Radha Ashtami

Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….

Radha Ashtami Vrat Niyam: हिंदू धर्म में राधा अष्टमी का पर्व अत्यंत पावन और श्रद्धा से भरा हुआ दिन माना जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त और प्रेम स्वरूपा श्री राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। Radha Ashtami खासकर ब्रजभूमि, मथुरा और वृंदावन जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन विशेष उत्सव और झांकियों का आयोजन होता है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, कीर्तन-भजन करते हैं और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति का वास होता है, और वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ता है। हालांकि, Radha Ashtami राधा अष्टमी के दिन पूजा-पाठ और व्रत के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी माना गया है। सही विधि से पूजा न करने या कुछ गलतियां करने पर पूजा का फल बाधित हो सकता है। Radha Ashtami इसलिए, इस पावन अवसर पर क्या करना चाहिए और किन बातों से बचना चाहिए, यह जानना आवश्यक है, ताकि श्रद्धा के साथ किया गया पूजन पूर्ण फलदायक हो सके। Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….. Radha Ashtami: राधा अष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त इस वर्ष, वैदिक पंचांग के अनुसार राधा अष्टमी 31 अगस्त 2025, रविवार को मनाई जाएगी। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि आरंभ: 30 अगस्त, रात्रि 10:46 बजे से भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त: 1 सितंबर, देर रात 12:57 बजे तक उदयातिथि के अनुसार: राधा अष्टमी 31 अगस्त को मनाई जाएगी। राधा अष्टमी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: 31 अगस्त, प्रातः 11:05 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा। What to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या करें? राधा रानी की कृपा प्राप्त करने और व्रत का पूर्ण फल पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें: स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें। स्नान के बाद साफ और स्वच्छ कपड़े पहनें ताकि मन और शरीर दोनों पवित्र रहें। तभी व्रत और पूजा का संकल्प लें। ब्रह्मचर्य का पालन: पूरे दिन ब्रह्मचर्य नियम का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। इसका मतलब है कि आप न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी संयमित और शुद्ध रहें। पवित्र भोग: राधा रानी को केवल ताजी और पवित्र चीज़ें जैसे ताजे फल, दूध, दूध से बने प्रसाद, फूल, इत्यादि ही भोग के रूप में लगाएं। पुरानी या अर्धपकी हुई चीज़ें अर्पित न करें। व्रत कथा पाठ/श्रवण: पूजा के बाद राधा अष्टमी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें। इससे व्रत की महिमा और धार्मिकता बढ़ती है और मन को आध्यात्मिक शांति मिलती है। शुभ मुहूर्त में पारण: व्रत खोलने का समय खास होता है। शुभ मुहूर्त में ही व्रत का पारण करना चाहिए ताकि पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त हो। जल्दबाजी न करें और समय का सम्मान करें। प्रसाद ग्रहण: व्रत खोलते समय उसी प्रसाद को ग्रहण करें, जिसे पूजा में राधा रानी को भोग लगाया गया था। इससे पूजन की पूर्णता बनी रहती है। दान और गौ सेवा: व्रत खोलने से पहले जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, या धन दान करें। इसके अलावा गौ सेवा भी बहुत शुभ मानी जाती है। इससे पुण्य बढ़ता है और व्रत की सफलता सुनिश्चित होती है। बुजुर्गों का आशीर्वाद: पारण करने के बाद घर के बुजुर्गों या वरिष्ठों का आशीर्वाद लेना आवश्यक होता है। उनका आशीर्वाद आपके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है। Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व What not to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या न करें? इन बातों से बचना चाहिए ताकि व्रत में कोई दोष न लगे और पूजा का फल बाधित न हो भोग को झूठा न करें: पूजा में जो भी भोग राधा रानी को अर्पित किया जाना है, वह पूरी तरह शुद्ध और बिना किसी स्पर्श के होना चाहिए। भोग बनाने के बाद उसे चखना या किसी भी तरह से झूठा करना वर्जित है। दिन में न सोएं: व्रत के दिन दिन में सोना धार्मिक दृष्टि से अनुचित माना गया है। इससे व्रत की तपस्या में बाधा आती है और इसका फल कम हो सकता है। शरीर की कटिंग से बचें: इस शुभ दिन शरीर की कटिंग जैसे बाल, नाखून या दाढ़ी काटना वर्जित होता है। इसे अशुद्धता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इससे बचना चाहिए। काले/गहरे कपड़े न पहनें: इस दिन काले या बहुत गहरे रंग के कपड़े पहनने से परहेज़ करें। राधा रानी को लाल और पीले रंग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इन्हीं रंगों के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। सिर ढक कर पूजा करें: पूजा करते समय महिलाओं को बाल बांधकर रखने चाहिए और सिर को चुनरी से ढकना चाहिए। यह श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक होता है। पुरुषों को भी सिर पर रुमाल या कपड़ा रखना चाहिए। बाल न धोएं: राधा अष्टमी की तिथि के दौरान बाल धोना वर्जित माना जाता है। Radha Ashtami यदि बाल धोने की आवश्यकता हो तो यह कार्य अष्टमी शुरू होने से पहले कर लेना चाहिए। निष्कर्ष राधा अष्टमी का व्रत अत्यंत फलदायी होता है, बशर्ते आप श्रद्धा और नियमों के साथ इसका पालन करें। इन नियमों का पालन कर आप राधा रानी की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को सुख-समृद्धि से भर सकते हैं। आपको राधा अष्टमी 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं..

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Mystery of dreams

Mystery of dreams: सपनों का रहस्य रोने और परीक्षा छूटने के सपनों का क्या है मतलब ?

