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Shri Durganama Shodashi: श्रीदुर्गानामषोडशी

Shri Durganama Shodashi: श्रीदुर्गानामषोडशी दुर्गा नारायणीशाना विष्णुमाया शिवा सती ।नित्या सत्या भगवती शर्वाणी सर्वमङ्गळा ।अम्बिका वैष्णवी गौरी पार्वती च सनातनी ॥ एषा नाम्नां षोडशिका श्रीदुर्गायाः प्रियङ्करी ।कीर्तनादाशु सुखदा सर्वोपद्रवनाशिनी ।ॐ दुर्गायै नमः । नारायण्यै नमः । ईशानायै नमः । विष्णुमायायैनमः । शिवायै नमः । सत्यै नमः । नित्यायै नमः । सत्यायै नमः ।भगवत्यै नमः । शर्वाण्यै नमः । सर्वमङ्गळायै नमः । अम्बिकायैनमः । वैष्णव्यै नमः । गौर्यै नमः । पार्वत्यै नमः । सनातन्यै नमः । इति श्रीदुर्गानामषोडशी समाप्ता ।

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ShrIdurgAsaptashlokI: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी

ShrIdurgAsaptashlokI: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी । अथ सप्तश्लोकी दुर्गा ।शिव उवाचदेवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥ देव्युवाचश‍ृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥ ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य नारायण ऋषिः ।अनुष्टुभादीनि छन्दांसि । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः ।श्रीदूर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ॥ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ २॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ५॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ६॥ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥ ७॥ ॥ इति दुर्गासप्तश्लोकी सम्पूर्णा ॥

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DevIkShamApaNastotram: देवीक्षमापणस्तोत्रम्

devIkShamApaNastotram: देवीक्षमापणस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः ।अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।दासोऽयमिति मां मत्त्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥ १॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ २॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ ३॥ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ ४॥ सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ५॥ अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ६॥ कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ ७॥ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वप्रसादात्सुरेश्वरि ॥ ८॥ ॥ इति देवीक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Vishwakarma Jayanti

Vishwakarma Jayanti: विश्वकर्मा पूजा 2025: कब है भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती? जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि !

Vishwakarma Jayanti: सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का पहला वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और शिल्पकार माना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इन्होंने भगवान ब्रह्मा के सातवें पुत्र के रूप में ब्रह्मांड के निर्माण में उनकी सहायता की थी। Vishwakarma Jayanti यह पर्व मुख्य रूप से कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करके भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह त्योहार उस दिन मनाया जाता है जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। आइए, जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में। Vishwakarma Jayanti 2025 date and auspicious time:विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा 2025 इस दिन मनाई जाएगी: विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 Vishwakarma Jayanti ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव 17 सितंबर 2025 को देर रात 01 बजकर 54 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 01 बजकर 55 मिनट पर) सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। Auspicious time of puja:पूजा के शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा Vishwakarma Jayanti पूजा के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिनमें पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। • पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक • महा पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक (अवधि: 02 घंटे 03 मिनट) • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 18 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 24 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक Vishwakarma Puja 2025 Rahukaal Timings:विश्वकर्मा पूजा 2025 राहुकाल का समय Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल का समय दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से 01 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल में पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए इस समय से पहले या बाद में पूजा करना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा पर बन रहे शुभ योग Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव और परिघ योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। परिघ योग के बाद शिव योग का संयोग बनेगा, और इसके साथ ही शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Significance) सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है: • सृष्टि के निर्माता: भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला वास्तुकार और शिल्पकार माना जाता है। Vishwakarma Jayanti उन्होंने ब्रह्मांड के निर्माण में ब्रह्मा जी की सहायता की थी। • सुख और सौभाग्य: धार्मिक मान्यता है कि शिल्पकार विश्वकर्मा जी की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। • सभी सुखों की प्राप्ति: भगवान विश्वकर्मा की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। • कार्य बाधाओं से मुक्ति: उनकी आराधना करने से काम में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं। • कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। • व्यापार में तरक्की: उनकी कृपा से कारोबार में तरक्की मिलती है। • घर-परिवार में खुशहाली: भगवान विश्वकर्मा की पूजा से घर-परिवार में खुशहाली आती है। •औजारों और मशीनों की पूजा: यह त्योहार कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा अपने औजारों और मशीनों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वे निर्बाध रूप से कार्य कर सकें। विश्वकर्मा पूजा 2025 पूजन विधि (Puja Vidhi) भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधिपूर्वक करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है: 1. प्रातःकाल स्नान: पूजा करने से पहले, व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए। 2. सफाई: स्नान के बाद, अपने घर, कार्यस्थल, औजारों और मशीनों की अच्छी तरह से सफाई करें। 3. मूर्ति/चित्र स्थापना: एक चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 4. पूजन सामग्री अर्पित करें: भगवान को फूल, धूप, दीप, चंदन, फल और प्रसाद अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद पाने के लिए उनके मंत्र ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ का जाप अवश्य करें। मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से पूजा का फल और अधिक बढ़ जाता है। 6. प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद, प्रसाद सभी में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें। निष्कर्ष Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा 2025 शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन न केवल हमारे औजारों और मशीनों के प्रति आदर भाव जगाता है, बल्कि हमें कार्य में कुशलता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में भी मदद करता है। Vishwakarma Jayanti विधि-विधान से पूजा करके हम भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सफलता तथा खुशहाली ला सकते हैं। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

