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Shri Krishnachandrashtakam 2: श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम् २

Shri Krishnachandrashtakam 2: श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम् २ Krishnachandrashtakam: श्रीकेवलरामप्रणीतम्वनभुवि विहरन्तौ तच्छविं वर्णयन्तौसुहृदमनुसरन्तौ दुर्हृदं सूदयन्तौ ।उपयमुनमटन्तौ वेणुनादं सृजन्तौभज हृदय हसन्तौ रामकृष्णौ लसन्तौ ॥ १॥ कलयसि भवरीतिं नैव चेद्भूरिभूतिंयमकृतनिगृहीतिं तर्हि कृत्वा विनीतिम् ।जहिहि मुहुरनीतिं जायमानप्रतीतिंकुरु मधुरिपुगीतिं रे मनो मान्यगीतिम् ॥ २॥ द्विपपरिवृढदन्तं यः समुत्पाट्य सान्तंसदसि परिभवन्तं लीलया हन्त सान्तम् ।स्वजनमसुखयन्तं कंसमाराद्भ्रमन्तंसकलहृदि वसन्तं चिन्तयामि प्रभुं तम् ॥ ३॥ गर्भगतकृष्णस्तुतिः Garbhgatakrishnastutih करधृतनवनीतः स्तेयतस्तस्य भीतःपशुपगणपरीतः श्रीयशोदागृहीतः ।निखिलनिगमगीतः कालमायाद्यभीतःकनकसदुपवीतः श्रीशुकादिप्रतीतः ॥ ४॥ सकलजननियन्ता गोसमूहानुगन्ताव्रजविलसदनन्ताभीरुगेहेषु रन्ता ।असुरनिकरहन्ता शक्रयागावमन्ताजयति विजयियन्ता वेदमार्गाभिमन्ता ॥ ५॥ सुकृतिविहितसेवो निर्जितानेकदेवोभवविधिकृतसेवः प्रीणिताशेषदेवः ।स्म नयति वसुदेवो गोकुलं यं मुदे वोभवतु स यदुदेवः सर्वदा वासुदेवः ॥ ६॥ करकजधृतशैले प्रोल्लसत्पीतचैले ?? मय् बे चोर्रेच्त्रुचिरनवघनाभे शोभने पद्मनाभे ।विकचकुसुमपुञ्जे शोभमाने निकुञ्जेस्थितवति कुरु चेतः प्रीतिमन्यत्र नेतः ॥ ७॥ विषयविरचिताशे प्राप्तसंसारपाशे-ऽनवगतनिजरूपे सृष्टकर्मण्यपूपे ।सुकृतकृतिविहीने श्रीहरे भक्तिहीनेमयि कृतय समन्तौ केवले दीनजन्तौ ॥ ८॥ इति श्रीकेवलरामप्रणीतं श्रीकृष्णचन्द्राष्टकं सम्पूर्णम् ।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें

Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज का पर्व विशेष महत्व माना जाता है जो माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक उत्तम तिथि है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं मां पार्वती को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करती हैं जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। Hartalika Teej 2025: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। साल में कुल 3 तीज पड़ती है, जिसे हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज कहा जाता है। हरियाली तीज श्रावण मास में पड़ती है, तो कजरी और हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास को रखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती है। Hartalika Teej 2025 Date इसके साथ ही अविवाहित  महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को रखने की विधान है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और धार्मिक महत्व… Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज हरतालिका तीज मुहूर्त (Hartalika Teej shubh muhurat) भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारम्भ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट पर हो रहा है। साथ ही इस तिथि का समापन 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज का पर्व मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन गौरी-शंकर की पूजा का मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है – हरितालिका पूजा मुहूर्त – प्रातः 5 बजकर 56 मिनट से सुबह 8 बजकर 31 मिनट तक गौरी-शंकर पूजा विधि (Shiv-Parvati Puja) हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात् साफ-सुथरे विशेषकर हरे या लाल रंग के वस्त्र पहनें। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थान पर चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं और स्वयं द्वारा बनाई गई माता पर्वती, भगवान शिव और गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। सबसे पहले गणेश जी का विधिवत पूजन करें और इसके बाद गौरी-शंकर की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में मां गौरी को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें और हरतालिका तीज व्रत कथा जरूर सुनें। आप पूजा में इन मंत्रों का जप भी कर सकते हैं – हरतालिका तीज पर बन रहे शुभ योग (Hartalika Teej 2025 Shubh Yog) इस साल हरतालिका तीज Hartalika Teej पर काफी शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन चंद्रमा मंगल के साथ कन्या राशि में होंगे, जिससे महालक्ष्मी राजयोग बन रहा है। इसके अलावा इस दिन  हस्त नक्षत्र के साथ साध्य, शुभ योग बन रहा है। इसके साथ ही इस दिन सूर्य अपनी स्वराशि सिंह राशि में विराजमान रहेंगे। रतालिका तीज 2025 पर करें इन मंत्रों का जाप (Hartalika Teej 2025 Mantra) देवी पार्वती का मंत्रऊं उमयेए पर्वतयेए जग्दयेए जगत्प्रथिस्थयेए स्हन्तिरुपयेए स्हिवयेए ब्रह्म रुप्नियेए” शिव मंत्रऊं ह्रयेए महेस्ह्अरयेए स्हम्भवे स्हुल् पद्येए पिनक्ध्रस्हे स्हिवये पस्हुपतये महदेवयअ नमह्” हरतालिका तीज व्रत विधि एवं नियम: Hartalika Teej Vrat Vidhi and Niyam हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं। विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें:उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये। इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका इसके बाद हरतालिका व्रत Hartalika Teej की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं। भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए:ॐ उमायै नम:ॐ पार्वत्यै नम:ॐ जगद्धात्र्यै नम:ॐ जगत्प्रतिष्ठयै नम:ॐ शांतिरूपिण्यै नम:ॐ शिवायै नम: भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए:ॐ हराय नम:ॐ महेश्वराय नम:ॐ शम्भवे नम:ॐ शूलपाणये नम:ॐ पिनाकवृषे नम:ॐ शिवाय नम:ॐ पशुपतये नम:ॐ महादेवाय नम: हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री: Hartalika Vrat Pujan Ki Samgri फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।केले का पत्ता।विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।जनेऊ, नाडा, वस्त्र,।माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।घी, तेल, दीपक,

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Varaha Jayanti

Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव

Varaha Jayanti 2025 date:वराह जयंती भगवान विष्णु के तीसरे अवतार, वराह, के शक्तिशाली वराह रूप का उत्सव है। विष्णु का यह अवतार बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। प्राचीन इतिहास के अनुसार, भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए वराह रूप धारण किया था, जो राक्षस हिरण्याक्ष द्वारा ब्रह्मांडीय महासागर में डूब गई थी। यह त्योहार केवल इस महान घटना का स्मरणोत्सव ही नहीं है, बल्कि विपत्ति का सामना करने में धर्म, साहस और ईश्वरीय हस्तक्षेप के महत्व का स्मरण भी कराता है। वराह जयंती त्यौहार भगवान विष्णु के तीसरे अवतार का जन्म उत्सव मनाने के लिए होता है । दुनिया को बुराई से बचाने के लिए देवता ने सूअर के रूप में पुनर्जन्म लिया। अपने पुनर्जन्म का उद्देश्य धरती पर धर्म बहाल करना और निर्दोष लोगों को असुर और राक्षसों जैसे विभिन्न बुरी ताकतों से बचाने के लिए था। वराह जयंती की पूर्व संध्या पर कई अनुष्ठान होते हैं। Varaha Jayanti भक्त भगवान विष्णु की पूजा दूसरे दिन शुक्ला पक्ष के माघ महीने में या द्वितिया तीथी में करते हैं। भक्त अच्छे भाग्य से आशीर्वाद पाने और ब्रह्मांड के संरक्षक से आशीर्वाद लेने के लिए भारत भर के कई क्षेत्रों में भगवान विष्णु के सभी अवतारों का जश्न मनाते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में, ऐसा माना जाता है कि भगवान वराह की पूजा करने से जातक को अत्यधिक धन, स्वास्थ्य और खुशी मिलती है। भगवान विष्णु के अवतार ने आधे मानव और आधे सूअर के रूप में सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त की थी और हिरण्यक्ष को हराया था। इसलिए, इस दिन भक्त भगवान वराह की पूजा करते हैं और अपने जीवन से सभी बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव Varaha Jayanti Kab Hai: वराह जयंती कब है? वर्ष 2025 में, वराह जयंती सोमवार, 25 अगस्त को पड़ रही है, जिस दिन विभिन्न आध्यात्मिक अनुष्ठानों, प्रार्थनाओं और भक्ति कार्यों का आयोजन किया जाएगा। यह शुभ अवसर भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ब्रह्मांड की व्यवस्था बनाए रखने में भगवान विष्णु की भूमिका का सम्मान करने के लिए एकत्रित होते हैं। वराह जयंती का महत्व:Importance of Varaha Jayanti वराह जयंती केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अवसर है जिसका भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व है। भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में मनाया जाने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने में धर्म या नैतिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण महत्व को रेखांकित करता है। बुराई पर अच्छाई की विजय: victory of good over evil वराह जयंती Varaha Jayanti का मूल, दुष्ट शक्तियों पर धर्म की विजय का उत्सव है। हिरण्याक्ष नामक राक्षस पर भगवान वराह की विजय की कथा एक सशक्त अनुस्मारक है कि अंधकार की शक्तियाँ चाहे कितनी भी विकराल क्यों न लगें, अंततः धर्म और ईश्वरीय न्याय की ही विजय होगी।साहस, त्याग और धार्मिकता: वराह जयंती की कथा साहस, त्याग और न्याय की स्थापना के लिए अटूट प्रतिबद्धता की शिक्षाओं से भरपूर है। हिरण्याक्ष के विरुद्ध भगवान वराह के महाकाव्य युद्ध ने बुराई के विरुद्ध खड़े होने और व्यापक भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक बलिदान देने का महत्व सिखाया है। भक्तगण इन मूल्यों का उत्सव मनाते हैं और इन्हें आत्मसात करते हैं, तथा सत्यनिष्ठा और साहस से भरा जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। आध्यात्मिक विकास और परिवर्तन:spiritual growth and transformation वराह जयंती के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान और प्रार्थनाएँ भक्तों को आध्यात्मिक विकास और आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करती हैं। इन पवित्र अनुष्ठानों में संलग्न होकर, भक्तों को संकट के समय ईश्वर की निरंतर उपस्थिति और हस्तक्षेप का स्मरण होता है। इससे आंतरिक परिवर्तन की भावना जागृत होती है और उनकी आध्यात्मिक यात्रा गहन होती है। समुदाय और दान: वराह जयंती समुदाय और दान के मूल्यों पर भी ज़ोर देती है। भक्तजन अनुष्ठानों में भाग लेने, प्रार्थना करने और दयालुता एवं दान के कार्यों में संलग्न होने के लिए एक साथ आते हैं। यह सामूहिक पूजा एकता की भावना को बढ़ावा देती है और एक-दूसरे, विशेषकर ज़रूरतमंदों, की सहायता करने के महत्व पर बल देती है। समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद:Blessings of prosperity and abundance अंततः, Varaha Jayanti वराह जयंती को समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद पाने के लिए एक शुभ दिन माना जाता है। भक्तों का मानना है कि भक्ति और ईमानदारी से अनुष्ठान करने से भगवान वराह का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उनके जीवन में सुरक्षा, समृद्धि और बाधाएँ दूर होती हैं और भविष्य में शांति और सफलता सुनिश्चित होती है। Where is Varaha Jayanti celebrated: वराह जयंती कहाँ मनाई जाती है? वराह जयंती Varaha Jayanti भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा और आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर में, धूमधाम से मनाई जाती है। प्राचीन हिंदू इतिहास से गहराई से जुड़ा शहर, मथुरा, भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में पारंपरिक अनुष्ठानों और सामुदायिक समारोहों के साथ इस त्योहार को मनाता है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका Necessary materials of puja:पूजा की आवश्यक सामग्री वराह जयंती Varaha Jayanti समारोह का मुख्य भाग षोडशोपचार पूजा है, जो एक विस्तृत सोलह चरणों वाली पूजा प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न प्रसाद और अनुष्ठान शामिल हैं। भक्त पंचामृत—जल, दूध, दही, शहद और घी के मिश्रण—से भगवान वराह की मूर्ति का अभिषेक या अनुष्ठानिक स्नान करते हैं। यह अनुष्ठान एक प्रतीकात्मक शुद्धिकरण और श्रद्धा का कार्य है। अभिषेक के बाद देवता को कमल के फूल, चंदन, अक्षत, कुमकुम, पान और मेवे चढ़ाए जाते हैं। भक्त वराह सहस्रनाम (भगवान वराह के एक हजार नाम) या अन्य विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं, जिससे आध्यात्मिक रूप से आवेशित वातावरण बनता है। पूजा का समापन आरती से होता है, एक अनुष्ठान जिसमें भक्त भजन गाते हुए देवता के सामने प्रज्वलित दीप लहराते हैं, जो अंधकार और अज्ञानता के नाश का प्रतीक है। Dhan:दान दान-पुण्य वराह जयंती Varaha Jayanti का एक अभिन्न अंग है। भक्तों का मानना है कि ज़रूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आर्थिक दान देने से न केवल भगवान वराह प्रसन्न होते हैं, बल्कि समृद्धि और सुख का आशीर्वाद भी मिलता

