विभीषण-हनुमत मिलन | हनुमान तथा माता सीता का संवाद | Vibhishan or Hanumat Milan in Hindi

अशोक वाटिका में सीता माता तथा हनुमान संवाद – रामायण हनुमान विभीषण संवाद श्री राम की आज्ञा का पालन करते हुए, हनुमान जी लंका पहुँचते हैं और अशोक वाटिका में सीता माता को ढूंढते हैं। वे माता सीता को अशोक वाटिका के एक गुप्त स्थान पर पाते हैं। सौ योजन की दुरी तय करने के बाद हनुमान जी लंका पहुंच जाते है। लंका पहुँचने  के बाद हनुमान की पहली भेंट लंका के द्वार पर पहरेदार एक राक्षसी से होती है जोकि स्वयं लंका नगरी होती है। लंका में घुसने के लिए हनुमान जी अति सूक्ष्म रूप धारण करते हैं लेकिन उसके बाद भी वह राक्षसी हनुमान को देख लेती है। वह हनुमान जी को लंका में प्रवेश करने से रोकती है लेकिन हनुमान जी विराट रूप धारण करके अपने मुक्के के प्रहार द्वारा उसके नाक को तोड़ देते हैं। हनुमान जी के प्रहार से वह अधमरी हो जाती  हैं और उनका रास्ता छोड़ देती है। हनुमान जी दोबारा सूक्षम रूप धरकर नगर के फाटक के निचे से लंका में प्रवेश कर जाते हैं और रात्रि के समय हवाई मार्ग से उड़ते हुए लंका के राज महल में सीता माता की खोज करने लगते हैं। लंकापति रावण के कक्ष में हनुमान जी सूक्ष्म रूप धारण कर के जाते हैं जहां पर रावण की पत्नी का रानी मंदोदरी सो रही थी उन्हें देखकर हनुमान जी सोचने लगते है कही ये तो सीता माता नही। लेकिन फिर वह सोचते है की हरण करके लाई गयी सीता माता इस प्रकार महल में नहीं सो सकती।  हनुमान-विभीषण Vibhishan संवाद | विभीषण-हनुमत मिलन  कुछ देर बाद हनुमान जी को एक भवन नजर आता है जिस पर भगवान विष्णु के  सुदर्शन चक्र का निशान बना हुआ था तथा शंख का निशान बना हुआ था। हनुमान जी को आश्चर्य हुआ कि असुरों की नगरी लंका में ऐसा कौन है जिसके घर पर भगवान विष्णु के चिन्ह दिखाई पड़ रहे है। आश्चर्यचकित होकर हनुमान जी निचे उतरते हैं। वह एक ब्राह्मण का वेश धारण करके  चौखट पर अलख जगाते हैं। तब घर के अंदर से विभीषण (Vibhishan ) जी बाहर निकलते हैं जोकि  लंकापति रावण के छोटे भाई थे। बातचीत के दौरान पता चलता है कि विभीषण भगवान विष्णु और श्री राम के परम भक्त है । असुरो की नगरी  लंका में राम भक्त का परिचय पाकर हनुमान जी बहुत प्रसन्न होते हैं और अपना वास्तविक परिचय बताकर विभीषण जी से सीता माता के बारे में पूछते हैं। तब विभीषण Vibhishan हनुमान को बताते हैं कि सीता माता राज महल में नहीं बल्कि लंकापति रावण की अति प्रिय बगिया अशोक वाटिका में है। बहुत से राक्षस पहरेदार उनकी निगरानी करते रहते हैं। सीता माता का पता  पाकर हनुमान जी निश्चय करते हैं कि वह रात्रि के समय सीता माता से भेंट करने के लिए जाएंगे।  अगले ही दिन हनुमान जी रात्रि के समय सूक्ष्म रूप धारण करके लंका की अशोक वाटिका में पहुंच जाते हैं और एक पेड़ के ऊपर छुप कर देखने लगते हैं। तभी उन्हें लंका के राजा के आने की उद्घोषणा सुनाई देती हैं। लंका का राजा रावण अशोक वाटिका में आता है और अशोक वाटिका के बीचो बीच  एक पेड़ के नीचे साधारण वस्त्रों में बैठी एक स्त्री नजर आती है जिसके पास जाकर लंका का राजा रावण विवाह का प्रस्ताव रखता है। रावण की बातों से हनुमान जी को यह ज्ञात हो जाता है कि वह स्त्री ही सीता माता है, जिससे रावण विवाह का प्रस्ताव स्वीकारने के लिए कह रहा है। हनुमान जी कुछ समय तक रावण के जाने की प्रतीक्षा करते हैं तथा रावण क जाने के बाद हनुमान जी पेड़ पर बैठे बैठे ही  श्री राम और सीता विवाह की कहानी कथा के रूप में गाने लगते हैं। लेकिन सीता जी को लगता है कि यह उनका कोई भ्रम है इसलिए वह इस पर अधिक ध्यान नहीं देती । तब हनुमान जी श्रीराम द्वारा निशानी के तौर पर दी गई मुद्रिका नीचे गिरा देते हैं जिसे देखकर सीता जी को यह आभास होता है कि वाकई में कोई श्रीराम का दूत उनका संदेशा लेकर आया है। क्योंकि यह वही मुद्रिका थी जो सीता जी ने स्वयं श्री राम को खेवट को देने के लिए दी थी।  सीता माता से पहली भेंट | हनुमान तथा माता सीता का संवाद   तब माता सीता पूछने लगते हैं कि कौन है जो उनके पति श्री राम का संदेश लेकर आया है कृपया करके मेरे सामने आइए। तब हनुमानजी पेड़ से कूदकर नीचे आते हैं तथा सीता माता को प्रणाम करके कहते हैं की हे माता, मैं प्रभु श्री राम का दूत हूं। अपने सामने एक छोटे आकर के वानर को देखकर सीता जी को यह लगता है कि यह रावण की कोई चाल है क्योंकि अगर श्रीराम का कोई दूत होता तो वह मनुष्य रूप में होता। हनुमान जी के वानर रुप में होने के कारण सीता माता को भ्रम हो रहा था। तब हनुमान  श्रीराम द्वारा दी गई मुद्रिका की बात उनको बताते है जोकि केवल श्रीराम और सीता जी को पता थी। हनुमान के इस कथन से सीता जी को हनुमान पर विश्वास हो जाता है की वह वास्तव में ही श्रीराम के कोई दूत है। फिर वह हनुमान से अपने पति श्री राम और लक्ष्मण के कुशलतापूर्वक होने के बारे में पूछती है और कहती है कि वे कब मुझे इस रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए आएंगे ,क्या वह मुझे भूल गए हैं। हनुमान जी  उन्हें धीरज बांधते हुए कहते हैं कि श्री राम को आपके ठिकाने का पता नहीं ना इसलिए अब तक इतना विलंब हुआ है। यदि श्रीराम को पता होता तो वह कब कि आपको यहां से मुक्त करा कर ले गए होते। तब हनुमान जी सीता माता को अपने साथ चलने के लिए कहते हैं लेकिन देवी सीता अपने पत्नी धर्म के पालन हेतु पर पुरुष के साथ स्वेच्छा से जाने के लिए मना कर देती है। तब वह हनुमान को अपनी चूड़ा मणि निशानी के तौर पर देती है और कहती है की श्रीराम ने मुझे यह विवाह के समय दी थी। हनुमान की जाने से पहले सीता जी से यह अनुरोध करते है

