Papankusha Ekadashi 2025

Papankusha Ekadashi 2025 Date And Time: कब मनाई जाएगी इस साल पापांकुशा एकादशी? नोट कर लें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Papankusha Ekadashi 2025 Date: पापांकुशा एकादशी, जिसे पुण्य व्रत या शरीर एकादशी भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में विशेष स्थान रखती है। यह एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भक्त अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। पापांकुशा एकादशी का व्रत आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। Papankusha Ekadashi 2025 Kab Hai: सनातन धर्म में आश्विन माह का विशेष महत्व है. यह महीना मां दुर्गे की आराधना का है. देवी मां दुर्गा व उनके नौ रूपों की विधि विधान से पूजा कर भक्त उनका आशीर्वाद पाता है. वहीं नवरात्रि और दशमी तिथि के बाद हर साल आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर पापांकुशा एकादशी व्रत रखने का विधान है. Papankusha Ekadashi 2025 पापांकुशा एकादशी का व्रत का संकल्प करने से व्रती के सभी दुख दूर होते हैं और जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है. लक्ष्मी नारायण की विशेष कृपा पाने के लिए इस दिन भक्त पूरे विधि विधान से शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं. पापांकुशा एकादशी 2025 (Papankusha Ekadashi 2025) Papankusha Ekadashi 2025: वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल एकादशी तिथि 02 अक्टूबर की शाम को 07:10 बजे मिनट पर शुरू हो रही है और 03 अक्टूबर को शाम 06:32 पर तिथि का समापन हो रहा है. इस तरह उदयातिथि में 03 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी व्रत रखा जाएगा. 3 अक्टूबर को ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाएगी. वहीं पापांकुशा एकादशी पारण शुभ मुहूर्त में सुबह 06:15 बजे से लेकर 08:37 के बीच किया जा सकेगा. पापांकुशा एकादशी 2025 पर महत्वपूर्ण समय Papankusha Ekadashi Important Time सूर्योदय 03 अक्टूबर, 2025 सुबह 6:23 बजे सूर्यास्त 3 अक्टूबर, 2025 शाम 6:08 बजे एकादशी तिथि प्रारंभ 2 अक्टूबर, 2025 शाम 7:11 बजे एकादशी तिथि समाप्त 03 अक्टूबर, 2025 शाम 6:33 बजे हरि वासरा अंतिम क्षण 04 अक्टूबर, 2025 12:12 पूर्वाह्न द्वादशी समाप्ति क्षण 04 अक्टूबर, 2025 शाम 5:09 बजे पारणा समय 4 अक्टूबर, सुबह 6:23 – 4 अक्टूबर, सुबह 8:44 पापांकुशा एकादशी का महत्व (Papankusha Ekadashi Ka Mahatav) पापांकुशा एकादशी व्रत कथा (Papankusha Ekadashi Vrat Katha) Papankusha Ekadashi 2025 प्राचीन काल में देवों और असुरों के बीच एक महान युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवता हारे और वे पृथ्वी पर आने लगे। असुरों ने देवताओं की स्त्री रूपिणी शक्ति को बंदी बना लिया। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और पपांकुशा एकादशी के दिन देवताओं की स्त्री रूपिणी शक्ति को मुक्त किया। व्रत के प्रभाव से देवता और असुर दोनों का कल्याण हुआ और पापों का नाश हुआ। Papankusha Ekadashi 2025 इस दिन की विशेषता यह है कि यह व्रत पापों को समाप्त करने के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है। पापांकुशा एकादशी व्रत विधि (Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi) पापांकुशा एकादशी के लाभ (Papankusha Ekadashi Ke Labh) पापांकुशा एकादशी का संदेश (Papankusha Ekadashi 2025 Ka Sandesh) Papankusha Ekadashi 2025: पापांकुशा एकादशी हमें यह सिखाती है कि जीवन में पापों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है भगवान विष्णु की भक्ति और सच्ची श्रद्धा। इस व्रत से व्यक्ति अपने पापों को समाप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह व्रत आत्मा की शुद्धि और जीवन की सही दिशा में चलने की प्रेरणा देता है Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

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Shradh or pitra paksha

Shradh or pitra paksha:श्राद्ध के अंतिम दिन क्या करें और क्या ना करें…

Shradh or pitra paksha: हर साल पितृ पक्ष के दौरान, लोग अपने स्वर्गवासी पितरों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं, ताकि उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकें. ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने पूर्वजों की संपत्ति का उपभोग तो करते हैं, लेकिन उनका श्राद्ध तर्पण नहीं करते, उन्हें पितृ दोष के कारण कई तरह के दुखों का सामना करना पड़ता है. Shradh or pitra paksha हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, पितृ पक्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है, और श्राद्ध द्वारा ही पितरों का ऋण चुकाया जाता है. श्राद्ध का तात्पर्य श्रद्धा से किए गए ऐसे कर्मों से है जो देवात्माओं, महापुरुषों, ऋषियों, गुरुजनों और पितर पुरुषों की प्रसन्नता के लिए किए जाते हैं. यह अपने पितृ पुरुषों के उपकारों के प्रति आभार व्यक्त करने और भक्ति भावना प्रदर्शित करने का एक प्रयत्न है. विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे सकते हैं, इसलिए इन नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है. पितृ पक्ष की शुरुआत कब होगी? (Pitru Paksha Date And Time) वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन 07 सितंबर को ही रात 11 बजकर 38 मिनट पर होगा। ऐसे में दिन रविवार, 07 सितंबर 2025 के दिन से ही पितृ पक्ष की शुरुआत होने जा रही है। इसके साथ ही इसकी समाप्ति सर्व पितृ अमावस्या यानी 21 सितंबर 2025 को होगी। आइए जानते हैं कि श्राद्ध के दौरान किन कार्यों को करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए, ताकि आपको अपने पितरों का आशीर्वाद मिल सके: श्राद्ध में क्या करना चाहिए? (Shradh or pitra paksha) 1. कौन करे श्राद्ध: पिता का श्राद्ध पुत्र द्वारा किया जाना चाहिए. यदि पुत्र अनुपस्थित हो, तो उसकी पत्नी श्राद्ध कर सकती है. 2. सही तिथि: वर्ष के किसी भी मास और तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृ पक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है. 3. पकवान और भोग: श्राद्ध में बनने वाले पकवान पितरों की पसंद के होने चाहिए. 4. आवश्यक सामग्री: श्राद्ध में गंगाजल, दूध, शहद और तिल का उपयोग सबसे ज़रूरी माना गया है. 5. ब्राह्मणों को भोजन: श्राद्ध पर ब्राह्मणों को अपने घर पर आमंत्रित करना चाहिए. उन्हें सोने, चांदी, कांसे और तांबे के बर्तन में भोजन कराना सर्वोत्तम माना जाता है. 6. भोजन का समय: मध्यान्हकाल (दोपहर) में ब्राह्मण को भोजन खिलाकर और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. 7. मंत्र जाप: इस दिन पितर स्तोत्र का पाठ और पितर गायत्री मंत्र आदि का जाप दक्षिणा मुखी होकर करना चाहिए. 8. पशु-पक्षियों को ग्रास: श्राद्ध के दिन कौवे, गाय और कुत्ते को ग्रास (भोजन का अंश) अवश्य डालनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है. 9. श्रद्धा-भावना: पिण्ड तो प्रतीक मात्र होते हैं, Shradh or pitra paksha असली समर्पण श्रद्धा-भावना ही होती है. यही श्रद्धा पितर, देव, ऋषि और महापुरुषों को प्रसन्न करने का माध्यम बनती है. 10. नित्य पूजन: नित्य देव पूजन, पितर पूजन, ऋषि आत्माओं का पूजन और सत्स्वरूप ईश्वर का आराधन ही असली श्रद्धा है. श्राद्ध में क्या नहीं करना चाहिए? (Shradh me kya na kare) 1. समय का ध्यान: रात में कभी भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, क्योंकि रात को राक्षसी का समय माना गया है. संध्या के वक्त भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए. 2. वर्जित भोजन: Shradh or pitra paksha श्राद्ध में कभी भी मसूर की दाल, मटर, राजमा, कुलथी, काला उड़द, सरसों और बासी भोजन आदि का प्रयोग वर्जित माना गया है. 3. तामसी भोजन: Shradh or pitra paksha श्राद्ध के वक्त घर में तामसी भोजन नहीं बनाना चाहिए. 4. नशीले पदार्थ: इस समय हर तरह के नशीले पदार्थों के सेवन से दूरी बनानी चाहिए. 5. शरीर पर प्रयोग: पितृ पक्ष के दिनों में शरीर पर तेल, सोना, इत्र और साबुन आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए. 6. क्रोध और कलह: श्राद्ध करते समय क्रोध, कलह और जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. इन नियमों का पालन कर आप अपने पितरों को संतुष्ट कर सकते हैं Shradh or pitra paksha और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, जिससे आपके जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहेगी.