Crying and Exams Dreams: What Do They Mean? | Dream Science Mystery of dreams: क्या आपने कभी सपने में खुद को रोते हुए देखा है? या फिर कभी ऐसा हुआ है कि आपकी परीक्षा छूट गई हो ? सपने हमारे जीवन का एक अनसुलझा और रहस्यमय हिस्सा होते हैं, जो अक्सर हमें भविष्य के बारे में कुछ संकेत देते हैं. Mystery of dreams स्वप्न शास्त्र के अनुसार, हर सपने का एक खास अर्थ होता है. चाहे आप खुद को रोते हुए देखें या परीक्षा छूटने का सपना देखें, इन सभी के गहरे मायने होते हैं जो आपकी असल जिंदगी से जुड़े हो सकते हैं. आइए जानते हैं कि आपके ये सपने आपके लिए कौन से शुभ या अशुभ संकेत लेकर आते हैं. Mystery of dreams: सपने में खुद को रोते हुए देखना: शुभ या अशुभ? Seeing Yourself Crying in a Dream: Auspicious or Inauspicious? Mystery of dreams: अगर आप सपने में खुद को रोते हुए देखते हैं, तो स्वप्न शास्त्र और सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार यह एक बेहद शुभ संकेत माना जाता है. इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में आपके मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि होने वाली है. Mystery of dreams आपको कोई अवार्ड मिल सकता है, आपकी कोई योजना सफल हो सकती है, या आपको कोई शुभ सूचना मिल सकती है. यह लंबी उम्र और मजबूत आर्थिक स्थिति का भी सूचक हो सकता है. वहीं, सपने में अकेले और जोर-जोर से रोना भविष्य में कुछ अच्छा होने और जीवन में बड़े बदलावों का संकेत देता है. यह भी हो सकता है कि आपकी कोई इच्छा पूरी होने वाली हो या कार्यक्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आएं. यदि आप अविवाहित हैं और खुद को रोते हुए देखते हैं, Mystery of dreams तो यह विवाह तय होने का संकेत हो सकता है. कभी-कभी, सपने में खुद को रोते हुए देखना आपकी मानसिक स्थिति को भी दर्शाता है, जिसका अर्थ यह भी हो सकता है कि असल जिंदगी में कोई वजह है जो आपको परेशान कर रही है. दूसरों को रोते हुए देखना: विभिन्न संदर्भ और उनके अर्थ Seeing Others Crying: Different Contexts and Their Meanings सपने में किसी और को रोते हुए देखने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं 1. किसी दूसरे व्यक्ति को रोते हुए देखना: जनसत्ता के अनुसार, यह एक अशुभ संकेत है. इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में आपके करीबियों को परेशानियां घेर सकती हैं, आपको कोई अशुभ सूचना मिल सकती है, या धन की हानि हो सकती है. यह जीवन में आने वाली परेशानियों का संकेत हो सकता है, Mystery of dreams कि आपका कुछ काम बिगड़ सकता है या किसी के साथ संबंध खराब हो सकते हैं. हालांकि, एक अन्य स्रोत के अनुसार, अगर आप किसी दूसरे इंसान को एक कोने में बैठकर रोते हुए देखते हैं, तो यह एक शुभ संकेत होता है. ऐसे सपने असल जिंदगी में आपके लिए शांति भरा समय लेकर आते हैं, आपकी सारी टेंशन खत्म हो सकती हैं, Mystery of dreams और आने वाला समय तरक्की भरा हो सकता है. इससे आपको अटका हुआ धन भी प्राप्त हो सकता है. सपने में कुआं देखना शुभ होता है या अशुभ, जाने सच 2. किसी दूसरे व्यक्ति के साथ खुद को रोता देखना: स्वप्न शास्त्र अनुसार, अगर कोई व्यक्ति सपने में किसी दूसरे व्यक्ति के साथ स्वयं को रोता हुआ देखता है, तो यह एक शुभ संकेत हो सकता है. शास्त्रों के अनुसार, इसका अर्थ है कि आपको धन लाभ हो सकता है, कोई शुभ समाचार मिल सकता है, या आपका कोई मनोरथ (इच्छा) पूर्ण हो सकता है. 3. सपने में बच्चे को रोते हुए देखना: यह एक अशुभ संकेत होता है. Mystery of dreams इसका मतलब है कि आपकी लाइफ में जल्दी ही कोई परेशानी आने वाली है. इसके साथ ही आपको आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ सकता है या फिर आपके साथ कोई दुर्घटना हो सकती है. परीक्षा से जुड़े सपनों का अर्थ (Meaning of Exam-Related Dreams) परीक्षा से संबंधित सपने भी भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं: 1. परीक्षा छूटने का सपना देखना: अगर आप सपने में परीक्षा छूटने का सपना देखते हैं तो यह एक बेहद अशुभ संकेत है. Mystery of dreams इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में आपके आत्मविश्वास में कमी आ सकती है. 2. परीक्षा पास करने, प्रथम आने या पूर्ण अंक प्राप्त करने का सपना देखना: परीक्षा पास करने, परीक्षा में प्रथम आने, या परीक्षा में पूर्ण अंक आने का सपना देखना अच्छी किस्मत का सूचक माना जाता है. इसका मतलब है कि आपकी आने वाले दिनों में लोकप्रियता बढ़ने वाली है.

