Shailputri Mantra

Devi Maa Shailputri Mantra, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Devi Maa Shailputri Mantra: मां दुर्गा का प्रथम अवतार Maa Shailputri हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, Maa Shailputri सती का अवतार हैं। इस अवतार में, वह राजा दक्ष प्रजापति की बेटी थी जो भगवान ब्रम्हा के पुत्र थे।  Maa Shailputri के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का पुष्प है। यह नंदी नामक बैल पर सवार संपूर्ण हिमालय पर विराजमान हैं। इसलिए इनको वृषोरूढ़ा और उमा के नाम से भी जाना जाता है। यह वृषभ वाहन शिवा का ही स्वरूप है। घोर तपस्या करने वाली शैलपुत्री समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक भी हैं। शैलपुत्री के अधीन वे समस्त भक्तगण आते हैं, जो योग, साधना-तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं। Maa Shailputri की बड़ी श्रद्धा से पूजा की जाती है। Maa Shailputri चंद्रमा पर शासन करती है। कहा जाता है कि शुद्ध मन से उनकी पूजा करने से चंद्रमा के सभी दुष्प्रभाव दूर हो जाते हैं। Maa Shailputri मूलाधार (जड़) चक्र से जुड़ी हैं। यह चक्र लाल रंग का होता है। मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने और उनसे सिद्धि और अन्य वरदान प्राप्त करने के लिए कई भक्त ध्यान करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। देवी शैलपुत्री मूलाधार शक्ति होने के कारण व्यक्ति को जीवन का पाठ पढ़ाती हैं। वह एक व्यक्ति को उसकी आत्म-चेतना को जगाने के माध्यम से मूलाधार शक्ति का एहसास कराती है। Maa Shailputri की पूजा करने के लाभ: Maa Shailputri की पूजा करने से चंद्र ग्रह के दोष से बचाव होता है Maa Shailputri की पूजा, शांति, सद्भाव और समग्र खुशी प्रदान करता है Maa Shailputri की पूजा, रोगों और नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखती है Maa Shailputri की पूजा, विवाहित जोड़े के बीच प्यार के बंधन को मजबूत करती है Maa Shailputri की पूजा, स्थिरता, करियर और व्यवसाय में सफलता प्रदान करता है Maa Shailputri के पूजा मंत्र माता शैलपुत्री की पूजा षोड्शोपचार विधि से की जाती है। इनकी पूजा में सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है। माँ शैलपुत्री को चमेली का फूल अत्यंत प्रिय है, मां शैलपुत्री का मंत्र इस प्रकार है… Maa Shailputri Mantra ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥ Om Devi Shailaputryai Namah॥ Prarthana वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Vrisharudham Shuladharam Shailaputrim Yashasvinim॥ Stuti या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Shailaputri Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Dhyana वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥पूणेन्दु निभाम् गौरी मूलाधार स्थिताम् प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Vrisharudham Shuladharam Shailaputrim Yashasvinim॥Punendu Nibham Gauri Muladhara Sthitam Prathama Durga Trinetram।Patambara Paridhanam Ratnakirita Namalankara Bhushita॥ Praphulla Vandana Pallavadharam Kanta Kapolam Tugam Kucham। Kamaniyam Lavanyam Snemukhi Kshinamadhyam Nitambanim॥ Stotra प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागरः तारणीम्।धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥त्रिलोजननी त्वंहि परमानन्द प्रदीयमान्।सौभाग्यरोग्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिनीं।मुक्ति भुक्ति दायिनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥ Prathama Durga Tvamhi Bhavasagarah Taranim।Dhana Aishwarya Dayini Shailaputri Pranamamyaham॥Trilojanani Tvamhi Paramananda Pradiyaman।Saubhagyarogya Dayini Shailaputri Pranamamyaham॥Charachareshwari Tvamhi Mahamoha Vinashinim।Mukti Bhukti Dayinim Shailaputri Pranamamyaham॥ Kavacha ॐकारः में शिरः पातु मूलाधार निवासिनी।हींकारः पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥श्रींकार पातु वदने लावण्या महेश्वरी।हुंकार पातु हृदयम् तारिणी शक्ति स्वघृत।फट्कार पातु सर्वाङ्गे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥ Omkarah Mein Shirah Patu Muladhara Nivasini।Himkarah Patu Lalate Bijarupa Maheshwari॥Shrimkara Patu Vadane Lavanya Maheshwari।Humkara Patu Hridayam Tarini Shakti Swaghrita।Phatkara Patu Sarvange Sarva Siddhi Phalaprada॥ Aarti शैलपुत्री माँ बैल असवार। करें देवता जय जय कार॥शिव-शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने न जानी॥पार्वती तू उमा कहलावें। जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें॥रिद्धि सिद्धि परवान करें तू। दया करें धनवान करें तू॥सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती जिसने तेरी उतारी॥उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो॥घी का सुन्दर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के॥श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें। प्रेम सहित फिर शीश झुकायें॥जय गिरराज किशोरी अम्बे। शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे॥मनोकामना पूर्ण कर दो। चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो॥

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Ekadashi Vrat Niyam

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष के दौरान पड़ रहा है। इंदिरा एकादशी व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। जानिए इस दिन क्या करें, क्या नहीं… Indira Ekadashi 2024 : हर साल में इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत प्रभु विष्णु जी को समर्पित है। इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल आश्विन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि पर रखा जाएगा। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन विष्णु भगवान के भक्त जन व्रत रख विधि-विधान के साथ पूजा करते हैं। एकादशी का व्रत काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। आइए जानते हैं इंदिरा एकादशी के दिन किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें  Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त में विष्णु भगवान की पूजा करें। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन व्रत न रखा हो तो सात्विक भोजन करने की कोशिश करें। व्रत रखने से पूर्व व्रत रखने का संकल्प जरूर लें। व्रत के सभी नियमों का पालन करें। पारण सूर्योदय के पाश्चात्य करना उत्तम रहेगा। इस दिन भजन-कीर्तन भी किया जाता है।  Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या न करें मास-मदिरा- इंदिरा एकादशी के दिन मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं। चावल- इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने की मनाही है। मान्यता है इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है। तुलसी– तुलसी की पत्तियां विष्णु भगवान को बेहद प्रिय हैं, जिसके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए इंदिरा एकादशी के दिन तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam मन्यताओं के अनुसार, इस दिन तुलसी जी व्रत रखती हैं। इसलिए इन्हें सर्ष करने से बचना चाहिए।  काले वस्त्र– धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा दृष्टि बनाए रखने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date And Time: कब और क्यों मनाई जाती है इंदिरा एकादशी? यहां जानें धार्मिक महत्व