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सीता की खोज । हनुमान द्वारा समुंदर लांघना। Search of Sita in Hindi

रामायण के अनुसार, माता सीता ( Sita ) को रावण ने लंका ले जाकर कैद कर लिया था। श्री राम और लक्ष्मण अपनी पत्नी सीता की खोज में निकल पड़े। अपनी यात्रा के दौरान, श्री राम और लक्ष्मण कई बाधाओं का सामना करते हैं। उन्हें राक्षसों का सामना करना पड़ता है, जंगलों में भटकना पड़ता है और कई आश्चर्यजनक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। lakshman ka sugreev par krodh लक्ष्मण का सुग्रीव पर क्रोध  लगभग चार माह बीत जाने के बाद भी सुग्रीव श्री राम के पास नहीं आया और ना ही उसने अपने किसी दूत के द्वारा उनको कोई संदेश भेजा। सुग्रीव के इस रवैया से श्रीरम को लगने लगा कि शायद सुग्रीव अपने मित्रता के वचन को भूल गया है और वह अपना वचन मानने से चूक रहा है यही सोचकर श्री राम ने सुग्रीव को चेतावनी देने के लिए लक्ष्मण जी को भेजा कि वह किष्किंधा नगरी जाकर सुग्रीव को उनकी मित्रता के वचन की याद दिलाए और सीता माता की खोज में सहायता करने की जो उन्होंने शपथ ली थी उसे पूरा करें। श्रीराम के इन वचनों से लक्ष्मण जी आग बबूला होकर किष्किंधा नगरी के लिए प्रस्थान करते है। उनके किष्किंदा जाते ही सारी वानर सेना इधर-उधर डर कर भागने लगती हैं, नगरवासी अपने-अपने घरों में छुप जाते हैं। तब हनुमान तथा सुग्रीव के मित्रगण लक्ष्मण जी को युक्ति से शांत करवाते हैं और सुग्रीव के लिए क्रोध ना करने का अनुरोध करते हैं। लक्ष्मण जी द्वारा श्री राम का संदेश पाकर सुग्रीव को अपने भूल पर पछतावा होता है और वह श्री राम की सेवा में अपने वानर दल को एकत्रित करके चले जाते हैं। श्री राम के पास जाकर सुग्रीव अपने वचन पूर्ति में विलंब होने के लिए क्षमा मांगते हैं और कहते हैं कि हम आज से ही अपने वानर दल की सहायता से सीता Sita माता की खोज के इस अभियान का श्रीगणेश करेंगे। Search of Sita सीता की खोज अभियान की शुरुआत  ऋषि मुख पर्वत के शिखर पर एक सभा आयोजित की जाती है जहां पर वानरराज सुग्रीव द्वारा अपने वानर दलों को चारों दिशाओं में सीता माता की खोज के लिए संगठित करके भेजा जाता है। उन्हीं में से दक्षिण दिशा की तरफ वानर दल जाता है जिसमें युवराज अंगद, जामवंत, नल, नील, हनुमान तथा बहुत से वानर सैनिक होते हैं। वे दक्षिण दिशा की तरफ भारत देश के अंतिम छोर तक चले जाते हैं जहां पर आगे प्रशांत महासागर था। लेकिन अथाह समुंदर के अतिरिक्त उन्हें सीता माता की खोज के बारे में तनिक भी संकेत नहीं मिला था। इसलिए सभी निराश होकर वही समुद्र तट पर अपने स्वामी का कार्य पूरा न कर पाने के निराशा में आत्मदाह की इच्छा से वहीं पर बैठ जाते हैं। Jatau ka bhai जटायु का भाई संपाति  वानर दल को ऐसे निराश होते देख वही पत्थर की गुफा के पास बैठा संपाती नाम का गिद्ध जोर जोर से हंसने लगता है और कहता है कि आज मुझे खाने के लिए बहुत सारे वानर मिल गए हैं। गिद्ध संपाती को देखकर हनुमान गिद्ध जटायु के बलिदान और उसकी महिमा का बखान करने लगते हैं जिसे सुनकर संपाती गिद्ध को अपने छोटे भाई जटायु का स्मरण हो आता है। गिद्ध संपाती उनसे पूछता है कि तुम लोग कौन हो और जटायु को कैसे जानते हो जटायु तो मेरा छोटा भाई है।  तब हनुमानजी संपाती को  बताते है की रावण द्वारा सीता के हरण के समय सीता माता को रावण से बचाने के लिए युद्ध करते हुए महात्मा जटायु वीर गति को प्राप्त हो गए। श्री राम और लक्ष्मण ने एक  पिता के भांति उनका संस्कार किया था। अपने भाई जटायु की मृत्यु की खबर सुनकर संपाती शौक में डूब जाता है रोने लगता है। तब बाद में संपाती कहता है कि मैंने भी एक दिन एक राक्षस को विमान में एक रूपवती स्त्री को ले जाते हुए देखा था शायद वह रावण ही था अगर मुझे पता होता कि वह दुष्ट राक्षस मेरे भाई जटायु को मारकर जा रहा है तो मैं उस पापी का वही अंत कर देता।  गिद्ध संपाती सभी वानर दल को कहते हैं कि वह सीता माता को देख सकता है क्योंकि एक गिद्ध की दृष्टि अपार होती है। उन्होंने बताया कि सीता माता यहां समुंद्र पार एक द्वीप है जहां पर वह एक पेड़ के नीचे मायूस बैठी हुई है। इस तरह गिद्ध संपाती की वजह से हनुमान तथा अन्य मानव दल को सीता माता का पता चल जाता है कि वह समुद्र के उस पार लंका नामक द्वीप पर है। सीता माता का पता तो लग गया था लेकिन अब सबके सामने यही प्रश्न था कि 400 कोस का समुंदर पार करके लंका तक कैसे पहुंचा जाए और सीता माता की सुध ली जाए।  Hanuman ka lanka prasthan हनुमान का लंका प्रस्थान   बहुत देर तक विचार-विमर्श करने के बाद जामवंत जी हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण कराते हैं कि कैसे उन्होंने अपने बाल्यकाल में सूर्य तक को निगल लिया था। और वह स्वयं भगवान शिव के रूद्र अवतार हैं इसलिए केवल उन्हीं के पास वह शक्ति है जिसके द्वारा हनुमान सौ योजन का समुद्र लांघ कर सीता माता की सुध लेकर आ सकते हैं। तब युवराज अंगद, जामवंत, नल और नील तथा समस्त वानरर दल हनुमान जी की स्तुति करता है और उनको उनकी शक्तियों का स्मरण हो जाता है । जय श्री राम का नारा बोलते हुए हनुमान जी उड़कर लंका की तरफ चल देते हैं। लंका तक जाने के समुद्र मार्ग में हनुमान जी की भेंट मैनाद पर्वत, एक राक्षसी तथा नागमाता से होती है जिनसे हनुमान जी अपने शक्ति तथा बुद्धि के बल पर निजात पा लेते हैं और सौ योजन का समुंद्र लांघकर लंकापुरी तक सफलतापूर्वक पहुंच जाते हैं।