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Shri Krishnachaturvimshati Stotram: श्रीकृष्णचतुर्विंशतिस्तोत्रम्

Shri Krishnachaturvimshati Stotram: श्रीकृष्णचतुर्विंशतिस्तोत्रम् केशवं केशिमथनं वासुकेर्नोगशायिनम् ।रासक्रीडाविलासाढ्यं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १॥ नारायणं नरहरिं नारदादिभिरर्चितम् ।तारकं भवबन्धानां कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २॥ माधवं मधुरावासं भूधरोद्धारकं विभुम् ।आधारं सर्वभूतानां कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ३॥ गोविन्दमिन्दुवदनं श्रीवन्द्यचरणाम्बुजम् ।नवेन्दीवरसङ्काशं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ४॥ विष्णुमुष्णीषभूषाढ्यं जिष्णुं दानवमर्दनम् ।तृष्णाभयप्रभेत्तारं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ५॥ (कृष्णाभयप्रभेत्तारं) मधुसूदनं विधिनुतं बुधमानसवासितम् ।दधिचोरं महाभागं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ६॥ त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं भवदादिविजैर्नुतम् । (वृषाद्यदितिजैर्नुतम्)कविं पुराणपुरुषं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ७॥ वामनं श्रीमदाकारं कामितार्थफलप्रदम् ।रामानुजं सामलोलं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ८॥ श्रीधरं श्रीधरानुतं राधेयाद्यैर्नुतं हरिम् ।राधाविडम्बनासक्तं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ९॥ हृषीकेशं विषावासं भिषजं भवरोगिणाम् ।तुषाराद्रिसुतावन्द्यं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १०॥ पद्मनाभं पद्मनेत्रं पद्माहृत्पद्म बम्भरम् ।आध्मातमुरलीलोलं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ ११॥ दामोदरं श्यामलाङ्गं सोमसूर्यविलोचनम् ।चामीकराम्बरधरं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १२॥ सङ्कर्षणं वेङ्कटेशं ओङ्काराकारमव्ययम् ।शङ्खचक्रगदापाणिं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १३॥ वासुदेवं व्यासनुतं भासुराभरणोज्ज्वलम् ।दासपोषणसंसक्तं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १४॥ प्रद्युम्नमाम्नायमयं खद्योतनमयार्चितम् ।वैद्यनाथं प्रपञ्चास्यं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १५॥ अनिरुद्धं ध्रुवनुतं शुद्धसङ्कल्पमव्ययम् ।शुद्धब्रह्मानन्दरूपं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १६॥ नरोत्तमं पुराणेशं मुरदानववैरिणम् ।करुणावरुणावासं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १७॥ अधोक्षजं सुधालापं बुवमानसवासिनम् ।अधिकानुग्रहं रक्षं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १८॥ नारसिंह दारुणास्यं क्षीराम्बुधिनिकेतनम् ।वीराग्रेसरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ १९॥ अच्युतं कच्छपाकारमुज्ज्वलं कुण्डलोज्ज्वलम् ।सच्चिदानन्दवीर्याढ्यं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २०॥ (सच्चिदानन्दरूपेशं) जनार्दनं घनाकारं सनातनतमं विभुम् ।विनायकपतिं नाथं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २१॥ उपेन्द्रमिन्द्रावरजं कवीन्द्रनुतविग्रहम् ।कविं पुराणपुरुषं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २२॥ हरिं सुरासुरनुतं दुरालोकं दुरीक्षणम् ।परेशं मुरसंहारं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २३॥ श्रीकृष्णं गोकुलावासं साकेतपुरवासिनम् ।आकाशकालदिग्रूपं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ २४॥ कृष्णस्तोत्रं चतुर्विंशमेतत् सन्नामगर्भितम् ।यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २५॥ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ २६॥ इति श्रीकृष्णचतुर्विंशतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Krishnagiti Namavalih : कृष्णगीति नामावलिः

