2023

Vikram Betaal:विक्रम बेताल की कहानी: राजा चन्द्रसेन और नवयुवक सत्वशील

राजा चन्द्रसेन और नवयुवक सत्वशील Vikram Betaal बहुत समय पहले की बात है जब समुद्र किनारे बसे एक नगर ताम्रलिपि पर राजा चंद्रसेन का राज हुआ करता था। राजा चंद्रसेन एक वीर और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी प्रजा उनसे बहुत प्यार करती थी। एक दिन राजा चंद्रसेन अपने सैनिकों के साथ भ्रमण कर रहे थे। कड़ी धूप होने के कारण राजा को काफी तेज प्यास लगी। तभी उन्होंने एक युवक को देखा जो एक तालाब से पानी भर रहा था। राजा ने युवक से पानी मांगा। युवक ने तुरंत राजा को पानी दिया। राजा ने युवक की इस उदारता की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने युवक से उसका नाम पूछा। युवक ने अपना नाम सत्वशील बताया। सत्वशील एक गरीब परिवार से था, लेकिन वह बहुत मेहनती और दयालु था। राजा चंद्रसेन ने सत्वशील को अपने दरबार में नौकरी दी। सत्वशील ने अपनी मेहनत और लगन से राजा का विश्वास जीत लिया। राजा चंद्रसेन ने सत्वशील को अपने सबसे करीबी सहयोगियों में से एक बना दिया। एक दिन राजा चंद्रसेन को एक खबर मिली कि एक टापू पर एक क्रूर राजा रहता है। वह टापू के लोगों को बहुत सताता है। राजा चंद्रसेन ने सत्वशील को उस टापू पर जाकर क्रूर राजा को हराने का आदेश दिया। सत्वशील ने राजा के आदेश का पालन किया। वह अपने सैनिकों के साथ टापू पर गया। सत्वशील ने क्रूर राजा से युद्ध किया और उसे हराकर टापू पर जीत हासिल कर ली। टापू के लोग सत्वशील के आने से बहुत खुश हुए। उन्होंने सत्वशील को अपना राजा घोषित कर दिया। सत्वशील ने टापू के लोगों का बहुत अच्छा शासन किया। वह एक न्यायप्रिय और दयालु राजा था। राजा चंद्रसेन ने सत्वशील की इस वीरता की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने सत्वशील की बेटी से उसकी शादी कर दी। सत्वशील और राजा चंद्रसेन दोनों ही बहुत अच्छे मित्र थे। उन्होंने मिलकर कई वीरतापूर्ण कार्य किए। Betaal बेताल का प्रश्न बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, “राजन, राजा चंद्रसेन और सत्वशील, दोनों में से सबसे बलवान कौन था?” राजा विक्रम ने सोच-समझकर उत्तर दिया, “सत्वशील ज्यादा शक्तिशाली था।” Betaal बेताल ने पूछा, “क्यों?” राजा विक्रम ने कहा, “राजा चंद्रसेन की शक्तियां बाहरी थीं। वह एक वीर योद्धा थे और उनके पास कई शक्तिशाली हथियार थे। लेकिन सत्वशील की शक्तियां आंतरिक थीं। वह एक दयालु और करुणावान व्यक्ति थे। उनकी शक्तियां प्रेम, करुणा और न्याय थीं।” बेताल राजा विक्रम के उत्तर से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने राजा विक्रम से कहा, “तुमने सही उत्तर दिया है। सत्वशील वास्तव में एक महान व्यक्ति थे। उनकी शक्तियां वास्तव में आंतरिक थीं।” राजा विक्रम ने बेताल को अपने कंधे पर बैठाया और आगे की यात्रा पर निकल पड़े।

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Vikram Betaal विक्रम बेताल की कहानी:पत्नी किसकी है ?