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shrI ChaNDIpAThaH: श्रीचण्डीपाठः

ShrI ChaNDIpAThaH: श्रीचण्डीपाठः ॥ ॐ श्री देवैः नमः ॥ ॥ अथ चंडीपाठः ॥ या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।नमस्तस्यै १४ नमस्तस्यै १५ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-१६॥ या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।नमस्तस्यै १७ नमस्तस्यै १८ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-१९॥ या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै २० नमस्तस्यै २१ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२२॥ या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै २३ नमस्तस्यै २४ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२५॥\ या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै २६ नमस्तस्यै २७ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-२८॥ या देवी सर्वभूतेषु च्छायारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै २९ नमस्तस्यै ३० नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३१॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ३२ नमस्तस्यै ३३ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३४॥ या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ३५ नमस्तस्यै ३६ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-३७॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ३८ नमस्तस्यै ३९ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४०॥ या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ४१ नमस्तस्यै ४२ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४३॥ या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ४४ नमस्तस्यै ४५ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४६॥ या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ४७ नमस्तस्यै ४८ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-४९॥ या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ५० नमस्तस्यै ५१ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५२॥ या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ५३ नमस्तस्यै ५४ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५५॥ या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ५६ नमस्तस्यै ५७ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-५८॥ या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ५९ नमस्तस्यै ६० नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६१॥ या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ६२ नमस्तस्यै ६३ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६४॥ या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ६५ नमस्तस्यै ६६ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-६७॥ या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ६८ नमस्तस्यै ६९ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७०॥ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ७१ नमस्तस्यै ७२ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७३॥ या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै ७४ नमस्तस्यै ७५ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-७६॥ इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भुतानाञ्चाखिलेषु या ।भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ ५-७७॥ चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ।नमस्तस्यै ७८ नमस्तस्यै ७९ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५-८०॥ ॥ इति चंडीपाठः ॥

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ChaNDikA HRidaya stotram: चण्डिकाहृदयस्तोत्रम्

ChaNDikA HRidaya stotram: चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् अस्य श्री चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य ।मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, श्री चण्डिका देवता ।ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं,अस्य श्री चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः । ध्यानं ।सर्वमंगळ मांगल्ये शिवे सर्वार्त्थ साधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते ॥ ब्रह्मोवाच ।अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं ।चण्डिका हृदयं गुह्यं श‍ृणुष्वैकाग्रमानसः । ।ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे,गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूपधारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वलज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधरीकृत दिगन्तरे,सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये,भूतवेताळवृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे, मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि, महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते, त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके, ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणीचामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते, नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे, महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते,नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके,शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे,त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते, ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय, द्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय, श्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्,शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान् राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः, स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः – मम सर्व कार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा –राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे ।भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ॥

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Shri Chamunda Stutih: श्रीचामुण्डा स्तुतिः

Shri Chamunda Stutih: श्रीचामुण्डा स्तुतिः जयस्व देवि चामुण्डे जय भूताऽपहारिणि ।जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥ विश्वमूर्तियुते शुद्धे विरूपाक्षी त्रिलोचने ।भीमरूपे शिवे विद्ये महामाये महोदरे ॥ २॥ मनोजये मनोदुर्गे भीमाक्षि क्षुभितक्षये ।महामारि विचित्राङ्गि गीतनृत्यप्रिये शुभे ॥ ३॥ विकरालि महाकालि कालिके पापहारिणि ।पाशहस्ते दण्डहस्ते भीमहस्ते भयानके ॥ ४॥ चामुण्डे ज्वलमानास्ये तीक्ष्णदंष्ट्रे महाबले ।शिवयानप्रिये देवी प्रेतासनगते शिवे ॥ ५॥ भीमाक्षि भीषणे देवि सर्वभूतभयङ्करि ।करालि विकरालि च महाकालि करालिनि ॥ ६॥ कालि करालविक्रान्ते कालरात्रि नमोऽस्तु ते ।सर्वशस्त्रभृते देवि नमो देवनमस्कृते ॥ ७॥ ॥फलश्रुतिः ॥ एवं स्तुता शिवदूती रुद्रेण परमेष्ठिना ।तुतोष परमा देवी वाक्यं चैवमुवाच ह ॥ ८॥ वरं वृष्णीष्व देवेश यत्ते मनसि वर्तते ।श्रीरुद्र उवाचस्तोत्रेणाऽनेन ये देवि स्तोष्यन्ति त्वां वरानने ॥ ९॥ तेषां त्वं वरदा देवि भव सर्वगता सती ।इमं पर्वतमारुह्य यः पूजयति भक्तितः ॥ १०॥ स पुत्रपौत्रपशुमान् Chamunda Stutih समृद्धिमुपगच्छतु ।यश्चैवं श‍ृणुयाद्भक्त्या स्तवं देवि समुद्भवम् ॥ ११॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छतु ।भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः ॥ १२॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां सोपवासो नरोत्तम ।संवत्सरेण लभतां राज्यं निष्कण्टकं पुनः ॥ १३॥ एषा ज्ञानान्विता शाक्तिः शिवदूतीति चोच्यते ।य एवं श‍ृणुयान्नित्यं भक्त्या परमया नृप ॥ १४॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमाप्नुयात् ।यश्चैनं पठते भक्त्या स्नात्वा वै पुष्करे जले ॥ १५॥ सर्वमेतत्फलं प्राप्य ब्रह्मलोके महीयते ।यत्रैतल्लिखितं गेहे सदा तिष्ठति पार्थिव ॥ १६॥ न तत्राऽग्निभयं घोरं सर्वचोरादि सम्भवम् ।यश्चेदं पूजयेद्भक्त्या पुस्तकेऽपि स्थितं बुधाः ॥ १७॥ तेन चेष्टं भवेत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।जायन्ते बहवः पुत्राः धनं धान्यं वरा स्त्रियः ॥ १८॥ रत्नान्यश्वा गजा भृत्यास्तेषामाशु भवन्ति च ।यत्रेदं लिख्यते गेहे तत्राप्येवं ध्रुवं भवेत् ॥ १९॥ ॥ इति पाद्मे पुराणे सृष्टिखण्डे श्रीचामुण्डा स्तुतिः समाप्ता ॥ इति श्रीपाद्मपुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे शिवदूतीचरितं नाम ।एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१॥ पद्मपुराण । सृष्टिखण्ड । अध्याय १/३१। १५८-१६७॥

