Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन ।

श्रीराम का वनवास श्रीराम का वनवास रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से हमें कई संदेश मिलते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं: वनवास का कारण श्रीराम के वनवास का कारण था कैकेयी का क्रोध। कैकेयी दशरथ की तीसरी पत्नी थी। वह दशरथ से बहुत प्रेम करती थी। लेकिन दशरथ ने एक समय में उसे दो वरदान दिए थे। एक वरदान था कि भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। दूसरा वरदान था कि राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए। एक दिन, जब दशरथ राजा थे, तब कैकेयी ने अपने वरदानों का स्मरण कराते हुए दशरथ से भरत को अयोध्या का राजा और राम को चौदह वर्ष का वनवास देने की मांग की। दशरथ अपने वचनों के प्रति वचनबद्ध थे। इसलिए उन्होंने कैकेयी की मांग को मान लिया। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह Shree ram राम का वनवास राम, सीता और लक्ष्मण को वनवास जाना था। वे सभी अयोध्या से निकलकर वन की ओर चल पड़े। अयोध्या में सभी लोग उनके जाने से बहुत दुखी थे। राम, सीता और लक्ष्मण वन में कई स्थानों पर रहे। उन्होंने कई राक्षसों का वध किया। उन्होंने कई लोगों की मदद की। वनवास का अंत चौदह वर्ष बाद, राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की। उन्होंने सीता को मुक्त कराया और अयोध्या लौट आए। अयोध्या में उनका भव्य स्वागत हुआ। वनवास का संदेश श्रीराम का वनवास एक कठिन समय था। लेकिन राम ने धर्म और सत्य के मार्ग पर चलकर इस कठिन समय को भी सहन किया। उन्होंने यह भी दिखाया कि माता-पिता के वचनों का पालन करना चाहिए। श्रीराम के वनवास से हमें यह भी सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है। श्रीराम ने भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी भी भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी। अंत में, भगवान की कृपा से उन्हें सफलता मिली।

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Sita Swayamver सीता स्वयंवर की कथा। श्रीराम और माता सीता का विवाह

श्रीराम और माता सीता का विवाह रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह विवाह हिंदू धर्म में प्रेम और समर्पण के प्रतीक के रूप में माना जाता है। विवाह का प्रसंग राजा दशरथ के चार पुत्र थे। श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। श्रीराम सबसे बड़े पुत्र थे। राजा दशरथ चाहते थे कि उनके बड़े पुत्र श्रीराम का विवाह हो जाए। एक दिन, राजा दशरथ ने अपने गुरु वशिष्ठ से सलाह ली। वशिष्ठ ऋषि ने उन्हें सलाह दी कि वे राजा जनक की पुत्री सीता के स्वयंवर में भाग लें। Sita Swayamver सीता स्वयंवर की शर्त  राजा जनक सभी को की शर्त बताते हुए कहते है। आप सभी राजाओं का मेरी पुत्री सीता के स्वयंवर में स्वागत है। आज इस स्वयंवर को जीतने की शर्त यह है कि जो भी महारथी  सामने रखें भगवान शिव के पिनाक धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी से मेरी पुत्री सीता का विवाह संपन्न होगा। अतः आप सभी से अनुरोध है कि एक-एक करके आए और भगवान शिव के इस धनुष को उठाकर और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा कर अपने बलाबल तथा शक्ति का परिचय दें। राजा जनक की यह घोषणा सुनकर सभी राजा एक-एक करके आते हैं और धनुष को उठाने का प्रयास करते हैं। लेकिन भगवान शिव के उस धनुष को उठाना या प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर कोई भी राजा महाराजा उस धनुष को हिला तक नहीं पाया।  लक्ष्मण जी को आया क्रोध  बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब कोई राजा उस धनुष को हिला नहीं पाया तो महाराजा जनक को क्रोध आ गया। उन्हें लगने लगा कि कोई भी इस शिव धनुष को उठा नहीं पाएगा और उनकी पुत्री सीता अविवाहित ही रह जाएंगी। यही सोचकर उन्होंने वहां उपस्थित सभी राजाओं की निंदा करने शुरू कर दी कि उनमें से कोई भी लायक पुरुष नहीं है। जो शिव धनुष का उठा सके।  राजा जनक की ऐसी अपमानजनक बातें सुनकर लक्ष्मण जी को क्रोध आ जाता है और वह इसे श्रीराम तथा रघुकुल  का अपमान समझते हैं। लक्ष्मण जी राजा जनक को ललकारने लगते हैं कि वह उनके तथा श्रीराम के सभा में होते हुए पूरी सभा को अयोग्य कैसे कह सकते हैं। तब ऋषि विश्वामित्र ने लक्ष्मण जी को शांत कराया और श्री राम को धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए बोला। श्रीराम  विनम्र भाव  से ऋषि  विश्वामित्र जी को प्रणाम करके शिव धनुष की तरफ बढ़ते हैं तो वहां पर उपस्थित राजा उनका उपहास करने लगते हैं क्योंकि कहा जाता है कि उस समय भगवान राम की आयु लगभग 16 से 17 वर्ष की थी। इसलिए वहां उपस्थित सभी राजा उन्हें  “लो, अब चिड़िया पहाड़ उठाने को चली है”  बोलकर उनका उपहास उड़ा रहे थे।  Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार  श्रीराम ने तोडा शिव धनुष  लेकिन भगवान विष्णु के अवतार श्री राम सहर्ष भाव से शिव धनुष को प्रणाम करते हैं और केवल अपने एक ही हाथ से शिव धनुष को उठा लेते हैं जिसे देखकर वहां उपस्थित सभी राजा हैरान रह जाते हैं। तभी  श्री राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर उसकी डोरी को खींच देते हैं जिससे वह शिव धनुष टूट जाता है और स्वयंवर की शर्त के अनुसार देवी सीता और श्री राम का विवाह हो जाता है। माता सीता श्री राम को वरमाला पहना देती हैं श्रीराम को अपने पति के रूप में स्वीकार करती है। यह देखकर राजा जनक तथा उनके परिवार जन की खुशी की कोई सीमा नहीं रहती। देवी सीता तथा श्रीराम का विवाह  तब राजा जनक ऋषि विश्वामित्र को बधाई देते हुए उनका अभिनंदन करते हैं तथा श्री राम और देवी सीता के विवाह के आगे के कार्यक्रम के बारे में पूछते हैं। ऋषि विश्वामित्र राजा जनक को कहते हैं कि हे जनक यह विवाह तो शिव धनुष के अधीन था। तुम धनुष टूटते ही है विवाह तो हो चुका है लेकिन फिर भी आपने कुल के रीति रिवाज के अनुसार ही आगे का कार्यक्रम बनाइए।  ऋषि विश्वामित्र के कहने पर जनकपुरी से राजा दशरथ के पास सन्देश भेजा जाता है। तथा उसके बाद दोनों परिवारों के द्वारा विचार करके राजा दशरथ के चारो पुत्रो का विवाह राजा जनक की चारो पुत्रियों से निश्चित कर दिया जाता है। जिसमे श्रीराम के साथ देवी सीता, भरत  के साथ मान्ध्वि, लक्ष्मण के साथ उर्मिला, तथा शत्रुघ्न के साथ श्रुतिकीर्ति का शुभ विवाह संपन्न किया जाता है। 