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Maa Kushmanda

Maa Kushmanda: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Kushmanda को शक्ति का एक रूप माना जाता है और उन्हें इस ब्रह्मांड को बनाने वाली के रूप में जाना जाता है। वह थी जिन्होंने अंधेरे को दूर किया और तीन दिव्य देवी और अन्य देवताओं को भी बनाया। कल्प (कल्पपंथ) के अंत के बाद, पराशक्ति ने देवी कुष्मांडा का रूप धारण किया और ब्रह्मांड के निर्माण को फिर से शुरू किया, जो पूर्ण अंधकार से भरा था। सबसे पहले देवी ने अपने तेज से अंधकार को दूर किया और ब्रह्मांड में प्रकाश लाया। तब देवी ने अपनी कोमल मुस्कान और तेज से ब्रह्मांड के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की।  जीवन को बनाए रखने के लिए, वह पूरे ब्रह्मांड के लिए ऊर्जा का स्रोत बन गई। बाद में उन्होंने पूरे ब्रह्मांड की रचना की और सूर्य मंडल में अपनी शक्ति को स्थापित किया और सूर्य को ब्रह्मांड में पर्याप्त प्रकाश प्रदान करने की शक्ति प्रदान की।  इस तरह, देवी सूर्य देव की शक्ति का स्रोत बन गईं। यही कारण है कि इस देवी को सूर्य मंडल अंतरवर्धिनी (सूर्य मंडल के भीतर रहने वाली) के नाम से पुकारा जाता है। कुष्मांडा नाम का अर्थ न केवल अंडे के आकार के ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में है, बल्कि उसके गर्भ में ब्रह्मांड के रक्षक के रूप में भी है, जो प्रकृति को बनाने और उसकी रक्षा करने का संकेत देता है। वह एक बाघ की सवारी करती है और उनकी कुल 8 भुजाएँ हैं। इनमें से प्रत्येक भुजा में एक विशेष वस्तु या हथियार होता है। उन्हें आमतौर पर एक धनुष और तीर, एक कमल, एक गदा, एक अमृत का बर्तन, एक माला, एक चक्र और एक कमंडल (पानी देने वाला बर्तन) के रूप में चित्रित किया जाता है। माँ कुष्मांडा एक दिव्य, शाश्वत प्राणी हैं और सभी ऊर्जा का स्रोत हैं। वह अपने भक्तों को शक्ति, ज्ञान, समृद्धि का आशीर्वाद देने के लिए जानी जाती है और उन्हें जीवन की परेशानियों और कठिनाइयों से बचाती है।  नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा के रूप में भी जाना जाता है। Maa Kushmanda: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती Maa Kushmanda के मंदिर कुष्मांडा दुर्गा मंदिर, दुर्गा कुंड, वाराणसी। (वाराणसी में नवदुर्गा देवी को समर्पित नौ मंदिर हैं) कुष्मांडा देवी मंदिर, घाटमपुर, उत्तर प्रदेश। Maa Kushmanda का मंत्र ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ Om Devi Kushmandayai Namah॥ Maa Kushmanda की Prarthana सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥ Surasampurna Kalasham Rudhiraplutameva Cha।Dadhana Hastapadmabhyam Kushmanda Shubhadastu Me॥ Maa Kushmanda की स्तुति या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Kushmanda Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Kushmanda का ध्यान वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhita Kamarthe Chandrardhakritashekharam।Simharudha Ashtabhuja Kushmanda Yashasvinim॥Bhaswara Bhanu Nibham Anahata Sthitam Chaturtha Durga Trinetram।Kamandalu, Chapa, Bana, Padma, Sudhakalasha, Chakra, Gada, Japawatidharam॥Patambara Paridhanam Kamaniyam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala, Manditam॥Praphulla Vadanamcharu Chibukam Kanta Kapolam Tugam Kucham।Komalangi Smeramukhi Shrikanti Nimnabhi Nitambanim॥ Maa Kushmanda का स्त्रोत दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ Durgatinashini Tvamhi Daridradi Vinashanim।Jayamda Dhanada Kushmande Pranamamyaham॥Jagatamata Jagatakatri Jagadadhara Rupanim।Charachareshwari Kushmande Pranamamyaham॥Trailokyasundari Tvamhi Duhkha Shoka Nivarinim।Paramanandamayi, Kushmande Pranamamyaham॥ Maa Kushmanda का कवच हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥ Hamsarai Mein Shira Patu Kushmande Bhavanashinim।Hasalakarim Netrecha, Hasaraushcha Lalatakam॥Kaumari Patu Sarvagatre, Varahi Uttare Tatha,Purve Patu Vaishnavi Indrani Dakshine Mama।Digvidikshu Sarvatreva Kum Bijam Sarvadavatu॥ Maa Kushmanda की आरती कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। शाकम्बरी माँ भोली भाली॥लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुँचती हो माँ अम्बे॥तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥ Maa Kushmanda Worship Mantra:नवरात्रि का चौथा दिन: पढ़ें मां कूष्मांडा की पूजन विधि, श्लोक, मंत्र एवं भोग

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Maa Kushmanda

Maa Kushmanda Worship Mantra:नवरात्रि का चौथा दिन: पढ़ें मां कूष्मांडा की पूजन विधि, श्लोक, मंत्र एवं भोग

Maa Kushmanda:हर साल चैत्र नवरात्रि के नौ पावन दिन हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. इन दिनों में मां भवानी के विभिन्न रूपों की आराधना करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन की तमाम बाधाएँ और परेशानियाँ दूर होती हैं. नवरात्रि का चौथा दिन विशेष रूप से मां दुर्गा के चौथे स्वरूप, मां कुष्मांडा को समर्पित है. ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से व्यक्ति को अपार धन, शौर्य, सुख-समृद्धि, शक्ति और बुद्धि की प्राप्ति होती है, साथ ही सभी रोग, कष्ट और शोक भी समाप्त हो जाते हैं. Who is Maa Kushmanda:कौन हैं मां कुष्मांडा भगवती पुराण के अनुसार, देवी कुष्मांडा Maa Kushmanda अष्टभुजाओं वाली हैं. उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जप माला सुशोभित हैं. वह सिंह की सवारी करती हैं, और उनका यह स्वरूप शक्ति, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है. अपनी मंद और हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण ही इन्हें कूष्मांडा देवी के रूप में पूजा जाता है. संस्कृत में कूष्मांडा का अर्थ ‘कुम्हड़ा’ होता है, और बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है. देवी कूष्मांडा योग-ध्यान की देवी भी हैं और अन्नपूर्णा का स्वरूप हैं, जो उदराग्नि को शांत करती हैं. मां कुष्मांडा की पूजा विधि (Maa Kushmanda Puja Vidhi) चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन Maa Kushmanda मां कुष्मांडा की पूजा के लिए इन चरणों का पालन करें: 1. स्नान और साज-सज्जा: सुबह उठकर स्नान करें और मंदिर की साफ-सफाई तथा साज-सज्जा करें. 2. ध्यान: मां कुष्मांडा का ध्यान करें और कलश की पूजा कर उन्हें नमन करें. 3. आसन: इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का प्रयोग करना बेहतर होता है. 4. अर्पण: श्रद्धापूर्वक कुमकुम, मौली (कलावा), अक्षत (चावल), लाल रंग के फूल, फल, पान के पत्ते, केसर और श्रृंगार का सामान मां को अर्पित करें. 5. कुम्हड़ा: यदि संभव हो, तो सफेद कुम्हड़ा या उसके फूल माता रानी को अर्पित करें, क्योंकि कुम्हड़ा मां को बहुत प्रिय है. 6. दुर्गा चालीसा पाठ: इसके बाद दुर्गा चालीसा का पाठ करें. 7. आरती: अंत में घी के दीप या कपूर से मां कुष्मांडा की आरती करें. 8. स्वास्थ्य की कामना: मां कुष्मांडा को जल-पुष्प अर्पित करते हुए निवेदन करें कि उनके आशीर्वाद से आपका और आपके स्वजनों का स्वास्थ्य अच्छा रहे. यदि घर में कोई लंबे समय से बीमार है, तो उनके अच्छे स्वास्थ्य की विशेष कामना करें. 9. प्रणाम और प्रसाद वितरण: पूजा के बाद अपने से बड़ों को प्रणाम करें और प्रसाद वितरित करें. मां कुष्मांडा का भोग (Maa Kushmanda Bhog) मां कुष्मांडा को कुम्हड़ा (पेठा) सबसे प्रिय है. इसलिए इनकी पूजा में पेठे का भोग लगाना चाहिए. आप पेठे की मिठाई भी मां कुष्मांडा को अर्पित कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त, हलवा, मीठा दही या मालपुए का प्रसाद भी चढ़ाना शुभ माना जाता है. पूजा के बाद इस प्रसाद को स्वयं भी ग्रहण करें और लोगों में भी वितरित करें. मालपुए का भोग लगाकर दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को प्रसाद देने से ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है, और हर प्रकार का विघ्न दूर होता है. मां कुष्मांडा के पूजा मंत्र (Maa Kushmanda Puja Mantra) मां कुष्मांडा को प्रसन्न करने के लिए आप इन मंत्रों का जाप कर सकते हैं: • सरल मंत्र: ‘ॐ कूष्माण्डायै नम:।।’ • पूजा मंत्र: ‘सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते। भयेभ्य्स्त्राहि नो देवि कूष्माण्डेति मनोस्तुते।।’ • प्रार्थना मंत्र: ‘सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥’ • स्तुति मंत्र: ‘या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’     ◦ अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे मां, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें. • बीज मंत्र: ‘ऐं ह्री देव्यै नम:’ • उपासना मंत्र: ‘वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥’ मां कुष्मांडा की आरती (Maa Kushmanda Aarti) कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥ पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी मां भोली भाली॥ लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥ भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥ सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥ तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥ मां के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥ तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो मां संकट मेरा॥ मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥ तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥ मां कुष्मांडा पूजा के लाभ (Maa Kushmanda Puja Benefits) मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं: • सुख-समृद्धि और सुरक्षा: परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मां संकटों से रक्षा करती हैं. • इच्छित वर और सौभाग्य: अविवाहित लड़कियों को मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है, और सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है. • रोग-शोक से मुक्ति: देवी कुष्मांडा अपने भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करती हैं. • आयु, यश, बल और बुद्धि: मां भक्तों को लंबी आयु, यश, बल (ताकत) और बुद्धि प्रदान करती हैं. इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की विधि-विधान से पूजा कर आप उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति ला सकते हैं. Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