गंधर्वसेन और काली देवी Vikram Betaal एक समय की बात है, धर्मपुर नाम के नगर में गंधर्वसेन नाम का युवक रहता था। गंधर्वसेन की कद-काठी बहुत आकर्षक थी। यही कारण था कि कई लड़कियां उससे विवाह करना चाहती थीं, लेकिन गंधर्वसेन को उनमें से एक भी लड़की पसंद नहीं थी। ब्राहमण पुत्र गंधर्वसेन जब अपने घोड़े पर सवार होकर नगर में निकलता था तो सारी लड़कियां उसे देखती रह जातीं। गंधर्वसेन किसी की तरफ नहीं देखता और तेज गति से नगर को पार करके रोजाना एक मंदिर की ओर निकल जाता था। यह मंदिर काली देवी का मंदिर था। गंधर्वसेन काली मां का बहुत बड़ा भक्त था। वो हर दिन मां काली की पूजा किया करता था। एक दिन, गंधर्वसेन मंदिर में पूजा कर रहा था कि अचानक उसे एक स्वर सुनाई दिया। स्वर ने कहा, “गंधर्वसेन, तुम्हारी भक्ति मुझे बहुत अच्छी लगती है। मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी करूंगी।” गंधर्वसेन बहुत खुश हुआ। उसने कहा, “माँ, मैं आपकी बहुत आभारी हूं। मेरी एक इच्छा है कि मुझे आपकी एक सच्ची भक्त पत्नी मिल जाए।” काली माता ने कहा, “तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।” कुछ दिनों बाद, गंधर्वसेन मंदिर में पूजा कर रहा था कि उसे एक सुंदर युवती दिखाई दी। युवती ने गंधर्वसेन से कहा, “मैं तुम्हारी पत्नी बनने के लिए तैयार हूं।” गंधर्वसेन बहुत खुश हुआ। उसने युवती से उसका नाम पूछा। युवती ने कहा, “मेरा नाम विद्या है।” विद्या और गंधर्वसेन का विवाह हो गया। विद्या एक बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान युवती थी। वह गंधर्वसेन की बहुत अच्छी पत्नी बनी। गंधर्वसेन और विद्या बहुत खुशी-खुशी साथ रहने लगे। एक दिन, गंधर्वसेन और विद्या मंदिर में पूजा कर रहे थे कि अचानक एक राक्षस ने मंदिर पर हमला कर दिया। राक्षस बहुत शक्तिशाली था। उसने गंधर्वसेन और विद्या को मारने की कोशिश की। विद्या ने गंधर्वसेन को बचाने के लिए अपने प्राण त्याग दिए। गंधर्वसेन बहुत दुखी हुआ। उसने काली माता से विद्या को वापस जीवित करने की प्रार्थना की। काली माता ने गंधर्वसेन की प्रार्थना सुन ली। उन्होंने विद्या को वापस जीवित कर दिया। गंधर्वसेन और विद्या बहुत खुश हुए। वे काली माता का आभार व्यक्त करने लगे। काली माता ने कहा, “मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें एक वरदान दूंगी।” गंधर्वसेन ने कहा, “माँ, मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए। बस मेरी पत्नी विद्या हमेशा मेरे साथ रहे।” काली माता ने कहा, “तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।” गंधर्वसेन और विद्या का जीवन सुख-शांति से बीतने लगा। वे काली माता के भक्त बने रहे। शिक्षा इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति से कोई भी इच्छा पूरी हो सकती है।

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Vikram Betaal विक्रम बेताल की कहानी: असली वर कौन है ?

Vikram Betaal विक्रम बेताल की कहानियों में एक कहानी है जिसमें एक राजकुमारी है जिसे दो राजकुमारों ने अपना वर बनाना चाहा। एक राजकुमार बहुत धनी और शक्तिशाली था, जबकि दूसरा राजकुमार बहुत सुंदर और बुद्धिमान था। राजकुमारी दोनों राजकुमारों से प्यार करती थी और यह तय नहीं कर पा रही थी कि किसे अपना वर बनाना चाहिए। एक दिन, राजकुमारी ने बेताल से सलाह मांगी। बेताल ने राजकुमारी को एक कहानी सुनाई और कहा कि कहानी के अंत में जो सवाल पूछा जाएगा, उसका जवाब राजकुमारी को यह तय करने में मदद करेगा कि किसे अपना वर बनाना चाहिए। कहानी सुनने के बाद, राजकुमारी ने बेताल से कहा कि वह सवाल पूछे। बेताल ने पूछा, “असली वर कौन है?” राजकुमारी ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, “असली वर वह है जो मुझे सबसे अधिक खुशी दे सकता है।” बेताल ने कहा, “तुमने सही उत्तर दिया है। असली वर वह है जो तुम्हें सबसे अधिक खुशी दे सकता है। धन और शक्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करोगी जो तुम्हें खुश नहीं कर सकता, तो तुम जीवन भर दुखी रहोगी।” राजकुमारी ने बेताल की बात मानी और उस राजकुमार से शादी की जो उसे सबसे अधिक खुशी दे सकता था। वह राजकुमार सुंदर और बुद्धिमान था, और वह राजकुमारी को बहुत प्यार करता था। राजकुमारी और राजकुमार बहुत खुशी से साथ रहे। इस कहानी से यह सीख मिलती है कि असली वर वह है जो हमें सबसे अधिक खुशी दे सकता है। धन और शक्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हम किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करते हैं जो हमें खुश नहीं कर सकता, तो हम जीवन भर दुखी रहेंगे।

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Vikram Betaal : विक्रम बेताल की कहानी: बड़ा बलिदान किसका