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Shree Ram : श्री राम द्वारा ताड़का वध तथा अहिल्या का उद्धार 

श्री राम द्वारा ताड़का का वध | श्री राम द्वारा ताड़का का वध रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस घटना के माध्यम से श्री राम के साहस, पराक्रम और धर्मपरायणता का परिचय मिलता है। श्रीराम तथा चारों भाइयों की शिक्षा पूर्ण होने के चारों भाई राजमहल में वापस लौट जाते हैं। उसके कुछ ही समय पश्चात महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के महल में आते हैं तथा राजा दशरथ से कहते हैं कि उन्हें श्री राम चाहिए ताकि उनके यज्ञ तथा अनुष्ठानों की असुरों तथा राक्षसों से रक्षा की जा सके । राक्षस हमेशा हमारे यज्ञ में बाधा डालते है और यज्ञ को पूरा नहीं होने देते। इसलिए हम राम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं ताकि वह हमारे यज्ञ तथा अनुष्ठानों रक्षा कर सकें। ताड़का कौन थी? ताड़का एक राक्षसी थी जो कि ऋषि विश्वामित्र के आश्रम के आसपास रहने वाले ऋषियों और साधुओं को सताती थी। वह बहुत ही बलशाली थी और उसकी आवाज इतनी भयानक थी कि सुनने वाले कांप उठते थे। Shree Ram श्री राम और लक्ष्मण का ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में जाना राजा दशरथ ने अपने पुत्रों श्री राम, लक्ष्मण और भरत को ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में भेजा था। ऋषि विश्वामित्र उनसे यज्ञ की रक्षा करने के लिए कहा चाहते थे। राक्षसी ताड़का का वध  श्री राम तथा लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम में चले जाते हैं। जहां पर विश्वामित्र श्री राम को बताते हैं कि एक राक्षसी ताड़का उनके हर यज्ञ में विघ्न डालती है तथा उसका विनाश करना आवश्यक है  यह माना जाता है कि राक्षसी ताड़का एक यक्षिणी थी। महा पुराण में वर्णित है कि यक्षिणीया स्वयं मां दुर्गा की शक्ति का अंश होती है इसलिए वे बहुत शक्तिशाली होती है। इसलिए श्री राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ राक्षसी ताड़का के निवास स्थान पर जाते हैं और उसको ललकारते हैं। ललकार सुनकर राक्षसी तड़का बाहर निकलती है और इनपर हमला करने लगती है काफी समय तक युद्ध के बाद श्री राम अपने एक बाण से राक्षसी तड़का का अंत कर देते है। उसके बाद विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को अपने आश्रम में ठहर आते हैं। अगले दिन जब ऋषि विश्वामित्र यज्ञ कर रहे होते हैं तब सुबाहु तथा मारीच नाम के दो राक्षस उनका यज्ञ भंग करने के लिए कुछ राक्षसों को साथ ले आते हैं। लेकिन श्री राम और लक्ष्मण पहले से ही वहां यज्ञ की रक्षा में तैनात होते हैं और मैं दोनों अपने दिव्य बाणों से सभी राक्षसों का अंत कर देते हैं। अहिल्या का उद्धार अहिल्या कौन थी? अहिल्या एक पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। वह ऋषि गौतम की पत्नी थी। एक बार, जब ऋषि गौतम आश्रम से बाहर गए थे, तब इंद्र ने अहिल्या का रूप धारण करके उसके साथ बलात्कार किया। इस घटना से अहिल्या बहुत दुखी हुईं और उन्होंने भगवान से अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी। अहिल्या स्वयं ब्रह्म देव की पुत्री थी। अत्यंत रूपवती होने के कारण देवराज इंद्र की नियत अहिल्या पर खराब हो गई। इसके पश्चात भी अहिल्या की शादी महर्षि गौतम से हो गई इससे देवराज इंद्र बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उन दोनो से बदला लेने की सोची। एक रात देवराज इंद्र ने मुर्गे का रूप धारण करके ऋषि गौतम के आश्रम के बाहर जाकर बांग देनी शुरू कर दी। उसकी आवाज सुनकर गौतम को लगा कि सुबह हो गई है और वह प्रतिदिन की तरह अपना कमंडल लेकर गंगा स्नान करने के लिए चल पड़ते है। पीछे से देवराज इंद्र ऋषि गौतम का वेश धारण करके अहिल्या के पास चले जाते हैं और उसके साथ समागम करते है । जब ऋषि गौतम गंगा तट पर स्नान करने के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें यह आभास होता है कि अभी सुबह हुई नहीं है। अवश्य ही किसी ने उनके साथ छल किया है। इसीलिए वह तुरंत अपने आश्रम की तरफ चल देते हैं। ऋषि गौतम अपने आश्रम पहुंचते हैं तो वह देखते हैं कि उन्हीं के भेष में एक व्यक्ति उनकी कुटिया से निकल रहा है। ऋषि गौतम परम तपस्वी थे इसलिए वह छल वेश में भी देवराज इंद्र को पहचान जाते हैं और उसे कुरूप होने का श्राप देते हैं। यह सुनकर अहिल्या अपनी कुटिया से बाहर निकलती है तब वह समझ जाती है कि उसके साथ छल हुआ है और अपने पति ऋषि गौतम के पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगती है। लेकिन क्रोध में भरे हुए श्री गौतम ने उन्हें क्षमा नहीं किया और तुरंत पत्थर में बदलने का श्राप दिया। बार-बार मिन्नत करने के बाद ऋषि गौतम को अहिल्या पर दया आ जाते हैं और वह उसके मुक्ति का मार्ग बताते हैं। जब भगवान विष्णु राम अवतार में पृथ्वी पर आएंगे तब वह अपने चरणों से स्पर्श करके तुम्हें इस श्राप से मुक्त करेंगे।  ताड़का वध के बाद जब महर्षि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण के साथ जनकपुरी की तरफ रवाना होते हैं तब वह ऋषि गौतम के आश्रम से होकर गुजरते हैं जहां पर वह श्री राम को अहिल्या की कहानी बताते हैं। तब श्रीराम अपने पैरों से स्पर्श करके पाषाण में परिवर्तित हो चुकी  अहिल्या को शाप मुक्त कर देते हैं। और इस तरह भगवान राम के द्वारा अहिल्या का उद्धार हो जाता है। 

