Sapne:सपने में दिख जाए बाघ, तो हो जाएं सावधान वरना होगा भारी नुकासान

रात को सोते समय हर व्यक्ति सपना देखता है। उस सपने में कुछ सपना शुभ होता है तो अशुभ। लेकिन क्या आपको पता है सपना देखने का मतलब क्या होता है। कई लोग सपने में जंगली जानवर को देखते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में जंगली जानवर को देखने का मतलब….. रात को सोते समय हर व्यक्ति सपना देखता है। उस सपने में कुछ सपना शुभ होता है तो अशुभ। लेकिन क्या आपको पता है सपना देखने का मतलब क्या होता है। कई लोग Sapne सपने में जंगली जानवर को देखते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में जंगली जानवर को देखने का मतलब आपको पता है। अगर नहीं तो आज इस खबर में जानेंगे सपने में बाघ देखने का मतलब क्या होता है। सपने में बाघ  का देखना शुभ होता है या अशुभ आइये विस्तार से जानते हैं। सपने में दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए बदलने वाला है भाग्य, होगा धन लाभ Sapne:सपने में बाघ देखने का मतलब स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बाघ देखने का अलग-अलग मतलब होता है। यदि रात को सोते समय सपने में बाघ दिखाई देता है, तो ऐसे सपने आपके लिए शुभ होता है। कहा जाता है कि इस तरह के सपना देखने से रुका हुआ कार्य पूर्ण हो जाता है। जो भी कार्य करने के बारे में सोच रहे हैं उस कार्य में सफलता मिलेगी। Sapne:सपने में बाघ को हमला करते देखना आपकी आंतरिक चिंताएं और संघर्ष: सपने में बाघ का हमला आपकी आंतरिक चिंताओं, भय या क्रोध का प्रतीक हो सकता है। यदि आप वास्तविक जीवन में तनावपूर्ण या चिंतित महसूस कर रहे हैं, तो यह सपना आपके अवचेतन मन का एक तरीका हो सकता है कि आप इन भावनाओं को व्यक्त करें। बाहरी खतरे या चुनौतियां: कुछ मामलों में, सपने में बाघ का हमला आपके जीवन में किसी वास्तविक खतरे या चुनौती का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यदि आप किसी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, तो यह सपना आपको उस स्थिति का सामना करने और उससे लड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। Sapne सपने में बाघ को मांस खाते हुए देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आप Sapne सपने में बाघ में बाघ को मांस खाते हुए देखते हैं, तो ऐसे सपने बहुत ही शुभ होता है। कहा जाता है कि इस तरह  के सपने देखने का मतलब आपके शत्रु आपसे जल्द ही हार मानने वाले हैं। इसके साथ ही आपको अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। Sapne:सपने में बाघ को मारते हुए देखना यदि आप अपने सपने में बाघ को मारते हुए देखते हैं, तो ऐसे Sapne सपने हमें इस बात का संकेत देता है कि हमें आपस में मिलकर रहना चाहिए। इसके साथ ही आपको अपने गुस्से पर नियंत्रण करना चाहिए।

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Durgashtami2024:हर महीने की अष्टमी पर करना चाहिए देवी पूजा और व्रत, बीमारियों से बचने के लिए बनी है ये परंपरा ?

पौष महीने की अष्टमी पर शक्ति पूजा से प्रसन्न होती हैं देवी दुर्गा, सेहत के लिए भी अच्छा है इस दिन व्रत-उपवास करना Durgashtami2024अष्टमी तिथि की स्वामी देवी दुर्गा होती हैं। इसलिए हर महीने के शुक्लपक्ष में इस तिथि पर शक्ति पूजा और व्रत-उपवास करने का विधान पुराणों में बताया गया है। शक्ति पूजा के साथ नियम से व्रत या उपवास किया जाए तो सेहत भी अच्छा रहता है। इससे बीमारियां भी दूर होती हैं और उम्र बढ़ती है। हर महीने मौसम में थोड़े बदलाव होते हैं। जिससे बीमारियों का संक्रमण होता है। इसलिए ऋषियों हर व्रत-उपवास की परंपरा बनाई। जिससे पाचन अच्छा रहता है और शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत बढ़ती है। Durgashtami2024:मासिक दुर्गाष्टमी का शुभ मुहूर्त मासिक दुर्गाष्टमी के दिन अभिजीत मुहूर्त में मां दुर्गा की पूजा करना शुभ माना जाता है। Durgashtami2024:मासिक दुर्गाष्टमी के उपाय मासिक दुर्गाष्टमी के दिन कुछ उपाय करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है। Durgashtami2024:पौष महीने में देवी आराधनापौष महीने में शीत ऋतु होती है। इस महीने में बीमारियों से बचने के लिए सूर्य पूजा की जाती है। साथ ही पुराणों में इसके लिए देवी पूजा के लिए अष्टमी तिथि तय की गई है। पौष महीने में की गई शक्ति आराधना से हर तरह की परेशानियां दूर होती हैं। 2022 के पहले महीने में आने वाली मासिक Durgashtami2024 दुर्गा अष्टमी को शक्ति की आराधना जरूर करनी चाहिए ताकि सालभर मुश्किलों से लड़ने की ताकत मिले और देवी मां की कृपा हमेशा बनी रहे। स्कंद षष्ठी पर इस शुभ मुहूर्त में विधान से करें पूजा, घर में बनी रहेगी खुशहाली! Durgashtami2024:शक्ति पूजा की विधि Durgashtami2024:शक्ति की आराधना के लिए मंत्र जाप करेंया देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ अष्टमी व्रत का महत्वमान्यता है कि हर हिंदू मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी का व्रत किया जाता है। इस व्रत का देवी दुर्गा का मासिक व्रत भी कहा जाता है। आमतौर पर हिंदू कैलेंडर में अष्टमी दो बार आती है। एक कृष्ण पक्ष में दूसरी शुक्ल पक्ष में। शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर खासतौर से देवी दुर्गा का पूजा और व्रत किया जाता है।