Krishnagiti Namavalih : कृष्णगीति नामावलिः (अवलम्बः – महाकवि मानवेदराजेन विरचिता कृष्णगीति) Krishnagiti हरिः श्री गणपतये नमः अविघ्नमस्तु ।नमः शिवायै च नमः शिवाय ।ॐ नमो नारायणाय ।ॐ सरस्वत्यै नमः ।ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।श्रिकृष्णाय परब्रह्मणे नमः ।नमोस्तुते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि मां ।यथा त्वत् चरणांभोजे रतिस्यादनपायिनी ॥Serial No. Names (Part Shloka-padyam pAdam number)क्रमांक नाम (भागः पद्यम्-श्लोकः/ पादम् संख्या)विष्णु-कृष्ण नामानि१. ॐ जगति सुकृतिलोकैः नन्दिताय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)२. ॐ आनन्दिताशाय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)३. ॐ कळविरणितवंशीभासमानाय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)४. ॐ असमानाय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)५. ॐ पशुपयुवतिभोग्याय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)६. ॐ सजलजलदपाळीमेचकाय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)७. ॐ देवतादेवताय नमः । (अवतारम् श्लोकः १)८. ॐ नन्देन रामेण यशोदया च प्रेम्णा सदयं लाळ्यमानाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)९. ॐ दिव्यगव्या आदीव्यमानाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)१०. ॐ विभुधपरिवृढाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)११. ॐ अघमोक्षं पुष्णमानाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)१२. ॐ परमतमपदोद्भासकाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)१३. ॐ गुरवे कृष्णाय नमः । (अवतारम् श्लोकः २)१४. ॐ सौवर्णाद्भुतभूषणोज्ज्वलवपुषे नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)१५. ॐ संवीतपीतांबराय नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)१६. ॐ नीलांभोदनिभाय नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)१७. ॐ धृतगदाशंखारिपङ्केरुहैः भुजैः भ्राजिष्णवे नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)१८. ॐ विश्वजनोपजनोपतापहरणे स्वयं धृष्णवे नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)१९. ॐ गुरुवायुमन्दिरविरोचिष्णवे नमः । (अवतारम् श्लोकः ३)२०. ॐ विष्णवे नमः । (अवतारम् श्लोकः ४)२१. ॐ मुरमथनाय नमः । (अवतारम् श्लोकः ४)२२. ॐ वृष्णीश्वराय नमः । (अवतारम् श्लोकः ४)२३. ॐ लक्ष्मीनाथाय नमः । (अवतारं/पदं १ श्लोकः ६)२४. ॐ जगदवनकलादीक्षिताय नमः । (अवतारं/पदं १ श्लोकः ६)२५. ॐ शर्वादिकविबुधजनैः उर्व्या च साकं क्षिरांभोधेः तीरं गत्वा वेधसा पुरुषसूक्तेन भक्त्या स्तुताय नमः । (अवतारं/पदं १ श्लोकः ७)२६. ॐ वेधसं समाधौ दिवि गिरा अवतारवृत्तान्तं श्रावयित्वा गां आश्वासितवते नमः । (अवतारं/पदं १ श्लोकः ८)२७. ॐ मायया अहिपतौ रोहिण्यां आहिते देवहेतोः देवकीं समविशतवते नमः । (अवतारं/पदं २ श्लोकः १७)२८. ॐ हरये नमः । (अवतारं/पदं ३ श्लोकः १८)२९. ॐ बोधमयाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् १)३०. ॐ अव्ययाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् १)३१. ॐ लोकहिताय अनन्तं रूपं भजमानाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् १)३२. ॐ यस्यावतारस्मरणात् जनाः दुरन्तं भवसागरं तरन्ति तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् १)३३. ॐ अजिताय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् २)३४. ॐ यस्य सुललितपदभाजां कुतोऽपि इह न हानिस्तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् २)३५. ॐ त्रिभुवनसाक्षिणे नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ३)३६. ॐ तनुगुणकृतिमरणभवविहीनाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ३)३७. ॐ भजतां अरणाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ३)३८. ॐ भक्तानां भजनार्थं तनुगुणकृतिमरणभवान् भजमानाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ३)३९. ॐ सुमहितधाम्ने नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ४)४०. ॐ यस्य नाम्नां स्मरणस्मारणनिकथननिशमनैः जगति जनिमृतिं न एति तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ४)४१. ॐ भवहराय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ५)४२. ॐ यस्य विहतसमाधिं समाधिं विदधत् भरिताधिकमहिताधिं भवपाथोधिं गोवत्सपदवत् तनुते तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ५)४३. ॐ मुरहराय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ६)४४. ॐ माधवाय नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ६)४५. ॐ खलनृपकृतभूभारव्यपहारिणे नमः । (अवतारं/पदं ४ पद्यम् ६)४६. ॐ जयन्त्यां निशीथे शिशिररुचि उदीते वियति प्रावृट् पयोदं यथा (तथा) प्रातुर्भूताय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २५)४७. ॐ चक्रायुधाय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २५)४८. ॐ कृष्णाभिख्याय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २५)४९. ॐ अक्षीणाभाय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५०. ॐ दयार्द्रैर्मृदुहसितसखैः वीक्षणैः ईक्षमाणाय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५१. ॐ परस्मै पुरुषाय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५२. ॐ अक्षामपुण्यैः लक्ष्याय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५३. ॐ त्रैलोक्याधीशाय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५४. ॐ पित्रा शौरिणा पुष्टादरं स्तुताय नमः । (अवतारं/पदं ४ श्लोकः २६)५५. ॐ महितशिरोधृतमणिमकुटाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् १)५६. ॐ तिलकविभासितफालाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् १)५७. ॐ नतचिल्लीजितवल्लीततिपृथुनयनजितांबुजजालाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् १)५८. ॐ नितरामनुरूपरूपाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् १)५९. ॐ त्रिभुवनबन्धुरगन्धवहाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् २)६०. ॐ मणिकुण्डलमण्डितगण्डाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् २)६१. ॐ अधररुगगञ्चितदन्तगणाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् २)६२. ॐ मुखनिन्दितपङ्कजषण्डाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् २)६३. ॐ निर्मलकौस्तुभकम्रगळाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ३)६४. ॐ लसदंसगळितवनमालिने नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ३)६५. ॐ वत्सविराजितवत्सतलाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ३)६६. ॐ वरहारोदितरुचिजालाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ३)६७. ॐ करधृतदरकमलारिगदाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ४)६८. ॐ जठरोषितभुवकदंबाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ४)६९. ॐ केसरभासुरनाभितलाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ४)७०. ॐ शांबरकम्रनितंबाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ४)७१. ॐ करिवरकरकमनोरुयुगाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ५)७२. ॐ जानुकृताखिललोभाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ५)७३. ॐ प्रसृतायुगजितकेकिगळाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ५)७४. ॐ प्रपदाधुतकमठविशोभिने नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ५)७५. ॐ वल्गुरुगाततगुल्फयुगाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ६)७६. ॐ नूपुरभासुरपादाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ६)७७. ॐ भंगिपदांगुलिपंङ्क्तिधराय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ६)७८. ॐ मणिघृणिधुतविधुपादाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ६)७९. ॐ मृदुरेखासखपादतलाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ७)८०. ॐ पदनतमतिशोधिपरागाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ७)८१. ॐ अमलतमाभमालनिभाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ७)८२. ॐ जगदानन्दननिखिलांगाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ७)८३. ॐ जगदभिरूपाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ८)८४. ॐ दिव्यरूपाय नमः । (अवतारं/पदं ५ पद्यम् ८)८५. ॐ कीर्तिपयोनिधये नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः २७)८६. ॐ देवकीवसुदेवाभ्यां ईडिताय नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः २७)८७. ॐ ᳚युवां मां ब्रह्मधिया अथवा सुतधिया शश्वत् संस्मरन्तौ अमितैः पुण्योत्करैः प्राप्यं मद्पदं क्षिप्रं आप्नुयात्᳚ इति पितरौ उक्तवते नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः २८)८८. ॐ ᳚नन्दालये मां निधाय तत्र यशोदया प्रसूतां नन्दसुतां आदाय अत्र निषीद᳚ इति पितरं उक्तवते नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः २९)८९. ॐ पशुपालमणये नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः २९)९०. ॐ शिशुतां इतवान् जगतीमहितौ पितरौ प्रणयात् अधिकं विधुरौ कृतवते नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः ३०)९१. ॐ शौरिणा गोकुलं गत्वा यशोदायाः सूतितल्पे विन्यस्ताय नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः ३१)९२. ॐ वलभिदुपलनीलवपुषे नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः ३५)९३. ॐ सूतितल्पे लसते रुदन्ते मुग्द्धवक्त्राय नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः ३५)९४. ॐ यस्य मुग्द्धवक्त्रं दृग्भ्यां पीत्वा यशोदा मोदं प्राप्तवती तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ५ श्लोकः ३५)९५. ॐ यस्य वदनं अलं उदीक्ष्य वसुदेवो गोजालं आप्ळुतसात् अकृत तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ६ पद्यम् १)९६. ॐ यं ᳚बालक चिरं जीव᳚ इतिआशंस्य पशुपकलापाः वृषगोततिं निशया कपिशं अकृषत तस्मै नमः । (अवतारं/पदं ६ पद्यम् ४)९७. ॐ पूतनायाः प्राणैः सह प्राणान्मोचकं मेचकं चुचुकं पीतवते नमः । (अवतारं/पदं ७ पद्यम् ६)९८. ॐ केशवाय नमः । (अवतारं/पदं ८ श्लोकः ४०)९९. ॐ विवृत्तनेत्रां विकीर्णकेशां विमुक्तनादप्रतिनादिताशां पूतनां पदौ भुजौ विसारितां पादपौघैः सह भूमौ पातितवते नमः । (अवतारं/पदं ८ श्लोकः ४०)१००. ॐ मृतपूतनावपुरुपरि कृतखेलनाय

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Krishna Giti or Krishna NatakaM of Manaveda Raja: कृष्णगीति अथवा कृष्णनाटकम