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सुग्रीव-बाली का युद्ध |श्रीराम के द्वारा बाली का वध | Sugreev Bali Fight, Death Of Bali in Hindi

Sugreev Bali Fight सुग्रीव-बाली का युद्ध रामायण के अनुसार, Sugreev सुग्रीव और बाली दो वानर राजा थे जो कि किष्किंधा के शासक थे। Sugreev Bali सुग्रीव बाली के छोटे भाई थे, लेकिन बाली ने अपने बल और पराक्रम के बल पर सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था। सुग्रीव को वन में भागना पड़ा और वह अपने मित्रों के साथ रह रहा था। एक दिन, सुग्रीव के पास श्री राम और लक्ष्मण आते हैं। श्री राम माता सीता की खोज में थे और उन्हें सुग्रीव के बारे में पता चला था। सुग्रीव श्री राम से मदद मांगता है और श्री राम उसे वादा करते हैं कि वे उसे उसका राज्य वापस दिलाएंगे। श्री राम और लक्ष्मण सुग्रीव के साथ किष्किंधा जाते हैं। सुग्रीव बाली को युद्ध के लिए ललकारता है। बाली सुग्रीव को युद्ध के लिए तैयार देखकर प्रसन्न होता है। दोनों भाई युद्ध के मैदान में उतरते हैं और एक-दूसरे पर प्रहार करने लगते हैं। बाली अत्यंत बलशाली था और सुग्रीव उससे हार जाता है। सुग्रीव भाग जाता है और बाली उसे पराजित मान लेता है। श्री राम जानते हैं कि बाली को सीधे तौर पर मारना संभव नहीं है, क्योंकि बाली को ब्रह्मा जी का वरदान प्राप्त था कि जो भी उसके सामने युद्ध करे, उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाएगी। इसलिए श्री राम बाली को छिपकर मारने की योजना बनाते हैं। श्री राम सुग्रीव को फिर से बाली से युद्ध करने के लिए कहते हैं। इस बार सुग्रीव के गले में एक माला डाली जाती है ताकि श्री राम उसे पहचान सकें। सुग्रीव और बाली फिर से युद्ध के मैदान में उतरते हैं। बाली सुग्रीव पर प्रहार करता है, लेकिन सुग्रीव बच जाता है। सुग्रीव भी बाली पर प्रहार करता है। इस बार श्री राम बाली के पीछे से निकलकर उस पर बाण चलाते हैं। बाली बाण लगने से घायल हो जाता है और गिर जाता है। बाली मरने से पहले श्री राम से पूछता है कि उन्होंने उसे छिपकर क्यों मारा। श्री राम बाली को उसकी गलतियों का एहसास कराते हैं और उसे बताते हैं कि उन्होंने उसके साथ न्याय किया है। बाली की मृत्यु के बाद सुग्रीव किष्किंधा का राजा बनता है। वह श्री राम और लक्ष्मण का आभार मानता है और उन्हें अपना मित्र बनाता है। युद्ध का परिणाम सुग्रीव-बाली का युद्ध रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप सुग्रीव को उसका राज्य वापस मिलता है और बाली का वध होता है। इस युद्ध से यह भी पता चलता है कि कर्म का नियम सदा ही लागू रहता है। बाली ने अपने भाई सुग्रीव के साथ अधर्म किया था और उसके लिए उसे मृत्यु का दंड मिला। युद्ध का महत्व सुग्रीव-बाली का युद्ध कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह युद्ध न्याय, कर्म और अधर्म के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक है। यह युद्ध हमें यह भी सिखाता है कि यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं और अधर्म का विरोध करते हैं, तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं। श्रीराम के द्वारा बाली का वध  कुछ ही समय बाद सुग्रीव बाली के दरबार पर जाकर उसे फिर से ललकारने लगता है। सुग्रीव की ललकार सुनकर वाली आग बबूला होकर निकलता है और बोलता है आज तुझे मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता। दोनों में फिर से युद्ध शुरू हो जाता है। जैसा कि विदित है कि बाली बलाबल में सुग्रीव से कहीं अधिक था इसलिए वह फिर सुग्रीव पर भारी पड़ने लगता है। जब बाली अपने गधा के प्रहार से सुग्रीव का अंत करने ही वाला था कि श्री राम अपना बाण बाली  पर चला देते हैं। बाण लगते हैं बाली वहीं पर गिर जाता है और चिल्लाने लगता है कि मेरे साथ छल  हुआ है। कौन है वह कायर जिसने छुपकर यह पाप किया है मेरे सामने आए। तब श्री राम लक्ष्मण वाली के सामने जाते हैं जिन्हें देखकर बाली उनसे शिकायत करता है कि तुमने छुपकर मुझ पर बाण चलाया हैं तुमने मेरे साथ अन्याय किया है। तब बाली को समझाते हुए श्री राम कहते हैं कि तुमने अपने छोटे भाई को अपने राज्य से निकालकर और उसकी पत्नी को अपने अधीन करके  सबसे बड़ा महा पाप किया है क्योंकि छोटे भाई की पत्नी पुत्री के समान होती है और आज तुम हमें धर्माधर्म का पाठ पढ़ा रहे हो। सुग्रीव मेरा मित्र है और अपने मित्र की रक्षा के लिए यदि मुझे पाप कर्म करके नरक भी भोगना पड़े तो मैं इसके लिए तैयार हूं। बहुत समय तक समझाने के बाद बाली को श्रीराम की महिमा समझ में आ जाती है और वह अपने पुत्र अंगद को श्रीराम की सेवा में समर्पित करके प्राण त्याग देता है। 

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राम हनुमत मिलन । राम सुग्रीव की मित्रता | Ram Sugreev mitrata Story In Hindi

