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Balarama Jayanti: बलराम जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि – जानें सब कुछ !

Balarama Jayanti: बलराम जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि Balarama Jayanti: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जयंती मनाई जाती है। यह एक आध्यात्मिक और आनंदमय पर्व है जो श्रद्धालुओं को भगवान बलराम और श्री कृष्ण की भक्ति में एकजुट करता है। व्रत, पूजा, भजन और प्रसाद के साथ यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक समर्पण का प्रतीक बनता है। इस साल 2025 में बलराम जयंती गुरुवार, 14 अगस्त को मनाई जाएगी। षष्ठी तिथि 13 अगस्त 2025 को सुबह 7:56 बजे शुरू होकर 14 अगस्त 2025 को दोपहर 3:24 बजे समाप्त होगी। कुछ स्रोतों के अनुसार, षष्ठी तिथि 14 अगस्त 2025 को सुबह 4:02 बजे शुरू होकर 15 अगस्त 2025 को रात 2:07 बजे समाप्त होगी। पूरे दिन 14 अगस्त 2025 को बलराम जयंती के रूप में मनाया जाएगा। Bhai Dooj 2025: कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की प्रथा? यमराज और यमुना से जुड़ी है इसकी कथा Who is Lord Balarama Jayanti : कौन हैं भगवान बलराम? भगवान बलराम (Balarama Jayanti), भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई हैं। उन्हें भगवान विष्णु के शेषनाग अवतार के रूप में भी जाना जाता है, जिस पर भगवान विष्णु क्षीर सागर में विश्राम करते हैं। बलराम जी बल, धर्म और कृषि के अद्वितीय प्रतीक हैं। उनका मुख्य शस्त्र ‘हल’ है, जिसके कारण उन्हें ‘हलधर’ भी कहा जाता है। वे धैर्य और सहनशीलता से जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। बलराम जी का जन्म और बाल लीलाएं:Balram ji’s birth and childhood pastimes बलराम जी का जन्म वासुदेव और देवकी की सातवीं संतान के रूप में हुआ था। कंस के भय से, भगवान विष्णु के निर्देश पर योग माया ने देवकी के गर्भ को रोहिणी माता के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया था। इस प्रकार, बलराम जी का जन्म रोहिणी माता के पुत्र के रूप में हुआ और वे ब्रज में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर में भगवान कृष्ण के साथ पले-बढ़े। बचपन से ही अत्यंत बलशाली बलराम जी ने अपने भाई कृष्ण के साथ मिलकर कई राक्षसों का वध किया और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बलराम जयंती का महत्व:Importance of Balarama Jayanti बलराम जयंती कई कारणों से हम सभी के लिए महत्वपूर्ण है: • संतान के लिए सुख-समृद्धि: इस दिन भगवान बलराम Balarama Jayanti का पूजन करने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और उन्हें लंबी आयु प्राप्त होती है। • बल की प्राप्ति: भगवान बलराम की पूजा से शारीरिक बल के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता और आत्म-नियंत्रण भी प्राप्त होता है। • धर्म की रक्षा: जो लोग धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं और उसकी रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें बलराम जी की पूजा अवश्य करनी चाहिए। • कृषि में सफलता: यदि आप कृषि से संबंधित कोई भी कार्य करते हैं, जैसे खेती या खेती से जुड़ा व्यवसाय, तो बलदाऊ जी की पूजा आपको सफलता दिला सकती है। यह त्यौहार हल की पूजा से भी जुड़ा है। • धैर्य और सहनशीलता: बलराम जी Balarama Jayanti का जीवन हमें धैर्यवान होने और अपनी शक्ति का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है। • पारिवारिक एकजुटता: बलराम जयंती परिवार में प्रेम और भाईचारे के महत्व को भी समझाती है। बलराम जयंती पूजा विधि:Balarama Jayanti Puja Method बलराम जयंती पर भगवान बलराम का पूजन करना बहुत सरल और आसान है: 1. स्नान और संकल्प: भक्त प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लेते हैं। 2. पूजा सामग्री: पूजा के लिए भगवान कृष्ण और Balarama Jayanti बलराम जी की तस्वीर या मूर्ति (आप भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की तस्वीर भी ले सकते हैं), लकड़ी या मिट्टी का छोटा हल, थोड़ा सा अनाज जैसे गेहूं, जौ, धान, धूप, रोली, चंदन, फल, फूल, नारियल आदि सामग्री एकत्र कर लें। 3. पूजा का स्थान: कुछ स्थानों पर घर में या बाहर दीवार पर भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बनाकर और गोबर से तालाब बनाकर उसमें झर बेरी, पतास और कांसी के पेड़ लगाकर पूजा करते हैं। 4. मूर्तियों का अभिषेक: मूर्तियों को नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है। सबसे पहले गंगाजल से स्नान कराएं, फिर तिलक लगाएं, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: अपनी मनोकामनाओं के साथ भगवान बलराम से प्रार्थना करें और “ओम नमो भगवते बलभद्राय नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। 6. कथा श्रवण और आरती: बलराम जयंती से संबंधित पौराणिक कथाएं सुनें और अंत में भगवान बलराम की आरती करें। 7. भोग और प्रसाद: विशेष भोजन बनाकर भोग अर्पित करें और फिर प्रसाद रूप में सभी को वितरित करें। 8. उपवास: उपासक दोपहर तक निर्जला उपवास रख सकते हैं। 9. भजन-कीर्तन: इस दिन भक्तगण भजन, कीर्तन और नृत्य के साथ पूरे उल्लास से उत्सव मनाते हैं। बलराम जयंती पर लें ये तीन संकल्प:Take these three resolutions on Balarama Jayanti बलराम जयंती के दिन आप अपने जीवन को बदलने के लिए ये तीन महत्वपूर्ण संकल्प ले सकते हैं: 1. धन और बल में वृद्धि: संकल्प लें कि आप अपने धन और बल को बढ़ाएंगे। 2. धर्म के मार्ग पर चलना: धर्म के मार्ग पर चलने और धर्म की रक्षा में सदैव योगदान देने का संकल्प लें। 3. परिवार की एकजुटता: अपने परिवार को एकजुट रखने और उसमें प्रेम भाव बनाए रखने का प्रयास करें। इसके अलावा, आप धैर्यवान बनने, कृषि करने वाले लोगों का सम्मान करने, शक्ति का दुरुपयोग न करने और भगवान कृष्ण व बलराम के प्रेम से प्रेरणा लेने का भी संकल्प ले सकते हैं। इन संकल्पों को लेने और उनका पालन करने से आपका जीवन अधिक खुशहाल और सार्थक बन सकता है। तो आइए, इस बलराम जयंती पर भगवान बलराम का पूजन करें और उनकी कृपा प्राप्त करें