Vikram Betaal विक्रम बेताल की कहानी: बड़ा बलिदान एक बार, विक्रम राजा एक जंगल में घूम रहे थे। अचानक, उन्हें एक बेताल मिला। बेताल ने कहा, “हे विक्रम, मैं एक कहानी सुनाना चाहता हूं। अगर तुम मुझे बता सको कि कहानी में सबसे बड़ा बलिदान किसका था, तो मैं तुम्हें आजाद कर दूंगा। लेकिन अगर तुम नहीं बता सको, तो तुम्हें मुझे अपना सिर देना होगा।” विक्रम को बेताल की कहानी सुनने में दिलचस्पी थी। उन्होंने कहा, “ठीक है, मैं तुम्हारी कहानी सुनने के लिए तैयार हूं।” बेताल ने कहा, “एक बार की बात है, एक राजा था जिसका नाम रोहण था। उसके पास एक बहुत ही खूबसूरत पत्नी थी जिसका नाम चंद्रमुखी था। चंद्रमुखी को एक डायन ने श्राप दिया था कि वह एक महीने के बाद मर जाएगी। रोहण ने अपनी पत्नी को बचाने के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन कोई भी उसे श्राप से नहीं बचा सका। अंत में, रोहण ने एक निर्णय लिया। उसने कहा, “मैं अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।” रोहण ने अपनी पत्नी के सिर पर अपना सिर रख दिया और उसने अपनी जान दे दी। चंद्रमुखी को रोहण की बलिदान से बहुत दुख हुआ। उसने भी अपनी जान दे दी। अब, बताओ कि इस कहानी में सबसे बड़ा बलिदान किसका था?” विक्रम ने कुछ देर सोचा, और फिर कहा, “मैं समझता हूं कि रोहण का बलिदान बहुत बड़ा था। उसने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए अपना जीवन दे दिया। लेकिन मैं कहूंगा कि चंद्रमुखी का बलिदान भी उतना ही बड़ा था। उसने अपने पति के बलिदान के बाद अपनी जान दे दी। दोनों ने एक-दूसरे के लिए बहुत प्यार किया था। रोहण ने अपनी पत्नी को बचाने के लिए अपना जीवन दिया, और चंद्रमुखी ने अपने पति के बलिदान के बाद अपनी जान दे दी। दोनों ने एक-दूसरे के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। इसलिए, मैं कहूंगा कि इस कहानी में सबसे बड़ा बलिदान दोनों का था।” बेताल ने कहा, “तुम्हारी बात सही है। इस कहानी में दोनों का बलिदान बहुत बड़ा था। तुमने सही जवाब दिया है। इसलिए, मैं तुम्हें आजाद कर देता हूं।” बेताल एक झटके में गायब हो गया। विक्रम खुश थे कि उन्होंने बेताल को सही जवाब दिया था। वे अपने रास्ते पर चले गए। यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार के लिए बलिदान करना सबसे बड़ा बलिदान है।

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Maa Durga 108 Names: करें मां के 108 नामों का जाप, बनी रहती है मां की कृपा

माँ दुर्गा के 108 नाम माँ दुर्गा को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे हिंदू धर्म की सबसे प्रमुख देवी हैं, और उन्हें कई नामों से जाना जाता है। इनमें से कुछ नाम निम्नलिखित हैं: इनके अलावा, देवी दुर्गा को अन्य कई नामों से भी जाना जाता है, जैसे: Mata Durga:माता दुर्गा के 5 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान इन सभी नामों का अपना एक विशेष अर्थ है। देवी दुर्गा को इन नामों से पुकारने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। Maa Durga 108 Names माँ दुर्गा के 108 नाम List सती, साध्वी, भवप्रीता, भवानी, भवमोचनी, आर्या, दुर्गा, जया, आद्या, त्रिनेत्रा, शूलधारिणी, पिनाकधारिणी, चित्रा, चंद्रघंटा, महातपा, मन, बुद्धि, अहंकारा, चित्तरूपा, चिता, चिति, सर्वमंत्रमयी, सत्ता, सत्यानंदस्वरुपिणी, अनंता, भाविनी, भव्या, अभव्या, सदागति, शाम्भवी, देवमाता, चिंता, रत्नप्रिया, सर्वविद्या, दक्षकन्या, दक्षयज्ञविनाशिनी, अपर्णा, अनेकवर्णा, पाटला, पाटलावती, पट्टाम्बरपरिधाना, कलमंजरीरंजिनी, अमेयविक्रमा, क्रूरा, सुंदरी, सुरसुंदरी, वनदुर्गा, मातंगी, मतंगमुनिपूजिता, ब्राह्मी, माहेश्वरी, ऐंद्री, कौमारी, वैष्णवी, चामुंडा, वाराही, लक्ष्मी, पुरुषाकृति, विमला, उत्कर्षिनी, ज्ञाना, क्रिया, नित्या, बुद्धिदा, बहुला, बहुलप्रिया, सर्ववाहनवाहना, निशुंभशुंभहननी, महिषासुरमर्दिनी, मधुकैटभहंत्री, चंडमुंडविनाशिनी, सर्वसुरविनाशा, सर्वदानवघातिनी, सर्वशास्त्रमयी, सत्या, सर्वास्त्रधारिणी, अनेकशस्त्रहस्ता, अनेकास्त्रधारिणी, कुमारी, एककन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढ़ा, प्रौढ़ा, वृद्धमाता, बलप्रदा, महोदरी, मुक्तकेशी, घोररूपा, महाबला, अग्निज्वाला, रौद्रमुखी, कालरात्रि, तपस्विनी, नारायणी, भद्रकाली, विष्णुमाया, जलोदरी, शिवदुती, कराली, अनंता, परमेश्वरी, कात्यायनी, सावित्री, प्रत्यक्षा और ब्रह्मावादिनी।

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Vikram Betaal:विक्रम बेताल की कहानी: पति कौन है?

