Sawan Amavasya 2025: कब पड़ेगी सावन महीने की अमावस्या? जानें इस दिन किन कामों की है सख्त मनाही

Sawan Amavasya 2025: श्रावण मास की अमावस्या पर कुंडली और जीवन से जुड़े तमाम तरह के दोषों को दूर करने के लिए पूजा के कौन से उपाय प्रभावी माने गये हैं? इस दिन किस कार्य को करना और किस कार्य को भूलकर भी नहीं करना चाहिए, जानने के लिए पढ़ें ये लेख. Sawan Amavasya 2025 Date: पवित्र श्रावण मास को शिव की साधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है. इस मास में तमाम पर्वों के साथ जो अमावस्या पड़ती है, उसे हरियाली अमावस के नाम से जाना जाता है. अमावस्या तिथि को मंत्र सिद्धि, पितृ कार्य और स्नान-दान आदि के लिए फलदायी माना गया है. पंचांग के अनुसार श्रावण मास की अमावस्या तिथि इस साल 24 जुलाई को प्रात:काल 02:28 बजे से प्रारंभ होकर 25 जुलाई 2025 को पूर्वाह्न 12:40 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार स्नान-दान और पितृपूजा आदि कार्य के लिए 24 जुलाई 2025 को ही अमावस्या मान्य होगी. आइए जानते हैं कि श्रावण अमावस्या के दिन शुभ फल की प्राप्ति के लिये क्या करना और अशुभ फल से बचने के लिए क्या नहीं करना चाहिए.  Sawan Amavasya 2025: कब पड़ेगी सावन महीने की अमावस्या सावन अमावस्या शुभ योग: Sawan Amavasya Auspicious Yoga Sawan Amavasya 2025: ज्योतिषियों की मानें तो हरियाली अमावस्या पर हर्षण योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इनमें गुरु पुष्य योग, अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और शिववास योग प्रमुख हैं। इन योग में देवों के देव महादेव और मां पार्वती की पूजा करने से साधक की हर एक मनोकामना पूरी होगी। साथ ही सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलेगी। श्रावण अमावस्या में क्या न करें: What not to do in Shravan Amavasya सनातन परंपरा में न सिर्फ श्रावण बल्कि अन्य मासों में भी पड़ने वाली अमावस्या को लेकर कुछेक नियम बताए गये है. जैसे अमावस्या के दिन शुभ कार्यों को करने की मनाही है. ऐसे में इस दिन किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य से बचें. इस दिन व्यक्ति लंबे समय से वीरान और बंद पड़े अंधेरे स्थान पर नहीं जाना चाहिए. Sawan Amavasya 2025 इसी प्रकार अमावस्या के दिन किसी का प्रयोग हुआ कपड़े, जूते अथवा अन्य कोई सामान नहीं लेना चाहिए. अमावस्या के दिन व्यक्ति को किसी के साथ वाद-विवाद से बचना चाहिए. शास्त्रों में अमावस्या के दिन केश और नाखून काटने की भी मनाही है.  श्रावण अमावस्या में क्या करें:What to do in Shravan Amavasya Sawan Amavasya 2025 : श्रावण अमावस्या के दिन नदी अथवा सरोवर तीर्थ आदि पर स्नान-ध्यान और दान करना अत्यंत ही पुण्यदायी माना गया है.  श्रावण मास की अमावस्या पर पेड़-पौधे लगाना तथा दान करना अत्यंत ही शुभ माना गया है. ऐसे में इस​ दिन आप अपने पितरों की याद में पौधे लगाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.  यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो पितरों के लिए श्राद्ध तथा उनके नाम से जरूरतमंद लोगों को धन और अन्न आदि का दान करना चाहिए.  श्रावण मास की अमावस्या के दिन गाय को चारा खिलाएं तथा उनकी सेवा करें. श्रावण अमावस्या के दिन खराब सामान घर से निकाल कर पूरे घर में दीये आदि से प्रकाश करना चाहिए. इस दिन घर के मुख्य द्वार पर दीया जरूर जलाएं.  कुंडली में कालसर्प दोष के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए श्रावण अमावस्या के दिन विधि-विधान से रुद्राभिषेक करें. 

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Sawan Shivratri 2025

Sawan Shivratri 2025: सावन शिवरात्रि पर भद्रावास योग, जलाभिषेक और पूजा के लिए चार पहर का समय जान लें

Sawan Shivratri 2025: सावन मास की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन जो भोले बाबा पर जल अर्पित करता है, उसकी भोलेबाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।   Sawan Shivrati 2025 Jalabhishek time: सावन मास की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन जो भोले बाबा पर जल अर्पित करता है, उसकी भोलेबाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Sawan Shivratri 2025 इस बार सावन शिवरात्रि ग्रहों का उत्तम संयोग रहेगा। इस समय गुरु मिथुन राशि में है, सूर्य कर्क राशि में शनि मीन राशि में हैं और शुक्र कर्क राशि में है। इसके अलावा ग्रहों के कारणइस दिन सर्वार्थ सिद्धि, गजकेसरी, नवपंचम राजयोग बन रहे हैं। इसके अलावा शिवरात्रि पर भद्रावास योग भी रहेगा। सावन शिवरात्रि पर भद्रा का समय सुबह 5:37 बजे से दोपहर 3:31 बजे तक रहेगा। Sawan Shivratri 2025 वैसे तो सावन के पूरे महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, लेकिन शिवरात्रि परशिवभक्त शिवालयों में जलाभिषेक कर शिव की पूजा अर्चना में करते हैं। Sawan Shivratri 2025: इस साल शिवरात्रि का पर्व 23 जुलाई बुधवार को मनाया जाएगा। इस साल सावन शिवरात्रि की शुरुआत 23 जुलाई को सुबह 4 बजकर 39 मिनट पर होगी। यह तिथि अगले दिन, यानी 24 जुलाई को अर्धरात्रि में 2 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी।ऐसे में श्रद्धालु शिवरात्रि पर ब्रह्म मुहूर्त में भगवान शिव का जलाभिषेक कर सकते हैं। Sawan Shivratri 2025: सावन शिवरात्रि पर भद्रावास योग Sawan Shivratri 2025 Date: सावन शिवरात्रि की तिथि  सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि आरंभ: 23 जुलाई,  प्रातः  04:39 मिनट परसावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि समाप्त:24 जुलाई,  देर रात 02:28  मिनट पर इस तरह 23 जुलाई को सावन माह की शिवरात्रि मनाई जाएगी। सावन शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Sawan Shivratri निशिता काल पूजा समय: 23 जुलाई,  12: 07 मिनट से  12: 48  मिनट तक  भद्रावास योग:  दोपहर 03:31 मिनट तकहर्षण योग: दोपहर 12:35 मिनट से 4 प्रहर का पूजन समय :4 prahar puja time प्रथम प्रहर- सांय  6:59 से रात 9:36 तकद्वितीय प्रहर- रात्रि 9:36 से 12:13 तकतृतीय प्रहर- रात्रि  12:13 से देर रात्रि 2:50 तकचतुर्थ प्रहर-  देर रात्रि  2:50 प्रातः 5:27 तक सावन शिवरात्रि व्रत पारण का समय: Time of breaking of Saavan Shivratri fast सावन शिवरात्रि व्रत पारण : 24 जुलाई 2025, प्रातः 05:27 मिनट से शुरू होगा। सावन शिवरात्रि पर इस विधि से करें पूजा :Worship with this method on Sawan Shivratri सबसे पहले ब्रह्ममुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर मंदिर को स्वच्छ करें।  फिर व्रत का संकल्प लें। अब  गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर यानी पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।  इसके उपरांत बेलपत्र, भांग, धतूरा, सफेद फूल, चंदन, फल और धूप-दीप अर्पित करें।  अब भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करें।  संभव हो तो रात्रि जागरण करें।  शिवरात्रि के अगले दिन शुभ मुहूर्त पर व्रत का पारण करें।  शिव प्रार्थना मंत्र:shiva prayer mantra करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं श्रावण वाणंजं वा मानसंवापराधं ।विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥ शिव नमस्कार मंत्र:Shiva Namaskar Mantra शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।।ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिमहिर्बम्हणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। शिव मूल मंत्र: Shiva Mool Mantra ॐ नमः शिवाय॥ रूद्र मंत्र: Rudra mantra ॐ नमो भगवते रूद्राय । रूद्र गायत्री मंत्र: Rudra Gayatri Mantra ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवायधीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ महामृत्युंजय मंत्र:Mahamrityunjaya Mantra: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।

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Sawan 2025: जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में होता है ये बड़ा अंतर, जानें पूजा के नियम और महत्त्व

