पूजा विधि: माँ शैलपुत्री की पूजा विधि और मन्त्र

पूजा विधि: माँ शैलपुत्री की पूजा विधि और वैदिक प्रमाण माँ शैलपुत्री, देवी दुर्गा का पहला स्वरूप, नवरात्रि के पहले दिन की पूजा का केंद्र होती हैं। उनकी पूजा से शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम माँ की पूजा विधि को विस्तार से जानेंगे, जिसमें वैदिक प्रमाण और मन्त्र भी शामिल हैं। माँ शैलपुत्री का महत्व माँ शैलपुत्री का वर्णन देवी भागवत और नवरात्रि उपासन विधि में मिलता है। इन ग्रंथों में उनका स्वरूप, गुण और भक्ति का महत्व बताया गया है। पूजा सामग्री (Worship Items) पूजा विधि (Worship Procedure) वैदिक प्रमाण माँ शैलपुत्री के प्रति भक्ति और पूजा का महत्व वैदिक शास्त्रों में स्पष्ट है। ये ग्रंथ हमें यह सिखाते हैं कि शक्ति की पूजा से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है। निष्कर्ष (Conclusion) माँ शैलपुत्री की पूजा विधि सरल, लेकिन प्रभावी है। इस पूजा से व्यक्ति को मानसिक शांति, शक्ति और समृद्धि प्राप्त होती है। सही विधि और मन्त्रों के साथ की गई पूजा जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है। Keywords: माँ शैलपुत्री, पूजा विधि, नवरात्रि, देवी दुर्गा, Worship, Vedic Mantra

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Shri Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा

Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा: एक विस्तृत विवरण Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा एक विशेष प्रकार की पूजा है जो माता दुर्गा को समर्पित होती है। Durga Manasa Puja यह पूजा दुर्गा सप्तशती के पाठ और मनन पर आधारित होती है। ‘मानस’ शब्द का अर्थ है मन, इसलिए इस पूजा में भक्त माता दुर्गा को अपने मन से पूजते हैं। Durga Manasa Puja:क्यों की जाती है दुर्गा मानस पूजा? Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा कैसे की जाती है? Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा के लाभ Durga Manasa Puja:कब की जाती है दुर्गा मानस पूजा? यह पूजा नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से की जाती है, लेकिन इसे साल में किसी भी समय किया जा सकता है। Durga Manasa Puja:दुर्गा मानस पूजा के दौरान क्या ध्यान रखना चाहिए? अंत में श्री दुर्गा मानस पूजा एक शक्तिशाली पूजा है जो भक्तों को माता दुर्गा के आशीर्वाद से भर देती है।Durga Manasa Puja यदि आप भी माता दुर्गा की भक्त हैं तो आप इस पूजा को नियमित रूप से कर सकते हैं। Shri Durga Manasa Puja:श्री दुर्गा मानस पूजा ॥ श्रीदुर्गामानस-पूजा ॥उद्यच्चन्दनकुङ्कुमारुणपयोधाराभिराप्लावितांनानानर्घ्यमणिप्रवालघटितां दत्तां गृहाणाम्बिके।आमृष्टां सुरसुन्दरीभिरभितो हस्ताम्बुजैर्भक्तितोमातः सुन्दरि भक्तकल्पलतिके श्रीपादुकामादरात्॥1॥ देवेन्द्रादिभिरर्चितं सुरगणैरादाय सिंहासनंचञ्चत्काञ्चनसंचयाभिरचितं चारुप्रभाभास्वरम्।एतच्चम्पककेतकीपरिमलं तैलं महानिर्मलंगन्धोद्वर्तनमादरेण तरुणीदत्तं गृहाणाम्बिके॥2॥ पश्चाद्देवि गृहाण शम्भुगृहिणि श्रीसुन्दरि प्रायशोगन्धद्रव्यसमूहनिर्भरतरं धात्रीफलं निर्मलम्।तत्केशान् परिशोध्य कङ्कतिकया मन्दाकिनीस्रोतसिस्नात्वा प्रोज्ज्वलगन्धकं भवतु हे श्रीसुन्दरि त्वन्मुदे॥3॥ सुराधिपतिकामिनीकरसरोजनालीधृतांसचन्दनसकुङ्कुमागुरुभरेण विभ्राजिताम्।महापरिमलोज्ज्वलां सरसशुद्धकस्तूरिकांगृहाण वरदायिनि त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे॥4॥ गन्धर्वामरकिन्नरप्रियतमासंतानहस्ताम्बुज-प्रस्तारैर्ध्रियमाणमुत्तमतरं काश्मीरजापिञ्जरम्।मातर्भास्वरभानुमण्डललसत्कान्तिप्रदानोज्ज्वलंचैतन्निर्मलमातनोतु वसनं श्रीसुन्दरि त्वन्मुदम्॥5॥ स्वर्णाकल्पितकुण्डले श्रुतियुगे हस्ताम्बुजे मुद्रिकामध्ये सारसना नितम्बफलके मञ्जीरमङ्घ्रिद्वये।हारो वक्षसि कङ्कणौ क्वणरणत्कारौ करद्वन्द्वकेविन्यस्तं मुकुटं शिरस्यनुदिनं दत्तोन्मदं स्तूयताम्॥6॥ ग्रीवायां धृतकान्तिकान्तपटलं ग्रैवेयकं सुन्दरंसिन्दूरं विलसल्ललाटफलके सौन्दर्यमुद्राधरम्।राजत्कज्जलमुज्ज्वलोत्पलदलश्रीमोचने लोचनेतद्दिव्यौषधिनिर्मितं रचयतु श्रीशाम्भवि श्रीप्रदे॥7॥ अमन्दतरमन्दरोन्मथितदुग्धसिन्धूद्भवंनिशाकरकरोपमं त्रिपुरसुन्दरि श्रीप्रदे।गृहाण मुखमीक्षतुं मुकुरबिम्बमाविद्रुमै-र्विनिर्मितमघच्छिदे रतिकराम्बुजस्थायिनम्॥8॥ कस्तूरीद्रवचन्दनागुरुसुधाधाराभिराप्लावितंचञ्चच्चम्पकपाटलादिसुरभिद्रव्यैः सुगन्धीकृतम्।देवस्त्रीगणमस्तकस्थितमहारत्नादिकुम्भव्रजै-रम्भःशाम्भवि संभ्रमेण विमलं दत्तं गृहाणाम्बिके॥9॥ कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती-मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वमारादिभिः।पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसाताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये॥10॥ मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै-र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः।सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतयेधूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥11॥ घृतद्रवपरिस्फुरद्रुचिररत्नयष्ट्यान्वितोमहातिमिरनाशनः सुरनितम्बिनीनिर्मितः।सुवर्णचषकस्थितः सघनसारवर्त्यान्वित-स्तव त्रिपुरसुन्दरि स्फुरति देवि दीपो मुदे॥12॥ जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलंयुक्तं हिङ्गुमरीचजीरसुरभिद्रव्यान्वितैर्व्यञ्जनैः।पक्वान्नेन सपायसेन मधुना दध्याज्यसम्मिश्रितंनैवेद्यं सुरकामिनीविरचितं श्रीचण्डिके त्वन्मुदे॥13॥ लवङ्गकलिकोज्ज्वलं बहुलनागवल्लीदलंसजातिफलकोमलं सघनसारपूगीफलम्।सुधामधुरिमाकुलं रुचिररत्नपात्रस्थितंगृहाण मुखपङ्कजे स्फुरितमम्ब ताम्बूलकम्॥14॥ शरत्प्रभवचन्द्रमः स्फुरितचन्द्रिकासुन्दरंगलत्सुरतरङ्गिणीललितमौक्तिकाडम्बरम्।गृहाण नवकाञ्चनप्रभवदण्डखण्डोज्ज्वलंमहात्रिपुरसुन्दरि प्रकटमातपत्रं महत्॥15॥ मातस्त्वन्मुदमातनोतु सुभगस्त्रीभिः सदाऽऽन्दोलितंशुभ्रं चामरमिन्दुकुन्दसदृशं प्रस्वेददुःखापहम्।सद्योऽगस्त्यवसिष्ठनारदशुकव्यासादिवाल्मीकिभिःस्वे चित्ते क्रियमाण एव कुरुतां शर्माणि वेदध्वनिः॥16॥ स्वर्गाङ्गणे वेणुमृदङ्गशङ्खभेरीनिनादैरुपगीयमाना।कोलाहलैराकलिता तवास्तु विद्याधरीनृत्यकला सुखाय॥17॥ देवि भक्तिरसभावितवृत्ते प्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते।तत्र लौल्यमपि सत्फलमेकं जन्मकोटिभिरपीह न लभ्यम्॥18॥ एतैः षोडशभिः पद्यैरुपचारोपकल्पितैः।यः परां देवतां स्तौति स तेषां फलमाप्नुयात्॥19॥ ॥ इति दुर्गातन्त्रे दुर्गामानसपूजा समाप्ता ॥ Durga Manasa Puja:श्रीदुर्गामानस – पूजा माता त्रिपुरसुन्दरि! तुम भक्तजनोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेवाली कल्पलता हो। माँ! यह पादुका आदरपूर्वक तुम्हारे श्रीचरणों में समर्पित है, इसे ग्रहण करो। यह उत्तम चन्दन और कुङ्कुमसे मिली हुई लाल जलकी धारासे धोयी गयी है। भाँति-भाँतिकी बहुमूल्य मणियों तथा मँगोंसे इसका निर्माण हुआ है और बहुत-सी देवाङ्गनाओंने अपने कर-कमलोंद्वारा भक्तिपूर्वक इसे सब ओर से धो-पोछकर स्वच्छ बना दिया॥1॥ माँ! देवताओंने तुम्हारे बैठनेके लिये यह दिव्य सिंहासन लाकर रख दिया है, इसपर विराजो यह वह सिंहासन है, जिसकी देवराज इन्द्र आदि भी पूजा करते हैं। अपनी कान्तिसे दमकते हुए राशि – राशि सुवर्णसे इसका निर्माण किया गया है। यह अपनी मनोहर प्रभासे सदा प्रकाशमान रहता है। इसके सिवा, यह चम्पा और केतकीकी सुगन्धसे पूर्ण अत्यन्त निर्मल तेल और सुगन्धयुक्त उबटन है, जिसे दिव्य युवतियाँ आदरपूर्वक तुम्हारी सेवामें प्रस्तुत कर रही हैं, कृपया इसे स्वीकार करो॥2॥ देवि! इसके पश्चात् यह विशुद्ध आँवलेका फल ग्रहण करो। शिवप्रिये! त्रिपुरसुन्दरि! इस आँवलेमें प्रायः जितने भी सुगन्धित पदार्थ हैं, वे सभी डाले गये हैं; इससे यह परम सुगन्धित हो गया है। अतः इसको लगाकर बालोंको कंघीसे झाड़ लो और गङ्गाजी की पवित्र धारामें नहाओ। तदनन्तर यह दिव्य गन्ध सेवामें प्रस्तुत है, यह तुम्हारे आनन्दकी वृद्धि करनेवाला हो॥3॥ सम्पत्ति प्रदान करनेवाली वरदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! यह सरस शुद्ध कस्तूरी ग्रहण करो। इसे स्वयं देवराज इन्द्रकी पत्नी महारानी शची अपने कर-कमलोंमें लेकर सेवामें खड़ी हैं। इसमें चन्दन, कुङ्कम तथा अगुरुका मेल होनेसे और भी इसकी शोभा बढ़ गयी है। इससे बहुत अधिक गन्ध निकलनेके कारण यह बड़ी मनोहर प्रतीत होती है॥4॥ माँ श्रीसुन्दरि! यह परम उत्तम निर्मल वस्त्र सेवामें समर्पित है, यह तुम्हारे हर्षको बढ़ावे। माता! इसे गन्धर्व, देवता तथा किन्नरोंकी प्रेयसी सुन्दरियाँ अपने फैलाये हुए कर-कमलोंमें धारण किये खड़ी हैं। यह केसरमें रँगा हुआ पीताम्बर है। इससे परम प्रकाशमान सूर्यमण्डलकी शोभामयी दिव्य कान्ति निकल रही है, जिसके कारण यह बहुत ही सुशोभित हो रहा है॥5॥ तुम्हारे दोनों कानोंमें सोनेके बने हुए कुण्डल झिलमिलाते रहें, कर-कमलकी एक अङ्गुलीमें अँगूठी शोभा पावे, कटिभागमें नितम्बोंपर करधनी सुहाये, दोनों चरणोंमें मञ्जीर मुखरित होता रहे, वक्षःस्थलमें हार सुशोभित हो और दोनों कलाइयोंमें कंकन खनखनाते रहें। तुम्हारे मस्तकपर रखा हुआ दिव्य मुकुट प्रतिदिन आनन्द प्रदान करे।Durga Manasa Puja ये सब आभूषण प्रशंसाके योग्य हैं॥6॥ धन देनेवाली शिवप्रिया पार्वती! तुम गलेमें बहुत ही चमकीली सुन्दर हँसली पहन लो, ललाटके मध्यभागमें सौन्दर्यकी मुद्रा (चिह्न) धारण करनेवाले सिन्दूरकी बेंदी लगाओ तथा अत्यन्त सुन्दर पद्मपत्रकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले नेत्रोंमें यह काजल भी लगा लो, यह काजल दिव्य औषधियों से तैयार किया गया है॥7॥ पापोंका नाश करनेवाली सम्पत्तिदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! अपने मुखकी शोभा निहारनेके लिये यह दर्पण ग्रहण करो। इसे साक्षात् रति रानी अपने कर-कमलोंमें लेकर सेवामें उपस्थित हैं। इस दर्पणके चारों ओर मूँगे जड़े हैं। प्रचण्ड वेगसे घूमनेवाले मन्दराचलकी मथानीसे जब क्षीरसमुद्र मथा गया, उस समय यह दर्पण उसीसे प्रकट हुआ था। यह चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है॥8॥ भगवान् शंकरकी धर्मपत्नी पार्वतीदेवी! देवाङ्गनाओंके मस्तकपर रखे हुए बहुमूल्य रत्नमय कलशोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक दिया जानेवाला यह निर्मल जल ग्रहण करो। इसे चम्पा और गुलाल आदि सुगन्धित द्रव्योंसे सुवासित किया गया है तथा यह कस्तूरीरस, चन्दन, अगुरु और सुधाकी धारासे आप्लावित है॥9॥ मैं कह्लार, उत्पल, नागकेसर, कमल, मालती, मल्लिका, कुमुद, केतकी और लाल कनेर आदि फूलोंसे, सुगन्धित पुष्प-मालाओंसे तथा नाना प्रकारके रसोंकी धारासे लाल कमलके भीतर निवास करनेवाली श्रीचण्डिका देवीकी पूजा करता (करती) हूँ॥10॥ श्रीचण्डिका देवि! देववधुओंके द्वारा तैयार किया हुआ यह दिव्य धूप तुम्हारी प्रसन्नता बढ़ानेवाला हो। यह धूप रत्नमय पात्रमें, जो सुगन्धका निवासस्थान है, रखा हुआ है; यह तुम्हें सन्तोष प्रदान करे। इसमें जटामासी, गुग्गुल, चन्दन, अगुरु-चूर्ण, कपूर, शिलाजीत, मधु, कुङ्कुम तथा घी मिलाकर उत्तम रीतिसे बनाया गया है॥11॥ देवी त्रिपुरसुन्दरी! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यहाँ यह दीप प्रकाशित हो रहा है। यह घीसे जलता है; इसकी दीयटमें सुन्दर रत्नका डंडा लगा है, इसे देवाङ्गनाओंने बनाया है। यह दीपक सुवर्णके चषक- (पात्र-) में जलाया गया है। इसमें कपूरके साथ बत्ती रखी है। यह भारी – से- भारी अन्धकारका भी नाश करनेवाला है॥12॥ श्रीचण्डिका देवि! देववधुओंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यह दिव्य नैवेद्य तैयार किया है, इसमें अगहनीके चावलका स्वच्छ भात है, जो बहुत ही रुचिकर और