एक बार की बात है, एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसकी एक सुंदर बेटी थी। एक दिन, एक भिक्षु ब्राह्मण के घर आया। भिक्षु ने ब्राह्मण की बेटी से शादी करने की इच्छा जताई। ब्राह्मण की बेटी ने शादी करने से मना कर दिया। भिक्षु ने ब्राह्मण की बेटी को धमकी दी कि अगर उसने शादी नहीं की, तो वह उसे श्राप दे देगा। ब्राह्मण की बेटी बहुत डरी हुई थी। उसने अपने पिता से कहा कि वह भिक्षु से शादी करने के लिए तैयार है। ब्राह्मण ने अपनी बेटी की शादी भिक्षु से कर दी। शादी के बाद, भिक्षु ने ब्राह्मण की बेटी को एक जंगल में ले जाकर उसे एक कमरे में बंद कर दिया। भिक्षु ने ब्राह्मण की बेटी से कहा कि वह उसे कभी नहीं छोड़ेगा। ब्राह्मण की बेटी बहुत दुखी थी। वह जंगल से भागने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पा रही थी। एक दिन, उसने एक राक्षस को देखा। ब्राह्मण की बेटी ने राक्षस से मदद मांगी। राक्षस ने ब्राह्मण की बेटी की मदद करने का फैसला किया। उसने ब्राह्मण की बेटी को जंगल से बाहर निकाल दिया। ब्राह्मण की बेटी बहुत खुश थी। उसने राक्षस को धन्यवाद दिया। राक्षस ने ब्राह्मण की बेटी से कहा, “तुम अब किसी और से शादी कर सकती हो। मैं तुम्हारा पति नहीं हूं।” ब्राह्मण की बेटी ने पूछा, “तो आप कौन हैं?” राक्षस ने कहा, “मैं तुम्हारी मां का भूत हूं। मैं तुम्हारी मदद करने आया था।” ब्राह्मण की बेटी ने अपने माता-पिता का आशीर्वाद लिया और एक अच्छे घर में शादी कर ली। वह बहुत खुश थी। बेताल का प्रश्न कहानी सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन, इस कहानी में पति कौन है?” राजा विक्रमादित्य ने सोच-समझकर कहा, “इस कहानी में कोई पति नहीं है। ब्राह्मण की बेटी की शादी भिक्षु से हुई थी, लेकिन भिक्षु ने उसे कैद कर लिया था। राक्षस ने उसे जंगल से बाहर निकाला था, लेकिन राक्षस ने कहा था कि वह उसका पति नहीं है। इसलिए, इस कहानी में पति कोई नहीं है।” बेताल ने राजा विक्रमादित्य की प्रशंसा की और कहा, “राजन, तुमने सही उत्तर दिया है। इस कहानी में कोई पति नहीं है।” कहानी का सार यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम और विश्वास ही विवाह के आधार हैं। कहानी से सीख चतुराई और बुद्धि से बड़ी से बड़ी समस्या को हल किया जा सकता है।

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Vikram Betaal:विक्रम बेताल की कहानी: पापी कौन है

(Vikram Betaal) एक बार की बात है, काशी में एक राजा था, जिसका नाम प्रताप मुकुट था। उसकी एक संतान थी, जिसका नाम वज्रमुकुट था। वज्रमुकुट एक साहसी और न्यायप्रिय राजकुमार था। एक दिन, वह अपने दीवान के बेटे के साथ शिकार करने जंगल गया। काफी घूमने के बाद उन दोनों को एक तालाब दिखा, जिसमें कमल खिले थे और हंस उड़ रहे थे। दोनों दोस्तों ने वहां रुककर तालाब के पानी से हाथ-मुंह धोया और पास ही बने महादेव के मंदिर में दर्शन करने चले गए। मंदिर में दर्शन करने के बाद, वे दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए। तभी, एक सुंदर राजकुमारी वहां आई। राजकुमारी ने कमल के फूल को बालों से निकालकर कानों से लगाया, फिर दांत से कुतरा, फिर पांव से दबाया और अंत में सीने से लगा लिया। दीवान का बेटा राजकुमारी के इस इशारे को समझ गया और उसने राजकुमार को बताया कि राजकुमारी का कहना है कि वह कर्नाटक से है। उसके पिता का नाम दंतावट है। उसका नाम पद्मावती है और अब वह राजकुमार के हृदय में बस चुकी है। यह सुनकर राजकुमार बहुत खुश हुआ। उसने दीवान के बेटे से कहा कि उसे कर्नाटक जाना है। दीवान का बेटा राजकुमार को कर्नाटक ले गया। जब वे दोनों राजमहल के निकट पहुंचे, तो उन्हें एक चरखा चलाती बुजुर्ग महिला दिखी। राजकुमार ने महिला से पूछा कि क्या वह पद्मावती की मां है? महिला ने कहा कि हां, वह पद्मावती की मां है। राजकुमार ने महिला से कहा कि वह पद्मावती से शादी करना चाहता है। महिला ने राजकुमार से कहा कि वह पद्मावती की शादी किसी ऐसे व्यक्ति से करेगी जो उसे कमल के फूल से तीन इशारे समझा सके। राजकुमार ने महिला से कहा कि वह उसे समझा सकता है। महिला राजकुमार को अंदर ले गई और पद्मावती से मिलवाया। राजकुमार ने पद्मावती को कमल के फूल से तीन इशारे समझा दिए। पद्मावती राजकुमार से शादी करने के लिए राजी हो गई। राजकुमार और पद्मावती की शादी धूमधाम से हुई। राजकुमार और पद्मावती बहुत खुश थे। वे दोनों एक साथ रहते थे और प्रेम से जीवन बिताते थे। बेताल का प्रश्न कहानी सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन, इस कहानी में पापी कौन है?” राजा विक्रमादित्य ने सोच-समझकर कहा, “इस कहानी में तीन पापी हैं। पहले पापी वह राजकुमार है, जिसने पद्मावती को छुपकर देखा। दूसरे पापी वह दीवान का बेटा है, जिसने राजकुमार को राजकुमारी के इशारे समझा दिए। तीसरे पापी वह बुजुर्ग महिला है, जिसने राजकुमार को पद्मावती से शादी करने के लिए चुनौती दी।” बेताल ने राजा विक्रमादित्य की प्रशंसा की और कहा, “राजन, तुमने सही उत्तर दिया है। इस कहानी में तीनों पापी हैं।” कहानी का सार यह कहानी हमें सिखाती है कि छुपकर देखना, दूसरों के इशारे समझाना और दूसरों को चुनौती देना पाप है।