Sawan 2025: श्रावण के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे जलाभिषेक कहा जाता है। इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण विधि है रुद्राभिषेक। आइए जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या अंतर होता है। Jalabhishek and Rudrabhishek: क्या आप जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या फर्क है? जलाभिषेक और रुद्राभिषेक दोनों ही शिवभक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। Sawan 2025 एक सरल आस्था की अभिव्यक्ति है, तो दूसरा गहराई से जुड़ी वैदिक परंपरा। दोनों का अपना अलग महत्त्व है और शिवजी हर उस श्रद्धा को स्वीकार करते हैं जो सच्चे मन से की जाए। इस लेख में जानिए दोनों पूजाओं की विधि, नियम, महत्व और धार्मिक दृष्टिकोण से इनका महत्व। Sawan 2025 Jalabhishek vs Rudrabhishek: शिवभक्तों के लिए विशेष माने जाने वाले श्रावण मास की शुरुआत इस बार 11 जुलाई 2025 से चुकी है। यह महीना भगवान शिव की पूजा, व्रत, उपवास और कांवड़ यात्रा जैसे अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रावण के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे जलाभिषेक कहा जाता है। Sawan 2025 इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण विधि है रुद्राभिषेक, जो वैदिक मंत्रों और विशेष सामग्री के साथ किया जाता है। कई बार लोग इन दोनों पूजा विधियों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में बड़ा अंतर होता है। आइए जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या अंतर होता है Sawan 2025: जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में होता है ये बड़ा अंतर क्या होता है जलाभिषेक: What is Jalabhishek? जलाभिषेक का अर्थ है शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित करना। Sawan 2025 यह सबसे सरल और प्रचलित अभिषेक विधि है, जिसे कोई भी भक्त आसानी से कर सकता है। विशेष रूप से श्रावण मास में भक्तजन सुबह उठकर शिव मंदिर जाते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यह एक सामान्य लेकिन अत्यंत पुण्यदायक पूजा मानी जाती है। जलाभिषेक की विधि: Method of Jalabhishek प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें कांसे या तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल अर्पित करें जल के साथ बेलपत्र, आक, धतूरा और सफेद फूल भी अर्पित करें महत्त्व: importance जलाभिषेक से मन की शुद्धि होती है, पापों का नाश होता है और व्यक्ति में मानसिक शांति आती है। Sawan 2025 यह शिवभक्ति की पहली और सरल सीढ़ी मानी जाती है। क्या होता है रुद्राभिषेक :What is Rudrabhishek? रुद्राभिषेक एक विशेष वैदिक प्रक्रिया है जिसमें ऋग्वेद या यजुर्वेद के रुद्र सूक्त मंत्रों का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद आदि से अभिषेक किया जाता है। यह पूजा विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों द्वारा की जाती है और इसमें मंत्रोच्चारण की विशेष भूमिका होती है। रुद्राभिषेक की विधि: Method of Rudrabhishek शुभ मुहूर्त में पंडित के साथ पूजा आरंभ करें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करें रुद्र सूक्त, शिवोपासना मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र आदि का उच्चारण करें अंत में आरती, प्रसाद वितरण और शिव चालीसा का पाठ करें महत्त्व: importance रुद्राभिषेक अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इससे कष्टों का निवारण, ग्रहदोष शांति, स्वास्थ्य लाभ और समृद्धि प्राप्त होती है। विशेष रूप से श्रावण सोमवार, महाशिवरात्रि या जन्मदिन/विवाह के अवसर पर यह करवाना अत्यंत फलदायक होता है। उद्देश्य और प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर:Important differences between purpose and process जलाभिषेक और रुद्राभिषेक दोनों ही भगवान शिव की आराधना के प्रभावशाली माध्यम हैं, लेकिन इनकी विधि, उद्देश्य और प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर होता है। जलाभिषेक एक सरल प्रक्रिया है जिसमें भक्त केवल शुद्ध जल को शिवलिंग पर अर्पित करता है। यह पूजा कोई भी व्यक्ति बिना पंडित की सहायता के कर सकता है और यह किसी भी दिन की जा सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य सरल भक्ति के माध्यम से मन की शुद्धि और शांति प्राप्त करना होता है। वहीं दूसरी ओर, रुद्राभिषेक एक विस्तृत और वैदिक प्रक्रिया है जिसमें विविध पवित्र द्रव्यों जैसे दूध, दही, घी, शहद आदि से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। इस पूजन में रुद्रसूक्त, महामृत्युंजय मंत्र और अन्य वैदिक मंत्रों का उच्चारण आवश्यक होता है, अतः इसे पंडित की उपस्थिति में ही संपन्न किया जाता है। रुद्राभिषेक विशेष रूप से श्रावण सोमवार, महाशिवरात्रि या किसी विशेष अवसर पर किया जाता है। इसका उद्देश्य विशेष फल की प्राप्ति, ग्रहदोषों की शांति और मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना होता है।

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Shiv Ji Ki Puja

Shiv Ji Ki Puja: शिवलिंग पर भूल से भी न चढ़ाएं ये फल, रूठ सकते हैं भोलेनाथ

Shiv Ji Ki Puja: सावन का महीना चल रहा है, भक्तों की भारी भीड़ रोजाना शिवालयों पर उमड़ रही है। भक्त भगवान शिव की पसंदीदा चीजों का चढ़ावा चढ़ा रहे हैं। ऐसे में कुछ फल ऐसे भी हैं जो भोलेनाथ को नहीं चढ़ाए जाने चाहिए…. Shiv Ji Ki Puja: श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस साल यह पावन महीना 11 जुलाई से प्रारंभ हो चुका है और यग 9 अगस्त तक चलेगा। इस अवधि में भक्तगण हर दिन शिवजी की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। जलाभिषेक, मंत्र जाप, व्रत और विविध प्रकार के फल-फूलों से शिव की आराधना की जाती है। माना जाता है कि भगवान शिव जल्दि प्रसन्न हो जाते हैं। यदि सच्चे मन से केवल जल अर्पित किया जाए, तो भोलेनाथ वह भी स्वीकार कर लेते हैं। शिव जी को सामान्य प्रसाद प्रिय है, लेकिन कुछ फल ऐसे भी हैं, जिन्हें उनकी पूजा में अर्पित नहीं करना वर्जित माना जाता है। आइए जानते हैं कि ये फल कौन से हैं… Shiv Ji Ki Puja: शिवलिंग पर भूल से भी न चढ़ाएं ये फल केला:(Banana) पुराणों और शास्त्रों में कहा गया है कि केले के उत्पत्ति भगवान शिव के रौद्र रूप और ब्राह्मण के श्राप के कारण हुई थी। ऐसे में कभी भी शिवलिंग पर केला नहीं चढ़ाना चाहिए। नारियल(Coconut) कहते हैं नारियल की उत्पत्ति समुद्र मंथन की प्रक्रिया के समय हुई और इसे मां लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। मां लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। ऐसे में माना जाता है कि भगवान शिव को नारियल नहीं चढ़ाना चाहिए क्योंकि यह शिव को लक्ष्मी जी अर्पित करने जैसा है, जो कि शास्त्रों के मुताबिक वर्जित है। जामुन(Jamun) जामुन को भी शिवलिंग पर नहीं चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों में इसे भी शुद्ध नहीं माना गया है। अनार(Pomegranate) शिवलिंग पर संपूर्ण अनार नहीं चढ़ाना चाहिए। Shiv Ji Ki Puja धार्मिक मान्यता है कि अनार पूरी तरह से शुद्ध नहीं है इसी कारण इसे शिवजी को अर्पित करना उचित नहीं माना जाता। हालांकि, अनार के रस से अभिषेक किया जा सकता है। कटहल(Jackfruit) Shiv Ji Ki Puja:भगवान शिव को भूलकर भी कटहल नहीं चढ़ाना चाहिए क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि कटहल में तमो गुण विद्यमान होता है। जो कि राक्षसी प्रवृत्ति को जन्म देता है।

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Morpankh Upay: शिवभक्त सावधान ! सावन में मोरपंख से करें ये उपाय, मिलेगा विष्णु-शिव दोनों का आशीर्वाद