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Shri Durga Panjara Stotram:श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रम्

Shri Durga Panjara Stotram:श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रम् विनियोगःॐ अस्य श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्रस्य सूर्य ऋषिः, त्रिष्टुप्छन्दः,छाया देवता, श्रीदुर्गा पञ्जरस्तोत्र पाठे विनियोगः ।ध्यानम् ।ॐ हेम प्रख्यामिन्दु खण्डात्तमौलिं शङ्खाभीष्टा भीति हस्तां त्रिनेत्राम् ।हेमाब्जस्थां पीन वस्त्रां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि ।अपराध शतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति नतां ब्रह्मादयः सुराः ।सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ॥ १॥ मार्कण्डेय उवाच –दुर्गे दुर्गप्रदेशेषु दुर्वाररिपुमर्दिनी ।मर्दयित्री रिपुश्रीणां रक्षां कुरु नमोऽस्तुते ॥ १॥ पथि देवालये दुर्गे अरण्ये पर्वते जले ।सर्वत्रोऽपगते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ २॥ दुःस्वप्ने दर्शने घोरे घोरे निष्पन्न बन्धने ।महोत्पाते च नरके दुर्गेरक्ष नमोऽस्तुते ॥ ३॥ व्याघ्रोरग वराहानि निर्हादिजन सङ्कटे ।ब्रह्मा विष्णु स्तुते दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ४॥ खेचरा मातरः सर्वं भूचराश्चा तिरोहिताः ।ये त्वां समाश्रिता स्तांस्त्वं दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ५॥ कंसासुर पुरे घोरे कृष्ण Durga Panjara रक्षणकारिणी ।रक्ष रक्ष सदा दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ६॥ अनिरुद्धस्य रुद्धस्य दुर्गे बाणपुरे पुरा ।वरदे त्वं महाघोरे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ७॥ सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) देव द्वारे नदी तीरे Durga Panjara राजद्वारे च सङ्कटे ।पर्वता रोहणे दुर्गे दुर्गे रक्ष नमोऽस्तुते ॥ ८॥ दुर्गा पञ्जर मेतत्तु दुर्गा सार समाहितम् ।पठनस्तारयेद् दुर्गा नात्र कार्या विचारण ॥ ९॥ रुद्रबाला महादेवी क्षमा च परमेश्वरी ।अनन्ता विजया नित्या मातस्त्वमपराजिता ॥ १०॥ इति श्री मार्कण्डेयपुराणे देवीमहात्म्ये रुद्रयामले देव्याः पञ्जरस्तोत्रम् ।

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Santan Saptami

Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व

Santan Saptami;प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है।Santan Saptami 2025 माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।सनातन धर्म में संतान सप्तमी व्रत का खास महत्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत (Santan Saptami 2025 ) कब रखा जाएगा? इस वर्ष 2025 में, Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी की तिथि को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कई लोग जानना चाहते हैं कि संतान सप्तमी का व्रत 29 अगस्त को रखा जाएगा या 30 अगस्त को। आइए, इस भ्रम को दूर करते हैं और जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि। संतान सप्तमी डेट और पूजा मुहूर्त (Santan Saptami 2025 Date And Puja Time) Santan Saptami 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। वहीं, इसका अंत 30 अगस्त को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। ऐसे में 30 अगस्त को संतान सप्तमी का उपवास रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। चूंकि उदय तिथि के अनुसार व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, इसलिए Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी का व्रत 30 अगस्त 2025, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहेगी, जो व्रत के लिए सर्वाधिक मान्य है। संतान सप्तमी व्रत का महत्व:Importance of Santan Saptami fast धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत अपार पुण्य फलदायी होता है। इस व्रत को करने से: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां… संतान सप्तमी 2025: पूजा विधि: Santan Saptami 2025: Puja method संतान सप्तमी के दिन व्रत और पूजा करने की विधि इस प्रकार है: निष्कर्ष संतान सप्तमी का व्रत माता-पिता के लिए उनकी संतान के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस वर्ष 30 अगस्त 2025 को श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत को रखें और भगवान शिव और माता पार्वती से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करें। यह ब्लॉग पोस्ट आपकी वेबसाइट ‘कर्मसु’ के लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह धार्मिक जानकारी को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों के लिए उपयोगी है।

