदा मे नाम सार्थकम् ।कुरु नित्यं वस स्वामिन् मम देहे गजानन ॥ ४६॥भक्तिं देहि त्वदीयां मे सदा ब्रह्मप्रकाशिनीम् ।तेनाऽहं कृतकृत्यश्च भविष्यामि गजानन ॥ ४७॥एवमुक्त्वा गणेशानं प्रणनाम कृताञ्जलिः ।भक्तिभावसमायुक्तं तञ्जगाद गजाननः ॥ ४८॥(फलश्रुतिः)श्रीगजानन उवाच ।त्वया कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वसिद्धिदम् ।भविष्यति महारण्य भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥ ४९॥त्वयोक्तं सफलं सर्वं भविष्यति सदा प्रियम् ।मामेव सर्वभावेन भजिष्यसि न संशयः ॥ ५०॥नानावतारवांश्चैव त्वद्देहस्थोऽहमञ्जसा ।भविष्यामि गणेशोक्त्वांऽतर्दधे देवसत्तमाः ॥ ५१॥अतो गणेशक्षेत्रं तु दण्डकारण्यमुत्तमम् ।सकलं तत्र सेवार्थं देवास्तस्य समाययुः ॥ ५२॥तेषां क्षेत्राणि देवेशा दण्डकारण्यगानि तु ।तेषु स्थिता विशेषेण भजन्ते गणनायकम् ॥ ५३॥सर्वेष्वरण्यदेशेषु गणेशः प्रतितिष्ठति ।दण्डकारण्यमध्ये स विशेषेणावतारकृत् ॥ ५४॥दण्डकारण्यकं सर्वं गणेशक्षेत्रमुच्यते ।मयूरक्षेत्रं तन्मध्ये भिन्नं स्वानन्दवाचकम् ॥ ५५॥ इति दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥एकादशस्तोत्रं– ॥ मुद्गलपुराणं षष्टः खण्डः । अध्यायः १३ । ६.१३ ३८-५५॥

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Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम्

Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः । जय देव गजानन प्रभो जय सर्वासुरगर्वभेदक ।जय सङ्कटपाशमोचन प्रणवाकार विनायकाऽव माम् ॥ १॥ तव देव जयन्ति मूर्तयः कलितागण्यसुपुण्यकीर्तयः ।मनसा भजतां हतार्तयः कृतशीघ्राधिककामपूर्तयः ॥ २॥ तव रम्यकथास्वनादरः स नरो जन्मलयैकमन्दिरम् ।न परत्र न चेह सौख्यभाङ् निजदुष्कर्मवशाद्विमोहभाक् ॥ ३॥ गजवक्त्र तवाङ्घ्रिपङ्कजे ध्वजवज्राङ्कयुते सदा भजे ।तव मूर्तिमहं परिष्वजे त्वयि हृन्मेऽस्तु सुमूषकध्वजे ॥ ४॥ त्वदृते हि गजानन प्रभो न हि भक्तौघसुखौघदायकः ।सुदृढा मम भक्तिरस्तु ते चरणाब्जे विबुधेश विश्वपाः ॥ ५॥ फलपूरगदेक्षुकार्मुकैर्युत रुक्चक्रधराब्जपाशधृक् ।अव वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड माम् ॥ ६॥ करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर ।शशिसुप्रभ विद्यया युत स्तनभारानमितेड्य रक्ष माम् ॥ ७॥ शशिभास्करवीतिहोत्रदृक् शुभसिन्दूररुचे विनायक ।द्विपवक्त्र महाहिभूषण त्रिदिवेशासुरवन्द्य पाहि माम् ॥ ८॥ सृणिपाशवरद्विजैर्युत द्विजराजार्धक मूषकध्वज ।शुभलोहितचन्दनोक्षित श्रुतिवेद्याभयदायकाऽव माम् ॥ ९॥ स्मरणात्तव शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः कृतार्थताम् ।गणपाऽऽपुरघौघभञ्जन द्विपराजास्य सदैव पाहि माम् ॥ १०॥ शरणं भगवान्विनायकः शरणं मे सततं च सिद्धिका ।शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं नान्यदुपैमि दैवतम् ॥ ११॥ गलद्दानगण्डं महाहस्तितुण्डं सुपर्वप्रचण्डं धृतार्धेन्दुखण्डम् ।करास्फोटिताण्डं महाहस्तदण्डं हृताढ्यारिमुण्डं भजे वक्रतुण्डम् ॥ १२॥ गणनाथ निबन्धसंस्तवं कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम् ।इदमेव सदा प्रदीयतां करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा ॥ १३॥ इति गजाननस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Shri Kalpakaganeshapancharatna Stava: श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः