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अच्युताष्टकं २: Achyutashtakam by Shridharavenkatesha

achyutAShTakam by Shri Shridhara Venkatesha. The author Shridhara Venkatesha was a staunch devotee of Shiva but he had no dislike for Vishnu. He had even decried the differences displyed by people who claimed to be devotees of Siva or Vishnu to the exclusion of the other. He believed that in this age of Kali yuga when peoples’ mind will be attacked by a million distractions making it impossible for one to devote himself seriously to God, they can take to chanting of His name as Shridhara believed that the name is as potent as Him in distroying the sins of the devotee. This theme is highlighted in this short poem. The poet addresses the name and not the Lord as is usually the case. The power of the Lord’s name in destroying the sins is mentioned in the first verse. He cites with wonder instances when the name came to the rescue of His devotees in times of crises. One instance was the case of Draupathi when she was being subjected to humiliation and was in a helpless condition. She cried out for help and uttered Lord’s name which produced unending piles of clothes to the amazement of all and frustrated the efforts of those who tried to dishonour her. The poet then cites the case of Gagendra who was caught in a tussle with a crocodile. After a long-drawn struggle the elephant, feeling helpless, called out loudly the Lord’s name. This made Him rush to his rescue. The poet feels that it was the Lord’s name that worked these wonders. अथ अच्युताष्टकम् ॥ अभिलपननिसर्गादच्युताख्ये भजे त्वां हरसि मदघवृन्दं त्वद्भुबुक्षावशात् त्वम् । अघहृदिति तवांब प्रत्युत ख्यातिदोऽहं त्वयि मम वद का वा संगतिर्दैन्यवाचाम् ॥ १॥ चिरातीता सान्दीपनितनुभुवः कालभवन- प्रपत्तिस्तं पित्रोः पुनरगमयत् सन्निधिमिति । यशः कृष्णस्येदं कथमहह न त्वां रसनया यदि श्रीकृष्णाख्ये भजति स तादनीं मुनिसुतः ॥ २॥ हरेर्यच्चोरत्वं यदपि च तथा जारचरितं तदेतत् सर्वांहस्ततिकृते संकथनतः । इतीदं माहात्म्यं मधुमथन ते दीपितमिदं वदन्त्याः कृष्णाख्ये तवहि विचरन्त्या विलसितम् ॥ ३॥ सभायां द्रौपत्याऽंशुकसृतिभिया तद्रसनया धृता तस्याश्चेलं प्रतनु तदवस्थं विदधती । व्यतानीश्शैलाभं वसनविसरं चांब हरता- मियान् गोविन्दाख्ये वद वसनराशिस्तव कुतः ॥ ४॥ अधिरसनमयि त्वामच्युताख्ये दधानं वनजभवमुखानां वन्द्यमाहुर्महान्तः । सतु विनमति मातश्चाश्वगोश्वादनादीन् भवति ननु विचित्रा पद्धतिस्तावकानाम् ॥ ५॥ जननि मुरभिदाख्ये जाह्नवीनिम्नगैका समजनि पदपद्माच्चक्रिणस्त्वाश्रितानाम् । परिणमति समस्ताः पादवार्घिन्दुरेको जगति ननु तटिन्यो जाह्नवीसह्यजाद्याः ॥ ६॥ समवहितमपश्यन् सन्निधौ वैनतेयं प्रसभविधुतपद्मापाणिरीशोऽच्युताख्ये । समवितुमुपनीतः सागजेन्द्रं त्वया द्राक् वद जननि विना त्वां केन वा किं तदाभूत् ॥ ७॥ यदेष स्तौमि त्वां त्रियुगचरणत्रायिणि ततो महिम्नः का हानिस्तवतु मम संपन्निरवधिः । शुना लीलाकामं भवति सुरसिन्धुर्भगवती तदेषा किंभूता सतु सपदि सन्तापभरितः ॥ ८॥ इति श्रीश्रीधरवेंकटेशार्यकृतौ अच्युताष्टकं संपूर्णम् ॥

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अच्युताष्टकम् १: Achyutashtakam 1

Achyutashtakam: अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥ १॥अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं सन्दधे ॥ २॥विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिणिऱागिणे जानकीजानये ।वल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥ ३॥कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४॥राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः ।लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥ ५॥धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद्द्वेषिणां केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः । var द्वेषिहापूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु माम् सर्वदा ॥ ६॥विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् । var विद्युदुद्योतवान्वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥ ७॥कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः ।हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥ ८॥अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।वृत्ततः सुन्दरं कर्तृ विश्वम्भरस्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९॥॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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अर्जुनकृतम् श्रीकृष्णस्तोत्रम्: Arjunakritam Shri Krishna Stotram