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Vikram Betal विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी

प्राचीन काल में, उज्जैन नगर में राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। वे एक न्यायप्रिय और बुद्धिमान राजा थे। “विक्रम और बेताल” की कहानियां नैतिकता और बुद्धिमत्ता का संदेश देती हैं। ये कहानियां हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं। (Vikram Betal) विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी बहुत समय पहले की बात है। उज्जयनी नाम के राज्य में राजा विक्रामादित्य राज किया करते थे। राजा विक्रामादित्य की न्यायप्रियता, कर्तव्यनिष्ठता और दानशीलता के चर्चे पूरे देश में मशहूर थे। यही कारण था कि दूर-दूर से लोग उनके दरबार में न्याय मांगने आया करते थे। राजा हर दिन अपने दरबार में लोगों की तकलीफों को सुनते और उनका निवारण किया करते थे। एक दिन की बात है। राजदरबार लगा हुआ था। तभी एक भिक्षु विक्रमादित्य के दरबार में आता है और एक फल राजा को देकर चला जाता है। राजा उस फल को कोषाध्यक्ष को दे देता है। उस दिन के बाद से हर रोज वह भिक्षु राजा के दरबार में आने लगा। उसका रोज का काम यही था कि वह राजा को फल देता और चुपचाप चला जाता। राजा भी प्रत्येक दिन भिक्षु द्वारा दिया गया फल कोषाध्यक्ष को थमा देता। ऐसे करते-करते करीब 10 साल बीत गए। एक दिन जब भिक्षु फिर राजा के दरबार में आकर फल देता है, तो इस बार राजा फल कोषाध्यक्ष को न देकर वहां मौजूद एक पालतू बंदर के बच्चे को दे देते हैं। यह बंदर किसी सुरक्षाकर्मी का था, जो छूट कर अचानक राजा के पास आ जाता है। बंदर जब उस फल को खाने के लिए तोड़ता है, तो उस फल के बीच से एक बहुमूल्य रत्न निकलता है। उस रत्न की चमक को देख राज दरबार में मौजूद सभी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। राजा भी यह नजारा देख आश्चर्य में पड़ जाता है। राजा कोषाध्यक्ष को इससे पूर्व भिक्षु द्वारा दिए गए सभी फलों के बारे में पूछता है। राजा के पूछने पर कोषाध्यक्ष बताता है कि महाराज मैंने उन सभी फलों को राज कोष में सुरक्षित रखवा दिया है। मैं उन सभी फलों को अभी लेकर आता हूं। कुछ देर बाद कोषाध्यक्ष राजा को आकर बताता है कि सभी फल सड़-गल गए हैं। उनके स्थान पर बहुमूल्य रत्न बचे हुए हैं। यह सुनकर राजा बहुत खुश होता है और कोषाध्यक्ष को सारे रत्न सौंप देता है। अगली बार जब भिक्षु फल लेकर दोबारा विक्रमादित्य के दरबार पहुंचता है, तो राजा कहते हैं, “भिक्षु मैं आपका फल तब तक ग्रहण नहीं करूंगा, जब तक आप यह नहीं बताते कि हर दिन आप इतनी बहुमूल्य भेंट मुझे क्यों अर्पित करते हैं? राजा की यह बात सुन भिक्षु उन्हें एकांत स्थान पर चलने को कहता है। एकांत में ले जाकर भिक्षु राजा को बताता है कि मुझे मंत्र साधना करनी हैं और उस साधना के लिए मुझे एक वीर पुरुष की जरूरत है। चूंकि, मुझे तुमसे वीर दूसरा कोई नहीं मिल सकता, इसलिए यह बहुमूल्य उपहार तुम्हें दे जाता हूं। भिक्षु की बात सुन राजा विक्रमादित्य उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। तब भिक्षु राजा को बताता है कि अगली अमावस्या की रात को उसे पास के श्मशान आना होगा, जहां वह मंत्र साधना की तैयारी करेगा। इतना कहकर भिक्षु वहां से चला जाता है। अमावस्या का दिन आते ही राजा को भिक्षु की बात याद आती है और वह वचन के अनुसार श्मशान पहुंच जाते हैं। राजा को देख भिक्षु बहुत प्रसन्न होता है। भिक्षु कहता है, “हे राजन, तुम यहां आए मैं बहुत खुश हुआ कि तुम्हें तुम्हारा वचन याद रहा। अब यहां से पूर्व की दिशा में जाओ। वहां एक महाश्मशान मिलेगा। उस महाश्मशान में एक शीशम का एक