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Vindhyeshwari Stotram:श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम्

Vindhyeshwari Stotram:विंध्येश्वरी स्तोत्रम देवी विंध्येश्वरी की स्तुति में समर्पित एक शक्तिशाली मंत्र है। यह स्तोत्र नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है, लेकिन इसे किसी भी समय भक्ति के साथ किया जा सकता है। विंध्येश्वरी देवी को शक्ति की देवी माना जाता है और उनकी पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है। विंध्येश्वरी स्तोत्रम में देवी के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। यह माना जाता है कि विंध्येश्वरी स्तोत्रम का नियमित पाठ करने से भक्तों को शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। यह स्तोत्र देवी की कृपा को प्राप्त करने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करता है। यदि आप विंध्येश्वरी देवी की भक्त हैं और उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं, तो आप इस स्तोत्र का नियमित पाठ कर सकते हैं। इससे आपको आध्यात्मिक शक्ति और आनंद प्राप्त होगा। Vindhyeshwari Stotram: विंध्येश्वरी स्तोत्रम के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं: Vindhyeshwari Stotram:श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम् निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।बनेरणे प्रकाशिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ त्रिशूल मुण्ड धारिणी,धरा विघात हारिणी ।गृहे-गृहे निवासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ दरिद्र दुःख हारिणी,सदा विभूति कारिणी ।वियोग शोक हारिणी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ लसत्सुलोल लोचनं,लतासनं वरप्रदं ।कपाल-शूल धारिणी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कराब्जदानदाधरां,शिवाशिवां प्रदायिनी ।वरा-वराननां शुभां,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ कपीन्द्न जामिनीप्रदां,त्रिधा स्वरूप धारिणी ।जले-थले निवासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ विशिष्ट शिष्ट कारिणी,विशाल रूप धारिणी ।महोदरे विलासिनी,भजामि विन्ध्यवासिनी ॥ पुंरदरादि सेवितां,पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥

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Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri:जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी -आरती

आरती नवरात्रि, माता की चौकी, देवी जागरण, शुक्रवार, वट सावित्री व्रत, दुर्गा पूजा, गणगौर तथा करवा चौथ के दिन गाई जाने वाली दुर्गा माँ की प्रसिद्ध आरती। जय श्यामा गौरी -आरती जय अम्बे गौरी,मैया जय श्यामा गौरी ।तुमको निशदिन ध्यावत,हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ मांग सिंदूर विराजत,टीको मृगमद को ।उज्ज्वल से दोउ नैना,चंद्रवदन नीको ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कनक समान कलेवर,रक्ताम्बर राजै ।रक्तपुष्प गल माला,कंठन पर साजै ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ केहरि वाहन राजत,खड्ग खप्पर धारी ।सुर-नर-मुनिजन सेवत,तिनके दुखहारी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कानन कुण्डल शोभित,नासाग्रे मोती ।कोटिक चंद्र दिवाकर,सम राजत ज्योती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ शुंभ-निशुंभ बिदारे,महिषासुर घाती ।धूम्र विलोचन नैना,निशदिन मदमाती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चण्ड-मुण्ड संहारे,शोणित बीज हरे ।मधु-कैटभ दोउ मारे,सुर भयहीन करे ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ ब्रह्माणी, रूद्राणी,तुम कमला रानी ।आगम निगम बखानी,तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत,नृत्य करत भैरों ।बाजत ताल मृदंगा,अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ तुम ही जग की माता,तुम ही हो भरता,भक्तन की दुख हरता ।सुख संपति करता ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ भुजा चार अति शोभित,वर मुद्रा धारी । [खड्ग खप्पर धारी]मनवांछित फल पावत,सेवत नर नारी ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कंचन थाल विराजत,अगर कपूर बाती ।श्रीमालकेतु में राजत,कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ श्री अंबेजी की आरति,जो कोइ नर गावे ।कहत शिवानंद स्वामी,सुख-संपति पावे ॥ॐ जय अम्बे गौरी..॥ जय अम्बे गौरी,मैया जय श्यामा गौरी ।