Arjunakritam Shri Krishna Stotram Arjunakritam Shri Krishna Stotram:पुलस्त्य उवाच -एवमुक्तोऽर्जुनः सम्यक् प्रणिपत्य जनार्दनम् ।तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिरुद्भूतपुलकस्ततः ॥ १९॥अर्जुन उवाच -नमोऽस्तु ते चक्रधरोग्ररूप नमोऽस्तु ते शार्ङ्गधरारुणाक्ष ।नमोऽस्तु तेऽभ्युद्यतखड्ग रौद्र नमोऽस्तु विभ्रान्तगदान्तकारिन् ॥ २०॥भयेन सन्नोऽस्मि सवेपथेन नाङ्गानि मे देव वशं प्रयान्ति ।वाचः समुच्चारयतः स्खलन्ति केशा हृषीकेश समुच्छ्वसन्ति ॥ २१॥कालो भवान्कालकरालकर्मा येनैतदेवं क्षयमक्षयात्मन् ।क्षत्रं समुद्भूतरुषा समस्तं नीतं भुवो भारविरेचनाय ॥ २२॥प्रसीद कर्तर्जय लोकनाथ प्रसीद सर्वस्य च पालनाय ।स्थितौ समस्तस्य च कालरूप कृतोद्यमेशान जयाव्ययात्मन् ॥ २३॥न मे दृगेषा तव रूपमेतद्द्रष्टुं समर्था क्षुभितोऽस्मि चान्तः ।पूर्वस्वभावस्थितविग्रहोऽपि संलक्ष्यसेऽत्यन्तमसौम्यरूप ॥ २४॥स्मरामि रूपं तव विश्वरूपं यद्दर्शितं पूर्वमभून्ममैव ।यस्मिन्मया विश्वमशेषमासीद्दृष्टं सयक्षोरगदेवदैत्यम् ॥ २५॥सा मे स्मृतिर्दर्शनभाषणादि प्रकुर्वतो नाथ गता प्रणाशम् ।कालोऽहमस्मीत्युदिते त्वया तु समागतेयं पुनरप्यनन्त ॥ २६॥कर्ता भवान्कारणमप्यशेषं कार्यं च निष्कारण कर्तृरूप ।आदौ स्थितौ संहरणे च देव विश्वस्य विश्वं स्वयमेव च त्वम् ॥ २७॥ब्रह्मा भवान्विश्वसृगादिकाले विश्वस्य रूपोऽसि तथा विसृष्टौ ।विष्णुः स्थितौ पालनबद्धकक्षो रुद्रो भवान्संहरणे प्रजानाम् ॥ २८॥एभिस्त्रिभिर्नाथ विभूतिभेदैर्यश्चिन्त्यते कारणमात्मनोऽपि ।वेदान्तवेदोदितमस्ति विष्णोः पदं ध्रुवं तत्परमं त्वमेव ॥ २९॥यन्निर्गुणं सर्वविकल्पहीनमनन्तमस्थूलमरूपगन्धम् ।परं पदं वेदविदो वदन्ति त्वमेव तच्छब्दरसादिहीनम् ॥ ३०॥यथा हि मूले विटपी महाद्रुमः प्रतिष्टितस्कन्धवरोग्रशाखः ।तथा समस्तामरमर्त्यतिर्यग्व्योमादिशब्दादिमयं त्वयीदम् ॥ ३१॥मुञ्चामि यावत्परमायुधानि वैरिष्वनन्ताहवदुर्मदेषु ।दृष्ट्वा हि तावत्सहसा पतन्तो नूनं तवैवाच्युत स प्रभावः ॥ ३२॥हता हतास्ते भवतो दृशैव मया पुनः केशव शस्त्रपूगैः ।काः कर्णभीष्मप्रमुखान्विजेतुं युष्मत्प्रसादेन विना समर्थः ॥ ३३॥त्रिशूलपाणिर्मम यः पुरस्तान्निषूदयन्वैरिबलं जगाम ।ज्ञातं मया साम्प्रतमेतदीश तव प्रसादस्य हि सा विभूतिः ॥ ३४॥यमेन्द्रवित्तेशजलेशवह्निसूर्यात्मको यश्च ममास्त्रपूगः ।नाशाय नाभूत्पतितोऽपि काये त्वत्सन्निधानस्य हि सोऽनुभावः ॥ ३५॥बाल्ये भवान्यानि चकार देव कर्माण्यसह्यानि सुरासुराणाम् ।तैरेव जानीम न यत्परं त्वां दोषः स निर्दोषमनुष्यतायाः ॥ ३६॥तालोच्छ्रिताग्रं गुरुभारसारमायामविस्तारवदद्य जातः ।पादाग्रविक्षेपविभिन्नभाण्डं चिक्षेप कोऽन्यः शकटं यथा त्वम् ॥ ३७॥अन्येन केनाच्युत पूतनायाः प्राणैः समं पीतमसृग्विमिश्रम् ।त्वया यथा स्तन्यमतीव बाल्ये गोष्ठे च भग्नौ यमलार्जुनौ तौ ॥ ३८॥विषानलोष्णाम्बुनिपातभीममास्फोट्य को वा भुवि मानुषोऽन्यः ।ननर्त पादाब्जनिपीडितस्य फणं समारुह्य च कालियस्य ॥ ३९॥सुरेशसन्देशविरोधवत्सु वर्षत्सु मेघेषु गवान्निमित्तम् ।दिनानि सप्तास्ति च कस्य शक्तिर्गोवर्धनं धारयितुं करेण ॥ ४०॥प्रलम्बचाणूरमुखान्निहत्य कंसासुरं यस्य बिभेति शक्रः ।तमष्टवर्षो निजघान कोऽन्यो निरायोधो नाथ मनुष्यजन्मा ॥ ४१॥बाणार्थमभ्युद्यतमुग्रशूलं निर्जित्य सङ्ख्ये त्रिपुरारिमेकः ।सकार्त्तिकेयज्वरमस्त्रबाहुं करोति को बाणमनच्युतोऽन्यः ॥ ४२॥कः पारिजातं सुरसुन्दरीणां सदोपभोग्यं विजितेन्द्रसैन्यः ।स्वर्गान्महीमुच्छ्रितवीर्यधैर्यः समानयामास यथा प्रभो त्वम् ॥ ४३॥हत्वा हयग्रीवमुदारवीर्यं निशुम्भशुम्भौ नरकं च कोऽन्यः ।जग्राह कन्यापुरमात्मनोऽर्थं प्राग्ज्योतिषाख्ये नगरे महात्मन् ॥ ४४॥स्थितौ स्थितस्त्वं परिपासि विश्वं तैस्तैरुपायैरविनीतभीतैः ।मैत्री न येषां विनयाय तांस्तान्सर्वान्भवान्संहरतेऽव्ययात्मन् ॥ ४५॥हिताय तेषां कपिलादिरूपिणा त्वयानुशस्ता बहवोऽनुजीवाः ।येषां न मैत्री हृदि ते न नेया विश्वोपकारी वध एव तेषाम् ॥ ४६॥ इत्थं भवान्दुष्टवधेन नूनं विश्वोपकाराय विभो प्रवृत्तः ।स्थितौ स्थितं पालनमेव विष्णुः करोति हन्त्यन्तगतोऽन्तरुद्रः ॥ ४७॥एतानि चान्यानि च दुष्कराणि दृष्टानि कर्माणि तथापि सत्यम् ।मन्यामहे त्वां जगतः प्रसूतिं किं कुर्म माया तव मोहनीयम् ॥ ४८॥त्वं सर्वमेतत्त्वयि सर्वमेतत्त्वत्तस्तथैतत्तव चैतदीश ।एतत्स्वरूपं तव सर्वभूतं विभूतिभेदैर्बहुभिः स्थितस्य ॥ ४९॥प्रसीद कृष्णाच्युत वासुदेव जनार्दनानन्त नृसिंह विष्णो ।मनुष्यसामान्यधिया यदीश दृष्टो मया तत्क्षमस्वादिदेव ॥ ५०॥न वेद्मि सद्भावमहं तवाद्य सद्भावभूतस्य चराचरस्य ।यो वै भवान्कोऽपि नतोऽस्मि तस्मै मनुष्यरूपाय चतुर्भुजाय ॥ ५१॥देवदेव जगन्नाथ सर्वपापहरो भव ।हेतुमात्रस्त्वहं तत्र त्वयैतदुपसंहृतम् ॥ ५२॥प्रसीदेश हृषीकेश अक्षौहिण्या दशाष्ट च ।त्वया ग्रस्ता भुवो भूत्यै हेतुभूता हि मद्विधाः ॥ ५३॥वयमन्ये च गोविन्द नराः क्रीडनकास्तव ।मद्विधैः करणैर्देव करोषि स्थितिपालनम् ॥ ५४॥यदत्र सदसद्वापि किञ्चिदुच्चारितं मया ।भक्तिमानिति तत्सर्वं क्षन्तव्यं मम केशव ॥ ५५॥इति विष्णुधर्मेषु पञ्चत्रिंशोऽध्यायान्तर्गतं अर्जुनप्रोक्तं श्रीकृष्णस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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श्री भरत मंदिर: ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दिए थे दर्शन श्री भरत मंदिर उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में स्थित है। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। श्री भरत मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर से ही ऋषिकेश शहर का अस्तित्व सामने आया है। इस मंदिर में बहुत सी प्राचीन कलाकृतियों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। श्री भरत मंदिर का इतिहास श्री भरत मंदिर का उल्लेख हिन्दू धर्म के स्कन्द पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, नृसिंह पुराण और वराह पुराण में किया गया है। इसमें यह वह स्थान है जहाँ पर परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा था कि हृषीकेश नाम से मैं सदैव यहीं स्थित रहूँगा। इसलिए इस स्थान का नाम हृषीकेश भी है। इस मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है करीब 789 ई. में बसंत पंचमी के शुभ दिन पर, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने मंदिर में भगवान की प्रतिमा को स्थापित किया गया है। प्रत्येक वर्ष इस दिन शालिग्राम को मायाकुंड में पवित्र स्नान के लिए ले जाते और फिर पुनर्स्थापना हेतु शहर में एक भव्य जुलूस के साथ वापस मंदिर लाया जाता है। श्री भरत मंदिर का महत्व इस मंदिर से सम्बंधित यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन यदि कोई तीर्थयात्री इस मंदिर में भगवान श्री हृषिकेश नारायण की 108 परिक्रमा करता है और उनके चरणों में आशीर्वाद मांगता है तो उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। ऐसा करना बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा के बराबर माना गया है। भगवान विष्णु जी के इस स्थान पर दर्शन दिए जाने के कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र है जिस वजह से मंदिर के दर्शन मात्र से सभी भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्री भरत मंदिर की वास्तुकला श्री भरत मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह के भीतर इस मंदिर में भगवान विष्णुजी जी कि ऐसी प्रतिमा है जिसे एक ही काले रंग का एक पत्थर यानी कि शालिग्राम पत्थर को काटकर बनाया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक प्राचीन पेड़ है। वास्तव में यह तीन अलग-अलग पेड़ों का एक संयोजन है जिनकी जड़ें इस तरह से आपस में जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अलग अलग देखना लगभग असंभव है। इसमें बरगद के पेड़ यानी वट वृक्ष, पीपल के पेड़ और बेल के पेड़ शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि, ये तीन पेड़ त्रि देव, ब्रह्मा निर्माता, विष्णु, संरक्षक और महेश संहारक का प्रतिनिधित्व करते हैं। भक्त इन वृक्षों की अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करते हैं। इस पेड़ के नीचे बुद्ध की एक खंडित मूर्ति रखी हुई है जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह प्रतिमा अशोक काल की है जब बौद्ध धर्म पूरे देश में फैल रहा था। श्री भरत मंदिर का समय सुबह भरत मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 11:00 AM सांयकाल भरत मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान विष्णु को पीली चीजों का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा सूखे मेवे, फल, फूल भी भगवान को अर्पित किये जाते है।