Ram Hanuman ka Milan राम हनुमत मिलन रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें राम और हनुमान का मिलन होता है। यह मिलन राम की सीता की खोज में एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। Hanuman or Ram ka Milan हनुमान का राम से मिलन राम Ram और लक्ष्मण सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे थे। वहां, उन्होंने एक गुफा में एक व्यक्ति को देखा। वह व्यक्ति हनुमान था। हनुमान ने राम और लक्ष्मण को देखा और उन्हें पहचान लिया। हनुमान ने राम और लक्ष्मण को प्रणाम किया और कहा, “हे राम! मैं आपका बहुत बड़ा भक्त हूं। मैंने आपकी बहुत कठिन तपस्या की है। मैं आपको देखने के लिए बहुत उत्सुक था।” राम ने हनुमान को देखा और कहा, “हे हनुमान! तुम एक महान भक्त हो। तुमने मेरी बहुत कठिन तपस्या की है। तुम हमारे लिए बहुत ही भाग्यशाली हो।” Ram राम और हनुमान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक-दूसरे से बहुत सारी बातें कीं। हनुमान ने राम को सीता के बारे में बताया। उसने उन्हें बताया कि सीता लंका में रावण के पास है। Ram Hanuman Milan mahatv राम हनुमत मिलन का महत्व राम हनुमत मिलन एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और हनुमान के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम हनुमत मिलन में, हनुमान ने राम की मदद करने का संकल्प लिया। उन्होंने राम को सीता को लंका से बचाने में मदद की। हनुमान की मदद से राम ने सीता को लंका से मुक्त कराया। राम हनुमत मिलन का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन में हनुमान की तरह दूसरों की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए। राम हनुमत मिलन की प्रमुख बातें राम हनुमत मिलन एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और हनुमान के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। राम हनुमत मिलन हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम हनुमत मिलन का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। Ram Sugreev mitrata राम सुग्रीव की मित्रता रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें राम और सुग्रीव की मित्रता होती है। यह मित्रता राम की सीता की खोज में एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। Ram Sugreev mitrata सुग्रीव की राम से मित्रता राम और लक्ष्मण सीता की खोज में किष्किन्धा पहुंचे थे। वहां, उन्होंने एक वानरराज सुग्रीव से मुलाकात की। सुग्रीव ने राम और लक्ष्मण को बताया कि उसका भाई बाली ने उसका राज्य छीन लिया है और उसकी पत्नी रुमा को भी ले गया है। राम ने सुग्रीव की मदद करने का संकल्प लिया। उन्होंने बाली से युद्ध करके उसे पराजित किया और सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलाया। राम और सुग्रीव की मित्रता एक सच्ची मित्रता थी। दोनों ने एक-दूसरे की मदद की और एक-दूसरे के दुख-सुख में साथ रहे। Ram Sugreev mitrata ka mahatv राम सुग्रीव मित्रता का महत्व राम सुग्रीव मित्रता एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और सुग्रीव के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन में राम और सुग्रीव की तरह दूसरों की मदद करने का संकल्प लेना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता की प्रमुख बातें राम सुग्रीव मित्रता एक महत्वपूर्ण प्रसंग है जो राम और सुग्रीव के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। राम सुग्रीव मित्रता हमें यह भी सिखाता है कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए। राम सुग्रीव मित्रता का हमारे जीवन में भी बहुत महत्व है।

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राम जटायु संवाद तथा शबरी के बेर | Shabri Ramayan In Hindi

सीता की खोज तथा राम जटायु संवाद  सीता की खोज Sita सीता का हरण होते ही, राम और लक्ष्मण बहुत दुखी हुए। उन्होंने सीता को खोजने का संकल्प लिया। वे वन में सीता की खोज करने लगे। एक दिन, वे एक घने जंगल में पहुंचे। वहां, उन्होंने एक घायल पक्षी देखा। पक्षी का नाम जटायु था। जटायु ने राम और लक्ष्मण को बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम और लक्ष्मण जटायु से सीता के बारे में और पूछने लगे। जटायु ने उन्हें बताया कि रावण ने सीता को लंका ले गया है। वह सीता को लंका के अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा है। राम और लक्ष्मण को जटायु की बातों से बहुत दुख हुआ। उन्होंने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में आगे बढ़ गए। वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां, उन्होंने शबरी नाम की एक भीलनी से मुलाकात की। शबरी ने उन्हें सीता के बारे में कुछ और जानकारी दी। शबरी ने उन्हें बताया कि सीता ने उसे एक बार देखा था। सीता ने उसे बताया था कि वह रावण द्वारा लंका ले जाई जा रही है। राम और लक्ष्मण को शबरी की बातों से भी कुछ और जानकारी मिली। वे सीता की खोज में आगे बढ़ते रहे। राम जटायु संवाद Sita सीता की खोज में राम और लक्ष्मण जब जटायु से मिले, तो उन्होंने उससे सीता के बारे में पूछा। जटायु ने उन्हें बताया कि उसने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। राम ने जटायु से कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता का हरण करते हुए रावण को देखा? तुमने उसे लंका ले जाते हुए देखा?” जटायु ने कहा, “हां, मैंने रावण को सीता का हरण करते हुए देखा था। मैंने उसे लंका ले जाते हुए भी देखा था।