Shri Kalpakaganeshapancharatna Stava: श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः श्रीमदुमापतिशिवप्रणीतःश्रीमत्तिल्ववने सभेशसदन-प्रत्यक्ककुब्गोपुरा-धोभागस्थित चारुसद्मवसतिर्भक्तेष्टकल्पद्रुमः ।नृत्तानन्दमदोत्कटो गणपतिः संरक्षताद्वोऽनिशंदूर्वासः प्रमुखाखिलर्षि विनुतः सर्वेश्वरोऽग्र्योऽव्ययः ॥ १॥ श्रीमत्तिल्लवनाभिधं पुरवरं क्षुल्लावुकं प्राणिनांइत्याहुर्मुनयः किलेति नितरां ज्ञातुं च तत्सत्यताम् ।आयान्तं निशि मस्करीन्द्रमपि यो दूर्वाससं प्रीणयन्नृत्तं दर्शयति स्म नो गणपतिः कल्पद्रुकल्पोऽवतात् ॥ २॥ देवान् नृत्तदिदृक्षया पशुपतेरभ्यागतान् कामिनःशक्रादीन् स्वयमुद्धृतं निजपदं वामेतरं दर्शयन् ।दत्वा तत्तदभीष्टवर्गमनिशं स्वर्गादिलोकान्विभुःनिन्ये यः शिवकामिनाथतनयः कुर्याच्छिवं वोऽन्वहम् ॥ ३॥ अस्माकं पुरतश्चकास्तु भगवान् श्रीकल्पकाख्योऽग्रणीःगोविन्दादि सुरार्चितोऽमृतरसप्राप्त्यै गजेन्द्राननः ।वाचं यच्छतु निश्चलां श्रियमपि स्वात्मावबोधं परंदारान् पुत्रवरांश्च सर्वविभवं कात्यायनीशात्मजः ॥ ४॥ वन्दे कल्पक कुञ्जरेन्द्रवदनं वेदोक्तिभिस्तिल्वभू-देवैः पूजितपादपद्मयुगलं पाशच्छिदं प्राणिनाम् ।दन्तादीनपि षड्भुजेषु दधतं वाञ्छाप्रदत्वाप्तयेस्वाभ्यर्णाश्रयिकामधेनुमनिशं श्रीमुख्यसर्वार्थदम् ॥ ५॥ औमापत्यमिमं स्तवं प्रतिदिनं प्रातर्निशं यः पठेत्श्रीमत्कल्पककुञ्जरानन-कृपापाङ्गाव लोकान्नरः ।यं यं कामयते च तं तमखिलं प्राप्नोति निर्विघ्नतःकैवल्यं च तथाऽन्तिमे वयसि तत्सर्वार्थसिद्धिप्रदम् ॥ ६॥ इति श्रीमदुमापतिशिवप्रणीतः श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः सम्पूर्णः ।

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Ekakshara Ganapati Kavacham: एकाक्षरगणपतिकवचम्

