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एकश्लोकी भागवतम्: ekashlokI bhAgavatam

एकश्लोकी भागवतम्:ekashlokI bhAgavatam आदौ देवकिदेविगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनम् मायापूतनजीवितापहरणं गोवर्धनोद्धारणम् ।कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुंतीसुतां पालनम् एतद्भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम् । इति श्रीभागवतसूत्र ॥ Shri Krishna’s charitam in short is that he is Devaki’s son, Gopi’s admiration, Putana’s killer, holder of Govardhan Giri, slayer of Kansa, destroyer of Kauravas, protector of Kunti’s sons and the central figure of Srimad Bhagavata PurAnam.

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Ekadashi

Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम, वरना पाप के बनेंगे भागी

Do’s and Dont’s on Ekadashi: शास्त्रों में एकादशी तिथि को बहुत पवित्र बताया गया है। इस तिथि के पुण्य फल से जीवन में कभी किसी चीज की कमी नहीं होती है और भगवान का आशीर्वाद बना रहता है। शास्त्रों में एकादशी का महत्व बताते हुए कुछ नियम भी बताए हैं। इन नियमों के अनुसार एकादशी तिथि को भूलकर भी इन कार्यों को करने से बचना चाहिए… हिंदू धर्म में सभी तिथियों में एकादशी तिथि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है और एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन किए गए उपवास, जप तप व ध्यान का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि इस पुण्य तिथि पर कुछ ऐसे कार्य हैं, जिनको वर्जित बताया गया। ऐसा करने से जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है और भगवान विष्णु की नाराजगी का भी सामना करना पड़ता है। आइए जानते हैं कि एकादशी के दिन ऐसे कौन से कार्य हैं, जिनको भूलकर भी नहीं करना चाहिए… Do not do this work on Ekadashi: एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम एकादशी तिथि पर करें यह कार्य:Do this work on Ekadashi date एकादशी के दिन रात में सोना नहीं चाहिए, यह तिथि बेहद पुण्यदायी होती है। इस तिथि को पूरी रात भगवान विष्णु के भजन गाने चाहिए, मंत्र या आरती करनी चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठकर पूरी रात जागरण करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और उनके आशीर्वाद से जीवन में उन्नति के योग बनते हैं। एकादशी तिथि पर ना करें इसका सेवन:Do not consume it on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन भूलकर भी चावल नहीं खाने चाहिए, चाहे आप उपवास ना भी रख रहे हों। धार्मिक कथाओं के अनुसार, एकादशी तिथि के दिन चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में रेंगने वाली योनि में जन्म लेता है। हालांकि अगर आप द्वादशी तिथि को चावल खाते हैं तो आपको इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है एकादशी तिथि पर ना करें ये कार्य:Do not do these things on Ekadashi date एकादशी के दिन दातुन या मंजन करना वर्जित बताया गया है। इसके साथ ही इस दिन क्रोध करना, झूठ बोलना, चुगली करना और दूसरों की बुराई करना, ऐसी चीजों से बचना चाहिए। ऐसा करने से ना केवल परिवार बल्कि पूरे समाज में सम्मान नहीं मिलता और पाप के भागी भी बनते हैं। इन सब कार्यों के करने से अच्छा है कि इस दिन भगवान विष्णु का भजन कर लें। एकादशी तिथि पर ध्यान रखें यह बात:Keep this thing in mind on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पत्तों को नहीं तोड़ना चाहिए, शास्त्रों में इसे वर्जित बताया गया है। वहीं द्वादशी तिथि को जब पारण करें तो तुलसी के पत्ते से ही करें। लेकिन उस दिन भी व्रती को तुलसी का पत्ता नहीं तोड़ना चाहिए। घर में अगर बच्चा या