Saphala Ekadashi 2024: सफला एकादशी व्रत 7 जनवरी को, श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए करें इन मंत्रों का जाप

सफला एकादशी Saphala Ekadashi हिंदू धर्म में एक प्रमुख व्रत है। यह व्रत पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा की जाती है। हर माह एकादशी व्रत को पूरी आस्था और विश्वास के रखा जाता है। एकादशी व्रत के दौरान भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। हिंदू पंचांग के मुताबिक, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी कहा जाता है और साल 2024 की पहली एकादशी 7 जनवरी को है। इस दिन यदि पूरी आस्था के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तो भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। Saphala Ekadashi सफला एकादशी पर पूजा का मुहूर्त एकादशी सफला 7 जनवरी को मनाई जाएगी। पंचांग के मुताबिक, पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 7 जनवरी को 12:41 AM पर होगा और इस तिथि का समापन 08 जनवरी सोमवार को 12:46 AM पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार व्रत भी 7 जनवरी को ही रखा जाएगा। 7 जनवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 07:15 बजे से रात 10:03 बजे तक है और इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ होगा। व्रत के पारण का समय 8 जनवरी को सुबह 07:15 बजे से सुबह 09:20 बजे के बीच रहेगा। Mokshada Ekadashi :क्यों करते हैं मोक्षदा एकादशी व्रत? जानिए व्रत कथा और इसका महत्व Saphala Ekadashi 2024 सफला एकादशी पर भोग में लगाएं ये चीजें सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की मूर्ति को पीले वस्त्र अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा पूजा के दौरान हल्दी, चंदन, दीप, धूप अर्पित करना चाहिए। प्रसाद में तुलसी की पत्तियां जरूर चढ़ाना चाहिए। भगवान विष्णु को खीर, फल और मिठाई का भोग लगाना चाहिए। इन मंत्रों का करें जाप त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।। Saphala Ekadashi 2024:सफला एकादशी का महत्व धार्मिक मत है कि सफला एकादशी का व्रत करने से कार्यों में सफलता (Saphala Ekadashi) मिलती है और इंसान को जीवन के दुखों से छुटकारा मिलता है। एकादशी व्रत करने से मृत्यु के बाद मोक्ष और जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।इसके अलावा साधक की मनचाही मनोकामना पूरी होती है। सफला व्रत की कथा पढ़ने या सुनने से पूजा सफल होती है। Saphala Ekadashi 2024:सफला एकादशी की पूजा विधि सफला एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी, बेलपत्र, फल, फूल, मिठाई आदि अर्पित करना चाहिए। पूजा के बाद भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। इस दिन व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। शाम के समय भगवान विष्णु की आरती करने के बाद पारण करना चाहिए। Saphala Ekadashi सफला एकादशी का व्रत करने के लाभ सफला एकादशी का व्रत करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: Saphala Ekadashi सफला एकादशी की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय में महिष्मान नाम का एक राजा था। उसके चार पुत्र थे। उनमें से लुम्पक नाम का पुत्र बहुत ही दुष्ट था। वह भगवान, ब्राह्मण और वैष्णवों की निंदा किया करता था। एक दिन राजा महिष्मान ने लुम्पक को समझाने का प्रयास किया, लेकिन लुम्पक नहीं माना। एक दिन राजा महिष्मान ने युधिष्ठिर से लुम्पक के उद्धार का उपाय पूछा। युधिष्ठिर ने कहा कि लुम्पक को सफला एकादशी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और वह भगवान का भक्त बन जाएगा। राजा महिष्मान ने लुम्पक को सफला एकादशी Saphala Ekadashi का व्रत करने के लिए कहा। लुम्पक ने व्रत करने की सहमति दे दी। व्रत के दिन लुम्पक ने विधिवत पूजा की और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने लुम्पक की प्रार्थना सुनी और उसे पापमुक्त कर दिया। लुम्पक भगवान का भक्त बन गया और उसने अपना जीवन धर्म-कर्म में व्यतीत किया।

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Sapne Me Bandar Dekhna: क्या आपको भी सपने में बार-बार दिखाई देते हैं बंदर ?

Sapne me Bandar Dekhna:अक्सर बुद्धि, चालाकी और अनुकरणशीलता के साथ जुड़े होते हैं। इसलिए, सपने Sapne में बार-बार बंदर देखना यह संकेत दे सकता है कि आपको अपने अवचेतन मन से एक संदेश मिल रहा है। यह संदेश कुछ ऐसा हो सकता है जैसे कि आपको अपने आसपास की दुनिया के बारे में अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, या आपको अपने विचारों और कार्यों पर अधिक सावधानी से विचार करने की आवश्यकता है। हिंदू धर्म में किसी भी सपने को देखने के पीछे एक कारण माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार ये सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के होने का संकेत देते हैं. आपके सपने में अक्सर बंदर दिखाई देते हैं तो जान लें कि सपने में बंदर का दिखना शुभ है या अशुभ. सपने देखना महज संयोग नहीं होता है. सपने हमें भविष्य के अच्छे बुरे संकेतों के बारे में बताते हैं. सपने हमें कई बार ऐसी चीज दिखाते हैं जो हमें भयभीत कर देते हैं. सपने (Sapne) में नजर आने वाली हर चीज़ का कोई न कोई मतलब जरूर होता है. इससे हम भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में सतर्क हो जाते हैं. Sapne बंदर को गुस्से में देखना सपने में बंदर को गुस्से में देखना अशुभ माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार इसका मतलब होता है कि आपका किसी से झगड़ा हो सकता है और आपके मान में कमी आ सकती है और जीवन की परेशानियों का ये कारण भी बन सकता है. Sapne Me Khud Ko Dekhna:सपने में खुद को देखना देता है बड़ा संके Sapne बंदर को खाते हुए देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में बंदर को कुछ खाते हुए देखना एक अशुभ सपना माना जाता है. यह सपना इस बात का संकेत करता है कि आपको भारी नुकसान होने वाला है और आने वाले समय में आपके परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही संकेत देता है कि आने वाले दिनों में हानि हो सकती है. Sapne सपने में बंदर को खुश या मस्ती करते हुए देखना स्वप्न शास्त्र में बंदर को खुश देखने में देखना एक शुभ सपना होता है. इस सपने का अर्थ है कि आपकी जिसके साथ लड़ाई हुई थी, उससे आपकी दोबारा मित्रता हो जाएगी और आपका पुराना दोस्त आपको मिलने वाला है. साथ ही साथ यह सपना इस लिहाज़ से भी अच्छा होता है कि आपके मान सम्मान में वृद्धि होने वाली है. Sapne बंदर का झुंड में देखना स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने Sapne में बंदर को झुंड में देखना एक शुभ सपना माना जाता है. यह सपने देखने का मतलब होता है कि आपका परिवार आपके साथ है और आपको धन लाभ होने वाला है. साथ ही आने वाले समय में आपके परिवार का साथ बना रहेगा और आने वाला समय खुशहाल रहेगा.