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Shree Ram श्री राम जन्म कथा | श्री राम और उनके भाइयों का जन्म |

(Shree Ram’s Birth story in Hindi) श्री राम का जन्म कैसे हुआ था। श्री राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन का जन्म राजा दशरथ वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के इक्ष्वाकु कुलोत्पन्न राजा थे। वे राजा अज व इन्वदुमतीके के पुत्र थेे तथा इक्ष्वाकु कुल मे जन्मे थे। वे श्रीराम के पिता थे। उनके चरित्र को आदर्श महाराजा, पुत्रों को प्रेम करने वाले पिता और अपने वचनों के प्रति पूर्ण समर्पित व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है। दशरथ का जन्म दशरथ का जन्म अयोध्या के राजा अज व इंदुमती के घर हुआ था। उनके पिता अज एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी माता इंदुमती एक सुंदर और गुणवान रानी थीं। दशरथ का विवाह दशरथ ने तीन विवाह किए। उनका पहला विवाह कौशल्या से हुआ। कौशल्या से उनका पुत्र श्रीराम हुआ। उनका दूसरा विवाह सुमित्रा से हुआ। सुमित्रा से उनका पुत्र भरत और लक्ष्मण हुए। उनका तीसरा विवाह कैकेयी से हुआ। कैकेयी से उनका पुत्र शत्रुघ्न हुआ। पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न होना राजा दशरथ पैदल वन में श्रृंग मुनि के पास जाते हैं तथा उनसे आग्रह करते हैं कि संतान सुख के लिए व्याकुल हैं। कृपया करके मेरी समस्या का समाधान कीजिए। राजा दशरथ की सादगी तथा विनम्र आदर भाव के कारण श्रृंग मुनि प्रसन्न हुए और उन्होंने दशरथ का वचन दिया कि वह उनका पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाएंगे। उसके पश्चात शुभ मुहूर्त देखकर उन्होंने दशरथ का पुत्र कामेष्टि यज्ञ संपन्न करवाया यज्ञ संपन्न होने के बाद हवन कुंड में से अग्निदेव एक खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए और राजा दशरथ से बोले। हे राजन, यह खीर ले जाओ और अपनी तीनों रानियों को बराबर खिला दो इससे तुम्हे संतान प्राप्ति अवश्य होगी। Shree Ram श्रीराम तथा उनके भाइयों का जन्म राजा दशरथ खीर का पात्र ले जाकर रानी कौशल्या तथा रानी कैकई को दे देते हैं। रानी कौशल्या तथा रानी कैकई अपने अपने पात्र में से एक एक निवाला सबसे छोटी रानी सुमित्रा को खिला देते हैं जिसके प्रभाव से कुछ समय बाद राजा दशरथ के घर में एक साथ चार पुत्रों का जन्म होता है। रानी कौशल्या सबसे बड़े पुत्र राम को जन्म देती है। उसके कुछ ही समय बाद हैरानी कैकई राजा दशरथ के दूसरे पुत्र भरत को जन्म देती हैं। कुछ है घड़ी बीतने के पश्चात रानी सुमित्रा राजा दशरथ के तीसरे पुत्र लक्ष्मण को जन्म देती है तथा कुछ ही क्षण बाद वह दशरथ के चौथे पुत्र शत्रुघ्न को जन्म देती हैं।  और इस प्रकार पृथ्वी पर बढ़े हुए पाप, अत्याचार को मिटाने के लिए भगवान नारायण स्वयं राजा दशरथ के पहले पुत्र श्री राम के रूप में जन्म लेते हैं। भगवान विष्णु के राम अवतार का साथ देने के लिए शेषनाग लक्ष्मण के अवतार में जन्म लेते हैं। तथा उनके साथ ही भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र भारत के अवतार में जन्म लेते हैं तथा शत्रुघ्न भगवान विष्णु के शंख शैल के  अवतार होते है। श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को चार पुरुषार्थ का रूप माना गया है। जिसमें श्री राम धर्म का रूप होते हैं तथा भारत मोक्ष का रूप होते हैं। उसके साथ ही लक्ष्मण जी को काम का प्रतीक माना गया है तथा शत्रुघ्न जी को धन का रूप माना गया है ।

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Khatu Shyam: खाटू श्याम भगवान से जुड़ी 10 बातें, कलियुग में पूजे जाने का सबसे बड़ा कारण क्या आप जानते हैं