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Raksha Bandhan 2024: कब है रक्षा बंधन? जान लें क्या है राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

Raksha Bandhan 2024: रक्षा बंधन, भाई-बहन के अटूट प्रेम का त्योहार है, जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी रक्षा का वचन लेती हैं और भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के बीच स्नेह, विश्वास और बंधन को मजबूत करता है। राखी बांधने के साथ ही मिठाईयां बांटी जाती हैं और घर में उत्सव का माहौल होता है। रक्षा बंधन सिर्फ एक त्योहार मात्र नहीं है, ये भाइयों और बहनों के बीच के संबंध को मजबूत करने का एक बहुत खूबसूरत जरिया भी है। रक्षाबंधन से जुड़ी एक खास बात बहुत कम लोगों को मालूम होता है कि भद्राकाल में राखी नहीं बांधनी चाहिए। शास्त्र और मुहूर्त शास्त्र में भद्रा काल को अशुभ माना गया है। ऐसे में राखी बांधने का शुभ मुहूर्त जानना बहुत जरूरी होता है। इसलिए आइए इस लेख में जानते हैं कि इस साल श्रावण मास की पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन किस दिन पड़ रहा है। साथ ही ये भी जानेंगे कि भद्राकाल कब समाप्त हो रहा है और राखी बांधने का शुभ मुहूर्त क्या है? रक्षाबंधन तिथिहिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाएगा। और सरल करके लिखें तो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 19 अगस्त 2024 को रक्षाबंधन मनाया जाएगा। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 19 अगस्त को प्रातः 03:04  शुरू होगा और इसका समापन 19 अगस्त को मध्य रात्रि 11:55 पर समाप्त होगा। राखी बांधने का शुभ मुहूर्तहिंदू पंचांग के अनुसार राखी बांधने का शुभ मुहूर्त दोपहर 01:30 से रात्रि 09:07 तक रहेगा। कुल मिलाकर शुभ मुहूर्त 07 घंटे 37 मिनट का होगा। भद्राकालभद्राकाल – पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ के साथ भद्रा की शुरुआतभद्राकाल की समाप्ति – 19 अगस्त 2024 को दोपहर 1:30 पर भद्रा मुख – 19 अगस्त को प्रातः 10:53 से दोपहर 12:37 तकभद्रा पूंछ – 19 अगस्त को प्रातः 09:51 से प्रातः 10:53 तक भद्राकाल में नहीं बांधी जाती है राखीभद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है, मान्यताओं के अनुसार इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है, जिसमें राखी बांधना भी शामिल है। राखी बांधना एक पवित्र कार्य है और इसे शुभ मुहूर्त में ही करना चाहिए। भद्राकाल में राखी बांधने से भाई-बहन के रिश्ते में तनाव आ सकता है और मनोकामनाएं पूरी नहीं हो सकती हैं। इसलिए, रक्षा बंधन का त्योहार मनाते समय भद्राकाल का ध्यान रखना चाहिए और राखी केवल शुभ मुहूर्त में ही बांधनी चाहिए। कौन है भद्रा?पौराणिक कथाओं के अनुसार भद्रा सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन हैं। भद्रा का स्वभाव क्रोधी है। जब भद्रा का जन्म हुआ तो वह जन्म लेने के फौरन बाद ही पूरे सृष्टि को अपना निवाला बनाने लगी थीं। इस तरह से भद्रा के कारण जहां भी शुभ और मांगलिक कार्य, यज्ञ और अनुष्ठान होते वहां समस्याएं आने लगती हैं। इस कारण से जब भद्रा लगती है तब किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूर्णिमा तिथि की शुरुआत आधा हिस्सा भद्रा काल होता है। यही वजह है कि रक्षाबंधन के दिन भद्रा का साया होने के कारण राखी नहीं बांधी जाती है। हिमाचल में यहां स्‍वयंभू प्रकट शिवलिंग में विराजे हैं बाबा भूतनाथ ज्योतिष में भद्रा काल का महत्वज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा की राशि से भद्रा का वास तय किया जाता है। गणना के मुताबिक चंद्रमा जब कुंभ राशि, कर्क राशि, सिंह राशि या मीन राशि में होता है, तब भद्रा पृथ्वी में निवास करके मनुष्यों को क्षति पहुंचाती है। वहीं मिथुन राशि, मेष राशि, वृषभ राशि और वृश्चिक राशि में जब चंद्रमा रहता है तब भद्रा स्वर्गलोक में रहती है एवं देवताओं के कार्यों में विघ्न डालती है। जब चंद्रमा धनु राशि, कन्या राशि, तुला राशि या मकर राशि में होता है तो भद्रा का वास पाताल लोक में माना गया है। भद्रा जिस भी लोक में रहती है वहीं प्रभावी रहती है। रक्षाबंधन 2024 (तिथि, भद्रा काल और शुभ मुहूर्त) श्रावण पूर्णिमा तिथि आरंभ- 19 अगस्त 2024 को सुबह 03:04श्रावण पूर्णिमा तिथि समापन- 19 अगस्त 2024 को मध्य रात्रि 11:55 राखी बांधने का शुभ मुहूर्त आरंभ – दोपहर 01:30 के बादराखी बांधने का शुभ मुहूर्त  समापन- रात्रि 09:07 तक भद्राकाल – पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ के साथ भद्रा की शुरुआतभद्राकाल की समाप्ति – 19 अगस्त 2024 को दोपहर 1:30 पर भद्रा मुख – 19 अगस्त को प्रातः 10:53 से दोपहर 12:37 तकभद्रा पूंछ – 19 अगस्त को प्रातः 09:51 से प्रातः 10:53 तक