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Shri Shanta Durgechi Aarti:श्री शांतादुर्गेची आरती

Shanta Durgechi:श्री शांतादुर्गेची आरती Shanta Durgechi:श्री शांतादुर्गेची आरती ही महाराष्ट्रातील एक प्रसिद्ध देवी आरती आहे. माता शांतादुर्गा ही शक्तीची देवी मानली जाते आणि तिला शांती देवी म्हणूनही ओळखले जाते. ही आरती देवीच्या सौंदर्याला, शक्तीला आणि भक्तांवरील कृपेला समर्पित आहे. Shanta Durgechi:आरती म्हणजे काय? आरती ही एक धार्मिक प्रथा आहे ज्यामध्ये दीपक किंवा दीपक ज्वाला देवाच्या मूर्ती किंवा प्रतिमेभोवती फिरवली जाते. आरती म्हणजे देवाला प्रकाश देणे आणि त्यांच्या सौंदर्याची स्तुती करणे. आरती मंत्रांचा उच्चार करून आणि देवाच्या नावाचा जप करून केली जाते. Shanta Durgechi:श्री शांतादुर्गेची आरती का म्हणावी? कसे म्हणावे? श्री शांतादुर्गेची आरती आपण घरी किंवा मंदिरात म्हणू शकता. आरतीचे शब्द आपण कोणत्याही भाषेत म्हणू शकता. आरती म्हणताना आपण देवीची मूर्ती किंवा प्रतिमा समोर बसून दीपक फिरवू शकता. कुठे शोधायची? श्री शांतादुर्गेची आरती आपल्याला इंटरनेटवर, भक्तिगीत पुस्तकांमध्ये किंवा मंदिरातून मिळू शकते. आपण YouTube वरूनही श्री शांतादुर्गेची आरती ऐकू शकता. नोट: आशा आहे की ही माहिती तुम्हाला उपयुक्त ठरेल. अधिक माहितीसाठी तुम्ही मला कोणतेही प्रश्न विचारू शकता. श्री शांतादुर्गेची कृपा असो! श्री शांतादुर्गेची आरती (Shri Shanta Durgechi Aarti) जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥ भूकैलासा ऐसी ही कवला नगरी ।शांतादुर्गा तेथे भक्तभवहारी ।असुराते मर्दुनिया सुरवरकैवारी ।स्मरती विधीहरीशंकर सुरगण अंतरी । जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥ प्रबोध तुझा नव्हे विश्वाभीतरी ।नेति नेति शब्दे गर्जती पै चारी ।साही शास्त्रे मथिता न कळीसी निर्धारी ।अष्टादश गर्जती परी नेणती तव थोरी । जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥ कोटी मदन रूपा ऐसी मुखशोभा ।सर्वांगी भूषणे जांबूनदगाभा ।नासाग्री मुक्ताफळ दिनमणीची प्रभा ।भक्तजनाते अभय देसी तू अंबा । जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥ अंबे भक्तांसाठी होसी साकार ।नातरी जगजीवन तू नव्हसी गोचर ।विराटरूपा धरूनी करीसी व्यापार ।त्रिगुणी विरहीत सहीत तुज कैचा पार । जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥ त्रितापतापे श्रमलो निजवी निजसदनी ।अंबे सकळारंभे राका शशीवदनी ।अगमे निगमे दुर्गे भक्तांचे जननी ।पद्माजी बाबाजी रमला तव भजनी । जय देवी जय देवी जय शांते जननी ।दुर्गे बहुदु:खदमने रतलो तव भजनी ॥

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NAVRATRI-दुर्गा सप्तशती चतुर्थ अध्याय चंड-मुंड का वध DURGA SAPTASHATI

दुर्गा सप्तशती का चतुर्थ अध्याय, जिसे “स्तुति और आशीर्वाद” का अध्याय भी कहा जाता है, देवी दुर्गा की महिमा और उनके द्वारा राक्षसों के वध के बाद देवताओं द्वारा की गई स्तुति पर केंद्रित है। इस अध्याय में प्रमुख असुर चंड और मुंड का वध होता है, और देवी चामुंडा के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। इसके बाद देवता देवी की स्तुति करते हैं और देवी उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं। दुर्गा सप्तशती चतुर्थ अध्याय का विस्तृत सार चंड-मुंड का वध (Killing of Chanda and Munda) दुर्गा सप्तशती असुरराज शुंभ और निशुंभ के आदेश से, उनके सेनापति चंड और मुंड देवी दुर्गा पर आक्रमण करने के लिए निकलते हैं। जब चंड और मुंड अपनी विशाल सेना लेकर देवी के पास पहुँचते हैं, तो देवी ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया। इस रौद्र रूप में देवी काली (या चामुंडा) का अवतार लेती हैं और अत्यंत क्रोध में आकर दोनों असुरों का वध कर देती हैं। श्लोक (Slokas related to the Killing of Chanda and Munda): प्रच्छाद्य चा चण्डमुण्डं महागजौ। जगाम दुष्टौ निहन्तुं महाबलौ। अर्थ: “देवी ने चंड और मुंड, जो बड़े गज (हाथी) के समान ताकतवर थे, को ढँक कर उनका संहार कर दिया।” चण्डं च मुण्डं च तया हतौ ततः। सा चामुण्डेति विख्याता भवेद्ध्यतः।। अर्थ: “चंड और मुंड के वध के बाद, देवी का नाम चामुंडा पड़ा, क्योंकि उन्होंने उन दोनों असुरों का वध किया था।” देवताओं द्वारा स्तुति (Praise by the Gods) चंड और मुंड के वध के बाद, सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी की स्तुति करने लगे। उन्होंने देवी की महिमा का गुणगान किया और उन्हें संसार की अधिष्ठात्री शक्तियों में से सबसे महत्वपूर्ण मानकर उनकी स्तुति की। देवी की स्तुति से जुड़े कुछ प्रमुख श्लोक (Important Slokas from the Praise of the Goddess): या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में बुद्धि रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” इस स्तुति में सभी देवताओं ने देवी को नमस्कार किया और कहा कि वे ही संसार के समस्त जीवों की रक्षक हैं। उनकी शक्ति और बुद्धि से ही संसार का संचालन होता है। देवताओं को आशीर्वाद (Blessings to the Gods) देवी की स्तुति से प्रसन्न होकर, उन्होंने देवताओं को आशीर्वाद दिया और उन्हें संकटों से मुक्त किया। उन्होंने कहा कि जब भी कोई असुर या अन्य संकट उत्पन्न होगा, वे स्वयं प्रकट होकर उनकी रक्षा करेंगी। इसके साथ ही, देवी ने यह भी कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करेगा, वह सभी संकटों से मुक्त होगा। वेदाहं सम्प्रतीतानि, वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ अर्थ: “मैं भूत, वर्तमान और भविष्य की सभी घटनाओं को जानती हूं, लेकिन मुझे कोई नहीं जान सकता।” चतुर्थ अध्याय के प्रमुख बिंदु (Key Takeaways from Fourth Chapter) चतुर्थ अध्याय का महत्व (Importance of Fourth Chapter) चतुर्थ अध्याय के मुख्य मंत्र (Main Mantras from Fourth Chapter) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह महामंत्र देवी चामुंडा की शक्ति का आह्वान करता है और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। यह मंत्र देवी की शक्ति को समर्पित है और उनकी सर्वव्यापी ऊर्जा का गुणगान करता है। चतुर्थ अध्याय से प्राप्त शिक्षा (Lessons from the Fourth Chapter) दुर्गा सप्तशती