Khatu Shyam: खाटू श्याम को कलियुग का सबसे प्रसिद्ध भगवान माना जाता है. खाटू श्याम भगवान को लेकर भक्तों के बीच गहरी आस्था है. इनक संबंध महाभारत काल से जुड़ा है. राजस्थान के सीकर में खाटू श्याम का मंदिर स्थित है. वैसे तो खाटू श्याम के कई मंदिर हैं, लेकिन मान्यता है कि राजस्थान के सीकर में स्थित यह मंदिर खाटू श्याम के सभी मंदिरों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है. खाटू श्याम को कलियुग संसार में सबसे प्रसिद्ध भगवान माना गया है. खाटू श्याम जी के दर्शन करने के लिए लाखों भक्तों की भीड़ हर दिन उमड़ती है. मान्यता है कि जो भक्त यहां आकर भगवान के दर्शन करते हैं और मनोकामना मांगते हैं, उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं. Khatu Shyam खाटू श्याम भगवान से जुड़ी 10 बातें Khatu Shyam Mandir: आखिर कैसे अस्तित्व में आया खाटू श्याम मंदिर, जानिए बर्बरीक से खाटू बाबा बनने तक की कहानी kalyug:कलियुग में पूजे जाने का सबसे बड़ा कारण खाटू श्याम भगवान को कलियुग में पूजे जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वे हारे का सहारा माने जाते हैं। वे उन लोगों की मदद करते हैं जो किसी भी तरह से परेशान हैं या जो अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने में असमर्थ हैं। खाटू श्याम भगवान को कलियुग में पूजे जाने के अन्य कारणों में शामिल हैं: खाटू श्याम भगवान एक लोकप्रिय देवता हैं और उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

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Khatu Shyam Mandir: आखिर कैसे अस्तित्व में आया खाटू श्याम मंदिर, जानिए बर्बरीक से खाटू बाबा बनने तक की कहानी

Khatu Shyam खाटू श्याम मंदिर भारत के राजस्थान राज्य के सीकर जिले में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर भगवान श्याम को समर्पित है, जो भगवान कृष्ण के एक रूप हैं। मंदिर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और यहाँ से आसपास का दृश्य बहुत ही सुंदर है। मंदिर की वास्तुकला बहुत ही सुंदर और आकर्षक है। मंदिर का मुख्य द्वार बहुत ही भव्य है और इसके ऊपर भगवान श्याम की एक सुंदर प्रतिमा है। मंदिर के अंदर भगवान श्याम की एक विशाल प्रतिमा है, जो बहुत ही आकर्षक है। मंदिर में भगवान श्याम के अलावा भगवान कृष्ण, राधा और अन्य देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएँ हैं। मंदिर में हर साल लाखों भक्त आते हैं। विशेष रूप से, हर साल फाल्गुन माह में आयोजित होने वाले खाटू मेले में लाखों भक्त आते हैं। मेले में भक्त भगवान श्याम से अपनी मनोकामनाएँ पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। कौन हैं बाबा खाटू श्याम Khatu Shyam बाबा खाटू श्याम भगवान कृष्ण के एक रूप हैं। वे महाभारत के पात्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के अवतार माने जाते हैं। बर्बरीक में बचपन से ही वीर और महान योद्धा के गुण थे और इन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त किए थे। इसी कारण इन्हें तीन बाण धारी भी कहा जाता है। क्या है मान्यता इस मंदिर की एक बहुत ही खास और अनोखी बात प्रचलित है। कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है इसे बाबा श्याम का हर बार एक नया रूप देखने को मिलता है। कई लोगों को उनके आकार में भी बदलाव नजर आता है। बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम महाभारत के युद्ध से पहले, घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने भगवान कृष्ण से वरदान मांगा कि वह युद्ध में दोनों पक्षों का नाश न करे, बल्कि केवल अधर्म का नाश करे। भगवान कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया, लेकिन युद्ध में दोनों पक्षों के बीच समानता बनाए रखने के लिए, उन्होंने बर्बरीक से अपना शीश दान करने को कहा। महाभारत के युद्ध के दौरान बर्बरीक ने अपनी माता अहिलावती के समक्ष इस युद्ध में जाने की इच्छा प्रकट की। जब मां ने इसकी अनुमति दे दी तो उन्होंने माता से पूछा, ‘मैं युद्ध में किसका साथ दूं?’ इस प्रश्न पर माता ने विचार किया कि कौरवों के साथ तो विशाल सेना, स्वयं भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, अंगराज कर्ण जैसे महारथी हैं, इनके सामने पांडव अवश्य ही हार जाएंगे। इसलिए उन्होंने बर्बरीक से कहा कि ‘जो हार रहा हो, तुम उसी का सहारा बनो।’ खाटू श्याम कैसे बने हारे का सहारा युद्ध की समाप्ति के बाद सभी पांडव विजय का श्रेय अपने ऊपर लेने लगे। आखिरकार निर्णय के लिए सभी श्रीकृष्ण के पास गए तो वह बोले, ‘‘मैं तो स्वयं व्यस्त था इसलिए मैं किसी का पराक्रम नहीं देख सका। ऐसा करते हैं, सभी बर्बरीक के पास चलते हैं।’’ वहां पहुंच कर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे पांडवों के पराक्रम के बारे में पूछा तो बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया, ‘‘भगवन युद्ध में आपका सुदर्शन चक्र नाच रहा था और जगदम्बा लहू का पान कर रही थीं, मुझे तो ये लोग कहीं भी नजर नहीं आए।’’बर्बरीक का उत्तर सुन सभी की नजरें नीचे झुक गईं। तब श्रीकृष्ण ने उनसे प्रसन्न होकर इनका नाम श्याम रख दिया। अपनी कलाएं एवं अपनी शक्तियां प्रदान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि, ‘‘बर्बरीक धरती पर तुम से बड़ा दानी न तो कोई हुआ है और न ही होगा। मां को दिए वचन के अनुसार, तुम हारने वाले का सहारा बनोगे। लोग तुम्हारे दरबार में आकर जो भी मांगें उन्हें मिलेगा।’’ इस तरह से खाटू श्याम मंदिर अस्तित्व में आया।

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Durga mata :श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा 