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Baba Bhootnath:हिमाचल में यहां स्‍वयंभू प्रकट शिवलिंग में विराजे हैं बाबा भूतनाथ

यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका इतिहास 5वीं शताब्दी का बताया जाता है।यहाँ स्वयंभू शिवलिंग है, जो कि धरती से निकला हुआ माना जाता है।यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और हर साल हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। भगवान शिव हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। ऐसा ही स्वयं-भू प्रकट शिवलिंग का रूप है बाबा भूतनाथ का। मंडी शहर के बीचों बीच शिखारा शैली में बने बाबा के मंदिर में हर रोज भक्तों की भीड़ रहती है। Baba Bhootnath:बाबा भूतनाथ मंदिर, मंडी, हिमाचल प्रदेश भगवान शिव हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। ऐसा ही स्वयं-भू प्रकट शिवलिंग का रूप है Baba Bhootnathबाबा भूतनाथ का। मंडी शहर के बीचों बीच शिखारा शैली में बने बाबा के मंदिर में हर रोज भक्तों की भीड़ रहती है। सावन माह में यहां हर सोमवार को विशेष पूजा अर्चना और भंडारे का आयोजन होता है। 1527 ई में बने इस मंदिर का रूप आज भी जस का तस है। मंदिर के अंदर प्राचीन वाद्य यंत्र भी रखे गए हैं और प्राचीन मूर्तियां भी हैं। यहां सुबह पांच बजे और रोज शाम को आरती का आयोजन होता है। साथ ही दूध, दहीं, शहद, बिल व भांग पत्र से पूजा का विशेष लाभ भक्तों को मिलता है। मंडी शहर के साथ-साथ देश व विदेश से श्रद्धालु भी बाबा भूतनाथ के दर्शनों के लिए यहां पहुंचते हैं। Baba Bhootnath:यह है मान्यता बताया जाता है कि प्राचीन समय में एक ग्वाला अपनी गाय को चराने के लिए मंडी आता था, तो गाय एक स्थान पर खड़ी हो जाती और उसके थनों से अपने आप ही उस स्थान पर दूध निकलने लगता। यह बात चारों और फैल गई। इसी बीच उक्त समय के राजा अजबेर सेन को भगवान शिव ने सपने में आकर कहा कि उक्त स्थान पर उनका शिवलिंग हैं। सपना आने के अगले दिन ही जब राजा ने वहां खोदाई करवाई तो स्वयं-भू प्रकट शिवलिंग वहां मिला। इसके बाद राजा ने यहां शिखरा शैली में एक मंदिर का निर्माण करवाया और तब से आज दिन तक मंडी शहर के अलावा देश भर के लोगों की आस्था का केंद्र बाबा भूतनाथ का मंदिर माना जाता है। बाबा भूतनाथ के बारे में कुछ रोचक तथ्य बाबा भूतनाथ मंदिर, कोलकाता, पश्चिम बंगाल शादी में आ रही है दिक्कतें तो जरुर कर लें जुलाई में इस दिन शिव जी की आराधना बाबा भूतनाथ मंदिर, जयपुर, राजस्थान बाबा भूतनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश इनके अलावा भी भारत में कई जगहों पर बाबा भूतनाथ के मंदिर हैं।

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Jagannath Bhagwan:जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़े ये रोचक तथ्य, जब 9 दिनों की यात्रा पर निकलते हैं भगवान