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Ganesh Visarjan

Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां…

Ganesh Visarjan: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश उत्सव का शुभारंभ होता है. यह पर्व दस दिनों तक पूरे भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है. गणेश चतुर्थी का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का प्राकट्य हुआ था. यह उत्सव केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और अब तो विदेशों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, Ganesh Visarjan जहां दस दिनों तक अखंड भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं. गृहस्थ लोग भी बप्पा की कृपा पाने के लिए अपने घर में गणेश जी को स्थापित करते हैं. गणेश चतुर्थी Ganesh Visarjan के दिन बप्पा को घर लाकर विधिवत पूजा करने के साथ उसी दिन या फिर डेढ़, तीन, पांच, सात दिन में, या फिर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा को जल में विसर्जित करते हैं. Ganesh Visarjan विसर्जन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है. यदि आप भी घर पर गणपति बप्पा को लेकर आए हैं, तो द्रिक पंचांग और हिंदू पंचांग के अनुसार जान लें कि Ganesh Visarjan गणपति बप्पा को किस तिथि और किस समय विदा करना सबसे शुभ है. अनंत चतुर्दशी 2025 की तिथि और विसर्जन मुहूर्त: Anant Chaturdashi 2025 date and immersion time अनंत चतुर्दशी, जो गणेश उत्सव का अंतिम दिन होता है, 6 सितंबर 2025, शनिवार को मनाई जाएगी. • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 6 सितंबर 2025 को 03:12 ए एम बजे • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2025 को 01:41 ए एम बजे • उदया तिथि के हिसाब से अनंत चतुर्दशी: 6 सितंबर 2025 को अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के शुभ मुहूर्त (6 सितंबर 2025, शनिवार) • प्रातः मुहूर्त (शुभ): 07:36 ए एम से 09:10 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:19 पी एम से 05:02 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 06:37 पी एम से 08:02 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 7 सितंबर को 09:28 पी एम से 01:45 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 7 सितंबर को 04:36 ए एम से 06:02 ए एम तक Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा अनंत चतुर्दशी से पहले गणेश विसर्जन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times for Ganesh immersion before Anant Chaturdashi Ganesh Visarjan अगर आप पूरे दस दिनों तक बप्पा को नहीं रख सकते हैं, तो हिंदू पंचांग के अनुसार Ganesh Visarjan गणेश चतुर्थी के दिन, डेढ़ दिन बाद, तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन किया जा सकता है. इन दिनों पर विसर्जन के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गणेश चतुर्थी पर गणेश विसर्जन (27 अगस्त 2025, बुधवार): • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ): 03:35 पी एम से 06:48 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 28 अगस्त को 08:12 पी एम से 12:23 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 28 अगस्त को 03:10 ए एम से 04:33 ए एम तक 2. एक और आधा दिन (डेढ़ दिन) के बाद गणेश विसर्जन (28 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार) • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:22 पी एम से 03:35 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 05:11 पी एम से 06:47 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (अमृत, चर): 06:47 पी एम से 09:35 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 29 अगस्त को 12:22 ए एम से 01:46 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ, अमृत): 29 अगस्त को 03:10 ए एम से 05:58 ए एम तक 3. तीसरे दिन गणेश विसर्जन (29 अगस्त 2025, शुक्रवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 05:58 ए एम से 10:46 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर): 05:10 पी एम से 06:46 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 12:22 पी एम से 01:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 09:34 पी एम से 10:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 30 अगस्त को 12:22 ए एम से 04:34 ए एम तक 4. पांचवें दिन गणेश विसर्जन (31 अगस्त 2025, रविवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 07:34 ए एम से 12:21 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 01:57 पी एम से 03:32 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 06:44 पी एम से 10:57 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 1 सितंबर को 01:46 ए एम से 03:10 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ): 1 सितंबर को 04:35 ए एम से 05:59 ए एम तक 5. सातवें दिन गणेश विसर्जन (2 सितंबर 2025): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 09:10 ए एम से 01:56 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 03:31 पी एम से 05:06 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 08:06 पी एम से 09:31 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 3 सितंबर को 10:56 पी एम से 03:10 ए एम तक निष्कर्ष गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में हर चीज़ का एक अंत होता है, Ganesh Visarjan और यह चक्र चलता रहता है. बप्पा को विधिवत विदा करने से वे अगले साल वापस आने का न्यौता स्वीकार करते हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. अस्वीकरण: यह लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है. इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं. इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम्

Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम् ॥ पूर्वपीठिका ॥ महादेवि गणेशस्य वरदस्य महात्मनः ।कवचं ते प्रवक्ष्यामि वज्रपञ्जरकाभिधम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचस्य श्रीभैरव ऋषिः,गायत्रं छन्दः, श्रीमहागणपति देवता, गं बीजं, ह्रीं शक्तिः,कुरु कुरु कीलकं, वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थेमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ श्रीभैरवर्षये नमः शिरसि । गायत्रछन्दसे नमो मुखे ।श्रीमहागणपतिदेवतायै नमो हृदि । गं बीजाय नमो गुह्ये ।ह्रींशक्तये नमो नाभौ । कुरु कुरु कीलकाय नमः पादयोः ।वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थे महागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठेविनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ करन्यासः ॥ गां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । गीं तर्जनीभ्यां नमः ।गूं मध्यमाभ्यां नमः । गैं अनामिकाभ्यां नमः ।गौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । गः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ गां हृदयाय नमः । गीं शिरसे स्वाहा । गूं शिखायै वषट् ।गैं कवचाय हुम् । गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । गः अस्त्राय फट् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ विघ्नेशं विश्ववन्द्यं सुविपुलयशसं लोकरक्षाप्रदक्षंसाक्षात्सर्वापदासु प्रशमनसुमतिं पार्वतीप्राणसूनुम् ।प्रायः सर्वासुरेन्द्रैः ससुरमुनिगणैः साधकैः पूज्यमानंकारुण्येनान्तरायामितभयशमनं विघ्नराजं नमामि ॥ ॥ कवचपाठः ॥ ॐ श्रीं ह्रीं गं शिरः पातु महागणपतिः प्रभुः ।विनायको ललाटं मे विघ्नराजो भ्रुवौ मम ॥ १॥ पातु नेत्रे गणाध्यक्षो नासिकां मे गजाननः ।श्रुती मेऽवतु हेरम्बो गण्डौ मे मोदकाशनः ॥ २॥ द्वैमातुरो मुखं पातु चाधरौ पात्वरिन्दमः ।दन्तान्ममैकदन्तोऽव्याद्वक्रतुण्डोऽवताद्रसाम् ॥ ३॥ गाङ्गेयो मे गलं पातु स्कन्धौ सिंहासनोऽवतु ।विघ्नान्तको भुजौ पातु हस्तौ मूषकवाहनः ॥ ४॥ ऊरू ममावतान्नित्यं देवस्त्रिपुरघातनः ।हृदयं मे कुमारोऽव्याज्जयन्तः पार्श्वयुग्मकम् ॥ ५॥ प्रद्युम्नो मेऽवतात्पृष्ठं नाभिं शङ्करनन्दनः ।कटिं नन्दिगणः पातु शिश्नं विश्वेश्वरोऽवतु ॥ ६॥ मेढ्रे मेऽवतु सौभाग्यो भृङ्गिरीटी च गुह्यकम् ।विराटकोऽवतादूरू जानू मे पुष्पदन्तकः ॥ ७॥ जङ्घे मम विकर्तोऽव्याद्गुल्फावन्त्यगणोऽवतु ।पादौ चित्तगणः पातु पादाधो लोहितोऽवतु ॥ ८॥ पादपृष्ठं सुन्दरोऽव्यान्नूपुराढ्यो वपुर्मम ।विचारो जठरं पातु भूतानि चोग्ररूपकः ॥ ९॥ शिरसः पादपर्यन्तं वपुः सप्तगणोऽवतु ।पादादिमूर्धपर्यन्तं वपुः पातु विनर्तकः ॥ १०॥ विस्मारितं तु यत्स्थानं गणेशस्तत्सदाऽवतु ।पूर्वे मां ह्रीं करालोऽव्यादाग्नेये विकरालकः ॥ ११॥ दक्षिणे पातु संहारो नैरृते रुरुभैरवः ।पश्चिमे मां महाकालो वायौ कालाग्निभैरवः ॥ १२॥ उत्तरे मां सितास्योऽव्यादैशान्यामसितात्मकः ।प्रभाते शतपत्रोऽव्यात्सहस्रारस्तु मध्यमे ॥ १३॥ दन्तमाला दिनान्तेऽव्यान्निशि पात्रं सदाऽवतु ।कलशो मां निशीथेऽव्यान्निशान्ते परशुस्तथा ।सर्वत्र सर्वदा पातु शङ्खयुग्मं च मद्वपुः ॥ १४॥ ॐ ॐ राजकुले हौं हौं रणभये ह्रीं ह्रीं कुद्यूतेऽवतात्श्रीं श्रीं शत्रुगृहे शौं शौं जलभये क्लीं क्लीं वनान्तेऽवतु ।ग्लौं ग्लूं ग्लैं ग्लं गुं सत्त्वभीतिषु महाव्याध्यार्तिषु ग्लौं गं गौंनित्यं यक्षपिशाचभूतफणिषु ग्लौं गं गणेशोऽवतु ॥ १५॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इतीदं कवचं गुह्यं सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।वज्रपञ्जरनामानं गणेशस्य महात्मनः ॥ १॥ अङ्गभूतं मनुमयं सर्वाचारैकसाधनम् ।विनानेन न सिद्धिः स्यात्पूजनस्य जपस्य च ॥ २॥ तस्मात्तु कवचं पुण्यं पठेद्वा धारयेत्सदा ।तस्य सिद्धिर्महादेवि करस्था पारलौकिकी ॥ ३॥ यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति पाठतः ।अर्धरात्रे पठेन्नित्यं सर्वाभीष्टफलं लभेत् ॥ ४॥ इति गुह्यं सुकवचं महागणपतेः प्रियम् ।सर्वसिद्धिमयं दिव्यं गोपयेत्परमेश्वरि ॥ ॥ श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Lord ganesha

Lord ganesha dreams meaning: सपने में भगवान गणेश का दिखना देता है यह संकेत, जान लें इसका मतलब