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Bhai Dooj 2025: कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की प्रथा? यमराज और यमुना से जुड़ी है इसकी कथा

भाई दूज 2025: कैसे शुरू हुई यह अनोखी प्रथा? यमराज और यमुना की कहानी Bhai Dooj 2025:दीपावली उत्सव के अंतिम दिन भाई दूज का पवित्र पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। इस शुभ अवसर पर बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, भाई अपनी बहन को जीवन में सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं। यह दिन यम देवता की पूजा-अर्चना के लिए भी विशेष महत्व रखता है। आइए जानते हैं कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की यह अनोखी प्रथा, और क्या है इसकी पौराणिक कथा। भाई दूज 2025 कब है? (Bhai Dooj 2025 Shubh Muhurat) 2025 में भाई दूज 23 अक्टूबर (गुरुवार) को मनाया जाएगा । इसे पूरे भारत में राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश के रूप में नामित नहीं किया गया है; हालाँकि, यह व्यापक रूप से मनाया जाता है और कुछ क्षेत्रों में इसे क्षेत्रीय अवकाश माना जा सकता है, जिससे पारिवारिक समारोह और उत्सव मनाने की अनुमति मिलती है। भाई दूज की पौराणिक कथा (Bhai Dooj Ki Pauranik Katha) भाई दूज Bhai Dooj 2025 की कथा भगवान सूर्यदेव के पुत्र यमराज और पुत्री यमुना से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य भगवान की पत्नी संज्ञादेवी थीं, जिनकी दो संतानें थीं – पुत्र यमराज और कन्या यमुना। यमराज अपनी बहन यमुना से बहुत प्यार करते थे, लेकिन अधिक काम होने के कारण वे उनसे मिलने नहीं जा पाते थे। एक बार, यमुना ने यमराज को वचन दिया कि वे कार्तिक माह की शुक्ल द्वितीया तिथि पर उनके घर भोजन करने आएँगे। यमराज को यमुना के घर जाने में थोड़ा संकोच होने लगा, क्योंकि वे लोगों के प्राण हरने का काम करते हैं, तो इस वजह से कौन उन्हें अपने घर बुलाएगा। लेकिन, फिर भी वे यमुना के घर चले जाते हैं। जब यमराज बहन के घर पहुँचे, तो वे उन्हें देखकर बेहद प्रसन्न हुईं और उनकी खूब सेवा की। यमुना ने अपने भाई के लिए कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए। बहन की सेवा और सत्कार को देखकर यमराज बहुत खुश हुए और यमुना से कोई वर मांगने के लिए कहा। इसके बाद यमुना ने उनसे वचन लिया कि हर साल कार्तिक माह के शुक्ल द्वितीया तिथि पर वे उनके घर आकर भोजन किया करें। यमराज ने भी उन्हें ‘तथास्तु’ कहते हुए तरह-तरह की भेंट भी दीं। एक अन्य कथा के अनुसार, यमुना ने यह वरदान मांगा कि जो लोग उस दिन बहन के घर भोजन करके मथुरा नगरी स्थित विश्राम घाट पर स्नान करें, वे यमलोक न जाएँ। यमराज ने इस बात को स्वीकार कर लिया और कहा कि जो सज्जन इस तिथि पर बहन के घर भोजन नहीं करेंगे, उन्हें वे यमपुरी ले जाएँगे, और यमुना के जल में स्नान करने वालों को स्वर्ग प्राप्त होगा। मान्यता के अनुसार, तभी से भाई दूज के पर्व को मनाने की शुरुआत हुई। भाई दूज का महत्व और अनुष्ठान (Bhai Dooj Ka Mahatva aur Anushthan) भाई दूज Bhai Dooj 2025 को ‘यम द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहनें स्नान-ध्यान के बाद यम देव की पूजा करती हैं। वे अपने भाई के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और माथे पर तिलक करती हैं। तिलक करने के बाद बहनें अपने हाथों से भाई को भोजन कराती हैं। इस दौरान भाई दूज की कथा का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि कथा का पाठ करने से भाई और बहन के रिश्ते में मधुरता आती है, और भाई को लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन भाई-बहन का साथ-साथ यमुना स्नान करना, तिलक लगवाना तथा बहन के घर भोजन करना अति फलदायी माना जाता है। इस पावन अवसर पर भाई द्वारा बहन को श्रद्धाभाव से वस्त्र, मुद्रा आदि भेंट देना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के रिश्ते की गहराई, प्रेम और एक-दूसरे के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

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The Apex of Devotion: Understanding the Last Sawan Somwar and Udhyapan

The Apex of Devotion: Understanding the Last Sawan Somwar and Udhyapan (भक्ति का शिखर: आखिरी सावन सोमवार और उद्यापन को समझना) The sacred month of Sawan, a period imbued with immense spiritual potency, is wholly dedicated to the veneration of Bhagwan Shiv and Devi Parvati. It is a time when the celestial energies align to bless devotees who observe the Sawan Somwar fasts with utmost faith and perform meticulous worship of Lord Shiva. It is widely believed that engaging in devotional practices during Sawan can manifest all desires. This year, the auspicious Sawan began on July 11th and extends until August 9th. Having already witnessed three powerful Sawan Somwars, we now stand at the threshold of the final Sawan Somwar, which falls on August 4th. For those dedicated souls who have diligently observed all the Sawan Somwar fasts, performing the Udhyapan ritual on this concluding day becomes not just important, but absolutely essential. Why, you ask? Because the complete fruition and full benefit of any fast are only truly realized upon the proper conclusion, known as Udhyapan. This final act is an Upaya (remedial measure) that ensures the spiritual energy accumulated throughout the fasting period is harmonized and effectively integrated into your life’s journey, aligning with your planetary combinations for positive outcomes. The Profound Significance of Sawan Somwar Fasting (सावन सोमवार व्रत का गहरा महत्व) Throughout the month of Sawan, devotees earnestly observe the Sawan Somwar fasts and meticulously perform the worship of Lord Shiva. There’s a deeply held belief that the worship of Lord Shiva during Sawan has the power to fulfill all the desires of devotees. This entire month holds a special sanctity, specifically consecrated to Bhagwan Shiva and Devi Parvati. Performing the Udhyapan: A Step-by-Step Guide for Full Benefits (उद्यापन विधि: पूर्ण लाभ के लिए चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका) To truly reap the entire benefits of your Sawan Somwar fasts, the Udhyapan on the last Somwar is paramount. Here’s how you can perform this sacred ritual with traditional reverence: Sacred Offerings for Lord Bholenath (भगवान भोलेनाथ के लिए पवित्र भोग) While completing your spiritual observances, offering a bhog (sacred food offering) to Lord Bholenath is an integral part of the ritual. This act symbolizes gratitude and devotion. Here are some traditional and beloved offerings:

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अगस्त 2025 (1-15) का मासिक राशिफल: आपकी राशि के लिए क्या लेकर आ रहा है यह पखवाड़ा?