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Ayodhya:अयोध्‍या में राम मंदिर बनने और अंतिम बार तोड़े जाने तक का इतिहास

प्राचीन भारतीय महाकाव्य, रामायण के अनुसार, भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। हिंदू धर्म में राम Ram एक प्रमुख देवता हैं और अयोध्या उनके जन्मस्थान के रूप में पवित्र स्थान है। इतिहासकारों के अनुसार कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अवध को कालांतर में अयोध्या और बौद्धकाल में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या (Ayodhya) मूल रूप से मंदिरों का शहर था। हालांकि यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़े मंदिरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। बौद्ध मत के अनुसार यहां भगवान बुद्ध ने कुछ माह विहार किया था। प्राचीन मंदिर Ayodhya अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कब हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालांकि, माना जाता है कि यह मंदिर कम से कम 12वीं शताब्दी में मौजूद था। इस मंदिर का उल्लेख 11वीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ में भी मिलता है। अयोध्या को भगवान श्रीराम Shree ram के पूर्वज विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु ने बसाया था, तभी से इस नगरी पर सूर्यवंशी राजाओं का राज महाभारतकाल तक रहा। यहीं पर प्रभु श्रीराम का दशरथ के महल में जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में जन्मभूमि की शोभा एवं महत्ता की तुलना दूसरे इन्द्रलोक से की है। धन-धान्य व रत्नों से भरी हुई अयोध्या नगरी की अतुलनीय छटा एवं गगनचुंबी इमारतों के अयोध्या नगरी में होने का वर्णन भी वाल्मीकि रामायण में मिलता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम के जल समाधि लेने के पश्चात अयोध्या Ayodhya कुछ काल के लिए उजाड़-सी हो गई थी, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर बना महल वैसे का वैसा ही था। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व आखिरी राजा, महाराजा बृहद्बल तक अपने चरम पर रहा। कौशलराज बृहद्बल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों हुई थी। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी हो गई, मगर श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व फिर भी बना रहा। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अयोध्या में राम मंदिर Ram mandir का निर्माण करवाया था। इस मंदिर का निर्माण का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें कालिदास की रघुवंशम्, बाणभट्ट की हर्षचरितम् और दंडी की दशकुमारचरितम् शामिल हैं। कालिदास की रघुवंशम् में उल्लेख मिलता है कि विक्रमादित्य ने अयोध्या (Ayodhya )में राम जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर में 84 स्तंभ थे और इसकी ऊंचाई 100 फीट थी। मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित थी। विक्रमादित्य के बाद के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर की देख-रेख की। उन्हीं में से एक शुंग वंश के प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग ने भी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। पुष्यमित्र का एक शिलालेख अयोध्या से प्राप्त हुआ था जिसमें उसे सेनापति कहा गया है तथा उसके द्वारा दो अश्वमेध यज्ञों के किए जाने का वर्णन है। अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय और तत्पश्चात काफी समय तक अयोध्या गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी। गुप्तकालीन महाकवि कालिदास ने अयोध्या का रघुवंश में कई बार उल्लेख किया है। इतिहासकारों के अनुसार 600 ईसा पूर्व अयोध्या में एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र था। इस स्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान 5वीं शताब्दी में ईसा पूर्व के दौरान तब मिली जबकि यह एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुआ। तब इसका नाम साकेत था। कहते हैं कि चीनी भिक्षु फा-हियान ने यहां देखा कि कई बौद्ध मठों का रिकॉर्ड रखा गया है। यहां पर 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री हेनत्सांग आया था। उसके अनुसार यहां 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3,000 भिक्षु रहते थे और यहां हिन्दुओं का एक प्रमुख और भव्य मंदिर भी था, जहां रोज हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते थे। बाबर द्वारा Ayodhya मंदिर का विध्वंस इसके बाद ईसा की 11वीं शताब्दी में कन्नौज नरेश जयचंद आया तो उसने मंदिर पर सम्राट विक्रमादित्य के प्रशस्ति शिलालेख को उखाड़कर अपना नाम लिखवा दिया। पानीपत के युद्ध के बाद जयचंद का भी अंत हो गया। इसके बाद भारतवर्ष पर आक्रांताओं का आक्रमण और बढ़ गया। आक्रमणकारियों ने काशी, मथुरा के साथ ही अयोध्या में भी लूटपाट की और पुजारियों की हत्या कर मूर्तियां तोड़ने का क्रम जारी रखा। लेकिन 14वीं सदी तक वे अयोध्या में राम मंदिर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए। विभिन्न आक्रमणों के बाद भी सभी झंझावातों को झेलते हुए श्रीराम की जन्मभूमि पर बना भव्य मंदिर 14वीं शताब्दी तक बचा रहा। कहते हैं कि सिकंदर लोदी के शासनकाल के दौरान यहां मंदिर मौजूद था। 14वीं शताब्दी में हिन्दुस्तान पर मुगलों का अधिकार हो गया और उसके बाद ही राम जन्मभूमि एवं अयोध्या को नष्ट करने के लिए कई अभियान चलाए गए। अंतत: 1527-28 में इस भव्य मंदिर को तोड़ दिया गया और उसकी जगह बाबरी ढांचा खड़ा किया गया। कहते हैं कि मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के एक सेनापति ने बिहार अभियान के समय अयोध्या में श्रीराम के जन्मस्थान पर स्थित प्राचीन और भव्य मंदिर को तोड़कर एक मस्जिद बनवाई थी, जो 1992 तक विद्यमान रही। विक्रमादित्य द्वारा निर्मित Ayodhya राम मंदिर की विशेषताएं बाबरनामा के अनुसार 1528 में अयोध्या Ayodhya पड़ाव के दौरान बाबर ने मस्जिद निर्माण का आदेश दिया था। अयोध्या में बनाई गई मस्जिद में खुदे दो संदेशों से इसका संकेत भी मिलता है। इसमें एक खासतौर से उल्लेखनीय है। इसका सार है, ‘जन्नत तक जिसके न्याय के चर्चे हैं, ऐसे महान शासक बाबर के आदेश पर दयालु मीर बकी ने फरिश्तों की इस जगह को मुकम्मल रूप दिया।’ हालांकि यह भी कहा जाता है कि अकबर और जहांगीर के शासनकाल में हिन्दुओं को यह भूमि एक चबूतरे के रूप से सौंप दी गई थी लेकिन क्रूर शासक औरंगजेब ने अपने पूर्वज बाबर के सपने को पूरा करते हुए यहां भव्य मस्जिद का निर्माण कर उसका नाम बाबरी मस्जिद रख दिया था।