श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत की कथा का बहुत महत्व है। यह कथा हमें देवी दुर्गा की महिमा और उनके भक्तों पर उनकी कृपा के बारे में बताती है। यह कथा हमें प्रेरित करती है कि हम भी देवी दुर्गा की सच्ची श्रद्धा से उनकी आराधना करें ताकि हमें भी उनकी कृपा प्राप्त हो सके। नवरात्रि व्रत का फल श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत का फल बहुत ही फलदायी होता है। इस व्रत को करने से मनुष्य को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। उसे सुख-समृद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। Durga mata नवरात्रि व्रत की विधि श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत की विधि निम्नलिखित है: नवरात्रि व्रत के नियम श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत के कुछ नियम निम्नलिखित हैं: व्रत कथा प्रारम्भ बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण। आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। चैत्र, आश्विन और आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? हे भगवान! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार करना उचित है? और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो? बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पते! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा Durga mata महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं, यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है। मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या और काक बन्ध्या को इस व्रत के करने से पुत्र उत्पन्न होता है। समस्त पापों को दूूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन सा मनोबल है जो सिद्ध नहीं हो सकता। जो मनुष्य अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता-पिता से हीन हो जाता है अर्थात् उसके माता-पिता मर जाते हैं और अनेक दुखों को भोगता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंग से हीन हो जाता है उसके सन्तानोत्पत्ति नहीं होती है। इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुख भोगता है। इस व्रत को न करने वला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो, भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता है और गूंगा हो जाता है। जो विधवा स्त्री भूल से इस व्रत को नहीं करतीं वह पति हीन होकर नाना प्रकार के दुखों को भोगती हैं। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा करे। Durga mata:दुर्गा माता के 9 रूपों की कहानी हे बृहस्पते! जिसने पहले इस व्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण! मनुष्यों का कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो। ब्रह्मा जी बोले- पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त मनो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर पुत्री उत्पन्न हुई। वह कन्या सुमति अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी। एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।  इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी कि हे पिताजी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से आधीन हूं। जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है। मनुष्य जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार मिलता है, क्यों कि कर्म करना मनुष्य के आधीन है। पर फल दैव के आधीन है। जैसे अग्नि में पड़े तृणाति अग्नि को अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ- जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर तुम क्या करती हो? इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति मन में विचार करने लगी कि – अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयावने कुशयुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की। उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगीं कि हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं। इस प्रकार भगवती दुर्गा का

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Sapna:सपने में खुद का चेहरा आईने में देखने का क्या मतलब होता है ?

Sapna कुछ मामलों में, सपने में खुद का चेहरा आईने में देखना एक नकारात्मक संकेत माना जा सकता है। यह आत्म-संदेह, आत्म-निंदात्मक विचारों या आत्म-विनाशकारी व्यवहार का प्रतीक हो सकता है। यह सपना व्यक्ति को अपने स्वयं के विचारों और भावनाओं के बारे में जागरूक होने के लिए भी प्रोत्साहित कर सकता है। ऐसा माना जाता है कि सपने भविष्य (Future) का संकेत देते हैं. हर व्यक्ति के सपने अलग-अलग होते हैं. किसी को अच्छे सपने आते हैं, किसी को बुरे सपने आते हैं. अच्छे सपने और बुरे सपने किसी व्यक्ति के वश में नहीं होते. यदि कोई व्यक्ति सोचे कि वह सिर्फ अच्छे सपने देखे तो ऐसा संभव नहीं है. विज्ञान (Science) यह भी मानता है कि हमारे दिनभर किए गए कार्यों को हमारा दिमाग रात में सोते समय सपने के रूप में हमें दिखाता है. इसी क्रम में आज हम बात करने जा रहे हैं कि यदि हमें सपने में खुद का चेहरा (Face) आईने में दिखाई दे तो इसका क्या मतलब होता है. Swapna Shastra:सपनों में दिखाई देने वाली ये आठ घटनाएं मानी जाती है शुभ सपने वो काल्पनिक दुनिया होते हैं, जो हमें असल दुनिया से बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाते हैं, जिसे हम स्वप्न लोक कहते हैं. स्वप्न शास्त्र के अनुसार हर सपने का कोई ना कोई मतलब जरूर होता है. देखे जाने वाले कुछ सपने शुभ होते हैं और कुछ अशुभ माने जाते हैं. स्वप्न शास्त्र में उन सभी सपनों का अर्थ बताया गया है. सपने में शीशे में चेहरा देखनायदि किसी सपने में आप अपने आपको किसी दर्पण के सामने खड़े हुए देखते हैं या दर्पण में आप अपने आप को देख रहे हैं तो यह सपना आपके लिए एक चेतावनी हो सकती है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार यह सपना आपको आने वाले दिनों में आपके जीवन में आने वाले शारीरिक और मानसिक कष्ट के बारे में संकेत देता है. इस प्रकार का सपना देखने का मतलब है कि आप दो मुंहे लोगों के बीच में फंस गए हैं, ऐसे में आपको सावधान रहने की बहुत जरूरत है. यह लोग कभी भी आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं. Sapna सपने में दर्पण देखना यदि आप सपने में आईना देखते हैं तो यह आपके लिए एक शुभ सपना हो सकता है. सपने में दर्पण देखने का मतलब है कि आप आर्थिक तरक्की करने वाले हैं. यह आपको आपके जीवन में होने वाले धन लाभ के बारे में संकेत देता है. सपने में दर्पण टूटनायदि कोई व्यक्ति अपने सपनों में दर्पण का टूटना देखता है, तो यह उसके लिए अच्छा सपना नहीं माना जाता. सपने में दर्पण टूटने का मतलब है कि आपके और आपके परिवार के संबंधों में कटुता बढ़ सकती है, इसलिए आपको अपने परिवार से मेलजोल बढ़ाना चाहिए और अपने संबंधों में मधुरता लानी चाहिए.