Morpankh Upay In Sawan: हिन्दू धर्म, ज्योतिष और वास्तु की दृष्टि से मोरपंख का विशेष महत्व है। मोरपंख भगवान श्री कृष्ण को प्रिय है। मोर पंख इतना शुभ है कि श्री कृष्ण ने अपने सिर पर धारण किया हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन मास में मोरपंख से जुड़े कुछ उपाय किए जाएं तो भगवान शिव के साथ-साथ श्री विष्णु की भी कृपा प्राप्त हो सकती है। Morpankh Upay: स्वयं के महीने में अगर मोर पंख से जुड़े उपाय किए जाएं तो इससे ग्रह दोष और बुरी नजर के दोष को दूर किया जा सकता है। मोर पंख के ये उपाय पैसों की तंगी,  से मुक्ति में भी बेहद कारगर माना जाता है। सावन महीना 14 जुलाई 2022 से शुरू हो चुका है और 12 अगस्त तक चलेगा। ऐसे में मोरपंक से जुड़े कुछ उपाय करने से न सिर्फ आर्थिक तंगी दूर होती है बल्कि घर में सुख समृद्धि भी आती है। आइए जानते हैं मोरपंख के उन खास उपायों के बारे में।  Morpankh Upay: शिवभक्त सावधान ! सावन में मोरपंख से करें ये उपाय आर्थिक वृद्धि के लिए:For economic growth Morpankh Upay: आर्थिक वृद्धि के लिए मोर पंख का उपाय भी विशेष माना जाता है. मान्यता के अनुसार इसके लिए श्रीकृष्ण और राधा-रानी के मंदिर में मोर पंख की पूजा करनी चाहिए. इसके बाद उस मोर पंख को धन स्थान या तिजोरी में रख दिया जाता है. ऐसा माना जाता है कि मोर पंख के इस उपाय से धन का प्रवाह बना रहता है. साथ ही फिजूलखर्ची पर भी नियंत्रण बना रहता है. बुरी नजर दूर करने के लिए:To ward off the evil eye Morpankh Upay: ऐसा माना जाता है कि बुरी नजर के कारण काम भी बिगड़ने लगता है. साथ ही अनावश्यक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है. ऐसे में इससे बचने के लिए चांदी के ताबीज में मोर पंख डालकर रोज सिर में रखकर सोने से बुरी नजर नहीं लगती. शत्रुओं को शांत करने के लिए:To pacify the enemies मंगलवार के दिन मोर पंख पर हनुमान जी के मस्तक पर सिंदूर लगाकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर रात भर पूजा स्थल पर छोड़ दें. इसके बाद अगली सुबह उस मोर पंख को पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से शत्रु शांत हो जाते हैं। कालसर्प दोष से छुटकारा: Get rid of Kaalsarp Dosh  सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ की आराधना करके कालसर्प दोष से छुटकारा पाया जा सकता है. जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष हो तो उस व्यक्ति को अपने तकिए के कवल में 7 मोरपंख डालकर रखने चाहिए. माना जाता है ये उपाय करने से इस दोष से छुटकारा मिल जाता है. इस उपाय से जुड़ी एक धार्मिक किंवदंति के अनुसार श्री कृष्ण ने भी कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए अपने मुकुट में मोरपंख धारण किया हुआ था.  ग्रह दोषों से मुक्ति का उपाय: Remedy to get rid of planetary defects यदि कुंडली में ग्रह दोष  है तो उसे दूर करने के लिए हाथ में मोर पंख पकड़कर अशुभ ग्रह से जुड़ा मंत्र 21 बार बोलें और फिर पंख पर पानी छिड़ककर उसे पूजा घर में रख लें। कुछ ही दिन में समाधान देखने को मिलेगा। 

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अर्धनारीश्वरस्तुतिः | ardhanArIshvarastutih

अर्धनारीश्वरस्तुतिः ॥ श्रीः ॥वन्देमह्यमलमयूखमौलिरत्नंदेवस्य प्रकटितसर्वमङ्गलाख्यम् ।अन्योन्यं सदृशमहीनकङ्कणाङ्कंदेहार्धद्वितयमुमार्धरुद्धमूर्तेः ॥ १॥तद्वन्द्वे गिरिपतिपुत्रिकार्धमिश्रंश्रैकण्ठं वपुरपुनर्भवाय यत्र ।वक्त्रेन्दोर्घटयति खण्डितस्य देव्यासाधर्म्यं मुकुटगतो मृगाङ्कखण्डः ॥ २॥एकत्र स्फटिकशिलामलं यदर्धेप्रत्यग्रद्रुतकनकोज्ज्वलं परत्र ।बालार्कद्युतिभरपिञ्जरैकभाग-प्रालेयक्षितिधरश‍ृङ्गभङ्गिमेति ॥ ३॥यत्रैकं चकितकुरङ्गभङ्गि चक्षुःप्रोन्मीलत्कुचकलशोपशोभि वक्षः ।मध्यं च ऋशिमसमेतमुत्तमाङ्गंभृङ्गालीरुचिकचसञ्चयाञ्चितं च ॥ ४॥स्राभोगं घननिबिडं नितम्बबिम्बंपादोऽपि स्फुटमणिनूपुराभिरामः ।आलोक्य क्षणमिति नन्दिनोऽप्यकस्मा-दाश्चर्यं परमुदभूदभूतपूर्वम् ॥ ५॥यत्रार्धं घटयति भूरिभूतिशुभ्रंचन्द्रांशुच्छुरितकुबेरशैलशोभाम् ।अर्धं च प्रणिहितकुङ्कुमाङ्गरागंपर्यस्तारुणरुचिकाञ्चनाद्रिमुद्राम् ॥ ६॥यत्कान्तिं दधदपि काञ्चनाभिरामांप्रोन्मीलद्भुजगशुभाङ्गदोपगूढम् ।बिभ्राणं मुकुटमुपोढचारुचन्द्रंसन्धत्ते सपदि परस्परोपमानम् ॥ ७॥आश्चर्यं तव दयिते हितं विधातुंप्रागल्भ्यं किमपि भवोपतापभाजाम् ।अन्योन्यं गतमिति वाक्यमेकवक्त्र-प्रोद्भिन्नं घटयति यत्र सामरस्यम् ॥ ८॥प्रत्यङ्गं घनपरिरम्भतः प्रकम्पंवामार्धं भुजगभयादिवैति यत्र ।यत्रापि स्फुटपुलकं चकास्ति शीत-स्वःसिन्धुस्नपिततयेव दक्षिणार्धम् ॥ ९॥एकत्र स्फुरति भुजङ्गभोगभङ्गि-र्नीलेन्दीवरदलमालिका परत्र ।एकत्र प्रथयति भास्मनोऽङ्गरागःशुभ्रत्वं मलयजरञ्जनं परत्र ॥ १०॥एकत्रार्पयति विषं गलस्य कार्ष्ण्यंकस्तूरीकृतमपि पुण्ड्रकं परत्र ।एकत्र द्युतिरमलास्थिमालिकाना-मन्यत्र प्रसरति मौक्तिकावलीनाम् ॥ ११॥एकत्र स्रुतरुधिरा करीन्द्रकृत्तिःकौसुम्भं वसनमनश्वरं परत्र ।इत्यादीन्यपि हि परस्परं विरुद्धा-न्येकत्वं दधति विचित्रधाम्नि यत्र ॥ १२॥दन्तानां सितिमनि कज्जलप्रयुक्तेमालिन्येऽप्यलिकविलोचनस्य यत्र ।रक्तत्वे करचरणाधरस्य चान्योनान्योन्यं समजनि नूतनो विशेषः ॥ १३॥कण्ठस्य भ्रमरनिभा विभार्धभागंमुक्त्वा किं स्थितिमकरोच्छिरोरुहार्धे ।अर्धं वा कनकसदृग्रुचिः कचानांसन्त्यज्य न्यविशत किं गलैकदेशे ॥ १४॥सौवर्णः करकमले यथैव वामेसव्येऽपि ध्रुवमभवत्तथैव कुम्भः ।क्रीडैकप्रसृतमतिर्विभुर्बिभर्तिस्वाच्छन्द्यादुरसि तमेव नूनमेनम् ॥ १५॥यत्रासीज्जगदखिलं युगावसानेपूर्णत्वं यदुचितमत्र मध्यभागे ।संरम्भाद्गलितमदस्तदेव नूनंविश्रान्तं घनकठिने नितम्बबिम्बे ॥ १६॥इत्यादीन्प्रविदधुरेव यत्र ताव-त्सङ्कल्पान्प्रथमसमागमे गणेन्द्राः ।यावत्स प्रणतिविधौ पदारविन्दंभृङ्गीशः परिहरति स्म नाम्बिकायाः ॥ १७॥किमयं शिवः किमु शिवाथ शिवा-विति यत्र वन्दनविधौ भवति ।अविभाव्यमेव वचनं विदुषा-मविभाव्यमेव वचनं विदुषाम् ॥ १८॥एकः स्तनः समुचितोन्नतिरेकमक्षिलक्ष्याञ्जनं तनुरपि क्रशिमान्वितेति ।लिङ्गैस्त्रिभिर्व्यवसिते सविभक्तिकेऽपियत्राव्ययत्वमविखण्डितमेव भाति ॥ १९॥यत्र ध्रुवं हृदय एव यदैक्यमासी-द्वाक्काययोरपि पुनः पतितं तदेव ।यस्मात्सतां हृदि यदेव तदेव वाचियच्चैव वाचि करणेऽप्युचितं तदेव ॥ २०॥कान्ते शिवे त्वयि विरूढमिदं मनश्चमूर्तिश्च मे हृदयसम्मददायिनीति ।अन्योन्यमभ्यभिहितं वितनोति यत्रसाधारणस्मितमनोरमतां मुखस्य ॥ २१॥उद्यन्निरुत्तरपरस्परसामरस्य-सम्भावनव्यसनिनोरनवद्यहृद्यम् ।अद्वैतमुत्तमचमत्कृतिसाधनं त-द्युष्माकमस्तु शिवयोः शिवयोजनाय ॥ २२॥लक्ष्याण्यलक्ष्याण्यपरत्र यत्रविलक्षणान्येव हि लक्षणानिसाहित्यमत्यद्भुतमीशयोस्त-न्न कस्य रोमाञ्चमुदञ्चयेत ॥ २३॥जूटाहेर्मुकुटेन्द्रनीलरुचिभिः श्यामं दधत्यूर्ध्वगंभागं वह्निशिखापिशङ्गमधरं मध्ये सुधाच्छच्छविः ।धत्ते शक्रधनुःश्रियं प्रतिमिता यत्रेन्दुलेखानृजु-र्युष्माकं स पयोधरो भगवतो हर्षामृतं वर्षतु ॥ २४॥इत्यर्धनारीश्वरस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