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Kalashtami Kalabhairav Jayanti:कालाष्टमी कालभैरव 2024 जयंती, कथा, महत्व, पूजा विधि

कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली एक हिंदू त्यौहार है। इस दिन भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव की पूजा की जाती है। भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक अवतार माना जाता है। वे भगवान शिव के गण और भक्त भी हैं। कालाष्टमी के दिन भैरव देव का जन्म हुआ था, इसलिए इसे भैरव जयंती अथवा काल भैरव अष्टमी भी कहा जाता हैं . भैरव देव भगवान शिव का रूप माना जाता हैं . यह उनका एक प्रचंड रूप है . यह भैरव अष्टमी, भैरव जयंती, काला- भैरव अष्टमी, महाकाल भैरव अष्टमी और काल – भैरव जयंती के नाम से जाना जाता है. यह भैरव के भगवान के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं . भैरव रूप भगवान शिव का एक डरावना और प्रकोप व्यक्त करने वाला रूप हैं . काल का मतलब होता है समय एवं भैरव शिव जी का रूप का नाम है. कालाष्टमी काल भैरव जयंती 2024 (Kalashtami Kalabhairav Jayanti) हर माह की कृष्ण पक्ष की सभी अष्टमी को काल भैरव को समर्पित कर कालाष्टमी कहा जाता है. हर महीने की कालाष्टमी से ज्यादा महत्व कार्तिक माह की कालाष्टमी को दिया जाता है. कार्तिक के ढलते चाँद के पखवाड़े में आठवें चंद्र दिन पर पड़ता है, अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन कालाष्टमी पर्व मनाया जाता है. काल भैरव जयंती 2024 में कब है (Kalabhairav Jayanti 2024)  यह दिन पापियों को दंड देने वाला दिन माना जाता है, इसलिए भैरव को दंडपानी भी कहा जाता हैं. मान्यतानुसार काले कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता है, क्यूंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी है, इसलिए इनमे स्वस्वा भी कहा जाता है मान्यतानुसार काले कुत्ते को भैरव बाबा का प्रतीक समझा जाता है, क्योंकि कुत्ता भैरव देव की सवारी है, इसलिए इनमें स्वस्वा भी कहा जाता है। यह रूप देवताओं और इंसानों में जो भी पापी रहता है, उसे दंड देता है। उनके हाथों में जो डंडा होता है, उससे वो दण्डित करते हैं। Kalashtami 2024: कालाष्टमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना जीवन में मिलेंगे बुरे परिणाम कालाष्टमी की 2024 में तिथि (Kalashtami 2024 Dates) दिनांक महिना दिन   04 जनवरी गुरुवार कालाष्टमी 02 फरवरी शुक्रवार कालाष्टमी 03 मार्च रविवार कालाष्टमी 01 अप्रैल सोमवार कालाष्टमी 01 मई बुधवार कालाष्टमी 30 मई गुरुवार कालाष्टमी 28 जून शुक्रवार कालाष्टमी 27 जुलाई शनिवार कालाष्टमी 26 अगस्त सोमवार कालाष्टमी 24 सितम्बर मंगलवार कालाष्टमी 24 अक्टूबर गुरुवार कालाष्टमी 22 नवम्बर शुक्रवार कालभैरव जयन्ती 22 दिसम्बर रविवार कालाष्टमी काल भैरव जयंती कथा महत्व (Kalabhairav Jayanti Katha Mahatva) एक बार त्रिदेव, ब्रह्मा विष्णु एवम महेश तीनो में कौन श्रेष्ठ इस बात पर लड़ाई चल रही थी. इस बात पर बहस बढ़ती ही चली गई, जिसके बाद सभी देवी देवताओं को बुलाकर एक बैठक की गई. यहाँ सबसे यही पुछा गया कि कौन ज्यादा श्रेष्ठ है. सभी ने विचार विमर्श कर इस बात का उत्तर खोजा, जिस बात का समर्थन शिव एवं विष्णु ने तो किया लेकिन  तब ही ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को अपशब्द कह दिये जिसके कारण भगवान शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा. शिव जी ने उस क्रोध से अपने रूप भैरव का जन्म किया. इस भैरव का अवतार का वाहन काला कुत्ता था, जिसके एक हाथ में छड़ी थी. इस अवतार को महाकालेश्वर के नाम से भी बुलाया जाता है. इसलिए इनको ‘डंडाधिपति’ कहा गया. शिव जी के इस रूप को देख सभी देवी देवता घबरा गए.  भैरव ने क्रोध में ब्रह्मा जी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया तब ही से ब्रह्मा के पास चार मुख हैं . इस प्रकार ब्रह्मा जी के सर को काटने के कारण भैरव जी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया . ब्रह्मा जी ने भैरव बाबा से माफ़ी मांगी, तब शिव जी अपने असली रूप में आ जाते है. भैरव बाबा को उनके पाप के कारण दंड मिला इसलिए भैरव को कई समय तक एक भिखारी की तरह रहना पड़ा. इस प्रकार वर्षो बाद वाराणसी में इनका दंड समाप्त होता हैं . इसका एक नाम दंडपानी पड़ा इस प्रकार भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता हैं . काल भैरव जयंती पूजा कैसे की जाती हैं (Kalabhairav Jayanti puja vidhi) इस प्रकार यह पूजा संपन्न की जाती हैं. कहते है काल भैरव को पूजने वाली को वो परम वरदान देते है, उसके मन की हर इच्छा पूरी करते है.  जीवन में किसी तरह की परेशानी, डर, बीमारी, दर्द को कल भैरव दूर करते है. कश्मीर की पहाड़ी पर वैष्णव देवी का मंदिर हैं जिसके पास भैरव का मंदिर हैं. ऐसी मान्यता हैं कि जब तक भैरव नाथ के दर्शन नहीं किये जाते तब तक वैष्णव देवी के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता. मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी काल भैरव का एक मंदिर है, जहाँ प्रसाद के तौर पर देशी शराब चढ़ाई जाती है. यहाँ यह मान्यता है कि शराब काल भैरव  का प्रसाद है, जो वो आज भी वहां पीते है. मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकानों में ये आसानी से मिल जाती है.