Krishna Giti or Krishna NatakaM of Manaveda Raja: कृष्णगीति अथवा कृष्णनाटकम् जगति सुकृतिलोकैर्नन्दितानन्दिताशा कळविरणितवंशीभासमानासमाना ।पशुपयुवतिभोग्या देवतादेवता सा सजलजलदपाळीमेचका मे चकास्तु ॥ १॥प्रेम्णालं लाळ्यमानः सदयमिह सदा नन्दसंज्ञेन पित्रा रामेण ज्यायसा वा विवशमतियशोदाख्यया वा जनन्या ।आदीव्यन् दिव्यगव्या विबुधपारे(परि)वृढो रिष्टदाताघमोक्षं पुष्णन् कृष्णो गुरुर्मे परमपदसमुद्भासको बोभवीतु ॥ २॥सौवर्णाद्भुतभूषणोज्ज्वलवपुः संवीतपीताम्बरो नीलाम्भोदनिभो भुजैधृ(र्धृ)तगदाशङ्खारिपङ्केरुहैः ।भ्राजिष्णुर्गुरुवायुमन्दिरविरोचिष्णुः स विष्णुः स्वयं धृष्णुर्विश्वजनोपतापहरणे काव्यं मम ख्यापयेत् ॥ ३॥((१)वंशी-वेणुः । देवतानामपि देवता । (२)अत्र प्रस्तुतश्लेषेण भगवान् श्रीकृष्णस्तन्नामकः स्वगुरुरपि विवक्षितः ॥ (३)अरि चक्रम् ।)विक्रान्त्याक्रान्तविश्वद्विषत इहगुरोविङ्क्र(र्विक्र)माख्यस्य राज्ञः स्वस्त्री(स्री)यो मानवेदो मुरमथनकथावर्णनालोभनुन्नः ।विष्णोर्वृष्णीश्वरस्य प्रथयति पदरूपेण किञ्चित् कथां तां कान्तां विश्वव्यथान्तामिह विबुधजनाः सन्तु सन्तोषवन्तः ॥ ४॥लक्ष्मीनाथ पुरा सुरासुरमृधे ये कालनेम्यादय- स्त्वत्पिष्टा अपि शिष्टकर्मबलतो दैत्या न मुक्तिं गताः ।तेषां भूरिभरेण भूतलजुषां सा भूतधात्री व्यथा- पात्री वेधसमेत्य वेगत इति प्रोवाच देवावृतम् ॥ ५॥पाटिरागेण गीयते । एकताळेन वाद्यते ।त्रपयालपितुमनीशामपि मांव्वसनभरो हि कथापयतीमांवनितानामिह वचनं परुषंविषहेथा मम रुगाधिकपरुषम् ।(४)नुन्नृः = प्रेरितः । पदरूपेण = गानरूपेण । विश्वव्यथान्तां = सकलदुःखसंहर्त्रीं (५)मृधं = युद्धम् ।पल्लवम् ।नाथ कृपालय परिपालय मांपापनृपालकरचिताधिमिमां (नाथ)निगदितमिदमयि निशमय च विधेशुचमिह मम शमय च शमजलधेवनितावच इति न वचो हेयंमम, किमु गव्यं शकृदिति हेयं (नाथ)स्वशिरो न तु शक्नोति स विनतंपन्नगपतिरुन्नेतुं नियतंकमठाधिपमपि महितं भुवनेन कुशलमयि मन्ये मम वहने (नाथ)कुलशिखरिकुलं खलु बत पतितंसपदि भवेदधिजलनिधि नियतंगतिरसि मम तु चकोरी शरणंकमयति जगति विना हिमकिरणं (नाथ)व्यसनमनोपममुदितमनूनंमम तु मनोगतमधुना नूनंपरममतो नतजगदवनरतेप्रभुरिह तु भवान्ननु भुवनपते (नाथ)(अधिजलधि = समुद्रे । कमयति = कं गच्छति? ।अयेतः – परस्मैपद कविप्रयोगात् । अनोपमं असदृशम् । साधुत्वं चिन्त्यम् ॥)उर्वीं गुर्वीं वहन्तीं विपदमिति वदन्तीं पतन्तीं पदान्ते पश्यन् बाष्पं वमन्तीं त्वयि स कृतमना व्याजहाराधिहारः ।वत्से सर्वंसहे त्वं क्षणसमयमये साध्वि सर्वं सहेथा लक्ष्मीनाथः स साक्षाज्जगदवनकलादीक्षितो रक्षिता नः ॥ ६॥एवं व्याहृत्य शर्वादिकविबुधजनैः साकमुर्व्या च तीरंक्षीराम्भोधेस्तवोरस्थलघृततुळसीसौरभीलोभनीयम् ।गत्वा नत्वा च स त्वामजित पुरुषसूक्तेन भक्त्योपतस्थेयावत्तावत्समाधौ दिवि तव गिरमाकर्ण्य मोदादगादीत् ॥ ७॥हे देवा देवदेवेरितमतिरिदमावेदये दानवारे- र्लीलासाहाय्यहेतोर्जगति यदुकुलं तन्वतो धन्यधन्यम् ।साकं नाकाङ्गनौघैरवतरत जवादेवमादिश्य गोभि- र्गामाश्वास्याप्तगेहो भवदवतरणात्युत्सुकोऽयं न्यवात्सीत् ॥ ८॥त्वत्सान्निध्येन धन्ये पुर इह मधुरानामके देवकीं तांपाणौकृत्याथ शौरिर्व्यचलदतिनृशंसेन कंसेन साकम् ॥आदायाकाशवाण्या क्रुधमपि च कृपाणीं कृपां स्वां त्रपां वाहित्वेमां हन्तुकामं यदुपतिमयमालोक्य वाक्यं बभाषे ॥ ९॥((६)आधिहारः = तापहर्ता ॥ (८)गोभिः = वाग्भिः ॥ (९)पाणौकृत्य = परिणीय ॥)सामन्तमलहरिरागेण गीयते । चम्पताळेन वाद्यते ।अनृशंस ननु कंस वसुधाभृदवतंसकथमिति व्यवसितं बत कृपाकुलमतेत्वयि विदितवेद्ये किमुपदेश्यमन्येनतदपि मे मुखरतां प्रणयिता वितनुते ।पल्लवम् ।वरमते साहसान्ननु विरम नरपतेपरमतेजोनिधे सपदि बत यदुपते (वर)वपुषैव सह मृत्युरिह जायतेऽचिरादतिचिरादपि च वा मृतिरियं सुनियताकिमनित्यतासदननिजतनोरपि च कृतेविदधते परहतिं निजहिते नृप रताः (वर)स्वसृहतेरपि तेन जीवितेन किमु तेनिजनाशनतो यशो वरमिह तु भूतलेउद्य(दय)ति सदा जगन्मदयाते(यति)यशोमय-शशाङ्के कळङ्कोऽय(द्य)नोदयेतामले (वर)(वपुषैव सहेत्यादि “मृत्युर्जन्मवतां वीर देहेन सह जायते ।अद्य वा(?)ब्दशतान्ते वा मृत्यु(त्युर्वै)प्राणिनां ध्रुवः” इति भागवताशयविवरणम् ॥)वनितावधो निखिलकुशलानि नाशये-दिति नीतिमयि फलय न तु विबुधविरचितांबहुमतो बहुशोऽपि विबुधविजयेन तेधर्मपालो ननु परामृशन्न वनितां (वर)दयनयि(नीय)तरजने भवदीयमतिरन्य-रूपैव ननु मनो विमलय विमर्शनान्विपदां हि विवरमविचार इति बुधवचोविस्मृतं किमु विभो विदितमपि दर्शनात् (वर)त्वदधीनमतिदीनमपराधलवहीन(-)ममिताधिभरलीनमतिभीतिभाजनंनिजशिशुजनं विवशमपकरुणमुपयमंनय न(नयनं)पुनरुपयमे बत जातवेपनं (वर)हितमिदं निगदितं शङ्कां न हरति चेत्परमपि मतं परमकरुण श‍ृणु पुनरिदंननु सुतान् दातास्मि यत एव तव भयंनृप रुषं त्यज परुषमयि कुरु हृदुरुमुदं (वर)शौरेस्त्वदाहितमतेः किमु वाक्यभङ्ग्या किं देवकीसुकृतपुञ्जविजृम्भितेन ।कंस्त(कंसस्त)थेति तरसैव तदीयवाच- मूरीचकार च चकार च हन्त चिन्ताम् ॥ १०॥सत्या किमेषा वसुदेववाणी तथ्या किमेषा गगनोत्थवाणी ।कालेन चैतन्निखिलं यथावत् ज्ञायेत तत्सम्प्रति सम्प्रतीक्षे ॥ ११॥एवं विचिन्तयन्नेव विविधं विवशाशयः ।विवेश स पुरं विष्णो विदूषितमनास्त्वया ॥ १२॥भोजाधिपात्स हरिणीं हरिणारिवर्य- पाणिद्वयी महितपञ्जरतो यथा ताम् ।धीमान्विमोच्य तरुणीं कृपणां कृपाण- पाणेर्भवत्प्रहितधीर्गृहमाप शौरिः ॥ १३॥कंसो यथोदितमथो तव तातनीतं तं सोऽवधीन्न कृपया निजभागिनेयम् ।आदाय नन्दनमुदारमना निकेत- मागम्य शौरिरखिलं निजगाद जायाम् ॥ १४॥((१३)हरिणारिः = सिंहः । शौरिर्वसुदेवः ॥)धन्येयं नारीदं वाक्यं श्रुत्वा स्मृत्वा चैतद्वृत्तम् ।विद्युन्मालाभिख्यं पुत्रं दृष्ट्वा चासीत्तुष्टा विष्णो ॥ १५॥तावश्च नारदमुनिर्मधुरापुरी(रीं)ता- मागच्छदाशयमयं भवतो विदित्वा ।कंसं शशंस च नृशंसमलं प्रशंसन् तं सन्निविष्टमतिहृष्टमतिं सभायाम् ॥ १६॥दैतेया यूयमेते यदव इह सुरास्त्वद्वधायैव विष्णुः प्रादुःष्यादेवमुक्तो विदुतयदुकुलः पञ्चतां षट् तनूजान् ।प्राणैषीदेष शौरेर्निभृतमहिपतावाहिते माययाथो रोहिण्यां देवकीं तां त्वमपि समविशो देव हे देवहेतोः ॥ १७॥भैरविरागेण गीयते । एकताळेन वाद्यते ।परिपाण्डुपयोधरभरभासाशरदिव शुशुभे तदनु शुभा सा((१५)अत्र मुद्रालंङ्काररीत्या “धन्येयं नारी”त्यस्य ज्योतिषिक “वाक्या”(?)न्तःपातिता वृत्तस्य विद्युन्मालाभिधेयता च द्योत्यते ॥(१७)प्रादुःष्यात् प्रादुर्भवेत् । विदुतयदुकुलः सन्तापितयादवगणः । अहिपतौ शेषांशभूते बलभद्रे ॥)पल्लवम् ।मञ्जुळदौहृदमन्दिरभूताकथमिव कथनीया तव माता (मञ्जु)कृशतरमुदरं गरिमपरीतंविबुधव्यसनमतो विपरीतं (मञ्जु)स कुचो मलिनमुखोऽतिकठोरोयदुपवदजनि विमुक्ताहारो (मञ्जु)विजहौ सा भरभयतो भूषा-मथ केवलतैवाजनि भूषा (मञ्जु)अदसीयमहो निभृतं हसितंमृदुळं च गतं भृशनिश्वसितं (मञ्जु)अवलोकितुमिव तव लळितमुखंकुचयुगळमभूदथ विनतमुखं (मञ्जु)आशां पाकरिपोः प्रसाधिततमामापादयन्नादरा- दालम्बो विबुधावलेस्त्रिजगतामेकावतंसो हरे ।मन्दम्मन्दमहो वहन् निजतनोरापूर्णतामन्वहं सोऽयं दौहृदपार्वणेन्दुरिह नो कं सप्रमोदं व्यधात् ॥ १८॥(यदुपवत् = कंस इव ॥(१८)कंसस्य प्रमोद न व्यधादेवेति च श्लेषभङ्ग्या प्रतिपाद्यते ॥)भवदेकावलम्बा सा वसुदेवकुडुम्बिनी ।आललम्बे परां शोभां जितदेवनितम्बिनी ॥ १९॥कंसस्त्वापन्नसत्त्वामिह निजसहजां शोकदामेकदा तां त्वत्सान्निध्योत्थतेजःप्रसरभृशपरिध्वस्तनेत्रप्रचाराम् ।निध्यायैवं स दध्यौ किमु कुसृतियुतः कोऽप्यसौ कृष्णसर्पोमत्प्राणैः पारणाय स्वसुरुदरगुहामध्यमद्याध्यवात्सीत् ॥ २०॥मन्नाथायां हतायां स्वसरि च युवतौ धर्मपत्न्यां च शौरे- रन्तर्वत्न्यामकीर्तिर्मम तु सहचरी नूनमाजीवनान्तम् ।हा हन्ताहिंसितायां पुनरिह सहसैवार्भकः कोऽप्यमुष्याः प्रादुर्भूतः करिष्यत्यसुरवरचमूघस्मरो भस्मसान्माम् ॥ २१॥एवं दोळायितात्मा नरपतिरजिघांसाजिघांसाभिभूतः पुत्रं तस्याः प्रसूतं प्रसभमिह निहन्तास्मि हन्तास्मि नूनम् ।इत्थं निश्चित्य दुःस्थाशय इह शयने भोजने सोऽथ याने स्नाने वा संस्मरंस्त्वां प्रतिपुरमवसत्तत्प्रसूतिप्रतीक्षः ॥ २२॥((२०)कृष्णसर्पः = कृष्ण एव सर्पः । तज्जातीयः पन्नगश्च । पारणाय = पारणां कर्तुम् ।प्राणैः पारणायेति प्रयोगश्चिन्त्यः ।(२२)द्वितीयं अस्मीत्यहमर्थेऽव्ययम् ॥)चतुर्मुखमुखा बहिर्मुखाः फुल(ल्ल)मुखाम्बुजाः ।तुष्टुवुस्त्वां तदा तुष्टा निविष्टमुद्रे(दरे)हरे ॥ २३॥मेच्चिद्भोळिरागेण गीयते । एकताळेन वाद्यते ।बोधमयाव्यय लोकहिताय हिभजसे रूपमनन्तंयत्स्मरणादपि भवसागरमिहसपदि तरन्ति दुरन्तंपल्लवम् ।याम इमे शरणं त्वां यदुवरयाम इमे शरणं त्वांत्वयि विमुखानां पतनं सुनियत-मपि सुमहितपदभाजांक्वापि कुतोऽपि न हानिरिहाजिततव सुलळितपदभाजां (याम)त्रिभुवनसाक्षी भजतेऽजित तनु-गुणकृतिमरणभवान्नो((२३)बर्हिर्मुखाः देवाः ॥)तदपि च तान्त्रि(न्नि)जभजनाय भजतिभजतामरण भवान्नो (याम)स्मरणस्मारणनिकथननिशमन-मयि खलु तव तनुनाम्नांजगति वितन्वञ्जनिमृतिमेता-मेति न सुमहितधाम्नां (याम)भवहर तनुते भवपाथोधिंभरिताधिकमहिताधिंगोवत्सपदं त्वयि तु समाधिंविदधद्विहतसमाधिं (याम)मुरहर खलनृपकृतभूभारंव्यवहर सहसोदारंमाधव मान्द्यं ननु तनु(मान्यान्ननु)तनु(न)या नोपरिपालय तरसा नो (याम)नुत्वा नत्वा गते त्वामिति विबुधगणे प्रावृताशा पयोदैः प्रावृट् प्रादुर्बभूव प्रकटरसमुपानीततत्तत्पदार्था ।अत्यासन्नप्रसूतिं सपदि परिचरन्तीव हन्तासहाया- मेनामत्यन्तदीनामिह पुनरनुकूले विधौ को न बन्धुः ॥ २४॥(विह्तसमाधिं = निरस्तसमस्तसन्तापम् ॥)कृष्णाभिख्यं जगत्यां प्रचुरतरतमोवर्धने बद्धदक्षिं(दीक्षं) व्यादीव्यत्पुष्करास्यं भुवनमहितमारात्कृतार्कप्रकाशम् ।जाया शौरेरुदीते शिशिररुचि निशीथे जयन्त्यां भवन्तं प्रादुश्चक्रेऽथ चक्रायुध वियति यथा प्रावृडेषा पयोदम् ॥ २५॥अक्षीणाभं दयार्द्रैर्मृदुहति(सि)तसखैर्वीक्षणैरीक्षमाणं लक्ष्मीनाथं स साक्षात् परमिह पुरुषं लक्ष्यमक्षामपुण्यैः ।त्रैलोक्याधीशमालोक्य च निजतनयं विस्मयस्नेहमोदै- राविष्टात्माथ शौरिः सदयित इति तुष्टाव पुष्टादरं त्वाम् ॥ २६॥कानक्कुर्ञिरागेण गीयते । एकताळेन वाद्यते ।महितशिरोधृतमणिमकुटं वर-तिलकविभासितफालंनतचिल्लीजितवल्लीतति पृथु -नयनजिताम्बुजजालं((२५)कृष्णाभित्र्यं = कृष्णनामधेयं, नीलकान्तिमिति च । तमोवर्धने = तमोगुणनाशने, अन्धकाराधिक्यकरणे च ।पुष्करास्यं पद्ममुखं, जलमुखं च । आरात्, समीपे दूरे च ॥)पल्लवम् ।कथये माधव कथमिव रूपंतव नितरामनुरूपं (कथ)त्रिभुवनबन्धुरगन्धवहं मणि।कुण्डलमण्डितगण्डंअधररुगञ्चितदन्तगणं मुख-निन्दितपङ्कजषण्डं (कथ)निर्मलकौस्तुभकम्रगळं लस-दंसगळितवनमालंवत्सविराजितवत्सतलं वर-हारोदितरुचिजालं (कथ)करधृतदरकमलारिगदं जठ-रोषितभुवनकदम्बंकेसरभासुरनाभितलं कपि-शाम्बरकम्रनितम्बं (कथ)करिवरकरकमनोरुयुगं मृदु-जानुकृताखिललोभं(वत्सतलं = उरस्थलम् । दरः = शङ्खः ।)प्रसृतायुगजितकेकिगळं प्रप-दाघृतकमठविशोभं (कथ)वल्गुरुगाततगुल्फयुगं वर-नूपुरभासुरपादंभङ्गिपदाङ्गुलिपङ्क्तिधरं नख-मणिधृ(घृ)णिधु(धृ)तविधुपादं (कथ)मृदुरेखासखपादतलं पद्-नतमतिशोधिपरागंअमलतमाभतमालनिभं जग-दानन्दननिखिलाङ्गं (कथ)दिव्यमिदं खलु तव रूपं लघुसंहर जगदभिरूपंअयि मामचिरादव कंसादल-मवमादसवतंसात् (कथ)देवकीवसुदेवाभ्यां देव कीर्तिपयोनिधे ।एवमीडित एतौ गामेवमीरितवान् भवान् ॥ २७॥(अवमात् = अधमात् ॥)मातस्तात तपस्यया हि युवयोर्मोमुद्यमानात्मना प्राग्जन्मस्मरणाय मे वपुरिदं दिव्यं मया दर्शितम् ।शश्वद् ब्रह्मधियाथवा सुतधिया मां संस्मरन्तौ युवां क्षिप्रं मत्पदमाप्नुयातममितैः प्राप्यं हि पुण्योत्करैः ॥ २८॥नन्दालये नन्दसुतां प्रसूतांयशोदयादाय यशोदयाब्धे ।निधाय मां तत्र निधे गुणानांनिषीद चात्रार्य विषीद मा त्वम् ॥ २९॥ (वर् मात्रार्य)शिशुतामितवानभिधाय भवा- न्विशदामिति गां पशुपालमणे ।प्रणयादधिकं विधुरौ पितरौ जनितावपि तौ जगती महितौ (जगतीमहितौ)॥ ३०॥विज्ञाय त्वन्मतं त्वां दधदथ गतवान् गोकुलं सूतितल्पे गृढं विन्यस्य चित्तं त्वयि च स तु यशोदाप्रसूतां सुतां ताम् ।धृत्वा विश्लेषपीडामपि सदनमुपेत्यास्त शौरिः पुरेव