विशाल वृक्ष है। उस वृक्ष पर एक मुर्दा लटका हुआ है। उस मुर्दे को तुम्हें मेरे पास लेकर आना है। भिक्षु की बात सुनकर राजा सीधे उस मुर्दे को लाने चल देता है। महाश्मशान में पहुंचने के बाद राजा को एक विशाल शीशम के पेड़ पर एक मुर्दा लटका हुआ दिखाई देता है। राजा अपनी तलवार खींचता है और पेड़ से बंधी डोर को काट देता है। डोर कटते ही मुर्दा जमीन पर आ गिरता है और जोर से चीखने की आवाज आती है। दर्दभरी चीख सुन राजा को लगता है कि शायद यह मुर्दा नहीं, बल्कि कोई जिंदा इंसान है। थोड़ी देर बाद जब मुर्दा तेजी से हंसने लगता है और फिर पेड़ पर जाकर लटक जाता है, तो विक्रम समझ जाता है कि इस मुर्दे पर बेताल चढ़ा है। काफी कोशिश के बाद विक्रम बेताल को पेड़ से उतार अपने कंधे पर टांग लेते हैं। इस पर बेताल विक्रम से कहता है, “विक्रम मैं तेरे साहस को मान गया। तू बड़ा ही पराक्रमी है। मैं तेरे साथ चलता हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि पूरे रास्ते में तू कुछ भी नहीं बोलेगा।” विक्रम सिर हिलाकर हां में बेताल की बात मान लेता है। इसके बाद बेताल विक्रम से कहता है कि रास्ता लंबा है, इसलिए इस रास्ते को रोमांचक बनाने के लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं। तो यह थी विस्तार से राजा विक्रम, योगी और बेताल की आरंभिक कहानी। यही से शुरू होता है बेताल पच्चीसी की 25 कहानियों का सफर, जो बेताल एक-एक करके विक्रम को सुनाता है। कहानियों के विक्रम-बेताल के इस भाग में आपको बेताल पच्चीसी की सभी कहानियां एक साथ पढ़ने को मिलेंगी। कहानी से सीख : एक राजा को हमेशा विक्रमादित्य की तरह सहासी और पराक्रमी होना चाहिए। तभी वह अपनी प्रजा की रक्षा कर सकता है।

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रविवार की कहानी | रविवार (इतवार) व्रत कथा | Sunday vrat katha in hindi

(Sunday vrat katha in hindi ) एक बूढ़ी औरत थी जो सूर्य देवता की पूजा करती थी। हर सुबह मैं अपना घर साफ करती और गाय के गोबर से लिपटी। इसके बाद ही वह खाना बनाती है और खाती थी पूर्णविराम वह अपने पड़ोसी के घर से गोबर इकट्ठा करती थी। पड़ोसी की पत्नी को यह पसंद नहीं था। एक दिन उसने अपनी गाय घर के अंदर बांध दी। अगले दिन बूढ़ी औरत को गोबर नहीं मिला और वह अपना घर नहीं लिप पाई। उसका घर साफ नहीं हो सका था, इसलिए उसने उस दिन भोजन नहीं किया। सूर्यकवचस्तोत्रम् २ Suryakavachastotram 2 उस रात सूर्य देवता उसके सपनों में आए। उन्होंने उसे एक गाय देने का वचन दिया। अगले दिन उसने अपने घर में एक गाय और बछड़े को पाया। पड़ोसी की पत्नी नहीं है देखा तो वह जल भुन गई। उसने यह भी देखा कि बुढ़िया की गाय तो सोने का गोबर करती है। उसके मन में लालच आ गया और उसने सोने का गोबर उठाकर उसकी जगह साधारण गोबर रख दिया। सूर्य देवता ने यह देख लिया। उन्होंने उस रात नगर में तूफान ला दिया। बूढ़ी औरत ने गाय को अपने घर के अंदर बांध लिया जिससे सोने का गोबर उसे ही मिल गया। पड़ोसी की पत्नी ने सोने का गोबर देने वाली गाय की बात जाकर राजा को बता दी। राजा ने वह जादुई गाय ले ली और अपने महल पर सोने के गोबर काले करा दिया। रात में सूर्य देवता राजा के सपने में आए और बोले कि वह गाय उन्होंने बूढ़ी औरत को भेज की है। जब राजा जागा तो उसने पाया कि उसके महल से दुर्गंध आ रही है। उसने देखा तो महल की दीवारों पर किया गया सोने के गोबर का लेप साधारण गोबर के लेप में बदल चुका था। उसे अपने कृत्य पर दुख हुआ और उसने बूढ़ी औरत को वह गाय लौटा दी। उसने पड़ोसी की चालाक पत्नी को दंड भी दिया। उसने यह घोषणा भी करा दी की उसके राज्य में हर कोई रविवार के दिन सूर्य की पूजा करेगा और उपवास रखेगा।