Dreams meaning: स्वप्न शास्त्र: सपने में भगवान गणेश को देखना देता है ये शुभ संकेत, जानिए क्या पड़ता है जीवन पर असर Lord ganesha: क्या आप भी सपने देखते हैं? अक्सर हम में से कई लोग ऐसे सपने देखते हैं जो हमें सुखद अनुभव देते हैं, वहीं कुछ सपने भयभीत भी कर सकते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर सपने का असल जिंदगी में वही मतलब नहीं होता जो हम सोचते हैं? Lord ganesha धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और शुभकर्ता कहा जाता है। सच्चे भाव से उनकी पूजा करने वाले भक्तों को किसी विघ्न का सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसे में, अगर आपको सपने में भगवान गणेश के दर्शन हो जाएं, तो इसे बेहद शुभ और दुर्लभ माना जाता है! आइए जानते हैं Lord ganesha स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में गणपति का आना आपके जीवन पर क्या प्रभाव डालता है। Lord ganesha dreams meaning: सपने में भगवान गणेश का दिखना देता है 1. सपने में गणेशजी की पूजा करना स्वप्न शास्त्र कहता है कि यदि आप सपने में खुद को Lord ganesha भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करते देखते हैं, तो यह एक अत्यंत शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि आपको जल्द ही कोई खुशखबरी मिल सकती है। साथ ही, आप किसी समस्या से निजात पा सकते हैं और आने वाले दिनों में आपको आकस्मिक धनलाभ होने की भी संभावना है। यह दर्शाता है कि आप पर गणेश जी की असीम कृपा बनी रहेगी। 2. सुबह के समय गणेश जी का सपना आना अगर आपको सुबह के समय भगवान गणेश जी का सपना आता है, तो यह एक बहुत ही शुभ संकेत माना जाता है। इसका मतलब है कि आपकी कोई मनोकामना पूर्ण हो सकती है। आपको आर्थिक लाभ और धन-संपत्ति का लाभ भी मिल सकता है। करियर में आपको कोई अच्छा अवसर प्राप्त हो सकता है, और आपकी इच्छाओं की पूर्ति भी हो सकती है। 3. सपने में गणेशजी की मूर्ति दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको सपने में भगवान गणेश जी की मूर्ति दिखाई देती है, तो यह एक बेहद शुभ संकेत है। इस सपने का अर्थ है कि आपके घर-परिवार में कोई धार्मिक या मांगलिक कार्यक्रम हो सकता है। आपके जो रुके हुए काम थे, वे अब पूरे हो सकते हैं, और आपको आकस्मिक धनलाभ भी हो सकता है। Lord ganesha यह सपना किसी योजना में आपकी सफलता का भी सूचक है। इसके अलावा, आपको लंबे समय से जिस खुशखबरी का इंतजार था, वह जल्द ही सुनने को मिल सकती है। 4. गणेशजी को सवारी पर देखना यदि आप सपने में भगवान गणेश जी को मूषक पर सवारी करते हुए देखते हैं, तो यह एक अत्यंत शुभ संकेत माना गया है। इसका मतलब है कि आपको कहीं से धन की प्राप्ति हो सकती है। आपके कार्यों में सिद्धि मिल सकती है, और आपकी कोई मनोकामना पूरी होने वाली है या आपको नौकरी में तरक्की मिलने वाली है। यह सपना किसी शुभ यात्रा पर जाने और इच्छा पूर्ति का भी संकेत देता है। ध्यान रहे, ऐसे सपने को किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। सपने में मृत लोगों का दिखना: क्या हैं इसके शुभ-अशुभ संकेत? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य 5. सपने में गणेश जी का विसर्जन दिखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको सपने में गणेश जी का विसर्जन दिखता है, तो यह थोड़ा सावधानी बरतने का संकेत है। इसका मतलब है कि आपके जीवन में कुछ परेशानी आ सकती है। ऐसे में, आपको सावधान हो जाना चाहिए और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना शुरू कर देनी चाहिए, ताकि वे आपके विघ्नों को दूर करें। निष्कर्ष: कुल मिलाकर, सपने में भगवान गणेश का दिखना अधिकतर परिस्थितियों में एक बहुत ही सकारात्मक और दुर्लभ अनुभव होता है। यह आपके जीवन में आने वाली खुशियों, सफलता, धन लाभ और विघ्नों के नाश का संकेत देता है। Lord ganesha यहां तक कि विसर्जन का सपना भी, संभावित परेशानियों की चेतावनी देते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से आपको भगवान की शरण में जाने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। तो, अगर आपने भी ऐसे सपने देखे हैं, तो इन संकेतों को समझें और सकारात्मकता के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ें!

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Parivartini ekadashi

Parivartini ekadashi 2025:परिवर्तिनी एकादशी पर जरूर करें इन चीजों का दान, सभी संकट होंगे दूर

Parivartini ekadashi: हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि पर परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2025) व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। Parivartini ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। उपासक पर उनकी कृपा बनी रहती है। प्रत्येक मास में दो एकादशी व्रत आते हैं। हर मास की एकादशियों का खास महत्व माना जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिये सो जाते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है और धार्मिक कार्यों, ध्यान, भक्ति आदि के लिये यह समय श्रेष्ठ माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आषाढ़, श्रावण, भादों, आश्विन ये चारों मास धार्मिक रूप से चतुर्मास और चौमासा के रूप में जाने जाते हैं और ऋतुओं में यह काल वर्षा ऋतु का। भगवान विष्णु चार महीनों तक सोते रहते हैं और देवोठनी एकादशी को ही जागृत होते हैं, लेकिन इन महीनों में एक समय ऐसा भी आता है कि सोते हुए भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं। यह समय होता है भादों मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का। इसलिये इसे परिवर्तिनी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। आइये जानते हैं भादों मास की शुक्ल एकादशी यानि परिवर्तिनी एकादशी के बारे में – परिवर्तिनी एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Parivartini ekadashi 2025 Muhurat) इस साल 2025 पार्श्व एकादशी बुधवार, 3 सितम्बर 2025 को है। 4 सितम्बर को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय: दोपहर 01:36 से शाम 04:08 बजे तक। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: सुबह 10:18 बजे। एकादशी तिथि प्रारम्भ: 3 सितम्बर 2025 को सुबह 03:53 बजे से। एकादशी तिथि समाप्त: 4 सितम्बर 2025 को सुबह 04:21 बजे तक। परिवर्तिनी एकादशी व्रत एवं पूजा विधि? (Parivartini Ekadashi Vrat aur pooja vidhi) स्नान और संकल्प: इस दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा का संकल्प लेते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें। भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु के वामन अवतार की मूर्ति या तस्वीर को एक साफ स्थान पर स्थापित करें। व्रत का पालन: इस दिन निर्जल या फलाहार व्रत करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। रामायण और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ: दिनभर विष्णु सहस्त्रनाम और रामायण का पाठ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी पूजा सामग्री (Parivartini Ekadashi Pooja Samagri) इस एकादशी पर व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी दुखों का अंत होता है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व (Parivartini Ekadashi Mahatav) परिवर्तिनी एकादशी Parivartini ekadashi को पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जयझूलनी, डोल ग्यारस, जयंती एकादशी आदि कई नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की आराधना की जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अंजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा (Parivartini Ekadashi Vrat Katha) परिवर्तनी एकादशी की कथा भगवान विष्णु के वामना अवतार से जुड़ी हुई है। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की चाल से अवगत भी करवाया लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था। परिवर्तिनी एकादशी पर इन करें चीजों का दान (Parivartini Ekadashi Daan List) परिवर्तिनी एकादशी की पूजा के बाद दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन सच्चे मन से अन्न, मिठाई, फल और धन का दान करें। मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से पैसों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा जीवन के दुख और संकट को दूर करने के लिए परिवर्तिनी एकादशी पर दूध और दही का दान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से सभी तरह की परेशानियों का अंत होता है।   अगर आप गृह क्लेश और रोग का सामना कर रहे है, तो ऐसे में परिवर्तिनी एकादशी व्रत करें और जल का दान करें। इससे कुंडली में पितृ और चंद्र दोष का प्रभाव कम होता है। इसके अलावा आर्थिक तंगी दूर होती है। परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र का दान करना शुभ माना जाता है, क्योंकि विष्णु जी को पीला रंग प्रिय है। ऐसा करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।