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Kalashtami : कालाष्टमी के दिन भूलकर भी न करें ये काम, वरना जीवन में मिलेंगे बुरे परिणाम

कालाष्टमी हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मत है कि भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस बारकालाष्टमी 4 जनवरी को है। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं सनातन धर्म में कालाष्टमी का विशेष महत्व है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी होती है। Kalashtami 2024 कालाष्टमी भगवान काल भैरव को समर्पित है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मत है कि भगवान काल भैरव की विधिपूर्वक पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस बार साल 2024 की पहली कालाष्टमी 4 जनवरी को है। कालाष्टमी के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही है, जिनको करने से साधक का जीवन परेशानियों से भरा रहता है और भगवान काल भैरव रुष्ट हो सकतें हैं। चलिए जानते हैं कालाष्टमी के दिन कौन से कार्यों को करने बचना चाहिए। Kalashtami 2024 कालाष्टमी के दिन न करें ये कार्य कालाष्टमी Kalashtami 2024: के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही है, जिनको करने से साधक का जीवन परेशानियों से भरा रहता है और भगवान काल भैरव रुष्ट हो सकते हैं। आइए जानते हैं कालाष्टमी के दिन कौन से कार्यों को करने बचना चाहिए। Kalashtami 2024 कालाष्टमी का महत्व कालाष्टमी हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान काल भैरव की पूजा-व्रत करने से साधक को जीवन के दुख और संकट से छुटकारा मिलता है और सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में कालाष्टमी Kalashtami 2024 पर्व का खास महत्व है। तंत्र विद्या सीखने वाले साधक बेहद धूमधाम से कालाष्टमी मनाते हैं। इस दिन भगवान काल भैरव की विधिपूर्वक पूजा-व्रत करने से इंसान के जीवन में खुशियों का आगमन होता है और सुख-शांति मिलती है और भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं। कालाष्टमी के अवसर पर उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर समेत कई मंदिरों में भगवान काल भैरव की पूजा की जाती है और भजन-कीर्तन किया जाता है। भगवान काल भैरव मंत्र ॐ ब्रह्म काल भैरवाय फट ॐ तीखदन्त महाकाय कल्पान्तदोहनम्। भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुर्माहिसि ॐ ह्रीं बं बटुकाय मम आपत्ति उद्धारणाय। कुरु कुरु बटुकाय बं ह्रीं ॐ फट स्वाहा

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Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं

भगवान विष्णु के अवतार श्री राम का नाम कौन नहीं जानता है। रामायण महाकाव्य के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि भगवान श्री राम में वैदिक सनातन धर्म की आत्मा कहे जाने वाले सभी गुण विद्यमान है।  Shree Ram भगवान श्री राम का जीवन परिचय त्रेतायुग में जन्में भगवान श्री राम (Shree Ram )अयोध्या के सूर्यवंशी महाराज दशरथ और कौसल्या के पुत्र थे। उनका जन्म राम नवमी के दिन हुआ था। भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। उनके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आईं, लेकिन उन्होंने सभी कठिनाइयों का सामना कर अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान राम का विवाह मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला, शत्रुध्न की पत्नी श्रुतकीर्ति और भरत की पत्नी मांडवी थी। विवाह के पश्चात् भगवान राम को राजा दशरथ ने रानी कैकयी के कहने पर 14 वर्ष के लिए वनवास पर भेज दिया था क्योंकि एक वचन के अनुसार कैकेयी राजा दशरथ से कुछ भी मांग सकती थी तो रानी कैकेयी ने दासी मंदोदरी के उकसाने पर भरत को अयोध्या का राजा बनाने और राम को वनवास देने की इच्छा जताई और पिता की आज्ञा का पालन करके भगवान राम सीता और लक्ष्मण के साथ वन की ओर चले गए। Shree Ram भगवान श्री राम का महत्त्व भगवान श्री राम का महत्त्व भारतीय संस्कृति में अत्यधिक है। वे भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं और हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “मर्यादाओं के सर्वोच्च व्यक्ति”। भगवान श्री राम Shree Ram का जीवन एक आदर्श जीवन है। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा सत्य, न्याय और कर्तव्य का पालन किया। वे एक आदर्श पति, पुत्र, भाई और राजा थे। उनके जीवन से हमें अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं, जो हमारे जीवन को बेहतर बनाने में मददगार होती हैं। भगवान श्री राम के बारे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा अनेक कथाएं लिखी गई हैं। वाल्मीकि के अलावा प्रसिद्ध महाकवि तुलसीदास ने भी श्री राम के महत्व को लोगों को समझाया है। भगवान राम ने कई ऐसे महान कार्य किए हैं जिसने हिन्दू धर्म को एक गौरवमयी इतिहास प्रदान किया है। भगवान विष्णु ने राम बनकर असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। भगवान श्री राम ने मातृ−पितृ भक्ति के चलते अपने पिता राजा दशरथ के एक आदेश पर 14 वर्ष तक वनवास काटा। नैतिकता, वीरता, कर्तव्यपरायणता के जो उदाहरण भगवान राम ने प्रस्तुत किए वह बाद में मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक बन गए। Shree Ram एक कुशल और प्रजा हितकारी राजा थे राम भगवान श्री राम Shree Ram को एक कुशल और प्रजा हितकारी राजा माना जाता है। उनके शासनकाल में अयोध्या में सुख, शांति और समृद्धि कायम रही। भगवान श्री राम के शासनकाल में अयोध्या एक आदर्श राज्य था। वहां सभी लोग सुखी और समृद्ध थे। सभी लोग भगवान श्री राम के शासन से प्रसन्न थे। आदिवासियों के भगवान श्री राम Shree Ram वनवास के दौरान भगवान श्री राम Shree Ram ने देश के सभी आदिवासियों और दलितों को संगठित करने का कार्य किया और उनको जीवन जीने की शिक्षा दी। उन्होंने देश के सभी संतों और उनके आश्रमों को राक्षसों, दैत्यों के आतंक से बचाया था। अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम ने भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। चित्रकूट में रहकर भी उन्होंने धर्म और कर्म की शिक्षा दीक्षा ली। भगवान राम ने भारत भर में भ्रमण कर भारतीय आदिवासी, जनजाति, पहाड़ी और समुद्री लोगों के बीच सत्य, प्रेम, मर्यादा और सेवा का संदेश फैलाया और यही कारण था कि राम का जब रावण से युद्ध हुआ तो सभी तरह की अनार्य जातियों ने राम का साथ दिया। Shree Ram भगवान राम की वापसी भगवान राम की वापसी एक ऐतिहासिक घटना है, जो हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखती है। भगवान राम, भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने सभी कठिनाइयों का सामना कर अपने कर्तव्यों का पालन किया। भगवान राम की वापसी की कथा रामायण महाकाव्य में वर्णित है। रामायण के अनुसार, भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद लंका के राजा रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। रावण के वध के बाद भगवान राम अयोध्या लौटे। भगवान श्री राम कहते है कि पृथ्वी लोक एक ऐसा लोक है जहां जो भी आता है उसे एक दिन वापस लौटना ही होता है। ठीक इसी तरह श्री राम भी अपना मानवीय रूप त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप विष्णु का रूप धारण कर बैकुंठ धाम की ओर चले गए। Shree Ram भगवान राम के बारे में सुने-अनसुने 10 किस्से 1. वनवास के समय भगवान राम 27 साल के थे।2. लव और कुश राम तथा सीता के दो जुड़वां बेटे थे।3. राम-रावण युद्ध के समय इंद्र देवता ने भगवान श्री राम के लिए दिव्य रथ भेजा था।4. भगवान श्री राम ने पृथ्वी पर 10 हजार से भी अधिक वर्षों तक राज किया।5. भगवान राम का जन्म चैत्र नवमी में हुआ था जिसको भारतवर्ष में रामनवमी के रूप में मनाया जाता है।6. भगवान राम ने रावण को मारने के बाद रावण के ही छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया था।7. गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दिया था और इस श्राप से भगवान राम ने ही उन्हें मुक्ति दिलाई थी।8. अरण्य नाम के एक राजा ने रावण को श्राप दिया था कि मेरे वंश से उत्पन्न युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा और भगवान राम इन्ही के वंश में जन्मे थे।9. माता सीता को रावण की कैद से आजाद कराने के लिए रास्ते में पड़े समुद्र को पार करने के लिए भगवान राम ने एकादशी का व्रत किया था।10. वनवास वापसी के बाद भगवान राम के अयोध्या वापसी की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए थे तब से दिवाली का त्योहार मनाया जाता है।