जगन्नाथ रथ यात्रा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस रथ यात्रा का आयोजन प्रतिवर्ष उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से होता है। यह रथ यात्रा हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। ऐसा माना जाता है कि आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन भगवान श्री कृष्ण यानी कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ 9 दिनों की यात्रा पर निकलते हैं। इस साल भी यह यात्रा 12 जुलाई, सोमवार से शुरू होकर आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि, यानी देवशयनी एकादशी 20 जुलाई, मंगलवार के दिन समाप्त होगी। हर साल इस यात्रा में भक्तों का तांता लग जाता है, लेकिन इस बार कोरोना वायरस की वजह से भक्तों को इस यात्रा में शामिल होने का अवसर नहीं मिल पाएगा और मंदिर के कुछ सीमित पुजारियों के द्वारा इस रस्म को पूरा किया जाएगा। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ जी का विशाल रथ 9 दिनों के लिए बाहर यात्रा पर निकलता है। इस यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ चलता है जिसे तालध्वज कहा जाता है। मध्य में सुभद्रा जी का रथ चलता है जिसे दर्पदलन या पद्म रथ कहा जाता है। सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है Jagannath Bhagwan:मौसी के घर जाते हैं भगवान जगन्नाथ मान्यतानुसार इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ मुख्य मंदिर से निकलकर अपनी मौसी के घर जाते हैं। पुरी स्थित गुंडिचा मंदिर को उनकी मौसी का घर माना जाता है। कहा जाता है कि इसी मंदिर में 9 दिन तक भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी के साथ निवास करते हैं। पंडित श्री माधव चंद्र महापात्रा जी ने हमें बताया कि वास्तव में गुंडिचा मंदिर में ही Jagannath Bhagwan भगवान जगन्नाथ जी का अवतरण हुआ था और ये उनका जन्म स्थल माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों को तीन अलग-अलग दिव्य रथों पर रखकर नगर भ्रमण कराया जाता है। इस दौरान जगन्नाथ मंदिर में भगवान का स्थान खाली हो जाता है। केवल रुकमणी जी, जो माता लक्ष्मी का अवतार हैं वही मुख्य जगन्नाथ मंदिर में विराजमान रहती हैं। इन 9 दिनों में संपूर्ण पूजा पाठ गुंडिचा मंदिर में ही संपन्न होता है तथा भगवान वहीं निवास करते हैं। Jagannath Bhagwan:कैसे हुई रथ परंपरा प्रारंभ जब राजा इंद्रद्युम ने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां बनवाई तो रानी गुंडिचा ने मूर्तियां बनाते हुए मूर्तिकार विश्वकर्मा और मूर्तियों को देख लिया जिसके चलते मूर्तियां अधूरी ही रह गई तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में स्थापित होना चाहते हैं। इसके बाद राजा ने इन्हीं अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कर दिया। उस वक्त भी आकाशवाणी हुई कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी जन्मभूमि मथुरा जरूर आएंगे। स्कंदपुराण के उत्कल खंड के अनुसार राजा इंद्रद्युम ने आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रभु के उनकी जन्मभूमि जाने की व्यवस्था की। तभी से यह परंपरा रथयात्रा के रूप में चली आ रही है। Jagannath Rath Yatra 2024:इस दिन गुंडीचा मंदिर पहुंचेंगे भगवान जगन्नाथ कितने दिन रुकते हैं मौसी के घर रथों का निर्माण रथों का निर्माण नीम की पवित्र अखंडित लकड़ी से होता है, जिसे दारु कहते हैं। रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील, कांटों और धातु का उपयोग नहीं करते हैं। रथों के निर्माण के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी पर होता है और निर्माण कार्य अक्षया तृतीया पर प्रारंभ होता है। महत्वपूर्ण पड़ाव रथ यात्रा का धार्मिक महत्व कुछ रोचक तथ्य

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Jagannath Rath Yatra 2024:इस दिन गुंडीचा मंदिर पहुंचेंगे भगवान जगन्नाथ कितने दिन रुकते हैं मौसी के घर

जगन्नाथ रथ यात्रा जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। यह भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की वार्षिक यात्रा का उत्सव है। यह यात्रा ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर से शुरू होती है और गुंडीचा मंदिर तक जाती है। यह यात्रा 10 दिनों तक चलती है और इस दौरान लाखों भक्त रथों को खींचने के लिए इकट्ठा होते हैं। रथ यात्रा का महत्व: रथ यात्रा का कार्यक्रम: यहां कुछ रोचक तथ्य दिए गए हैं जो आपको जगन्नाथ रथ यात्रा के बारे में जानना चाहिए: भगवान जगन्नाथ का महाप्रसादभगवान जगन्नाथ जी छह बार महाप्रसाद चढ़ाया जाता है. भोजन में सात विभिन्न प्रकार के चावल, चार प्रकार की दाल, नौ प्रकार की सब्जियां और अनेक प्रकार की मिठाइयां परोसी जाती हैं. मीठे व्यंजन तैयार करने के लिए यहां शक्कर की बजाए अच्छे किस्म का गुड़ प्रयोग में लाया जाता है. आलू टमाटर और फूलगोभी का उपयोग मंदिर में नहीं होता है. कब से शुरू होगी यात्रा-वैदिक पंचांग के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा 07 जुलाई को सुबह 08 बजकर 05 मिनट से शुरू होगी.– यह यात्रा सुबह 09 बजकर 27 मिनट तक निकाली जाएगी.– इसके बाद यात्रा दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से फिर से शुरू होगी.– इस बार यात्रा 01 बजकर 37 मिनट पर विश्राम लेगी.– इसके बाद शाम 04 बजकर 39 मिनट से यात्रा शुरू होगी.– अब यह यात्रा 06 बजकर 01 मिनट तक चलेगी. कैसे हुई इस यात्रा की शुरुआतभगवान जगन्नाथ की यात्रा सदियों से चली आ रही है. ऐसा कहा जाता है कि इसकी शुरुआत 12वीं शताब्‍दी में हुई थी. एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार बहन सुभद्रा ने अपने भाइयों कृष्‍ण और बलराम से कहा कि वे नगर को देखना चाहती हैं. इसके बाद अपनी बहन की इच्छा पूरी करने के​ लिए दोनों भाइयों ने बड़े ही प्‍यार से एक रथ तैयार करवाया. इस रथ में तीनों भाई- बहन सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले थे और भ्रमण पूरा करने के बाद वापस पुरी लौटे. तभी से यह परंपरा चली आ रही है. मौसी के घर कितने दिन रुकते हैं?जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो रास्ते में गुंडिचा में मौसी के घर भी जाते हैं. माना जाता है कि मौसी के घर पर तीनों भाई- बहन खूब पकवान खाते हैं. जिससे उनकी तबियत खराब हो जाती है और वो अज्ञातवास में चले जाते हैं. वे मौसी के यहां पूरे 7 दिनों तक रुकते हैं और स्वस्थ्य होने के बाद पुरी वापस लौटते हैं.