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शिव अपराधस्तवः | aparAdhastavaH | SHIV MANTRA FOR LIFE

शिव अपराधस्तवः शम्भो शङ्कर शान्त शाश्वत शिव स्थाणो भवोमापते भूतेश त्रिपुरान्तक त्रिनयन श्रीकण्ठ कालान्तक । शर्वोग्राभय भर्ग भीम जगतां नाथाक्षय श्रीनिधे रुद्रेशान महेश्वरेश्वर महायोगीशतुभ्यं नमः ॥ १॥ स्वामिन् सर्वजगद्गुरो हर महालीलाक्षमाक्षेत्रस- च्चिद्रूपाखिलभूतभाव्यजगतां नाथ प्रपन्नार्तिहन् । पापघ्नाशुभपाशदुःखभयहृद्भक्तेष्टद ज्ञानद श्रीदातर्क्य षडङ्ग मोक्षण महायोगीश तुभ्यं नमः ॥ २॥ क्रूरं कष्टतरं विनष्टहृदयं भ्रष्टं शठं निष्ठुरं निर्लज्जं कृपणं कृतघ्नमशुचिं बह्वाशिनं हिंसकम् । आशापाशशतप्रबद्धमनसं दुष्कीर्तिभाजं जडं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ३॥ मूर्खं बालमतिं स्वधर्मरहितं धर्मार्थहीनं खलं कामान्धं क्षणिकं कदर्थनपरं दौश्शील्यजन्मस्थलम् । अज्ञं लुब्धमसत्यनिष्ठमधमं प्रज्ञायशोवर्जितं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ४॥ क्षुद्रं दुर्भगमल्पसत्त्वमलसं भग्नव्रतं रागिणं भीरुं डाम्भिकमीर्ष्यकं व्यसनिनं पापात्मकं सूतकम् । आधिव्याधिनिपीडितं जडधियं सद्भिः सदा निन्दितं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ५॥ आकाङ्क्षाश्रयमार्यवर्तिविमुखं क्षीणं गुणद्वेषिणं धूर्तं दुर्गुणमत्यशुद्धहृदयं सर्वत्र सन्देहिनम् । दीनं पापरतं समस्त विषयेष्वासक्तमन्यायिनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ६॥ अश्रद्धं गतपौरुषं कुपथगं जाज्वल्यमानं हृषा संसारार्णवमग्नमूर्मितरलं नीचप्रियं निर्दयम् । वैराग्यानतिदानयोगनियमद्वेष्टारमुन्मादिनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ७॥ द्वन्द्वग्रस्तसमस्तवृत्तिकुशलं सत्सङ्गविद्वेषिणं दुःसङ्गप्रियमप्रतिष्ठवचनं कामातुरं तस्करम् । शैवज्ञानपराङ्मुखं खलजनव्यापारपारङ्गतं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ८॥ दुर्मत्यावमतिप्रवृद्धरजसं सद्वृद्धसेवारिपुं सद्धर्मेष्वसमुत्सुकं गुरुजने मान्येषु चात्युद्धतम् । शिष्टाशिष्टकरप्रियं च सततं दुष्टस्य तुष्टिप्रदं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ९॥ स्वप्नेऽप्युत्तमगन्धपुष्पनिकरैरीशार्चनावर्जितं ध्यानाध्यानविचारणागुणरिपुं तुच्छं मदोच्छृङ्खलम् । दारिद्र्यास्पदमात्मवैरिवशगं तापत्रयस्याश्रयं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १०॥ आत्मातिस्तुतिकारिणं परमहानिन्दाकरं निन्दितं लुण्टाकं पतितं विपर्ययगतस्वान्तं सदा याचकम् । व्याक्रोशाद्विहतस्वकार्यनिचयं सर्वापदां सञ्चयं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ११॥ कृत्याकृत्यविचारवर्जितमतिं व्रात्यं महावञ्चकं दुर्बुद्धिं मदमानमत्सरनिधिं दुर्वृत्तवृत्त्याश्रयम् । मिथ्याज्ञानिनमार्यकण्टकमलं लोकत्रये दूषितं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १२॥ दुष्कर्मप्रचये प्रहृष्टहृदयं क्लेशैश्च सम्पीडितं चार्वाकं कुमतिं कुचेलमलसं कार्पण्यजन्मस्थलम् । भार्यापुत्रगृहादिसक्तमनसं गाम्भीर्यधैर्यच्युतं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १३॥ चित्तक्षोभकरं कलङ्कहृदयं शोकास्पदं लोलुपं सारासारविचारहीनमनसं नीचप्रियं नीरसम् । मत्तोन्मत्तनिकृष्टनष्टचकितं शून्यं हृदालापिनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १४॥ आत्मज्ञानविहीनमात्मविमुखं सर्वात्मभावद्विषं सङ्कल्पैर्बहुभिर्विभिन्नहृदयं दैत्यप्रसक्तं सदा । मर्माविद्वचनं कठोरहृदयं मित्रद्रुहं चुम्बकं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १५॥ वेदोक्ताचरणाशिवात्मचरितं स्वेच्छाप्रवृत्तिं सदा सच्छास्नेष्वपरागिणं प्रियतमालक्ष्मीगुणावेष्टितम् । दाक्षिण्यप्रतिपन्नताविरहितं स्वार्थैकदृष्टिं सदा कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १६॥ सत्यत्यागदयाक्षमाशमदमाद्यर्थानभिज्ञात्मकं देवब्राह्मणगोव्रजातिथिपितृज्ञानात्मकापूजकम् । विश्वस्तेष्वपकारवञ्चनपरं मैत्रीरिपुं दुर्जनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषकरं पाहि माम् ॥ १७॥ कृत्वाधर्ममतिं कथञ्चिदपरः को मत्समोऽस्मिन्भवे- दित्येवं बहुजल्पिनं कुपुरुषं भ्रान्त्याश्रयं राक्षसम् । दृष्टादृष्टसुखैषिणं बत मुदा मुक्त्वा शिवाराधनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १८॥ मार्जालाखुबकाश्वकुक्कुटकपिक्रोडाहिवृत्तिं सदा तीर्थध्वाङ्क्षमनर्थकं परसुखे सन्तापिनं दुःसहम् । त्यक्तोपायममेयकाङ्क्षिणमहो शुण्ठं च चोरोपमं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ १९॥ अस्पृश्यं विकलं कुधैर्यमखिले दोषे स्वकीये गुणं पश्यन्तं चलमात्मकार्यनिरतं पूज्यं विषादात्मकम् । चिन्ताशोकपरीतचेतसमलं सर्वाशुभानां पदं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २०॥ दुष्पूरस्वककुक्षिपूरणपरं भारं भुवः केवलं दासीमेषखरस्वभावमपटुं सम्मानने भाजने । रिक्तं बालकदीर्घसूत्रिणमलं हृच्छल्यशीलं सदा कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि भाम् ॥ २१॥ अत्यादेशिनमुत्तमस्थितिमतां सन्त्यागिनं नास्तिकं रन्ध्रान्वेषिणमन्धमूकबधिरं शम्भोस्तु विश्वात्मनः । माहात्म्य श्रवणस्तुतीक्षणविधौ माहेश्वरा वत्सलं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २२॥ दुष्कार्यालघुभारवाहनपशुं तृष्णातृणग्राहिणं संसारार्णवदुःखपङ्कपतितं यान्तं सदाधो भृशम् । स्वत्वाहन्त्वममत्वमोहमकरैराकृष्यमाणं सदा कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २३॥ भ्रष्टं सर्वजुगुप्सितं परहितव्याघातिनं तामसं सम्भ्रान्तं चपलं विधानविहितव्यापारविद्वेषिणम् । शम्भो त्वत्पदभक्तिहीनमदृढं सम्मूढमात्मद्विषं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २४॥ ज्येष्ठावासमतिप्रमादितमतिं क्षुत्तृड्जराद्यर्दितं स्वप्नेऽप्यन्यपरोपकाररहितं सर्वाहितं दुर्लभम् । लोके सत्परिहार्यनिन्दितमहो दुःखप्रदेशक्रियं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २५॥ त्वक्चुक्लान्त्रसिरातनूरुहमयं काराख्यरन्ध्रस्थितं नानापायपतिष्णु कालशिखिना पापच्यमानं भृशम् । दृष्ट्वापि स्वकलेवरं कृशतरं तत्रापि रक्तं पशुं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २६॥ किं वाचा बहुविस्तरेण भगवन् मत्सन्निभो भूतले नाभून्नास्ति च नो भविष्यति पुमान् निर्भाग्यचूडामणिः । तस्मादीदृशमात्मवञ्चकमहो त्रैलोक्यचूडामणे कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २७॥ सर्वश्रेष्ठ गुणैकभाजन विभो सत्त्वोत्तमेषूत्तमा- सङ्ख्येयावगुणैकभाजनमलं कष्टातिकष्टक्रियम् । श्रीशाश्रीशमतीन्द्रियेन्द्रियवशं निस्सङ्गिनं सङ्गिनं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २८॥ विण्मूत्रकृमिमांसशोणितमयं मेदोऽस्थिमज्जात्मकं निर्गन्धैकनिधिं जरापरिगतं वातादिदोषात्मकम् । दृष्ट्वा तु स्वशरीरमत्र तु सदा वैराग्यहीनं पशुं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ २९॥ विष्ठामूत्रकुजन्त्वनिष्टमशुभं स्वाभाव्यतो नश्वरं कृष्णक्षेण्यविषूचिकाज्वरशिरश्शूलादिरोगास्पदम् । ज्ञात्वा तु स्वशरीरमत्र तु सदा वैराग्यहीनं पशुं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ३०॥ पङ्गुत्वान्ध्यजरित्वमौर्ख्यखलताबाधिर्यजन्मस्थलं क्लेद्यच्छेद्यविशोष्यदाह्यकृशतास्थौल्यस्वभावात्मकम् । सम्पश्यन्नपि दोषमत्र तु सदा सम्प्रीतियुक्तं पशुं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ३१॥ देहक्षालनलेपनादिविधिना संस्पर्शयोग्यं त्वचा छन्नं क्लिन्नमहार्णवं व्रणमुखैर्नित्यं स्रवन्तं मलम् । तं दृष्ट्वाप्यविरागिणं च नरके शूनं सरागं पशुं कारुण्याकरवारिधे भव पितर्दोषाकरं पाहि माम् ॥ ३२॥ ॥ इति अपराधस्तवः सम्पूर्णः ॥