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Dream:सपने में इन 5 चीजों का दिखाई देना माना जाता है बेहद शुभ, जानिए हर एक का मतलब

सपने मनुष्य के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे हमारे विचारों, भावनाओं और अनुभवों को प्रतिबिंबित कर सकते हैं। सपने हमें हमारी क्षमताओं और सीमाओं के बारे में भी सिखा सकते हैं। सपने कई तरह के हो सकते हैं। वे सुखद हो सकते हैं, दुखद हो सकते हैं, अजीब हो सकते हैं, या यहां तक ​​कि डरावने भी हो सकते हैं। सपने हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं Swapna Shastra हम सभी सपने देखते हैं. रात में सोने के बाद व्यक्ति को तरह-तरह के सपने दिखाई देते हैं जिसमे से कुछ सपने शुभ और अशुभ सपने माने जाते हैं. इन सपनों Swapna का व्यक्ति के जीवन में गहरा प्रभाव पड़ता है. स्वप्न शास्त्र में सपनों के बारे में विस्तार से बताया गया है. सपने में दिखाई देने वाली चीजों का असल जिंदगी में दूसरा मतलब होता है. सपनों से व्यक्ति के जीवन में घटने वाली घटना के बारे में तरह-तरह के संकेत मिलते हैं.सपनों में कुछ सपने बेहद ही डरावने किस्म के होते हैं तो कुछ सपने व्यक्ति को अच्छे लगते हैं. आज हम आपको स्वप्न शास्त्र में बताए गए ऐसे शुभ सपने के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके दिखाई देने का मतलब आपके जीवन में कोई शुभ घटना होने वाली है. मृत्यु का सपना देखना मृत्यु के सपने के कई अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि मृत्यु के सपने भविष्य के बारे में भविष्यवाणियां करते हैं। दूसरों का मानना ​​है कि मृत्यु के सपने केवल हमारे अवचेतन मन की उपज हैं।मृत्यु का सपना डरावने सपने में एक है. लेकिन स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में किसी की मृत्यु को देखना शुभ माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के मुताबिक जिन लोगों के सपने में मृत्यु दिखाई देती है इसका मतलब होता है कि ऐसे लोगों को जल्द ही धन प्राप्ति होने वाला है. आने वाले दिनों में इनकी आर्थिक स्थितियों में सुधार आने वाला है. Dream सपने में फल और फूल वाले पेड़ देखना सपने में फल और फूल वाले पेड़ देखना एक शुभ सपना माना जाता है। यह सपना अक्सर खुशी, समृद्धि, और सफलता का प्रतीक होता है। Sapne Me Khud Ko Dekhna:सपने में खुद को देखना देता है बड़ा संके फल और फूल वाले पेड़ प्राकृतिक जीवन और प्रजनन का प्रतीक हैं। वे अक्सर नई शुरुआत और विकास का संकेत देते हैं। यदि आप सपने में फल और फूल वाले पेड़ देखते हैं, तो यह एक संकेत हो सकता है कि आपके जीवन में कुछ अच्छे बदलाव होने वाले हैं। यह सपना आपको सफलता, खुशी, और समृद्धि के लिए तैयार रहने का संकेत दे सकता है।ऐसे सपनों का दिखाई देने का मतलब व्यक्ति की हर एक इच्छा जल्द ही पूरी होने वाली है. व्यक्ति के पास अच्छा खासा धन एकत्रित हो सकता है. पहाड़ चढ़ने का सपना देखना सपने में पहाड़ चढ़ना एक शुभ सपना माना जाता है। यह सपना अक्सर सफलता, उन्नति, और नए अवसरों का प्रतीक होता है। पहाड़ चढ़ना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यह भी एक पुरस्कृत कार्य है। पहाड़ की चोटी पर पहुंचना एक बड़ी उपलब्धि है। यदि आप सपने में पहाड़ चढ़ते हैं, तो यह एक संकेत हो सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, आप इन चुनौतियों को पार करने में सक्षम होंगे और सफलता प्राप्त करेंगे। सपने में उल्लू का दिखाई देना उल्लू को मां लक्ष्मी का वास माना जाता है. ऐसे में जब कभी सपने में उल्लू दिखाई दे तो समझिए आपके ऊपर जल्द ही मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति होने वाली है. आपको धन लाभ और जीवन में सुख-समृद्धि और ऐशोआराम मिलने वाला है. सपने में बारिश का देखना सपने sapne में बारिश का दिखाई देना एक शुभ संकेत माना जाता है. इसका मतलब होता है कि आपके जीवन में हर तरह की खुशियां मिलने वाली है. धन-दौलत की कोई कमी आपको महसूस नहीं होगी. आपकी कोई योजना आपको बढ़िया लाभ दिला सकती है.

