2023

नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन

फ्रेंड्स, इस पॉट में हम भगवान शिव और नंदी की कहानी (Lord Shiva And Nandi Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. जब भी हम शिवालय जाते हैं, तो देखते हैं कि शिवलिंग के पास माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेशजी के साथ नंदी भी विराजमान है. हिन्दू धर्म में नंदी भगवान शिव के निवास कैलाश के द्वारपाल हैं. साथ ही बैल के रूप में वे उनके वाहन भी हैं. उन्हें हर शिव मंदिर में भोले- शंकर के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है. संस्कृत में नंदी का अर्थ है – प्रसन्नता या आनंद. नंदी को शक्ति, समर्थता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है. शैव परंपरा में नंदी को नंदीनाथ संप्रदाय का मुख्य गुरु भी माना जाता है. नंदी शिव के वाहन होने के साथ ही उनके साथी और उनके गणों में सर्वोच्च हैं. क्या आप जानते हैं कि नंदी का जन्म कैसे हुआ? उनके माता पिता कौन थे? कैसे नंदी शिव के परम प्रिय हो गए? कैसे नंदी भगवान शिव के वाहन बने? क्यों वे शिवलिंग के साथ विराजते हैं? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से जानकारी देंगे. नंदी के जन्म के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है. पौराणिक कथा कथानुसार ब्रम्हचारी व्रत का पालन करते हुए एक बार शिलाद ऋषि को भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका संपूर्ण वंश समाप्त हो जायेगा. वे एक शिशु को गोद लेना चाहते थे. लेकिन वे चाहते थे कि जिस शिशु को वे गोद लें, वह अध्यात्मिक हो तथा उस पर भगवान शिव की विशेष कृपा और आशीर्वाद हो. अपनी कामना की पूर्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव का कठोर तप प्रारंभ किया. कई वर्षों तक वे तप में लीन रहे. जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा. शिलाद ऋषि ने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा. भगवान शिव शिलाद ऋषि को उनका मनचाहा वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. भगवान शिव के अंतर्ध्यान होने के बाद शिलाद ऋषि ने जब अपनी आँखें खोली, तो उनकी गोद में एक शिशु था. उस शिशु के चेहरे पर एक अलौकिक तेज था. शिलाद ऋषि ने उसका नाम नंदी रखा और उसका पालन-पोषण करने लगे. वे उससे बहुत स्नेह करते थे. किंतु नियति ने नंदी के लिए कुछ और ही लिख रखा था. एक दिन मित्र और वरुण नामक दो संत शिलाद ऋषि के आश्रम में पधारे. शिलाद ऋषि ने उनका खूब आदर-सत्कार किया. नंदी ने भी उनकी बहुत सेवा की. प्रस्थान करते समय शिलाद ऋषि और नंदी ने दोनों संतों का आशीर्वाद लिया. संतो ने शिलाद ऋषि को दीर्घायु और खुशहाली का आशीर्वाद दिया. किंतु जब नंदी को आशीर्वाद देने की बारी आई, तो उनके माथे पर चिंता की लकीरे खिंच गई. शिलाद ऋषि ने यह तुरंत भांप लिया. जब वे मित्र और वरुण ऋषि को आश्रम के बाहर तक छोड़ने गये, तो उनसे पूछ लिया कि उन्होंने नंदी को यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंताग्रस्त हो गये. नंदी ने जब पिता को चिंतित देखा, तो उसका कारण पूछा. शिलाद ऋषि ने नंदी को पूरी सच्चाई बता दी. पिता की बात सुन नंदी हंसने लगे. आश्चर्यचकित पिता ने जब कारण पूछा, तो नंदी बोले, “पिताश्री, आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से प्राप्त किया है. जिन पर शिवजी की कृपा होती हैं, उन्हें कोई संकट छू नहीं सकता. यह कहकर वे पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर भगवान शिव की तपस्या करने वन चले गए और तप करने लगे. नंदी का तप इतना कठोर, ध्यान इतना प्रबल और आस्था इतनी मजबूत थी कि भगवान शिव को प्रकट होने में अधिक समय नहीं लगा. शिव ने प्रकट होकर नंदी से वरदान मांगने को कहा. नंदी के पूरी उम्र उनका सानिध्य मांग लिया. तब शिव ने उन्हें बैल का चेहरा प्रदान कर अपने वाहन के रूप में स्वीकार किया और अपने गणों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया.  ध्रुव तारे की कहानी शिव ने आशीर्वाद से नंदी मृत्यु के भय से मुक्त होकर अजर-अमर हो गये. भगवन शिव ने गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया. इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गये. भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया था कि जहाँ उनका निवास होगा, वहाँ नंदी का भी निवास होगा. माना जाता है कि तबसे शिव मंदिर में शिवलिंग के साथ नंदी की भी स्थापना की जाती हैं. नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं. उनका हर क्षण भगवान को समर्पित है. वे मनुष्य को शिक्षा देते हैं कि वे अपना हर क्षण परमात्मा की सेवा में अर्पित करें, ताकि वे भगवान की कृपा के पात्र बन जाएँ.

