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आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रम्: Anandachandrikastotram

आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रम्: Anandachandrikastotram श्रीश्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ।ध्यानम् ।अङ्गश्यामलिमच्छटाभिरभितो मन्दीकृतेन्दीवरं जाड्यं जागुडरोचिषां विदधतं पट्टाम्बरस्य श्रिया ।वृन्दारण्यविलासिनं हृदि लसद्दामाभिरामोदरं राधास्कन्धनिवेशितोज्ज्वलभुजं ध्यायेम दामोदरम् ॥अथ श्रीराधिकाया आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रंश्रीराधिकायै नमः ।राधादामोदरप्रेष्ठा राधिका वार्षभानवी ।समस्तवल्लवीवृन्दधम्मिल्लोत्तंसमल्लिका ॥ १॥कृष्णप्रियावलीमुख्या गान्धर्वा ललितासखी ।विशाखासख्यसुखिनी हरिहृद्भृङ्गमञ्जरी ॥ २॥इमां वृन्दावनेश्वर्या दशनाममनोरमाम् ।आनन्दचन्द्रिकां नाम यो रहस्यां स्तुतिं पठेत् ॥ ३॥स क्लेशरहितो भूत्वा भूरिसौभाग्यभूषितः ।त्वरितं करुणापात्रं राधामाधवयोर्भवेत् ॥ ४॥इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां आनन्दचन्द्रिकास्तोत्रं समाप्तम् ।

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Aksharadhamadhipatilakshanavarnanam: अक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनम्

Aksharadhamadhipatilakshanavarnanam: अक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनम् पूर्वं त्वसाधारणलक्षणं यच्छ्रीस्वामिनारायणदिव्यमूर्तेः । पूर्वावतारान् सकलान् स्वमूर्ती सन्दर्शयेदुक्तमिदं हि लक्ष्म ॥ १॥ वैकुण्ठलोकादिषु दिव्यमूर्ती दिव्येऽद्भुतैश्वर्यसुखे च तासु । स्वकीयरूपे शतशो मनुष्यान् सन्दर्शयेच्चिह्नमिदं द्वितीयम् ॥ २॥ साधारणानपि तं समाधिं यः कारयित्वा मनसः प्रवृत्तिम् । संरोधयेत् स्वात्मनि तत्तृतीयं लक्ष्मोदितं ब्रह्मपुराधिपस्य ॥ ३॥ अन्यावतारैः श्रितमानवानां श्रेयस्कृतं वृत्तिनिरोधनं वा । सन्दर्शयेत्तद्वयमेव भक्तद्वारा हि तुर्यं प्रभुलक्षणं तत् ॥ ४॥ धाक्षरे स्वे बहुप्रकाशे मुक्तव्रजैः स्नेहभरेण सेव्याम् । सिंहासनस्थां रुचिरां स्वमूर्तिं सन्दर्शयेद् यादृशतादृशान्नृन् ॥ ५॥ तत्पञ्चमं लक्षणमत्र धार्मेः अथोच्यते चिह्नमिदं हि षष्ठम् । पूर्वागमे ज्ञानविरागभक्तिधर्मादिकं योगपथश्च साङ्ख्यम् । कुर्याद्ध तद्वर्णनमात्मयोगात् स्वैः कारयेत्तत्र चमत्कृतिश्च । पूर्वागमार्थादपि सौष्ठवार्थः प्रादुर्भवेच्छान्तिकरः सुधेव ॥ ६॥ स्वालोकमात्रेण सहस्रजीववृत्तेस्तु नैसर्गिकरोधनं स्यात् । स्वस्मिन् यथा चुम्बकमेति लोहं तत् सप्तमं चिह्नम् ॥ ७॥ अथाष्टमं च । कस्यापि नुः स्वाश्रयमात्रतोऽपि महाशिवं स्याद्धि तदन्तकाले । तमक्षरं नेतुमियात् स्वकीयैर्मुक्तैर्विमानैः सहितः स धार्मिः ॥ ८॥ निजे निदेशे शतशो मनुष्यान् ज्ञाने तथा त्यागयुते स्वधर्मे । संस्थापयेद् घोरकलौ युगेऽस्मिन् प्रोक्तं प्रभोस्तन्नवमं हि लक्ष्म ॥ ९॥ जनाः स्वसम्बन्धगवस्त्रपुष्पस्पर्शेक्षणाभ्यां समियुः समाधिम् । पश्येयुरैश्यं हरिमत्र धाम विनापि योगं दशमं च लक्ष्म ॥ १०॥ देशान्तरे कश्चन धार्मिमूर्तेर्वार्ता प्रकुर्यात् पुरतो नृणान्तम् । श्रुत्वा जनास्तेजसि लोकयेयुरेकादशं चिह्नमिदं हरेश्च ॥ ११॥ प्रधानजीवेश्वरकालमायामुक्ताक्षराणां पुरुषोत्तमस्य । पृथक् पृथग् लक्षणमेव कुर्यात् स्वयं स्वभक्तैरपि कारयेद्वा ॥ १२॥ सैश्वर्यरूपाणि पुनश्च तेषां प्रदर्शयेद्वा बहुशो जनांश्च । सर्वोत्तमस्वाक्षरधामभाजश्चिह्नं परं द्वादशमुक्तमेतत् ॥ १३॥ सन्दर्शयेत् पूर्वनिजावताराँल्लीनान् स्वमूर्ती शतशो मनुष्यान् । नो न तेषु स्वयमद्भुतं तत् त्रयोदशं धर्मसुतस्य लक्ष्म ॥ १४॥ इति श्रीअक्षरधामाधिपतिलक्षणवर्णनं सम्पूर्णम् ।