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Krishnakriya ShaTka Gitam: कृष्णक्रियाषट्कगीतम्

Krishnakriya ShaTka Gitam: कृष्णक्रियाषट्कगीतम् विनिद्र जिवोऽहं गहन त्रासंसंसार अनले विधुर वासंअनन्तपुरष जगन्निवासअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ १॥ एकाकी विहारं च सर्व क्रियाएकाकी कर्मो धर्मश्च सकलंअनन्तपुरष जगन्निवासअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ २॥ पचामी पाकोहं यथा सामर्ध्यंफल जलेन सह वृन्दा नाथअनन्तपुरुष जगन्निवासअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ ३॥ Shrikrishna Karpura Stotram: श्रीकृष्णकर्पूरस्तोत्रम् करोमि देव ते शय्यारचितंआनन्ददायनी प्रियासहितंअनन्तपुरुष जगन्निवासअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ ४॥ नन्दनन्दनस्त्वं गोपिकाकान्तभक्तानां प्राणस्त्वं च जगन्नाथअनन्तपुरुष Krishnakriya जगन्निवासअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ ५॥ त्वया विना नाथ स्थले मत्स्याहंयथा प्राणहीना निर्देहि देहंआवाह्वती त्वं नित्य कृष्णदासःअत्रागच्छ स्वामी अत्रागच्छ ॥ ६॥ रचयिता — श्रीकृष्णदासः

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Shri Krishnakundashtakam: श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम्

Shri Krishnakundashtakam: श्रीकृष्णकुण्डाष्टकम् किं तपश्चचार तीर्थलक्षमक्षयं पुरा सुप्रसीदति स्म कृष्ण एव सदरं यतः ।यत्र वासमाप साधु तत्समस्तदुर्लभे तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ १॥ यद्यरिष्टदानवोऽपि दानदो महानिधे- रस्मदादिदुर्मतिभ्य इत्यहोवसीयते ।यो मृतिच्छलेन यत्र मुक्तिमद्भुतां व्यधात् तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ २॥ Shrikrishna Karpura Stotram: श्रीकृष्णकर्पूरस्तोत्रम् गोवधस्य निष्कृतिस्त्रिलोकतीर्थकोटिभी राधयेत्यवादि तेन ता हरिः समाह्वयन् ।यत्र पार्ष्णिघाटजे ममज्ज च स्वयं मुदा तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ३॥ क्वापि पापनाश एव कर्मबन्धबन्धना- द्ब्रह्मसौख्यमेव विष्णुलोकवासिता क्वचित् ।प्रेमरत्नमत्ययत्नमेव यत्र लभ्यते तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ४॥ फुल्लमाधवीरसालनीपकुञ्जमण्डले भृङ्गकोककोकिलादिकाकली यदञ्चति ।आष्टयामिकावितर्ककोटिभेदसौरभं तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ५॥ Krishnakundashtakam दोलकेलिचित्ररासनृत्यगीतवादनै- र्निह्नवप्रसूनयुद्धसीधुपानकौतुकैः ।यत्र खेलतः कोशोरशेखरौ सहालिभि- स्तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ६॥ दिव्यरत्ननिर्मितावतारसारसौष्टवै- श्छत्रिका विराजि चारु कुट्टिमप्रभाभरैः ।सर्वलोकलोचनातिधन्यता यतो भवेत् तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ७॥ माथुरं विकुण्ठतोऽपि जन्मधामदुर्लभं वास्काननन्ततोऽपि पाणिना धृतो गिरिः ।श्रीहरेस्ततोऽपि यत्परं सरोऽतिपावनं तत्र कृष्णकुण्ड एव संस्थितिः स्तुतास्तु नः ॥ ८॥ कृष्णकुण्डतीरवाससाधकं पठेदिदं योऽष्टकं धियं निमज्य केलकुञ्जराजितोः ।राधिकागिरीन्द्रधारिणोः पदाम्बुजेषु स प्रेमदास्यमेव शीघ्रमाप्नुयादनामयम् ॥ ९॥ इति महामहोपाध्यायश्रीविश्वनाथचक्रवर्तिविरचितं श्रीकृष्णकुण्डाष्टकं समाप्तम् ।

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फोन

Sapne Mein Mobile Tutna: सपने में अपने फोन के टूटने का सपना देखते हैं तो इसका क्या मतलब होता है ?