Indira Ekadashi: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और इनमें इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi 2025) का स्थान अत्यंत पवित्र है। यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली यह एकमात्र एकादशी है, जो इसे पितरों के उद्धार और मोक्ष के लिए समर्पित एक खास अवसर बनाती है। Indira Ekadashi इस दिन भगवान लक्ष्मी नारायण जी की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि पितरों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए, इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व को विस्तार से जानते हैं। इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त:Date and auspicious time of Indira Ekadashi 2025 वैदिक पंचांग के अनुसार, इंदिरा एकादशी 2025: इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 16 सितंबर 2025 को मध्य रात्रि 12:21 बजे से शुरू होने का भी उल्लेख है) एकादशी तिथि समाप्त: 17 सितंबर को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर सनातन धर्म में उदया तिथि मान्य है, जिसके अनुसार सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसलिए, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। पूजा के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of puja • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • लाभ मुहूर्त (सुबह): सुबह 05:32 बजे से 07:04 बजे तक • अमृत मुहूर्त (सुबह): सुबह 07:04 बजे से 08:36 बजे तक • शुभ मुहूर्त (दोपहर): सुबह 10:08 बजे से 11:40 बजे तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:18 बजे से दोपहर 03:07 बजे तक • लाभ मुहूर्त (शाम): शाम 04:15 बजे से 05:47 बजे तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:24 बजे से शाम 06:47 बजे तक (अन्य स्रोत में 05:45 बजे से 06:10 बजे तक) • चर मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 10:11 बजे से 11:40 बजे तक • निशिता मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 11:16 बजे से 12:03 बजे तक इंदिरा एकादशी पारण का समय:Time of Indira Ekadashi Paran • इंदिरा एकादशी का पारण 18 सितंबर 2025 को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: सुबह 06 बजकर 07 मिनट से सुबह 08 बजकर 34 मिनट तक (अन्य स्रोत में 05:33 बजे से 07:04 बजे तक) इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करें और अन्न व धन का दान कर व्रत खोलें। इंदिरा एकादशी का महत्व: Significance of Indira Ekadashi सनातन धर्म में Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का खास महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और पितृ पक्ष में पड़ने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। • पितरों को मोक्ष: धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि उनके पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। • पितृ दोष का निवारण: जिन व्यक्तियों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह दोष को शांत करने में मदद करता है। इसे श्राद्ध एकादशी भी कहा जाता है, और इस दिन पितरों का श्राद्ध व तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। • पापों से मुक्ति: नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया था कि यह व्रत न केवल पितरों को मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्रत करने वाले के स्वयं के पापों का भी नाश करता है। • सुख-समृद्धि: मान्यता है कि इस व्रत को करने से साधक को जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है और सभी सुखों को भोगकर वह बैकुंठ धाम को जाता है। • अश्वमेध यज्ञ के समान फल: शास्त्रों में कहा गया है कि Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। • अकाल मृत्यु से मुक्ति: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है। इंदिरा एकादशी की पूजा विधि:Puja Vidhi of Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी Indira Ekadashi का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है और द्वादशी तिथि तक चलता है। 1. दशमी तिथि के दिन: • एक समय भोजन: दशमी के दिन भक्त केवल एक समय सात्विक भोजन करते हैं। मांसाहारी भोजन, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज किया जाता है। • ब्रह्मचर्य का पालन: दशमी की रात से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। • पितृ तर्पण (वैकल्पिक): यदि संभव हो तो दशमी के दिन दोपहर में नदी या पवित्र सरोवर में पितरों के लिए तर्पण किया जा सकता है। इसमें जल और काले तिल से पितरों को अर्घ्य दिया जाता है। • घर की शुद्धि: घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। 2. एकादशी तिथि के दिन • प्रातःकाल स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें। • व्रत का संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय कहें कि “मैं इंदिरा एकादशी का व्रत अपने पितरों को मोक्ष दिलाने और अपने पापों का नाश करने के लिए कर रहा/रही हूं।” • भगवान शालिग्राम की पूजा: भगवान शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) या भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं। पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। • इंदिरा एकादशी व्रत कथा श्रवण: एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। • पितृ तर्पण: इस दिन दोपहर में पितरों के लिए विशेष तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। Indira Ekadashi इसमें जल, दूध, काले तिल और कुश से पितरों को तर्पण दिया जाता है। • ब्राह्मण भोजन: यदि संभव हो, तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दें। • रात्रि जागरण: रात में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें और उनकी कथाएं सुनें। 3. द्वादशी तिथि के दिन (पारण) • प्रातःकाल पूजा: सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें। • ब्राह्मण को भोजन और दान: पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएं

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Geeta Adhyay

Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष

Geeta Adhyay: श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक श्राद्ध रहते हैं। इन 16 दिनों के लिए हमारे पितृ सूक्ष्म रूप में हमारे घर में विराजमान होते हैं। श्राद्ध में श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए। इस पाठ का फल आत्मा को समर्पित करना चाहिए। Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए…. भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष की शुरुआत होती है, जो कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक कुल 16 दिन का होता है. पितृ पक्ष के इन सोलह दिन हम अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार इस दौरान सूक्ष्म रूप से हमारे पितर हमारे घर में विराजमान होते हैं और हमारे द्वारा किये गये श्राद्ध कर्म से तृप्त होते हैं. अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया मुक्ति कर्म ही श्राद्ध कहलाता है और उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं. तर्पण को ही पिंडदान भी कहा जाता है. श्रीमद भगवत गीता के 7वें अध्याय में श्राद्ध कर्म का उल्लेख मिलता है. श्राद्ध के दिन भगवत गीता के सातवें अध्याय का महात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए और उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए. बता दें कि Geeta Adhyay श्रीमद भगवत गीता का वो ज्ञान जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था. Geeta Adhyay इस गीता का सातवें अध्याय पितृ मुक्ति और मोक्ष से जुड़ा है. श्राद्ध पक्ष में गीता के सातवें अध्याय का पाठ किया जाता है. जिसका नाम है ज्ञानविज्ञान योग. शास्त्रों में इसे पितरों के कल्याण का सबसे सरल उपाय बताया गया है. कहा जाता है कि पितृ पक्ष में श्रीमद भगवत गीता की कथा को सुनने मात्र से ही पितृ दोष से मुक्ति मिल जाती है. गीता का पाठ पितरों को मोक्ष दिलाने का अटूट साधन है. मान्यता है कि परिवार के किसी पूर्वज की मृत्यु के बाद अगर उसका अंतिम संस्कार भलीभांति नहीं किया जाता है या फिर उसकी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है तो उसकी आत्मा अपने घर और आगामी पीढ़ी के इर्द गिर्द ही भटकती रहती है और वहीं अतृप्त आत्मा परिवार के लोगों को कष्ट देकर अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दबाव बनाती है. ऐसे ही Geeta Adhyay पितृ दोष को दूर करने के लिए हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध कर्म ही मृतक को वैतरणी पार कराता है. पितृ पक्ष में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करना सबसे प्रभावशाली होता है. गीता में श्रीकृष्ण ने खुद कहा है कि ‘सर्व धमार्न परित्यज्य माम एकम शरणम व्रज’ अर्थात सभी परंपराओं और युक्तियों को छोड़कर जो व्यक्ति केवल श्रीकृष्ण की आराधना करता है. उसके लिए बाधाएं अवसर में और कांटे फूल में बदल जाते हैं. श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली वाणी का वर्णन है. इसीलिए जब संकट में भगवत वाणी का श्रवण करने से सभी संकट खुद-ब-खुद टल जाते हैं. मान्यताओं के अनुसार राजा परिक्षित से जब ऋषि शमीक का अपमान किया और ऋगी ऋषि के चलते सात दिन में सर्पदंश से मृत्यु का श्राप मिता तो सभी ऋषि-मुनियों ने श्राप से मुक्ति के जो उपाय बताए वे प्रभावहीन रहे और जब शुकदेव महराज ने उन्हें भागवत का परायण कराया तो कथा का विश्राम होते ही परीक्षित का भय दूर हुआ और उन्हें सदगति प्राप्त हुई. बता दें कि Geeta Adhyay गीता में योग शब्द को एक नहीं, बल्कि कई अर्थों में प्रयोग हुआ है और हर योग अंतिम में भगवान से मिलने के मार्ग से जोड़ता है. योग का मतलब आत्मा का परमात्मा से मिलन है. गीता में योग के कई प्रकार हैं. लेकिन मुख्य रूप से तीन योग ज्ञान योग, Geeta Adhyay कर्म योग और भक्ति योग का वास्ता मनुष्य से अधिक होता है. Geeta Adhyay महाभारत के युदध् के दौरान जब अर्जुन रिश्ते नातों में उलझ कर मोह में बंध रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन को बताया था कि जीवन का सबसे बड़ा योग कर्म योग है. उन्होंने बताया था कि कर्म योग से कोई भी प्राणी मुक्त नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा कि वह स्वंय अर्थात भगवान भी कर्म योग से बंधे हैं.