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Brahmakrita Ganapativandana:ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना

Brahmakrita Ganapativandana:ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना (शिवरहस्यान्तर्गते ईशाख्ये) ब्रह्मोवाच । देवीसुतं करधृताङ्कुशपाशदीप्तं विघ्नाद्रिनाशकवरोदरनागबन्धम् । शुण्डाधृतोरुवरमोदकविघ्नसङ्घ- सन्नोदकं प्रणमताद्य गणाधिनाथम् ॥ २५॥ जगत्त्रयेऽपि सर्वत्र त्वं हि विश्वगणेश्वरः । सम्पूज्यः सर्वकार्येषु निर्विघ्नार्थं गजानन ॥ २६॥ त्वामादौ सर्वकार्येषु पूजयन्तु सुरासुराः । अनभ्यर्चयतां विघ्नं भवत्येव पदे पदे ॥ २७॥ ॥ इति शिवरहस्यान्तर्गते ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना सम्पूर्णा ॥ – ॥ श्रीशिवरहस्यम् । ईशाख्यः द्वादशमांशः । अध्यायः १६ विधिसंविधानम् । २५-२७ ॥

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Ayudha Puja

Ayudha Puja 2025 Date: आयुध पूजा 2025: तिथि, महत्व और शुभ मुहूर्त – अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों का करें सम्मान

Ayudha Puja 2025 Date And Time: आयुध पूजा, जिसे शस्त्र पूजा या अस्त्र पूजा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो हमारे दैनिक जीवन और पेशेवर कार्यों में उपयोग होने वाले उपकरणों, औजारों और हथियारों का सम्मान करता है। यह आभार व्यक्त करने का एक सुंदर तरीका है। हर साल नवरात्रि के नौवें दिन, जिसे महा नवमी के रूप में मनाया जाता है, इस त्योहार को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। Ayudha Puja 2025 Date: आयुध पूजा 2025 कब है? साल 2025 में Ayudha Puja आयुध पूजा बुधवार, 01 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। यह तिथि महा नवमी के साथ पड़ती है। तिथि प्रारंभ: नवमी तिथि 30 सितंबर को शाम 06:06 बजे शुरू होगी। तिथि समाप्त: 01 अक्टूबर को शाम 07:01 बजे समाप्त होगी। आयुध पूजा विजय मुहूर्त: दोपहर 02:28 बजे से दोपहर 03:16 बजे तक रहेगा। Ayudha Puja:आयुध पूजा का महत्व यह त्योहार भारतीय संस्कृति में कई कारणों से विशेष महत्व रखता है: 1. आध्यात्मिक श्रद्धा: ऐसी मान्यता है कि जो कुछ भी हमें अपने कर्तव्यों में सहायता करता है, Ayudha Puja वह पूजा के योग्य है। औजारों को दिव्य ऊर्जा का विस्तार माना जाता है। 2. बुराई पर अच्छाई की जीत: यह त्योहार देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर पर और महाभारत में अर्जुन द्वारा अपने शस्त्रों को पुनः प्राप्त करने की विजय का प्रतीक है। 3. आधुनिक अनुकूलन: किसान के हल से लेकर मैकेनिक के रिंच, छात्र की किताबों से लेकर लैपटॉप और वाहनों तक – आज, तकनीकी उपकरण भी इस दिन पूजे जाते हैं। 4. सांस्कृतिक एकता: यह त्योहार सभी समुदायों में कौशल, श्रम और शिल्प कौशल के प्रति गहरी सराहना पैदा करता है। 5. कृतज्ञता और विनम्रता: यह हमें ज़मीन से जुड़े रहने की याद दिलाता है, उन वस्तुओं और व्यवसायों का सम्मान करता है जो हमारे जीवन को कार्यात्मक और सफल बनाते हैं। History and Mythology of Ayudha Puja: आयुध पूजा का इतिहास और पौराणिक कथाएँ आयुध पूजा की जड़ें प्राचीन हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक कथाओं में गहराई से निहित हैं। महाभारत से संबंध: महाभारत के अनुसार, अपने वनवास के दौरान, अर्जुन ने अपने हथियारों को एक शमी के पेड़ में छिपा दिया था। विजयदशमी के दिन, अपना वनवास पूरा करने के बाद, उन्होंने उन्हें वापस प्राप्त किया और युद्ध में जाने से पहले उनकी पूजा की – और विजयी हुए। हथियारों के प्रति यह श्रद्धा प्रतीकात्मक हो गई और आयुध पूजा के रूप में विकसित हुई। देवी दुर्गा की विजय: एक और मजबूत संबंध नवरात्रि की कथा से आता है, जहाँ देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर को हराया था। Ayudha Puja अपनी जीत के बाद, उन्होंने अपने हथियार रख दिए, जिनकी देवताओं द्वारा पूजा की गई। इस कार्य से शक्ति और कार्य के उपकरणों की पूजा करने की प्रथा का उदय हुआ। शाही परंपरा: मैसूर के वोडेयार शासकों ने अपनी नवरात्रि उत्सवों के दौरान आयुध पूजा को संस्थागत रूप दिया था, Ayudha puja festival in india जहाँ विजय प्राप्त करने से पहले हथियारों को पवित्र किया जाता था। समय के साथ, आयुध पूजा युद्ध के औजारों की पूजा से हटकर किसी भी उपकरण या साधन के व्यापक, प्रतीकात्मक उत्सव में बदल गई जो किसी के पेशे या शिक्षा का समर्थन करता है। Ayudha puja festival in india:भारत में आयुध पूजा का उत्सव यह त्योहार विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी यह मनाया जाता है। दक्षिण भारत: यहाँ लोग अपने घरों में, कार्यालयों में, कारखानों में और वाहनों की विशेष पूजा करते हैं। छात्र अपनी किताबें देवी सरस्वती की मूर्ति के पास रखकर पढ़ाई से परहेज करते हैं। उत्तरी और पश्चिमी भारत: इन क्षेत्रों में इसे शस्त्र पूजा के रूप में भी जाना जाता है और कुछ जगहों पर यह प्रतिबंधित अवकाश के रूप में मनाया जा सकता है। दुर्गा पूजा और दशहरा से संबंध: आयुध पूजा, दुर्गा पूजा और दशहरा आपस में जुड़े हुए हैं और अक्सर हिंदू चंद्र कैलेंडर के एक ही सप्ताह में, विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान पड़ते हैं। आयुध पूजा महा नवमी (नौवें दिन) पर होती है, जबकि दशहरा (विजयदशमी) दसवें दिन मनाया जाता है। आयुध पूजा की रस्में और परंपराएँ आयुध पूजा में हमारे दैनिक जीवन को उत्पादक और उद्देश्यपूर्ण बनाने वाले औजारों को धन्यवाद देना शामिल है। पूजा से पहले की तैयारियाँ:     स्वच्छता: औजारों, मशीनों, किताबों और वाहनों को अच्छी तरह से साफ और पॉलिश किया जाता है।     सजावट: वस्तुओं को हल्दी, कुमकुम, चंदन का पेस्ट, गेंदे के फूल, आम के पत्ते और केले के तनों से सजाया जाता है।      व्यवस्थित प्रदर्शन: उपकरणों को अक्सर एक वेदी या मंच पर व्यवस्थित किया जाता है, Ayudha Puja कभी-कभी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की मूर्तियों या तस्वीरों के साथ। मुख्य दिन की पूजा (महा नवमी):     स्नान: भक्तगण स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनते हैं।     वेदी स्थापित करना: देवताओं की छवियों के साथ एक सजाया हुआ क्षेत्र स्थापित किया जाता है, खासकर देवी सरस्वती (ज्ञान के लिए), देवी लक्ष्मी (धन के लिए), और देवी दुर्गा या पार्वती (शक्ति के लिए)।     प्रसाद: नारियल, पान के पत्ते और सुपारी, फल और मिठाई, अगरबत्ती और दीये, पारंपरिक भोजन जैसे पायसम, वड़ा या सुंदर (क्षेत्रीय भिन्नताएँ) चढ़ाए जाते हैं।     पूजा प्रदर्शन: आरती भक्ति के साथ की जाती है। पूजा के दिन औजारों को छुआ या इस्तेमाल नहीं किया जाता है।     वाहन पूजा: वाहनों को धोया जाता है, फूलों और केले के पत्तों से सजाया जाता है, और पहियों के नीचे नींबू रखकर प्रतीकात्मक रूप से नकारात्मकता को दूर करने के लिए कुचला जाता है।    किताबों और वाद्ययंत्रों की पूजा: विशेष रूप से दक्षिण भारत में, छात्र अपनी नोटबुक, पेन और वाद्ययंत्र सरस्वती की मूर्ति के पास रखते हैं और पढ़ाई से बचते हैं, यह मानते हुए कि देवी का आशीर्वाद अकादमिक और कला में सफलता लाता है। आयुध पूजा पर अवकाश Ayudha Puja आयुध पूजा 2025 बुधवार, 01 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह भारत में राष्ट्रीय अवकाश नहीं है। हालाँकि, यह तमिलनाडु, कर्नाटक, और आंध्र प्रदेश जैसे कई दक्षिणी राज्यों में बैंक अवकाश या सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया

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Dussehra 2025

Dussehra 2025 Date And Time: दशहरा 2025: कब है विजयादशमी? जानें तिथि, रावण दहन और शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व !

Dussehra 2025 Date: दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। हर साल अश्विन माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार, हमें भगवान राम की रावण पर विजय और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के संहार की याद दिलाता है। आइए जानते हैं कि साल 2025 में दशहरा कब है और इससे जुड़े शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व क्या हैं। Dussehra 2025 kis din hai: दशहरा या विजयादशमी का पर्व अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंकपति रावण का वध किया था। यही कारण है कि इस त्योहार को विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन रावण, मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतलों का प्रदोष काल में दहन भी किया जाता है। जानें इस बार दशहरा कब है व रावण दहन का शुभ मुहूर्त। When is Dussehra 2025: दशहरा 2025 कब है? ज्योतिष पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 01 अक्टूबर 2025 को शाम 07 बजकर 01 मिनट पर शुरू होगी (एक स्रोत के अनुसार 07 बजकर 02 मिनट) और इसका अंत 02 अक्टूबर 2025 को शाम 07 बजकर 10 मिनट पर होगा। चूंकि दशहरा या  (vijayadashami) विजयादशमी उदयातिथि में मनाई जाती है, इसलिए यह त्योहार गुरुवार, 02 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। Religious significance of Dussehra:दशहरा का धार्मिक महत्व दशहरा का पर्व विभिन्न रूपों में देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाया जाता है। उत्तर भारत: उत्तर भारत में इस दिन भगवान राम की वानर सेना के साथ मिलकर लंकापति रावण का वध करने की खुशी में रामलीला और रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया जाता है। पूर्वी भारत: पूर्वी भारत में दशहरे को दुर्गा पूजा और दुर्गा विसर्जन के रूप में मनाया जाता है, जो मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का प्रतीक है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है और लोगों को सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। दशहरा 2025 पर बन रहे शुभ योग:Auspicious chances are being formed on Dussehra 2025 इस साल Dussehra 2025 दशहरा पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। दशहरा के दिन रवि योग पूरे दिन रहेगा। इसके अलावा, सुकर्मा और धृति योग के साथ श्रवण नक्षत्र भी रहेगा, जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और मंगलकारी संयोग माना गया है। Auspicious time for Dussehra Ravana Dahan:दशहरा रावण दहन का शुभ मुहूर्त शास्त्रों के अनुसार, रावण दहन प्रदोष काल में करने का विधान है, जो सूर्यास्त के बाद आरंभ होता है। 02 अक्टूबर 2025 को सूर्यास्त का समय शाम 06 बजकर 05 मिनट है (एक अन्य स्रोत के अनुसार 06 बजकर 06 मिनट), इसलिए इसके बाद प्रदोष काल शुरू होगा और रावण दहन किया जा सकेगा। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में रावण दहन करने से शुभ प्रभाव पड़ता है। शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त:Auspicious time for weapon worship Dussehra 2025: दशहरा के दिन शस्त्र पूजन का भी विशेष महत्व है। इस दिन शस्त्र पूजन का शुभ मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 09 मिनट से दोपहर 02 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। पूजन की कुल अवधि 47 मिनट की है। दशहरा अबूझ मुहूर्त:dussehra abujh muhurat ज्योतिष शास्त्र में दशहरा तिथि Dussehra 2025 को एक ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इसका अर्थ है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य, जैसे नया व्यापार शुरू करना, संपत्ति या वाहन खरीदना, बिना किसी मुहूर्त को देखे किया जा सकता है। इस दिन कोई सामान खरीदने के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है। दशहरा का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है जो हमें सिखाता है कि सत्य की हमेशा जीत होती है। ललिता पंचमी 2025: तिथि,महत्व और उपांग ललिता व्रत की संपूर्ण जानकारी