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को कैसे बचाया?” Jatau जटायु ने कहा, “मैंने रावण से सीता को छोड़ने के लिए कहा, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी। उसने मेरे पंख काट दिए और मुझे घायल कर दिया।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने हमारे लिए बहुत बड़ा उपकार किया है। तुमने सीता को बचाने की कोशिश की। हम तुम्हें कभी नहीं भूलेंगे।” जटायु ने कहा, “मैंने सीता को बचाने की कोशिश की, लेकिन मैं असफल रहा। मैं सीता को नहीं बचा सका।” राम ने कहा, “हे पक्षिराज! तुमने सीता को बचाने की कोशिश की, यह ही सबसे बड़ी बात है। तुमने सीता की रक्षा के लिए अपना प्राण तक दे दिया। हम तुम्हारी वीरता को कभी नहीं भूलेंगे।” राम और लक्ष्मण ने जटायु को धन्यवाद दिया और उसे मरने से बचा लिया। जटायु मरते-मरते भी राम और लक्ष्मण को सीता की खोज में सफल होने का आशीर्वाद दे गया। राम तथा गन्धर्व संवाद Shree ram श्रीराम एक पुत्र की तरह जटायु का अंतिम संस्कार करते है तथा सीता की खोज में दक्षिण की तरफ चल देते है। बहुत समय तक वन में भटकते हुए उनपर एक लंबी भुजाओं वाला राक्षस आक्रमण करता है। लक्ष्मण अपनी तलवार से उस राक्षस की दोनो भुजाए काट देते है । तब वह राक्षस श्रीराम को बताता है कि वह एक गंधर्व है और ऋषि के शाप के कारण ऐसा बन गया है यदि कृपया करके आप मेरे पूरे शरीर का अंतिम संस्कार करेंगे तो मैं श्राप से मुक्त हो जाऊंगा। तब मैं आपकी पत्नी सीता तक पहुंचने में आपकी सहायता करूंगा। तब श्रीराम लक्षमण से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए कहते है और उस विशाल राक्षस का पुरे शरीर के  साथ अंतिम संस्कार करते है।  अंतिम संस्कार करने के बाद वह राक्षस एक रूपवान गंधर्व बन जाता है और श्रीराम को बताता है कि आपकी पत्नी को लंका का राजा रावण हरण करके ले गया है। मैं अपने दिव्य ज्ञान से यह देख सकता हु की आपकी मित्रता वानर राज सुग्रीव से होगी जिसकी सहायता से आप अपने कार्य में सफल होंगे तथा रावण पर विजय प्राप्त करेंगे । सुग्रीव से मिलने के लिए आप पहले माता शबरी से मिलेंगे जोकि परम तपस्विनी है और महर्षि मतंग मुनि की शिष्या है।  वह आपकी भक्ति कर रही है। इसलिए आप अभी पंपासरोवर के पास स्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाइए जहां पर आपको माता शबरी मिलेंगी। राम-लक्षमण की माता शबरी से भेंट  उसके बाद श्री राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर की तरफ चल देते हैं जहां पर उन्हें एक वृद्ध भीलनी मिलती है जोकि रास्ते पर फूल बिछा रही होती है। वह वृद्ध भीलनी परम तपस्विनी माता शबरी थी जोकी अपने भगवान श्री राम के आने के लिए कुटिया के रास्ते पर हर दिन फूल बिछाती थी ताकि जब श्री राम आए तो उनके पैर में कोई कांटा ना लगे। जब श्री राम और लक्ष्मण की कुटिया में पहुंचते हैं तो उनका परिचय पाकर माता शबरी खुशी से रोने लगती हैं तथा श्री राम और लक्ष्मण का स्वागत करती है वह उन्हें बताती हैं कि उनके गुरु श्री मतंग मुनि जी अब नहीं रहे लेकिन उन्होंने ही मुझे बताया था कि भविष्य में श्रीराम अपनी पत्नी सीता को खोजते हुए हमारे आश्रम में आएंगे और तुम उन्हें सुग्रीव तक जाने का मार्ग बता देना जिनकी सहायता से वह रावण पर विजय प्राप्त करके अपनी पत्नी सीता को पा सकेंगे।  (Shabri )शबरी के बेर  Mata माता शबरी Shabri श्री राम और लक्ष्मण को भोजन के रूप में अपने द्वारा लाए गए बेर देती है। शबरी श्रीराम के लिए आश्रम के वृक्षों से प्रतिदिन बेर चख चख कर अपनी टोकरी में रखती ताकि श्रीराम के लिए केवल मीठे बेर ला सके। शबरी द्वारा चख कर  इकट्ठे किए हुए  बेर भी श्री राम बड़े आदर भाव से खाते हैं क्योंकि वह जानते थे कि वह बेर झूठे होते हुए भी स्नेह और भक्ति भाव से परिपूर्ण है। शबरी मतंग मुनि के बाद केवल इसीलए रही की वह श्री राम के दर्शन करना चाहती थी। अतः श्री राम से मिलन के मिलने के पश्चात शबरी उनको बताती है कि पंपा सरोवर के दक्षिण तट की तरफ ऋषि मुख पर्वत है जिसके शिखर पर  वानर राज सुग्रीव अपने चार मंत्रियों के साथ वास करते हैं और