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संस्कृत में टमाटर को क्या कहते हैं :नहीं सुना होगा इसका ऐसा नाम Tomato in sanskrit

संस्कृत में टमाटर: नामों की विस्तृत व्याख्या और उदाहरण Tomato in sanskrit पिछले उत्तर में, मैंने संस्कृत में प्याज के लिए अनेक संस्कृत नामों का उल्लेख किया था। अब, मैं टमाटर नामों को विस्तार से समझाऊंगा और कुछ उदाहरण भी दूंगा: 1. अमृतोदभव: 2. रक्तवर्ण: 3. पेरूवृक्षफल: 4. तामलफल: 5. बंगालवृक्षफल: 6. टमाटर: 7. अग्निमंथ: 8. लालभिंडी: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न क्षेत्रों और कालखंडों में टमाटर के लिए विभिन्न नाम उपयोग किए जाते थे। उदाहरण के लिए: संस्कृत में तामलफल: टमाटर के लिए एक रोचक नाम तामलफल संस्कृत में टमाटर के लिए एक असामान्य लेकिन दिलचस्प नाम है। आइए इसका अर्थ और उपयोग को गहराई से समझते हैं: निष्कर्ष: तामलफल टमाटर के लिए एक असामान्य लेकिन काव्यात्मक नाम है। यह टमाटर के स्वाद और सुगंध की तुलना एक परिचित मसाले से करता है।

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संस्कृत में प्याज के अनेक नाम जानकर हो जायेंगे हैरान :KARMASU

संस्कृत में प्याज के अनेक नाम: onion meaning in Sanskrit 1. पलाण्डु: यह शब्द “पल” (पानी) और “अण्डु” (अंडा) से मिलकर बना है। यह प्याज के गोलाकार आकार और उसके अंदर स्तरों को दर्शाता है, जो एक अंडे के समान होते हैं। उदाहरण: “शून्यगृहे पलाण्डुं कृष्णं पचति देवी।” (देवी रसोईघर में प्याज पका रही है।) 2. कृष्णावल: यह शब्द “कृष्ण” (काला) और “अवल” (पंक्ति) से मिलकर बना है। यह प्याज के गहरे रंग और उसके स्तरों को दर्शाता है, जो एक काले रंग की पंक्ति की तरह दिखते हैं। उदाहरण: “भोजनं कृष्णावलेन सह खादति।” (वह प्याज के साथ भोजन खाता है।) 3. रोहिता: यह शब्द “रक्त” (लाल) से लिया गया है। यह प्याज के लाल रंग को दर्शाता है। उदाहरण: “रोहितां शाके चिकित्सकः प्रयोजयति।” (चिकित्सक भोजन में लाल प्याज का उपयोग करता है।) 4. श्वेतरोहिता: यह शब्द “श्वेत” (सफेद) और “रोहिता” (लाल) से मिलकर बना है। यह सफेद प्याज के लाल रंग के छिलके को दर्शाता है। उदाहरण: “श्वेतरोहितायाः शाकं स्वादिष्टं भवति।” (सफेद प्याज की सब्जी स्वादिष्ट होती है।) 5. लवणकन्द: यह शब्द “लवण” (नमक) और “कन्द” (कंद) से मिलकर बना है। यह प्याज के स्वाद को दर्शाता है, जो थोड़ा नमकीन होता है और इसका एक भूमिगत कंद होता है। उदाहरण: “लवणकन्दं भोजने उपयुज्यते।” (प्याज का उपयोग भोजन में किया जाता है।) 6. गुरुव्याकरणटीका: यह एक विनोदी नाम है जो प्याज के स्तरों को व्याकरण के ग्रंथों में अध्यायों की तरह दर्शाता है। उदाहरण: “शाककौशलं गुरुव्याकरणटीकया सह तुल्यं भवति।” (प्याज पकाने की कला व्याकरण के ग्रंथों के अध्ययन के समान है।) 7. उका: यह शब्द प्याज की तीखी गंध को दर्शाता है। उदाहरण: “उकागन्धः श्वासं रुन्धति।” (प्याज की गंध सांस लेने में बाधा डालती है।) यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये सभी नाम विभिन्न क्षेत्रों और कालखंडों में उपयोग किए जाते थे।

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Sapne:सपने में दिखें ये 5 चीज, तो समझ लीजिए बदलने वाला है भाग्य, होगा धन लाभ