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ShrI lalitAhRidaya stotraM: श्रीललिताहृदयस्तोत्रम्

shrI lalitAhRidaya stotraM: श्रीललिताहृदयस्तोत्रम् अथश्रीललिताहृदयस्तोत्रम् ॥ श्रीललिताम्बिकायै नमः ।देव्युवाच ।देवदेव महादेव सच्चिदानन्दविग्रहा ।सुन्दर्याहृदयं स्तोत्रं परं कौतूहलं विभो ॥ १॥ ईश्वरौवाच । साधु साधुत्वया प्राज्ञे लोकानुग्रहकारकम् ।रहस्यमपिवक्ष्यामि सावधानमनाःश‍ृणु ॥ २॥ श्रीविद्यां जगतां धात्रीं सर्ग्गस्थितिलयेश्वरीम् ।नमामिललितां नित्यां भक्तानामिष्टदायिनीम् ॥ ३॥ बिन्दुत्रिकोणसम्युक्तं वसुकोणसमन्वितम् ।दशकोणद्वयोपेतं चतुर्द्दश समन्वितम् ॥ ४॥ दलाष्टकेसरोपेतं दलषोडशकान्वितम् ।वृत्तत्रययान्वितम्भूमिसदनत्रयभूषितम् ॥ ५॥ नमामि ललिताचक्रं भक्तानामिष्टदायकम् ।अमृताम्भोनिधिन्तत्र रत्नद्वीपं नमाम्यहम् ॥ ६॥ नानावृक्षमहोद्यानं वन्देऽहं कल्पवाटिकाम् ।सन्तानवाटिकांवन्दे हरिचन्दनवाटिकाम् ॥ ७॥ मन्दारवाटिकां पारिजातवाटीं मुदा भजे ।नमामितव देवेशि कदम्बवनवाटिकाम् ॥ ८॥ पुष्यरागमहारत्नप्राकारं प्रणमाम्यहम् ।पद्मरागादिमणिभिःप्राकारं सर्वदा भजे ॥ ९॥ गोमेदरत्नप्राकारं वज्रप्राकारमाश्रये ।वैडूर्यरत्नप्राकारम्प्रणमामि कुलेश्वरी ॥ १०॥ इन्द्रनीलाख्यरत्नानां प्राकारं प्रणमाम्यहम् ।मुक्ताफलमहारत्नप्राकारम्प्रणमाम्यहम् ॥ ११॥ मरताख्यमहारत्नप्राकाराय नमोनमः ।विद्रुमाख्यमहारत्नप्राकारम्प्रणमाम्यहम् ॥ १२॥ माणिक्यमण्डपं रत्नसहस्रस्तम्भमण्डपम् ।ललिते!तवदेवेशि भजाम्यमृतवापिकाम् ॥ १३॥ आनन्दवापिकां वन्देविमर्शवापिकां भजे ।भजेबालातपोल्गारं चन्द्रिकोगारिकां भजे ॥ १४॥ महाश‍ृङ्गारपरिखां महापत्माटवीं भजे ।चिन्तामणिमहारत्नगृहराजं नमाम्यहम् ॥ १५॥ पूर्वांनायमयं पूर्व्वद्वारं देवि नमाम्यहम् ।दक्षिणांनायरूपन्तेदक्षिणद्वारमाश्रये ॥ १६॥ नमामि पश्चिमद्वारं पश्चिमाम्नाय रूपकम् ।वन्देऽहमुत्तरद्वारमुत्तराम्नायरूपकम् ॥ १७॥ ऊर्द्ध्वाम्नायमयं वन्दे ह्यूर्द्धद्वारं कुलेश्वरि ।ललितेतव देवेशि महासिंहासनं भजे ॥ १८॥ ब्रह्मात्मकं मञ्चपादमेकं तव नमाम्यहम् ।एकंविष्णुमयं मञ्चपादमन्यं नमाम्यहम् ॥ १९॥ एकं रुद्रमयं मञ्चपादमन्यं नमाम्यहम् ।मञ्चपादंममाम्येकं तव देवीश्वरात्मकम् ॥ २०॥ मञ्चैकफलकं वन्दे सदाशिवमयं शुभम् ।नमामितेहंसतूलतल्पकं परमेश्वरी! ॥ २१॥ नमामिते हंसतूलमहोपाधानमुत्तमम् ।कौस्तुभास्तरणंवन्दे तव नित्यं कुलेश्वरी ॥ २२॥ महावितानिकां वन्दे महायविनिकां भजे ।एवं पूजागृहं ध्यात्वा श्रीचक्रे श्रीशिवां भजे ॥ २३॥ स्वदक्षिणे स्थापयामि भागे पुष्पाक्षतादिकान् ।अमितांस्तेमहादेवि दीपान् सन्दर्शयाम्यहम् ॥ २४॥ मूलेन त्रिपुराचक्रं तव सम्पूज्ययाम्यहम् ।त्रिभिःखण्डैस्तवख्यातैः पूजयामि महेश्वरि! ॥ २५॥ वाय्वग्नि जलसम्युक्तं प्राणायामैरहं शिवै ।शोषाणान्दाहनं चैव करोमि प्लावनं तथा ॥ २६॥ त्रिवारं मूलमन्त्रेण प्राणायामं करोम्यहम् ।पाषण्डकारिणोभूता भूमौये चान्तरिक्षके ॥ २७॥ करोम्यनेन मन्त्रेण तालत्रयमहं शिवे ।नारायणोऽहम्ब्रह्माहं भैरवोऽहं शिवोस्म्यहम् ॥ २८॥ देवोहं परमानन्दोऽस्म्यहं त्रिपुरसुन्दरि ।ध्यात्वावै वज्रकवचं न्यासं तव करोम्यहम् ॥ २९॥ कुमारीबीजसम्युक्तं महात्रिपुरसुन्दरि! ।मांरक्षरक्षेति हृदि करोम्यज्ञलिमीश्वरि! ॥ ३०॥ महादेव्यासनायेति प्रकरोम्यासनं शिवे ।चक्रासनंनमस्यामि सर्वमन्त्रासनं शिवे ॥ ३१॥ साद्ध्यसिद्धासनं मन्त्रैरेभिर्युक्तं महेश्वरि ।करोम्यस्मिञ्चक्रमन्त्रैर्देवतासनमुत्तमम् ॥ ३२॥ करोम्यथ षडङ्गाख्यं मातृकां च कलां न्यसे ।श्रीकण्टङ्केशवं चैव प्रपञ्चं योगमातृकाम् ॥ ३३॥ तत्त्वन्यासं ततः कूर्व्वे चतुष्पीटं यथाचरे ।लघुषोढान्ततः कूर्व्वे शक्तिन्यासं महोत्तमम् ॥ ३४॥ पीटन्यासं ततः कुर्वे देवतावाहनं प्रिये ।कुङ्कुमन्यासकञ्चैव चक्रन्यासमथाचरे ॥ ३५॥ चक्रन्यासं ततः कुर्व्वे न्यासं कामकलाद्वयम् ।षोडशार्ण्णमहामन्त्रैरङ्गन्यासङ्करोम्यहम् ॥ ३६॥ महाषोढां ततः कुर्व्वे शाम्भवं च महाप्रिये ।ततोमूलम्प्रजप्त्वाथ पादुकाञ्च ततः परम् ॥ ३७॥ गुरवे सम्यगर्च्याथ देवतां हृदिसम्भजे ।करोमिमण्डलं वृत्तं चतुरश्रं शिवप्रिये ॥ ३८॥ पुष्पैरभ्यर्च्च्यसाधारं शङ्खं सम्पूजयामहम् ।अर्च्चयामिषडङ्गेन जलमापूरयाम्यहम् ॥ ३९॥ ददामि चादिमं बिन्दुं कुर्वे मूलाभिमन्त्रितम् ।तज्जलेनजगन्मातस्त्रिकोणं वृत्तसम्युतम् ॥ ४०॥ षल्कोणं चतुरश्रञ्च मण्डलं प्रणमाम्यहम् ।विद्ययापूजयामीह त्रिखण्डेन तु पूजनम् ॥ ४१॥ बीजेनवृत्तषल्कोणं पूजयामि तवप्रिये ।तस्मिन्देवीकलात्मानां मणिमण्डलमाश्रये ॥ ४२॥ धूम्रार्च्चिषं नमस्यामि ऊष्मां च ज्वलनीं तथा ।ज्वालिनीञ्च नमस्यामि वन्देऽहं विस्पुलिङ्गिनीम् ॥ ४३॥ सुश्रियं च सुरूपाञ्चकम्पिलां प्रणमाम्यहम् ।नौमिहव्यवहां नित्यां भजे कव्यवहां कलाम् ॥ ४४॥ सूर्याग्निमण्डलां तत्र सकलाद्वादशात्मकम् ।अर्घ्यपाद्यमहन्तत्र तपिनीं तापिनीं भजे ॥ ४५॥ धूम्रां मरीचीं वन्देऽहं ज्वालिनीं मरुहं भजे ।सुषुम्नाम्भोगदां वन्दे भजे विश्वां च बोधिनीम् ॥ ४६॥ धारिणीं च क्षमां वन्दे सौरीरेताः कलाभजे ।आश्रयेमण्मलं चान्द्रं तल्कलाषोडशात्मकम् ॥ ४७॥ अमृतां मानदां वन्दे पूषां तुष्टीं भजाम्यहम् ।पुष्टिम्भजे महादेवि भजेऽहं च रतिं धृतिम् ॥ ४८॥ रशनिं चन्द्रिकां वन्दे कान्तीं जोत्सना श्रियं भजे ।नेऔमिप्रीतिञ्चागतदाञ्चपूर्ण्णिमाममृताम्भजे ॥ ४९॥ त्रिकोणलेखनं कुर्व्वे आकारादिसुरेखकम् ।हलक्षवर्ण्णसम्युक्तंस्पीतं तं हंसभास्करम् ॥ ५०॥ वाक्कामशक्ति संयुक्तं हंसमाराधयाम्यहम् ।वृत्ताद्बहिःषडश्रस्यलेखनं प्रकरोम्यहम् ॥ ५१॥ पुरतोग्न्यादिषल्ख़ोणं कखगेनार्च्चयाम्यहम् ।श्रीविद्ययासप्तवारं करोम्यत्राभि मन्त्रितम् ॥ ५२॥ समर्प्पयामि देवेशि तस्मात् गन्धाक्षतादिकम् ।ध्यायामिपूजाद्रव्येषु तत् सर्वं विद्ययायुतम् ॥ ५३॥ चतुर्न्नवतिसन्मन्त्रान् स्पृष्ट्वा तत् प्रजपाम्यहम् ।वह्नेर्द्दशकलाःसूर्यकलाद्वादशकं भजे ॥ ५४॥ आश्रये शोडषकलास्तत्र चन्द्रमसस्तदा ।सृष्टिम्वृद्धिम् स्मृतिम् वन्दे मेधाम् कान्तीम् तथैव च ॥ ५५॥ लक्ष्मीम् द्युथिम् स्थिताम् वन्दे स्थितिम् सिद्धिम् भजाम्यहम् ।एताब्रह्मकलावन्दे जरान्थाम् पालिनीम् भजे ॥ ५६॥ शान्तिं नमामीश्वरीं च रतीं वन्दे च कारिकाम् ।वरदांह्लादिनीं वन्दे प्रीतिं दीर्घां भजाभम्यहम् ॥ ५७॥ एता विष्णुअकलावन्दे तीक्षणां रौद्रिं भयां भजे ।