फोन के टूटने का सपना देखते हैं क्या आपने कभी सोचा है कि आपका अवचेतन मन आपके फ़ोन के टूटने की तस्वीरें क्यों बनाता है? सपनों के अपने छिपे हुए अर्थ होते हैं, और वे अक्सर हमारे गहरे विचारों, आशंकाओं और इच्छाओं को दर्शाते हैं। अगर आप अपने फ़ोन के टूटने का सपना देख रहे हैं, तो यह सिर्फ़ उस डिवाइस के बारे में नहीं है। यह एक प्रतीक है, एक रूपक है जो आपके निजी या पेशेवर जीवन में किसी गहरी बात का प्रतिनिधित्व करता है। Sapne Mein Mobile Tutna: क्या यह संपर्क टूटने का डर हो सकता है, गलत संचार की चिंता हो सकती है, या शायद तकनीक पर आपकी निर्भरता का प्रतिबिंब हो सकता है? जैसे-जैसे हम स्वप्न व्याख्या की जटिल भूलभुलैया में आगे बढ़ेंगे, आप इस अनोखे सपने के पीछे छिपे प्रतीकों की परतों को उजागर करेंगे, और समझेंगे कि आपका अवचेतन मन क्या संप्रेषित करने की कोशिश कर रहा है। Sapne Mein Mobile Tutna: सपने में अपने फोन के टूटने का सपना देखते हैं सपने में मोबाइल का टूटना ‌‌‌यदि आप सपने के अंदर एक टूटे हुए स्मार्ट फोन को देखते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आपका भटकाव हो सकता है। या आपके प्रिय की छवी को नुकसान होगा । क्योंकि फोन आजकल सबसे प्रिय चीजों मे से एक हो गया है। प्रतिकात्मक रूप से यह सपना यही संदेश देता है। ‌‌‌सपने के अंदर एक पुराने फोन को तोड़ना यदि आप जानबूझ कर एक पुराने फोन को तोड़ रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि आपके जीवन के अंदर कुछ बदलने वाला है। आप अपने  जीवन से पुरानी चीजों को हटाने वाले हैं। यह सपना आपके लिए अच्छा है। आपके जीवन मे कुछ नया घटित होगा । ‌‌‌सपने मे फोन का फटा हुआ स्क्रीन देखना यदि आप सपने के अंदर अपने या किसी भी फोन का फटा हुआ स्क्रीन देखते हैं तो आपको सावधान हो जाने की आवश्यकता है क्योंकि यह आपको बताता है कि आपके साथ किसी का झगड़ा हो सकता है। ‌‌‌जब भी आप कार्य करें तो अब आपको कार्य सोच समझ कर करना होगा ।हो सकता है कोई बेवजह आप से झगड़ा करने लग जाए । ‌‌‌ख्वाब मे फोन का काच टूटा हुआ देखना यदि आप सपने के अंदर मोबाइल फोन के टूटे हुए कांच को देखते हैं तो यह सपना नकारात्मक फल देने वाला होता है। इसका अर्थ यह है कि आपकी उम्मीदें टूट सकती हैं। हो सकता है कि ‌‌‌आप जिन कार्यों से उम्मीद कर रहे हैं।वे कार्य पूरे ही ना हों और आपकी उम्मीद पर पानी फिर जाए तो आपको इस बारे मे और अधिक सोच लेने की आवश्यकता है। ‌‌‌मोबाइल फोन की स्क्रीन पर चित्र का ना दिखना यदि आप एक ऐसा मोबाइल फोन देखते हैं ,जिसकी स्क्रीन पर आप चित्र नहीं देख पा रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि आपके अंदर आपसी समझ की कमी है। ‌‌‌आपको अपनी आपसी समझ को बढ़ाने का प्रयास करना होगा । ‌‌‌सपने मे मोबाइल फोन के अंदर दरारें देखना यदि आप सपने के अंदर मोबाइल फोन मे दरारें देखते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आपके प्रियजन चंचल हो गए हैं। आपको उनकी चंचलता परेशान कर सकती है। आपको सही समय पर सही निर्णय लेने की जरूरत है। सपने में दिखने वाली ये चीजें देती हैं शुभ संकेत, जल्द मिल सकती है अच्छी खबर सपने मे खराब मोबाइल को देखना ‌‌‌यदि आप सपने मे एक खराब फोन को देखते हैं या एक ऐसे फोन को देखते हैं जोकि काम नहीं कर रहा है तो इस प्रकार के सपने का मतलब यह है कि आप अपने हाथों से अपने लिए एक समस्या खड़ी कर रहे हैं। आपको अपने कार्यों पर सही से विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं आगे जाकर यही कार्य आपके लिए परेशानी का सबब ‌‌‌ तो नहीं बन जाएंगे । ‌‌‌सपने मे एक महंगे फोन को तोड़ना यदि आप सपने मे देखते हैं कि कोई महंगे फोन को तोड़ दिया है लेकिन वह अभी भी एक हिस्से के रूप मे काम कर रहा है तो इसका अर्थ यह है कि कोई ऐसा इंसान है जो आपकी प्रतिष्ठा हो हिलाने की कोशिश मे लगा हुआ है। आपको इस प्रकार के इंसान की पहचान करने की जरूरत है। ‌‌‌टूटे हुए फोन की वजह से काम का बंद होना यदि आप ख्वाब मे यह देखते हैं कि कोई कार्य टूटे हुए फोन की वजह से बंद हो गया है तो यह एक नकारात्मक संकेत देता है। इसका अर्थ यह है कि व्यवसायिक क्षेत्र के अंदर समस्याएं पैदा होगी । ‌‌‌सपने मे बातचीत के दौरान मोबाइल गिरकर टूट जाना यदि आप सपने मे यह देखते हैं कि आप किसी के साथ बात चीत कर रहे हैं और उसके बाद आपका मोबाइल इससे गिर जाता है और उसके बाद यह टूट जाता है तो इसका अर्थ यह है कि बातचीत करने वाले व्यक्ति के साथ आपका संघर्ष हो सकता है।  ‌‌‌एक सपने मे फोन को टूटा हुआ देखकर दुखी होना यदि आप सपने मे अपने फोन को टूटा हुआ देखकर दुखी होते हैं तो इसका मतलब यह है कि आपको जल्दी ही कुछ ऐसा समाचार मिल सकता है जो आपको निराश कर सकता है। ‌‌‌गुस्से मे एक फोन को तोड़ देना यदि आप सपने मे यह देखते हैं कि आप एक फोन को गुस्से के अंदर तोड़ देते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप अपने काम के अंदर उलझे हुए महसूस कर रहे हैं  या फिर इसका अर्थ यह हो सकता है कि आप का मन किसी से बात करने को कर रहा है लेकिन आप उससे बात नहीं कर पा रहे हैं। मोबाइल फोन का फट जाना यदि आप सपने मे यह देखते हैं कि मोबाइल फोन फट गया है या उसकी बैटरी फट गई है और आप घबरा गए हैं यह सपना इस बात को बताता है कि आपके अंदर किसी बात को लेकर डर बना हुआ है। संभव है कि वह डर सूचना से संबंधित हो । अपने मन के अंदर आपको झांक कर देखना होगा कि आप किस ‌‌‌ बात को लेकर डरे हुए हैं। ‌‌‌सपने के अंदर मोबाइल फोन