अगस्त का यह पखवाड़ा आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरा प्रभाव डालने वाला है। चाहे आप अपने करियर में नई ऊंचाइयों को छूने की योजना बना रहे हों, वित्तीय स्थिरता की तलाश में हों, रिश्तों में मधुरता चाह रहे हों, या अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाना चाहते हों – ग्रहों की चाल आपको महत्वपूर्ण संकेत दे रही है। आइए, एक-एक करके सभी 12 राशियों के लिए इस अवधि का विस्तृत विश्लेषण करें: 1. मेष राशि (Aries): सीखो और चमको! मेष राशि वाले जातकों के लिए 1 से 15 अगस्त का यह समय थोड़ी मस्ती और थोड़ी रियलिटी के साथ बीतेगा। आपके लिए इस दौरान का मूल मंत्र है “सीखो और चमको”। • करियर और व्यवसाय: नए प्रोजेक्ट्स के अवसर मिलेंगे, खासकर ऐसे प्रोजेक्ट्स जिनमें आपको लगेगा कि आप सक्षम नहीं हैं। ऑफिस या व्यवसाय में नई जिम्मेदारियां मिलेंगी, जिन्हें आपको स्वीकार करना होगा, भले ही घबराहट हो। शनि की साढ़ेसाती में ऐसा बार-बार होता है, और यह बस शुरुआत है। वर्क फ्रॉम होम करने वालों के लिए काम और आराम दोनों संतुलित रहेंगे, फोकस भी बना रहेगा। बॉस की उम्मीदें थोड़ी ऊंची रहेंगी, इसलिए ऊर्जा और धैर्य का संतुलन बनाए रखना होगा। ऑफिस पॉलिटिक्स से दूर रहकर अपने काम पर ध्यान दें, आपका काम ही आपके लिए बोलेगा। • वित्त और धन: आर्थिक स्थिति decent रहेगी। पैसे का प्रवाह बना रहेगा और खर्च भी होगा, लेकिन स्मार्ट तरीके से संभल सकता है। फ्रीलांसिंग, डिजाइनिंग या मार्केटिंग से जुड़े लोगों के लिए आय के नए रास्ते खुलेंगे। रुका हुआ पैसा या अटकी हुई डील्स एक्टिवेट हो जाएंगी। निवेश करते समय दिल की बजाय दिमाग का इस्तेमाल करें। • प्रेम संबंध और रिश्ते: दिल थोड़ा संवेदनशील रहेगा, छोटी बातें गहरा असर डालेंगी। पुरानी यादें या लोग दिमाग में लौट सकते हैं। कमिटेड लोगों के लिए खुला संवाद बहुत महत्वपूर्ण है; सुनना भी सीखें और दूसरों की स्थिति को समझने की कोशिश करें। सिंगल्स के लिए किसी नए व्यक्ति से वाइब मैच हो सकती है, मैसेजिंग या चैटिंग शुरू हो सकती है, नई खुशियाँ आने वाली हैं। • शिक्षा और विद्यार्थी जीवन: पढ़ाई का मूड थोड़ा उतार-चढ़ाव भरा रहेगा। कभी-कभी लगेगा कि पूरा अनुशासन बनाएंगे, और कभी-कभी 3-4 दिनों तक खाली बैठे रहेंगे। एकाग्रता में कमी और गहरे विचारों में खो जाना भी हो सकता है। मीडिया, टेक, भाषा, कंटेंट या क्रिएटिव फील्ड से जुड़े छात्रों के लिए समय बेहतर है। मोबाइल, लैपटॉप आदि से दूरी बनाए रखें यदि वे आपको विचलित कर रहे हैं। • स्वास्थ्य: शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस हो सकती है। मूड स्विंग्स और नींद में गड़बड़ी भी हो सकती है। पीठ दर्द और पाचन संबंधी समस्याएँ परेशान कर सकती हैं। नींद का पैटर्न बदलता हुआ दिख रहा है। अधिक पानी पिएं और रात में हल्का भोजन करें। इन 15 दिनों में गुस्से पर नियंत्रण रखना सबसे बड़ी सलाह है। • उपाय: मंगलवार को हनुमान मंदिर जाकर गुड़ या चने का दान करें। यदि स्वास्थ्य अनुमति दे, तो रक्तदान करें। लाल रंग के वस्त्र का दान करना भी लाभकारी रहेगा। 2. वृषभ राशि (Taurus): निरंतरता ही मौन शक्ति है! वृषभ राशि के जातकों को धीरे-धीरे चलना है लेकिन मजबूत बनना समय की पुकार है। इस हफ्ते का मंत्र है “कंसिस्टेंसी इज अ साइलेंट पावर”। • करियर और व्यवसाय: काम धीरे चल रहा है, पर सही दिशा में है। कॉर्पोरेट, मीडिया, मार्केटिंग या फ्रीलांसिंग में जुड़े लोगों के लिए यह विश्वसनीयता, संपर्क और नेटवर्क बनाने का समय है। आपकी बात का लोगों पर असर हो रहा है, मीटिंग्स और कॉल हो रही हैं, लोग आपकी पिच सुन रहे हैं। एक साथ दो विकल्प दिख सकते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बनेगी; धैर्य से सोच-विचार कर ही निर्णय लें। कई ऐसे निर्णय आएंगे जहाँ दोनों चीजें अच्छी लगेंगी, लेकिन किसी एक को ही चुनना होगा। सीनियर लोग आपको नोटिस करेंगे, इसलिए हमेशा सोचें कि आप पर कैमरा लगा है और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दें, आपको सराहना मिलेगी। • वित्त और धन: पैसों का प्रवाह ठीक-ठाक रहेगा। नए क्लाइंट्स, पुराने भुगतान या साइड इनकम एक्टिवेट हो सकती है। खर्चे कभी-कभी नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं, खासकर लग्जरी या आराम से संबंधित चीजों पर। निवेश करते समय उन योजनाओं से बचें जो कम समय में पैसा दोगुना करने का वादा करती हैं। स्मार्ट निर्णय लें, दीर्घकालिक लाभ मिलेगा। • प्रेम संबंध और रिश्ते: भावनाएं थोड़ी भारी रह सकती हैं। पुरानी बातें या किसी के शब्द आपको फिर से याद आएंगे जो दिल में चुभेंगे। कमिटेड लोगों के लिए ईमानदारी और खुला संवाद बहुत जरूरी है। सिंगल्स पुराने दोस्तों या चैट के माध्यम से दोबारा जुड़ सकते हैं और उन्हें कोई सच्चा व्यक्ति मिल सकता है। रिश्तों को नाटक से दूर रखकर शांति और परिपक्वता से संभालें। • शिक्षा और विद्यार्थी जीवन: पढ़ाई थोड़ा “स्लो कुकर” मोड में चलेगी। शुरुआत में कम ऊर्जा रहेगी, लेकिन समझने की पूरी कोशिश करते रहेंगे। अकाउंट्स, इकोनॉमिक्स, भाषा या कम्युनिकेशन से संबंधित विषयों में पकड़ मजबूत होती दिखेगी। उच्च शिक्षा या ऑनलाइन सर्टिफिकेशन वाले छात्रों को नए अवसर मिलेंगे। पढ़ाई को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटें (जैसे 20-30 मिनट के सेशन)। • स्वास्थ्य: यह समय थोड़ा थका-थका सा जाएगा। शरीर को नींद की आवश्यकता महसूस होगी। मूड स्विंग्स और बर्नआउट भी महसूस कर सकते हैं, ये सब आपकी नींद से जुड़ा है। नींद को ठीक करें, बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा। आप रिचार्ज और ऊर्जावान महसूस करेंगे। पानी पीते रहें, हल्का खाना खाएं, योगा करने से तेजी से रिकवरी होगी। स्ट्रेस ईटिंग और ओवरथिंकिंग से बचें। • उपाय: घर से निकलने से पहले “ॐ शुक्राय नमः” मंत्र का 11 बार जाप करें। शुक्रवार को माता लक्ष्मी के नाम पर व्रत रख सकते हैं या उनके चरणों में कमल का फूल अर्पित कर सकते हैं। 3. मिथुन राशि (Gemini): विचारों की ऊर्जा और संतुलन! मिथुन राशि के जातकों के लिए अगस्त का यह पखवाड़ा कई नए विचारों और ट्विस्ट से भरा रहेगा, आप ऊर्जावान महसूस करेंगे। • करियर और व्यवसाय: मिथुन राशि का दिमाग पूरी तरह से चार्ज महसूस होगा, खूब सारे आइडियाज आएंगे, और लोग भी आपके नए कदमों पर ध्यान देंगे। लेखन, प्रशिक्षण, पत्रकारिता या शिक्षा से जुड़े लोगों को पहचान मिलना