निद्रान्तन्द्रीं क्षुधां वन्दे नमामि क्रोधिनीं क्रियाम् ॥ ५८॥ उल्कारीं मृत्युरूपां च एता रुद्रकला भजे ।नीलाम्पीतां भजे श्वेतां वन्देऽहमरुणां कलाम् ॥ ५९॥ अनन्तख्यां कलाञ्चेति ईश्वरस्य कलाभजे ।निवृत्तिञ्चप्रतिष्ठाञ्चविद्यांशान्तिं भजाम्यहम् ॥ ६०॥ रोधिकां दीपिकां वन्दे रेचिकां मोचिकां भजे ।परांसूक्षामृतां सूक्षां प्रणामि कुलेश्वरि! ॥ ६१॥ ज्ञानाख्याञ्चनमस्यामि नौमिज्ञानामृतां कलाम् ।आप्यायिनींव्यापिनीं च मोदिनीं प्रणमाम्यहम् ॥ ६२॥ कलाः सदाशिवस्यैताः षोडश प्रणमाम्यहम् ।विष्णुयोनिन्नमस्यामि मूलविद्यां नमाम्यहम् ॥ ६३॥ त्रैयम्बकम् नमस्यामि तद्विष्णुम् प्रणमाम्यहम् ।विष्णुयोनिम्नमस्यामि मूलविद्याम् नमाम्यहम् ॥ ६४॥ अमृतं मन्त्रितं वन्दे चतुर्न्नवतिभिस्तथा ।अखण्डैकरसानन्दकरेपरसुधात्मनि ॥ ६५॥ स्वच्छन्दस्पपुरणं मन्त्रं नीधेहि कुलरूपिणि ।अकुलस्थामृताकारेसिद्धिज्ञानकरेपरे ॥ ६६॥ अमृतं निधेह्यस्मिन् वस्तुनिक्लिन्नरूपिणि ।तद्रूपाणेकरस्यत्वङ्कृत्वाह्येतत्स्वरूपिणि ॥ ६७॥ भूत्वा परामृताकारमयि चित् स्पुरणं कुरु ।एभिर्म्मनूत्तमैर्वन्देमन्त्रितं परमामृतम् ॥ ६८॥ जोतिम्मयमिदं वन्दे परमर्घ्यञ्च सुन्दरि ।तद्विन्दुभिर्मेशिरसि गुरुं सन्तर्प्पयाम्यहम् ॥ ६९॥ ब्रह्मास्मिन् तद्विन्दुं कुण्डलिन्यां जुहोम्यहम् ।हृच्चक्रस्तां-महादेवीम्महात्रिपुरसुन्दरीम् ॥ ७०॥ निरस्तमोहतिमिरां साक्षात् संवित्स्वरूपिणीम् ।नासापुटात्परकलामथनिर्ग्गमयाम्यहम् ॥ ७१॥ नमामियोनिमद्ध्यास्थां त्रिखण्डकुसुमांञ्जलिम् ।जगन्मातर्महादेवियन्त्रेत्वां स्थापयाम्यहम् ॥ ७२॥ सुधाचैतन्यमूर्त्तीं ते कल्पयामिमनुं तव ।अनेनदेविमन्त्रयन्त्रेत्वां स्थापयाम्यहम् ॥ ७३॥ महापद्मवनान्तस्थे कारणानन्तविग्रहे ।सर्वभूतहितेमातरेह्यपि परमेश्वरि ॥ ७४॥ देवेशी भक्तसुलभे सर्वाभरणभूषिते ।यावत्वम्पूजयामीहतावत्त्वं सुस्थिराभव ॥ ७५॥ अनेन मन्त्रयुग्मेन त्वामत्रावाहयाम्यहम् ।कल्पयामिनमः पादमर्घ्यं ते कल्पयाम्यहम् ॥ ७६॥ गन्धतैलाभ्यञ्जनञ्चमज्जशालाप्रवेशम् ।कल्पयामिनमस्तस्मै मणिपीठोप्रवेशनम् ॥ ७७॥ दिव्यस्नानीयमीशानि गृहाणोद्वर्त्तनं शुभे ।गृहाणोष्णादकस्नानङ्कल्पयाम्यभिषेचनम् ॥ ७८॥ हेमकुम्भायुतैः स्निग्द्धैः कल्पयाम्यभिषेचनम् ।कल्पयामिनमस्तुभ्यं धएऔतेन परिमार्ज्जनम् ॥ ७९॥ बालभानु प्रतीकाशं दुकूलं परिधानकम् ।अरुणेनदुकुलेनोत्तरीयं कल्पयाम्यहम् ॥ ८०॥ प्रवेशनं कल्पयामि सर्वाङ्गानि विलेपनम् ।नमस्तेकल्पयाम्यत्र मणिपीठोपवेशनम् ॥ ८१॥ अष्टगन्धैः कल्पयामि तवलेखनमम्बिके ।कालागरुमहाधूपङ्कल्पयामि नमश्शिवे ॥ ८२॥ मल्लिकामालातीजाति चम्पकादि मनोरमैः ।अर्च्चिताङ्कुसुमैर्म्मालां कल्पयामि नमश्शिवे ॥ ८३॥ प्रवेशनं कल्पयामि नमो भूषणमण्डपे ।उपवेश्यंरत्नपीठे तत्रते कल्पयाम्यहम् ॥ ८४॥ नवमाणिक्यमकुटं तत्रते कल्पयाम्यहम् ।शरच्चन्द्रनिभंयुक्तं तच्चन्द्रशकलं तव ॥ ८५॥ तत सीमन्तसिन्दूरं कस्तूरीतिलकं तव ।कालाज्ञनङ्कल्पयामि पालीयुगलमुत्तमम् ॥ ८६॥ मणिकुण्डलयुग्मञ्च नासाभरणमीश्वरी! ।ताटङ्कयुगलन्देवि ललिते धारयाम्यहम् ॥ ८७॥ अथाद्यां भूषणं कण्ठे महाचिन्ताकमुत्तमम् ।पदकन्ते कल्पयामि महापदकमुत्तमम् ॥ ८८॥ मुक्तावलीं कल्पयामि चैकावलि समन्विताम् ।छन्नवीरञ्चकेयूरयुगलानां चतुष्टयम् ॥ ८९॥ वलयावलिमालानीं चोर्मिकावलिमीश्वरि ।काञ्चीदामकटीसूत्रंसौभग्याभरणं च ते ॥ ९०॥ त्रिपुरे पादकटकं कल्पये रत्ननूपुरम् ।पादाङ्गुलीयकन्तुभ्यं पाशमेकं करेतव ॥ ९१॥ अन्ये करेङ्कुशं देवि पूण्ड्रेक्षुधनुषं तव ।अपरेपुष्पबाणञ्च श्रीमन्माणिक्यपादुके ॥ ९२॥ तदावरण देवेशि महामञ्चादिरोहणम् ।कामेश्वराङ्कपर्यङ्कमुपवेशनमुत्तमम् ॥ ९३॥ सुधया पूर्ण्णचषकं ततस्तत् पानमुत्तमम् ।कर्प्पूरवीटिकान्तुभ्यं कल्पयामि नमः शिवे ॥ ९४॥ आनन्दोल्लासविलसद्धंसं ते कल्पयाम्यहम् ।मङ्गलारात्रिकंवन्दे छत्रं ते कल्पयाम्यहम् ॥ ९५॥ चामरं यूगलं देविदर्प्पणं कल्पयाम्यहम् ।तालव्रिन्तङ्कल्पयामिगन्धपुष्पाक्षतैरपि ॥ ९६॥ धूपं दीपश्चनैवेद्यं कल्पयामि शिवप्रिये ।अथाहम्बैन्दवे चक्रे सर्वानन्दमयात्मके ॥ ९७॥ रत्नसिंहासने रम्ये समासीनां शिवप्रियाम् ।उद्यद्भानुसहस्राभाञ्जपापुष्पसमप्रभाम् ॥ ९८॥ नवरत्नप्रभायुक्तमकुटेन विराजिताम् ।चन्द्ररेखासमोपेताङ्कस्तूरितिलकाङ्किताम् ॥ ९९॥ कामकोदण्डसौन्दर्यनिर्ज्जितभ्रूलतायुताम् ।अञ्जनाञ्चितनेत्रान्तुपद्मपत्रनिभेषणाम् ॥ १००॥ मणिकुण्डलसम्युक्त कर्ण्णद्वयविराजिताम् ।ताम्बूलपूरितमुखींसुस्मितास्यविराजिताम् ॥ १०१॥ आद्यभूषणसम्युक्तां हेमचिन्ताकसंयुताम् ।पदकेनसमोपेतां महापदकसंयुताम् ॥ १०२॥ मुक्ताफलसमोपेतामेकावलिसमन्विताम् ।कौसुभाङ्गदसंयुक्तचतुर्बाहुसमन्विताम् ॥ १०३॥ अष्टगन्धसमोपेतां श्रीचन्दनविराजिताम् ।हेमकुम्भोपमप्रख्यस्तनद्वन्दविराजिताम् ॥ १०४॥ रक्तवस्त्रपरीधानां रक्तकञ्चुकसंयुताम् ।सूक्ष्मरोमावलियुक्ततनुमद्ध्यविराजिताम् ॥ १०५॥ मुक्तामाणिक्यखचित काञ्चीयुतनितम्बनीम् ।सदाशिवाङकस्थबृहन्महाजघनमण्डलाम् ॥ १०६॥ कदलिस्तम्भसंराजदूरुद्वयविराजिताम् ।कपालीकान्तिसङ्काशजङ्घायुगलशोभिताम् ॥ १०७॥ ग्रूढगुल्फद्वेयोपेतां रक्तपादसमन्विताम् ।ब्रह्मविष्णुमहेशादिकिरीटस्फूर्ज्जिताङ्घ्रिकाम् ॥ १०८॥ कान्त्या विराजितपदां भक्तत्राण परायणाम् ।इक्षुकार्मुकपुष्पेषुपाशाङ्कुशधरांशुभाम् ॥ १०९॥ संवित्स्वरूपिणीं वन्दे ध्यायामि परमेश्वरीम् ।प्रदर्शयाम्यथशिवेदशामुद्राः फलप्रदाः ॥ ११०॥ त्वां तर्प्पयामि त्रिपुरे त्रिधना पार्व्वति ।अग्नौमहेशदिग्भागे नैरृत्र्यां मारुते तथा ॥ १११॥ इन्द्राशावारुणी भागे षडङ्गान्यर्च्चये क्रमात् ।आद्याङ्कामेश्वरीं वन्दे नमामि भगमालिनीम् ॥ ११२॥ नित्यक्लिन्नां नमस्यामि भेरुण्डां प्रणमाम्यहम् ।वह्निवासान्नमस्यामि महाविद्येश्वरीं भजे ॥ ११३॥ शिवदूतिं नमस्यामि त्वरितां कुल सुन्दरीम् ।नित्यान्नीलपताकाञ्च विजयां सर्वमङ्गलाम् ॥ ११४॥ ज्वालामालाञ्च चित्राञ्च महानित्यां च संस्तुवे ।प्रकाशानन्दनाथाख्याम्पराशक्तिनमाम्यहम् ॥ ११५॥ शुक्लदेवीं नमस्यामि प्रणमामि कुलेश्वरीम् ।परशिवानन्दनाथाख्याम्पराशक्ति नमाम्यहम् ॥ ११६॥ कौलेश्वरानन्दनाथं नौमि कामेश्वरीं सदा ।भोगानन्दन्नमस्यामि सिद्धौघञ्च वरानने ॥ ११७॥ क्लिन्नानन्दं नमस्यामि समयानन्दमेवच ।सहजानन्दनाथञ्चप्रणमामि मुहुर्मुहु ॥ ११८॥ मानवौघं नमस्यामि गगनानन्दगप्यहम् ।विश्वानन्दन्नमस्यामि विमलानन्दमेवच ॥ ११९॥ मदनानन्दनाथञ्च भुवनानन्दरूपिणीम्