Indira Ekadashi: हिंदू धर्म में, एकादशी तिथि का विशेष महत्व है, और जब बात पितृपक्ष में आने वाली एकादशी की हो, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। Indira Ekadashi पितृपक्ष में आने वाली इस एकादशी को Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पुण्य कर्म करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, इसका धार्मिक महत्व और पितरों की शांति व मोक्ष के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इंदिरा एकादशी 2025 कब है? जानें शुभ मुहूर्त : When is Indira Ekadashi 2025? Know the auspicious time पंचांग के अनुसार, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 2025 आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। इस वर्ष, यह शुभ तिथि 17 सितंबर 2025 को पड़ रही है। एकादशी तिथि का आरंभ और समापन इस प्रकार होगा:The beginning and end of Ekadashi Tithi will be as follows एकादशी तिथि का आरंभ: 17 सितंबर 2025 को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (यानी 16 सितंबर की रात)। कुछ स्रोतों में यह 16 तारीख की रात 12 बजकर 23 मिनट भी दिया गया है। एकादशी तिथि का समापन: 17 सितंबर 2025 को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर। कुछ स्रोतों में यह 17 तारीख की रात 11 बजकर 40 मिनट भी दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि का व्रत उस दिन किया जाता है, जिस दिन सुबह के समय एकादशी तिथि रहती है। इसलिए, 17 सितंबर को ही इंदिरा एकादशी का व्रत और श्राद्ध किया जाएगा। इस दिन एक विशेष संयोग भी बन रहा है: गौरी योग। चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में विराजमान रहेंगे, जिससे यह शुभ गौरी योग बनेगा। ऐसे में व्रत और श्राद्ध कर्म करने वालों को विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होगी। ज्योतिषियों का मत है कि इन शुभ योग में पूजा करने से साधक पर लक्ष्मी नारायण जी की कृपा बरसती है और पितरों को नवजीवन प्राप्त होता है। इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व: पितरों को मिलता है मोक्ष:Importance of Indira Ekadashi fast: Ancestors get salvation इंदिरा एकादशी का हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्व बताया गया है, विशेषकर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए। पितरों को मुक्ति और मोक्ष: यह माना जाता है कि इस दिन व्रत करने और पुण्य कार्य करने से पितरों को मुक्ति मिलती है Indira Ekadashi और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से तीन पीढ़ी के पूर्वजों का उद्धार होता है। पापों का नाश: इंदिरा एकादशी के दिन व्रत और तर्पण करने से पितरों के पापों का नाश हो जाता है। नरक से मुक्ति: यदि किसी कारण से पितर नरक में पड़े हैं, तो इस व्रत को करने से उन्हें भी मुक्ति मिल जाती है। Indira Ekadashi बुरे कर्म करने वाले पूर्वजों को प्रेतयोनि में लंबे समय तक भटकना पड़ सकता है, और उनके लिए श्राद्ध और पिंडदान अनिवार्य है। वैकुंठ धाम की प्राप्ति: इस व्रत को करने से व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु के शरण में रहने वाले साधकों को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति: जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, Indira Ekadashi उन्हें सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। पितरों की शांति के लिए इंदिरा एकादशी पर क्या करें:What to do on Indira Ekadashi for the peace of ancestors Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं: 1. व्रत और पूजन: इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत अवश्य करें। अगर आप व्रत नहीं रख पा रहे हैं, तब भी भगवान विष्णु की पूजा अवश्य करनी चाहिए। 2. तर्पण और पिंडदान: इंदिरा एकादशी पितृपक्ष में आती है, इसलिए इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करना बेहद फलदायी होता है। इससे पितरों की आत्मा तृप्त होती है और उन्हें उच्च गति प्राप्त होती है। 3. काले तिल से तर्पण: यदि आप व्रत नहीं कर रहे हैं, तो भगवान विष्णु की पूजा के साथ काले तिल से तर्पण अवश्य करें। इतना करने से भी आपके पितरों को शांति मिलेगी। 4. दान-पुण्य: इस दिन पितरों के नाम से दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए। पितृ पक्ष 2025: एक महत्वपूर्ण संदर्भ:Pitru Paksha 2025: An Important Context Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान मनाई जाती है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष रहता है। इस दौरान रोजाना पितरों का तर्पण किया जाता है। इस साल पितृ पक्ष 07 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक है। पितरों के तर्पण और पिंडदान की पूरी विधि गरुड़ पुराण में बताई गई है। सर्व पितृ अमावस्या 2025: हर साल आश्विन अमावस्या के दिन सर्व पितृ का तर्पण किया जाता है। इस दिन ही पितर अपने लोक लौट जाते हैं। इस वर्ष 21 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या है।

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Sharadiya Navratri

Sharadiya Navratri 2025 Start Date: कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, पहले दिन इन मंत्रों का करें जप, माता शैलपुत्री की बरसेगी कृपा….