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श्री अष्टाक्षरीध्यानम्: Shri Ashtaksharidhyanam

वेदान्तस्वद्रुमायस्तलपरिलसिताष्टाक्षराष्टच्छदाब्जे तिष्ठन् वामाङ्घ्रिणासावितरपदतलं वामतोऽग्रे निधाय । बिभ्रत् सर्वा विभूतीर्मणिगणविलसद्भूषणश्यामलश्रीः शब्दब्रह्मात्मवेणुं भुवनधृतिहरं नादयन् माधवोऽव्यात् ॥ १॥ इति श्री अष्टाक्षरीध्यानं सम्पूर्णम् ।

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Randhan Chhath

Randhan Chhath 2025 Date: कब है रांधन छठ, जाने शुभ मुहूर्त व तिथि

Randhan Chhath: रांधण छठ एक पारंपरिक गुजराती हिंदू त्योहार है, जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह अगले दिन आने वाले शीतला सतम के लिए भोजन पकाने से जुड़ा है। रांधण छठ गुजरात का पारंपरिक त्योहार है, जो रक्षाबंधन से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और अगले दिन यानी श्रावणी पूर्णिमा के लिए पकवान बनाकर पूजा हेतु तैयार करती हैं। 2025 में कब है रांधन छठ? पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान कृष्ण के जन्म से दो दिन पहले यानि षष्ठी तिथि पर उनके बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष षष्ठी को रांधन छठ या हल छठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियां अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं, और भगवान बलराम की पूजा करती हैं। Randhan Chhath 2025 Date: रांधण छठ 2025 का शुभ मुहूर्त व तिथि रांधण छठ – 14 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार (भाद्रपद, कृष्ण पक्ष, षष्ठी) Kya hai Randhan Chhath: क्या है रांधण छठ? रांधण छठ भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जिसे बलराम जयंती, हलछठ, या हर छठ के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने संतान की सुख-समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। विशेष रूप से यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिनका जन्म कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व हुआ था। Kyo manate hai Randhan Chhath: क्यों मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व भगवान बलराम के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। बलराम जी को हल और खेती का देवता माना गया है, इसलिए इस दिन विशेष रूप से कृषि संस्कृति, मातृत्व, और संरक्षण का सम्मान किया जाता है। साथ ही यह व्रत स्त्रियों द्वारा संतान सुख, उनकी भलाई व निरोगी जीवन के लिए रखा जाता है। रांधण छठ का महत्व: Randhan Chhath ka Mahetwa कहाँ और कौन से लोग मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व उत्तर भारत, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। खासकर वैष्णव परंपरा, गृहस्थ स्त्रियाँ, और कृषक परिवार इस पर्व को बड़ी आस्था से मनाते हैं। Randhan Chhath Per Kiski Puja Ki Jati Hai: रांधण छठ पर किसकी पूजा की जाती है? इस दिन भगवान बलराम, शीतला माता, और कभी-कभी अन्नपूर्णा देवी या गृह लक्ष्मी की पूजा की जाती है। बलराम जी को हल का प्रतीक माना जाता है, अतः उनकी पूजा में खेती-बाड़ी से जुड़े प्रतीकों का उपयोग होता है। Randhan Chhath Ke Din Puja Kaise Kare: रांधण छठ के दिन पूजा कैसे करें? रांधण छठ के धार्मिक अनुष्ठान Randhan Chhath Manane Ke Labh: रांधण छठ मनाने के लाभ Randhan Chhath Ke Din Kya Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या करना चाहिए? Randhan Chhath Ke Din Kya Nahi Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