स्वप्न शास्त्र के अनुसार, कुछ सपनों को शुभ माना जाता है, जिनके देखने से यह माना जाता है कि आपके भाग्य में बदलाव आने वाला है और धन लाभ होने की संभावना है। तोता : स्वप्न शास्त्र बताता है कि यदि आपको भी अपने Sapne सपने में तोता दिखाई देता है तो इसका मतलब है कि आपको जल्द ही कहीं से धन मिलने वाला है. सपने में तोते का दिखाई देना शुभ माना जाता है. मधुमक्खी का छत्ता : स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि सपने में आपको मधुमक्खी का छत्ता दिखाई दे तो यह आपके लिए शुभ संकेत माना जाएगा. इसका अर्थ है कि जल्द ही आपकी आय में बढ़ोत्तरी होने वाली है, जिसके कारण आप अपना आने वाला समय सुख और ऐशो आराम से व्यतीत करेंगे. देवी-देवताओं को Sapne सपने में देखना : स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आप अपने सपने में देवी या देवता को देखते हैं तो यह संकेत है कि आने वाले दिनों में आपको अपने किए गए कार्यों में सफलता अवश्य प्राप्त होगी. साथ ही यह संकेत करता है कि आपकी आमदनी के स्रोत बढ़ेंगे और आपको अचानक धन प्राप्ति होगी. फलों से लदा पेड़ : स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यदि आपको अपने सपनों में फलों से लदा हुआ पेड़ या बहुत सारे पेड़ दिखाई दें तो ये आपके लिए एक शुभ संकेत है. यह सपना संकेत करता है कि आने वाले भविष्य में आपको बहुत सारा धन प्राप्त होने वाला है और आप जल्द ही अमीर हो सकते हैं. काला बिच्छू देखना : यदि सपने में आपको काले रंग का बिच्छू दिखाई देता है तो यह आपके लिए एक शुभ संकेत है. यह सपना संकेत करता है कि जल्द ही आपको कहीं से धन संपत्ति मिलने वाली है और आपका आने वाला जीवन सुखमय व्यतीत होने वाला है. सपने में चींटी देखने का मतलब ? जानें यह शुभ या अशुभ संकेत Sapne सपने में देखने पर शुभ मानी जाती हैं: माँ लक्ष्मी: सपने में माँ लक्ष्मी का दर्शन धन प्राप्ति का शुभ संकेत माना जाता है। सोना: सपने में सोना देखना भी धन लाभ का प्रतीक है। फलों से लदा हुआ पेड़: सपने में फलदार पेड़ देखना शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। झाड़ू: सपने में झाड़ू देखना भी धन लाभ का संकेत माना जाता है। बारिश: सपने में बारिश देखना भी शुभ माना जाता है और यह आर्थिक लाभ का प्रतीक हो सकता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सपनों का अर्थ हमेशा निश्चित नहीं होता है और इनकी व्याख्या व्यक्ति की विशिष्ट परिस्थितियों और सपने के अन्य विवरणों के आधार पर भिन्न हो सकती है। यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि सपने केवल संकेत होते हैं और वे भविष्य की भविष्यवाणी नहीं करते हैं। आपके भाग्य का निर्माण आपके कर्मों और प्रयासों से होता है। अगर आप इन शुभ सपनों में से कोई भी सपना देखते हैं, तो यह सकारात्मक सोच रखने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करने का एक अच्छा समय है।

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Hindu Dharma:हिन्दू धर्म में क्या है 4 अंक का महत्व? जानें आपसे कैसे जुड़ा है ये नंबर

Hindu Dharma:हिन्दू धर्म में 4 अंक का अत्यधिक महत्व है। यह संख्या अनेक महत्वपूर्ण अवधारणाओं और पहलुओं से जुड़ी हुई है, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं: Hindu Dharmaहिन्दू धर्म में अंकों का बहुत महत्व माना गया है हर एक अंक से जुड़ी कोई न कोई विशेषता शास्त्रों में वर्णित है जिसके आधार पर उस अंक का प्रभाव भी व्यक्ति के जीवन पर देखने को मिलता है। जहां एक ओर हर अंक का न सिर्फ ज्योतिष में स्थान मौजूद है बल्कि उसकी धार्मिकता भी शास्त्रों में बताई गई है। ठीक ऐसे ही 4 अंक को ज्योतिष शास्त्र में दिव्य माना गया है, वहीं धार्मिक दृष्टि से भी इस अंक का गहरा अर्थ बताया गया है। 1. चार युग: हिन्दू काल गणना के अनुसार, सृष्टि चार युगों में विभाजित है: 2. चार वेद: Hindu Dharma हिन्दू धर्म के चार मुख्य ग्रंथ हैं: 3. चार पुरुषार्थ: मनुष्य जीवन के चार मुख्य लक्ष्य हैं: 4. Hindu Dharma अन्य महत्वपूर्ण पहलू: भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है, जानिए यह पौराणिक कथा आपसे कैसे जुड़ा है 4 अंक: Hindu Dharma हिन्दू धर्म में 4 अंक का महत्व आपके जीवन के अनेक पहलुओं से जुड़ा हो सकता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 4 अंक का महत्व व्यक्ति की जन्मकुंडली और अन्य ज्योतिषीय कारकों के आधार पर भिन्न हो सकता है। आप भी इस लेख में दी गई जानकारी के माध्यम से यह जान सकते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म में क्यों खास माना जाता है 4 अंक और क्या है इसका महत्व एवं इससे जुड़ी विशेषता। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से। डिस्क्लेमर  ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है। 

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Sapne:सपने में चींटी देखने का मतलब ? जानें यह शुभ या अशुभ संकेत