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Shri Lalita Kavacha:श्रीललिताकवचम्

Shri Lalita Kavacha:श्रीललिताकवचम् । नारदपुराणान्तर्गते । सनत्कुमार उवाच-अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् ।येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥ १॥ सर्वतः सर्वदाऽऽत्मानं ललिता पातु सर्वगा ।कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥ २॥ दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा ।नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशं मे पातु कौणपीम् ॥ ३॥ तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनी ।महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥ ४॥ वामपार्श्वं सदा पातु इतीमेलरिता ततः ।माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धदायिनी ॥ ५॥ पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवता कुलसुन्दरी ।अधो नीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥ ६॥ करोतु मे मङ्गलानि सर्वदा सर्वमङ्गला ।देहेन्द्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥ ७॥ पालयत्वनिशं चित्ता चित्तं मे सर्वदावतु ।कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥ ८॥ पापान्मां सर्वतः शोकात्सङ्क्षयात्सर्वतः सदा ।असत्यात्क्रूरचिन्तातो हिंसातश्चौरतस्तथा ।स्तैमित्याच्च सदा पातु प्रेरयन्त्यः शुभं प्रति ॥ ९॥ नित्याः षोडश मां पातु गजारूढाः स्वशक्तिभिः ।तथा हयसमारूढाः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १०॥ सिंहारूढास्तथा पातु पातु ऋक्षगता अपि ।रथारूढाश्च मां पातु सर्वतः सर्वदा रणे ॥ ११॥ तार्क्ष्यारूढाश्च मां पातु तथा व्योमगताश्च ताः ।भूतगाः सर्वगाः पातु पातु देव्यश्च सर्वदा ॥ १२॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् ।द्रावयन्तु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥ १३॥ गजाश्वद्वीपिपञ्चास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः ।असङ्ख्याः शक्तयो देव्यः पातु मां सर्वतः सदा ॥ १४॥ सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् ।कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानन्दमास्थितः ॥ १५॥ इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् ।यस्य सन्धारणान्मर्त्यो निर्भयो विजयी सुखी ॥ १६॥ ॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादेबृहदुपाख्याने श्रीललिताकवचं सम्पूर्णम् ॥ अध्यायः ८९॥

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Lalitadevi Kavacham: ललितादेवीकवचम्