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Swapna Shastra:सपनों में दिखाई देने वाली ये आठ घटनाएं मानी जाती है शुभ

Swapna Shastra: सपनों की व्याख्या करने के लिए, स्वप्न शास्त्र विभिन्न कारकों पर विचार करता है, जैसे कि सपने में क्या देखा गया, सपने का समय, सपने देखने वाले का व्यक्तित्व और वर्तमान परिस्थितियां। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने दो प्रकार के होते हैं: शुभ और अशुभ। शुभ सपने अच्छे संकेत देते हैं, जबकि अशुभ सपने बुरे संकेत देते हैं। सोने के बाद आत्मा शरीर से बाहर निकलकर यहां-वहां घूमती है और बाद में शरीर में प्रवेश कर जाती है। उस समय शरीर कोमा की स्थिति में होता है। लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है ये आज भी शोध का विषय है। समुद्र का पानी होता अशुभ संकेत Swapna Shastra अशांति और उथल-पुथल: सपने में समुद्र का पानी उथल-पुथल भरा देखना जीवन में अशांति और उथल-पुथल का संकेत देता है। परिवर्तन: सपने में समुद्र का पानी देखना जीवन में परिवर्तन का संकेत भी देता है। यह परिवर्तन अच्छा या बुरा हो सकता है। अंतर्विरोध: सपने में समुद्र का पानी देखना अंतर्विरोध का भी संकेत देता है। व्यक्ति अपने जीवन में किसी तरह के अंतर्विरोध से जूझ रहा हो सकता है। इस तरह के सपने देखने के बाद मनुष्य को वाहन सावधानी पूर्वक चलाना चाहिए और ऊंचाई वाली जगहों पर सावधानी से जाना चाहिए। ये सपना भविष्य में सावधानी बरतने की तरफ इशारा करता है। सपने में गुलाब का फूल देखना सपनों की व्याख्या व्यक्तिगत परिस्थितियों और सपने देखने वाले के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। किसी भी सपने की व्याख्या करने से पहले, सभी कारकों को ध्यान में रखना चाहिए। यदि आप सपने में गुलाब का फूल देखते हैं, तो यह एक अच्छा संकेत है। यह आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तनों का संकेत देता है। सपने में गुलाब का फूल देखते हैं तो ये आपके लिए शुभ माना जाता है। ये आपके जीवन में आने वाली सकारात्मकता का संकेत है। ऐसे सपनों का ये अर्थ भी होता है कि जल्द ही आपके मन की कोई इच्छा पूरी होने वाली है। सपने में डूब जाना सपने में डूबते हैं, तो यह एक चेतावनी संकेत हो सकता है कि आपको अपने जीवन में कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है। आपको अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के तरीके खोजने की आवश्यकता हो सकती है, अपनी चिंताओं का सामना करने के तरीके सीखने की आवश्यकता हो सकती है, या अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने की आवश्यकता हो सकती है।आप गहरे पानी में डूब रहे हैं। ये इस बात का संकेत है कि आप किसी डर या दुख में हैं। सपने में अपने आपको उस व्यक्ति को उन घटनाओं के बारे में सोचना बंद करना चाहिए जो गुजर चुकी हैं। आपको किसी भी तरह की चिंता नहीं करनी चाहिए और अपने मन को शांत करने का प्रयास करना चाहिए। खुद को दरिद्र रूप में देखना अपने सपनों को याद रखने की कोशिश करें। जितना अधिक आप अपने सपनों को याद रख पाएंगे, उतनी ही आसानी से आप उन्हें व्याख्या कर पाएंगे। सपने में क्या हुआ, इस पर ध्यान दें। सपने में क्या हुआ, इस पर ध्यान देने से आपको सपने का अर्थ समझने में मदद मिल सकती है। सपने का समय और स्थान ध्यान दें। सपने का समय और स्थान भी सपने के अर्थ को प्रभावित कर सकते हैं। सपने देखने वाले का व्यक्तित्व और वर्तमान परिस्थितियां पर विचार करें। सपने देखने वाले का व्यक्तित्व और वर्तमान परिस्थितियां भी सपने के अर्थ को प्रभावित कर सकती हैं। आपको इससे परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे स्वप्न का मतलब आपके धन में वृद्धि होना है। ये अटके हुए धन के वापस मिलने का भी संकेत है। सपने में तोता देखना कौशल और प्रतिभा: सपने में तोता देखना कौशल और प्रतिभा का भी संकेत दे सकता है। यह व्यक्ति की कुछ नई प्रतिभा या कौशल के विकास का संकेत हो सकता है। माहौल और प्रभाव: सपने में तोता देखना माहौल और प्रभाव का भी संकेत दे सकता है। यह व्यक्ति के आसपास के माहौल या किसी अन्य व्यक्ति के प्रभाव को दर्शा सकता है।  इसका मतलब है कि आपको कोई अच्छा समाचार मिलने वाला है। आपके जीवन में सुख की शुरूआत होने वाली है। तोता हमेशा से सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। सपने में मृत्यु देखना सपनों में अपने किसी भी परिजन की मृत्यु होते हुए देखते हैं तो समझिए उनकी आयु में वृद्धि हो गई है। नई शुरुआत: सपने में मृत्यु देखने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि आप अपने जीवन में एक नई शुरुआत करने के लिए तैयार हैं। यह पुरानी आदतों या संबंधों को छोड़ने और नए अवसरों को खोजने का समय हो सकता है। परिवर्तन: सपने में मृत्यु देखने का एक अन्य अर्थ यह भी हो सकता है कि आपके जीवन में कुछ बदलाव होने वाले हैं। यह बदलाव अच्छे या बुरे हो सकते हैं। भवन का निर्माण देखना  भवन का निर्माण दिखाई देने का मलतब है आपके जीवन में उन्नति होने वाली है। आपको धन की प्राप्ति होने वाली है। आशा: सपने में भवन निर्माण देखना आशा का भी संकेत दे सकता है। यह व्यक्ति के जीवन में बेहतर समय आने की उम्मीद का संकेत हो सकता है। प्रतिभा: सपने में भवन निर्माण देखना प्रतिभा का भी संकेत दे सकता है। यह व्यक्ति की कुछ नई प्रतिभा या कौशल के विकास का संकेत हो सकता है। नया अवसर: सपने में भवन निर्माण देखना नए अवसर का भी संकेत दे सकता है। यह व्यक्ति के जीवन में नए अवसरों की संभावना का संकेत हो सकता है। सबसे दुर्लभ सपना क्या है सपने देखते समय आप सचेत रहते हैं कि आप सपना देख रहे हैं लेकिन आप सपने देखते रहते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, 55 प्रतिशत लोग अपने जीवन में कम से कम एक बार इस प्रकार के सपनों का अनुभव करते हैं। यह निर्धारित करना मुश्किल है कि कौन सा सपना सबसे दुर्लभ है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप “दुलर्भ” को कैसे परिभाषित करते हैं। यदि आप दुर्लभ को “बहुत कम लोगों को आने वाला” के रूप में परिभाषित करते हैं, तो ऐसे कई सपने हैं जो बहुत कम लोगों को आते हैं। यदि आप दुर्लभ को “बहुत ही अनोखा या असामान्य” के रूप में परिभाषित करते हैं, तो ऐसे भी कई सपने हैं जो बहुत ही अनोखे या असामान्य हैं।