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Durga Dvatrimshat Namavalih: दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः

Durga Dvatrimshat Namavalih: दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गाऽऽपद्विनिवारिणी ।दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ॥ १॥ दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ॥ २॥ दुर्गमादुर्गमालोका दुर्गमाऽऽत्मस्वरूपिणी ।दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ॥ ३॥ दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ॥ ४॥ दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ॥ ५॥ दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया सुधी मानवः ॥ ६॥ पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः ।शत्रुभिः पीड्यमानो वा दुर्गबन्धगतोऽपि वा ।द्वात्रिंशन्नामपाठेन मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७॥ इति दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः समाप्ता ।

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ChaNDikAShTakam:चण्डिकाष्टकम्

ChaNDikAShTakam:चण्डिकाष्टकम् सहस्रचन्द्रनित्दकातिकान्त-चन्द्रिकाचयै-दिशोऽभिपूरयद् विदूरयद् दुराग्रहं कलेः ।कृतामलाऽवलाकलेवरं वरं भजामहेमहेशमानसाश्रयन्वहो महो महोदयम् ॥ १॥ विशाल-शैलकन्दरान्तराल-वासशालिनींत्रिलोकपालिनीं कपालिनी मनोरमामिमाम् ।उमामुपासितां सुरैरूपास्महे महेश्वरींपरां गणेश्वरप्रसू नगेश्वरस्य नन्दिनीम् ॥ २॥ अये महेशि! ते महेन्द्रमुख्यनिर्जराः समेसमानयन्ति मूर्द्धरागत परागमंघ्रिजम् ।महाविरागिशंकराऽनुरागिणीं नुरागिणीस्मरामि चेतसाऽतसीमुमामवाससं नुताम् ॥ ३॥ भजेऽमरांगनाकरोच्छलत्सुचाम रोच्चलन्निचोल-लोलकुन्तलां स्वलोक-शोक-नाशिनीम् ।अदभ्र-सम्भृतातिसम्भ्रम-प्रभूत-विभ्रम-प्रवृत-ताण्डव-प्रकाण्ड-पण्डितीकृतेश्वराम् ॥ ४॥ अपीह पामरं विधाय चामरं तथाऽमरंनुपामरं परेशिदृग्-विभाविता-वितत्रिके ।प्रवर्तते प्रतोष-रोष-खेलन तव स्वदोष-मोषहेतवे समृद्धिमेलनं पदन्नुमः ॥ ५॥ भभूव्-भभव्-भभव्-भभाभितो-विभासि भास्वर-प्रभाभर-प्रभासिताग-गह्वराधिभासिनीम् ।मिलत्तर-ज्वलत्तरोद्वलत्तर-क्षपाकरप्रमूत-भाभर-प्रभासि-भालपट्टिकां भजे ॥ ६॥ कपोतकम्बु-काम्यकण्ठ-कण्ठयकंकणांगदा-दिकान्त-काश्चिकाश्चितां कपालिकामिनीमहम् ।वरांघ्रिनूपुरध्वनि-प्रवृत्तिसम्भवद् विशेष-काव्यकल्पकौशलां कपालकुण्डलां भजे ॥ ७॥ भवाभय-प्रभावितद्भवोत्तरप्रभावि भव्यभूमिभूतिभावन प्रभूतिभावुकं भवे ।भवानि नेति ते भवानि! पादपंकजं भजेभवन्ति तत्र शत्रुवो न यत्र तद्विभावनम् ॥ ८॥ दुर्गाग्रतोऽतिगरिमप्रभवां भवान्याभव्यामिमां स्तुतिमुमापतिना प्रणीताम् ।यः श्रावयेत् सपुरूहूतपुराधिपत्यभाग्यं लभेत रिपवश्च तृणानि तस्य ॥ ९॥ रामाष्टांक शशांकेऽब्देऽष्टम्यां शुक्लाश्विने गुरौ ।शाक्तश्रीजगदानन्दशर्मण्युपहृता स्तुतिः ॥ १०॥ ॥ इति कविपत्युपनामक-श्री उमापतिद्विवेदि-विरचितं चण्डिकाष्टकंसम्पूर्णम् ॥

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Shri KumarI SahasranAmastotram: श्रीकुमारीसहस्रनामस्तोत्रम्