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सीता हरण और रावण जटायु का युद्ध | Sita haran Story in Hindi

Sita haran सीता हरण रामायण महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। इसमें रावण, लंका का राजा, सीता, राम की पत्नी का हरण करता है। रावण की योजना रावण, सीता की सुंदरता से मोहित हो गया था। वह उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता था। उसने अपनी बहन शूर्पणखा को सीता को लुभाने के लिए भेजा। शूर्पणखा ने सीता को प्रपोज किया, लेकिन सीता Sita ने उसे अपमानित कर दिया। शूर्पणखा ने रावण को यह बात बताई, तो रावण ने सीता का हरण करने की योजना बनाई। स्वर्ण मृग (हिरन) तब लंकापति रावण मारीच को कहते हैं कि तुम एक अद्भुत स्वर्ण मृग (हिरण) का रूप धारण करो जिसके सींग सोने के हों तथा जिसकी चमड़ी सुनहरे रंग की हो। ऐसे अद्भुत हिरण को देखकर सीता अवश्य ही उसकी मांग करेगी और राम लक्ष्मण को उसका शिकार करने के लिए बोलेगी। जब राम लक्ष्मण उस सुनहरे मृग (हिरण) के पीछे पीछे जाएंगे तब मैं सीता का हरण कर लूंगा। रावण की बात मानकर मारीच एक अद्भुत सुनहरे हिरण का रूप धारण करके श्री राम लक्ष्मण की कुटिया की तरफ जाकर विचरण करने लगता है। सीता जी की नजर जब उस हिरण पर पड़ती है तो वह उस स्वर्ण मृग के सुंदर रूप को देखकर मोहित हो जाती है । कुटिया में आकर वह श्री राम लक्ष्मण को उस स्वर्ण मृग के बारे में बताती हैं और इच्छा जाहिर करती हैं कि वह मृग उन्हे चाहिए। सीता Sita के इच्छा का मान रखते हुए श्री राम लक्ष्मण को वहीं छोड़कर हिरन रूपी मारीच के पीछे धनुष बाण लेकर चल पड़ते हैं। श्री राम को अपनी ओर आता देख कर योजना के अनुसार मृग के वेश में मारीच कुटिया से दूर भाग जाता है जिसके पीछे श्रीराम भी चले जाते हैं। कुछ समय तक स्वर्ण मृग के पीछे भागते हुए श्रीरम उस पर बाण चला देते हैं।  बाण लगते ही मारीच श्रीराम के जैसे स्वर में चिल्लाने लगता है हे सीते हे लक्ष्मण, हे सीते हे लक्ष्मण। श्री राम जैस स्वर में अपना और लक्ष्मण का नाम सुनकर सीता जी को यही लगता है कि श्रीराम पर कोई संकट आ गया है और वह मदद के लिए लक्ष्मण तथा उन्हें पुकार रहे हैं। इसलिए सीता जी लक्ष्मण को तुरंत अपने भैया की सहायता के लिए जाने को कहती लेकिन लक्ष्मण उनकी बात मानने से मना कर देते हैं। क्योंकि लक्ष्मण जी को पता था की श्रीराम का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता यह किसी असुर की चाल हो सकती है। लेकिन अपने पति के  ऐसे स्वर  सुनने के बाद सीता जी को शांति नहीं हो रही थी और वह लक्ष्मण को बार-बार जाने के लिए कहती है। जब लक्ष्मण  नहीं मानते तो वह उन्हें अपशब्द कहने लगती हैं।  लक्ष्मण रेखा  अंत में लक्ष्मण जी के पास कोई और रास्ता नहीं होता इसलिए वह सीता जी की सुरक्षा के लिए कुटिया के दहलीज के पास एक रेखा खींच देते है और बोलते हैं कि जो भी इस रेखा को पार करने की कोशिश करेगा वह जलकर भस्म हो जाएगा। अंत में लक्ष्मण जाते-जाते माता सीता से कहते हैं कि आप कितनी भी विकट परिस्थिति में इस रेखा को पार नहीं करेंगी। और कोई भी असुर, देव या जीव इस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर पाएगा। कहकर लक्ष्मण कुटिया से चले जाते है।  लक्ष्मी जी के जाते ही कुटिया के आस पास झाड़ियों में छुपा हुआ रावण बाहर निकलता है और कुटिया के अंदर जाने की कोशिश करता है। लेकिन जैसे ही रावण लक्ष्मण द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा पर पैर रखता है तो उसके पैर जल जाते हैं। बार-बार प्रयत्न करने के बाद भी जब रावण कुटिया में प्रवेश नहीं कर पाया तो उसने दूसरी योजना सोची। तब रावण एक साधु का वेश धारण करके कुटिया के बाहर अलख जगाता है। कुटिया के बाहर आए किसी साधु की आवाज सुनकर माता सीता कुटिया से बाहर आती है तो देखती हैं एक साधु उनके दरवाजे पर भिक्षा मांग रहा है। भिक्षा लेकर सीता कुटिया से बाहर आती  हैं और लक्ष्मण रेखा के पास आकर खड़ी हो जाती और रावण (साधु) को बोलती है कि वह आकर  भिक्षा ले ले। क्योंकि वह इस रेखा से बाहर नहीं आ सकती। इस पर साधु के भेष में रावण बोलता है कि तु शायद हमें नहीं जानती हैं, हम परम तपस्वी साधु हैं यदि तुम बाहर भिक्षा लेकर नहीं आई तो मैं तुम्हारे पति को श्राप दे दूंगा।  Sita haran सीता हरण एक दिन, रावण ने अपने मामा मारीच को सोने का हिरण बनकर सीता को लुभाने के लिए भेजा। सीता को हिरण बहुत सुंदर लगा और वह उसे पकड़ने के लिए राम से कहती है। राम हिरण को पकड़ने के लिए जाते हैं और मारीच को मार देते हैं। मरते समय, मारीच राम की आवाज में सीता और लक्ष्मण को पुकारता है। सीता को लगता है कि यह राम की आवाज है और वह लक्ष्मण से कहती है कि वह राम की मदद करे। लक्ष्मण कुटिया के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींच देते हैं और सीता को उस रेखा को पार करने से मना करते हैं। लक्ष्मण की बात मानकर सीता कुटिया में ही रहती है। तभी रावण साधु का वेश धारण करके आता है और सीता से भिक्षा मांगता है। सीता रावण को भिक्षा देती है। भिक्षा लेने के बाद, रावण सीता से कुटिया से बाहर आने के लिए कहता है। सीता रावण की बात मानकर कुटिया से बाहर आती है। रावण उसी समय सीता का हरण कर लेता है। रावण और जटायु का युद्ध  जब रावण सीता को पुष्पक विमान में ले जा रहा था तब सीता की मदद की गुहार वहां पर बैठे जटायु नाम के गिद्ध ने सुनी और वह सीता की सहायता करने के लिए रावण से युद्ध करने लगता है। बहुत समय तक रावण से लड़ते हुए रावण अपनी चंद्रहास खड़ग (तलवार) से जटायु का एक पंख काट देता है जिससे वह लुढ़कता  हुआ जमीन पर आकर गिरता है और दर्द से कराहने लगता है।  जब कुछ भी ना हो पाया तो सीता जी अपने पल्लू का एक टुकड़ा फाड़ कर अपने सारे जेवर उसमें बांधकर नीचे ऋषिमुख पर्वत पर फेंक देती

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Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत में रात को ही क्यों की जाती है भोलेनाथ की पूजा? जानिए वजह

( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत को रखने से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति, रोगों से मुक्ति, और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत की मान्यताओं के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। इसलिए इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। इसके अलावा, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव का विवाह चतुर्दशी तिथि को हुआ था। इसलिए इस दिन का विशेष महत्व है। मासिक शिवरात्रि व्रत रखने वाले भक्तों को इस दिन निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए: Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत रखने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं: मासिक शिवरात्रि व्रत हर महीने किया जा सकता है। यह व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है। मासिक शिवरात्रि का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मासिक शिवरात्रि का व्रत असंभव को भी संभव कर सकता है और इस व्रत को रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस व्रत में रात्रि के समय में पूजा करने के बाद रात को जागरण करते हुए भोलेनाथ की अराधना करनी चाहिए. यदि कुंवारे लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत व पूजन करते हैं तो जल्द ही उन्हें अच्छा जीवनसाथी मिलता है. रात को क्यों होती है भोलेनाथ की पूजा पौराणिक कथाओं के अनुसार चतुर्दशी तिथि की रात्रि में भगवान शिव का विवाह हुआ था, इसलिए भोलेनाथ को रात्रि प्रिय है. यही वजह है कि मासिक शिवरात्रि के दिन अगर रात्रि के समय भगवान शिव का पूजन किया जाए तो वह प्रसन्न होते हैं. इसके अलावा शिव को संहार का देवता भी कहा गया है और रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है. इसलिए मासिक शिवरात्रि की रात को विधि-विधान के साथ भगवान शिव का पूजन करने से जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है. मासिक शिवरात्रि का व्रत करने पर जातक रात्रि के चार प्रहर में भगवान शिव का पूजन करता है. बता दें ​कि प्रत्येक प्रहर 3 घंटे का होता है. एक प्रहर में भोलेनाथ का दूध से अभिषेक किया जाता है, फिर दही और फिर शहद से ​अभिषेक होता है.