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महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, मंगल और शनि दोष से मिलेगी निजात

हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि श्रावण मास के अलावा फाल्गुन मास में पड़ने वाली शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही हर तरह के दुखों से निजात मिल जाती है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने के साथ शिवलिंग में कुछ चीजें जरूर अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें दुधाभिषेक करें भगवान शिव को जल के अलावा दूध से भी अभिषेक कर सकते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव को दूध चढ़ाने से हर तरह के रोगों से छुटकारा मिल सकता है। दही चढ़ाएं शिवलिंग में दही चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दही चढ़ाने से भगवान शिव का स्वभाव गंभीर होता है। ऐसे में व्यक्ति के जीवन में आने वाली हर समस्या से निजात मिल जाती है। घी चढ़ाएं भगवान शिव को घी चढ़ाने से व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वह क्षेत्र में सफलता पा लेता है। इसके साथ ही कुंडली से शनि की साढ़े साती और ढैय्या का दुष्प्रभाव कम हो जाता है। चावल से करें श्रृंगार महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग का चावल से श्रृंगार करने से मंगल दोष से निजात मिलती है। इसके साथ ही कर्ज से मुक्ति मिलती है। तिल चढ़ाएं हर रोग से निजात पाने के साथ संतान प्राप्ति के लिए तिल चढ़ाना चाहिए। इसके लिए दूध में थोड़ा सा तिल मिलाकर अभिषेक करें। जनेऊ अर्पित करें महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर सफेद वस्त्र और जनेऊ अर्पित करें। ऐसा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होगी और लंबी आयु का वरदान मिलेगा।

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आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की। तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं? तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या ऐप आप पापी हो गए? तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बाद के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए? बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है। यही कारण है कि कहा जाता है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।’ जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशआ भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए। 

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महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली- ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’  शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया।  दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- ‘हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।’  शिकारी हंसा और बोला- ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे।’  उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। हिरणी का दुखभरा स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला- ‘ हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।’  मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।’  शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया। अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जानकर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए। शिव कथा का यह है संदेश शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पंडित एवं पुजारियों से उत्कृष्ट बना देती है

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बसंत पंचमी यह पर्व विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सरस्वती पूजा से पहले ही कर लें तैयारी

इस साल बसंत पंचमी 26 जनवरी को चार शुभ योग में मनायी जायेगी। माघ शुक्ल पंचमी तिथि 25 जनवरी की शाम से ही शुरू हो जाएगी। उदयातिथि के अनुसार बसंत पंचमी 26 जनवरी को मनाई जाएगी। धार्मिक दृष्टिकोण से यह पर्व विद्यार्थियों के लिए विशेष महत्व रखता है। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु का आगमन भी हो जाता है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि पर मां सरस्वती की उत्पत्ति भी हुई थी। बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा भी कहा जाता है. हर साल माघ शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी होती है. इस दिन विद्यालयों और मंदिरों से लेकर घरों में लोग मां सरस्वती की पूजा करते हैं.  यदि आप बसंत पंचमी के दिन घर पर ही मां सरस्वती पूजा करने वाले हैं तो पहले से ही इसकी तैयारी कर लें और पूजा में प्रयोग होने वाली जरूरी सामग्रियों की सूची तैयार कर बाजार से इसकी खरीदारी भी कर लें. ऐसे में पूजा वाले दिन किसी सामग्री के न होने के कारण पूजा में विघ्न नहीं होगी और पूजा अच्छे से संपन्न होगी. वसंत पंचमी पर भूलकर भी न करें ये काम विशेषकर विद्यार्थियों, कला व संगीत क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए बसंत पंचमी का दिन बेहद खास होता है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का भी विशेष महत्व होता है। विद्या आरंभ या फिर किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए इस दिन को बेहद उत्तम माना जाता है। इस बार चार शुभ योग में बसंत पंचमी मनायी जाएगी। विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा को ले गांव-मुहल्ले की पूजा समितियां तैयारी में जुट गई हैं। विद्यालयों में भी विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा की तैयारी जोर- शोर से की जा रही है। पूजा को ले विद्यालयों में गीत-संगीत, नुक्कड़ नाटक, एकांकी, चित्रकारी, पेंटिंग, दौड़कूद प्रतियोगिताओं का पूर्वाभ्यास बच्चों की ओर से की जा रही है। सरस्वती पूजा के लिए ये सामग्रियां है जरूरी घर पर कैसे करें देवी सरस्वती की पूजा बसंत पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर साफ कपड़े पहनें. संभव हो तो इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनें. अब पूजा मंदिर या पूजास्थल की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़कर इस जगह की शुद्धि कर लें. पूजा की चौकी पर पील रंग का कपड़ा बिछाएं और देवी सरस्वती की प्रतिमा या फोटो स्थापित करें. देवी सरस्वती के बगल में भगवान गणेश की मूर्ति भी जरूर रखें. चौकी के पास अपनी किताबें या कला से जुड़ी चीजें भी रखें. एक कलश में जलभरकर रखें और इसमें आम के पांच पत्ते की डली डालें और ऊपर नारियल रख दें. देवी सरस्वती को हल्दी, कुमकुम का तिलक लगाएं. पीले फूलों की माला पहनाएं और वस्त्र अर्पित करें. साथ ही साथ भगवान गणेश की भी पूजा करें. पूजा में अक्षत, फल, सुपारी और भोग आदि अर्पित करें और फिर धूप-दीप जलाएं. हाथ जोड़कर सरस्वती मंत्र का जाप करें. अब आखिर में आरती करें और आशीर्वाद लें. इस दिन सरस्वती वंदना करना भी शुभ होता है. पूजा समाप्त होने के बाद भोग का वितरण करें.