Shri KumarI SahasranAmastotram: श्रीकुमारीसहस्रनामस्तोत्रम् आनन्दभैरव उवाच वद कान्ते सदानन्दस्वरूपानन्दवल्लभे । कुमार्या देवतामुख्याः परमानन्दवर्धनम् ॥ १॥ अष्टोत्तरसहस्राख्यं नाम मङ्गलमद्भुतम् । यदि मे वर्तते विद्ये यदि स्नेहकलामला ॥ २॥ तदा वदस्व कौमारीकृतकर्मफलप्रदम् । महास्तोत्रं कोटिकोटि कन्यादानफलं भवेत् ॥ ३॥ आनन्दभैरवी उवाच महापुण्यप्रदं नाथ श‍ृणु सर्वेश्वरप्रिय । अष्टोत्तरसहस्राख्यं कुमार्याः परमाद्भुतम् ॥ ४॥ पठित्त्वा धारयित्त्वा वा नरो मुच्येत सङ्कटात् । सर्वत्र दुर्लभं धन्यं धन्यलोकनिषेवितम् ॥ ५॥ अणिमाद्यष्टसिद्ध्यङ्गं सर्वानन्दकरं परम् । मायामन्त्रनिरस्ताङ्गं मन्त्रसिद्धिप्रदे नृणाम् ॥ ६॥ न पूजा न जपं स्नानं पुरश्चर्याविधिश्च न । अकस्मात् सिद्धिमवाप्नोति सहस्रनामपाठतः ॥ ७॥ सर्वयज्ञफलं नाथ प्राप्नोति साधकः क्षणात् । मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्यं योनिमुद्रास्वरूपकम् ॥ ८॥ कोटिवर्षशतेनापि फलं वक्तुं न शक्यते । तथापि वक्तुमिच्छामि हिताय जगतां प्रभो ॥ ९॥ अस्याः श्रीकुमार्याः सहस्रनामकवचस्य वटुकभैरवऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । कुमारीदेवता । सर्वमन्त्रसिद्धिसमृद्धये विनियोगः ॥ १०॥ ॐ कुमारी कौशिकी काली कुरुकुल्ला कुलेश्वरी । कनकाभा काञ्चनाभा कमला कालकामिनी ॥ ११॥ कपालिनी कालरूपा कौमारी कुलपालिका । कान्ता कुमारकान्ता च कारणा करिगामिनी ॥ १२॥ कन्धकान्ता कौलकान्ता कृतकर्मफलप्रदा । कार्याकार्यप्रिया कक्षा कंसहन्त्री कुरुक्षया ॥ १३॥ कृष्णकान्ता कालरात्रिः कर्णेषुधारिणीकरा । कामहा कपिला काला कालिका कुरुकामिनी ॥ १४॥ कुरुक्षेत्रप्रिया कौला कुन्ती कामातुरा कचा । कलञ्जभक्षा कैकेयी काकपुच्छध्वजा कला ॥ १५॥ कमला कामलक्ष्मी च कमलाननकामिनी । कामधेनुस्वरूपा च कामहा काममदीनी ॥ १६॥ कामदा कामपूज्या च कामातीता कलावती । भैरवी कारणाढ्या च कैशोरी कुशलाङ्गला ॥ १७॥ कम्बुग्रीवा कृष्णनिभा कामराजप्रियाकृतिः । कङ्कणालङ्कृता कङ्का केवला काकिनी किरा ॥ १८॥ किरातिनी काकभक्षा करालवदना कृशा । केशिनी केशिहा केशा कासाम्बष्ठा करिप्रिया ॥ १९॥ कविनाथस्वरूपा च कटुवाणी कटुस्थिता । कोटरा कोटराक्षी च करनाटकवासिनी ॥ २०॥ कटकस्था काष्ठसंस्था कन्दर्पा केतकी प्रिया । केलिप्रिया कम्बलस्था कालदैत्यविनाशिनी ॥ २१॥ केतकीपुष्पशोभाढ्या कर्पूरपूर्णजिह्विका । कर्पूराकरकाकोला कैलासगिरिवासिनी ॥ २२॥ कुशासनस्था कादम्बा कुञ्जरेशी कुलानना । खर्बा खड्गधरा खड्गा खलहा खलबुद्धिदा ॥ २३॥ खञ्जना खररूपा च क्षाराम्लतिक्तमध्यगा । खेलना खेटककरा खरवाक्या खरोत्कटा ॥ २४॥ खद्योतचञ्चला खेला खद्योता खगवाहिनी । खेटकस्था खलाखस्था खेचरी खेचरप्रिया ॥ २५॥ खचरा खरप्रेमा खलाढ्या खचरानना । खेचरेशी खरोग्रा च खेचरप्रियभाषिणी ॥ २६॥ खर्जूरासवसंमत्ता खर्जूरफलभोगिनी । खातमध्यस्थिता खाता खाताम्बुपरिपूरिणी ॥ २७॥ ख्यातिः ख्यातजलानन्दा खुलना खञ्जनागतिः । खल्वा खलतरा खारी खरोद्वेगनिकृन्तनी ॥ २८॥ गगनस्था च भीता च गभीरनादिनी गया । गङ्गा गभीरा गौरी च गणनाथ प्रिया गतिः ॥ २९॥ गुरुभक्ता ग्वालिहीना गेहिनी गोपिनी गिरा । गोगणस्था गाणपत्या गिरिजा गिरिपूजिता ॥ ३०॥ गिरिकान्ता गणस्था च गिरिकन्या गणेश्वरी । गाधिराजसुता ग्रीवा गुर्वी गुर्व्यम्बशाङ्करी ॥ ३१॥ गन्धर्व्वकामिनी गीता गायत्री गुणदा गुणा । गुग्गुलुस्था गुरोः पूज्या गीतानन्दप्रकाशिनी ॥ ३२॥ गयासुरप्रियागेहा गवाक्षजालमध्यगा । गुरुकन्या गुरोः पत्नी गहना गुरुनागिनी ॥ ३३॥ गुल्फवायुस्थिता गुल्फा गर्द्दभा गर्द्दभप्रिया । गुह्या गुह्यगणस्था च गरिमा गौरिका गुदा ॥ ३४॥ गुदोर्ध्वस्था च गलिता गणिका गोलका गला । गान्धर्वी गाननगरी गन्धर्वगणपूजिता ॥ ३५॥ घोरनादा घोरमुखी घोरा घर्मनिवारिणी । घनदा घनवर्णा च घनवाहनवाहना ॥ ३६॥ घर्घरध्वनिचपला घटाघटपटाघटा । घटिता घटना घोना घनरुप घनेश्वरी ॥ ३७॥ घुण्यातीता घर्घरा च घोराननविमोहिनी । घोरनेत्रा घनरुचा घोरभैरव कन्यका ॥ ३८॥ घाताघातकहा घात्या घ्राणाघ्राणेशवायवी । घोरान्धकारसंस्था च घसना घस्वरा घरा ॥ ३९॥ घोटकेस्था घोटका च घोटकेश्वरवाहना । घननीलमणिश्यामा घर्घरेश्वरकामिनी ॥ ४०॥ ङकारकूटसम्पन्ना ङकारचक्रगामिनी । ङकारी ङसंशा चैव ङीपनीता ङकारिणी ॥ ४१॥ चन्द्रमण्डलमध्यस्था चतुरा चारुहासिनी । चारुचन्द्रमुखी चैव चलङ्गमगतिप्रिया ॥ ४२॥ चञ्चला चपला चण्डी चेकिताना चरुस्थिता । चलिता चानना चार्व्वो चारुभ्रमरनादिनी ॥ ४३॥ चौरहा चन्द्रनिलया चैन्द्री चन्द्रपुरस्थिता । चक्रकौला चक्ररूपा चक्रस्था चक्रसिद्धिदा ॥ ४४॥ चक्रिणी चक्रहस्ता च चक्रनाथकुलप्रिया । चक्राभेद्या चक्रकुला चक्रमण्डलशोभिता ॥ ४५॥ चक्रेश्वरप्रिया चेला चेलाजिनकुशोत्तरा । चतुर्वेदस्थिता चण्डा चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ ४६॥ चतुर्गुणा चन्द्रवर्णा चातुरी चतुरप्रिया । चक्षुःस्था चक्षुवसतिश्चणका चणकप्रिया ॥ ४७॥ चार्व्वङ्गी चन्द्रनिलया चलदम्बुजलोचना । चर्व्वरीशा चारुमुखी चारुदन्ता चरस्थिता ॥ ४८॥ चसकस्थासवा चेता चेतःस्था चैत्रपूजिता । चाक्षुषी चन्द्रमलिनी चन्द्रहासमणिप्रभा ॥ ४९॥ छलस्था छुद्ररूपा च छत्रच्छायाछलस्थिता । छलज्ञा छेश्वराछाया छाया छिन्नशिवा छला ॥ ५०॥ छत्राचामरशोभाढ्या छत्रिणां छत्रधारिणी । छिन्नातीता छिन्नमस्ता छिन्नकेशा छलोद्भवा ॥ ५१॥ छलहा छलदा छाया छन्ना छन्नजनप्रिया । छलछिन्ना छद्मवती छद्मसद्मनिवासिनी ॥ ५२॥ छद्मगन्धा छदाछन्ना छद्मवेशी छकारिका । छगला रक्तभक्षा च छगलामोदरक्तपा ॥ ५३॥ छगलण्डेशकन्या च छगलण्डकुमारिका । छुरिका छुरिककरा छुरिकारिनिवाशिनी ॥ ५४॥ छिन्ननाशा छिन्नहस्ता छोणलोला छलोदरी । छलोद्वेगा छाङ्गबीजमाला छाङ्गवरप्रदा ॥ ५५॥ जटिला जठरश्रीदा जरा जज्ञप्रिया जया । जन्त्रस्था जीवहा जीवा जयदा जीवयोगदा ॥ ५६॥ जयिनी जामलस्था च जामलोद्भवनायिका । जामलप्रियकन्या च जामलेशी जवाप्रिया ॥ ५७॥ जवाकोटिसमप्रख्या जवापुष्पप्रिया जना । जलस्था जगविषया जरातीता जलस्थिता ॥ ५८॥ जीवहा जीवकन्या च जनार्द्दनकुमारिका । जतुका जलपूज्या च जगन्नाथादिकामिनी ॥ ५९॥ जीर्णाङ्गी जीर्णहीना च जीमूतात्त्यन्तशोभिता । जामदा जमदा जृम्भा जृम्भणास्त्रादिधारिणी ॥ ६०॥ जघन्या जारजा प्रीता जगदानन्दवद्धीनी । जमलार्जुनदर्पघ्नी जमलार्जुनभञ्जिनी ॥ ६१॥ जयित्रीजगदानन्दा जामलोल्लाससिद्धिदा । जपमाला जाप्यसिद्धिर्जपयज्ञप्रकाशिनी ॥ ६२॥ जाम्बुवती जाम्बवतः कन्यकाजनवाजपा । जवाहन्त्री जगद्बुद्धिर्ज्जगत्कर्तृ जगद्गतिः ॥ ६३॥ जननी जीवनी जाया जगन्माता जनेश्वरी । झङ्कला झङ्कमध्यस्था झणत्कारस्वरूपिणी ॥ ६४॥ झणत्झणद्वह्निरूपा झननाझन्दरीश्वरी । झटिताक्षा झरा झञ्झा झर्झरा झरकन्यका ॥ ६५॥ झणत्कारी झना झन्ना झकारमालयावृता । झङ्करी झर्झरी झल्ली झल्वेश्वरनिवासिनी ॥ ६६॥ ञकारी ञकिराती च ञकारबीजमालिनी । ञनयोऽन्ता ञकारान्ता ञकारपरमेश्वरी ॥ ६७॥ ञान्तबीजपुटाकारा ञेकले ञैकगामिनी । ञैकनेला ञस्वरूपा ञहारा ञहरीतकी ॥ ६८॥ टुण्टुनी टङ्कहस्ता च टान्तवर्गा टलावती । टपला टापबालाख्या टङ्कारध्वनिरूपिणी ॥ ६९॥ टलाती टाक्षरातीता टित्कारादिकुमारिका । टङ्कास्त्रधारिणी टाना टमोटार्णलभाषिणी ॥ ७०॥ टङ्कारी विधना टाका टकाटकविमोहिनी । टङ्कारधरनामाहा टिवीखेचरनादिनी ॥ ७१॥ ठठङ्कारी ठाठरूपा ठकारबीजकारणा । डमरूप्रियवाद्या च डामरस्था डबीजिका ॥ ७२॥ डान्तवर्गा डमरुका डरस्था डोरडामरा । डगरार्द्धा डलातीता डदारुकेश्वरी डुता ॥ ७३॥ ढार्द्धनारीश्वरा ढामा ढक्कारी ढलना ढला । ढकेस्था ढेश्वरसुता ढेमनाभावढोनना ॥ ७४॥ णोमाकान्तेश्वरी णान्तवर्गस्था णतुनावती । णनो माणाङ्ककल्याणी णाक्षवीणाक्षबीजिका ॥ ७५॥ तुलसीतन्तुसूक्ष्माख्या तारल्या तैलगन्धिका । तपस्या तापससुता तारिणी तरुणी तला ॥ ७६॥ तन्त्रस्था तारकब्रह्मस्वरूपा तन्तुमध्यगा । तालभक्षत्रिधामूत्तीस्तारका तैलभक्षिका ॥ ७७॥ तारोग्रा तालमाला च तकरा तिन्तिडीप्रिया । तपसः तालसन्दर्भा तर्जयन्ती कुमारिका ॥ ७८॥ तोकाचारा तलोद्वेगा तक्षका तक्षकप्रिया । तक्षकालङ्कृता तोषा तावद्रूपा तलप्रिया ॥ ७९॥ तलास्त्रधारिणी तापा तपसां फलदायिनी । तल्वल्वप्रहरालीता तलारिगणनाशिनी ॥ ८०॥ तूला तौली तोलका च तलस्था तलपालिका तरुणा तप्तबुद्धिस्थास्तप्ता प्रधारिणी तपा ॥ ८१॥ तन्त्रप्रकाशकरणी तन्त्रार्थदायिनी तथा । तुषारकिरणाङ्गी च चतुर्धा वा समप्रभा ॥ ८२॥ तैलमार्गाभिसूता च तन्त्रसिद्धिफलप्रदा । ताम्रपर्णा ताम्रकेशा ताम्रपात्रप्रियातमा ॥ ८३॥ तमोगुणप्रिया तोला तक्षकारिनिवारिणी । तोषयुक्ता तमायाची तमषोढेश्वरप्रिया ॥ ८४॥ तुलना तुल्यरुचिरा तुल्यबुद्धिस्त्रिधा मतिः । तक्रभक्षा तालसिद्धिः तत्रस्थास्तत्र गामिनी ॥ ८५॥ तलया तैलभा ताली तन्त्रगोपनतत्परा । तन्त्रमन्त्रप्रकाशा च त्रिशरेणुस्वरूपिणी ॥ ८६॥ त्रिंशदर्थप्रिया तुष्टा तुष्टिस्तुष्टजनप्रिया । थकारकूटदण्डीशा थदण्डीशप्रियाऽथवा ॥ ८७॥ थकाराक्षररूढाङ्गी थान्तवर्गाथ कारिका । थान्ता थमीश्वरी थाका थकारबीजमालिनी ॥ ८८॥ दक्षदामप्रिया दोषा दोषजालवनाश्रिता । दशा दशनघोरा च देवीदासप्रिया दया ॥ ८९॥ दैत्यहन्त्रीपरा दैत्या दैत्यानां मद्दीनी दिशा । दान्ता दान्तप्रिया दासा दामना दीर्घकेशिका ॥ ९०॥ दशना रक्तवर्णा च दरीग्रहनिवासिनी देवमाता च दुर्लभा च दीर्घाङ्गा दासकन्यका ॥ ९१॥ दशनश्री दीर्घनेत्रा दीर्घनासा च दोषहा । दमयन्ती दलस्था च द्वेष्यहन्त्री दशस्थिता ॥ ९२॥ दैशेषिका दिशिगता दशनास्त्रविनाशिनी दारिद्र्यहा