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अघोराष्टकम् | aghorAShTakam | SHIV MANTRA FOR LIFE

श्रीअघोराष्टकम् कालाभ्रोत्पलकालगात्रमनलज्वालोर्ध्वकेशोज्ज्वलं दंष्ट्राद्यस्फुटदोष्ठबिम्बमनलज्वालोग्रनेत्रत्रयम् ।रक्ताकोरकरक्तमाल्यरचितं(रुचिरं)रक्तानुलेपप्रियं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ १॥जङ्घालम्बितकिङ्किणीमणिगणप्रालम्बिमालाञ्चितं (दक्षान्त्रं)डमरुं पिशाचमनिशं शूलं च मूलं करैः ।घण्टाखेटकपालशूलकयुतं वामस्थिते बिभ्रतं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ २॥नागेन्द्रावृतमूर्ध्निज(र्धज) स्थित(श्रुति)गलश्रीहस्तपादाम्बुजं श्रीमद्दोःकटिकुक्षिपार्श्वमभितो नागोपवीतावृतम् ।लूतावृश्चिकराजराजितमहाहाराङ्कितोरस्स्थलं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ३॥धृत्वा पाशुपतास्त्रनाम कृपया यत्कुण्डलि(यत्कृन्तति)प्राणिनां पाशान्ये क्षुरिकास्त्रपाशदलितग्रन्थिं शिवास्त्राह्वयं (?) ।विघ्नाकाङ्क्षिपदं प्रसादनिरतं सर्वापदां तारकं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ४॥घोराघोरतराननं स्फुटदृशं सम्प्रस्फुरच्छूलकं प्राज्यां(ज्यं)नृत्तसुरूपकं चटचटज्वालाग्नितेजःकचम् ।(जानुभ्यां)प्रचटत्कृता(रिनिकरं)स्त्रग्रुण्डमालान्वितं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ५॥भक्तानिष्टकदुष्टसर्पदुरितप्रध्वंसनोद्योगयुक् हस्ताग्रं फणिबद्धहस्तचरणं प्रारब्धयात्रापरम् ।स्वावृत्त्यास्थितभीषणाङ्कनिकरप्रारब्धसौभाग्यकं ? वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ६॥यन्मन्त्राक्षरलाञ्छितापघनवन्मर्त्याश्च(च्च) वज्रार्चिषो भूतप्रेतपिशाचराक्षसकलानिर्घातपाता इव(दिव) ।उत्सन्नाश्च भवन्ति सर्वदुरितप्रोच्चाटनोत्पादकं वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ७॥यद्ध्यानो ध्रुवपूरुषो(ध्यानोद्यतपूरुषो)षितगृहग्रामस्थिरास्थायिनो भूतप्रेतपिशाचराक्षसप्रतिहता निर्घातपाता इव ।यद्रूपं विधिना स्मरन् हि विजयी शत्रुक्षयं प्राप्नुते वन्देऽभीष्टफलाप्तयेऽङ्घ्रिकमलेऽघोरास्त्रमन्त्रेश्वरम् ॥ ८॥॥ इति श्रीअघोराष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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अघोरस्तवः | aghorastavaH  | SHIV MANTRA FOR LIFE