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Kua

Sapne me Kua Dekhna: सपने में कुआं देखना शुभ होता है या अशुभ, जाने सच

सपने में कुआं देखना (Sapne Mein Kua Dekhna) – विस्तृत हिन्दी व्याख्या सपने में कुआं Kua देखना एक आम लेकिन महत्वपूर्ण सपना है, जिसे देखकर जागने के बाद कई प्रश्न मन में उठते हैं – क्या यह सपना शुभ है या अशुभ? स्वप्न शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर सपना किसी न किसी संकेत को दर्शाता है, जो आने वाले समय में होने वाली घटनाओं के बारे में इशारा करता है। सपने में कुआं देखने का सामान्य अर्थ (Swapan Shastra ke Anusar) विशेष परिस्थितियों में कुएं Kua का सपना क्या दर्शाता है: सपने में नदी देखना क्या संकेत देता है? जानिए इसका गहरा अर्थ कुएं Kua के प्रकार और उनके अर्थ: कुएं से संबंधित क्रियाएं और उनके अर्थ: धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व: आपके भावनात्मक अनुभव का महत्व: सपने के बाद क्या करें? विशेष सुझावयदि आपने सपना में कोई पहचाना हुआ कुआं देखा हो (जैसे बचपन का या गांव का Kua कुआं), तो यह अतीत से जुड़ा संकेत हो सकता है।अगर कुआं नई जगह या अनजाना हो, तो यह भविष्य के नए अनुभवों या अज्ञात चुनौतियों का संकेत देता है।

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AShTashlokI:अष्टश्लोकी

AShTashlokI:अष्टश्लोकी अकारार्थो विष्णुर्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्मकारार्थो जीवस्तदुपकरणं वैष्णवमिदम् ।उकारोऽनन्यर्हं नियमयति सम्बन्धमनयोःत्रयीसारस्त्र्यात्मा प्रणव इममर्थं समदिशत् ॥ १॥मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंसःस्वरूपङ्गतिःगम्यं शिक्षितमीक्षितेन पुरतःपश्चादपि स्थानतः ।स्वातन्रयं निजरक्षणं समुचिता वृत्तिश्च नान्योचितातस्यैवेति हरेर्विविच्य कथितं स्वस्यापि नार्हं ततः ॥ २॥अकारार्थायैवस्वमहमथ मह्यं न निवहाःनराणां नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।यमाहास्मै कालं सकलमपि सर्वत्र सकला-स्ववस्थास्वाविः स्युर्मम सहजकैङ्कर्यविधयः ॥ ३॥देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदं साधु विद्यात्तृतीयंस्वातन्त्र्यान्धो यदि स्यात्प्रथममितरशेषत्वधीश्चेद्द्वितीयम् ।आत्मत्राणोन्मुखश्चेन्नम इति च पदं बान्धवाभासलोलःशब्दं नारायणाख्यं विषयचपलधीश्चेच्चतुर्थीं प्रपन्नः ॥ ४॥नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनञ्चो-पायं कर्त्तव्यभागं त्वथ मिथुनपरं प्राप्यमेवं प्रसिद्धम् ।स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणं दशैतान्मन्तारं त्रायते चेत्यधिगतनियमः षट्पदोऽयं द्विखण्डः ॥ ५॥ईशानाञ्जगतामधीशदयितां नित्यानपायां श्रियंसंश्रित्याश्रयणोचिताखिलगुणस्याङ्घ्री हरेराश्रये ।इष्टोपायतया श्रिया च सहितायात्मेश्वरायार्थयेकर्तुं दास्यमशेषमप्रतिहतं नित्यं त्वहं निर्ममः ॥ ६॥मत्प्राप्त्यर्थतया मयोक्तमखिलं सन्त्यज्य धर्मं पुनःमामेकं मदवाप्तये शमणमित्यार्तोऽवसायं कुरु ।त्वामेकं व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णो ह्यहंमत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितं कुर्यां शुचं मा कृथाः ॥ ७॥निश्चित्य त्वदधीनतां मयि सदा कर्माद्युपायान् हरेकर्तुं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलं सीदामि दुःखाकुलः ।एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम पुनस्सर्वापराधक्षयंकर्तासीति दृढोऽस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन्सारथेः ॥ ८॥शाखानामुपरि स्थितेन मनुना मूलेन लब्धात्मकःसत्ताहेतुसकृज्जपेन सकलं कालं द्वयेन क्षिपन् ।वेदोत्तंसविहारसारथिदयागुम्फेन विस्त्रम्भितःसारज्ञो यदि कश्चिदस्ति भुवने नाथः स यूथस्य नः ॥ ९॥इति अष्टश्लोकी समाप्ता ॥