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Durga Chandrakala Stuti: दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः

Durga Chandrakala Stuti: दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः वेधोहरीश्वरस्तुत्यां विहर्त्रीं विन्ध्यभूधरे ।हरप्राणेश्वरीं वन्दे हन्त्रीं विबुधविद्विषाम् ॥ १॥ अभ्यर्थनेन सरसीरुहसम्भवस्य त्यक्त्वोदिता भगवदक्षिपिधानलीलाम् ।विश्वेश्वरी विपदपागमने पुरस्तात् माता ममास्तु मधुकैटभयोर्निहन्त्री ॥ २॥ प्राङ्निर्जरेषु निहितैर्निजशक्तिलेशैः एकीभवद्भिरुदिताखिललोकगुप्त्यै ।सम्पन्नशस्त्रनिकरा च तदायुधस्थैः माता ममास्तु महिषान्तकरी पुरस्तात् ॥ ३॥ प्रालेयशैलतनया तनुकान्तिसम्पत्- कोशोदिता कुवलयच्छविचारुदेहा ।नारायणी नमदभीप्सितकल्पवल्ली सुप्रीतिमावहतु शुम्भनिशुम्भहन्त्री ॥ ४॥ विश्वेश्वरीति महिषान्तकरीति यस्याः नारायणीत्यपि च नामभिरङ्कितानि ।सूक्तानि पङ्कजभुवा च सुरर्षिभिश्च दृष्टानि पावकमुखैश्च शिवां भजे ताम् ॥ ५॥ उत्पत्तिदैत्यहननस्तवनात्मकानि संरक्षकाण्यखिलभूतहिताय यस्याः ।सूक्तान्यशेषनिगमान्तविदः पठन्ति तां विश्वमातरमजस्रमभिष्टवीमि ॥ ६॥ ये वैप्रचित्तपुनरुत्थितशुम्भमुख्यैः दुर्भिक्षघोरसमयेन च कारितासु ।आविष्कृतास्त्रिजगदार्तिषु रूपभेदाः तैरम्बिका समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ७॥ सूक्तं यदीयमरविन्दभवादिदृष्टं आवर्त्य देव्यनुपदं सुरथः समाधिः ।द्वावप्यवापतुरभीष्टमनन्यलभ्यं तामादिदेवतरुणीं प्रणमामि देवीम् ॥ ८॥ माहिष्मतीतनुभवं च रुरुं च हन्तुं आविष्कृतैर्निजरसादवतारभेदैः ।अष्टादशाहतनवाहतकोटिसंख्यैः अम्बा सदा समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ९॥ एतच्चरित्रमखिलं लिखितं हि यस्याः सम्पूजितं सदन एव निवेशितं वा ।दुर्गं च तारयति दुस्तरमप्यशेषं श्रेयः प्रयच्छति च सर्वमुमां भजे ताम् ॥ १०॥ यत्पूजनस्तुतिनमस्कृतिभिर्भवन्ति प्रीताः पितामहरमेशहरास्त्रयोऽपि ।तेषामपि स्वकगुणैर्ददतीं वपूंषि तामीश्वरस्य तरुणीं शरणं प्रपद्ये ॥ ११॥ कान्तारमध्यदृढलग्नतयाऽवसन्नाः मग्नाश्च वारिधिजले रिपुभिश्च रुद्धाः ।यस्याः प्रपद्य चरणौ विपदस्तरन्ति सा मे सदाऽस्तु हृदि सर्वजगत्सवित्री ॥ १२॥ बन्धे वधे महति मृत्युभये प्रसक्ते वित्तक्षये च विविधे च महोपतापे ।यत्पादपूजनमिह प्रतिकारमाहुः सा मे समस्तजननी शरणं भवानी ॥ १३॥ बाणासुरप्रहितपन्नगबन्धमोक्षः तद्बाहुदर्पदलनादुषया च योगः ।प्राद्युम्निना द्रुतमलभ्यत यत्प्रसादात् सा मे शिवा सकलमप्यशुभं क्षिणोतु ॥ १४॥ पापः पुलस्त्यतनयः पुनरुत्थितो मां अद्यापि हर्तुमयमागत इत्युदीतम् ।यत्सेवनेन भयमिन्दिरयाऽवधूतं तामादिदेवतरुणीं शरणं गतोऽस्मि ॥ १५॥ यद्ध्यानजं सुखमवाप्यमनन्तपुण्यैः साक्षात्तमच्युतपरिग्रहमाश्ववापुः ।गोपाङ्गनाः किल यदर्चनपुण्यमात्रात् सा मे सदा भगवती भवतु प्रसन्ना ॥ १६॥ रात्रिं प्रपद्य इति मन्त्रविदः प्रपन्नान् उद्बोध्य मृत्यवधिमन्यफलैः प्रलोभ्य ।बुद्ध्वा च तद्विमुखतां प्रतनं नयन्तीं आकाशमादिजननीं जगतां भजे ताम् ॥ १७॥ देशकालेषु दुष्टेषु दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः ।सन्ध्ययोरनुसन्धेया सर्वापद्विनिवृत्तये ॥ १८॥ इति श्रीमदपय्यदीक्षितविरचिता दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः समाप्ता ।