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Ekadashi:क्यों मनाते है एकादशी व्रत, आइये जानते है

हमारा देश आस्था श्रद्धा और विश्वास का प्रतिक माना जाता है। देश में हमारी आस्था ही है जो हमें मस्जिद और मंदिर जाने पर देवी देवता और भगवान के होने का एहसास दिलाता है ! हमारी आस्था के कारन ही आज सम्पूर्ण समाज पीपल के पेड़ में ब्रह्म देवता और नीम में देवी तथा बबूल के पेड़ में प्रेत नजर आता हैं। इसी आस्था श्रद्धा विश्वास के चलते ही रिश्तों का निर्धारण और अनुपालन होता है। एकादशी व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जैसे: एकादशी Ekadashi व्रत को दो भागों में बांटा जा सकता है: एकादशी Ekadashi व्रत की तिथि का निर्धारण चंद्र दर्शन के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। एकादशी व्रत रखने की विधि इस प्रकार है: एकादशी Ekadashi व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत के पीछे कई पौराणिक कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार एक राजा के पास एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। मंत्री ने राजा से कहा कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। राजा ने मंत्री की बात मानकर एकादशी व्रत रखा। व्रत रखने से राजा के सभी पाप धुल गए और वह सुखी और समृद्ध हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार एक ऋषि ने एकादशी व्रत रखा। ऋषि के व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने ऋषि को वरदान दिया। वरदान के अनुसार, ऋषि को मोक्ष की प्राप्ति हुई। इन पौराणिक कथाओं से स्पष्ट है कि एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति कराता है। एकादशी व्रत रखने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं: एकादशी Ekadashi व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए लाभकारी है। यह व्रत व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

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Masik Shivratri 2023: इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि, जानें तिथि और पूजा विधि

मासिक शिवरात्रि हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन पड़ रही है मासिक शिवरात्रि Masik Shivratri 2023 Masik Shivratri 2023 मासिक शिवरात्रि 11 दिसबंर के दिन शनिवार को सुबह 7 बजकर 10 मिनट से शुरू होगी। साथ ही इस तिथि की समाप्ति 12 दिसंबर, रविवार सुबह 6 बजकर 24 मिनट पर होगी। ऐसे में इस बार मासिक शिवरात्रि की उपासना 11 दिसंबर को की जाएगी। पूजा विधि मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह उठकर सबसे पहले स्नानादि से निवृत हो जाएं। इसके बाद महादेव की पूजा करें। ऐसा कहा जाता है औघड़दानी को बेलपत्र, भांग, धतूरा अति प्रिय है। व्रती को सुबह स्नान करके साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर मंदिर में जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाओं को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान शिव को दूध, दही, घी, शहद, फल, फूल, धूप, दीप आदि अर्पित करें। भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। भगवान शिव की आरती करें। अंत में प्रसाद वितरित करें। इसलिए इन चीजों को अपनी पूजा में जरूर शामिल करें। इसके साथ व्रत कथा का पाठ करें या सुनें। अंत में कपूर की आरती से पूजा का समापन करें। मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। शिव स्तुति आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ निर्विकार ओमकार अविनाशी, तुम्ही देवाधि देव, जगत सर्जक प्रलय करता, शिवम सत्यम सुंदरा ॥ निरंकार स्वरूप कालेश्वर, महा योगीश्वरा, दयानिधि दानिश्वर जय, जटाधार अभयंकरा ॥ शूल पानी त्रिशूल धारी, औगड़ी बाघम्बरी, जय महेश त्रिलोचनाय, विश्वनाथ विशम्भरा ॥ नाथ नागेश्वर हरो हर, पाप साप अभिशाप तम, महादेव महान भोले, सदा शिव शिव संकरा ॥ जगत पति अनुरकती भक्ति, सदैव तेरे चरण हो, क्षमा हो अपराध सब, जय जयति जगदीश्वरा ॥ जनम जीवन जगत का, संताप ताप मिटे सभी, ओम नमः शिवाय मन, जपता रहे पञ्चाक्षरा ॥ आशुतोष शशाँक शेखर, चन्द्र मौली चिदंबरा, कोटि कोटि प्रणाम शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा ॥ कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. कोटि नमन दिगम्बरा.. मासिक शिवरात्रि के व्रत का नियम मासिक शिवरात्रि के व्रत में व्रती को दिन में कुछ भी नहीं खाना चाहिए। केवल रात में एक बार भोजन करना चाहिए। व्रती को इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। मासिक शिवरात्रि के व्रत के लाभ मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं: सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का महत्व और लाभ देखते हुए सभी लोगों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।

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Pradosh Vrat 2023: दिसंबर का पहला प्रदोष व्रत कब, नोट करें सही डेट और प्रदोष काल का समय

Pradosh Vrat 2023:प्रदोष व्रत करने से भक्तों के सभी पापों का नाश होता है और उन्हें सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।दिसंबर माह में दो रवि प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है, रवि प्रदोष व्रत आरोग्य, सौभाग्य और सफलता प्रदान करता है. जानें दिसंबर के रवि प्रदोष व्रत की डेट, मुहूर्त December Pradosh Vrat 2023 रवि प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय की जाती है। पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर, मंदिर में जाकर शिवलिंग की पूजा करें। पूजा में बेलपत्र, धतूरा, चंदन, पुष्प आदि अर्पित करें। शिव चालीसा और शिव मंत्रों का जाप करें। अंत में, आरती करें और प्रसाद वितरित करें। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत सबसे अधिक फलदायी माना गया है. वार अनुसार प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्व है. इस साल 2023 में दिसंबर का पहला प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ रहा है, जो लंबी आयु की प्राप्ति के लिए बेहद शुभ फलदायी माना जाता है. दिसंबर का पहला रवि प्रदोष व्रत 2023 (First Ravi Pradosh Vrat 2023) दिसंबर माह का पहला रवि प्रदोष व्रत 10 दिसंबर 2023, रविवार के दिन रखा जाएगा. इस व्रत में शिव जी की पूजा प्रदोष काल में करनी चाहिए. पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 10 दिसंबर 2023 को सुबह 07 बजकर 13 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 11 दिसंबर 2023 को सुबह 07 बजकर 10 मिनट पर इसका समापन होगा. पूजा का मुहूर्त – शाम 05.24 – रात 08.08 रवि प्रदोष व्रत का महत्व प्रदोष व्रत की महत्वता सप्ताह के दिनों के अनुसार अलग-अलग होती है. रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत और पूजा से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है. जो लोग आए दिन बीमारी का शिकार होते हैं उन्हें रवि प्रदोष व्रत जरुर करना चाहिए. प्रदोष काल यानी सूर्य अस्त होने से 45 मिनट पहले और सूर्य अस्त होने के 45 मिनट बाद तक का समय. इस दौरान शिव साधना करने से मनोकामना जल्द पूर्ण होती है.