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NAVRATRI-दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय धूम्रलोचन का अत्याचार Durga Saptashati

दुर्गा सप्तशती का तृतीय अध्याय देवी दुर्गा के अद्वितीय पराक्रम और उनके द्वारा असुरों के सेनापति धूम्रलोचन के वध का वर्णन करता है। यह अध्याय दिखाता है कि देवी दुर्गा केवल युद्ध कौशल में निपुण नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं सत्य और धर्म की अधिष्ठात्री हैं। इस अध्याय में असुरों द्वारा पुनः देवताओं पर आक्रमण का प्रयास किया जाता है, लेकिन देवी दुर्गा उन्हें अपनी महाशक्ति से नष्ट कर देती हैं। दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय का विस्तृत सार धूम्रलोचन का अत्याचार (Dhumralochan’s Attack) महिषासुर के वध के बाद, असुरों के शेष बचे अनुयायी और सेनापति अत्यंत क्रोधित थे। उनमें से एक असुर सेनापति धूम्रलोचन था। उसे असुरराज शुंभ और निशुंभ ने देवी दुर्गा को पराजित करने का आदेश दिया। धूम्रलोचन अपने विशाल सेना के साथ देवी पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा। उसने देवी को बंदी बनाने का प्रयास किया, लेकिन देवी दुर्गा की शक्ति के आगे वह असफल रहा। धूम्रलोचन और देवी का सामना (Dhumralochan Faces Devi Durga) जब धूम्रलोचन ने देवी से युद्ध करना चाहा, तो देवी दुर्गा ने अपनी दृष्टि मात्र से ही उसे भस्म कर दिया। यह देवी के “तृतीय नेत्र” की शक्ति थी, जो अत्यंत क्रोध में खुलकर प्रकट हुई थी। धूम्रलोचन के वध के बाद, उसकी सेना ने देवी पर आक्रमण किया, लेकिन देवी के वाहन सिंह ने असुरों की पूरी सेना को नष्ट कर दिया। श्लोक और मंत्र (Mantras and Shlokas from Third Chapter) तृतीय अध्याय में कई महत्वपूर्ण श्लोक और स्तुति प्रस्तुत किए गए हैं, जो देवी दुर्गा की शक्ति और पराक्रम का वर्णन करते हैं। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि। महिषासुरं वदेत्याहं पुनः शत्रून् जहि॥ अर्थ: “हे देवी, हमें रूप, विजय, यश और शत्रुओं का नाश प्रदान करें। महिषासुर के बाद अब शत्रुओं को नष्ट करें।” या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” धूम्रलोचन का वध (Dhumralochan’s Death by Goddess Durga) धूम्रलोचन जब देवी के सामने आता है, तो वह अत्यंत घमंड में होता है। वह देवी को बंदी बनाना चाहता है, लेकिन देवी की महाशक्ति के सामने वह असहाय हो जाता है। देवी ने मात्र एक दृष्टि से ही धूम्रलोचन का वध कर दिया। इस घटना ने सभी असुरों में भय फैला दिया और उन्हें अहसास हो गया कि देवी से पार पाना असंभव है। ततस्तं धूम्रलोचनं बलं चाशेषमर्दयत्। क्रोधसंवर्तया दृष्ट्या सा चासौ साग्निना हता।। अर्थ: “फिर देवी ने अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टि से धूम्रलोचन और उसकी सेना का संहार किया, और वे सब भस्म हो गए।” असुरों की सेना का नाश (Destruction of Dhumralochan’s Army) धूम्रलोचन के वध के बाद, उसकी सेना ने देवी पर हमला किया। लेकिन देवी दुर्गा के वाहन सिंह ने उन असुरों को मारकर नष्ट कर दिया। देवी ने अपने सिंह के साथ युद्ध में अद्वितीय कौशल दिखाया और असुरों की पूरी सेना का संहार कर दिया। देवी सिंह समारूढा शङ्खचक्रगदाधरा। असुराणां क्षयं कर्तुं देवी समुपकल्पिता।। अर्थ: “देवी दुर्गा अपने सिंह पर सवार होकर, शंख, चक्र, गदा आदि अस्त्रों से सुसज्जित होकर असुरों का विनाश करने के लिए तैयार हो गईं।” तृतीय अध्याय के प्रमुख बिंदु (Key Takeaways from Third Chapter) तृतीय अध्याय का महत्व (Importance of Third Chapter) दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय के मुख्य मंत्र (Main Mantras from Third Chapter) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। यह महामंत्र देवी दुर्गा की शक्तियों को आह्वान करता है और भक्तों को भयमुक्त एवं शक्तिशाली बनाता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थ: “वह देवी जो सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम।” तृतीय अध्याय से प्राप्त शिक्षा (Lessons from the Third Chapter) दुर्गा सप्तशती

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Karwa Chauth 2024 Date: करवा चौथ कब है? 21 मिनट के लिए लगेगी भद्रा, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, चांद निकलने का समय