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कैसे हुआ सरस्वती का जन्म | saraswati ka janam kaise hua | माता सरस्वती के जन्म की कहानी |

Saraswati जब सृष्टि का निर्माण हुआ तो हर और अव्यवस्था थी। ब्रह्मा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि सृष्टि में व्यवस्था कैसे बनाई जाए। समस्या पर विचार करते समय उन्हें एक आवाज सुनाई पड़ी कि ज्ञान ही सृष्टी में व्यवस्था बनाने में सहायता कर सकता है। तभी ब्रह्मा के मुख से सरस्वती (Saraswati) की चमत्कारी आकृति प्रकट हुई जो ज्ञान और बुद्धि की देवी थी, श्वेत वस्त्र धारण किए वह हंस पर सवार थी। उसके एक हाथ में पुस्तक और दूसरे में वीणा थी। विचार, समझ और संवाद के जरिए उन्होंने ब्रह्मा को यह समझाने में सहायता की की किस तरह से सृष्टि में व्यवस्था कायम की जाए। जब उसने वीणा बजाई तो हल्ला गुल्ला शांत होने लगा सूर्य, चंद्रमा और तारों का जन्म हुआ। समुंद्र भर गए और ऋतु परिवर्तन होने लगा। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर सरस्वती का नाम वाग्देवी रख दिया जिसका अर्थ शब्द और ध्वनि की देवी होता है। इस प्रकार ब्रह्मा, सरस्वती के ज्ञान की बदौलत सृष्टि के रचयिता बन गए। सरस्वती जी के जन्म की कथा हिंदू धर्म में बहुत प्रसिद्ध है। इस कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का कार्य संपन्न कर दिया तो उन्होंने पाया कि सृष्टि में सबकुछ है, लेकिन सब मूक, शांत और नीरस है। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल निकाला और छिड़क दिया, जिससे मां सरस्वती वहां पर प्रकट हो गईं। उन्होंने अपने हाथों में वीणा, माला और पुस्तक धारण कर रखा था। सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा वीणा से निकलने वाले मधुर स्वर से सृष्टि में ध्वनि का संचार हुआ। माला से निकलने वाले सुगंध से सृष्टि में सुगंध का संचार हुआ। और पुस्तक से निकलने वाले ज्ञान से सृष्टि में ज्ञान का संचार हुआ। मां सरस्वती को ज्ञान, कला, संगीत, और विद्या की देवी माना जाता है। वे सृष्टि में ज्ञान और कला का प्रसार करती हैं। मां सरस्वती का जन्म वसंत पंचमी के दिन हुआ था। इसलिए वसंत पंचमी को सरस्वती (saraswati )पूजा का पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन लोग मां सरस्वती की पूजा करते हैं और उनसे ज्ञान, कला और सफलता की कामना करते हैं। सरस्वती जी के जन्म की कुछ अन्य कथाएँ भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि का निर्माण किया तो उन्होंने देखा कि सृष्टि में ज्ञान और कला का अभाव है। तब उन्होंने अपने नाभि से एक कमल उत्पन्न किया, जिस पर विराजमान होकर मां सरस्वती प्रकट हुईं। एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सृष्टि का निर्माण किया तो उन्होंने देखा कि सृष्टि में ज्ञान और कला का विकास नहीं हो रहा है। तब उन्होंने अपने-अपने तेज से एक शक्ति उत्पन्न की, जिससे मां सरस्वती प्रकट हुईं। इन सभी कथाओं से स्पष्ट है कि मां सरस्वती ज्ञान, कला और विद्या की देवी हैं। वे सृष्टि में ज्ञान और कला का प्रसार करती हैं।

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रोहिणी व्रत Rohini Vrat 2023