बुजुर्ग है, जिसने एकादशी का व्रत ना किया हो, उसको पत्ता तोड़ने के लिए द्वादशी तिथि में कहना चाहिए। एकादशी तिथि पर ना करें इन चीजों का सेवन:Do not consume these things on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनको खाने से बचना चाहिए। जैसे मसूर दाल, चना दाल, उड़द दाल, गोभी, गाजर, शलजम, पालक का साग आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इस दिन शारीरिक व मानसिक तौर पर किए जाने वाले बुरे कार्यों को करने से बचना चाहिए। शास्त्रों में एकादशी तिथि को मोक्षदायिनी तिथि कहा गया है इसलिए एकादशी तिथि के दिन इन कार्यों करने से बचना चाहिए। एकादशी तिथि पर भूलकर भी ना करें ये काम:Do not do this work even by mistake on Ekadashi date एकादशी तिथि के दिन पान खाना, चोरी करना, हिंसा करना, क्रोध करना, मैथुन, स्त्रीसंग, कपट आदि चीजों से बचना चाहिए। वहीं अगर आपसे कोई गलती हो जाए तो उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। साथ ही इनको आदत बना लेनी चाहिए, जो आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगी। शारीरिक व मानसिक तौर पर अगर आप किसी को नुकसान पहुंचाते हैं तो यह बहुत गलत है, ऐसा करने से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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Aja Ekadashi Vrat Katha

Aja Ekadashi Vrat Katha In Hindi: अजा एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा ,इसके पाठ से अश्वमेध यज्ञ का मिलता फल

Aja Ekadashi Vrat Katha in Hindi: अजा एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति दिलाने वाला है। पद्म पुराण में वर्णित अजा एकादशी की कथा के अनुसार, इस कथा का पाठ करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। अजा एकादशी का व्रत रखने वालों को इस कथा का पाठ जरुर करना चाहिए। तभी व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। Aja Ekadashi Vrat Katha Sunne Ka Fayda :अजा एकादशी की कथा सुनने से फायदा सनातन धर्म(Sanatan Dharma) में अजा एकादशी(Aja Ekadashi) का अपना महत्व है. इस दिन व्रत रखने से कई प्रकार के दुखों से राहत मिलती है. माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से इस व्रत को रखता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है. आइए जानते है Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी से जुड़ी वास्तविक कथा, जिससे पढ़ने और सुनने मात्र से आपके सभी पाप खत्म हो सकते हैं.  Aja Ekadashi Vrat Katha:अजा एकादशी की व्रत कथा, भगवान राम के पूर्वज से जुड़ी है दरासल अजा एकादशी व्रत की कथा भगवान श्रीराम (Ram) के पूर्वंज इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चन्द्र(Raja Harishchandra) की है. राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी राजा थे. जो अपने मुख से निकले वचनों और अपनी कही वाणी को पूरा करने के लिए अपनी अर्धांगिनी तारामती(Taramati) और पुत्र राहुल रोहिताश्व तक को बेच देते हैं और खुद भी एक चाण्डाल(Chanadala) की सेवा करने लग जाते हैं. अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है गौतम ऋषि(Gautam Rishi) के कहने पर राजा हरिश्चन्द्र ने Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी का व्रत किया, तब जाकर उन्हें कष्टों से छुटकारा मिला. आइए जानते हैं इस कथा को विस्तार से, जिसे भगवान श्रीकृष्ण(Shri Krishna) ने युधिष्ठिर(yudhishthir) समेत पांडवों को सुनाई थी.  Aja Ekadashi Vrat Katha: अजा एकादशी की व्रत कथा युधिष्ठिर ने कहा, “हे वासुदेव!  मैनें पुत्रदा एकादशी के बारे में सविस्तार वर्णन सुना. अब कृपा करके मुझे अजा एकादशी के बारे में विस्तार से बताएं. इस एकादशी(Ekadashi) को क्या कहते हैं और इस व्रत को करने के नियम हैं? इस व्रत को करने से किस तरह का फल मिलता है?  