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Ashtamahishiyuta Krishna Stotram: अष्टमहिषीयुतकृष्णस्तोत्रम्

Ashtamahishiyuta Krishna Stotram: अष्टमहिषीयुतकृष्णस्तोत्रम् हृद्गुहाश्रितपक्षीन्द्रवल्गुवाक्यैः कृतस्तुते । तद्गरुत्कन्धरारूढ रुक्मिणीश नमोऽस्तु ते ॥ १॥ अत्युन्नत्याऽखिलैः स्तुत्य श्रुत्यन्तात्यन्तकीर्तित । सत्ययोजित सत्यात्मन् सत्यभामापते नमः ॥ २॥ जाम्बवत्याः कम्बुकण्ठालम्बिजृम्भिकराम्बुज । शम्भुत्र्यम्बकसम्भाव्यं साम्बतात नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ नीलाय विलसद्भूषाजालायोज्ज्वलमालिने । लोलालकोद्यत्फालाय कालिन्दीपतये नमः ॥ ४॥ जैत्रचित्रचरित्राय शात्रवानीकमृत्यवे । मित्रप्रकाशाय नमो मित्रविन्दाप्रियाय ते ॥ ५॥ बालानेत्रोत्सवानन्तलीलालावण्यमूर्तये । नीलाकान्ताय ते भक्तावालायाऽस्तु नमोनमः ॥ ६॥ भद्राय स्वजनाविद्यानिद्राविद्रावणाय वै । रुद्राणीभद्रमूलाय भद्राकान्ताय ते नमः ॥ ७॥ रक्षिताखिलविश्वाय शिक्षिताखिलरक्षसे । लक्षणापतये नित्यं भिक्षुश्लाघ्याय ते नमः ॥ ८॥ षोडशस्त्रीसहस्रेशं षोडशातीतमच्युतम् । ईडेत वादिराजोक्तप्रौढस्तोत्रेण सन्ततम् ॥ ९॥ इति श्रीमद्वादिराजयतिकृतं अष्टमहिषीयुतकृष्णस्त्रोत्रं सम्पूर्णम् । भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।

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AShTapadI: अष्टपदी

AShTapadI: अष्टपदी (राग भैरव)जयति निजघोषभुवि गोपमणिभूषणम् ।युवतिकलधौतरतिजटितमविदूषणम् ॥ ध्रुवपदम् ॥विकचशरदम्बुरुहरुचिरमुखतोऽनिशम् ।जिघ्रतादमलमधुमदशालिनी भृशम् ॥ १॥तरलदलसापाङ्गविभ्रमभ्रामितम् ।निःस्थिरीभवितुमिच्छतु हृदितकामितम् ॥ २॥मधुरमृदुहासकलिताधरच्युतरसम् ।पिबतु रसनाऽपि मुहुरुदितरतिलालसम् ॥ ३॥अमृतमयशिशिरवचनेषु नवसूत्सुकम् ।श्रवणपुटयुगलमनुभवतु चिरसूत्सुकम् ॥ ४॥विपुलवक्षस्थले स्पर्शरसपूरितम् ।तुङ्गकुचकलशयुगमस्तु मदनेरितम् ॥ ५॥मृदिततमकायदेवद्रुमालम्बिता ।हर्षमतिशयितमुपयातु तनुलता ६॥पुष्परसपुष्टपरपुष्टभृङ्गीमये ।वसतिरपि भवतु मम निभृतकुञ्जालये ॥ ७॥गीतमिदमेवमुरुभावगर्भितपदम् ।रोचयतु कृष्णमिह सरससम्पदम् ॥ ८॥इति श्रीदेवकीनन्दनजीकृताऽष्टपदी समाप्ता ।

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Shri Anuragavallih:श्रीअनुरागवल्लिः