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Vikram Betaal:विक्रम बेताल की कहानी: भिक्षु शान्तशील की कथा

Vikram Betaal राजा विक्रमादित्य और बेताल की कहानियों में से एक कहानी है भिक्षु शान्तशील की कथा। इस कहानी में, राजा विक्रमादित्य को एक योगी से शव लाने का आदेश मिलता है। राजा शव को श्मशान ले जाता है, लेकिन रास्ते में बेताल उसे 24 बार रोकता है और उसे एक कठिन पहेली पूछता है। राजा प्रत्येक पहेली का सही उत्तर देता है और शव को श्मशान ले जाने में सफल होता है। जब राजा योगी के पास शव लेकर आता है, तो योगी बहुत खुश होता है। वह राजा से कहता है, “हे राजन, आपने इस मुश्किल काम को करके यह साबित कर दिया कि आप सभी राजाओं में सबसे श्रेष्ठ हैं।” यह कहते हुए वह राजा के कंधे से शव को उतारा और उसे तंत्र साधना के लिए तैयार करने लगा। जब तंत्र साधना हो गई तो योगी राजा से कहता है, “हे राजन, अब आप इसे लेटकर प्रणाम करें।” इतना सुनते ही राजा को बेताल की बात याद आ गई। उसने योगी से कहा, “मुझे ऐसा करना नहीं आता, इसलिए आप मुझे पहले करके बता दें, फिर मैं ऐसा कर लूंगा।” जैसे ही योगी प्रणाम करने के लिए झुका, राजा ने उसका सिर काट दिया। यह सब देखकर बेताल बहुत खुश हुआ और बोला, “राजन यह योगी विद्वानों का राजा बनना चाहता था, लेकिन अब तुम बनोगे विद्वानों के राजा। मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया, अब तुम्हें जो चाहिए मांग लो।” राजा ने बेताल से कहा, “बेताल, मैं तुमसे कुछ नहीं मांगता। मैं तो बस तुम्हारी बातों का जवाब देना चाहता था।” बेताल ने कहा, “राजन, तुमने मेरी बातों का जवाब बहुत अच्छी तरह से दिया है। मैं तुम्हारी बुद्धि और साहस की सराहना करता हूं।” यह कहकर बेताल राजा विक्रमादित्य से हमेशा के लिए विदा हो गया। इस कहानी का नैतिक इस कहानी का नैतिक यह है कि बुद्धि और साहस से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है। राजा विक्रमादित्य ने बेताल की पहेलियों का सही उत्तर देकर अपनी बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने योगी का सिर काटकर अपना साहस भी दिखाया। इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें हमेशा सावधान रहना चाहिए। योगी एक विद्वान था, लेकिन वह दुष्ट था। वह राजा विक्रमादित्य को मारना चाहता था। राजा ने अपनी बुद्धि और साहस से योगी को मारकर अपनी जान बचाई। यह सुनते ही राजा ने बोला, “अगर आप खुश हैं तो मैं यही चाहता हूं कि आपने जो मुझे चौबीस कहानियां सुनाई हैं, उनके साथ यह पच्चीसवीं कहानी भी पूरी दुनिया में मशहूर हो जाए और हर कोई इन्हें आदर के साथ पढ़ें।” बेताल ने यह सुनते ही कहा, “जैसी आपकी इच्छा, ऐसा ही होगा, ये कहानियां ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से जानी जाएंगी और जो भी इन्हें ध्यान से पढ़ेगा या सुनेगा, उनके पाप खत्म हो जाएंगे।” इतना कहकर बेताल चला गया और उसके जाने के बाद शिवजी ने राजा को दर्शन दिए। शिवजी ने प्रकट होकर राजा से कहा, “तुमने इस दुष्ट योगी को मारकर एक अच्छा काम किया है। अब तुम जल्द ही सात द्वीपों समेत पाताल और पृथ्वी पर राज करोगे। जब तुम्हारा इन सभी चीजों से मन भर जाए, तो तुम मेरे पास चले आना।” इतना कहकर शिवजी वहां से चले गए। इसके बाद राजा अपने नगर गए और वहां जब सब को राजा की वीरता के बारे में पता चला तो सभी ने राजा की प्रशंसा की और खुशियां मनाई। कुछ ही वक्त बाद राजा विक्रमादित्य धरती और पाताल के राजा बन गए। जब उनका मन भर गया, तो वे भगवान शिवजी के पास चले गए।

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Vikram Betaal विक्रम बेताल की कहानी: रिश्ता क्या हुआ ?