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मौनी अमावस्या पर करें ये महाउपाय उपाय, मिलेगी पितृदोष से मुक्ति

मौनी अमावस्या पर मौन रहकर पवित्र नदी या जलकुंड में स्नान और दान करने का विशेष महत्व बताया गया है. ऐसा कहते हैं कि मौनी अमावस्या पर दान-स्नान करने से इंसान के सारे पाप मिट जाते हैं और उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. कब है मौनी अमावस्या? (Mauni Amavasya 2023 Date and Time)इस वर्ष मौनी अमावस्या की तिथि को लेकर लोगों में बहुत कन्फ्यूजन है. कुछ लोग 21 जनवरी तो कुछ 22 जनवरी को मौनी अमावस्या बता रहे हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार, मौनी अमावस्या शनिवार, 21 जनवरी को सुबह 06 बजकर 16 मिनट से लेकर अगले दिन रविवार, 22 जनवरी को रात 02 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. लेकिन उदया तिथि के कारण मौनी अमावस्या 21 जनवरी को ही मनाई जाएगी. दान-स्नान का शुभ मुहूर्त (Mauni Amavasya 2023 Shubh Muhurt) 21 जनवरी को सुबह 8 बजकर 33 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 52 मिनट के बीच स्नान और दान-धर्म से जुड़े कार्य करने का शुभ मुहूर्त रहेगा. इस दौरान पवित्र नदी या कुंड में स्नान करने के बाद गरीब और जरूरतमंद लोगों को ठंड से बचने के लिए कम्बल, गुड़ और तिल का दान कर सकते हैं. पवित्र नदी में आस्था की डुबकी लेते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:’ और ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का जाप जरूर करें. पितृदोष दूर करने के उपायआप शनिश्चरी अमावस्या के दिन घर के दक्षिण दिशा में अपने पूर्वजों की तस्वीर लगाएं और फूल माला चढ़ाकर आशीर्वदा लें. साथ ही नियमित इनके ऊपर सफेद फूल अर्पित करें. ऐसा करने से पितरों की कृपा आप पर आने लगती है और पितृदोष से मुक्ति मिल जाती है. पीपल के पेड़ के नीचे करें ये उपायमाघ माह की मौनी अमावस्या के दिन पीपल स्नान-दान करने के बाद दोपहर के समय में पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएं. साथ ही पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल और काले तिल अर्पित करें और पूर्वजों से आशीर्वाद मांगे. इस दिन शाम के वक्त सरसों के तेल में पीपल के पेड़ के नीचे 7 दीपक जलाएं. ऐसा करने से पितृदेव प्रसन्न होते हैं और पितृदोष से मुक्ति मिलती है.  क्यों खास होती है मौनी अमावस्या? (Mauni Amavasya 2023 Significance)हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है. इससे तर्पण करने वालों को पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस दिन नदी के घाट पर जाकर पितरों का तर्पण और दान करने से कुंडली के दोषों से मुक्ति पाई जाती है. इसके अलावा, इस दिन मौन व्रत रखने से वाक् सिद्धि की प्राप्ति होती है. मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत का विशेष महत्व होता है. मौन व्रत का अर्थ खुद के अंतर्मन में झांकना, ध्यान करना और भगवान की भक्ति में खो जाने से है.