सपनों की व्याख्या सदैव जटिल और विवादास्पद रही है। विभिन्न संस्कृतियों और मतों में सपनों के अर्थों को लेकर भिन्न मान्यताएं प्रचलित हैं। सपने में चींटी देखने का अर्थ भी विभिन्न स्रोतों और दृष्टिकोणों से भिन्न-भिन्न रूप से समझा जाता है। हिंदू स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में चींटी देखना शुभ संकेत माना जाता है। यह धन, समृद्धि, उन्नति और सफलता का प्रतीक है। हम कई तरह के सपने देखते हैं. इनमें से कुछ Sapne सपने सुबह उठने पर भूल जाते हैं. वहीं कई सपने ऐसे होते हैं जो हमें सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं. अगर आपको सपने में चींटी दिखाई देती है तो समझ जाइए कि इसके पीछे एक बेहद ही खास बात छिपी हुई है. ऐसे में जानिए सपने में चींटी देखने का क्या मतलब हैः Sapne कड़ी मेहनत और लगनसपने में चींटी देखना शुभ माना गया है. सपने में चींटी देखने का मतलब यह हो सकता है कि आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन से काम करने की आवश्यकता है. चींटियां अपनी कड़ी मेहनत और लगन के लिए प्रसिद्ध हैं. आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दूसरों के साथ सहयोग करने की आवश्यकता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ऐसे सपने का मतलब है कि चूंक चींटियां धैर्यवान होती हैं इसलिए आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए धैर्य रखने और लगातार प्रयास करने की आवश्यकता है. सपने में इन चीजों का दिखाई देना माना जाता है बेहद शुभ, जानिए हर एक का मतलब Sapne धन और समृद्धि का प्रतीक चींटियों को समृद्धि और धन का प्रतीक माना जाता है. सपने में चींटी देखने का मतलब यह हो सकता है कि आपके जीवन में समृद्धि और धन आने वाला है. सपने में चींटी देखने का मतलब यह हो सकता है कि आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा और आप जीवन में खुश रहेंगे. Sapne सपने में चींटी का झुंड देखनाअगर आपने सपने में चींटी का झुंड देखा है तो यह एक अशुभ सपना माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, बहुत सारी चींटी के बीच खुद को देखने का मतलब होता है कि आप किसी बहुत बड़ी मुसीबत से घिरने वाले हैं. इसका मतलब है कि अलग-अलग प्रकार की परेशानी आपके घर में आने वाली है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यह सपना ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ साझा कर देना चाहिए ताकि इसका असर कम हो जाए. सपने में लाल चींटी को देखनास्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर आप अपने Sapne सपने में कुछ लाल चींटी को अपने आसपास देखा है तो यह एक अशुभ सपना है. आपको अपने व्यापार या नौकरी में कुछ नुकसान देखने को मिलेगा. इसके अलावा रिश्तेदारी यार प्यार मोहब्बत में भी नुकसान हो सकता है. (Disclaimer: यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर ले लें.)

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Skanda Sashti Vrat 2024: स्कंद षष्ठी पर इस शुभ मुहूर्त में विधान से करें पूजा, घर में बनी रहेगी खुशहाली!