श्रीकृष्ण ने कहा कि, “हे कुंती पुत्र! भाद्रपद की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं. इस व्रत को करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है. इस लोक और परलोक में कल्याण करने वाली इस एकादशी व्रत के समान दुनिया में कोई दूसरा व्रत नहीं है. Aja Ekadashi Vrat Katha अब ध्यान से इस कथा को सुनिए. “पौराणिक काल में भगवान राम के वंशज में अयोध्या नगरी के राजा हरिश्चन्द्र नाम का एक राजा था. अपनी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के कारण राजा के दूर-दूर तक चर्चे थे.  एक बार सभी देवताओं ने राजा की परीक्षा लेने की योजना बनाई, राजा ने सपना देखा की ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना सारा वैभव दे दिया है. अगली सुबह राजा जब उठा तो सच में विश्वामित्र राजा के द्वार पर खड़े थे. Aja Ekadashi Vrat Katha विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से कहा, कल रात जो तुमने सपने में मुझे अपना सारा राज-पाठ दान कर दिया है.  राजा ने सत्यनिष्ठा की भावना के साथ अपनी तमाम संपत्ति विश्वामित्र को दान कर दी. दान दक्षिणा देने के लिए राजा हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्नी, बेटा और खुद को बेच दिया. राजा हरिश्चन्द्र को डोम जात के एक व्यक्ति ने खरीद लिया, जो श्मशान घाट में दाह-संस्कार का काम करवाता था. राजा हरिश्चन्द्र एक चाण्डाल के सेवक बन गए. Aja Ekadashi Vrat Katha राजा ने चाण्डाल के लिए कफन लेने का कार्य भी किया, किंतु इस आपत्तिजनक काम करने के बाद भी उन्होंने कभी सच का मार्ग नहीं छोड़ा.  इस काम को करते-करते कई वर्ष बीत जाने के बाद राजा हरिश्चन्द्र को काम पर काफी अफसोस होने लगा, और वह उसे निकालने का रास्ता तलाशने लगे. राजा हरिश्चन्द्र हर वक्त इस काम से मुक्ति के रास्ते तलाशने की कोशिश करते. एक बार राजा की मुलाकात गौतम ऋषि से हुई, राजा ने गौतम ऋषि को प्रणाम कर उन्हें अपनी दुःख-भरी बात बताई.  राजा की दुःख-भरी बातों को सुनकर गौतम ऋषि को भी दुःख हुआ और उन्होंने राजा को बताया,“हे राजन! भादो माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी आती है जिसे अजा एकादशी भी कहा जाता है. तुम उस व्रत को विधि-विधान के साथ करो और रात के वक्त जागरण भी, इससे तुम्हारे सभी तरह के पाप का नाश हो जाएगा. गौतम ऋषि इतनी बात कहकर अंतर्धान हो गए.   अजा एकादशी के आने पर राजा ने महर्षि गौतम के कहे के मुताबिक ही नियमपूर्वक व्रत और रात को जागरण किया. इस व्रत को करने से राजा को सभी पापों से मुक्ति मिल गई. उस वक्त स्वर्ग में जश्न मनाया जाने लगा फूलों की बारिश होने लगी. Aja Ekadashi Vrat Katha राजा हरिश्चन्द्र ने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देवेन्द्र देवताओं को अपने सामने पाया. राजा ने अपने मृत पुत्र और पत्नी को वस्त्रों और आभूषणों से लदा देखा.  व्रत की वजह से राजा को दोबारा उसका राज्य मिल गया, असल में एक ऋषि के द्वारा राजा की परीक्षा लेने के लिए ये सब खेल रचा गया था, लेकिन अजा एकादशी के व्रत के कारण ऋषि द्वारा रची गई माया खत्म हो गई और आखिरी वक्त में हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक में चले गए.  इस कथा को सुनने के बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा,“हे राजन! ये सब Aja Ekadashi Vrat Katha अजा एकादशी व्रत का असर था. जो भी मनुष्य इस व्रत कथा का विधि-विधान के साथ पालन करता है और रात के वक्त जागरण तो उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है और अंत में वे स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है. कहा जाता है कि इस एकादशी को करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है.