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Kushotpatini Amavasya

Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका

Kushotpatini Amavasya 2025 Date: भाद्रपद मास की अमावस्या को अत्यंत शुभ माना गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भाद्रपद मास की कुशोत्पाटिनी अमावस्या क्यों खास है. आइए जानते हैं इस अमावस्या का पौराणिक महत्व और इस दिन क्या करना शुभ रहेगा. Kushotpatini Amavasya 2025: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को अत्यंत महत्व दिया गया है. अमावस्या ही एकमात्र ऐसी तिथि है जिससे पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाती है. परंपरा के अनुसार, पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान इत्यादि कर्म किए जाते हैं. भाद्रपद मास की अमावस्या इसलिए भी खास है Kushotpatini Amavasya क्योंकि इस दिन कुश नामक पवित्र घास को साल भर के धार्मिक कार्यों के लिए इकट्ठा किया जाता है. आइए जानते हैं कि इस साल भाद्रपद मास की कुशोत्पाटिनी अमावस्या कब है, क्यों खास है, इस दिन क्या करना शुभ फलदायी होता है. Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम कब है कुशोत्पाटिनी अमावस्या: Kab Hai Kushotpatini Amavasya दृक पंचांग के अनुसार, इस साल कुशोत्पाटिनी अमावस्या शनिवार 23 अगस्त को पड़ रही है. अमावस्या तिथि की शुरुआत 22 अगस्त को रात 11 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी. जबकि, इस तिथि की समाप्ति 23 अगस्त को सुबह 11 बजकर 35 मिनट पर होगी. ऐसे में उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए इस साल कुशोत्पाटिनी अमावस्या शनिवार 23 अगस्त को मनाई जाएगी और इसी दिन पूरे साल भर धार्मिक कार्यों के लिए कुश इकट्ठा किया जाएगा. अमावस्या के दिन शनिवार पड़ने के कारण इसका महत्व और भी अधिक बढ़ गया है.  क्या है कुशोत्पाटिनी अमावस्या का धार्मिक महत्व: What is the religious significance of Kushotpatini Amavasya ? भाद्रपद अमावस्या को हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. यह तिथि श्राद्ध पक्ष की शुरुआत का प्रतीक होती है. इस दिन से पितरों की शांति के लिए तर्पण, दान, और जप जैसे कर्म आरंभ किए जाते हैं. Kushotpatini Amavasya इसके अलावा इसी दिन इसी दिन से ‘कुश’ नामक पवित्र घास को धार्मिक कार्यों के लिए भूमि से विधिवत उखाड़ा जाता है. यही कारण है कि इसे कुश पितृणी अमावस्या भी कहा जाता है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने कुशा को धार्मिक कर्मों के लिए योग्य और पवित्र घोषित किया था. इसलिए इस दिन तोड़ी गई कुशा का उपयोग श्राद्ध, यज्ञ और तप में विशेष फलदायक होता है. 23 अगस्त को यह अमावस्या क्यों है खास: Why is this Amavasya on 23rd August special? हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2025 में यह अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है, Kushotpatini Amavasya जिससे इसका स्वरूप शनि अमावस्या भी हो गया है. यह दिन उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी है जो शनि दोष, साढ़ेसाती, या जीवन में बार-बार आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाना चाहते हैं. इस दिन कौन-कौन से कार्य करें: What tasks should be done on this day? श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि, सभी 16 चरणों के सरल वैदिक मंत्रों के साथ कुश उखाड़ने का मंत्र: mantra to uproot kush “कुशाग्रह वस्ते रुद्रा कुश मध्य तू केशवह कुश मुले वसे ब्रह्म कुशानमें देही मेदिनी” कुशा उत्पत्ति कथा: Kusha origin story Kushotpatini Amavasya: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय हिरण्यकश्यप के बड़े भाई हिरण्याक्ष ने धरती का अपहरण कर लिया। हिरण्याक्ष पृथ्वी को पताल लोक ले गया राक्षस राज इतना शक्तिशाली था कि उसका कोई विरोध तक ना कर सका। तब धरती को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया तथा हिरण्याक्ष का वध कर धरती को मुक्त कराया। तथा पृथ्वी को पुनः अपनी पूर्व अवस्था में स्थापना किया। पृथ्वी की स्थापना करने के बाद भगवान वाराह बहुत भीग गए थे Kushotpatini Amavasya जिसके कारण उन्होंने अपने शरीर को बहुत तेज झटका, झटकने से उनके रोए टूटकर धरती पर जा गिरे जिससे कुशा की उत्पत्ति हुई। कुशा की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु तथा शीर्ष भाग में भगवान शिव विराजते हैं। मान्यातानुसार कुशा को किसी साफ-सुथरे जल श्रोत अथवा पोखर से प्राप्त करना चाहिए। स्वयं को पूर्व की दिशा की तरफ मुंह करना चाहिए तथा अपने हाथ से कुशा को धीरे-धीरे उखाड़ना चाहिए है। ध्यान रहे कि यह साबुत ही रहे ऊपर की नोक भी ना टूटने पाए।

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ShrIKrishna Kavacham or Trailokyavijayam Kavacham:श्रीकृष्ण अथवा त्रैलोक्यविजयं नामकवचम्

ShrIKrishna Kavacham or Trailokyavijayam Kavacham: श्रीकृष्ण अथवा त्रैलोक्यविजयं नामकवचम् नारद उवाच । भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि किं मन्त्रं भगवान्हरः ।कृपया-ऽदात् परशुरामाय स्तोत्रं च वर्म च ॥ १॥कोवाऽस्य मन्त्रस्याराध्यः किं फलं कवचस्य च ।स्तवनस्य फलं किं वा तद्भवान्वक्तुमर्हसि ॥ २॥ ShrIKrishna Kavacham नारायण उवाच । मन्त्राराध्यो हि भगवान् परिपूर्णतमः स्वयम् ।गोलोकनाथः श्रीकृष्णो गोप-गोपीश्वरः प्रभुः ॥ ३॥ त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ।स्तवराजं महापुण्यं भूतियोग-समुद्भवम् ॥ ४॥ मन्त्रं कल्पतरुं नाम सर्वकाम-फलप्रदम् ।ददौ परशुरामाय रत्नपर्वत-सन्निधौ ॥ ५॥ स्वयंप्रभा-नदीतीरे पारिजात-वनान्तरे ।आश्रमे लोकदेवस्य माधवस्य च सन्निधौ ॥ ६॥ ShrIKrishna Kavacham: महादेव उवाच । वत्सागच्छ महाभाग भृगुवंश-समुद्भव ।पुत्राधिकोऽसि प्रेम्णा मे कवचग्रहणं कुरु ॥ ७॥ श‍ृणु राम प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डे परमाद्भुतम् ।त्रैलोक्यविजयं नाम श्रीकृष्णस्य जयावहम् ॥ ८॥ श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके राधिकाश्रमे ।रासमण्डल-मध्ये च मह्यं वृन्दावने वने ॥ ९॥ अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्व-मन्त्रौघविग्रहम् ।पुण्यात्पुण्यतरं चैव परं स्नेहाद्वदामि ते ॥ १०॥ यद्धृत्वा पठनाद्देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।शुंभं निशुंभं महिषं रक्तबीजं जघान ह ॥ ११॥ यद्धृत्वाऽहं च जगतां ShrIKrishna Kavacham संहर्ता सर्वतत्ववित् ।अवध्यं त्रिपुरं पूर्वं दुरन्तमपि लीलया ॥ १२॥ यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मा ससृजे सृष्टिमुत्तमाम् ।यद्धृत्वा भगवाञ्छेषो विधत्ते विश्वमेव च ॥ १३॥ यद्धृत्वा कूर्मराजश्च शेषं धत्ते हि लीलया ।यद्धृत्वा भगवान्वायुः विश्वाधारो विभुः स्वयम् ॥ १४॥ यद्धृत्वा वरुणः सिद्धः कुबेरश्च धनेश्वरः ।यद्धृत्वा पठनादिन्द्रो देवानामधिपः स्वयम् ॥ १५॥ यद्धृत्वा भाति भुवने तेजोराशिः स्वयं रविः ।यद्धृत्वा पठनाच्चन्द्रो महाबल-पराक्रमः ॥ १६॥ अगस्त्यः सागरान्सप्त यद्धृत्वा पठनात्पपौ ।चकार तेजसा जीर्णं दैत्यं वातापिसंज्ञकम् ॥ १७॥ यद्धृत्वा पठनाद्देवी सर्वाधारा वसुन्धरा ।यद्धृत्वा पठनात्पूता गङ्गा भुवनपावनी ॥ १८॥ यद्धृत्वा जगतां साक्षी धर्मो धर्मभृतां वरः ।सर्व-विद्याधिदेवी सा यच्च धृत्वा सरस्वती ॥ १९॥ यद्धृत्वा जगतां लक्ष्मी-रन्नदात्री परात्परा ।यद्धृत्वा पठनाद्वेदान् सावित्री सा सुषाव च ॥ २०॥ वेदाश्च धर्मवक्तारो यद्धृत्वा पठनाद् भृगो ।यद्धृत्वा पठनाच्छुद्ध-स्तेजस्वी हव्यवाहनः ।सनत्कुमारो भगवान्यद्धृत्वा ज्ञानिनां वरः ॥ २१॥ दातव्यं कृष्ण-भक्ताय साधवे च महात्मने ।शठाय परशिष्याय दत्वा ShrIKrishna Kavacham मृत्युमवाप्नुयात् ॥ २२॥ त्रैलोक्यविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ।ॠषिश्छन्दश्च गायत्री देवो रासेश्वरः स्वयम् ॥ २३॥ त्रैलोक्यविजय-प्राप्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः ।परात्परं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २४॥ ॐ प्रणवो मे शिरः पातु श्रीकृष्णाय नमः सदा ।पायात्कपालं कृष्णाय स्वाहा पञ्चाक्षरः स्मृतः ॥ २५॥ कृष्णेति पातु नेत्रे च कृष्ण स्वाहेति तारकम् ।हरये नम इत्येवं भ्रूलतां पातु मे सदा ॥ २६॥ ॐ गोविन्दाय स्वाहेति नासिकां ShrIKrishna Kavacham पातु सन्ततम् ।गोपालाय नमो गण्डौ पातु मे सर्वतः सदा ॥ २७॥ ॐ नमो गोपाङ्गनेशाय कर्णौ पातु सदा मम ।ॐ कृष्णाय नमः शश्वत्पातु मेऽधर-युग्मकम् ॥ २८॥ ॐ गोविन्दाय स्वाहेति दन्तौघं मे सदाऽवतु ।पातु कृष्णाय दन्ताधो दन्तोर्ध्वं क्लीं सदाऽवतु ॥ २९॥ ॐ श्रीकृष्णाय स्वाहेति जिह्विकां पातु मे सदा ।रासेश्वराय स्वाहेति तालुकं पातु मे सदा ॥ ३०॥ राधिकेशाय स्वाहेति कण्ठं पातु सदा मम ।नमो गोपाङ्गनेशाय वक्षः पातु सदा मम ॥ ३१॥ ॐ गोपेशाय स्वाहेति स्कन्धं पातु सदा मम ।नमः किशोर-वेषाय स्वाहा पृष्टं सदाऽवतु ॥ ३२॥ उदरं पातु मे नित्यं मुकुन्दाय नमः सदा ।ॐ ह्रीं क्लीं कृष्णाय स्वाहेति करौ पातु सदा मम ॥ ३३॥ ॐ विष्णवे नमो बाहुयुग्मं पातु सदा मम ।ॐ ह्रीं भगवते स्वाहा नखं पातु मे सदा ॥ ३४॥ ॐ नमो नारायणायेति नखरन्ध्रं सदाऽवतु ।ॐ श्रीं क्लीं पद्मनाभाय नाभिं पातु सदा मम ॥ ३५॥ (ह्रीं ह्रीं) ॐ सर्वेशाय स्वाहेति कङ्कालं पातु मे सदा ।ॐ गोपीरमणाय स्वाह नितम्बं पातु मे सदा ॥ ३६॥ ॐ गोपीरमणनाथाय पादौ पातु सदा मम ।ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदाऽवतु।३७ ॥ ॐ केशवाय स्वाहेति मम केशान्सदाऽवतु ।नमः कृष्णाय स्वाहेति ब्रह्मरन्ध्रं सदाऽवतु ॥ ३८॥ ॐ माधवाय स्वाहेति मे लोमानि सदाऽवतु ।ॐ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदाऽवतु ॥ ३९॥ परिपूर्णतमः कृष्णः प्राच्यां ShrIKrishna Kavacham मां सर्वदाऽवतु ।स्वयं गोलोकनाथो मामाग्नेयां दिशि रक्षतु ॥ ४०॥ पूर्णब्रह्मस्वरूपश्च दक्षिणे मां सदाऽवतु ।नैरॄत्यां पातु मां कृष्णः पश्चिमे पातु मां हरिः ॥ ४१॥ गोविन्दः पातु मां शश्वद्वायव्यां दिशि नित्यशः ।उत्तरे मां सदा पातु रसिकानां शिरोमणिः ॥ ४२॥ ऐशान्यां मां सदा पातु वृन्दावन-विहारकृत् ।वृन्दावनी-प्राणनाथः पातु मामूर्ध्वदेशतः ॥ ४३॥ सदैव माधवः पातु बलिहारी महाबलः ।जले स्थले चान्तरिक्षे नृसिंहः पातु मां सदा ॥ ४४॥ स्वप्ने जागरणे शश्वत्पातु मां माधवः सदा ।सर्वान्तरात्मा निर्लिप्तः पातु मां सर्वतो विभुः ॥ ४५॥ इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघ-विग्रहम् ।त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ ४६॥ मया श्रुतं कृष्ण-वक्त्रात् प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत् यः ॥ ४७॥ कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ ShrIKrishna Kavacham सोऽपि विष्णुर्न संशयः ।स च भक्तो वसेद्यत्र लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः ॥ ४८॥ यदि स्यात्सिद्धकवचो जीवन्मुक्तो भवेत्तु सः ।निश्चितं कोटिवर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥ ४९॥ राजसूय-सहस्राणि वाजपेय-शतानि च ।अश्वमेधायुतान्येव नरमेधायुतानि च ॥ ५०॥ महादानानि यान्येव प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा ।त्रैलोक्यविजयस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ५१॥ व्रतोपवास-नियमं स्वाध्यायाध्ययनं तपः ।स्नानं च सर्वतीर्थेषु नास्यार्हन्ति कलामपि ॥ ५२॥ सिद्धत्वममरत्वं च दासत्वं श्रीहरेरपि ।यदि स्यात्सिद्धकवचः सर्वं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ५३॥ स भवेत्सिद्धकवचो दशलक्षं जपेत्तु यः ।यो भवेत्सिद्धकवचः सर्वज्ञः स भवेद्ध्रुवम् ॥ ५४॥ इदं कवच-मज्ञात्वा भजेत्कृष्णं सुमन्दधीः ।कोटिकल्पं प्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धि-दायकः ॥ ५५॥ गृहीत्वा कवचं वत्स महीं निःक्षत्रियं कुरु ।त्रिस्सप्तकृत्वो निश्शंकः सदानन्दो हि लीलया ॥ ५६॥ ShrIKrishna Kavacham राज्यं देयं शिरो देयं प्रणा देयाश्च पुत्रक ।एवंभूतं च कवचं न देयं प्राणसंकटे ॥ ५७॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डेनारद-नारायणसंवादे परशुरामाय श्रीकृष्णकवच-प्रदानं नाम एकत्रिंशत्तमोऽध्ययः ॥ ब्रह्मवैवर्तपुराण । गणपतिखण्ड । अध्याय ३१/८-५७॥