Shri Anuragavallih:श्रीअनुरागवल्लिः Shri Anuragavallih:देहार्बुदानि भगवान्! युगपत्प्रयच्छ वक्त्रार्बुदानि च पुनः प्रतिदेहमेव ।जिह्वार्बुदानि कृपया प्रतिवक्त्रमेव नृत्यन्तु तेषु तव नाथ! गुणार्बुदानि ॥ १॥किमात्मना? यत्र न देहकोट्यो देहेन किं? यत्र न वक्त्रकोट्यः ।वक्त्रेण किं? यत्र न कोटिजिह्वाः किं जिह्वया? यत्र न नामकोट्यः ॥ २॥आत्मास्तु नित्यं शतदेहवर्ती देहस्तु नाथास्तु सहस्रवक्त्रः ।वक्त्रं सदा राजतु लक्षजिह्वं गृह्णातु जिह्वा तव नामकोटिम् ॥ ३॥यदा यदा माधव! यत्र यत्र गायन्ति ये ये तव नामलीलाः ।तत्रैव कर्णायुतधार्यमाणा स्तास्ते सुधा नित्यमहं धयानि ॥ ४॥कर्णायुतस्यैव भवन्तु लक्ष कोट्यो रसज्ञा भगवंस्तदैव ।येनैव लीलाः श‍ृणवानि नित्यं तेनैव गायानि ततः सुखं मे ॥ ५॥कर्णायुतस्येक्षटकोटिरस्या हृत्कोटिरस्या रसनार्बुदं स्तात् ।श्रुत्वैव दृष्ट्वा तव रूपसिन्धु मालिङ्ग्य माधुर्यमहो! धयानि ॥ ६॥नेत्रार्बुदस्यैव भवन्तु कर्ण नासारसज्ञा हृदयार्बुदं वा ।सौन्दर्यसौस्वर्यसुगन्धपूर माधुर्यसंश्लेषरसानुभूत्यै ॥ ७॥त्वत्पार्श्वगत्यै पदकोटिरस्तु सेवां विधातुं मम हस्तकोटिः ।तां शिक्षितुं स्तादपि बुद्धिकोटि रेतान्वरान्मे भगवन्! प्रयच्छ ॥ ८॥इति श्रीविश्वनाथचक्रवर्तिठक्कुरविरचितस्तवामृतलहर्यां श्रीअनुरागवल्लिः समाप्ता ।

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श्री अनन्तकृष्णवरदराजाष्टकम्: ShrI Anantakrishnavaradaraja Ashtakam

श्री अनन्तकृष्णवरदराजाष्टकम्: ShrI Anantakrishnavaradaraja Ashtakam श्री-भूमि-नीला-परिसेव्यमान- मनन्तकृष्णं वरदाख्य-विष्णुम् ।अघौघविध्वंसकरं जनानां अघंहरेशं प्रभजे सदाऽहम् ॥ १॥तिष्ठन् स्वधिष्ण्ये परितो विपश्यन् आनन्दयन् स्वानभिराममूर्त्या ।योऽघंहरग्रामजनान् पुनीते ह्यनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ २॥भक्तान् जनान् पालनदक्षमेकं विभुं श्रियाऽऽश्लिष्यतनुं महान्तम् ।सुपर्णपक्षोपरिरोचमान- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ३॥सूर्यस्य कान्त्या सदृशैर्विराजद्- रत्नैः समालङ्कृतवेषभूषम् ।तमो विनाशाय मुहुर्मुहुस्त्वा- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ४॥अनन्तसंसार-समुद्रतार- नौकायितं श्रीपतिमाननाब्जम् ।अनन्तभक्तैः परिदृश्यमान- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ५॥नमन्ति देवाः सततं यमेव किरीटिनं गदिनं चक्रिणं तम् ।वैखानसैः सूरिभिरर्चयन्त- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ६॥तनोति देवः कृपया वरान् यो चिरायुषं भूतिमनन्यसिद्धिम् ।तं देवदेवं वरदानदक्ष- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ७॥कृष्णं नमस्कृत्य महामुनीन्द्राः स्वानन्दतुष्टा विगतान्यवाचः ।तं स्वानुभूत्यै भव-पाद्म-वन्द्य- मनन्तकृष्णं वरदेशमीडे ॥ ८॥अनन्तकृष्णस्य कृपावलोका- दघंहर-ग्रामज-दीक्षितेन ।सुसूक्तिमालां रचितां मनोज्ञां गृह्णातु देवो वरदेश- विष्णुः ॥॥ इति अघंहर-ग्राम-वासिना अनन्तकृष्णवरदराजस्यपार्श्ववर्तिना ब्रह्मश्री रङ्गस्वामि-दीक्षितेन विरचितंअनन्त-कृष्ण-वरदराजाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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अद्वैताष्टकम्:Advaitashtakam