श्रीअघोरस्तवः सकलभुवननाथं सर्वदं सर्ववन्द्यं सहमनु मनुनाथं पूजयित्वा सशक्तिम् ।परमशिवमघोरास्त्राख्यमन्त्राधिराजं परिमितविषयाभिर्वाग्भिरभ्यर्चयामः ॥ १॥यत्पाशसंहृतिषु पाशुपतं महास्त्रं ग्रन्थिप्रभेदनविधौ क्षुरिकास्त्रमाहुः ।विघ्नस्तुतौ च शकलीकरणे शिवास्त्रं वन्दे तदस्त्रमहमैशमघोरसंज्ञम् ॥ २॥यस्ते बिभर्ति निजमूर्धनि मन्त्रचक्रं यो वा बिभर्त्यवयवेषु तदक्षराणि ।सोऽयं निरस्य निखिलग्रहभूतरोगान् (हेयं) जित्वास्त्रनायकरिपूनतिवृद्धिमेति ॥ ३॥वज्रं शक्तिर्दण्डखड्गाहिपाशान् वायोरस्त्रं सा गदा(शङ्खं?) च त्रिशूलम् ।पद्मं चक्रं साधयन्ति स्वकृत्यं लब्ध्वाज्ञां ते दिग्भृतामायुधानि ॥ ४॥न भवति विषपीडा नारिपीडा न चाधिः न खलु निखिलरोगा नापि भूतग्रहार्तिः ।न धनहरणभीतिर्नाभिचारस्य तेषां सकृदपि भुवने त्वां येऽस्त्रराजं स्मरन्ति ॥ ५॥मन्त्री जपाकुसुमसन्निभभीममूर्तिं त्वां घोरमूर्धपरिपिङ्गलकेशपङ्क्तिम् ।दंष्ट्राकरालवदनं तटिदाभजिह्वं व्यात्ताननं रविशशिज्वलनोग्रनेत्रम् ॥ ६॥नागेन्द्रभूषणकपालकृताङ्कमाला- शोभान्वितं भ्रुकुटिभङ्गकरालवक्त्रम् ।धूम्राम्बरं मुखरनूपुरमष्टबाहुं ध्यायन् प्रसिध्यति झणत्क्वणकिङ्किणीकम् ॥ ७॥त्वां दक्षिणैः करतलैरसिशूलमूल- शक्तिं(क्तीः) डमड्डमरुकं चषकं दधानं (?) ।खेटं त्रिशूलनृकपालसुरेन्द्रशस्त्रा- ण्यारब्धयात्रमरिमर्दनमाश्रितोऽस्मि ॥ ८॥कर्णद्वये करयुगे भुजयोश्च युग्मे पार्श्वद्वये पदयुगे कटिमण्डले च ।कुक्षौ गले शिरसि नाथ चतुर्दशाहीन् तत्तद्विभूषणकृतात्मतनूर्बिभर्षि ॥ ९॥वामे शूलदले स्थितस्तव हरिः श्रीनीलरुद्रः पुन- र्मध्ये दक्षिणतो विधिः सुफलके गौरी गुहः कुम्भके ।दण्डाग्रे गणनायको दिनकरो दण्डेऽस्य मूले स्मरः तेनाघाहिगलग्रहोन्मदरिपूनस्त्रेश निर्नाशय ॥ १०॥त्वां सात्त्विकं धवलरूपमुपास्य मोक्षं सम्प्राप्नुवन्ति मनुजाः सुखसन्निविष्टम् ।आरक्तवर्णमद(थ) राजसमुद्धताङ्ग- मा(साद)यन्ति सकलाभिमतार्थसिद्धिम् ॥ ११॥शत्रुक्षयाय सकलामयनाशनाय सर्वोपसर्गहतये च तवातिरौद्रम् ।कृष्णं कृपानिलयतामसमेव शस्तं यानोद्यतं यतिवराः कथयन्ति रूपम् ॥ १२॥यद्वा दमद्दमरुकासिपिशाचशूल- मूलानि दक्षिणकरैरवरैः कपालम् ।त्वां खेटकेन वरघण्टिकया च शूल- मध्यं दधानमहमष्टभुजं नमामि ॥ १३॥आकर्षणे निखिलरोगहतौ रिपूणां स्तम्भे वशीकरणमोहनदीपनेषु ।युद्धोद्यतं तव पुर(वपु)स्तटिदंशुभीमं स्मृत्वोग्रदंष्ट्रमचिरेण फलं लभन्ते ॥ १४॥कृष्णप्रभं त्रिनयनं त्रिभुजं त्रिपादं भीमं महाशनिरवं विकटाट्टहासम् ।त्वां सूचिमुष्टिहननैरहिभूषिताङ्गं ध्यायन्ति धावनपरं रिपुमारणादौ ॥ १५॥त्वां षड्भुजं त्रिनयनं शशिकान्तरूपं पद्माननं विधृतभूषणमूर्धकेशम् ।वामे कपालधनुषी दधतं सखेटं शूलं शरं च परतः प्रणतोऽस्मि सासिम् ॥ १६॥व्याधादरि(वरि)प्रमथने सति भूमिकम्पे दाहे दिशां प्रचुरवृष्टिषु चण्डवाते ।पापक्षये सकलवृद्धिषु शान्तिकादौ भीतौ च देव तव रूपमिदं स्मरन्ति ॥ १७॥सजलघनघनाभं भीमदंष्ट्रं त्रिनेत्रं भुजगधरमघोरं रक्तवस्त्राङ्गरागम् ।परशुडमरुखड्गान् खेटकं बाणचापौ त्रिशिखनरकपाले बिभ्रतं भावयामि ॥ १८॥शूलं मूलं पिशाचं शरमसिसृणियुक्टङ्कयुग्भिण्डिपालं वज्रं तत्स्थूलमध्यं डमरुकमपरैर्घण्टिकां चापखेटौ ।पाशं चक्रं च दण्डं भुजगमनलकं दक्षिणैर्बाहुदण्डै- र्मध्ये त्वां विद्युदाभं विजयिनमनिशं घोरनाथं भजामः ॥ १९॥केऽप्यष्टकाधिकसहस्रकरं विदुस्त्वा- मन्येऽपि चाष्टशतहस्तमतर्क्यवेषम् ।केचिद्द्विपञ्चकरमष्टभुजं परेऽपि केचिच्चतुर्भुजयुतं कतिचिद्द्विबाहुम् ॥ २०॥केचिद्वदन्ति धृतषोडशबाहुदण्ड- मन्ये पुनर्द्विनवसङ्ख्यकरारविन्दम् ।त्वां सर्वतः प्रसृतपाणिपदं तु शैवं तेजः सुदुस्सहतरं वयमामनामः ॥ २१॥त्वां बाहुमूलवलयीकृततक्षकाहिं तन्मध्यवेष्टितमहादृढपूर्वपद्मम् ।पादाब्जसंस्थकुलिकं करपद्मशोभं दण्डे कटीघटितवासुकिमेखलाङ्कम् ॥ २२॥त्वां शङ्खपालभुजगेन्द्रकृतोपवीतं जानुद्वयस्फुरदनन्तमहोरगेन्द्रम् ।लूतादिवृश्चिकविराजिविराजिताङ्गं कर्कोटकाहिपरिभूषितकण्ठभागम् ॥ २३॥त्वां प्रस्फुरच्छिखिनिभोर्ध्वकचं स्फुरन्तं घोराननं विकृतघोरतराहिभूषम् ।वन्दामहे वरतनुं वररूपशोभं वक्षोल्लसच्चटचटारवरुण्डमालम् ॥ २४॥आम्रेडितप्रयुतसङ्ख्यतटित्कृतास्थि- मालाधरं कहकहारवभोगिभूषम् ।भूयो वमज्ज्वलनदीप्तललाटनेत्रं त्वां हुङ्कृतेन मम घातय घातयारीन् ॥ २५॥चक्रोद्धृतप्रणवफट्कृतसम्पुटं ते मन्त्रोत्तमं जपति यः सममङ्गमन्त्रैः ।अस्मात्परं मनुशतैः किमिहाल्पसारै- रायातमिष्टमनिशं त्वयि सिद्धिमेति ॥ २६॥यः पञ्चषड्भिर्द्विदशाष्टयुग्मैर्वर्णैर्मनोज्ञैः परिकल्पिताङ्गः ।ऋष्यादिकं बीजसशक्तिकीलयुक्त्यातिसञ्चिन्त्य जपेत्स धन्यः ॥ २७॥यो मस्तकेऽलिकतले नयनद्वये च मध्ये भ्रुवोस्तव मनोरिह नासिकायाम् ।कर्णद्वये हनुयुगे द्विजपङ्क्तियुग्मे कण्ठेऽसयोश्च जठरे स्तनयोः क्रमेण ॥ २८॥वर्णान्निवेशयति वक्षसि नाभिदेशे बाहुप्रकोष्ठतलपाणिषु वामतश्च ।स्फिज्यूरुजानुतलतश्चरणेषु तद्व- त्पायौ सलिङ्गवृषणे चरमाङ्गदेशे ॥ २९॥पार्श्वद्वये हृदि च तालुनि साधकेन्द्रः पूजाविधौ जपविधौ च सुसम्प्रदायः ।(सोऽयं निरस्य) निखिलार्तिमनेकसौख्या- न्यासादयत्यनिमिषैरपि पूज्यमानः ॥ ३०॥त्वां शेषकलृप्तवलयाङ्कितपाणिपद्मं कर्कोटकाहिपरिभूषितदामशोभम् ।वक्षःस्थलाभरणतक्षकनागशोभं पद्माख्यनागपरिकल्पितहारभूषम् ॥ ३१॥सुश्वेतपद्मपरिक्लृप्तललाटशोभं मध्याङ्गलग्नकुलिकोदरबन्धनागम् ।केचित्कटीघटितभूषितशङ्खपालं कर्णावतंसवरवासुकिमामनन्ति ॥ ३२॥चर्मासिचापशरवज्रपरश्वथाङ्ग- शूलादिमध्यसृणिदण्डधरैश्च हस्तैः ।पञ्चाननं धवलदंष्ट्रमगाधनेत्रं त्वामञ्जनाभमरिभीषणमाश्रयामः ॥ ३३॥हस्तैरभीवरपरश्वथकृष्णसार- युक्तैश्चतुर्भिरभिशोभितमाननैश्च ।त्वां पूजयन्निह सहस्रदलाब्जसंस्थं वाञ्छां व्रजेद्दशभिरावरणैरुपेतम् ॥ ३४॥काल्याद्याभिः परिवृततनुं शक्तिभिर्दिग्गताभि- स्तन्मध्यस्थैः परिचिततनुं भीषणाद्यैश्च रन्ध्रैः ।ब्राह्म्याद्याभिर्दिशि दिशि तनुं(वृतं) मातृभिर्लोकपालैः साङ्गं ध्यायन् जपति सुमतिर्भूतले यः स धन्यः ॥ ३५॥कृत्वा चक्रं रजोभिस्तव तदनुगुणैः कर्णिकाकेसराढ्यं मध्ये च द्वादशारं कृतनियमविधिः षोडशारं च बाह्ये ।मध्ये त्वां पूजयित्वा दिशि दिशि परितः केसरेष्वष्टशक्ती- रिच्छादिद्वादशारेष्वथ यजति महास्त्राणि चत्वारि दिक्षु ॥ ३६॥शेषारेष्वष्टरुन्द्रान्विदिगुदिततनून् भीषणाभीषणादीन् बाह्येऽस्त्रैरात्मदिक्स्थैः सह कुलिशमुखैर्भौतिकादीनि चाष्टौ ।तस्याधिव्याधिनाशः सकलमभिमतं शत्रुनाशश्च सद्यः शान्तिः पुष्टिश्च विद्या धनमपरिमितं क्षेत्रसम्पत्तिरन्ते ॥ ३७॥यस्त्वां युद्धोद्यताङ्गं यजति कृतमतिर्भास्कराद्यैर्गणेशैः क्षेत्रेशैः कोणसंस्थैः त्रिदशपतिमुखैरष्टरुद्रैः परीतम् ।आद्ये तज्ज्ञानरूपप्रभृतिभिरपरे वीरघोषादिरुद्रै- स्तद्बाह्यस्थैश्चतुर्थद्रविणपतिमुखैः पञ्चमे कालमुख्यैः ॥ ३८॥षष्ठे चोच्छुष्ममुख्यैरनिशमभिमुखैः सप्तमे विष्णुमुख्यै- रन्यस्मिन् तीक्ष्णदंष्ट्रप्रभृतिभिरमरेशादिभिश्चापरस्मिन् ।आधारे लोकपालैर्दिशिदिशि दशमे सायुधैः सेव्यमानं भोगानास्वाद्य सर्वान् भुवि तनुविरमे मोक्षमाप्नोति सोऽयम् ॥ ३९॥चक्रं स्रग्वज्रशक्तीर्डमरुपरशुघण्टाहिखड्गप्रखेटान् बिभ्राणं दण्डपाशौ ध्वजनरशिरसी चापबाणौ भुजैश्च ।दोर्भ्यां द्वाभ्यां महास्त्रं नियुतरविनिभं लूतमुण्डाहिभूषं चार्काभं कुण्डलाढ्यं कुमतविहतये घोरनाथं भजामः ॥ ४०॥विद्युन्मालानलाभं भुजगपरिवृतं भीषणं निम्ननेत्रं शूलं पाशं च घण्टामनलमसिमहाखेटकौ प्रज्वलन्तौ ।सव्येऽभीशक्तिचापान शरपरशुरुजा दक्षिणे घोरवक्त्रं पार्श्वे घोरास्त्रमेवं नियमितमनसा संयजे सर्वसिद्ध्यै ॥ ४१॥जप्त्वायुतं (तव मनूत्तम)मिष्ट(मङ्ग)युक्तं हुत्वा सहस्र(मपकृत्य)मपाकरोति ।सन्ध्यासु चाष्टसहितं शतमत्र जप्त्वा ध्यायन् कुबेरसदृशं श्रियमेति मर्त्यः ॥ ४२॥आधारनाभिहृदये च गले च तालु- भ्रूमध्यमूर्ध्न्यखिलशक्तिपदेषु देवम् ।तेजोमयं सरति यः क्रमशश्च मोक्षं यो व्युत्क्रमेण स नरः पुनरेति भोगम् ॥ ४३॥यद्वैभवं तव महास्त्रमहानुभावं स्तोतुं न मन्त्रपतयस्तदशेषमीशाः ।का शक्तिरत्र वद तादृशमीदृशानां कश्चैकदेशगणको गणकीर्तिमेति ॥ ४४॥एतामघोरास्त्रपदानुविद्धां यः स्त्रोत्रमालां पठति त्रिसन्ध्यम् ।विजित्य(निर्जित्य)शत्रून् विगतामयोऽसौ प्राप्नोत्यशेषानपि वाञ्छितार्थान् ॥ ४५॥॥ इति श्रीअघोरस्तवः सम्पूर्णः ॥