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Shrikrishna Karpura Stotram: श्रीकृष्णकर्पूरस्तोत्रम्

Shrikrishna Karpura Stotram: श्रीकृष्णकर्पूरस्तोत्रम् कर्पूरं पूररेफैर्विरहितमवनी वामनेत्रेन्दुभूषं कृष्णायेदं पदं यः प्रजपति सुजनष्ठद्रयं योजयित्वा ।नानासौख्यादिभोगैः सह स विहरते दीर्घजीवी पृथिव्या- मन्ते गोलोकवासो भवति हरिरसे लीनचित्तस्य तस्य ॥ १॥ ध्यायत्रून्रूपं त्वदीयं हृदि विमलमुखं शान्तचित्तो जनो यो- मन्दं मन्दं स्मरन् सन् तव सुमनुवरं पूर्णमर्थं विचार्य ।भोः कृष्ण त्वद्विलीनं निखिलजगदिदं भावयन् सुप्रहृष्टो- जीवन्मुक्तः प्रशान्तः प्रभवति स नरो लोकपूज्यः सुरेश ॥ २॥ नादब्रह्माङ्कुरस्त्वं सुनिखिलजगदाधारबीजस्वरूपः सिद्धानां सिद्धरूपः Shrikrishna Karpura Stotram कुलजनहृदये चित्कलाकाररूपः ।कालस्यान्तस्वरूपः कलिकलुष महाकालरूपस्त्वमेव श्रीमद्योगेशवन्द्यस्त्वमसि मधुरिपुः पाहि मां दीनबन्धो ॥ ३॥ गोपीनां कामदेवो द्रुपदतनुजनुः कामधेनुस्वरूपो- गोपालानां सखा त्वं विविधनृपनुतो वान्धवः पाण्डवानाम् ।नन्दस्यानन्ददाता सहचरवरदो राधिकाचित्तचौरो- रत्नं त्वं यादवानां शिवसखकृपया रक्ष मां नाथहीनम् ॥ ४॥ विष्णुस्त्वं व्यापकत्वात्त्वमसि गिरिधरो गोशिखाधारणत्वात् कृष्णः श्यामाङ्गकत्वाद्यदुकुलजननाद्वासुदेवस्त्वमेव ।पूर्णब्रह्मात्मकत्वात्त्वमसि हि निखिलानन्दरूपाच्युताख्यः काली त्वं पुंस्वरूपा कुलजनवरदः कालसङ्कल्पनाच्च ॥ ५॥ महामेघश्यामं मणिमुकुट पीताम्बरधरं सुवेणुं बाहुभ्यां दधतमतिशोभायुततनुम् ।हरे प्रत्यालीढासनपरिगतं त्वां स्मितमुखं त्रिपञ्चारे पीठे स्मरति कुलजः कृष्णमतुलम् ॥ ६॥ दिवा श्रीकृष्ण त्वां यजति तुलसीपत्रकमलै- र्जनो यो लक्षञ्च प्रजपति मनुं ते दृढमनाः ।नरेन्द्रः सम्भूय प्रभवति स लक्ष्मीपतिरं महावागीशानी निवसति च तत्कएठकुहरे ॥ ७॥ १लतागेहे स्थित्वा २नवनिधुवनान्तर्गतमना यजन् त्वां रात्रौ श्रीरमण ३कुलपुष्पैः ४कुलधनैः ।५कुलस्थानं पश्यन् प्रजपति मनुं यः ६कुलजनः स जीवन्मुक्तः सन् विचरति शिवोऽक्षितितले ॥ ८॥ महा जन्माष्टम्यां तव चरणयुग्मं मुनिपते निशायामभ्यर्च्य प्रजपति सहस्राक्षरमनुम् ।हृदम्भोजे ध्यायन् तव ललितरूपं सपदियः सदानन्दाकारः प्रभवति स मान्यः सुरसमः ॥ ९॥ समाराध्य प्राणेन्द्रियमपि ७कुलाचारविधिना वलिं कामक्रोधादिकपशुगणानां Shrikrishna Karpura Stotram प्रतिदिनम् ।प्रयच्छेद्यस्तुभ्यं तवचरण पद्मार्पितमनाः स एव ब्रह्मज्ञः स च परशिवः सैष सकलः ॥ १०॥ अनन्त श्रीकृष्ण त्रिपुरहरवन्धो सुरनुत त्वमेतद्ब्रह्माण्डं सृजसि मनसा रक्षसि हरे ।पुनः स्वामिन् काले सकलमपि लीनं प्रकुरुषे त्वमेवैको नान्यस्त्वमसि जगतां मुख्यनिलयः ॥ ११॥ अभूमिस्त्वं भूमन् गुणविषययोर्वाङ्मनसयोः कथं स्तोतुं शक्यो भवसि धनशंशेरवचसा ।तथापि त्वद्भक्तिर्मुखरयति मामत्र भवती सपर्यापर्यायः प्रभवतु ततस्त्वत्स्तुतिरयम् ॥ १२॥ (टिप्पणी१ लताः इडापिङ्गलासुषुम्णानाडीत्रयं तस्य गेहं नाडीस्पन्दस्थानमाज्ञाचक्रम् ।२ नवनिधुवनं Shrikrishna Karpura Stotram मूलाधारगतकुण्डल्याः सहस्रारस्थपरशिवेनसह संयोगस्थानम् ॥ ३ कुलपुष्पानि मूलाधारगतकुण्डल्या सहस्रारगतचन्द्रमण्डले आघातात् निसृतलाक्षारसाभामृतविन्दवः ।४ कुलधनानि पञ्चप्राणाः५ मूलाधारस्थकुण्डल्या आरोहावरोहक्रम एव कुलाकुलक्रमः तस्य स्थानं मृणालतन्तुः ।६ “कुलाकुलकमाभ्यासद्भवेत्कौलोवरानने” । इति वचनात् एवं कौलो भवति स एव कुलजनः प्रथवा कुलतः उच्यते ।)७ कुलाचारविधिरेव कुलाकुलक्रमाभ्यासम् इति श्रीधनशंशेरजङ्गवर्मणाविरचितं वीरेन्द्रकेसरिन्शर्मणा संशोधितं श्रीकृष्ण कर्पूरस्तोत्रम् ॥

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