Karwa Chauth 2024:करवा चौथ हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह व्रत पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना के लिए रखा जाता है। करवा चौथ विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है, लेकिन अब यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुका है। Karwa Chauth 2024 करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले “सारगी” खाती हैं और दिन भर निर्जला उपवास रखती हैं। व्रत का समापन रात में चंद्रमा को देखकर और अर्घ्य देकर किया जाता है। इस व्रत का खास महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसे वैवाहिक जीवन के प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। Karwa Chauth 2024:करवा चौथ 2024 की तारीख साल 2024 में करवा चौथ 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह दिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है। चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 20 अक्टूबर 2024 को सुबह 9:30 बजे होगा और इसका समापन 21 अक्टूबर 2024 को सुबह 9:59 बजे होगा। इसलिए, 20 अक्टूबर को करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा। भद्रा काल का प्रभाव ज्योतिषीय दृष्टि से, चतुर्थी तिथि पर भद्रा का समय विशेष ध्यान देने योग्य होता है। भद्रा को शुभ कार्यों के लिए अशुभ माना जाता है, और इसके दौरान पूजा करना वर्जित होता है। इस साल करवा चौथ पर भद्रा का समय भी आ रहा है, जो 21 मिनट का रहेगा। भद्रा काल शाम 6:08 बजे से 6:29 बजे तक रहेगा। इस दौरान पूजा करना वर्जित होगा। Karwa Chauth 2024 इसलिए, महिलाओं को इस समय के बाद ही पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भद्रा समाप्त होते ही पूजा शुरू की जा सकती है। Puja Muhurat:पूजा का शुभ मुहूर्त करवा चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त भद्रा के समाप्त होने के बाद शुरू होगा। इस साल Karwa Chauth 2024 करवा चौथ की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय शाम 6:29 बजे से रात 7:45 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा करेंगी और करवा चौथ की कथा सुनेंगी। पूजा में भगवान गणेश और माता पार्वती की आराधना के साथ-साथ करवा माता को विशेष रूप से पूजा जाता है। करवा एक मिट्टी का पात्र होता है, जिसे जल से भरकर पूजा में रखा जाता है और अंत में चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए उपयोग किया जाता है। Diwali 2024: 31 अक्टूबर या 01 नवंबर, कब है दिवाली? यहां दूर होगी असमंजस की स्थिति Karwa Chauth 2024 Date:चंद्रमा निकलने का समय करवा चौथ के व्रत का समापन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद होता है। Karwa Chauth 2024 इस दिन महिलाएं चंद्रमा के दर्शन के बाद ही अपना व्रत तोड़ती हैं। साल 2024 में चंद्रमा के उदय होने का समय रात 8:11 बजे रहेगा। इसके बाद महिलाएं चंद्रमा को जल अर्पित करके अपने व्रत का समापन करेंगी और फिर पति के हाथों से जल ग्रहण करके व्रत तोड़ेंगी। Karwa Chauth 2024 Puja Vidhi:करवा चौथ की पूजा विधि उपसंहार करवा चौथ Karwa Chauth 2024 विवाहित महिलाओं के लिए एक विशेष त्यौहार है, जो उनके पति के प्रति उनके प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। 2024 में करवा चौथ 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, और पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6:29 बजे से रात 7:45 बजे तक रहेगा। चंद्रमा का उदय रात 8:11 बजे होगा, और इस समय के बाद महिलाएं अपना व्रत खोलेंगी। भद्रा काल के दौरान पूजा नहीं करनी चाहिए, इसलिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Diwali 2024: 31 अक्टूबर या 01 नवंबर, कब है दिवाली? यहां दूर होगी असमंजस की स्थिति

Diwali 2024:दिवाली 2024 का इंतजार हर कोई कर रहा है, क्योंकि यह हिंदू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा त्यौहार है। लेकिन इस साल एक सवाल जो लोगों के मन में है, वह है कि दिवाली 2024 में 31 अक्टूबर को मनाई जाएगी या 1 नवंबर को। इस प्रकार की असमंजस की स्थिति अक्सर पंचांग और तिथियों के भिन्न-भिन्न गणना के कारण उत्पन्न होती है, लेकिन आइए इसे स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास करते हैं। Diwali 2024 Subh Muhurat:दिवाली का शुभ मुहूर्त 01 नवंबर को मां लक्ष्मी की पूजा (Diwali 2024 Shubh Muhurat) करने का शुभ मुहूर्त संध्याकाल 05 बजकर 36 मिनट से लेकर 06 बजकर 16 मिनट तक है। इस दौरान आप मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं। Diwali ka Importance:दिवाली का महत्व दिवाली, जिसे “दीपावली” के नाम से भी जाना जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन भगवान राम के अयोध्या लौटने और रावण पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में दीप जलाए जाते हैं। साथ ही, माता लक्ष्मी की पूजा भी इस दिन की जाती है, जो धन, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती हैं। दिवाली का मुख्य दिन लक्ष्मी पूजा का होता है, जो अमावस्या की रात को आता है। Kab hai diwali 2024:31 अक्टूबर या 1 नवंबर, कब है दिवाली? diwali 2024 में दिवाली को लेकर कुछ संशय इसलिए है क्योंकि पंचांगों में तिथियों को लेकर मतभेद है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर 2024 को रात में 1:40 बजे से शुरू होगी और 1 नवंबर 2024 को रात में 1:06 बजे समाप्त होगी। इस कारण कुछ लोग 31 अक्टूबर को दिवाली मनाने की बात कर रहे हैं, जबकि अन्य 1 नवंबर को लक्ष्मी पूजा का दिन मान रहे हैं। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब अमावस्या तिथि दो दिनों में फैली होती है। ऐसे में यह निर्णय लिया जाता है कि किस दिन अमावस्या का अधिक प्रभाव है और पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा है। ज्यादातर जगहों पर, दिवाली उस दिन मनाई जाती है जब सूर्यास्त के समय अमावस्या होती है। इस हिसाब से Diwali 2024 1 नवंबर को लक्ष्मी पूजा के लिए अधिक मान्यता दी जा रही है। Kis din Manaye Diwali:किस दिन मनाएं दिवाली? धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषियों की राय के अनुसार, 1 नवंबर 2024 को दिवाली Diwali 2024 मनाना अधिक उपयुक्त होगा। इस दिन अमावस्या तिथि पूरे दिन रहेगी, और शाम को लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त भी मिलेगा। हालांकि, 31 अक्टूबर को भी कुछ लोग दीपावली मना सकते हैं, लेकिन मुख्य पूजा और अनुष्ठान 1 नवंबर को ही किए जाएंगे। Diwali 2024 puja vidhi:दिवाली की पूजा विधि दिवाली के दिन शाम को मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। घरों को दीपों से सजाया जाता है, ताकि मां लक्ष्मी का वास हो और समृद्धि का आशीर्वाद मिले। इस दिन विशेष रूप से साफ-सफाई का महत्व होता है, क्योंकि इसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय लक्ष्मी स्तोत्र, गणेश वंदना और विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जाता है। उपसंहार दिवाली 2024 में कुछ भ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न हो रही है क्योंकि अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर और 1 नवंबर दोनों दिन पड़ रही है। लेकिन ज्योतिषीय गणना और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर 1 नवंबर 2024 को दिवाली मनाना सबसे सही रहेगा। इस दिन अमावस्या का पूरा प्रभाव रहेगा, और लक्ष्मी पूजा का सही मुहूर्त भी उपलब्ध होगा। diwali mai puja kaise kare:ऐसे करें पूजा Diwali me kya karna chahiye:करें ये कार्य Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Shardiya Navratri 2024 Date: कब से शुरू हो रही शारदीय नवरात्रि? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और महत्व