Vikram Betaal एक बार, राजा विक्रमादित्य अपने मंत्री मलयध्वज के साथ जंगल में घूम रहे थे। रास्ते में, उन्होंने एक पेड़ पर लटके हुए एक आदमी को देखा। आदमी ने राजा को आवाज़ दी और कहा, “हे राजन! मैं एक बेताल हूँ। अगर तुम मुझे अपने कंधे पर रखकर सूर्योदय तक घर ले जाओगे, तो मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊँगा।” राजा विक्रमादित्य ने बेताल की बात मान ली और उसे अपने कंधे पर बैठा लिया। बेताल ने एक कहानी सुनाई, जो इस प्रकार थी: Story कहानी एक बार, एक राजा मांडलिक था। उसके दो बच्चे थे, एक लड़का और एक लड़की। लड़का का नाम वीर था और लड़की का नाम लावण्यवती था। वीर बड़ा होकर एक शक्तिशाली योद्धा बना, जबकि लावण्यवती एक सुंदर और बुद्धिमान लड़की थी। एक दिन, राजा मांडलिक ने अपने बच्चों के विवाह की बात सोची। उसने एक ज्योतिषी को बुलाया और उनसे पूछा कि उनके बच्चों के लिए कौन से जोड़े सबसे उपयुक्त होंगे। ज्योतिषी ने कहा, “आपके बेटे के लिए एक ऐसी लड़की सबसे उपयुक्त होगी, जिसकी उम्र उससे कम हो। आपकी बेटी के लिए एक ऐसी लड़की सबसे उपयुक्त होगी, जिसकी उम्र उससे अधिक हो।” राजा मांडलिक ने अपने बच्चों की शादी के लिए एक समारोह का आयोजन किया। समारोह में कई राजाओं और महाराजाओं ने भाग लिया। समारोह के दौरान, वीर ने एक लड़की को देखा, जिसकी उम्र उससे कम थी। वह लड़की बहुत सुंदर थी। वीर ने उस लड़की से शादी करने का फैसला किया। लावण्यवती ने भी एक लड़की को देखा, जिसकी उम्र उससे अधिक थी। वह लड़की भी बहुत सुंदर थी। लावण्यवती ने उस लड़की से शादी करने का फैसला किया। राजा मांडलिक ने अपने बच्चों की इच्छा को पूरा किया और दोनों की शादी कर दी। कुछ समय बाद, वीर की पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया। लावण्यवती की पत्नी ने भी एक बेटे को जन्म दिया। बेटा होने पर, वीर और लावण्यवती ने अपने बच्चों का नाम रख दिया, “संतोष”। संतोष बड़ा होकर एक विद्वान और गुणी व्यक्ति बना। वह अपने माता-पिता का आज्ञाकारी और भक्त पुत्र था। एक दिन, संतोष अपने माता-पिता के साथ जंगल में घूम रहा था। रास्ते में, उन्होंने एक साधु को देखा। साधु ने संतोष को देखा और कहा, “हे बालक! तुम एक बहुत ही सुंदर और गुणी हो। तुम्हारे माता-पिता तुमसे बहुत प्यार करते हैं।” संतोष ने साधु की बात सुनकर प्रसन्नता व्यक्त की। साधु ने फिर कहा, “हे बालक! तुम अपने माता-पिता के लिए क्या कर सकते हो?” संतोष ने कहा, “हे साधु! मैं अपने माता-पिता के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।” साधु ने कहा, “हे बालक! तुम्हारे माता-पिता के लिए सबसे अच्छा काम यह होगा कि तुम अपने भाई-बहनों के साथ प्रेम और सद्भाव से रहो।” संतोष ने साधु की बात मान ली और अपने भाई-बहनों के साथ प्रेम और सद्भाव से रहने लगा। Story end कहानी खत्म बेताल ने कहानी खत्म करने के बाद राजा विक्रमादित्य से पूछा, “हे राजन! रिश्ता क्या हुआ?” राजा विक्रमादित्य ने सोच-समझकर कहा, “हे बेताल! रिश्ता तो वही है, जो हमेशा से रहा है। माता-पिता के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही होते हैं, चाहे उनकी उम्र कितनी भी हो।” बेताल राजा विक्रमादित्य की बात सुनकर प्रसन्न हुआ और कहा, “हे राजन! तुम्हारा जवाब सही है। रिश्ता तो प्रेम और स्नेह का होता है, उम्र का नहीं।” बेताल यह कहकर फिर से पेड़ पर लटक गया। राजा विक्रमादित्य ने बेताल को प्रणाम किया और अपने रास्ते पर चल दिए।

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Vikram Betaal:विक्रम बेताल की कहानी: किसका पुण्य बड़ा ?

Vikram Betaal एक समय की बात है, एक नगर में एक राजा रहता था। उसका नाम चंद्रसेन था। राजा बहुत ही दयालु और धर्मात्मा था। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। एक दिन, राजा जंगल में शिकार करने गया। शिकार करते समय राजा को एक बूढ़ा व्यक्ति मिला। बूढ़ा व्यक्ति बहुत ही गरीब और भूखा था। राजा ने बूढ़े व्यक्ति को अपने साथ महल ले आया और उसे खाना खिलाया। राजा ने बूढ़े व्यक्ति को कपड़े और पैसे भी दिए। बूढ़ा व्यक्ति राजा की दयालुता से बहुत खुश हुआ। उसने राजा को धन्यवाद दिया और कहा, “महाराज, आपने मेरे जीवन को बचा लिया है। मैं आपका बहुत आभारी हूं।” राजा ने कहा, “यह मेरा सौभाग्य है कि मैं आपकी मदद कर पाया।” राजा ने बूढ़े व्यक्ति को अपने महल में रहने के लिए भी कहा। बूढ़ा व्यक्ति राजा के महल में रहने लगा और राजा की सेवा करने लगा। एक दिन, राजा को पता चला कि बूढ़ा व्यक्ति एक सिद्ध पुरुष है। सिद्ध पुरुष ने राजा को बताया कि राजा ने उसके साथ जो दयालुता की है, उसके लिए उसे बहुत पुण्य प्राप्त होगा। राजा को यह बात सुनकर बहुत खुशी हुई। उसने सिद्ध पुरुष से पूछा, “महात्मा, क्या आप मुझे बता सकते हैं कि सबसे बड़ा पुण्य क्या है?” सिद्ध पुरुष ने कहा, “सबसे बड़ा पुण्य दूसरों की मदद करना है। जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, वे ही सबसे बड़े पुण्यवान होते हैं।” राजा ने सिद्ध पुरुष की बात मान ली और उसने अपना पूरा जीवन दूसरों की मदद करने में लगा दिया। वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता था। राजा की मृत्यु के बाद, वह स्वर्ग में गया। स्वर्ग में, राजा को पता चला कि उसने बहुत बड़ा पुण्य अर्जित किया है। राजा स्वर्ग में बहुत खुश था। Vikram Betaal बेताल का सवाल बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा, “राजन, बताओ कि राजा चंद्रसेन का पुण्य कितना बड़ा था?” विक्रमादित्य ने कहा, “राजा चंद्रसेन का पुण्य बहुत बड़ा था। उसने अपने जीवन में दूसरों की मदद करके बहुत बड़ा पुण्य अर्जित किया था।” बेताल ने कहा, “तुमने सही कहा। राजा चंद्रसेन का पुण्य बहुत बड़ा था।” बेताल ने विक्रमादित्य को छोड़ दिया और पेड़ पर लटक गया। विचार इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दूसरों की मदद करना सबसे बड़ा पुण्य है। जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, वे ही सबसे बड़े पुण्यवान होते हैं।

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