Ekakshara Ganapati Kavacham: एकाक्षरगणपतिकवचम् त्रैलोक्यमोहनकवचम् ।एकार्णकवचम् । श्रीगणेशाय नमः ।नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने ।कार्यारम्भेषु सर्वेषु पूजितो यः सुरैरपि ॥ १॥ पार्वत्युवाच ।भगवन् देवदेवेश लोकानुग्रहकारकः ।इदानी श्रोतृमिच्छामि कवचं यत्प्रकाशितम् ॥ २॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य त्वया प्रीतेन चेतसा ।वदैतद्विधिवद्देव यदि ते वल्लभास्म्यहम् ॥ ३॥ ईश्वर उवाच ।श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाख्येयमपि ते ध्रुवम् ।एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं सर्वकामदम् ॥ ४॥ (एकार्णगणनाथस्य कवचं) यस्य स्मरणमात्रेण न विघ्नाः प्रभवन्ति हि । (प्रभवन्ति च निर्विघ्नास्स्मरणेनान्यमानवाः)त्रिकालमेककालं वा ये पठन्ति सदा नराः ॥ ५॥ तेषां क्वापि भयं नास्ति सङ्ग्रामे सङ्कटे गिरौ ।भूतवेतालरक्षोभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते ॥ ६॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् गणनायकम् ।न च सिद्धिमाप्नोति मूढो वर्षशतैरपि ॥ ७॥ अघोरो मे यथा मन्त्रो मन्त्राणामुत्तमोत्तमः ।तथेदं कवचं देवि दुर्लभं भुवि मानवैः ॥ ८॥ गोपनीयं प्रयत्नेन नाज्येयं यस्य कस्यचित् ।तव प्रीत्या महेशानि कवचं कथ्यतेऽद्भुतम् ॥ ९॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य गणकश्चर्षिरीरितः ।त्रिष्टुप्छन्दस्तु विघ्नेशो देवता परिकीर्तिता ॥ १०॥ गँ बीजं शक्तिरोङ्कारः सर्वकामार्थसिद्धये ।सर्वविघ्नविनाशाय विनियोगस्तु कीर्तितः ॥ ११॥ ध्यानम् ।रक्ताम्भोजस्वरूपं लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं पाशंचैवाङ्कुशं वा वरदमभयदं बाहुभिर्धारयन्तम् ।शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं देवंचन्द्रार्धचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ॥ १२॥ अथ कवचम् ।गणेशो मे शिरः पातु भालं पातु गजाननः ।नेत्रे गणपतिः पातु गजकर्णः श्रुती मम ॥ १३॥ कपोलौ गणनाथस्तु घ्राणं गन्धर्वपूजितः ।मुखं मे सुमुखः पातु चिबुकं गिरिजासुतः ॥ १४॥ जिह्वां पातु गणक्रीडो दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ।वाचं विनायकः पातु कष्टं पातु महोत्कटः ॥ १५॥ स्कन्धौ पातु गजस्कन्धो बाहू मे विघ्ननाशनः ।हस्तौ रक्षतु हेरम्बो वक्षः पातु महाबलः ॥ १६॥ हृदयं मे गणपतिरुदरं मे महोदरः ।नाभि गम्भीरहृदयः पृष्ठं पातु सुरप्रियः ॥ १७॥ कटिं मे विकटः पातु गुह्यं मे गुहपूजितः ।ऊरु मे पातु कौमारं जानुनी च गणाधिपः ॥ १८॥ जङ्घे गजप्रदः पातु गुल्फौ मे धूर्जटिप्रियः ।चरणौ दुर्जयः पातुर्साङ्गं गणनायकः ॥ १९॥ आमोदो मेऽग्रतः पातु प्रमोदः पातु पृष्ठतः ।दक्षिणे पातु सिद्धिशो वामे विघ्नधरार्चितः ॥ २०॥ प्राच्यां रक्षतु मां नित्यं चिन्तामणिविनायकः ।आग्नेयां वक्रतुण्डो मे दक्षिणस्यामुमासुतः ॥ २१॥ नैरृत्यां सर्वविघ्नेशः पातु नित्यं गणेश्वरः ।प्रतीच्यां सिद्धिदः पातु वायव्यां गजकर्णकः ॥ २२॥ कौबेर्यां सर्वसिद्धिशः ईशान्यामीशनन्दनः ।ऊर्ध्वं विनायकः पातु अधो मूषकवाहनः ॥ २३॥ दिवा गोक्षीरधवलः पातु नित्यं गजाननः ।रात्रौ पातु गणक्रीडः सन्ध्योः सुरवन्दितः ॥ २४॥ पाशाङ्कुशाभयकरः सर्वतः पातु मां सदा ।ग्रहभूतपिशाचेभ्यः पातु नित्यं गजाननः ॥ २५॥ सत्वं रजस्तमो वाचं बुद्धिं ज्ञानं स्मृतिं दयाम् ।धर्मचतुर्विधं लक्ष्मीं लज्जां कीर्तिं कुलं वपुः ॥ २६॥ धनं धान्यं गृहं दारान् पौत्रान् सखींस्तथा ।एकदन्तोऽवतु श्रीमान् सर्वतः शङ्करात्मजः ॥ २७॥ सिद्धिदं कीर्तिदं देवि प्रपठेन्नियतः शुचिः ।एककालं द्विकालं वापि भक्तिमान् ॥ २८॥ न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते भुवि मानवः ॥ २९॥ यं यं कामयते नित्यं सुदुर्लभमनोरथम् ।तं तं प्राप्नोति सकलं षण्मासान्नात्र संशयः ॥ ३०॥ मोहनस्तम्भनाकर्षमारणोच्चाटनं वशम् ।स्मरणादेव जायन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥ सर्वविघ्नहरं देवं ग्रहपीडानिवारणम् ।सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वापत्तिनिवारणम् ॥ ३२॥ धृत्वेदं कवचं देवि यो जपेन्मन्त्रमुत्तमम् ।न वाच्यते स विघ्नौघैः कदाचिदपि कुत्रचित् ॥ ३३॥ भूर्जे लिखित्वा विधिवद्धारयेद्यो नरः शुचिः ।एकबाहो शिरः कण्ठे पूजयित्वा गणाधिपम् ॥ ३४॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं देवि दुर्लभम् ।यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते ॥ ३५॥ गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ।पठेद्वा पाठयेद्वापि तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३६॥ न प्रकाश्यं महेशानि कवचं यत्र कुत्रचित् ।दातव्यं भक्तियुक्ताय गुरुदेवपराय च ॥ ३७॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले एकाक्षरगणपतिकवचं अथवात्रैलोक्यमोहनकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Ekavimshati Ganeshamantrah 21 Ganesha Mantras: एकविंशतिगणेशमन्त्राः