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Matra Navami

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय

Matra Navami: मातृ नवमी पितृ पक्ष के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, विशेषकर उन माताओं, बहुओं और बेटियों के लिए जिनका निधन सुहागिन के रूप में हुआ हो। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का इंतजार साल भर किया जाता है, क्योंकि यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। आइए, वर्ष 2025 में मातृ नवमी Matra Navami की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों के बारे में विस्तार से जानें ताकि आप अपने दिवंगत पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों When isMatra Navami 2025: मातृ नवमी 2025 कब है? हिंदी पंचांग के अनुसार, मातृ नवमी हर वर्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2025 में, मातृ नवमी श्राद्ध पूजा 15 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। • नवमी तिथि का प्रारम्भ: 15 सितंबर 2025 को सुबह 03 बजकर 06 मिनट पर। • नवमी तिथि की समाप्ति: 16 सितंबर 2025 को सुबह 01 बजकर 31 मिनट पर। मातृ नवमी 2025 के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Matra Navami 2025 श्राद्ध कर्म के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। मातृ नवमी पर आप इन शुभ मुहूर्तों में पूजा-पाठ कर सकते हैं: • अपराह्न काल पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 03 बजकर 58 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 02 घण्टे 28 मिनट। • रोहिणी नक्षत्र में पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 12 बजकर 41 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 00:49 मिनट। हालांकि, यह भी मान्यता है कि मातृ नवमी का श्राद्ध दोपहर 12 बजे से पहले करना शुभ माना गया है। मातृ नवमी का महत्व:Importance of Matra Navami पितृ पक्ष में Matra Navami मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों का पिंडदान करने के लिए समर्पित है जिनकी मृत्यु सुहागिन के रूप में हुई थी। • आत्मा की शांति और आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। • सुख-समृद्धि और सौभाग्य: मातृ नवमी का श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। जिस घर की महिला इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखती है, उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दिवंगत माताओं का श्राद्ध करने से उनकी कृपा पूरे घर पर बनी रहती है। • विशेष विधान: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में सौभाग्यवती माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध की तिथि Matra Navami मातृ नवमी को अलग से बताया गया है। पितृपक्ष में माताओं की पूजा की जाती है और माताओं तथा सुहागिन स्त्रियों के लिए श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मातृ नवमी श्राद्ध पूजा विधि:Matra Navami Shraddha Puja Method मातृ नवमी Matra Navami पर पितरों को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए निम्नलिखित विधि से श्राद्ध कर्म करें: 1. सुबह का स्नान और संकल्प: मातृ नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत हो जाएं। स्नान आदि करने के बाद सफेद और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। 2. चौकी स्थापित करें: एक लकड़ी की चौकी को अपने घर के दक्षिण दिशा में रखें। उस चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर अपने पूर्वज मातृ पितरों की फोटो या प्रतीक के रूप में स्थापित करें। 3. तर्पण और पूजन: फोटो पर फूल माला चढ़ाएं, काले तिल का दीपक जलाएं, धूपबत्ती जलाकर इत्र आदि लगाएं। तस्वीर पर तुलसी की पत्तियां अवश्य अर्पित करें। 4. श्रीमद्भागवत गीता का पाठ: इस दिन श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 5. भोजन तैयार करें और गाय को खिलाएं: घर पर जो भी भोजन तैयार किया जाता है, उसमें से कुछ भोजन सबसे पहले गायों को खिलाना चाहिए। 6. पितरों के लिए भोजन: जिन पितरों का श्राद्ध करना है, उनके लिए भी भोजन निकालकर अपने घर के बाहर जाकर दक्षिण दिशा में साफ-सुथरी जगह पर रखें। 7. तुलसी पूजन: इस दिन घर में तुलसी के पौधे अवश्य लगाएं और उनकी पूजा-अर्चना करें। तुलसी के पास एक दीपक भी अवश्य जलाएं। 8. सूर्य देव को अर्घ्य और तर्पण: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद किसी पवित्र नदी में तर्पण करना चाहिए, इससे पितृ प्रसन्न होते हैं। 9. पितरों को भोग: पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन बनाकर सबसे पहले पितरों को धूप दान करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें और उन्हें भोजन का भोग लगाएं। 10. पशु-पक्षियों को भोजन: मातृ नवमी के दिन बनाए गए भोजन में से कुत्ते, कौवे और गाय को खिलाएं, ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 11. ब्राह्मणों को भोजन और दान: इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए। मातृ नवमी के दिन पितरों को खुश करने के खास उपाय: Special ways to please the ancestors on the day of Matra Navami पितृ पक्ष में मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और उनको प्रसन्न करने का उत्तम दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए ये खास उपाय जरूर करें: • सुबह माता तुलसी की पूजा करें और उन्हें धूप-दीप जलाएं। • किसी भी गरीब और जरूरतमंद सुहागिन महिला को सुहाग का सामान जैसे – लाल साड़ी, कुमकुम, सिंदूर, चूड़ियां, अनाज, जूते-चप्पल आदि का दान जरूर करें। मातृ नवमी पर न करें ये भूल, वरना आ सकती है दरिद्रता:Do not make this mistake on Matra Navami , otherwise poverty may come. मातृ नवमी पर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन कुछ गलतियाँ करने से बचना चाहिए: • श्राद्ध न करना: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि सौभाग्यवती माता का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने के बजाय नवमी तिथि को न किया जाए, तो पितृ प्रेत योनि में भटकते