Sharadiya Navratri 2025 date and time:इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। नवरात्रि में विधिवत 9 दिन की दुर्गा देवी की पूजा करने से सुख, धन व सौभाग्य बढ़ता है। kab se shuru hai Sharadiya Navratri 2025: हर साल पितृपक्ष समाप्त के बाद शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है। नवरात्रि 9 दिनों का पावन पर्व है, जो मां दुर्गा देवी को समर्पित है। इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। इन नौ रात्रियों एवं दस दिनों में देवी दुर्गा के 9 भिन्न-भिन्न रूपों की विधिवत आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव के दसवें दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है, जिसे दशहरा कहते हैं। इस साल की शारदीय नवरात्रि का समापन 2 अक्टूबर को होगा। Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना कर पूजा की शुरुआत होगी। आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि कब से शुरू हो रहे हैं- कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, जानें डेट व मुहूर्त:When does Sharadiya Navratri start, know the date and auspicious time प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 22, 2025 को 01:23 ए एम बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त – सितम्बर 23, 2025 को 02:55 ए एम बजे हिन्दू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 22 सितंबर 2025 को है। इसी दिन कलश स्थापना की जाएगी। घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि पर है। घटस्थापना मुहूर्त – 06:09 ए एम से 08:06 ए एम अवधि – 01 घण्टा 56 मिनट्स घटस्थापना अभिजित मुहूर्त – 11:49 ए एम से 12:38 पी एम अवधि – 00 घण्टे 49 मिनट्स कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरुप:What is the nature of Mother Shailputri? Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन पूजा जाने वाली देवी मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सरल, सुशील और दया से पूर्ण है। मां का रूप दिव्य और आकर्षक है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान है, Sharadiya Navratri जो उनके अद्भुत और शक्ति से भरे स्वरूप का प्रतीक है। मां की सवाली वृषभ है । मां शैलपुत्री का तपस्वी रूप बहुत ही प्रेरणादायक है, उन्होंने घोर तपस्या की है और समस्त जीवों की रक्षिका हैं। नवरात्रि के पहले दिन का व्रत और पूजा विशेष रूप से कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। विपत्ति के समय में मां शैलपुत्री अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और Sharadiya Navratri उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। मां शैलपुत्री साधक के मूलाधार चक्र को जागृत करने में भी सहायक होती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर का वह ऊर्जा केंद्र है, Sharadiya Navratri जो हमें स्थिरता, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करता है। इस चक्र के जागरण से जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का प्रवाह होता है। मां शैलपुत्री पूजा विधि:Maa Shailputri puja method Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा विधि देवी भागवत पुराण में विस्तार से दी गई है। Sharadiya Navratri शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा विधि इस प्रकार है:सुबह जल्दी उठें: नवरात्रि के पहले दिन पूजा का आरंभ ब्रह्म मुहूर्त में करें। Sharadiya Navratri इस समय वातावरण शुद्ध और आध्यात्मिक होता है।स्नान और शुद्ध वस्त्र पहनें: पूजा से पहले स्नान करके शुद्ध और स्वच्छ कपड़े पहनें।मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें: एक चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें और फिर उस पर मां शैलपुत्री की मूर्ति, तस्वीर या फोटो स्थापित करें।कलश स्थापना: पूरे परिवार के साथ विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें। यह कार्य नवरात्रि पूजा का प्रमुख हिस्सा होता है।ध्यान और मंत्र जप: कलश स्थापना के बाद, मां शैलपुत्री का ध्यान मंत्र ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः, वंदे वाञ्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्, या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः जप करें। साथ ही, नवरात्रि व्रत का संकल्प लें।षोड्शोपचार पूजा विधि: मां शैलपुत्री की पूजा षोड्शोपचार विधि से करें। इसमें सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है।माता को फूल और कुमकुम अर्पित करें: सफेद, पीले या लाल फूल मां शैलपुत्री को अर्पित करें। साथ ही, कुमकुम का तिलक भी करें।धूप और दीप जलाएं: मां के समक्ष धूप और दीपक जलाएं। साथ ही, पांच देसी घी के दीपक भी जलाएं ताकि सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।आरती करें: इसके बाद मां शैलपुत्री की आरती उतारें। मां की आरती करने से व्यक्ति को उनकी कृपा प्राप्त होती है।माता की कथा, दुर्गा चालिसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी Sharadiya Navratri पूजा के बाद, मां शैलपुत्री की कथा, दुर्गा चालिसा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। Sharadiya Navratri इससे मां की आशीर्वाद प्राप्ति होती है।जयकारे लगाएं: परिवार के साथ “जय माता दी” के जयकारे लगाएं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।भोग अर्पित करें: अंत में, मां शैलपुत्री को भोग अर्पित करें।शाम की पूजा: शाम के समय भी पूजा करें। इस समय भी मां की आरती उतारें और मंत्र जप करके ध्यान लगाएं।मां शैलपुत्री का भोग Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा में विशेष रूप से सफेद रंग का महत्व है, Sharadiya Navratri जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए सफेद रंग की सामग्री का अर्पण करना आवश्यक होता है। मां शैलपुत्री को सफेद रंग के फूल अर्पित करें। पूजा में मां को सफेद मिठाई, जैसे खीर, खाजा, या सफेद लड्डू अर्पित करें। सफेद रंग की अन्य सामग्री जैसे दूध और दही भी अर्पण कर सकते हैंमां शैलपुत्री की पूजा से लाभ: मां शैलपुत्री का मंत्र वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मां शैलपुत्री व्रत कथा:Maa Shailputri fast story देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, सिवाय अपनी बेटी सती और उनके पति भगवान शिव के।सती को यज्ञ में भाग लेने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि शायद उन्हें जानबूझकर यज्ञ में नहीं बुलाया गया है। भगवान शिव से सती को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सती अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं। आखिरकार, भगवान शिव ने उन्हें

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Himalayaraja Krita Shailaputri Stutih: हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः

Himalayaraja Krita Shailaputri Stutih: हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः हिमालय उवाच ।मातस्त्वं कृपयागृहे मम सुता जातासि नित्यापि यद्भाग्यं मे बहुजन्मजन्मजनितं मन्ये महत्पुण्यदम् ।दृष्टं रूपमिदं परात्परतरां मूर्तिं भवान्या अपि माहेशीं प्रति दर्शयाशु कृपया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ १॥ श्रीदेव्युवाच ।ददामि चक्षुस्ते दिव्यं पश्य मे रूपमैश्वरम् ।छिन्धि हृत्संशयं विद्धि सर्वदेवमयीं पितः ॥ २॥ श्रीमहादेव उवाच ।इत्युक्त्वा तं गिरिश्रेष्ठं दत्त्वा विज्ञानमुत्तमम् ।स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं माहेश्वरं तदा ॥ ३॥ शशिकोटिप्रभं चारुचन्द्रार्धकृतशेखरम् ।त्रिशूलवर हस्तं च जटामण्डितमस्तकम् ॥ ४॥ भयानकं घोररूपं कालानलसहस्रभम् ।पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ५॥ द्वीपिचर्माम्बरधरं नागेन्द्रकृतभूषणम् ।एवं विलोक्य तद्रूपं विस्मितो हिमवान् पुनः ॥ ६॥ प्रोवाच वचनं माता रूपमन्यत्प्रदर्शय ।ततः संहृत्य तद्रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ७॥ रूपमन्यन्मुनिश्रेष्ठ विश्वरूपा सनातनी ।शरच्चन्द्रनिभं चारुमुकुटोज्ज्वलमस्तकम् ॥ ८॥ शङ्खचक्रगदापद्महस्तं नेत्रत्रयोज्ज्वलम् ।दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥ ९॥ योगीन्द्रवृन्दसंवन्द्यं सुचारुचरणाम्बुजम् ।सर्वतः पाणिपादं च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ १०॥ दृष्ट्वा तदेतत्परमं रूपं स हिमवान् पुनः ।प्रणम्य तनयां प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ११॥ हिमालय उवाच ।मातस्तवेदं परमं रूपमैश्वरमुत्तमम् ।विस्मितोऽस्मि समालोक्य रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ १२॥ त्वं यस्य सो ह्यशोच्यो हि धन्यश्च परमेश्वरि ।अनुगृह्णीष्व मातर्मां कृपया त्वां नमो नमः ॥ १३॥ श्रीमहादेव उवाच ।इत्युक्ता सा तदा पित्रा शैलराजेन पार्वती ।तद्रूपमपि संहृत्य दिव्यं रूपं समादधे ॥ १४॥ नीलोत्पलदलश्यामं वनमालाविभूषितम् ।शङ्खचक्रगदापद्ममभिव्यक्तं चतुर्भुजम् ॥ १५॥ एवं विलोक्य तद्रूपं शैलानामधिपस्ततः ।कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा हर्षेण महता युतः ॥ १६॥ स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टाव परमेश्वरीम् ।सर्वदेवमयीमाद्यां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ॥ १७॥ हिमालय उवाच ।मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये त्वं सर्वं नहि किञ्चिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे ।त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया ॥ १८॥ त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा पितॄणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका ।हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः ॥ १९॥ रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव ।वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहिमाम् ॥ २०॥ उद्यत्सूर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम् ।उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननी देवि प्रसीदाम्बिके ॥ २१॥ रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं घोरं पञ्चमुखाम्बुजत्रिनयनैईमैः समुद्भासितम् ।चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके ॥ २२॥ रूपं ते शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम् ।दिव्यैर्बाहुचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते ॥ २३॥ रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं, कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाङ्गदैर्भूषितम् ।विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि, भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ॥ २४॥ मातः कः परिवर्णितुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं शक्तो देवि जगत्रये बहुगुणैर्देवोऽथवा मानुषः ।तत् किं स्वल्पमतिब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयै- र्गुणैर्नो मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ २५॥ अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम ।यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥ २७॥ धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्व निजलीलया ।नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः ॥ २७॥ इति हिमालयराजकृत शैलपुत्रीस्तुतिः ।

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DurgAsUktam: दुर्गासूक्तम्

DurgAsUktam: दुर्गासूक्तम् ॥ अथ दुर्गा सूक्तम् ॥ ॐ जातवेदसे सुनवाम सोम मरातीयतो निदहाति वेदः ।स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरिताऽत्यग्निः ॥ १॥ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनींकर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीꣳ शरणमहंप्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ २॥ अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्थ्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा ।पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शंयोः ॥ ३॥ विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुन्न नावा दुरिताऽतिपर्षि ।अग्ने अत्रिवन्मनसा गृणानोऽस्माकं बोध्यविता तनूनाम् ॥ ४॥ पृतना जितꣳ सहमानमुग्रमग्निꣳ हुवेम परमाथ्सधस्थात् ।स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद्देवो अति दुरितात्यग्निः ॥ ५॥ प्रत्नोषि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सथ्सि ।स्वाञ्चाग्ने तनुवं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमायजस्व ॥ ६॥ गोभिर्जुष्टमयुजो निषिक्तन्तवेन्द्र विष्णोरनुसंचरेम ।नाकस्य पृष्ठमभि संवसानो वैष्णवीं लोक इह मादयन्ताम् ॥ ७॥ ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ॥ ॥ इति दुर्गा सूक्तम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ तैत्तिरीयारण्यकम् ४, प्रपाठकः १०, अनुवाकः २

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Shri Durgamba Stotram:श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रम्

Shri Durgamba Stotram:श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रम् ज्ञानमात्रावशेषाया निष्पप्रपञ्चा निरङ्कुशा ।चिदानन्दघनात्यच्छा दुर्गाम्बां तां उपास्महे ॥ १॥ मन्त्राणां मातृका देवि ज्ञानानां ज्ञानरूपिणी ।ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥ २॥ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।दुर्गात्सन्त्रायते यस्मात् देवी दुर्गेति कथ्यते ॥ ३॥ प्रपद्ये शरणं देवि दुराचारविधातिनीम् ।नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥ ४॥ इति श्रीसमर्थरामदासानुग्रहित श्रीरामपदपङ्कजभृङ्गायमानश्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यवरभगवताश्रीश्रीधरस्वामिनाविरचितं श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Dream interpretation according to astrology: सपने में आसमानी बिजली देखना: शुभ या अशुभ? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य !