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How to celebrate Diwali according to Premanand Maharaj:प्रेमानंद महाराज के अनुसार दिवाली कैसे मनाये

Diwali: दिवाली: बाहरी उत्सव से आंतरिक प्रकाश की ओर एक यात्रा दीपावली, दिवाली, जुआ, शराब, भक्ति, ज्ञान, नाम जप, आंतरिक दीपावली Diwali: दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, भारत और दुनिया भर में मनाया जाने वाला एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह केवल दीप जलाने और खुशियाँ मनाने का पर्व नहीं है, बल्कि इसका एक गहरा आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। ऐसा माना जाता है कि यह उत्सव भगवान श्री रामचंद्र जी के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या में चक्रवर्ती सम्राट के रूप में विराजमान होने की खुशी में मनाया गया था, जब पूरी अयोध्या दीपों से प्रकाशित हो उठी थी। दीपावली (Diwali) का वास्तविक अर्थ और हमें क्या नहीं करना चाहिए? आज हम घरों को सजाते हैं, दीपक जलाते हैं, लेकिन क्या हम दीपावली के आंतरिक स्वरूप को समझते हैं? अक्सर देखने में आता है कि लोग दीपावली के शुभ अवसर पर जुआ खेलने लगते हैं। लोग सोचते हैं कि “साल भर नहीं खेलते पर दीपावली को तो खेलें!” लेकिन क्या कहीं ऐसा लिखा है कि आप दीपावली पर वो अपराध करें जिसमें कलियुग का वास रहता है? पूज्य महाराज Maharaj श्री हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि द्यूत क्रीड़ा (जुआ खेलना), शराब पीना, मांस खाना, परस्त्री गमन (व्यभिचार करना), स्वर्ण चोरी करना, और हिंसा करना – ये सभी कार्य कलियुग के निवास स्थान हैं। इन आसुरी प्रवृत्तियों वाले कार्यों से हमें बचना चाहिए। धर्मराज युधिष्ठिर और महाराज नल दमयंती जैसे बड़े-बड़े पवित्र चरित्र भी द्यूत क्रीड़ा के कारण भारी विपत्तियों में पड़े थे। यह समझना आवश्यक है कि अधर्म के धन से कभी सुख-शांति नहीं मिलती, बल्कि इससे परिवार बिखर जाता है और अशांति पैदा होती है। महाराज जी दृढ़ता से यह संदेश देते हैं कि यदि आप सुख और शांति प्राप्त करना चाहते हैं, तो इन व्यसनों और गंदे आचरणों को छोड़ दें। यह त्याग ही सबसे बड़ा उत्सव है और यह आपको मानसिक शांति और उन्नति प्रदान करेगा। दीपावली पर क्या करें और कैसे जलाएं आंतरिक दीप? तो, दीपावली Diwali पर हमें क्या करना चाहिए? हमें अपने प्रभु का भजन करना चाहिए, अपने प्रिय प्रीतम का या भगवत विग्रह का ध्यान करना चाहिए। दीपक जलाकर, खूब गुरु मंत्र और नाम जप करना चाहिए, विशेषकर रात 12 बजे तक, क्योंकि इससे कई गुना बढ़कर लाभ मिलता है। ठाकुर जी को भोग लगाएं और आरती करें। दीपावली Diwali 2025 का आंतरिक स्वरूप हमारे हृदय में भक्ति के दीप और प्रेम की बाती जलाने से संबंधित है। जैसे घर में दीपक जलाने से बाहरी अंधेरा दूर होता है, वैसे ही हमारे हृदय का अंधकार ज्ञान के प्रकाश से ही मिटेगा। यह भक्ति का दीपक और प्रेम की बाती किसी बाजार में नहीं मिलती, यह साधु संगति (भगवत प्रेमी महात्माओं का संग) से ही प्राप्त होती है। जब यह ज्ञान का प्रकाश हृदय में प्रकट होता है, तब चिंता, शोक, दुख, और मृत्यु आदि का भय नष्ट हो जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं, बल्कि हमारा स्वरूप सच्चिदानंद है, ईश्वर का अंश है। Diwali जब यह बात पता चल जाती है कि मैं कौन हूँ, तो व्यक्ति आनंद से भर जाता है, मस्त हो जाता है और आत्मा राम बन जाता है। यह समझना कि “मैं भगवान का अंश हूँ” और भगवत प्राप्ति करना ही हमारा परम धर्म है, एक गृहस्थ को भी महात्मा बना देता है। अपने अंदर के अंधकार को दूर करने के लिए, हमें नाम जप और भक्ति करनी चाहिए। यह आंतरिक दीपावली यदि जल गई, तो आप जन्म-मृत्यु के भय से मुक्त हो जाएंगे। एक दृढ़ संकल्प लें: पूज्य महाराज Maharaj जी हम सभी से यह भेंट मांगते हैं कि इस दीपावली पर हम सभी गलत आचरण, शराब, मांस, व्यभिचार, जुआ, चोरी और हिंसा को त्यागने का दृढ़ संकल्प लें। यह संकल्प लेना ही अपने आप में सबसे बड़ा उत्सव है, और इससे हमारा समाज एक धार्मिक, शांतिप्रिय और परमानंद में डूबने वाला समाज बनेगा। Diwali श्री कृष्ण स्वयं आपकी सहायता करेंगे और आपको इन व्यसनों को छोड़ने की सामर्थ्य प्रदान करेंगे, क्योंकि वे हर पल आपके साथ हैं

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दिवाली 2025: तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और 5 दिन का संपूर्ण कैलेंडर – अभी से जानें सब कुछ !