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Rishi Panchami Katha PDF Download | ऋषि पंचमी व्रत कथा, विधि और महत्व

Rishi Panchami Katha PDF Download: हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। इन्हीं में से एक है ऋषि पंचमी व्रत, जो सप्तऋषियों को समर्पित होता है। यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल वर्तमान जन्म बल्कि पिछले जन्म के पाप भी समाप्त हो जाते हैं। इस बार ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:05 एएम से 01:39 पीएम तक रहेगा। ऋषि पंचमी का महत्व Rishi Panchami Vrat महिलाओं द्वारा विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने और कथा पढ़ने से महिला को ऋतुकाल में हुई भूलों और अज्ञानता से हुए दोषों से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा कर उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी कथा (Rishi Panchami Katha Pdf) प्राचीन समय में विदर्भ देश में उत्तक नाम का एक सदाचारी ब्राह्मण निवास किया करता थे। जिसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी और उन दोनों की दो संतानें थीं एक पुत्र और एक पुत्री। उसके पुत्र सुविभूषण ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया और कन्या का समयानुसार एक सामान्य कुल में विवाह कर दिया गया लेकिन कुछ ही दिनों में कन्या विधवा हो गई। जिसके बाद वह अपने मायके में रहने लगी। एक दिन कन्या अपने माता-पिता की सेवा करके एक शिलाखण्ड पर शयन कर रही थी कि तभी रात भर में उसके शरीर में कीड़े पड़ गए। सुबह के समय कुछ शिष्यों ने उस कन्या को इस हालत में देखा तो उन्होंने उसकी जानकारी उसकी माता सुशीला को दी। अपनी पुत्री की यह दशा देख के माता विलाप करने लगी और पुत्री को उठाकर ब्राह्मण के पास लाई। ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर कहा- महाराज! यह क्या कारण है कि मेरी पुत्री के सारे शरीर में कीड़े पड़ गए हैं? तब ब्राह्मण ने ध्यान धरके देखा तो पता चला कि उसकी पुत्री ने सात जन्म पहिले अजस्वला होते हुए भी घर के तमाम बर्तन, भोजन, सामग्री को छू लिया था और ऋषि पंचमी व्रत का भी अनादर किया था उसी दोष के कारण इस पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ गए क्योंकि रजस्वला वाली स्त्री का पहला दिन चांडालिनी के बराबर, दूसरा दिन ब्रह्मघातिनी के समान, तीसरा दिन धोबिन के समान होता है। ब्राह्मण ने बताया कि कन्या ने ऋषि पंचमी व्रत के दर्शन अपमान के साथ किये जिससे उसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं । ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) इस प्रकार व्रत करने से स्त्रियां सुंदरता, सौभाग्य, धन और संतान सुख प्राप्त करती हैं और पापों से मुक्ति पाकर उत्तम लोक को प्राप्त होती हैं। ऋषि पंचमी व्रत विधि (Rishi Panchami Vrat Vidhi) तब सुशीला ने कहा- महाराज! ऐसे उत्तम व्रत को आप विधि के साथ वर्णन कीजिए, जिससे सभी प्राणी इस व्रत से लाभ उठा सकें। ब्राह्मण बोले- यह व्रत भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को धारण किया जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान कर व्रत धारण करके सायंकाल सप्तऋषियों का पूजन करना चाहिए, भूमि को शुद्ध गौ के गोबर से लीपने के बाद उस पर अष्ट कमल दल बनाकर नीचे लिखे सप्तऋषियों की स्थापना कर प्रार्थना करनी चाहिए। इस पूजा में महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ महर्षियों की मूर्ति की स्थापना कर आचमन, स्नान, चंदन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पूजन कर व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए। इस व्रत का उद्यापन भी विधि विधान करना चाहिए। चतुर्थी के दिन एक समय भोजन करके पंचमी को व्रत आरम्भ करें। सुबह नदी में स्नान कर गोबर से लीपकर सर्वतोभद्र चक्र बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश के कण्ठ में नया वस्त्र बांधकर पूजा – सामग्री एकत्र कर अष्ट कमल दल पर सप्तऋषियों की सुवर्ण प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद षोडषोपचार से पूजन कर रात्रि को इसकी कथा का श्रवण करें फिर सुबह ब्राह्मण को भोजन दक्षिणा देकर व्रत पूर्ण करें। इस प्रकार से इस व्रत का उद्यापन करने से नारी सुन्दर रूप लावण्य को प्राप्त होकर सौभाग्यवती होकर धन व पुत्र से संतुष्ट हो उत्तम गति को प्राप्त होती है। Rishi Panchami Katha PDF Download क्यों करें? 👉 [Download Rishi Panchami Katha PDF Here]

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