Dream interpretation according to astrology: क्या आपने कभी रात को सोते समय सपने में आसमानी बिजली गिरते हुए देखी है? सपनों की दुनिया बड़ी अजीब होती है जहाँ जो मिलता है वो खो जाता है और जो जाता है वो मिलने वाला होता है। कई बार ऐसे सपने मन में उत्सुकता या डर पैदा करते हैं कि आखिर इनका हमारे वास्तविक जीवन से क्या संबंध है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, रात की गहरी नींद में आने वाले हमारे सपने हमारे दिन भर किए गए कार्यों, मन में उठे विचारों या किसी दबी हुई इच्छा का परिणाम होते हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्म मुहूर्त में देखा गया स्वप्न अपना फल ज़रूर देता है। स्वप्न शास्त्र astrology के विशेषज्ञों के अनुसार, सपने में आसमानी बिजली देखना अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का संकेत हो सकता है। आइए जानते हैं विस्तार से कि इन सपनों का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। Dream interpretation according to astrology:सपने में आसमानी बिजली गिरते देखने के शुभ संकेत अगर आपने सपने में आसमानी बिजली गिरते देखी है, तो यह कई मामलों में एक शुभ संकेत माना जाता है। • व्यापार में बड़ा फायदा: यह आपके कारोबार में बड़ी सफलता और astrology फायदे की उम्मीद दर्शाता है। आपकी वित्तीय परेशानियाँ दूर हो सकती हैं और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा से आप कर्ज मुक्त भी हो सकते हैं। • कार्य में सफलता और पदोन्नति: यह कार्य में सफलता पाने का संकेत है। यदि आप लंबे समय से नौकरी की तलाश में हैं या काम में पदोन्नति (प्रमोशन) पाना चाहते हैं, तो आपकी यह इच्छा जल्द ही पूरी हो सकती है। • आसमान में बिजली चमकना: यदि आप सपने में आसमान में astrology बिजली चमकते हुए देखते हैं (केवल चमक, बिना गिरने या कड़कने की आवाज़ के), तो यह व्यापार-व्यवसाय में बड़ी सफलता मिलने की पूर्व सूचना है। सपने में आसमानी बिजली या संबंधित घटनाएँ देखने के अशुभ संकेत हालांकि, कुछ स्थितियों में सपने में बिजली देखना अशुभ भी हो सकता है। • परिवार में अशुभ घटना या परेशानी: यदि आप सपने में बिजली गिरते हुए देखते हैं, तो इसका अर्थ हो सकता है कि आपके परिवार में कोई अशुभ घटना घटने वाली है। यह विपत्ति आने, जीवन में बहुत सारी परेशानियों का सामना करने और धन हानि होने की संभावना को भी दर्शाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, सपने में बिजली गिरते देखना अशुभ समाचार मिलने की संभावना को दर्शाता है। • बिजली कड़कने की आवाज़ सुनना: यदि आपको सपने में बिजली कड़कने की आवाज़ सुनाई देती है, तो इसे बिल्कुल अच्छा नहीं माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाला है, astrology जिस कारण उन्हें आर्थिक संकट से भी गुज़रना पड़ सकता है। यह सपना लोगों से धोखा मिलने का संकेत भी देता है और आपको सावधानीपूर्वक रहने तथा हर किसी पर विश्वास न करने की सलाह देता है। • रिश्तों में धोखाधड़ी: यदि आप रात में सोते समय बिजली कड़कते हुए सपने में देखते हैं, तो यह सावधान होने का संकेत होता है। यह रिश्ते में धोखाधड़ी के संकेत माने जाते हैं, जिसका अर्थ है कि आपको किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए, astrology बल्कि अपने आसपास के रिश्तों से सचेत रहना चाहिए। • बिजली से करंट लगना: यदि सपने में आपको बिजली से करंट लगने का दृश्य दिखाई दे, तो यह एक अशुभ स्वप्न माना जाता है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में कोई खास दोस्त या घर का कोई सदस्य आपको धोखा दे सकता है। यह सपना नज़दीकी लोगों से सावधान रहने की सीख देता है। निष्कर्ष सपने में आसमानी बिजली देखने के विभिन्न अर्थ हो सकते हैं। यह आपके जीवन में आने वाले astrology शुभ बदलावों और सफलताओं का संकेत भी हो सकता है, वहीं यह कुछ संभावित चुनौतियों और परेशानियों की ओर भी इशारा कर सकता है। सपनों के इन संकेतों को समझकर आप अपने जीवन में आने वाली परिस्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकते हैं।

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Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: श्रीमद्भागवत गीता: मानसिक शांति, ऊर्जा और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता के लिए क्यों पढ़नी चाहिए रोज़ाना ?

Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: क्या आप अपने जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मकता और उद्देश्य की स्पष्टता की तलाश में हैं? श्रीमद्भागवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। यह जीवन जीने की कला सीखने का एक ज़रिया है। भगवान श्री कृष्ण ने यह ग्रंथ कुरुक्षेत्र युद्ध के समय अर्जुन को दिया था, जिसमें धर्म और कर्म के महत्व के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय भी शामिल हैं। आज के तेज़ और तनावपूर्ण जीवन में, जब लोग अक्सर उलझन और चिंता में फंसे रहते हैं, रोज़ Bhagwat Geeta गीता का पाठ करना मानसिक शांति और जीवन की दिशा समझने का सबसे आसान तरीका बन सकता है। आइए, भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से जानते हैं कि नियमित रूप से भगवद गीता का अध्ययन करने से हमारे जीवन में कौन-कौन से चमत्कारी बदलाव आते हैं। Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde:भगवद गीता पढ़ने के चमत्कारी लाभ: जीवन बदल जाएगा! भगवद गीता का रोज़ाना पाठ करने से कई मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं: 1. मानसिक शांति और नियंत्रण जो व्यक्ति रोज़ाना गीता का पाठ करता है, उसका मन स्थिर और शांत रहता है। चाहे जीवन में कितनी भी परेशानियां आएं, वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। गीता Bhagwat Geeta पढ़ने से व्यक्ति खुद को समझना सीखता है और परिस्थितियों के अनुसार सही फैसले लेने में सक्षम होता है। यह आदत धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच को साफ़ और तार्किक बनाती है, जिससे जीवन में उलझन कम होती है। 2. क्रोध और बुराई से मुक्ति गीता पढ़ने वाले व्यक्ति को क्रोध, ईर्ष्या, लालच और मोह के बंधनों से छुटकारा मिलता है। जब व्यक्ति इन नकारात्मक भावनाओं से मुक्त हो जाता है, तो उसके जीवन में सुख और संतोष बढ़ता है। गीता में बताई गई बातें व्यक्ति को यह सिखाती हैं कि किस तरह हर परिस्थिति में संयम बनाए रखा जाए और अपने अंदर की बुराई पर विजय पाई जाए। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि भगवद गीता पढ़ने से न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होती है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी बढ़ता है। व्यक्ति का आत्मबल मज़बूत होता है, वह साहसी बनता है और अपने जीवन के कर्तव्यों को निभाने में निडर बन जाता है। गीता पढ़ना जीवन में एक नैतिक और मानसिक ताक़त का स्रोत बन जाता है। 4. तनाव और चिंता से राहत आज के जीवन में तनाव और चिंता आम बात हो गई है। गीता पढ़ने से व्यक्ति को जीवन के सही और गलत का ज्ञान मिलता है। उसे समझ आता है कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए और कैसे खुद को मानसिक रूप से शांत रखा जाए। रोज़ गीता का पाठ करने से व्यक्ति अंदर से मज़बूत होता है और वह किसी भी संकट का सामना धैर्य और समझदारी से कर सकता है। 5. जीवन में उद्देश्य की स्पष्टता गीता पढ़ने से व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को समझता है। वह जानता है कि हर काम का महत्व क्या है और कैसे अपने कर्मों के अनुसार जीवन को सही दिशा दी जा सकती है। यह ज्ञान व्यक्ति को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि उसे जीवन में स्थायी संतोष भी प्रदान करता है। निष्कर्ष श्रीमद्भागवत गीता Bhagwat Geeta सिर्फ एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक है जो हमें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, क्रोध और चिंता से मुक्ति, और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता प्रदान करती है। Bhagwat Geeta इसे रोज़ाना पढ़ने से आप अपने अंदर एक गहरा बदलाव महसूस करेंगे और जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और समझदारी से कर पाएंगे।

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Bhagavad Gita: श्रीमद्भागवत गीता जीवन बदलने वाले चमत्कारी लाभ और पाठ के सही नियम – पूर्ण ज्ञान की कुंजी