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Poranik Mandir:भारत के प्राचीन मंदिरों के बारे में, जिसका वर्षों पुराना है इतिहास

भारत में प्राचीन मंदिरों Poranik Mandir की एक समृद्ध विरासत है। भारत की संस्कृति और आध्यात्मिकता की चर्चा विश्व भर में फैली हुई हैं। विभिन्न धर्मों के संगम की धरती भारत में एक से बढ़कर एक पुराने व भव्य कलात्मक मंदिर हैं, जिनकी सुंदरता देखने लायक है। हजारों साल पुराने इन मंदिरों की खूबसूरती व समृद्धि को देखकर आप भारत के विशाल इतिहास का अंदाजा लगा सकते हैं।इन मंदिरों का निर्माण विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोगों द्वारा किया गया था, और वे भारतीय वास्तुकला और संस्कृति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु बृहदेश्वर मंदिर,तंजौर: यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को 1002 ईस्वी में चोल शासक राजाराज चोल प्रथम ने निर्माण करवाया था। यह मंदिर द्रविड़ शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर द्रविड़ शैली का अनूठा उदाहरण है। इस मंदिर के शीर्ष की ऊंचाई 66 मीटर है। इसकी प्रसिद्धि को देखने लोग मीलों दूरी का सफर तय करते हैं। यह मंदिर अपने समय में विश्व की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था। चेन्नाकेशव मंदिर, कर्नाटक: चेन्नाकेशव मंदिर के बारे में और जानना चाहते हैं, बिल्कुल! यह कर्नाटक के बेल्लूर में स्थित एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक महत्व वाला मंदिर है। यहाँ इसके बारे में कुछ जानकारी: इतिहास और महत्व 12वीं शताब्दी में होयसला राजा विष्णुवर्धन द्वितीय द्वारा निर्मित। भगवान विष्णु के एक रूप, चेन्नाकेशव को समर्पित है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित एक राष्ट्रीय महत्व का स्मारक। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, होयसला मंदिरों का समूह, का एक हिस्सा। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मान्यता दी गई है। इसके तीन प्रवेश द्वारों में से पूर्वी प्रवेश द्वार सबसे अच्छा माना जाता है। इस मंदिर को विजयनगर के शासकों द्वारा चोलों पर उनकी विजय को दर्शाने के लिए बनाया गया था। दिलवाड़ा मंदिर, राजस्थान दिलवाड़ा मंदिर, राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू में स्थित एक समूह मंदिर हैं। ये मंदिर जैन धर्म के तीर्थंकरों को समर्पित हैं। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच गुजरात के चालुक्य राजवंश और वाहेला राजवंश के शासकों द्वारा किया गया था। दिलवाड़ा मंदिरों का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है। ये मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी और कला के लिए प्रसिद्ध हैं। मंदिरों के बाहरी हिस्सों पर भगवान गणेश, भगवान विष्णु, भगवान शिव और अन्य हिंदू देवताओं और देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। मंदिरों के अंदरूनी हिस्सों में तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू नगर में स्थित दिलवाड़ा मंदिर पांच मंदिरों का समूह है, जिसका निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच हुआ था। जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर में 48 स्तम्भ हैं, जिनमें नृत्यांगनाओं की बनी आकृतियां हैं, 5 very mysterious temples of India भारत के 5 बेहद रहस्यमय मंदिर द्वारकाधीश मंदिर: द्वारकाधीश मंदिर भारत के गुजरात राज्य के द्वारका शहर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, जिन्हें अक्सर “द्वारकाधीश” या “द्वारका के राजा” के रूप में जाना जाता है। मंदिर भारत के चार धाम तीर्थों में से एक है। द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण गुजरात के चालुक्य राजवंश के राजा वीरधवल ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। मंदिर का निर्माण चूना पत्थर से किया गया है और यह पांच मंजिला है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान कृष्ण की एक श्यामवर्णी चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है। भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हैं। द्वारकाधीश मंदिर अपनी सुंदरता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के बाहरी हिस्सों पर भगवान कृष्ण, लक्ष्मी, शिव, पार्वती, गणेश और देवी सरस्वती सहित कई हिंदू देवताओं और देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। मंदिर के अंदरूनी हिस्सों में भगवान कृष्ण की जीवनी से संबंधित कई चित्र और भित्ति चित्र हैं। भगवान श्री कृष्ण को समर्पित द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। गुजरात में मौजूद इस मंदिर को चार धाम यात्रा में शामिल किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 2500 साल पुराना है। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर, जिसे श्रीरंगम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली शहर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिन्हें अक्सर “श्री रंगनाथ” या “वैकुण्ठ के राजा” के रूप में जाना जाता है। मंदिर भारत के चार धाम तीर्थों में से एक है। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में पल्लव राजवंश के राजा नरसिंहवर्मन II ने करवाया था। मंदिर का निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है और यह दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक है। मंदिर का क्षेत्रफल लगभग 631,000 वर्ग मीटर है और इसकी परिधि लगभग 4 किलोमीटर है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान विष्णु की एक चतुर्भुजी प्रतिमा के लिए समर्पित है। भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर विराजमान हैं। मंदिर के अन्य हिस्सों में कई अन्य हिंदू देवताओं और देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर अपनी सुंदरता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के बाहरी हिस्सों पर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, शिव, पार्वती, गणेश और देवी सरस्वती सहित कई हिंदू देवताओं और देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। मंदिर के अंदरूनी हिस्सों में भगवान विष्णु की जीवनी से संबंधित कई चित्र और भित्ति चित्र हैं। सोमनाथ मंदिर गुजरात सोमनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम हैं। गुजरात में स्थित इस मंदिर को 7वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इस वैभवशाली मंदिर को कई बार तोड़ा गया। फिर भी इस मंदिर की विशालता और भव्यता आज भी कायम है। ऋग्वेद में भी इस मंदिर का उल्लेख किया गया है।  ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान में पुष्कर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर हिंदू धर्म के तीन प्रमुख देवताओं में से एक, ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर दुनिया का एकमात्र मंदिर है जो ब्रह्मा को समर्पित है। राजस्थान के पुष्कर में स्थित इस मंदिर की संरचना 14वीं शताब्दी की मानी जाती है। इस मंदिर को करीब 2000 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर के बीचों-बीच ब्रह्मा और उनकी दूसरी पत्नी गायत्री की मूर्ति है। आपको बता दें कि यह मंदिर भारत का एक मात्र