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अघोरकवचम् अथवा अघोरमूर्तिकवचम् | aghoramUrtikavacham

ॐ श्रीगणेशाय नमः । अथ अघोरकवचं लिख्यते । श्री अघोरभैरवाय नमः । भैरवी उवाच – भगवन्करुणाम्भोधे शास्त्राम्भोनिधिपारग । पुराऽस्माकं वरो दत्तः तं दातुं मे क्षमो भव ॥ १॥ भैरव उवाच – सत्यं पुरा वरो दत्तो वरं वरय पार्वति । यत्किञ्चिन्मनसीष्टं स्यात्तद्दातुं ते क्षमोऽस्म्यहम् ॥ २॥ देवी उवाच – अघोरस्य महादेव कवचं देवदुर्लभम् । शीघ्रं मे दयया ब्रूहि यद्यहं प्रेयसी तव ॥ ३॥ भैरव उवाच – अघोरकवचं वक्ष्ये महामन्त्रमयं परम् । रहस्यं परमं तत्त्वं न चाख्येयं दुरात्मने ॥ ४॥ अस्य श्री अघोरकवचस्य महाकालभैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रो देवता । क्ष्मीं बीजं क्ष्मां शक्तिः क्ष्मः कीलकं श्री अघोर विद्यासिद्ध्यर्थं कवचपाठे विनियोगः ॥ अथ मन्त्रः अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः ॥ ॐ अघोरो मे शिवः पातु श्री मेऽघोरो ललाटकम् । ह्रीं घोरो मेऽवतां नेत्रे क्लीं घोरो मेऽवताच्छती ॥ ५॥ सौःतरेभ्योऽवताङ्गडौक्षी नासां पातु सर्वतः क्षं । मुखं पातु मे शर्वोऽघोरः सर्वोऽवताङ्गलम् ॥ ६॥ घोरश्च मेऽवतात्स्कन्धौ हस्तौ ज्वलन्नमोऽवतु । ज्वलनः पातु मे वक्षः कुक्षिं प्रज्वलरुद्रकः ॥ ७॥ पार्श्वौ प्रज्वलरूपेभ्यो नाभिं मेऽघोररूपभृत् । शिश्नं मे शूलपाणिश्च गुह्यं रुद्रः सदावतु ॥ ८॥ कटिं मेऽमृतमूर्तिश्च मेढ्रेऽव्यान्नीलकण्ठकः । ऊरू चन्द्रजटः पातु पातु मे त्रिपुरान्तकः ॥ ६॥ जङ्घे त्रिलोचनः पातु गुल्फौ याज्ञियरूपवान् । अघोरोऽङ्घ्री च मे पातु पादौ मेऽघोरभैरवः ॥ १०॥ पादादिमूर्धपर्यन्तमघोरात्मा शिवोऽवतु । शिरसः पादपर्यन्तं पायान्मेऽघोरभैरवः ॥ ११॥ प्रभाते भैरवः पातु मध्याहे वटुकोऽवतु । सन्ध्यायां च महाकालो निशायां कालभैरवः ॥ १२॥ अर्द्धरात्रे स्वयं घोरो निशान्तेऽमृतरूपधृत् । पूर्वे मां पातु ऋग्वेदो यजुर्वेदस्तु दक्षिणे ॥ १३॥ पश्चिमे सामवेदोऽव्यादुत्तरेऽथर्ववेदकः । आग्नेय्यामग्निरव्यान्मां नैरृत्यां नित्यचेतनः ॥ १४॥ वायव्यां रौद्ररूपोऽव्यादैशान्यां कालशासनः । ऊर्ध्वोऽव्यादूर्ध्वरेताश्च पाताले परमेश्वरः ॥ १५॥ दशदिक्षु सदा पायाद्देवः कालाग्निरुद्रकः । अग्नेर्मां पातु कालाग्निर्वायोर्मां वायुभक्षकः ॥ १६॥ जलादौर्वामुखः पातु पथि मां शङ्करोऽवतु । निषण्णं योगध्येयोऽव्याद्गच्छन्तं वायुरूपभृत् ॥ १७॥ गृहे शर्वः सदा पातु बहिः पायाद्वृषध्वजः । सर्वत्र सर्वदा पातु मामघोरोऽथ घोरकः ॥ १८॥ रणे राजकुले दुर्गे दुर्भिक्षे शत्रुसंसदि । द्यूते मारीभये राष्ट्रे प्रलये वादिना कुले ॥ १६॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्योऽवतान्मां घोरभैरवः । घोरघोरतरेभ्यो मां पायान्मन्मथसङ्गरे ॥ २०॥ सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो भोजनावसरेऽवतु । नमस्ते रुद्ररूपेभ्योऽवतु मां घोरभैरवः ॥ २१॥ सर्वत्र सर्वदाकालं सर्वाङ्गं सर्वभीतिषु । हं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षः अघोरकः ॥ २२॥ अघोरास्त्राय फट् पातु अघोरो मां सभैरवः । विस्मारितं च यत्स्थानं स्थलं यन्नामवर्जितम् ॥ २३॥ तत्सर्वं मामघोरोऽव्यान्मामथाघोरः सभैरवः । भार्यान्पुत्रान्सुहृद्वर्गान्कन्यां यद्वस्तु मामकम् ॥ २४॥ तत्सर्वं पातु मे नित्यं अघोरो माथ घोरकः । स्नाने स्तवे जपे पाठे होमेऽव्यात्क्षः अघोरकः ॥ २५॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेभ्यो रुद्ररूपेभ्यः ॥ २६॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सौः क्ष्मं पातु नित्यं मां श्री अघोरकः । इतीदं कवचं गुह्यं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २७॥ मूलमन्त्रमयं दिव्यं त्रैलोक्ये सारमुत्तमम् । अदातव्यमवाच्यं च कवचं गुह्यमीश्वरि ॥ २८॥ अप्रष्टव्यमस्तोतव्यं दीक्षाहीनेन मन्त्रिणा । अदीक्षिताय शिष्याय पुत्राय शरजन्मने ॥ २६॥ न दातव्यं न श्रोतव्यमित्याज्ञां मामकां श‍ृणु । परं श्रीमहिमानं च श‍ृणु चास्य सुवर्मणः ॥ ३०॥ अदीक्षितो यदा मन्त्री विद्यागृध्नुः पठेदिदम् । सदीक्षित इति ज्ञेयो मान्त्रिकः साधकोत्तमः ॥ ३१॥ यः पठेन्मनसा तस्य रात्रौ ब्राह्मे मुहूर्त्तके । पूजाकाले निशीथे च तस्य हस्तेऽष्टसिद्धयः ॥ ३२॥ दुःस्वप्ने बन्धने धीरे कान्तारे सागरे भये । पठेत् कवचराजेन्द्रं मन्त्री विद्यानिधिं प्रिये ॥ ३३॥ सर्वं तत्प्रशमं याति भयं कवचपाठनात् । रजः-सत्त्व-तमोरूपमघोरकवचं पठेत् ॥ ३४॥ वाञ्छितं मनसा यद्यत्तत्तत्प्राप्नोति साधकः । कुङ्कुमेन लिखित्वा च भूर्जत्वचि रवौ शिवे ॥ ३५॥ केवलेन सुभक्ष्ये च धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे । यद्यदिष्टं भवेत् तत्तत्साधको लभतेऽचिरात् ॥ ३६॥ यद्गृहे अघोरकवचं वर्तते तस्य मन्दिरे । विद्या कीर्तिर्धनारोग्यलक्ष्मीवृद्धिर्न संशयः ॥ ३७॥ जपेच्चाघोरविद्यां यो विनानेनैव वर्मणा । तस्य विद्या जपं हीनं तस्माद्धर्मं सदा पठेत् ॥ ३८॥ अघोरमन्त्रविद्यापि जपन् स्तोत्रं तथा मनुम् । सद्यः सिद्धिं समायाति अघोरस्य प्रसादतः ॥ ३९॥ इति श्रीदेवदेवेशि अघोरकवचं स्मरेत् । गोप्यं कवचराजेन्द्रं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ ४०॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रेविश्वसारोद्धारे तन्त्रेऽघोरसहस्रनामाख्ये कल्पे अघोरकवचं समाप्तम् ॥