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Sapna:सपने में खुद को चोट लगते देखना कैसा होता है

सपने में खुद को चोट ( chot ) लगते हुए देखना एक अशुभ सपना sapna माना जाता है। इस सपने के कई अर्थ हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर यह आने वाले समय में कठिनाइयों और समस्याओं का संकेत देता है। Sapna:सपने में खुद का चेहरा आईने में देखने का क्या मतलब होता है ? हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सपनों का कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। सपनों का अर्थ व्यक्तिगत अनुभवों और विश्वासों के आधार पर भिन्न हो सकता है। इसलिए, यदि आप सपने में खुद को चोट लगते हुए देखते हैं, तो घबराएं नहीं। बस अपने आसपास की सावधानी बरतें और आने वाले समय में कठिनाइयों और समस्याओं के लिए तैयार रहें।

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सूर्पनखा की नाक कटना तथा खर-दूषण का वध (रामायण)। Khar Dushan Vadh Story in Hindi (Ramayan)

Ramayan रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है खर-दूषण का वध। यह घटना राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास के दौरान हुई थी। घटना का कारण रावण की बहन शूर्पणखा ने राम और लक्ष्मण को देखकर उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। राम ने उसे नकार दिया। इससे शूर्पणखा बहुत क्रोधित हो गई। उसने राम और लक्ष्मण को धमकी दी कि वह उन्हें मार डालेगी। शूर्पणखा की धमकी से डरकर खर और दूषण, जो शूर्पणखा के भाई थे, राम और लक्ष्मण से बदला लेने के लिए पंचवटी आए। सूर्पनखा की नाक कटना | खर-दूषण का वध (रामायण) अपने वनवास के अंतिम वर्षों में श्री राम, लक्ष्मण और सीता दंडक वन में गोदावरी नदी के किनारे पर पंचवटी स्थान पर अपने रहने के लिए कुटिया बनाते हैं। और वहीं पर अपने वनवास का बाकी समय बिताते है। एक बार जब श्रीराम अपने आंगन में बैठे ध्यान कर रहे थे तब सूर्पनखा नामक राक्षसी वहां पर आ जाती है। सुपनखा वास्तव में लंकापति रावण की बहन थी। सूर्पनखा ध्यान में बैठे श्री राम के सुंदर स्वरूप को देखकर उन पर मोहित हो जाती हैं । वह एक सुंदर रूपवती नारी का रूप धारण करके श्री राम के पास पहुंचकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। तब श्री राम बड़े ही विनम्र भाव से उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं और कहते हैं कि वह अपनी पत्नी सीता को आजीवन एक विवाह में रहने का वचन दे चुके हैं। उस समय लक्ष्मण जी वन से लकड़ियां एकत्रित करने के लिए गए हुए थे और वह भी आ जाते हैं जिन्हें देखकर शूर्पणखा एक बार उन पर भी मोहित हो जाती है। शूर्पणखा ने अपने साथ विवाह का वही प्रस्ताव लक्ष्मण जी के समक्ष भी रखा। तब लक्ष्मण जी उनको बोलते हैं कि उनके बड़े भाई श्री राम के होते हुए वह उन के योग्य नहीं हैं।   सूर्पनखा की नाक कटना जब श्री राम और लक्ष्मण दोनों सूर्पनखा के विवाह प्रस्ताव को इंकार कर देते हैं तो सूर्पनखा को क्रोध आ जाता है। और तभी देवी सीता भी कुटिया के अंदर से बाहर निकल कर आती हैं। सीता को देखकर सूर्पनखा श्रीराम को कहती है कि तुम इस औरत के कारण ही मुझे नकार रहे हो, इसलिए मैं तुम्हारी पत्नी को ही खा जाती हूं। यह कह कर क्रोध में सुपनखा माता सीता की तरफ बढ़ती है तभी श्री राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं और लक्ष्मण जी अपनी तलवार निकालकर सूर्पनखा की नाक पर वार करते है। लक्ष्मण जी के तलवार के वार से सुपनखा की नाक कट जाती है और वह रोते हुए वहां से चली जाती है। खर दूषण का दरबार अपने कटी हुई नाक को लेकर सुपनखा अपने भाई और दंडक वन के उस समय के असुर राजा खर के पास पहुंचती है। अपने भाई खर और दूषण के पास पहुंचकर सूर्पनखा न्याय की दुहाई देते हुए रोने लगती है। अपनी बहन को रोता हुआ देखकर राजा कर पूछते हैं कि उसकी यह दशा किसने की है। तब सूर्पनखा रोते हुए खर को बताती है कि श्री राम और लक्ष्मण नाम के दो युवक गोदावरी नदी के किनारे अपनी कुटिया बनाकर वहां पर रहने आए हैं, उन्होंने मुझे अकेली पाकर मेरा अपमान करने की कोशिश की। इसलिए आप वहां जाकर उन दोनों से मेरे अपमान का बदला लीजिए। उनके साथ एक सुंदर नारी भी है जोकि राम की पत्नी है। Shree ram श्रीराम का वनवास । राम वन गमन । अपने बहन के अपमान का बदला लेने के लिए खर और दूषण अपने 14 राक्षसों को एक साथ भेज देते हैं और कहते हैं कि जाओ और पंचवटी में बनी हुई कुटिया का तिनका तिनका बिखेर डालो और उजाड़ दो। असुर खर के  14 सैनिक एक साथ पंचवटी की तरफ जाते हैं वहां श्रीराम पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे। क्योंकि उन्हें अंदाजा था कि सूर्पनखा अपने अपमान का बदला लेने के लिए अवश्य किसी ना किसी को भेजेगी। चौदह असुर एक कतार में उनके सामने आकर बोले कि दंडक वन के राजा खर ने का आदेश दिया है कि तुम दोनों भाई हमारे राजा की शरण में खुद को समर्पित कर दो तथा तुम्हारे साथ जो सुंदर औरत है उसे हमारे राजा की सेवा में उपस्थित करो। उनके यह बातें सुनकर श्रीराम ने अपने धनुष पर एक बाण साधकर उनकी तरफ छोड़ा और एक ही बाण से उन सभी असुरों का सर धड़ से अलग हो गया जिसे देखकर सूर्पनखा चौक गई और फिर अपने भाई खर दूषण के दरबार में आ पहुंची और बोली। Ramayan खर और दूषण का वध रक्षा कीजिए भैया रक्षा कीजिए आपके भेजे हुए 14 असुरों को उस राम ने अपने की बाण से मार डाला। यह सुनकर खर दूषण समझ जाते हैं कि श्री राम लक्ष्मण कोई साधारण मानव नहीं है और वह अपनी सेना लेकर खुद ही श्री राम लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए चल पड़ते हैं। पंचवटी पहुंचने के बाद खर दूषण श्री राम लक्ष्मण को ललकार ते हैं। कुछ समय तक युद्ध होने के पश्चात ऋषि अगस्त प्रकट होते हैं और श्री राम को बोलते हैं कि खर दूषण परम मायावी राक्षस है इसलिए आप अपने दिव्यास्त्रों में से मन मोहिनी अस्त्र का उपयोग कीजिए। तब श्रीराम मनमोहनी अस्त्र खर दूषण की ओर चला देते है जिसके प्रभाव से खर दूषण की सेना मोहित होकर आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाती है। और आखिर में श्रीराम अपने दिव्यास्त्र के द्वारा दंडक वन के राजा खर का वध कर देते है।

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