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भगवती तुलसी की कथा । Bhagwati Tulsi Ki Katha In Hindi

तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha तुलसी की कथा बहुत ही प्राचीन है। हिन्दू धर्म में तुलसी को पवित्रता, शुद्धता और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है। तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha कई रूपों में मिलती है। एक कथा के अनुसार, तुलसी एक सुंदर और गुणवान राजकुमारी थीं, जिनका नाम वृंदा था। वह दैत्यराज कालनेमी की पुत्री थीं। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके पति बनेंगे। लेकिन, भगवान विष्णु ने उन्हें यह भी कहा कि उन्हें एक दैत्य का रूप धारण करना होगा। वृंदा ने भगवान विष्णु के आदेश का पालन किया और उन्होंने शंखचूड़ नाम के दैत्य का रूप धारण किया। शंखचूड़ एक महान योद्धा था। उसने अपने बल और पराक्रम से सभी देवताओं को पराजित कर दिया। देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी। भगवान शिव ने शंखचूड़ को मारने के लिए भगवान विष्णु को भेजा। भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और शंखचूड़ से युद्ध किया। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में, भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का वध कर दिया। वृंदा को अपने पति के वध का बहुत दुख हुआ। उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने वृंदा को क्षमा कर दिया और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया। तुलसी की एक और कथा के अनुसार, तुलसी एक वनवासी कन्या थीं। वह भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति पाने के लिए कठोर तपस्या की। Poranik Katha:पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापों की कहानी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके पति बनेंगे। लेकिन, भगवान विष्णु ने उन्हें यह भी कहा कि उन्हें एक पौधे का रूप धारण करना होगा। तुलसी ने भगवान विष्णु के आदेश का पालन किया और वह तुलसी के पौधे का रूप धारण कर लीं। तुलसी के पौधे की सुगंध और पवित्रता से सभी देवता प्रसन्न हुए। उन्होंने तुलसी के पौधे को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में स्वीकार किया। तुलसी की कथाओं में, उन्हें हमेशा एक पवित्र और भक्त महिला के रूप में चित्रित किया गया है। वह भगवान विष्णु की कृपा से एक पौधे का रूप धारण कर लीं, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। तुलसी को हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। उन्हें घरों में लगाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। तुलसी के पत्तों को प्रसाद के रूप में भी खाया जाता है। तुलसी को “हरिप्रिया” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “भगवान विष्णु की प्रिय”। वह भगवान विष्णु की आराधना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। Tulsi Ki Katha तुलसी की कथा का सार तुलसी की कथा में, वृंदा को एक आदर्श पत्नी और भक्त के रूप में चित्रित किया गया है। वह अपने पति की भक्ति में इतनी तल्लीन थी कि उसने भगवान विष्णु के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया, यहां तक ​​कि अपना पति भी। तुलसी की कथा (Tulsi Ki Katha) हमें यह भी सिखाती है कि भगवान विष्णु भक्तों के प्रति बहुत दयालु हैं। उन्होंने वृंदा की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपना पति बना लिया। तुलसी की कथा Tulsi Ki Katha हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है। यह कथा हमें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्ति और समर्पण के महत्व को सिखाती है।

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Dream Interpretation: सपने में दिखें ये 5 चीजें तो समझिए खुलने वाली है किस्मत, बनने वाले हैं अमीर

स्वप्नशास्त्र के अनुसार, सपने (Dream) में कुछ चीजें दिखाई देना शुभ संकेत माना जाता है। ये सपने आने वाले समय में अच्छे दिन आने की ओर इशारा करते हैं। Swapna Shastra In Hindi : सपने में कुछ चीजें दिखाई देना शुभ संकेत माना जाता है। ये सपने आने वाले समय में अच्छे दिन आने की ओर इशारा करते हैं। स्वप्नशास्त्र के अनुसार, सपने में दिखाई देने वाली 5 चीजें जो किस्मत खुलने का संकेत देती हैं, निम्नलिखित हैं: बारिश सपने Dream में बारिश दिखाई देना भी शुभ माना जाता है। यह सपना समृद्धि, खुशहाली और आशीर्वाद का प्रतीक है। यह सपना आने वाले समय में आपके जीवन में धन लाभ, नौकरी में तरक्की या कोई अन्य शुभ समाचार मिलने का संकेत देता है। Sapne Me Khud Ko Dekhna:सपने में खुद को देखना देता है बड़ा संके झाड़ू सपने में झाड़ू देखना बहुत अच्छा माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में झाड़ू दिखना शुभ होता है. इस सपने का मतलब है कि आपके जीवन में जल्द सुख और समृद्धि आने वाली है. ये  सपना आपके धनवान बनने का संकेत देता है. अगर आपने सपने में झाड़ू देखा है तो इसका मतलब है कि आपकी किस्मत खुलने वाली है. चंद्रमा सपने में चंद्रमा का दिखना भी बहुत शुभ माना गया है. स्वप्नशास्त्र के अनुसार ये संकेत देता है कि आपके  मान-सम्मान में जल्द वृद्धि होने वाली है. आपके ऊपर मां लक्ष्मी मेहरबान रहने वाली हैं और उनकी कृपा से आपके धन-धान्य में वृद्धि होगी. खाली बर्तन स्वप्नशास्त्र के अनुसार सपने Dream में खाली बर्तन देखना भी  घर में मां लक्ष्मी के आगमन का संकेत देता है. यह सपना इशारा करता है कि जल्द ही आपके जीवन से सभी समस्याएं खत्म होने वाली हैं. Dream गुलाब का फूल सपने गुलाब का फूल देखने का मतलब है कि आपके किस्मत का ताला जल्द खुलने वाला है. इस सपने का मतलब यह है कि आप पर मां लक्ष्मी की कृपा रहेगी और पिछले कई दिनों से चल रही आपकी सारी आर्थिक समस्याएं दूर हो जाएंगी. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि Karmasu.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Poranik Katha:पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापों की कहानी