Ekavimshati Ganeshamantrah 21 Ganesha Mantras: एकविंशतिगणेशमन्त्राः अथातः सम्प्रवक्ष्यामि चैकविंशतिसङ्ख्यकान् ।गणेशान्राजमातङ्ग्या सम्बद्धान् योगिनीयुतान् ॥ १॥ बीजषट्कं गणेशस्य ङेऽन्तं तन्नाम चोच्चरेत् ।नमोऽन्ता मनवस्तेषां क्रमान्नामानि वच्म्यहम् ॥ २॥ अग्रे पृष्ठे द्विदन्तादिद्वितुण्डाक्षो विनायकः ।ज्येष्ठो विनायकश्चैव तथा गजविनायकः ॥ ३॥ विनायकः कालसंज्ञो नागेशाख्यो विनायकः ।अथान्तर्गृहमावृत्य स्थिताञ्छृणु विनायकान् ॥ ४॥ तथा सृष्टिगणेशश्च यक्षविघ्नेश एव च ।गजकर्णश्चित्रघण्टः स्यान्मङ्गलविनायकः ॥ ५॥ विनायकश्च मित्रादिरथ वानन्दकानने ।व्यवस्थिता गणेशा ये ते वक्ष्यन्ते मयाधुना ॥ ६॥ मोदः प्रमोदः सुमुखो दुर्मुखो गणनायकः ।विनायको ज्ञानपूर्वो द्वारविघ्नेश एव च ॥ ७॥ अविमुक्तेशनिकटे त्वविमुक्तविनायकः ।योगिन्यश्च क्रमादेषां कीर्त्यन्ते प्रेतवाहनाः ॥ ८॥ दन्दशूककरा रौद्री मृगशीर्षा वृषानना ।व्यालास्या धूर्तविश्वासा व्योमैकचरणार्धदृक् ॥ ९॥ तापिनी तुष्टिपूर्वा च शोषिणी कोटरी तथा ।विद्युत्प्रभा स्थूलनासा मार्जारी कण्ठपूरणा ॥ १०॥ कामाक्ष्यट्टाट्टहासा च बलाका गतिपुण्यदा ।मूकास्या चेति योगिन्यो ङेऽन्तं नाम नमोऽन्तकम् ॥ ११॥ स्वबीजाद्यं भवेन्मन्त्रो यथानामार्थकारकः । इति श्रीमहामायामहाकालानुमते मेरुतन्त्रे शिवप्रणीतेपश्चिमाम्नायगणपतिमन्त्रकथने एकोनविंशे प्रकाशेप्रोक्ताः एकविंशतिगणेशमन्त्राः सम्पूर्णाः । अथ नामावलिः –ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्विदन्तविनायकाय नमः । १ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्वितुण्डविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्व्यक्षविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः ज्येष्ठविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गजविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः कालविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः नागेशविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः सृष्टिगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः यक्षविघ्नेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गजकर्णाय नमः । १०ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः चित्रघण्टाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मङ्गलविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मित्रादिविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मोदगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः प्रमोदगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः सुमुखाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः दुर्मुखाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गणनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः ज्ञानविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्वारविघ्नेशाय नमः । २०ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः अविमुक्तेशविनायकाय नमः । २१ श्लोकानि ४९३-५०३

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Bhuvaneshwari Jayanti 2025

Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date: भुवनेश्वरी जयंती: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा

Bhuvaneshwari Jayanti: हिंदू धर्म में, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भुवनेश्वरी जयंती मनाई जाती है। यह दिन देवी भुवनेश्वरी की साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां भुवनेश्वरी का अवतरण हुआ था। दस महाविद्याओं में से एक, मां भुवनेश्वरी, इस ब्रह्मांड की समस्त शक्ति का आधार हैं। उनका स्वरूप अत्यंत कांतिपूर्ण और सौम्य है, और स्वयं भगवान शंकर ने भी उनके पाठ से समस्त आगमों तथा तंत्रों में विज्ञानी हुए हैं। Bhuvaneshwari Jayanti इस विशेष दिन पर मां भुवनेश्वरी की आराधना करने से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। मां भुवनेश्वरी की महिमा और पूजा का महत्व: मां भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जो सृष्टि के पालन, पोषण और संहार का कार्य करती हैं। गुरु के सानिध्य में, गुरु के मुख से अभ्यास करके, जो मनुष्य शिवालय, शून्य घर या चौराहे पर इनके मंत्र का जप करता है, वह योगी बन जाता है। Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date जो एकाग्रचित्त होकर इसे सदा पढ़ता या सुनता है, Bhuvaneshwari Jayanti वह दीर्घायु और सुखी होता है, उसकी वाणी ओजस्वी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति गुरु के चरणों में श्रद्धावान होकर स्त्रियों का प्रिय होता है। दुर्भाग्य और कष्टों से मुक्ति का उपाय: मंत्रमहार्णव के अनुसार, जो नारी दुर्भाग्य, धन-धान्य की कमी, रोग और कष्टों से पीड़ित है, उसे भोजपत्र पर देवी का मंत्र लिखकर अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए। ऐसा करने से उसे सुख और सौभाग्य दोनों प्राप्त होते हैं। पुरुषों को यही मंत्र अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। अतः, यदि आप भी इन सभी चीज़ों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो Bhuvaneshwari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती के दिन आपको मां भुवनेश्वरी की साधना अवश्य करनी चाहिए। भुवनेश्वरी देवी के मंत्र और पूजा विधि: भुवनेश्वरी देवी का एकाक्षरी मंत्र ‘ह्रीं’ है। उनका विशेष मंत्र है: ‘ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:’। पूजा विधि: इस मंत्र का कम से कम 1100 बार जाप करना चाहिए। किसी भी मंत्र का जितना जाप किया जाता है, उसके जप का 10 प्रतिशत हवन, 10 प्रतिशत तर्पण, 10 प्रतिशत मार्जन और 10 प्रतिशत ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। हवन सामग्री: मां भुवनेश्वरी का होम पीपल, गूलर, पलाश, बरगद की समिधाएं, पीली सरसों, खीर और घी आदि से किया जाता है। मंत्र जाप के बाद आप इनमें से किसी भी एक चीज़ का होम कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा राशि अनुसार भुवनेश्वरी जयंती Bhuvaneshwari Jayanti के विशेष उपाय: भुवनेश्वरी जयंती के दिन विभिन्न राशि के जातक अपनी समस्याओं के निवारण और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए विशेष उपाय कर सकते हैं: • मेष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करने के बाद पीपल की समिधा से हवन करें। इससे जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। • वृष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके दूध-चावल से बनी खीर का होम करें। इससे व्यापार में वृद्धि के लिए आर्थिक मदद मिलेगी। • मिथुन राशि: ब्राह्मी और घी को देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से अभिमंत्रित करके पूरे एक साल तक पिएं। इससे आपमें सुंदर कविता करने की अद्भुत क्षमता आएगी। • कर्क राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके बरगद की समिधा से हवन करें। इससे हर तरह के वाद-विवाद से छुटकारा मिलेगा। • सिंह राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके गूलर की समिधा से होम करें। Bhuvaneshwari Jayanti इससे विरोधियों से छुटकारा मिलेगा और भय दूर होगा। • कन्या राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके पीली सरसों का होम करें। इससे आप किसी को भी अपने वश में करने की क्षमता हासिल कर लेंगे। • तुला राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके घी, मधु और शक्कर से युक्त खीर से होम करें। इससे आपको नौकरी में तरक्की मिलेगी। • वृश्चिक राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके चंदन के जल से युक्त चावल से होम करें। आप जिस भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, आपको उस क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • धनु राशि: सुख-सौभाग्य पाने के लिए, भोजपत्र पर देवी भुवनेश्वरी का एकाक्षरी मंत्र “ह्रीं” लिखकर स्त्रियों को अपने बाएं हाथ में और पुरुषों को अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। Bhuvaneshwari Jayanti इससे शीघ्र ही सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी और जीवन में कोई अड़चन नहीं आएगी। • मकर राशि: जीवन में खुशहाली के लिए, अपने सामने एक लोटा जल लेकर बैठ जाएं और देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का 21 बार जाप करें। जाप करने के बाद उस जल से अपना अभिषेक करें। ऐसा करने से आपके जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. • कुंभ राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके देवी को चंदन, अगर, कपूर और केसर की गंध अर्पित करके, पलाश की समिधा से हवन करें। ऐसा करने से आपको श्रेष्ठ वाणी की प्राप्ति होगी और आप सभी को जल्द ही प्रभावित कर पाने में सफल होंगे। • मीन राशि: शुद्ध जल लेकर, उसे देवी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से इक्कीस बार अभिमंत्रित करना चाहिए और अभिमंत्रित करने के बाद उस जल को पीना चाहिए। इस प्रकार मंत्र से अभिमंत्रित जल का पान करने से आपकी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी। निष्कर्ष: भुवनेश्वरी जयंती (Bhuvaneshwari Jayanti) का यह पावन अवसर मां भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत मौका है। ऊपर बताए गए उपायों और मंत्रों का विधि-विधान से पालन करके आप देवी मां को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti अपनी राशि के अनुसार उपाय करके आप अपनी विशिष्ट इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