दिवाली 2025: तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और 5 दिन का संपूर्ण कैलेंडर – अभी से जानें सब कुछ! दिवाली का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है और इसे ‘दीप उत्सव’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘दीपावली’ का अर्थ है ‘दीपों की अवली’ यानी दीपों की पंक्ति। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है और बुराई पर अच्छाई की जीत को भी दर्शाता है। यह त्योहार हर साल कार्तिक अमावस्या के दिन बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे, और उनके आगमन की खुशी में लोगों ने घी के दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है, और ऐसा माना जाता है दिवाली 2025 कि उनकी आराधना से घर में सुख-समृद्धि आती है। दिवाली 2025 मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर भ्रमण के लिए निकलती हैं, इसलिए भी इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है। लक्ष्मी जी के साथ भगवान गणेश और कुबेर जी की भी पूजा की जाती है। दिवाली 2025 कब है? (Diwali 2025 Date) 2025 में दिवाली की तिथि को लेकर थोड़ा असमंजस है, क्योंकि कार्तिक अमावस्या तिथि दो दिन पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक अमावस्या तिथि का आरंभ 20 अक्टूबर 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट / 03 बजकर 45 मिनट पर होगा और यह अगले दिन 21 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 54 मिनट / 05 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी। अधिकांश ज्योतिष मतों के अनुसार, दिवाली का पर्व 20 अक्टूबर 2025 को ही मनाया जाएगा, क्योंकि इस दिन लक्ष्मी पूजा सूर्यास्त के बाद करने का विधान है, और निशिता काल में पूजा का विशेष महत्व है, जो 20 अक्टूबर को ही है। हालांकि, कुछ मतों के अनुसार, प्रदोष काल में अमावस्या तिथि होने के कारण 21 अक्टूबर को भी देश के कुछ हिस्सों में दिवाली मनाई जा सकती है। दिवाली 2025 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (Diwali 2025 Lakshmi Puja Muhurat) दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का समय 20 अक्टूबर 2025 को निर्धारित है। लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त और अन्य महत्वपूर्ण काल इस प्रकार हैं: • लक्ष्मी पूजा का समय: रात 07:08 बजे से रात 08:18 बजे तक।     ◦ अवधि: 1 घंटा 8 मिनट। • प्रदोष काल: शाम 05:46 बजे से रात 08:18 बजे तक / शाम 05:33 बजे से रात 08:08 बजे तक। • वृषभ काल: रात 07:08 बजे से रात 09:03 बजे तक / शाम 06:56 बजे से रात 08:53 बजे तक। • निशिता काल का मुहूर्त: रात 11:41 बजे से 21 अक्टूबर को प्रातः 12:31 बजे तक। • शहर के अनुसार लक्ष्मी पूजा के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। दिवाली 2025 कैलेंडर (5 दिन का त्योहार) दिवाली का त्योहार धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक पाँच दिनों तक चलता है। 2025 के लिए दिवाली का पूरा कैलेंडर इस प्रकार है: • धनतेरस: 17 अक्टूबर 2025 (या कुछ स्रोतों के अनुसार 18 अक्टूबर 2025) • नरक चतुर्दशी: 18 अक्टूबर 2025 (या काली चौदस 19 अक्टूबर 2025) • दिवाली: 20 अक्टूबर 2025 • कार्तिक अमावस्या तिथि समाप्ति: 21 अक्टूबर 2025 (या दिवाली स्नान 21 अक्टूबर 2025) • गोवर्धन पूजा: 22 अक्टूबर 2025 • भाई दूज: 23 अक्टूबर 2025 धनतेरस पर सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त: यदि आप धनतेरस पर सोना खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो 18 अक्टूबर को दोपहर 12:18 बजे से 19 अक्टूबर को सुबह 06:08 बजे तक का समय शुभ माना गया है। 19 अक्टूबर को सुबह 06:08 बजे से दोपहर 01:51 बजे तक भी सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त है। दिवाली के दिन करें ये शुभ काम दिवाली 2025 पर घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी का वास बनाए रखने के लिए कुछ शुभ कार्य करने का विधान है: 1. सजावट: दीवाली के दिन अपने घरों और दुकानों को गेंदे के फूल की लड़ियों और अशोक, आम तथा केले के पत्तों से सजाना शुभ माना जाता है। 2. कलश स्थापना: घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर कलश में नारियल स्थापित करना शुभ माना जाता है। 3. स्वच्छता: दिवाली के दिन सफाई का विशेष महत्व है, क्योंकि लक्ष्मी मां उसी घर में प्रवेश करती हैं जहां साफ-सफाई होती है। 4. लक्ष्मी पूजन विधि: लक्ष्मी पूजा के लिए, पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर, उस पर श्री गणेश और देवी लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियों को रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित कर स्थापित करें और फिर पूजन करें। 5. दीप प्रज्ज्वलन: शाम को लक्ष्मी पूजा के साथ ही जलते हुए दीपकों की भी पूजा की जाती है। घर और आंगन में सब जगह दीपक लगाएं, क्योंकि दिवाली प्रकाश का पर्व है। यह जानकारी मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। एबीपी लाइव किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।

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Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram:श्रीविष्णुपुराणे नागपत्नीकृत श्रीकृष्ण स्तोत्रम्

Srikrishna Stotram: यहाँ “विष्णुपुराण” में वर्णित नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र (Nagapatni Kruta Shri Krishna Stotram) से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी जा रही है, जो आप अपने हिंदी ब्लॉग में उपयोग कर सकते हैं। Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram:नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र — विष्णुपुराण से भूमिका विष्णुपुराण, जो महर्षि पराशर द्वारा रचित अष्टादश महापुराणों में से एक है, उसमें अनेक प्रसंगों के माध्यम से भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की महिमा का वर्णन किया गया है।श्रीकृष्ण अवतार के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण प्रसंग है — कालिय नाग के दमन का। इस कथा में श्रीकृष्ण जब यमुना में बसे कालिय नाग के भय से गोकुलवासियों को मुक्त करते हैं, तब कालिय की पत्नियाँ (नागपत्नियाँ) श्रीकृष्ण की स्तुति करती हैं। यह स्तुति ही Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र कहलाती है। नागपत्नी कृत स्तोत्र का प्रसंग यमुना नदी का जल कालिय नाग के विष से विषाक्त हो गया था।गोकुलवासियों व गोधन की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण यमुना में कूद पड़े।श्रीकृष्ण ने कालिय नाग से युद्ध किया और अंततः उसके फनों पर नृत्य कर उसे पराजित किया।जब कालिय हार गया, तब उसकी पत्नी नागपत्नियाँ रोती हुई श्रीकृष्ण के चरणों में आईं और अत्यंत भावुक होकर भगवान की स्तुति करने लगीं। Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram:नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का भावार्थ यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण की निर्दोषता, करुणा, शौर्य, ब्रह्मत्व और भक्तवत्सलता का वर्णन करता है। कुछ प्रमुख भाव: स्तोत्र के प्रमुख श्लोकों के भावार्थ इस स्तोत्र का महत्व श्रीविष्णुपुराणे नागपत्नीकृत श्रीकृष्ण स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram in Hindi ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तमः ।परं ज्योतिरचिन्त्यं यत्तदंशः परमेश्वरः ॥ १ ॥ न समर्थाः सुरास्स्तोतुं यमनन्यभवं विभुम् ।स्वरूपवर्णनं तस्य कथं योषित्करिष्यति ॥ २ ॥ यस्याखिलमहीव्योमजलाग्निपवनात्मकम् ।ब्रह्माण्डमल्पकाल्पांशः स्तोष्यामस्तं कथं वयम् ॥ ३ ॥ यतन्तो न विदुर्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिनः ।परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नताः स्म तम् ॥ ४ ॥ न यस्य जन्मने धाता यस्य चान्ताय नान्तकः ।स्थितिकर्ता न चाऽन्योस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा ॥ ५ ॥ कोपः स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते ।कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वचः ॥ ६ ॥ स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनां मूढा दीनाश्च जन्तवः ।यतस्ततोऽस्य दीनस्य क्षम्यतां क्षमतां वर ॥ ७ ॥ समस्तजगदाधारो भवानल्पबलः फणी ।त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्त्तार्धेन जीवितम् ॥ ८ ॥ क्व पन्नगोऽल्पवीर्योऽयं क्व भवान्भुवनाश्रयः ।प्रीतिद्वेषौ समोत्कृष्टगोचरौ भवतोऽव्यय ॥ ९ ॥ ततः कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदतः ।प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ १० ॥ भुवनेश जगन्नाथ महापुरुष पूर्वज ।प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः ॥ ११ ॥ वेदान्तवेद्य देवेश दुष्टदैत्यनिबर्हण ।प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीविष्णुपुराणे नागपत्नीकृत श्रीकृष्ण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Vishwa Shanti Stotra: श्री विश्व शान्ति स्तोत्र