Lalitadevi Kavacham: ललितादेवीकवचम् अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् ।येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥ ८९-२३॥ सर्वतः सर्वदाऽऽत्मानं ललिता पातु सर्वगा ।कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥ ८९-२४॥ दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा ।नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशं मे पातु कौणपीम् ॥ ८९-२५॥ तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनी ।महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥ ८९-२६॥ वामपार्श्वं सदा पातु इतीमेलरिता ततः ।माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥ ८९-२७॥ पातु मामूर्ध्वतः शश्चद्दैवताकुलसुन्दरी ।अधो नीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥ ८९-२८॥ करोतु मे मङ्गलानि सर्वदा सर्वमङ्गला ।देहन्द्रियमनः प्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥ ८९-२९॥ पालयत्वनिशं चित्ता चित्तं मे सर्वदावतु ।कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥ ८९-३०॥ पापान्मां सर्वतः शोकात्सङ्क्षयात्सर्वतः सदा ।असत्यात्क्रूरचिन्तातो हिंसातश्चौरतस्तथा ।स्तैमित्याच्च सदा पान्तु प्रेरयन्त्यः शुभं प्रति ॥ ८९-३१॥ नित्याः षोडश मां पान्तु गजारूढाः स्वशक्तिभिः ।तथा हयसमारूढाः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥ ८९-३२॥ सिंहारूढास्तथा पान्तु पान्तु ऋक्षगता अपि ।रथारूढाश्च मां पान्तु सर्वतः सर्वदा रणे ॥ ८९-३३॥ तार्क्ष्यारूढाश्च मां पान्तु तथा व्योमगताश्च ताः ।भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥ ८९-३४॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् ।द्रावयन्तु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥ ८९-३५॥ गजाश्वद्वीपिपञ्चास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः ।असङ्ख्याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥ ८९-३६॥ सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् ।कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदाऽऽनन्दमास्थितः ॥ ८९-३७॥ इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् ।यस्य सन्धारणान्मर्त्यो निर्भयो विजयी सुखी ॥ ८९-३८॥ इति नारदपुराणे पूर्वभगे एकोननवतितमाध्यायान्तर्गतं ललिता कवचं समाप्तम् । बृहन्नारदीयपुराण । पूर्वभाग । अध्याय ८९/२३-३८॥

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Maa Chandraghanta

Maa Chandraghanta:मां चंद्रघंटा का मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Chandraghanta देवी पार्वती का विवाहित रूप हैं। भगवान शिव से विवाह के बाद देवी महागौरी ने अपने माथे को आधा चंद्र से सजाना शुरू किया और जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित है। देवी चंद्रघंटा बाघिन पर सवार हैं। वह अपने माथे पर अर्ध-गोलाकार चंद्रमा (चंद्र) पहनती है। उनके माथे पर अर्धचंद्र घंटी (घंटी) की तरह दिखता है और इसी वजह से उन्हें चंद्र-घण्टा के नाम से जाना जाता है। माँ को दस हाथों से चित्रित किया गया है। देवी चंद्रघंटा अपने चार बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल रखती हैं और पांचवें बाएं हाथ को वरद मुद्रा में रखती हैं। वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल का फूल, तीर, धनुष और जप माला धारण करती है और पांचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती है। देवी पार्वती का यह रूप शांत और अपने भक्तों के कल्याण के लिए है। इस रूप में देवी चंद्रघंटा अपने सभी हथियारों के साथ युद्ध के लिए तैयार हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके माथे पर चंद्र-घंटी की आवाज उनके भक्तों से सभी प्रकार की बुरी आत्माओं को दूर कर देती है। Maa Chandraghanta Mantra: मंत्र  ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ Om Devi Chandraghantayai Namah॥ Maa Chandraghanta प्रार्थना  पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥ Pindaja Pravararudha Chandakopastrakairyuta।Prasadam Tanute Mahyam Chandraghanteti Vishruta॥ Maa Chandraghanta स्तुति  या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Chandraghanta Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Chandraghanta ध्यान  वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chandraghanta Yashasvinim॥Manipura Sthitam Tritiya Durga Trinetram।Khanga, Gada, Trishula, Chapashara, Padma Kamandalu Mala Varabhitakaram॥Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Manditam॥Praphulla Vandana Bibadhara Kanta Kapolam Tugam Kucham।Kamaniyam Lavanyam Kshinakati Nitambanim॥ Maa Chandraghanta स्तोत्र  आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥ Apaduddharini Tvamhi Adya Shaktih Shubhparam।Animadi Siddhidatri Chandraghante Pranamamyaham॥Chandramukhi Ishta Datri Ishtam Mantra Swarupinim।Dhanadatri, Anandadatri Chandraghante Pranamamyaham॥Nanarupadharini Ichchhamayi Aishwaryadayinim।Saubhagyarogyadayini Chandraghante Pranamamyaham॥ Maa Chandraghanta कवच  रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम्॥बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम्।स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम॥कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च।न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम्॥ Rahasyam Shrinu Vakshyami Shaiveshi Kamalanane।Shri Chandraghantasya Kavacham Sarvasiddhidayakam॥Bina Nyasam Bina Viniyogam Bina Shapoddha Bina Homam।Snanam Shauchadi Nasti Shraddhamatrena Siddhidam॥Kushishyam Kutilaya Vanchakaya Nindakaya Cha।Na Datavyam Na Datavyam Na Datavyam Kadachitam॥ Maa Chandraghanta आरती  जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥भक्त की रक्षा करो भवानी।

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Maa Chandraghanta

Navratri 3rd day Maa Chandraghanta puja vidhi aarti: नवरात्रि के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, नोट कर लें पूजन विधि और आरती

Maa Chandraghanta puja vidhi: चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है और इसका तीसरा दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप, मां चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी है, जो अपने भक्तों को सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करता है। इस बार द्वितीया और तृतीया नवरात्रि व्रत एक ही दिन किए जाएंगे। Maa Chandraghanta: मां चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का एक अर्धचंद्र स्थित है, जिससे उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। यह नाम उनके दिव्य रूप को दर्शाता है, जिसमें एक अद्वितीय तेज और ममता समाहित है। उनका स्वरूप अत्यंत अलौकिक और भव्य माना जाता है। वे शांतिपूर्ण होने के साथ-साथ उनकी शक्ति भी अद्वितीय है, जो हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि प्रदान करती है। मां ने अपने भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा धारण कर रखे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता चंद्रघंटा को राक्षसों का वध करने वाली देवी भी कहा जाता है। पूजा का महत्व और लाभ नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जीवन में खुशहाली आती है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। पूजा के फलस्वरूप, लोग आपको अधिक सम्मान देने लगते हैं। मां चंद्रघंटा की पूजा से न केवल भौतिक सुख में वृद्धि होती है, बल्कि समाज में आपका प्रभाव भी बढ़ता है। उनकी आराधना से जीवन के सभी पहलुओं में सफलता प्राप्त होती है। Maa Chandraghanta puja vidhi: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए इन विधियों का पालन करें: 1. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सुबह जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें। 2. वस्त्र और फूल अर्पित करें: पूजा में मां को लाल और पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। Maa Chandraghanta मां चंद्रघंटा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले रंग के फूलों का प्रयोग करें। लाल और पीले गेंदे के फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है, क्योंकि ये मां की ममता और शक्ति का प्रतीक हैं। 3. कुमकुम और अक्षत: इसके बाद मां को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। 4. गंध, धूप, पुष्प: मां चंद्रघंटा को सिंदूर, अक्षत, गंध, धूप और पुष्प अर्पित करें। 5. भोग अर्पित करें: मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta को पीले रंग की मिठाई और दूध से बनी खीर का भोग अर्पित करें। खीर का भोग अर्पित करना सर्वोत्तम माना जाता है, और मां को विशेष रूप से केसर की खीर बहुत पसंद है। इसके अतिरिक्त, आप लौंग, इलायची, पंचमेवा और दूध से बनी मिठाइयां भी मां को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं। भोग में मिसरी और पेड़े भी जरूर रखें। 6. मंत्र जाप करें: पूजा के दौरान मां के मंत्रों का जाप करें। मां की अराधना “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” का जप करके की जाती है। 7. दुर्गा सप्तशती और आरती: साथ ही दुर्गा सप्तशती और अंत में मां चंद्रघंटा की आरती का पाठ भी करें। नवरात्रि के हर दिन नियम से दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती करें। 8. सूर्योदय से पहले पूजा: विशेष रूप से, इस दिन सूर्योदय से पहले पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इस समय मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इन सभी विधियों को विधिपूर्वक करने से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। मां चंद्रघंटा का पूजा मंत्र: Maa Chandraghanta puja Mantra • पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। • वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्। सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ • मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। रंग, गदा, त्रिशूल,चापचर,पदम् कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ मां चंद्रघंटा की आरती:Maa Chandraghanta Arti जय मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समान तुम शीतल दाती। चंद्र तेज किरणों में समाती। क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली। मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो। सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली। हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं। मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योत जलाएं। शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता। कांची पुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी। इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करके आप उनके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

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