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ॐकारेश्वरमाहात्म्यम् (शिवरहस्यान्तर्गता)| OMkAreshvaramAhAtmyam

OMkAreshvaramAhAtmyam: ॐकारेश्वरमाहात्म्यम् (शिवरहस्यान्तर्गता)| पार्वती -महादेवमहानन्दकरुणामृतसागर ।श्रुतमुत्तममाख्यानं महाकालगणस्य च ॥ २॥किं वान्यत् प्रीतिजनकं क्षेत्रमस्ति महेश्वर ।क्षेत्राणां त्वं पतिः शम्भो विशिष्टं वक्तुमर्हसि ॥ ३॥ईश्वरः -क्षेत्रमस्त्येकमुत्कृष्टमुत्फुल्लकमलानने ।ओङ्कारं नाम विमलं कलिकल्मषनाशनम् ॥ ४॥तत्र शैववरा नित्यं निवसन्ति सहस्रशः ।ते सर्वे मम लिङ्गार्चां कुर्वन्त्येव प्रतिक्षणम् ॥ ५॥भासिताभासितैर्नित्यं शान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः ।रुद्राक्षवरभूषाढ्या भालाक्षान्यस्तमानसाः ॥ ६॥तत्रास्ति सरितां श्रेष्ठा लिङ्गसङ्गतरङ्गिता ।नर्मदा शर्मदा नित्यं स्नानात्पानावगाहनात् ॥ ७॥पापौघसङ्घभङ्गाढ्या वातपोतसुशीतला ।तत्रास्ति कुण्डमुत्कृष्टमोङ्काराख्यं शुचिस्मिते ॥ ८॥तत्कुण्डदर्शनादेव मल्लोके निवसेच्चिरम् ।तत्कुण्डोदकपानेन हृदि लिङ्गं प्रजायते ॥ ९॥भावाः पिबन्ति तत्कुण्डजलं शीतं विमुक्तये ।तृप्तिं प्रयान्ति पितरः तत्कुण्डजलतर्पिताः ॥ १०॥सदा तत्कुण्डरक्षार्थं गणाः संस्थापिता मया ।कुण्डधारप्रभृतयः शूलमुद्गरपाणयः ॥ ११॥गजेन्द्रचर्मवसना मृगेन्द्रसमविक्रमाः ।हरीन्द्रानपि ते हन्युर्गिरीन्द्रसमविग्रहाह ॥ १२॥धनुःशरकराः सर्वे जटाशोभितमस्तकाः ।अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्भस्मोद्धूलितविग्रहा ॥ १३॥सङ्ग्राममुखराः सर्वे गणा मेदुरविग्रहाः ।कदाचिदननुज्ञाप्त तान् गणान् मददर्पितः ॥ १४॥अप्सरोभिः परिवृतो मरुतां पतिरुद्धतः ।आरुह्याभ्रमुनाथं तं क्रीडितुं नर्मदाजले ॥ १५॥समाजगाम त्वरितः शच्या साकं शिवे तदा ।तदा तं गणपाः क्रुद्धाः सर्वे ते ह्यतिमन्यवः ॥ १६॥सगजं पातयन्नब्धौ शच्या साकं सुरेश्वरम् ।सुरांस्तदा सवरुणान् बिभिदुः पवनानलान् ॥ १७॥निस्त्रिंशवरधाराभिः सुतीक्ष्णाग्रैः शिलीमुखैः ।मुद्गरैर्बिभिदुश्चान्ये सवाहायुधभूषणान् ॥ १८॥विवाहनांस्तदा देवान् स्रवद्रक्तान् स्खलत्पदान् ।कान्दिशीकान् मुक्तकेशान् क्षणाच्चक्रुर्गणेश्वराः ॥ १९॥अप्सरास्ता विकन्नराः रुदन्त्यो मुक्तमूर्धजाः ।हाहा बतेति क्रन्दन्त्यः स्रवद्रक्तार्द्रवाससः ॥ २०॥तथा देवगणाः सर्वे शक्राद्या भयकम्पिताः ।ओङ्कारं तत्र तल्लिङ्गं शरणं जग्मुरीश्वरम् ॥ २१॥॥ इति शिवरहस्यान्तर्गते शिवपार्वतीसंवादे ओङ्कारेश्वरमहात्म्यम् ॥- ॥ श्रीशिवरहस्यम् । भर्गाख्यः पञ्चमांशः । अध्यायः ७। २-२१॥

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Hariyali Amavasya

Hariyali Amavasya 2025 Date : कब है हरियाली अमावस्या ? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त

Hariyali Amavasya 2025 Date, Shubh Muhurat: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितरों का तर्पण एवं पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या की सही तिथि और शुभ मुहूर्त। Hariyali Amavasya 2025 Date, Shubh Muhurat: सनातन धर्म में श्रावण मास का विशेष महत्व है। यह महीना भगवान शिव की भक्ति का पावन समय माना जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई 2025 से हो चुकी है, जिसका समापन 9 अगस्त 2025 को होगा। इस माह में आने वाले सभी व्रत-त्योहार बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। Hariyali Amavasya: इन्हीं व्रत में से एक हरियाली अमावस्या भी है। इस दिन पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान, पितरों का तर्पण और शिवलिंग का अभिषेक करने से पितृदोष दूर होता है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही, पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और भगवान शिव की विशेष कृपा भी प्राप्त होती है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व… Kab Hai Hariyali Amavasya: कब है हरियाली अमावस्या? Hariyali Amavasya पंचांग के अनुसार, 24 जुलाई को देर रात 02 बजकर 28 मिनट पर सावन माह की अमावस्या तिथि शुरू होगी। वहीं, 25 जुलाई को देर रात 12 बजकर 40 मिनट पर सावन अमावस्या तिथि समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इस प्रकार 24 जुलाई को सावन अमावस्या मनाई जाएगी। सावन अमावस्या को हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है। सावन अमावस्या शुभ योग  ज्योतिषियों की मानें तो हरियाली अमावस्या पर हर्षण योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इनमें गुरु पुष्य योग, अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और शिववास योग प्रमुख हैं। इन योग में देवों के देव महादेव और मां पार्वती की पूजा करने से साधक की हर एक मनोकामना पूरी होगी। साथ ही सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलेगी। हरियाली अमावस्या का धार्मिक महत्व Hariyali Amavasya धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में उल्लेख है कि श्रावण मास में किया गया दान, स्नान, जप, तप और शिव आराधना अक्षय पुण्य प्रदान करती है। विशेष रूप से हरियाली अमावस्या के दिन किया गया व्रत, तर्पण और पूजन पितरों की शांति के साथ-साथ व्यक्ति को पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन में अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति दिलाता है। साथ ही, इससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

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