रोहिणी व्रत एक हिंदू और जैन व्रत है जो हर महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र होता है। रोहिणी नक्षत्र को देवी लक्ष्मी का नक्षत्र माना जाता है। इसलिए इस व्रत को देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए किया जाता है। Rohini Vrat रोहिणी व्रत का महत्व रोहिणी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से विवाहित महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही उनके पति की लंबी उम्र होती है। नवविवाहित महिलाएं इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से भी करती हैं। Rohini Vrat 2023: रोहिणी व्रत पर हो रहा है दुर्लभ ‘भद्रावास’ योग का निर्माण, प्राप्त होगा अक्षय फल Rohini Vrat रोहिणी व्रत की पूजा विधि रोहिणी व्रत की पूजा विधि निम्नलिखित है: Rohini Vrat रोहिणी व्रत का पारण रोहिणी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। पारण के समय एक बार फिर देवी लक्ष्मी की पूजा करें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। Rohini Vrat रोहिणी व्रत के नियम रोहिणी व्रत के दौरान निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: रोहिणी (Rohini) व्रत एक पवित्र व्रत है जो महिलाओं को सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है। इस व्रत को विधि-विधान से करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंगलवार, 28 नवंबर 2023प्रारंभ: 27 नवंबर 2023 दोपहर 01:52 बजेसमाप्त : 28 नवंबर 2023 अपराह्न 01:58 बजे रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों का महत्वपूर्ण व्रत है इस व्रत को जैन समुदाय के लोग करते है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता हैं। इसलिए इसे व्रत को रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर रोहिणी व्रत का पारण किया जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। रोहिणी व्रत एक वर्ष में 12 होते है अर्थात् यह प्रत्येक महीनें में आता है। फलाहार सूर्यास्त से पहले किया जाता है क्योंकि रात को भोजन नहीं किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। जैन समुदाय में यह मान्यता है कि यह व्रत विशेष फल देता है तथा कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता हे।

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Dev Diwali 2023: देव दिवाली का शिव से है गहरा संबंध

देव दिवाली 2023 मुहूर्त (Dev Diwali 2023 Muhurat) कार्तिक पूर्णिमा तिथि शुरू – 26 नवंबर 2023, दोपहर 03.53 कार्तिक पूर्णिमा तिथि समाप्त – 27 नवंबर 2023, दोपहर 02.45 प्रदोषकाल देव दीपावली मुहूर्त – शाम 05:08 – रात 07:47 अवधि – 02 घण्टे 39 मिनट्स इस दिन प्रदोष काल में देव दीपावली मनाई जाती है. इस दिन वाराणसी में गंगा नदी के घाट और मंदिर दीयों की रोशनी से जगमग होते हैं. काशी में देव दिवाली की रौनक खास होती है. देव दिवाली की कथा Dev Diwali ki katha त्रिपुरासुर का वध पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए तारकासुर के तीनों बेटे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अमरत्व का वरदान मांगा। ब्रह्म देव ने उन्हें यह वरदान देने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें एक अन्य वरदान दिया कि जब तीनों के सोने, चांदी और लोहे के तीन नगर अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में होंगे और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत होकर असंभव रथ पर सवार असंभव बाण से मारना चाहे, तब ही उनकी मृत्यु होगी। इस वरदान से त्रिपुरासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गए और उन्होंने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे त्रिपुरासुर के वध के लिए प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने देवताओं को बताया कि त्रिपुरासुर का वध केवल भगवान शिव ही कर सकते हैं। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया। उन्होंने सभी देवताओं से अपना आधा बल प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एक असंभव रथ तैयार किया। इस रथ का रथनी सूर्य, चक्रचित्रकार चंद्रमा, सारथी ब्रह्मा जी, बाण भगवान विष्णु, धनुष मेरू पर्वत और डोर वासुकी नाग थे। अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में आने पर त्रिपुरासुर के तीन नगरों को भगवान शिव ने अपने बाण से भस्म कर दिया। इस प्रकार त्रिपुरासुर का वध हुआ और देवताओं को उनसे मुक्ति मिली। त्रिपुरासुर के वध का महत्व त्रिपुरासुर के वध का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह हिंदू धर्म में अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह भी बताता है कि भगवान शिव हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। Ganesh bhagwan:भगवान गणेश को दूर्वा क्यों अर्पित की जाती है? त्रिपुरासुर के वध से जुड़े कुछ अन्य तथ्य त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरासुर के वध की कथा को शिवपुराण में विस्तार से वर्णित किया गया है। काशी से देव दिवाली का संबंध काशी से देव दिवाली का संबंध त्रिपुरासुर के वध से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रिपुरासुर का वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। त्रिपुरासुर के वध के बाद, सभी देवता भगवान शिव के आशीर्वाद के लिए काशी पहुंचे। उन्होंने गंगा नदी में स्नान किया और भगवान शिव की पूजा की। इसके बाद उन्होंने गंगा नदी के तट पर दिवे जलाए और खुशियां मनाईं। इसी दिन से काशी में देव दीपावली मनाई जाने लगी। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है। इसलिए, देव दीपावली काशी में विशेष रूप से मनाई जाती है। देव दीपावली के दिन, काशी के घाटों पर लाखों दिवे जलाए जाते हैं। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। इस दिन, गंगा नदी में महाआरती भी की जाती है। देव दीपावली काशी के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार है। यह त्योहार अच्छाई की बुराई पर विजय और भगवान शिव की कृपा का प्रतीक है।

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