Vishwa Shanti Stotra: विश्व शांति स्तोत्र (श्री विश्व शांति स्तोत्र): ज्योतिष ग्रंथ के अनुसार, नवग्रहों को छोड़कर अन्य सभी ग्रह भगवान रुद्र या शिव के क्रोध से उत्पन्न हुए हैं। अधिकांश ग्रहों का स्वभाव सामान्यतः हानिकारक होता है, लेकिन कुछ नवग्रह शुभ ग्रह माने जाते हैं। यदि ज्योतिष के अनुसार इनकी पूजा की जाए, तो ये मनुष्य की सभी समस्याओं, बाधाओं को दूर कर देते हैं। विश्व शांति स्तोत्र या “शांति मंत्र” या पंच शांति, उपनिषदों में पाई जाने वाली शांति (शांति) के लिए हिंदू प्रार्थनाएँ हैं। आमतौर पर इनका पाठ धार्मिक अनुष्ठानों और प्रवचनों के आरंभ और अंत में किया जाता है। यजुर्वेद के विश्व शांति स्तोत्र शांति पाठ मंत्र के माध्यम से साधक ईश्वर से शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। विशेषकर हिंदू समुदाय के लोग अपने किसी भी धार्मिक कृत्य, अनुष्ठान, यज्ञ आदि के आरंभ और अंत में इस शांति पाठ के मंत्रों का जाप करते हैं। वैसे, इस मंत्र के माध्यम से संसार के सभी जीवों, वनस्पतियों और प्रकृति में शांति की प्रार्थना की गई है। उनके अनुसार, ईश्वर स्वरूप शांति, वायु में शांति, अंतरिक्ष में शांति, पृथ्वी पर शांति, जल में शांति, जल में शांति होनी चाहिए। और वनस्पति में शांति, विश्व में शांति हो, सभी देवताओं में शांति हो, शरीर में शांति हो, सभी में शांति हो, सभी में शांति हो, ईश्वर शांति हो, शांति हो, शांति हो। Vishwa Shanti Stotra: श्री विश्व शान्ति स्तोत्र शांति मंत्र महान भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को प्रकट करते हैं। Vishwa Shanti Stotra हमारे सांस्कृतिक विचार, दृष्टिकोण आध्यात्मिक आधारशिलाएँ बनाते हैं। हमारी आध्यात्मिकता का भवन इन्हीं मूल सिद्धांतों पर निर्मित होना चाहिए। आइए इन्हें देखें। दिव्य जीवन संस्था, ऋषिकेश के श्री स्वामी शिवानंद ने इसे संकलित किया है। Vishwa Shanti Stotra Ke Labh: विश्व शांति स्तोत्र के लाभ Vishwa Shanti Stotra: विश्व शांति स्तोत्र के पाठ से सभी जीवों की शांति होती है! शांति से विश्व की शांति, जल में शांति, औषधि में शांति, वनस्पति में शांति, विश्व में शांति आदि शांति के सुख हैं।विश्व शांति स्तोत्र या “शांति मंत्र” या पंच शांति, उपनिषदों में पाई जाने वाली शांति (शांति) के लिए हिंदू प्रार्थनाएँ हैं। आमतौर पर इनका पाठ धार्मिक अनुष्ठानों और प्रवचनों के आरंभ और अंत में किया जाता है। उपनिषदों के कुछ विषयों के आरंभ में विश्व शांति स्तोत्र का आह्वान किया जाता है। माना जाता है कि ये साधक के मन और उसके आस-पास के वातावरण को शांत करते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि इनका पाठ करने से आरंभ किए जा रहे कार्य में आने वाली सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।विश्व शांति स्तोत्र हमेशा पवित्र अक्षर ॐ (औं) और “शांति” शब्द के तीन उच्चारणों के साथ समाप्त होता है, Vishwa Shanti Stotra: श्री विश्व शान्ति स्तोत्र जिसका अर्थ है “शांति”। तीन बार उच्चारण करने का उद्देश्य तीनों लोकों में शांति और बाधाओं को दूर करना है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए किसी भी कारण से मानसिक पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति को और यज्ञ एवं पूजा करने के बाद भी इस विश्व शांति स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री विश्व शान्ति स्तोत्र हिंदी पाठ:Vishwa Shanti Stotra in Hindi नश्यन्तु प्रेत कूष्माण्डा नश्यन्तु दूषका नरा: ।साधकानां शिवाः सन्तु आम्नाय परिपालिनाम ॥ जयन्ति मातरः सर्वा जयन्ति योगिनी गणाः ।जयन्ति सिद्ध डाकिन्यो जयन्ति गुरु पन्क्तयः ॥ जयन्ति साधकाः सर्वे विशुद्धाः साधकाश्च ये ।समयाचार संपन्ना जयन्ति पूजका नराः ॥ नन्दन्तु चाणिमासिद्धा नन्दन्तु कुलपालकाः ।इन्द्राद्या देवता सर्वे तृप्यन्तु वास्तु देवतः ॥ चन्द्रसूर्यादयो देवास्तृप्यन्तु मम भक्तितः ।नक्षत्राणि ग्रहाः योगाः करणा राशयश्च ये ॥ सर्वे ते सुखिनो यान्तु सर्पा नश्यन्तु पक्षिणः ।पशवस्तुरगाश्चैव पर्वताः कन्दरा गुहाः ॥ ऋषयो ब्राह्मणाः सर्वे शान्तिम कुर्वन्तु सर्वदा ।स्तुता मे विदिताः सन्तु सिद्धास्तिष्ठन्तु पूजकाः ॥ ये ये पापधियस्सुदूषणरतामन्निन्दकाः पूजने ।वेदाचार विमर्द नेष्ट हृदया भ्रष्टाश्च ये साधकाः ॥ दृष्ट्वा चक्रम्पूर्वमन्दहृदया ये कौलिका दूषकास्ते ।ते यान्तु विनाशमत्र समये श्री भैरवास्याज्ञया ॥ द्वेष्टारः साधकानां च सदैवाम्नाय दूषकाः ।डाकिनीनां मुखे यान्तु तृप्तास्तत्पिशितै स्तुताः ॥ ये वा शक्तिपरायणाः शिवपरा ये वैष्णवाः साधवः ।सर्वस्मादखिले सुराधिपमजं सेव्यं सुरै संततम ॥ शक्तिं विष्णुधिया शिवं च सुधियाश्रीकृष्ण बुद्धया च ये ।सेवन्ते त्रिपुरं त्वभेदमतयो गच्छन्तु मोक्षन्तु ते ॥ शत्रवो नाशमायान्तु मम निन्दाकराश्च ये ।द्वेष्टारः साधकानां च ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ।तत्परं पठेत स्तोत्रमानंदस्तोत्रमुत्तमम ।सर्वसिद्धि भवेत्तस्य सर्वलाभो प्रणाश्यति ॥ ॥ इति श्री विश्व शान्ति स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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