अद्वैताष्टकम्:Advaitashtakam Advaitashtakam: हुहुङ्कारगर्जनादि अहोरात्रसद्गुणं हा कृष्ण राधिकानाथ प्रार्थनादिभावनम् ।धूपदीपकस्तुरी च चन्द्रनादिलेपनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ १॥गङ्गावारि मनोहारि तुलस्यादि मञ्जरी कृष्णज्ञानसदाध्यान प्रेमवारिझर्झरी ।कृपाब्धिः करुणानाथ भविष्यति प्रार्थनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ २॥मुहुर्मुहुः कृष्ण कृष्ण उच्चैः स्वरे गायतं अहे नाथ जगत्त्रातः मम दृष्टिगोचरम् ।द्विभुज करुणानाथ दीयतां सुदर्शनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ३॥श्री अद्वैतप्रार्थनार्थ जगन्नाथालयं शचीमातुर्गर्भजात चैतन्यकरुणामयम् ।श्री अद्वैतसङ्गरङ्गकीर्तनविलासनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ४॥अद्वैतचरणारविन्दज्ञानध्यानभावनं सदाद्वैतपादपद्मरेणुराशिधारणम् ।देहि भक्तिं जगन्नाथ रक्ष मामभजनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ५॥सर्वदातः सीतानाथ प्राणेश्वर सद्गुणं ये जपन्ति सीतानाथपादपद्मकेवलम् ।दीयतां करुणानाथ भक्तियोगः तत्क्षणं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ६॥श्री चैतन्य जयाद्वैत नित्यानन्द करुणामयं एक अङ्ग त्रिधामूर्ति कैशोरादि सदा वरम् ।जीवत्राण भक्तिज्ञान हुङ्कारादि गर्जनं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ७॥दीनहीननिन्दकादि प्रेमभक्तिदायकं सर्वदातः सीतानाथ शान्तिपुरनायकम् ।रागरङ्गसङ्गदोषकर्मयोगमोक्षणं सीतानाथाद्वैतचरणारविन्दभावनम् ॥ ८॥इति सार्वभौम भट्टाचार्यविरचितं अद्वैताष्टकं सम्पूर्णम् ।

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Ahilya Utsav

Ahilya Utsav : अहिल्या उत्सव

Ahilya Utsav:अहिल्या उत्सव 18वीं शताब्दी की रानी अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में मनाया जाने वाला एक त्योहार है, जिन्हें साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।अहिल्या उत्सव 18वीं शताब्दी की रानी अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में मनाया जाने वाला एक त्योहार है, जिन्हें साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। क्यों मनाया जाता है अहिल्या उत्सव:Why is Ahilya Utsav celebrated वीरांगना रानी अहिल्या बाई ‘दार्शनिक रानी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, 13 अगस्त 1795 को सत्तर वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उनकी विरासत अभी भी जीवित है और उनके द्वारा किए गए विभिन्न मंदिर, धर्मशालाएं और सार्वजनिक कार्य महान योद्धा रानी की गवाही के रूप में खड़े हैं। उन्होंने अपना ध्यान विभिन्न परोपकारी गतिविधियों की ओर भी लगाया, जिनमें उत्तर में मंदिरों, घाटों, कुओं, तालाबों और विश्राम गृहों के निर्माण से लेकर दक्षिण में तीर्थस्थलों तक शामिल थे। उनका सबसे उल्लेखनीय योगदान 1780 में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का नवीनीकरण और मरम्मत था। कैसे मनाया जाता है अहिल्या उत्सव:How is Ahilya Utsav celebrated इंदौर की वीरांगना रानी अहिल्या बाई की पुण्य तिथि के अवसर पर हर वर्ष अहिल्या उत्सव मनाया जाता है। इस दिन सुबह राजवाड़ा पर देवी अहिल्या बाई की मूर्ति मूर्तिपर माल्यार्पण की जाती है। Ahilya Utsav इसके बाद इंद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है और शाम को प्रतीकात्मक पालकी यात्रा भी निकाली जाती है। देवी अहिल्योत्सव समिति के कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा देवी अहिल्याबाई की जयंती मनाई जाती है। मई महीने में देवी अहिल्याबाई की जन्म दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा इंदौर में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है और इसमें संगीत, नृत्य और कविता पाठ जैसे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। Ahilya Utsav यह लोगों द्वारा अहिल्याबाई और उनकी विरासत को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है।

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