Bhagavad Gita: क्या आप अपने जीवन में शांति, स्पष्टता और सकारात्मकता की तलाश में हैं? सनातन धर्म का एक अमूल्य रत्न, श्रीमद्भागवत गीता, आपको इन सभी की प्राप्ति में मदद कर सकती है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अद्भुत दर्शन है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को प्रदान किया था। Bhagavad Gita आज, यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनियाभर में लोग गीता के पाठ से लाभ उठा रहे हैं। आइए जानते हैं कि रोजाना Bhagavad Gita गीता पढ़ने से आपको कौन से चमत्कारी लाभ मिल सकते हैं और इसे सही तरीके से पढ़ने के नियम क्या हैं, ताकि आप इसके गूढ़ ज्ञान को आत्मसात कर सकें। Bhagavad Gita: गीता पाठ के अद्भुत लाभ: जब आप इसे जीवन में उतारते हैं:Amazing benefits of reading Geeta: When you implement it in life श्रीमद्भागवत गीता का नियमित अध्ययन आपके जीवन को कई तरह से सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। यह आपको आंतरिक शांति और स्पष्टता प्रदान करती है। 1. मन की शांति और स्थिरता: जो व्यक्ति नियमित रूप से भगवत गीता का पाठ करता है, Bhagavad Gita उसका मन हमेशा शांत रहता है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन पर काबू पाने की क्षमता रखता है। गीता आपको अपने मन को अपनी इच्छानुसार किसी भी कार्य में लगाने की शक्ति देती है। 2. क्रोध, लालच और मोह से मुक्ति: रोजाना गीता का अध्ययन करने वाले लोग कामवासना, क्रोध, लालच और मोह-माया जैसे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इन सबसे मुक्ति पाकर व्यक्ति का जीवन सुखमय तरीके से व्यतीत होता है। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि: प्रतिदिन Bhagavad Gita भगवत गीता का पाठ करने से जीवन से सभी नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होने लगती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। इतना ही नहीं, गीता पढ़ने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और वह साहसी व निडर बनकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता रहता है। 4. तनाव से मुक्ति और सही-गलत का ज्ञान: गीता पढ़ने वाला व्यक्ति सच और झूठ, ईश्वर और जीव के ज्ञान को प्राप्त करता है। उसे अच्छे और बुरे की समझ आ जाती है। भगवत गीता का पाठ करने से व्यक्ति को तनाव से भी मुक्ति मिलती है। 5. कर्म और जीवन का गहरा दर्शन: गीता हमें यह ज्ञान देती है कि व्यक्ति को केवल अपने काम और कर्म पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, यह भी समझाती है कि हमारे कर्मों का फल हमें निश्चित ही प्राप्त होगा। Bhagavad Gita गीता हमें जीवन क्या है, इसे कैसे जीना चाहिए, आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे होता है, और अच्छे-बुरे की समझ क्यों ज़रूरी है, जैसे गूढ़ सवालों के जवाब भी देती है। पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष Bhagavad Gita: गीता पढ़ने का सही तरीका और नियम: पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए गीता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसे केवल एक बार पढ़ना पर्याप्त नहीं है; बल्कि इसे समझने के चार स्तरों से गुजरना पड़ता है। ज्ञान प्राप्ति के चार स्तर: 1. श्रवण या पठन ज्ञान: पहले आप पढ़ते या सुनते हैं। 2. मनन ज्ञान: फिर, पढ़े-सुने ज्ञान के बारे में चिंतन और मनन करते हैं। 3. निदिध्यासन ज्ञान: यदि वह ज्ञान आपको ठीक और उपयोगी लगता है, तब आप उसका अभ्यास कर उसे अपने जीवन में उतारते हैं। 4. अनुभव ज्ञान: आखिर में, उस ज्ञान का प्रतिफल आपको मिलता है। यदि आप गीता पढ़कर उसके उपदेशों को जीवन में नहीं उतारते हैं, तो उसका फल कैसे मिलेगा? जब हम Bhagavad Gita गीता के उपदेशों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो निश्चित ही सुपरिणाम सामने आते हैं। कितनी बार पढ़ें गीता? ज्ञान की गहराई: आप जितनी बार गीता का पाठ करेंगे, आपको कुछ नया सीखने को मिलेगा। पहली बार: आप इसे एक अंधे व्यक्ति के रूप में पढ़ते हैं, केवल रिश्तों की समझ मिलती है। दूसरी बार: मन में सवाल जागृत होते हैं कि ऐसा क्यों हुआ। तीसरी बार: आप इसके अर्थ को समझने लगते हैं, हर व्यक्ति अपने तरीके से समझता है। चौथी बार: आप हर एक पात्र से जुड़ी भावनाओं को समझ पाते हैं। पांचवी बार: पूरा कुरुक्षेत्र आपके मन में खड़ा हो जाता है, अलग-अलग कल्पनाएँ होती हैं। छठवीं बार: आप भगवान को अपने सामने अनुभव करने लगते हैं, मानो भगवान स्वयं आपको बता रहे हों। आठवीं बार: आपको पूर्णतः अहसास हो जाता है कि कृष्ण कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही हैं और हम उनके भीतर। पाठ के महत्वपूर्ण नियम: शुभ समय: भगवत गीता पढ़ने के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है, Bhagavad Gita क्योंकि इस समय मन, मस्तिष्क और वातावरण में शांति व सकारात्मकता होती है। मन की स्थिति: गीता का पाठ हमेशा स्नान के बाद और शांत चित्त मन से ही करना चाहिए। एकाग्रता: पाठ करते समय बीच-बीच में इधर-उधर की बातें नहीं करनी चाहिए और न ही किसी कार्य के लिए बार-बार उठना चाहिए। स्थान: साफ-सफाई वाले स्थान और ज़मीन पर आसन बिछाकर ही गीता का पाठ करना चाहिए। सम्मान: गीता के प्रत्येक अध्याय को शुरू करने से पहले और बाद में भगवान श्रीकृष्ण और गीता के चरण कमलों को स्पर्श करना चाहिए। श्लोक और भावार्थ: क्या पढ़ें और कैसे? गीता गहरा ज्ञान और अर्थ रखने वाली एक आध्यात्मिक पुस्तक है जो मूल रूप से संस्कृत भाषा में है। Bhagavad Gita आज यह कई अनुवादित भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन संस्कृत के अर्थ न समझने के कारण कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि गीता को श्लोक समेत पढ़ना चाहिए या केवल भावार्थ पढ़ना काफी है। गहराई से जुड़ने के लिए: वैसे तो गीता का भावार्थ भी पढ़ने और समझने के लिए काफी है, Bhagavad Gita लेकिन अगर आप उन्हें संस्कृत के श्लोकों के साथ पढ़ते हैं, तो आप गीता से और गहराई से जुड़ पाएंगे। संस्कृत उच्चारण के लाभ: जिस प्रकार संस्कृत के मंत्रों के जाप के अपने फायदे हैं, ठीक वैसे ही गीता के श्लोकों के पाठ के भी अपने मायने और फायदे हैं। संस्कृत भाषा का उच्चारण

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Shri mahAchaNDyaShTottarashatanAmAvalI:श्रीमहाचण्ड्यष्टोत्तरशतनामावली