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय Read More »

Surya Gochar 2025

Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

Surya Gochar 2025: सनातन धर्म में संक्रांति का विशेष महत्व है, और जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को संक्रांति कहा जाता है। वर्ष 2025 में, कन्या संक्रांति तब मनाई जाएगी जब सूर्य देव अपनी सिंह राशि को छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि इस वर्ष Surya Gochar 2025 कन्या संक्रांति के साथ ही विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाएगी, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन इंदिरा एकादशी भी मनाई जाएगी, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देती है। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों….. कन्या संक्रांति 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्योतिषियों के अनुसार, साल 2025 में कन्या संक्रांति की तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: • संक्रांति प्रवेश: 17 सितंबर 2025, देर रात 01:54 बजे • पुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से दोपहर 11:44 बजे तक • महापुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से 07:39 बजे तक • सूर्योदय: 05:36 AM • सूर्यास्त: 05:51 PM • ब्रह्म मुहूर्त: 04:02 से 04:49 बजे • विजय मुहूर्त: 01:46 से 02:35 PM • गोधूलि बेला: 05:51 से 06:15 PM • निशीथ काल: 11:20 से 12:07 AM कन्या संक्रांति का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। यह घटना न केवल ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भी विशेष मानी जाती है। कन्या राशि में सूर्य का गोचर बुद्धि, सेवा, व्यवस्था और कर्म का प्रतीक माना जाता है। यह दिन सकारात्मक ऊर्जा, आत्मशुद्धि और कर्मयोग की भावना को बढ़ाने वाला होता है। सनातन शास्त्रों के अनुसार, कन्या संक्रांति के दिन शिल्पकार विश्वकर्मा जी का अवतरण हुआ था, इसलिए हर साल कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाती है। Surya Gochar 2025 विशेष रूप से इंजीनियरिंग, तकनीकी और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और फलदायक होता है। जो लोग मशीनरी, तकनीकी या कारीगरी से जुड़े हैं, Surya Gochar 2025 उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। पूजन एवं दान विधि कन्या संक्रांति के शुभ अवसर पर सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और पुण्य कमाने के लिए इन विधियों का पालन करें: • प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। • अपने पूजा स्थल और कार्यस्थल को स्वच्छ करके दीपक और पुष्प अर्पित करें। • लाल वस्त्र, तिल का तेल, घी, गुड़ आदि का दान करें। • आध्यात्मिक मंत्रों का जप करें, जैसे – “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”। • परिवार सहित सात्विक भोजन बनाएं और जरूरतमंदों में बांटें। • इस दिन क्रोध, विवाद और अहंकार से दूर रहें। सूर्य गोचर 2025: इन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज! Surya Gochar 2025 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 17 सितंबर 2025 को सूर्य देव के सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करने से कुछ राशियों के जातकों को करियर में विशेष लाभ और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं उन राशियों के बारे में: मेष राशि (Aries) सूर्य देव के राशि परिवर्तन से मेष राशि के जातकों को काफी हद तक लाभ मिलता दिख रहा है। सूर्य देव की दृष्टि षष्ठ भाव में होने से आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपके शत्रुओं में आपका भय रहेगा, और आप कई मामलों में कठोर निर्णय ले सकते हैं। आपके भाग्य में वृद्धि होगी, लेकिन आपको धर्म पथ पर चलना होगा और माता-पिता का सम्मान करना होगा। आप न्यायप्रिय होंगे, जिससे समाज में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलेगी, और आप कुछ नया करने की योजना भी बना सकते हैं। धनु राशि (Sagittarius) सूर्य देव के कन्या राशि में गोचर करने से धनु राशि के जातकों को भी विशेष फायदा हो सकता है। सूर्य देव की दृष्टि आपके करियर भाव में रहेगी, जिससे आपको अनुकूल परिणाम मिल सकते हैं। Surya Gochar 2025 आपकी बुद्धि और प्रगाढ़ होगी, जिससे आप जीवन में कई सही फैसले ले पाएंगे। आपमें नेतृत्व करने की क्षमता बढ़ेगी और आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे आप बड़ी सफलता पाने में सफल होंगे। पिता के साथ संबंध मधुर रहेंगे और सरकारी तंत्र से आपको सम्मान मिल सकता है। कई जातकों को सरकारी नौकरी से संबंधित कोई बड़ी खुशखबरी भी मिल सकती है। Surya Gochar 2025 आपके व्यवहार से लोग प्रभावित हो सकते हैं। माता का विशेष ख्याल रखने की सलाह दी गई है। निष्कर्ष कन्या संक्रांति 2025 एक अत्यंत शुभ और फलदायक तिथि है, खासकर जब यह विश्वकर्मा पूजा और इंदिरा एकादशी के साथ पड़ रही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है। यह गोचर कई राशियों के लिए करियर और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

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