Shardiya Navratri 2024 Date: शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। इन दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत पूजा करने का विधान है। जानें सही तिथि Shardiya Navratri 2024:शारदीय नवरात्रि हिन्दू धर्म में एक प्रमुख त्यौहार है, जो देवी दुर्गा की आराधना के लिए समर्पित है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसे पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि 2024 की तारीख 3 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक है। यह त्यौहार 9 दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। Shardiya Navratri 2024:शारदीय नवरात्रि का महत्व शारदीय नवरात्रि का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत बड़ा है। यह पर्व शक्ति की देवी दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। नवरात्रि का अर्थ होता है ‘नौ रातें’, और इन नौ रातों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, क्योंकि इसी समय मां दुर्गा ने महिषासुर राक्षस का वध किया था। इन नौ दिनों में साधक विशेष व्रत, उपवास और ध्यान के माध्यम से आत्मशुद्धि करते हैं और देवी की कृपा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि की तिथियाँ 2024 2024 में शारदीय नवरात्रि 3 अक्टूबर से शुरू होगी और 11 अक्टूबर को समाप्त होगी। इस दौरान हर दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाएगी। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि व्रत और पूजा विधि नवरात्रि के दौरान भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं। यह उपवास शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान भक्त सिर्फ फलाहार और दूध का सेवन करते हैं और अनाज, प्याज, लहसुन से परहेज करते हैं। प्रत्येक दिन की पूजा में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है और मां दुर्गा की आरती की जाती है। पूजा के अंत में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जिसमें छोटी बच्चियों को देवी का रूप मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराकर आशीर्वाद लिया जाता है। Shardiya Navratri 2024:नवरात्रि के अंतिम दिन और दशहरा शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के उपरांत दशमी के दिन दशहरा या विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन भगवान राम की रावण पर विजय और मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। इस दिन रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। Shardiya Navratri 2024:किस पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा धरती पर ही वास करती हैं। ऐसे में वह किसी न किसी वाहन में सवार होकर आती हैं और वापसी भी इसी तरह करती हैं। श्लोक शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे।गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ देवी भागवत पुराण के इस श्लोक के अनुसार, वार के अनुसार देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन का निर्णय लिया जाता है। अगर नवरात्रि सोमवार या रविवार को होती है, तो मां हाथी में , मंगलवार या शनिवार को घोड़ा।शुक्रवार को मां डोली और गुरुवार को डोली में आती हैं। इसके साथ ही बुधवार के दिन आती है, तो नौका में सवार होकर आती हैं। बता दें कि इस बार शारदीय नवरात्रि गुरुवार के दिन शुरू हो रही है। इसलिए मां का आगमन डोली से हो रहा है। मान्यता है कि मां का डोली से आना सुख-समृद्धि लेकर आता है। समापन शारदीय नवरात्रि 2024 का समय देवी दुर्गा की आराधना, साधना और आत्मचिंतन का महत्वपूर्ण समय होगा। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में शुद्धता, सत्य और धर्म का मार्ग अपनाकर हम किसी भी प्रकार की बुराई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

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Mahishasura Mardini Stotram – Aigiri Nandini महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि 

Mahishasura Mardini Stotram:महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि: एक विस्तृत विश्लेषण Mahishasura Mardini Stotram:महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिमय स्तोत्र है जो देवी दुर्गा की स्तुति करता है। इस स्तोत्र का एक विशेष रूप ‘अयि गिरिनन्दिनि’ नाम से जाना जाता है। ‘गिरिनन्दिनि’ का अर्थ है ‘पर्वत की पुत्री’, जो देवी दुर्गा का एक विशिष्ट नाम है। Mahishasura Mardini Stotram:स्तोत्र का महत्व यह स्तोत्र देवी दुर्गा की शक्ति, साहस और बुराई पर विजय प्राप्त करने की क्षमता का गुणगान करता है। यह स्तोत्र न केवल भक्तों के मन में देवी के प्रति श्रद्धा और भक्ति जगाता है, बल्कि उन्हें बुराई के खिलाफ लड़ने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। Mahishasura Mardini Stotram:स्तोत्र की विशेषताएं Mahishasura Mardini Stotram:स्तोत्र का अर्थ और व्याख्या ‘अयि गिरिनन्दिनि’ स्तोत्र में देवी दुर्गा को विभिन्न नामों से पुकारा गया है और उनकी शक्ति और गुणों का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा को ब्रह्मांड की रक्षिका और बुराई का नाश करने वाली देवी के रूप में चित्रित करता है। Mahishasura Mardini Stotram:स्तोत्र का लाभ निष्कर्ष महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिमय स्तोत्र है जो देवी दुर्गा की महानता का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। क्या आप इस स्तोत्र के बारे में अधिक जानना चाहते हैं? या आप जानना चाहते हैं कि इस स्तोत्र को कैसे गाया जाता है? यहां कुछ अतिरिक्त जानकारी दी गई है: Mahishasura Mardini Stotram – Aigiri Nandini अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरतेदनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरतेशिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपतेरिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृतेचतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरेत्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटकेकनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥ जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरतेविरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपतेत्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललतेसकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचेजितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

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अथ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला – श्री दुर्गा द्वात्रिंशत नाम माला (Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala)

Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala दुर्गा दुर्गार्ति शमनी दुर्गापद्विनिवारिणी ।दुर्गामच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी । दुर्गतोद्वारिणी दुर्ग निहन्त्री दुर्गमापहण ।दुर्गम ज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी । दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी । दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ।दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी । दुर्गमाङ्गी दुर्गमाता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ।दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्लभा दुर्गधारिणी । नामावली ममायास्तु दुर्गया मम मानसः ।पठेत् सर्व भयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः । Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala:अथ श्री दुर्गा बत्तीस नामवली स्त्रोत | श्री दुर्गा बत्तीस नामवली | मां दुर्गा के 32 चमत्कारी नाम एक समय की बात है, ब्रह्मा आदि देवताओ ने पुष्प आदि विविध उपचारों से महेश्वरी दुर्गा का पूजन किया। इस से प्रसन्न होकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा ने कहा: देवताओं! मैं तुम्हारे पूजन से संतुष्ट हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो, मैं दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करुँगी। दुर्गा का यह वचन सुनकर देवता बोले: देवी! हमारे शत्रु महिषासुर को, जो तीनों लोकों के लिए कंटक था, आपने मार डाला, इस से सम्पूर्ण जगत स्वस्थ एवं निर्भय हो गया। आपकी कृपा से हमें पुनः अपने-अपने पद की प्राप्ति हुई है। आप भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं, हम आपकी शरण में आये हैं, अतः अब हमारे मन में कुछ भी पाने की अभिलाषा शेष नहीं हैं। हमें सब कुछ मिल गया। तथापि आपकी आज्ञा हैं, इसलिए हम जगत की रक्षा के लिए आप से कुछ पूछना चाहते हैं। महेश्वरी! कौन-सा ऐसा उपाय हैं, जिस से शीघ्र प्रसन्न होकर आप संकट में पड़े हुए जीव की रक्षा करती हैं। देवेश्वरी! यह बात सर्वथा गोपनीय हो तो भी हमें अवश्य बतावें। Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala:देवताओं के इस प्रकार प्रार्थना करने पर दयामयी दुर्गा देवी ने कहा: देवगण! सुनो-यह रहस्य अत्यंत गोपनीय और दुर्लभ हैं। मेरे बत्तीस नामों की माला सब प्रकार की आपत्ति का विनाश करने वाली हैं। तीनों लोकों में इस के समान दूसरी कोई स्तुति नहीं हैं। यह रहस्यरूप हैं। इसे बतलाती हूँ, सुनो –१) दुर्गा,२) दुर्गार्तिशमनी,३) दुर्गापद्विनिवारिणी,४) दुर्गमच्छेदिनी,५) दुर्गसाधिनी,६) दुर्गनाशिनी,७) दुर्गतोद्धारिणी ,८) दुर्गनिहन्त्री,९) दुर्गमापहा,१०) दुर्गमज्ञानदा,११) दुर्गदैत्यलोकदवानला,१२) दुर्गमा,१३) दुर्गमालोका,१४) दुर्गमात्मस्वरूपिणी,१५) दुर्गमार्गप्रदा,१६) दुर्गमविद्या,१७) दुर्गमाश्रिता,१८) दुर्गमज्ञानसंस्थाना,१९) दुर्गमध्यानभासिनी,२०) दुर्गमोहा,२१) दुर्गमगा,२२) दुर्गमार्थस्वरूपिणी,२३) दुर्गमासुरसंहन्त्री,२४) दुर्गमायुधधारिणी,२५) दुर्गमांगी,२६) दुर्गमता,२७) दुर्गम्या,२८) दुर्गमेश्वरी,२९) दुर्गभीमा,३०) दुर्गभामा,३१) दुर्गभा३२) दुर्गदारिणी जो मनुष्य मुझ दुर्गा की इस नाममाला का यह पाठ करता हैं, वह निःसंदेह सब प्रकार के भय से मुक्त हो जायेगा।’ Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala कोई शत्रुओं से पीड़ित हो अथवा दुर्भेद्य बंधन में पड़ा हो, इन बत्तीस नामों के पाठ मात्र से संकट से छुटकारा पा जाता हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं हैं। यदि राजा क्रोध में भरकर वध के लिए अथवा और किसी कठोर दंड के लिए आज्ञा दे दे या युद्ध में शत्रुओं द्वारा मनुष्य घिर जाए अथवा वन में व्याघ्र आदि हिंसक जंतुओं के चंगुल में फंस जाए तो इन बत्तीस नामों का एक सौ आठ बार पाठ मात्र करने से वह सम्पूर्ण भयों से मुक्त हो जाता हैं। विपत्ति के समय इस के समान भयनाशक उपाय दूसरा नहीं हैं। देवगण! इस नाममाला का पाठ करने वाले मनुष्यो की कभी कोई हानि नहीं होती। अभक्त, नास्तिक और शठ मनुष्य को इसका उपदेश नहीं देना चाहिए। जो भारी विपत्ति में पड़ने पर भी इस नामावली का हजार, दस हजार अथवा लाख बार पाठ करता हैं, स्वयं करता या ब्राह्मणो से कराता हैं, वह सब प्रकार की आपत्तियों से मुक्त हो जाता हैं। सिद्ध अग्नि में मधुमिश्रित सफ़ेद तिलों से इन नामों द्वारा लाख बार हवन करे तो मनुष्य सब विपत्तियों से छूट जाता हैं। इस नाममाला का पुरश्चरण तीस हजार का हैं। पुरश्चरणपूर्वक पाठ करने से मनुष्य इसके द्वारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध कर सकता हैं। मेरी सुन्दर मिट्टी की अष्टभुजा मूर्ति बनावे, आठों भुजाओं में क्रमशः गदा, खड्ग, त्रिशूल, बाण, धनुष, कमल, खेट (ढाल) और मुद्गर धारण करावें। Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala:मूर्त्ति के मस्तक पर चन्द्रमा का चिन्ह हो, उसके तीन नेत्र हों, उसे लाल वस्त्र पहनाया गया हों, वह सिंह के कंधे पर सवार हो और शूल से महिषासुर का वध कर रही हो, इस प्रकार की प्रतिमा बनाकर नाना प्रकार की सामग्रियों से भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करे। मेरे उक्त नमो से लाल कनेर के फूल चढ़ाते हुए सौ बार पूजा करे और मंत्र जाप करते हुए पुए से हवन करे। भांति-भांति के उत्तम पदार्थ का भोग लगावे। इस प्रकार करने से मनुष्य असाध्य कार्य को भी सिद्ध कर लेता हैं। जो मानव प्रतिदिन मेरा भजन करता हैं, वह कभी विपत्ति में नहीं पड़ता।’ Shri Durga Dwatrinshat Nam Mala:देवताओं से ऐसा कह कर जगदम्बा वहीँ अंतर्धान हो गयीं। दुर्गा जी के इस उपाख्यान को जो सुनते हैं, उन पर कोई विपत्ति नहीं आती।

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