Skanda Sashti स्कंद षष्ठी, जिसे षष्ठी या कुमार षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान कार्तिकेय, भगवान शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र, का जन्मोत्सव है। यह त्योहार प्रति वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। स्कंद षष्ठी 2024 तिथियां और समय दिनांक तिथि प्रारंभ तिथि समाप्त हिन्दू मास जनवरी 16, 2024, मंगलवार 02:16 AM, जनवरी 16 11:57 PM, जनवरी 16 पौष फरवरी 14, 2024, बुधवार 12:09 AM, फरवरी 14 10:12 AM, फरवरी 15 माघ मार्च 15, 2024, शुक्रवार 11:25 PM, मार्च 14 10:09 PM, मार्च 15 फाल्गुन अप्रैल 13, 2024, शनिवार 12:04 AM अप्रैल 13 11:43 AM, अप्रैल 14 चैत्र मई 13, 2024, सोमवार 02:03 AM, मई 13 02:50 AM, मई 14 वैशाख जून 11, 2024, मंगलवार 05:27 PM, जून 11 07:16 PM, जून 12 ज्येष्ठ जुलाई 11, 2024, बृहस्पतिवार 10:03 AM, जुलाई 11 12:32 PM, जुलाई 12 आषाढ़ अगस्त 10, 2024, शनिवार 03:14 AM, अगस्त 10 05:44 AM, अगस्त 11 श्रावण सितम्बर 9, 2024, सोमवार 07:58 PM, सितम्बर 08 09:53 PM, सितम्बर 09 भाद्रपद अक्टूबर 8, 2024, मंगलवार 11:17 AM, अक्टूबर 08 12:14 PM, अक्टूबर 09 आश्विन नवम्बर 7, 2024, बृहस्पतिवार 12:41 AM, नवम्बर 07 12:34 AM, नवम्बर 08 कार्तिक दिसम्बर 6, 2024, शुक्रवार 12:07 PM, दिसम्बर 06 11:05 PM, दिसम्बर 07 मार्गशीर्ष Skanda Sashti Vrat स्कंद षष्ठी पर ऐसे करें पूजा इन बातों का रखें खास ध्यान Skanda Sashti Vrat महत्व:भगवान कार्तिकेय की पूजा: स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय की पूजा करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है।बुद्धि और ज्ञान: भगवान कार्तिकेय को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से ज्ञान और विद्या प्राप्ति में सहायता मिलती है।विजय: भगवान कार्तिकेय को देवसेनापति भी कहा जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से विजय प्राप्ति में सहायता मिलती है।कष्टों का नाश: स्कंद षष्ठी व्रत रखने और भगवान कार्तिकेय की पूजा करने से समस्त कष्टों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।यह भी जानें: स्कंद षष्ठी के दिन कुछ लोग 24 घंटे का निर्जला व्रत भी रखते हैं।स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। योगिनी एकादशी : ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति का व्रत  स्कंद षष्ठी के पीछे का इतिहास भगवान कार्तिकेयन को दक्षिण भारत में हिंदुओं द्वारा भगवान गणेश के छोटे भाई के रूप में माना जाता है, हालांकि उन्हें उत्तर भारत में हिंदुओं का बड़ा भाई माना जाता है। भगवान कार्तिकेय के जन्म और सुरपद्म की हत्या के आसपास एक पौराणिक कथा है। एक बार, तीन राक्षसों, सुरपदमन, सिम्हामुखन और तारकासुरन ने दुनिया भर में तबाही मचाई। सुरपदमन को भगवान शिव से वरदान मिला था कि शिव की क्षमताएं ही उन्हें नष्ट कर देंगी। इससे उसकी ताकत इतनी बढ़ गई कि वह और उसके भाई-बहन मानवता और देवों के लिए खतरा बन गए। जैसा कि देवता इन राक्षसों से खुद को मुक्त करना चाहते हैं, वे भगवान शिव के पास जाते हैं, जो केवल उस राक्षस को हरा सकते हैं। हालाँकि, मिशन उनके लिए और अधिक कठिन हो गया क्योंकि शिव एक गहरी एकाग्रता में लीन थे। परिणामस्वरूप, देवों ने शिव के कामुक जुनून को उत्तेजित करने और इस तरह उन्हें ध्यान से विचलित करने के लिए प्रेम के देवता, मनमाता को भेजा। ममता की एकाग्रता तब भंग हुई जब उन्होंने अपना पुष्पसारम (फूलों का बाण) भगवान शिव की ओर छोड़ा। इससे शासक भड़क गया और उसने मिनामाता को जलाकर राख कर दिया। बाद में, सभी देवों के कहने पर, शिव ने मनमाता को पुनर्जीवित किया और अपनी सभी दानव-हत्या क्षमताओं से संपन्न एक बच्चे को जन्म देने के लिए चुना। भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से छह चिंगारी निकाली, जिन्हें अग्नि के देवता सरवण नदी के ठंडे पानी में ले गए, जहां छह चिंगारी छह पवित्र बच्चों के रूप में प्रकट हुईं। कार्तिका बहनें (नक्षत्र कार्तिका या प्लीएड्स के छह सितारों में से) नाम की छह कन्याओं ने इन शिशुओं की देखभाल करने की सहमति दी। जब माता पार्वती ने आकर तालाब में पल रहे छह बच्चों को दुलार किया, तो वे छह मुख, बारह हाथ और दो पैरों वाले एक बच्चे में मिल गए। इस भव्य आकृति को कार्तिकेय नाम दिया गया था। माता पार्वती ने उनकी योग्यता, पराक्रम और तमिल में वेल नामक भाला प्रदान किया। जैसे-जैसे वह बड़े होते गए कार्तिकेयन एक दार्शनिक और योद्धा के रूप में विकसित हुए। वह ज्ञान और करुणा का अवतार बन गया और युद्ध की एक विशाल समझ रखता था। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने सुरपद्मन और उनके भाइयों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। भगवान ने सुरपदमन के भाइयों सिम्हामुखन और तारकासुरन की हत्या राक्षसों के शहर जाने के रास्ते में की थी। फिर भगवान और शैतान के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसके दौरान उन्होंने सुरपद्मन के वेल को काट दिया। सुरपद्मन की लाश से एक मोर और एक मुर्गा निकला, पूर्व सिद्धांत के वाहन (वाहन) के रूप में सेवा कर रहा था और बाद में उसके झंडे पर बुराई पर विजय के संकेत के रूप में था। कार्तिकेय ने Skanda Sashti Vrat षष्ठी को सुरपद्म को हराया। इसके अतिरिक्त, यह माना जाता है कि जब सुरपद्मन को गंभीर चोटें आईं, तो उसने भगवान से उसे बख्शने की भीख मांगी। इसलिए मुरुगा ने उसे इस शर्त पर मोर में बदल दिया कि वह सदा के लिए उसका वाहन बना रहेगा। स्कंद षष्ठी मंत्र: स्कंद षष्ठी व्रत में शक्तिशाली स्कंद षष्ठी मंत्र का जाप करें। निम्न शक्तिशाली स्कंद षष्ठी मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करें:- ॐ सरवणभावाय नमः थुथिपोर्कु वल्विनाइपोम थूनबम्पोम नेन्जिल पाथिपोर्कु सेल्वम पलिथुक कैथीथोंगम निश्चयियम कैकूडम निमलार अरुल कण्थर षष्ठी कवचम ठनै स्कंद षष्ठी: निष्कर्ष स्कंद षष्ठी तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में मनाया जाने वाला दस दिवसीय त्योहार है। इन दिनों, तिरुचेंदूर में भगवान सुब्रमण्य को समर्पित मंदिर में एक भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है, और त्योहार को पूरा करने के लिए, सूरा संहार, या भगवान स्कंद द्वारा राक्षसों के वध की घटना को आज भी दोहराया जाता है। इस दिन, भक्त इस भव्य आयोजन को देखने के लिए आते हैं और भगवान स्कंद का आशीर्वाद लेते हैं।

Skanda Sashti Vrat 2024: स्कंद षष्ठी पर इस शुभ मुहूर्त में विधान से करें पूजा, घर में बनी रहेगी खुशहाली! Read More »