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मकर संक्रांति आज या कल? जानें सही डेट, शुभ मुहूर्त में इन चीजों का करें दान

पौष माह की शुक्ल की द्वादशी तिथि को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन बताया गया है. मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है. मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य की पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है. मकर संक्रांति से ही ऋतु परिवर्तन भी होने लगता है. मकर संक्रांति से सर्दियां खत्म होने लगती हैं और वसंत ऋतु की शुरुआत होती है. इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी 2023, रविवार को मनाई जाएगी.  मकर संक्रांति का त्योहार हिंदू धर्म में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भगवान सूर्य को समर्पित माना गया है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य के ग्रह गोचर को संक्रांति कहा जाता है। मकर राशि में जाने को मकर संक्रांति कहते हैं। इस पर्व में लोग नई फसलों की पूजा भी करते हैं। मकर संक्रांति का पर्व हर राज्य में अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। इसलिए इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, मकर संक्रांति को पूर्वी उत्तर प्रदेश खिचड़ी, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, हरियाणा, पंजाब में माघी  और तमिलनाडु में पोंगल के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति का पर्व हर साल जनवरी महीने में ही आता है। लेकिन इस साल इस पर्व की तारीख को लेकर लोगों के बीच कंफ्यूजन है। मकर संक्रांति 2023 शुभ मुहूर्त- मकर संक्रांति पुण्य काल 15 जनवरी को सुबह 07 बजकर 15 मिनट से शाम 05 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। अवधि 10 घंटे 31 मिनट की है। मकर संक्रांति महा पुण्यकाल का समय 15 जनवरी को सुबह 07 बजकर 15 मिनट से सुबह 09 बजे तक रहेगा। अवधि 01 घंटा 45 मिनट की है। मकर संक्रांति पर किन चीजों का करें दान 1. तिल –  मकर संक्रांति पर  तिल का दान करना शुभ माना जाता है. तिल का दान करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं. 2. खिचड़ी-  मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाना जितना शुभ है उतना ही शुभ इसका दान करना भी माना जाता है.  3.  गुड़- इस दिन गुड़ का दान करना भी शुभ होता है. गुड़ का दान करने से सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है. 4. तेल- इस दिन तेल दान करना शुभ होता है. ऐसा करने से शनि देव का आर्शीवाद मिलता है.  5. अनाज- मकर संक्रांति के दिन पांच तरह के अनाज दान करने से हर तरह की मनोकामना पूरी होती है.6. रेवड़ी – मकर संक्रांति के दिन रेवड़ी का भी दान करना भी शुभ माना जाता है.  7. कंबल – इस दिन कंबल का दान करना शुभ होता है. इससे राहु और शनि शांत होते हैं.  

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आज का पंचांग

आज शुक्रवार को पौष माह की पूर्णिमा तिथि है। आज पूर्णिमा का व्रत भी रहेगा। पूर्णिमा तिथि अगले दिन 7 जनवरी 2023 को सुबह 4.37 बजे तक रहेगी। आज पूरे दिन आर्द्रा और पुनर्वसु नक्षत्र रहेंगे। पंचांग के अनुसार सूर्योदय सुबह 7.17 बजे एवं सूर्यास्त सायं 5.48 बजे होगा। चन्द्रोदय 5.11 बजे होगा तथा चन्द्रास्त नहीं होगा। शुभ-अशुभ मुहूर्त एवं राहुकाल (Aaj ka Rahukaal) आज दुष्ट मुहूर्त सुबह 9.19 बजे से 10.01 बजे तक एवं दोपहर 12.47 बजे से 1.29 बजे तक रहेगा। कुलिक योग सुबह 9.19 बजे से 10.01 बजे तक एवं कंटक योग दोपहर 1.29 बजे से 2.10 बजे तक रहेगा। कालवेला/ अर्द्धयाम का समय दोपहर 2.52 बजे से 3.34 बजे तक रहेगा। यमघण्ट योग दोपहर 4.15 बजे से 4.57 बजे तक एवं यमगंड योग दोपहर 3.02 बजे से 4.20 बजे तक रहेगा। आज राहुकाल सुबह 11.08 बजे से दोपहर 12.26 बजे तक रहेगा। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य करने से बचें। शुक्रवार, 06 जनवरी 2023  तिथि पूर्णिमा नक्षत्र आर्द्रा करण विष्टि पक्ष शुक्ल पक्ष योग इंद्र till 08:54:59 AM, 07 जनवरी दिन शुक्रवार सूर्य एवं चन्द्र गणना सूर्योदयसूर्यास्त 07:05:49 AM05:40:04 PM चंद्र उदयचन्द्रास्त 05:03:15 PM06:39:02 AM चंद्र राशि मिथुन ऋतु हेमंत हिन्दू मास एवं वर्ष शक संवत् 1944 विक्रम संवत् 2079 माह-अमान्ता पौष माह-पुर्निमान्ता पौष अशुभ मुहूर्त राहु कालं 11:03:39 AM to 12:22:56 PM यंमघन्त कालं 03:01:30 PM to 04:20:47 PM गुलिकालं 08:25:005 AM to 09:44:22 AM शुभ मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त 12:01:00 PM to 12:43:00 PM

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