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Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और बप्पा की कृपा पाने के 5 महाउपाय

Ganesh Chaturthi: भगवान गणेश, जिन्हें बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है, के जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में पूरे देश में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाता है। इस वर्ष, गणेश चतुर्थी का महापर्व 27 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। Ganesh Chaturthi भक्तजन इस दौरान घरों, दफ्तरों, दुकानों और मंदिरों में गणपति जी की मूर्ति स्थापित करते हैं और पूरे 10 दिनों तक उनकी विधिनुसार उपासना करते हैं, Ganesh Chaturthi जो अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होती है। वैसे तो भगवान गणेश की पूजा-अर्चना रोजाना की जाती है, लेकिन भादों माह को उनकी उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी 2025 से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां, शुभ मुहूर्त और बप्पा की कृपा पाने के सरल उपाय। Ganesh Chaturthi date and auspicious time 2025: गणेश चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त 2025 • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त की दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। • पर्व का दिन: उदया तिथि के अनुसार, गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को ही मनाया जाएगा। • गणेश मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त: ज्योतिषियों के अनुसार, 27 अगस्त को सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति स्थापना के लिए अत्यंत शुभ रहेगा। Ganesh Chaturthi आप इस शुभ अवधि में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे दुर्लभ संयोग:Rare coincidences are happening on Ganesh Chaturthi 2025 इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जो इस तिथि की महत्ता को कई गुना बढ़ा रहे हैं: • प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग: गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग का अद्भुत संयोग रहेगा। • इंद्र-ब्रह्म योग: इन योगों के साथ इंद्र-ब्रह्म योग भी उपस्थित रहेगा। • लक्ष्मी नारायण योग: कर्क राशि में बुध और शुक्र की युति से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा, Ganesh Chaturthi जो धन-संपदा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। • बुधवार का महासंयोग: गणेश चतुर्थी बुधवार के दिन पड़ रही है, और बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, जिससे इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। Offer this special offering to Lord Ganesha on Ganesh Chaturthi:गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को लगाएं ये विशेष भोग भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए विशेष भोग लगाए जाते हैं, जिन्हें बेहद शुभ माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • मोदक और लड्डू: भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय हैं। मान्यता है कि इन्हें अर्पित करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। • खीर और मालपुआ: मोदक और लड्डू के अलावा, खीर और मालपुआ जैसे भोग भी प्रभु को चढ़ाए जाते हैं। Do these 5 great measures for happiness and prosperity on Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर सुख-समृद्धि के लिए करें ये 5 महाउपाय गणेश चतुर्थी के दिन कुछ विशेष उपायों को करने से भगवान गणेश की कृपा से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। 1. मोदक और लड्डू का भोग: गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाएं। ऐसा करने से उनकी कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. दूर्वा और शुद्ध घी अर्पित करें: भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. पीले रंग की गणपति प्रतिमा स्थापित करें: यदि संभव हो, तो गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करें। यह माना जाता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और धन-धान्य में वृद्धि होती है। 4. हाथी को हरा चारा खिलाएं: गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना बहुत शुभ होता है। इस उपाय से कार्यों में आने वाली सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. गणपति मंदिर के दर्शन: भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन अवश्य करें। यह उपाय जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सहायक माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025 का पंचांग:Ganesh Chaturthi 2025 calendar 27 अगस्त 2025 के लिए पंचांग की महत्वपूर्ण जानकारी: • सूर्योदय: सुबह 05 बजकर 57 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 09 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 12 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 12 बजे से 12 बजकर 45 मिनट तक। निष्कर्ष:conclusion गणेश चतुर्थी का पर्व हमें भगवान गणेश के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर देता है। इन शुभ मुहूर्तों और उपायों का पालन करके आप भी गणपति बप्पा की कृपा से अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि ला सकते हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहाँ दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। अमर उजाला या लाइव हिंदुस्तान, यहाँ दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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Ekadanta Stuti Mahavishnukrita: महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः

Ekadanta Stuti Mahavishnukrita: महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमहाविष्णुरुवाच ।नमो गणपते तुभ्यं विघ्नराजाय ते नमः ।नमः कृपानिधे ढुण्ढे भक्तसंरक्षकाय ते ॥ ३७॥सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं नमस्ते विघ्नहारिणे ।अभक्तेभ्यः सदा विघ्नदात्रे हेरम्बरूपिणे ॥ ३८॥निर्गुणाय गुणानां वै चालकाय नमो नमः ।नमः प्रपञ्चरूपाय प्रपञ्चरहिताय ते ॥ ३९॥ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ।नरकुञ्जररूपाय नानामायामयाय ते ॥ ४०॥ कारणानां च देवेश कारणाय नमो नमः ।ज्येष्ठराजाय वै तुभ्यं कारणै रहिताय च ॥ ४१॥योगिनां हृदि संस्थाय योगिभ्यो योगदायिने ।योगरूपधरायैव गणेशाय नमो नमः ॥ ४२॥मायाश्रयाय मायाया आधाराय नमो नमः ।मायिभ्यो मायया त्वं वै मोहदाता नमो नमः ॥ ४३॥त्वां स्तोतुं कः समर्थः स्याद्योगाकारेण वर्तसे ।यत्र वेदा विकुण्ठाश्च शास्त्रैः सर्वैः सहाङ्गकैः ॥ ४४॥मनोवाणीविहीनस्त्वं न हि देव कृपाकर ।मनोवाणीमयो नैव कथं त्वां स्तौमि विघ्नपम् ॥ ४५॥तथापि बुद्धिदाता त्वं त्वत्प्रसादेन संस्तुतः ।धन्योऽहं देवदेवेश तव दर्शनतोऽधुना ॥ ४६॥साक्षाद् दृष्ट्वा गणेशं त्वां तेनाहं ब्रह्मरूपकः ।जातो नास्त्यत्र सन्देहो योगीन्द्रो योगदायकः ॥ ४७॥इत्युक्त्वा तं प्रणम्याऽसौ त्वनृत्यद् भक्तिभावितः ।रोमाञ्चितशरीरश्च हर्षाश्रुभिरपिप्लुतः ॥ ४८॥ (फलश्रुतिः)एकदन्त उवाच ।तमुवाच गणाधीशो वरं वृणु जनार्दन ।तपसा भक्तिभावेन तुष्टो दास्यामि वाञ्छितम् ॥ ४९॥त्वया कृतमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ।भविष्यति नृणां विष्णो पठतां श‍ृण्वतां सदा ॥ ५०॥धर्मार्थकाममोक्षाणां साधकं प्रभविष्यति ।ईप्सितार्थप्रदं सद्यः प्रसादान्मे च केशव ॥ ५१॥मुद्गल उवाच ।गणेशवचनं श्रुत्वा विष्णुर्हर्षसमन्वितः ।जगाद तं प्रणम्यादौ वाञ्छितं संवृणे त्विति ॥ ५२॥ विष्णुरुवाच ।यदि प्रसन्नतां यातस्तदा भक्तिं सुदुर्लभाम् ।तव पादयुगे देहि दृढामव्यभिचारिणीम् ॥ ५३॥अन्यद्देहि गणाधीश ज्ञानं मे ह्यतुलं तथा ।कीर्तिं सर्वत्र मे देहि सामर्थ्यं विविधं तथा ॥ ५४॥मधुकैटभनाशार्थमुपायं वद साम्प्रतम् ।अन्यदैत्याभिहनने सामर्थ्यं देहि विघ्नप ॥ ५५॥तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तथेति गणपोऽब्रवीत् ।युद्धाय गच्छ देवेश दैत्यौ जेष्यसि तौ बलात् ॥ ५६॥तयोर्मरणमत्यन्त सुगुप्तं ब्रह्मणा कृतम् ।समये वरदानस्य तपसा तोषितेन च ॥ ५७॥ इति महाविष्णुकृता एकदन्तस्तुतिः सम्पूर्णा ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ४ । २.४ ३७-५७॥