सनातन पौराणिक ग्रंथों में अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर मिलती है। आज हम आपको 24 ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे की कथा बताएँगे। इस बात से क्रोधित होकर तारा ने राम को श्राप दिया कि वह अपनी पत्नी सीता को खो देंगे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि अगले जन्म में उनकी मृत्यु वालि के हाथों होगी। 1- युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप Poranik Katha महाभारत के शांति पर्व के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था, तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया, तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि “आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।” Bagwan Shiv :क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे ? 2- ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई। 3- माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप माण्डव्य ऋषि एक महान तपस्वी और ऋषि थे। वे अपने ज्ञान और कर्म के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार, वे एक जंगल में तपस्या कर रहे थे। तभी, एक राजा अपनी सेना के साथ जंगल से गुजर रहा था। राजा ने देखा कि माण्डव्य ऋषि एक पेड़ के नीचे ध्यान में बैठे हैं। राजा ने सोचा कि यह पेड़ उसके महल के लिए बहुत अच्छा होगा। इसलिए, उसने अपने सैनिकों को पेड़ को काटने का आदेश दिया। माण्डव्य ऋषि ने पेड़ पर ध्यान नहीं दिया। सैनिकों ने पेड़ काटना शुरू कर दिया। माण्डव्य ऋषि ने जब यह देखा तो उन्होंने क्रोध से भरकर यमराज को श्राप दे दिया कि वे अगले जन्म में एक दासी के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यमराज ने माण्डव्य ऋषि से माफी मांगी और कहा कि वे अनजाने में ऐसा कर बैठे हैं। माण्डव्य ऋषि ने अपना श्राप वापस ले लिया, लेकिन उन्होंने यमराज को एक शर्त रखी कि वे अगले जन्म में शूद्र योनि में जन्म लेंगे। यमराज ने इस शर्त को मान लिया और अगले जन्म में उन्हें विदुर के रूप में जन्म हुआ। विदुर एक महान ज्ञानी और राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने पांडवों की बहुत सहायता की। माण्डव्य ऋषि का श्राप एक महत्वपूर्ण सबक देता है। यह बताता है कि हमें किसी भी व्यक्ति को बिना सोचे-समझे दंड नहीं देना चाहिए। हमे हमेशा यह सोचना चाहिए कि उस व्यक्ति ने क्या गलती की है और उसका क्या कारण है। 4- नंदी का रावण को श्राप वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदी जी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदी जी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा। 5- कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूछ काली है। कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ मंं भस्म हो जाओगे। 6- उर्वशी का अर्जुन को श्राप महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा। 7- तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है। 8- श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया। ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली, तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक

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Sapne Me Khud Ko Dekhna:सपने में खुद को देखना देता है बड़ा संके

सपने Sapne में खुद को देखने के कई अलग-अलग संदर्भ भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप सपने में खुद को खुश देख रहे हैं, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि आप अपने जीवन में खुश हैं और संतुष्ट हैं। यदि आप सपने में खुद को दुखी देख रहे हैं, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कभी ना कभी हर इंसान रात की नींद में सपना जरूर देखता है. बल्कि अक्‍सर ही लोग नींद में सपने Sapne देखते हैं. ये सपने दिन भर की घटनाओं, हमारे दिमाग में चल रहे विचारों का असर तो होते ही हैं, साथ ही ये भविष्‍य में होने वाली घटनाओं का इशारा भी देते हैं. इन सपनों का हमारे जीवन पर शुभ-अशुभ असर पड़ता है. हालांकि कई बार हमें सपने जागने के कुछ देर बाद याद भी नहीं रहते हैं. वहीं कुछ सपने याद रह जाते हैं. स्‍वप्‍न शास्‍त्र में सपनों के मतलब बताए गए हैं. आज हम जानते हैं कि सपने में खुद को देखने का क्‍या मतलब होता है. Sapne सपने में खुद को रोते हुए देखना सपने में खुद को रोते हुए देखने का एक सकारात्मक अर्थ यह हो सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ सकारात्मक परिवर्तन कर रहे हैं या करने की योजना बना रहे हैं। यह आपके आत्म-स्वीकृति और आत्म-जागरूकता में वृद्धि का भी संकेत हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि आप सपने Sapne में खुद को खुशी के आंसू बहाते हुए देख रहे हैं, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ खुशी की घटनाओं की उम्मीद कर रहे हैं। Sapne सपने में खुद को श्‍मशान घाट या कब्रिस्‍तान में देखना सपने में खुद को श्‍मशान घाट या कब्रिस्‍तान में देखना मृत्यु और परिवर्तन का प्रतीक हो सकता है। यह एक संकेत हो सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों के लिए तैयार हैं। दि सपने में खुद को कब्रिस्‍तान या श्‍मशान घाट में देखें तो यह भी शुभ संकेत है. ऐसा सपना बताता है कि आपको जल्‍द ही जीवन में बड़ी तरक्‍की मिलने वाली है. साथ ही ऐसा सपना धन लाभ का इशारा भी देता है.  Sapne Me Kyu Dikhai Deta Hai Mor Pankh सपने में क्यों दिखाई देता है मोर पंख Sapne सपने में खुद को आत्‍महत्‍या करते हुए देखना सपने में खुद को आत्‍महत्‍या करते हुए देखें तो यह बताता है कि आपकी उम्र बढ़ गई है. आपको खुशियां मिलने वाली हैं. ऐसा सपना धन लाभ का इशारा भी देता है Sapne सपने में खुद को ऊंचाई से गिरते देखना डर या अनिश्चितता: ऊंचाई से गिरने का सपना अक्सर डर या अनिश्चितता की भावनाओं को दर्शाता है। यदि आप अपने जीवन में किसी चीज़ के बारे में अनिश्चित महसूस कर रहे हैं, तो यह सपना यह संकेत दे सकता है कि आप नियंत्रण खोने से डरते हैं। Sapne सपने में खुद को तारे देखते हुए देखना सफलता: तारे अक्सर सफलता और उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि आप सपने में तारे देखते हैं, तो यह यह संकेत दे सकता है कि आप अपने जीवन में कुछ बड़ी हासिल करने की उम्मीद कर रहे हैं। सपने में आप खुद को आसमान के तारे देखते हुए देखें तो यह बहुत ही शुभ सपना है. यह बताता है कि आपको कोई बड़ा पद, प्रतिष्‍ठा या उपलब्धि मिलने वाली है.  Sapne सपने में खुद को गरीब देखना धन की प्राप्ति: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में खुद को गरीब देखना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ऐसे सपने आने का मतलब है कि आपको जल्द ही धन लाभ होने वाला है। या फिर कहीं अटका हुआ धन भी वापस मिल सकता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. Karmasu.in इसकी पुष्टि नहीं करता है.) 

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