Shri mahAchaNDyaShTottarashatanAmAvalI:श्रीमहाचण्ड्यष्टोत्तरशतनामावली ॐ अस्यश्री महाचण्डी महामन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः ककुप्छन्दः श्री महाचण्डिका दुर्गा देवता ॥ ह्रां – ह्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत्ध्यानम्शशलाञ्छनसम्युतां त्रिनेत्रांवरचक्राभयशङ्खशूलपाणिम् ।असिखेटकधारिणीं महेशीं त्रिपुरारातिवधूं शिवांस्मरामि ॥ मन्त्रः – ॐ ह्रीं श्च्यूं मं दुं दुर्गायै नमः ॐ ॥ ॥अथ महाचण्डी नामावलिः॥ ॐ चण्डिकायै नमः ।ॐ मङ्गलायै नमः ।ॐ सुशीलायै नमः ।ॐ परमार्थप्रबोधिन्यै नमः ।ॐ दक्षिणायै नमः ।ॐ दक्षिणामूर्त्यै नमः ।ॐ सुदक्षिणायै नमः ।ॐ हविःप्रियायै नमः ।ॐ योगिन्यै नमः ।ॐ योगाङ्गायै नमः । १०ॐ धनुःशालिन्यै नमः ।ॐ योगपीठधरायै नमः ।ॐ मुक्तायै नमः ।ॐ मुक्तानां परमा गत्यै नमः ।ॐ नारसिम्ह्यै नमः ।ॐ सुजन्मने नमः ।ॐ मोक्षदायै नमः ।ॐ दूत्यै नमः ।ॐ साक्षिण्यै नमः ।ॐ दक्षायै नमः । २०ॐ दक्षिणायै नमः ।ॐ सुदक्षायै नमः ।ॐ कोटिरूपिण्यै नमः ।ॐ क्रतुस्वरूपिण्यै नमः ।ॐ कात्यायन्यै नमः ।ॐ स्वस्थायै नमः ।ॐ कविप्रियायै नमः ।ॐ सत्यग्रामायै नमः ।ॐ बहिःस्थितायै नमः ।ॐ काव्यशक्त्यै नमः । ३०ॐ काव्यप्रदायै नमः ।ॐ मेनापुत्र्यै नमः ।ॐ सत्यायै नमः ।ॐ परित्रातायै नमः ।ॐ मैनाकभगिन्यै नमः ।ॐ सौदामिन्यै नमः ।ॐ सदामायायै नमः ।ॐ सुभगायै नमः ।ॐ कृत्तिकायै नमः ।ॐ कालशायिन्यै नमः । ४०ॐ रक्तबीजवधायै नमः ।ॐ दृप्तायै नमः ।ॐ सन्तपायै नमः ।ॐ बीजसन्तत्यै नमः ।ॐ जगज्जीवायै नमः ।ॐ जगद्बीजायै नमः ।ॐ जगत्त्रयहितैषिण्यै नमः ।ॐ स्वामिकरायै नमः ।ॐ चन्द्रिकायै नमः ।ॐ चन्द्रायै नमः । ५०ॐ साक्षात्स्वरूपिण्यै नमः ।ॐ षोडशकलायै नमः ।ॐ एकपादायै नमः ।ॐ अनुबन्धायै नमः ।ॐ यक्षिण्यै नमः ।ॐ धनदार्चितायै नमः ।ॐ चित्रिण्यै नमः ।ॐ चित्रमायायै नमः ।ॐ विचित्रायै नमः ।ॐ भुवनेश्वर्यै नमः । ६०ॐ चामुण्डायै नमः ।ॐ मुण्डहस्तायै नमः ।ॐ चण्डमुण्डवधायै नमः ।ॐ उद्धतायै नमः ।ॐ अष्टम्यै नमः ।ॐ एकादश्यै नमः ।ॐ पूर्णायै नमः ।ॐ नवम्यै नमः ।ॐ चतुर्दश्यै नमः ।ॐ अमावास्यै नमः । ७०ॐ कलशहस्तायै नमः ।ॐ पूर्णकुम्भधरायै नमः ।ॐ धरित्र्यै नमः ।ॐ अभिरामायै नमः ।ॐ भैरव्यै नमः ।ॐ गम्भीरायै नमः ।ॐ भीमायै नमः ।ॐ त्रिपुरभैरव्यै नमः ।ॐ महचण्डायै नमः ।ॐ महामुद्रायै नमः । ८०ॐ महाभैरवपूजितायै नमः ।ॐ अस्थिमालाधारिण्यै नमः ।ॐ करालदर्शनायै नमः ।ॐ कराल्यै नमः ।ॐ घोरघर्घरनाशिन्यै नमः ।ॐ रक्तदन्त्यै नमः ।ॐ ऊर्ध्वकेशायै नमः ।ॐ बन्धूककुसुमाक्षतायै नमः ।ॐ कदम्बायै नमः ।ॐ पलाशायै नमः । ९०ॐ कुङ्कुमप्रियायै नमः ।ॐ कान्त्यै नमः ।ॐ बहुसुवर्णायै नमः ।ॐ मातङ्ग्यै नमः ।ॐ वरारोहायै नमः ।ॐ मत्तमातङ्गगामिन्यै नमः ।ॐ हम्सगतायै नमः ।ॐ हम्सिन्यै नमः ।ॐ हम्सोज्वलायै नमः ।ॐ शङ्खचक्राङ्कितकरायै नमः । १००ॐ कुमार्यै नमः ।ॐ कुटिलालकायै नमः ।ॐ मृगेन्द्रवाहिन्यै नमः ।ॐ देव्यै नमः ।ॐ दुर्गायै नमः ।ॐ वर्धिन्यै नमः ।ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः ।ॐ महाचण्डिकायै नमः । १०८ ॥ॐ॥

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Devistuti ShakrAdaya or Mahishantakarisuktam:शक्रादयकृता देवीस्तुतिः अथवा महिषन्तकरीसूक्तम्

Devistuti ShakrAdaya or Mahishantakarisuktam:शक्रादयकृता देवीस्तुतिः अथवा महिषन्तकरीसूक्तम् दुर्गा सप्तशत्यान्तर्गतम् ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ऋषिरुवाच ॥ १॥ शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या । तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥ २॥ देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ ३॥ यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च । सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥ ४॥ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः । श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥ ५॥ किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि । किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ६॥ हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै- र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा । सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत- मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ ७॥ यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि । स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु- रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ ८॥ या मुक्तिहेतुरविचन्त्यमहाव्रता त्वं अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः । मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥ ९॥ शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान- मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् । देवी त्रयी भगवती भवभावनाय वार्त्ता च सर्वजगतां परमार्त्ति हन्त्री ॥ १०॥ मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा । श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥ ११॥ ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥ १२॥ दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल- मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः । प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ १३॥ देवि प्रसीद परमा भवती भवाय सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि । विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत- न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ १४॥ ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ १५॥ धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा- ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति । स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा- ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ १६॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ १७॥ एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान्विनिहंसि देवि ॥ १८॥ दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥ १९॥ खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् । यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड- योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ २०॥ दुर्वृत्तवृत्तशमन्ं तव देवि शीलं रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः । वीर्यं च हन्त्रि हृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥ २१॥ केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र । चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ २२॥ त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा । नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त- मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ २३॥ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४॥ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ २५॥ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ २६॥ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्रानि तेऽम्बिके । करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान्रक्ष सर्वतः ॥ २७॥ ऋषिरुवाच ॥ २८॥ एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः । अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ २९॥ भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता । प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ ३०॥ देव्युवाच ॥ ३१॥ व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छतम् ॥ ३२॥ देवा उचुः ॥ ३३॥ भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते । यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥ ३४॥ यदि चापि वरो देयस्त्वयाऽस्माकं महेश्वरि । संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥ ३५॥ यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥ ३६॥ तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् । वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ ३७॥ ऋषिरुवाच ॥ ३८॥ इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽत्मनः । तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ३९॥ इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा । देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४०॥ पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् । वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४१॥ रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी । तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ४२॥ इति श्री मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥

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