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Ekadanta Stuti by Madasura: एकदन्तस्तुतिः मदासुरेण प्रोक्ता

Ekadanta Stuti by Madasura: एकदन्तस्तुतिः मदासुरेण प्रोक्ता ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ गृत्समद उवाच –मदासुरः प्रणम्यादौ परशुं यमसन्निभम् ।तुष्टाव विविधैर्वाक्यैः शस्त्रं ब्रह्ममयं भयात् ॥ ८॥ मदासुर उवाच ।नमस्ते एकदन्ताय मायामायिकरूपिणे ।सदा ब्रह्ममयायैव गणेशाय नमो नमः ॥ ९॥ मूषकारूढरूपाय मूषकध्वजिने नमः ।सर्वत्र संस्थितायैव बन्धहीनाय ते नमः ॥ १०॥ चतुर्बाहुधरायैव लम्बोदर सुरूपिणे ।नाभिशेषाय वै तुभ्यं हेरम्बाय नमो नमः ॥ ११॥ चिन्तामणिधरायैव चित्तस्थाय गजानन ।नानाभूषणयुक्ताय गणाधिपतये नमः ॥ १२॥ अनन्तविभवायैवानन्तमायाप्रचालक ।भक्तानन्दप्रदात्रे ते विघ्नेशाय नमो नमः ॥ १३॥ योगिनां योगदात्रे ते योगानां पतये नमः ।योगाकारस्वरूपाय ह्येकदन्तप्रधारिणे ॥ १४॥ मायाकारं शरीरं त एकशब्दः प्रकथ्यते ।दन्तः सत्तामयस्तत्र मस्तकस्ते नमो नमः ॥ १५॥ मायासत्ताविहीनस्त्वं तयोर्योगधरस्तथा ।कस्त्वां स्तोतुं समर्थः स्यादतस्ते वै नमो नमः ॥ १६॥ शरणागतपालाय शरणागतवत्सल ।पुनः पुनः सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं नमो नमः ॥ १७॥ रक्ष मामेकदन्तस्त्वं शरणागतमञ्जसा ।भक्तं भावेन सम्प्राप्तं संसारात्तारयस्व च ॥ १८॥ एवमुक्त्वा प्रणम्यापि मदः कृत्वा प्रदक्षिणाम् ।कृताञ्जलिपुटो भूत्वा संस्थितो देवसन्निधौ ॥ १९॥ तमुवाच गणाधीशः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।विकाररहितं दृष्ट्वा हृदयं भक्तिसंयुतम् ॥ २०॥ (फलश्रुतिः ।)एकदन्त उवाच ।त्वां हन्तुं क्रोधसंयुक्तो जातोऽहं नात्र संशयः ।अधुना शरणं प्रेप्सुं न हन्मि शरणागतम् ॥ २१॥ मदाज्ञावशगो भूत्वा तिष्ठ स्थाने स्वके सदा ।देवानां वैरमुत्सृज्य मद्भक्तिनिरतो भव ॥ २२॥ वरं वरय मत्तस्त्वं त्वया दास्यामि चिन्तितम् ।विनयेन च सन्तुष्टः स्तोत्रेणाऽहं विशेषतः ॥ २३॥ त्वया कृतमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति दैत्यप ।श‍ृणुयाद्वा प्रयत्नेन भवेत्तस्येप्सितप्रदम् ॥ २४॥ न तत्र मदसम्भूतं भयं भवति कर्हिचित् ।अन्ते स्वानन्ददं तस्मै स्तोत्रं मद्भक्तिदं भवेत् ॥ २५॥ इति एकदन्तस्तुतिःमदासुरकृता द्वादशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ – ॥ मुद्गलपुराणं द्वितीयः खण्डः । अध्यायः ५४ । २.५४ ९-२५॥

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