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Aja Ekadashi

Aja Ekadashi 2025 Date And Time: अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है

Aja Ekadashi: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल अजा एकादशी किस दिन पड़ रही है। Aja Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति के जीवन से दुख, दोष और संकटों को दूर करके सुख-शांति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। शास्त्रों के अनुसार अजा एकादशी का पालन करने से व्यक्ति को पूर्व जन्मों के पापों से भी मुक्ति मिलती है। इस व्रत को करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल अजा एकादशी किस दिन पड़ रही है।  सत्यनारायण व्रत 2025 में कब-कब रखा जाएगा ? अजा एकादशी 2025 तिथि और मुहूर्त: Aja Ekadashi 2025 Tithi Or Subh Muhurat एकादशी तिथि आरंभ- 18 अगस्त 2025, शाम 5:22 बजेएकादशी तिथि समाप्त- 19 अगस्त 2025, दोपहर 3:32 बजेव्रत पारण का समय (20 अगस्त को): सुबह 5:53 बजे से 8:29 बजे तकधार्मिक मान्यता है कि अजा एकादशी पर उपवास और भगवान विष्णु की भक्ति करने से जीवन के समस्त पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अजा एकादशी व्रत का महत्व: Aja Ekadashi Vrat Ka Mahetwa मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की उपासना करता है और व्रत कथा का श्रवण करता है, उसे मृत्यु के बाद विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस व्रत की कथा सुनने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल मिलता है। पूजन विधि: Pujan Vidhi

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Utkalikavallarih: उत्कलिकावल्लरीः

Utkalikavallarih: उत्कलिकावल्लरीः श्रीवृन्दारण्यविहारिणे नमः । प्रपद्य वृन्दावनमध्यमेकः क्रोशन्नसावुत्कलिकाकुलात्मा । उद्घाटयामि ज्वलतः कठोरां बाष्पस्य मुद्रां हृदि मुद्रितस्य ॥ १॥ अये वृन्दारण्य त्वरितमिह ते सेवनपराः परामापुः के वा न किल परमानन्दपदवीम् । अतो नीचैर्याचे स्वयमधिपयोरीक्षणविधे- र्वरेण्यां मे चेतस्युपदिश दिशं हा कुरु कृपाम् ॥ २॥ तवारण्ये देवि ध्रुवमिह मुरारिपोर्विहरते सदा प्रेयस्येति श्रुतिरपि विरौति स्मृतिरपि । इति ज्ञात्वा वृन्दे चरणमभिवन्दे तव कृपां कुरुष्व क्षिप्रं मे फलतु नितरां तर्षविटपी ॥ ३॥ हृदि चिरवसदाशामण्डलालम्बपादौ गुणवति तव नाथौ नाथितुं जन्तुरेषः । सपदि भवदनुज्ञां याचते देवि वृन्दे मयि किर करुणार्द्रां दृष्टिमत्र प्रसीद ॥ ४॥ दधतं वपुरंशुकन्दलीं दलदिन्दीवरवृन्दबन्धुराम् । कृतकाञ्चनकान्तिवञ्चनैः स्फुरितां चारुमरीचिसञ्चयैः ॥ ५॥ निचितं घनचञ्चलातते- रनुकूलेन दुकूलरोचिषा । मृगनाभिरुचः सनाभिना महितां मोहनपट्टवाससा ॥ ६॥ माधुरीं प्रकटयन्तमुज्ज्वलां श्रीपतेरपि वरिष्ठसौष्ठवाम् । इन्दिरामधुरगोष्ठसुन्दरी वृन्दविस्मयकरप्रभोन्नताम् ॥ ७॥ इतरजनदुर्घटोदयस्य स्थिरगुणरत्नचयस्य रोहणाद्रिम् । अखिलगुणवतीकदम्बचेतः प्रचुरचमत्कृतिकारिसद्गुणाढ्यम् ॥ ८॥ निस्तुलव्रजकिशोरमण्डली मौलिमण्डनहरिन्मणीश्वरम् । विश्वविस्फूरितगोकुलोल्लसन् नव्ययौवतवतंसमालिकाम् ॥ ९॥ स्वान्तसिन्धुमकरीकृतराधं हृन्निशाकरकुरङ्गितकृष्णाम् । प्रेयसीपरिमलोन्मदचित्तं प्रेष्ठसौरभहृतेन्द्रियवर्गाम् ॥ १०॥ प्रेममूर्तिवरकार्त्तिकदेवी कीर्तिगानमुखरीकृतवंशम् । विश्वनन्दनमुकुन्दसमज्ञा वृन्दकीर्तनरसज्ञरसज्ञाम् ॥ ११॥ नयनकमलमाधुरीनिरुद्ध व्रजनवयौवतमौलिहृन्मरालम् । व्रजपतिसुतचित्तमीनराज ग्रहणपटिष्ठविलोचनान्तजालाम् ॥ १२॥ गोपेन्द्रमित्रतनयाध्रुवधैर्यसिन्धु पानक्रियाकलससम्भववेणुनादम् । विद्यामहिष्ठमहतीमहनीयगान सम्मोहिताखिलविमोहनहृत्कुरङ्गाम् ॥ १३॥ क्वाप्यानुसङ्गिकतयोदितराधिकाख्या विस्मारिताखिलविलासकलाकलापम् । कृष्णेतिवर्णयुगलश्रवणानुबन्ध प्रादुर्भवज्जडिमडम्बरसंविताङ्गीम् ॥ १४॥ त्वां च वल्लवपुरन्दरात्मज त्वां च गोकुलवरेण्यनन्दिनि । एष मूर्ध्नि रचिताञ्जलिर्नयन् भिक्षते किमपि दुर्भगो जनः ॥ १५॥ हन्त सान्द्रकरुणासुधाझरी पूर्णमानसह्रदौ प्रसीदतम् । दुर्जनेऽत्र दिशतं रते निज प्रेक्षणप्रतिभुवश्छटामपि ॥ १६॥ श्यामयोर्नववयःसुषमाभ्यां गौरयोरमलकान्तियशोभ्याम् । क्वापि वामखिलवल्गुवतंसौ माधुरी हृदि सदा स्फुरतान् मे ॥ १७॥ सर्ववल्लववरेण्यकुमारौ प्रार्थये बत युवां प्रणिपत्य । लीलया वितरतं निजदास्यं लीलया वितरतं निजदास्यम् ॥ १८॥ प्रणिपत्य भवन्तमर्थये पशुपालेन्द्रकुमार काकुभिः । व्रजयौवतमौलिमालिका करुणापात्रमिमं जनं कुरु ॥ १९॥ भवतीमभिवाद्य चाटुभि- र्वरमूर्जेश्वरि वर्यमर्थये । भवदीयतया कृपां यथा मयि कुर्यादधिकां बकान्तकः ॥ २०॥ दिशि विदिशि विहारमाचरन्तः सह पशुपालवरेण्यनन्दनाभ्याम् । प्रणयिजनगणास्तयोः कुरुध्वं मयि करुणां बत काकुमाकलय्य ॥ २१॥ गिरिकुञ्जकुटीरनागरौ ललिते देवि सदा तवाश्रवौ । इति ते किल नास्ति दुष्करं कृपयाङ्गीकुरु मामतः स्वयम् ॥ २२॥ भाजनं वरमिहासि विशाखे गौरनीलवपुषोः प्रणयानाम् । त्वं निजप्रणयिनोर्मयि तेन प्रापयस्व करुणार्द्रकटाक्षम् ॥ २३॥ सुबल वल्लववर्यकुमारयो- र्दयितसखस्त्वमसि व्रजे । इति तयोः पुरतो विधुरं जनं क्षणममुं कृपयाद्य निवेदय ॥ २४॥ श‍ृणुत कृपया हन्त प्राणेशयोः प्रणयोद्धुराः किमपि यदयं दीनः प्राणी निवेदयति क्षणम् । प्रवणितमनाः किं युष्माभिः समं तिलमप्यसौ युगपदनयोः सेवां प्रेम्णा कदापि विधास्यति ॥ २५॥ क्व जनोऽयमतीव पामरः क्व दुरापं रतिभाग्भिरप्यदः । इयमुल्लयत्यजर्जरा गुरु- रुत्तर्षधुरा तथापि माम् ॥ २६॥ ध्वन्तब्रह्ममरालकूजितभरैरूर्जेश्वरीनूपुर क्वानैरूर्जितवैभवस्तव विभो वंशीप्रसूतः कलः । लब्धः शस्तसमस्तनादनगरीसाम्राज्यलक्ष्मीं परां आराध्यः प्रणयात् कदा श्रवणयोर्द्वन्द्वेन मन्देन मे ॥ २७॥ स्तम्भं प्रपञ्चयति यः शिखिपिञ्छमौलि वेणोरपि प्रवलयन् स्वरभङ्गमुच्चैः । नादः कदा क्षणमवाप्स्यति ते महत्या वृन्दावनेश्वरि स मे श्रवणातिथित्वम् ॥ २८॥ कस्य सम्भवति हा तदहर्वा यत्र वां प्रभुवरौ कलगीतिः । उन्नमन् मधुरिमोर्मिसमृद्धा दुष्कृतं श्रवणयोर्विधुनोति ॥ २९॥ परिमलसरणिर्वां गौरनीलाङ्गराजन् मृगमदघुसृणानुग्राहिणी नागरेशौ । स्वमहिमपरमाणुप्रावृताशेषगन्धा किमिह मम भवित्री घ्राणभृङ्गोत्सवाय ॥ ३०॥ प्रदेशिनीं मुखकुहरे विनिक्षिपन् जनो मुहुर्वनभुवि फुत्करोत्यसौ । प्रसीदतं क्षणमधिपौ प्रसीदतं दृशोः पुरः स्फुरतु तडिद्घनच्छविः ॥ ३१॥ व्रजमधुरजनव्रजावतंसौ किमपि युवामभियाचते जनोऽयम् । मम नयनचमत्कृतिं करोतु क्षणमपि पादनखेन्दुकौमुदी वाम् ॥ ३२॥ अतर्कितसमीक्षणोल्लसितया मुदा श्लिष्यतो- र्निकुञ्जभवनाङ्गने स्फुरितगौरनीलाङ्गयोः । रुचः प्रचुरयन्तु वां पुरटयूथिकामञ्जरी विराजदलिरम्ययोर्मम चमत्कृतिं चक्षुषोः ॥ ३३॥ साक्षात्कृतिं बत ययोर्न महत्तमोऽपि कर्तुं मनस्यपि मनाक् प्रभुतामुपैति । इच्छन्नयं नयनयोः पथि तौ भवन्तौ जन्तुर्विजित्य निजगार भियं ह्रियं च ॥ ३४॥ अथवा मम किं नु दूषणं बत वृन्दावनचक्रवर्तिनौ । युवयोर्गुणमाधुरी नवा जनमुन्मादयतीव कं न वा ॥ ३५॥ अहह समयः सोऽपि क्षेमो घटेत नरस्य किं व्रजनटवरौ यत्रोद्दीप्ता कृपासुधयोज्ज्वला । कृतपरिजनश्रेणिचेतश्चकोरचमत्कृति- र्व्रजति युवयोः सा वक्त्रेन्दुद्वयी नयनाध्वनि ॥ ३६॥ प्रियजनकृतपार्ष्णिग्राहचर्योन्नताभिः सुगहनघटनाभिर्वक्रिमाडम्बरेण । प्रणयकलहकेलिक्ष्वेलिभिर्वामधीशौ किमिह रचयितव्यः कर्णयोर्विस्मयो मे ॥ ३७॥ निभृतमपहृतायामेतया वंशिकायां दिशि दिशि दृशमुत्कां प्रेर्य सम्पृच्छमानः । स्मितशवलमुखीभिर्विप्रलब्धः सखीभि- स्त्वमघहर कदा मे तुष्टिमक्ष्णोर्विधत्से ॥ ३८॥ क्षतमधरदलस्य स्वस्य कृत्वा त्वदाली कृतमिति ललितयां देवि कृष्णे ब्रुवाणे । स्मितशवलदृगन्ता किञ्चिदुत्तम्भितभ्रू- र्मम मुदमुपधास्यत्यास्यलक्ष्मीः कदा ते ॥ ३९॥ कथमिदमपि वाञ्छितुं निकृष्टः स्फुटमयमर्हति जन्तुरुत्तमार्हम् । गुरुलघुगणनोज्झितार्तनाथौ जयतितरामथवा कृपाद्युतिर्वाम् ॥ ४०॥ वृत्ते दैवाद् व्रजपतिसुहृन्नन्दिनीविप्रलम्भे संरम्भेणोल्ललित ललिताशङ्कयोद्भ्रान्तनेत्रः । त्वं शारीभिः समयपटुभिर्द्राग् उपालभ्यमानः कामं दामोदर मम कदा मोदमक्ष्णोर्विधाता ॥ ४१॥ रासारम्भे विलसति परित्यज्य गोष्ठाम्बुजाक्षी वृन्दं वृन्दावनभुवि रहः केशवेनोपनीय । त्वां स्वाधीनप्रियतमपदप्रापणेनार्चिताङ्गीं दूरे दृष्ट्वा हृदि किमचिरादर्पयिष्यामि दर्पम् ॥ ४२॥ रम्या शोणद्युतिभिरलकैर्यावकेनोर्जदेव्याः सद्यस्तन्द्रीमुकुलदलसक्लान्तनेत्रा व्रजेश । प्रातश्चन्द्रावलीपरिजनैः साचि दृष्टा विवर्णै- रास्यश्रीस्ते प्रणयति कदा सम्मदं मे मुदं च ॥ ४३॥ व्यात्युक्षीरभसोत्सवेऽधरसुधापानग्लहे प्रस्तुते जित्वा पातुमथोत्सुकेन हरिणा कण्ठे धृतायाः पुरः । ईषच्छोणिममीलिताक्षमनृजुभ्रूवल्लिहेलोन्नतं प्रेक्षिष्ये तव सस्मितं सरुदितं तद् देवि वक्त्रं कदा ॥ ४४॥ आलीभिः सममभुपेत्य शनकैर्गान्धर्विकायां मुदा गोष्ठाधीशकुमार हन्त कुसुमश्रेणीं हरन्त्यां तव । प्रेक्षिष्ये पुरतः प्रविश्य सहसा गूढस्मितास्यं बलाद् आच्छिन्दानमिहोत्तरीयमुरसस्त्वां भानुमत्याः कदा ॥ ४५॥ उदञ्चति मधूत्सवे सहचरीकुलेनाकुले कदा त्वमवलोक्यसे व्रजपुरन्दरस्यात्मज । स्मितोज्ज्वलमदीश्वरीचलदृगञ्चलप्रेरणान् निलीनगुणमञ्जरीवदनमत्र चुम्बन् मया ॥ ४६॥ कलिन्दतनयातटिवनविहारतः श्रान्तयोः स्फुरन्मधुरमाधवीसदनसीम्नि विश्राम्यतोः । विमुच्य रचयिष्यते स्वकचवृन्दमत्रामुना जनेन युवयोः कदा पदसरोजसन्मार्जनम् ॥ ४७॥ परिमिलदुपबर्हं पल्लवश्रेणिभिर्वां मदनसमरचर्याभारपर्याप्तमत्र । मृदुभिरमलपुष्पैः कल्पयिष्यामि तल्पं भ्रमरयुजि निकुञ्जे हा कदा कुञ्जराजौ ॥ ४८॥ अलिद्युतिभिराहृतैर्मिहिरनन्दिनीनिर्झरात् पुरः पुरटझर्झरीपरिभृतैः पयोभिर्मया । निजप्रणयिभिर्जनैः सह विधास्यते वां कदा विलासशयनस्थयोरिह पदाम्बुजक्षालन ॥ ४९॥ लीलातल्पे कलितवपुषोर्व्यावहासीमनल्पां स्मित्वा स्मित्वा जयकलनया कुर्वतोः कौतुकाय । मध्ये कुञ्जं किमिह युवयोः कल्पयिष्याम्यधीशौ सन्धारम्भे लघु लघु पदाम्भोजसंवाहनानि ॥ ५०॥ प्रमदमदनयुद्धारम्भसम्भावुकाभ्यां प्रमुदितहृदयाभ्यां हन्त वृन्दावनेशौ । किमहमिह युवाभ्यां पानलीलोन्मुखाभ्यां चषकमुपहरिष्ये साधु माध्वीकपूर्णम् ॥ ५१॥ कदाहं सेविष्ये व्रततिचमरीचामरमरुद् विनोदेन क्रीडाकुसुमशयने न्यस्तवपुषौ । दरोन्मीलन्नेत्रौ श्रमजलकणक्लिद्यदलकौ ब्रुवाणावन्योन्यं व्रजनवयुवानाविह युवाम् ॥ ५२॥ च्युतशिखरशिखण्डं किञ्चिदुत्स्रंसमानां विलुठदमलपुष्पश्रेणिमुन्मुच्य चूडाम् । दनुजदमन देव्याः शिक्षया ते कदाहं कमलकलितकोटिं कल्पयिष्यामि वेणीम् ॥ ५३॥ कमलमुखि विलासैरंसयोः स्रंसितानां तुलितशिखिकलापं कुन्तलानां कलापम् । तव कवरतयाविर्भाव्य मोदात् कदाहं विकचविचकिलानां मालयालङ्करिष्ये ॥ ५४॥ मिथःस्पर्धाबद्धे बलवति वलत्यक्षकलहे व्रजेश त्वां जित्वा व्रजयुवतिधम्मिल्लमणिना । दृगन्तेन क्षिप्ताः पणमिह कुरङ्गं तव कदा ग्रहीष्यामो बद्धा कलयति वयं तत्प्रियगणे ॥ ५५॥ किं भविष्यति शुभः स वासरो यत्र देवि नयनाञ्चलेन माम् । गर्वितं विहसितुं नियोक्ष्यसे द्यूतसंसदि विजित्य माधवम् ॥ ५६॥ किं जनस्य भवितास्य तद् दिनं यत्र नाथ मुहुरेनमादृतः । त्वं व्रजेश्वरवयस्यनन्दिनी मानभङ्गविधिमर्थयिष्यसे ॥ ५७॥ त्वदादेशं शारीकथितमहमाकर्ण्य मुदितो वसामि त्वत्कुण्डोपरि सखि विलम्बस्तव कथम् । इतीदं श्रीदामस्वसरि मम सन्देशकुसुमं हरेति त्वं दामोदर जनममुं नोत्स्यसि कदा ॥ ५८॥ शठोऽयं नावेक्ष्य पुनरिह मया मानधनया विशन्तं स्त्रीवेशं सुबलसुहृदं वारय गिरा । इदं ते साकूतं वचनमवधार्योच्छलितधीश्- छलाटोपैर्गोपप्रवरमवरोत्स्यामि किमहम् ॥ ५९॥ अघहर बलीवर्दः प्रेयान्नवस्तव यो व्रजे वृषभवपुषा दैत्येनासौ बलादभियुज्यते । इति किल मृषागीर्भिश्चन्द्रावलीनिलयस्थितं वनभुवि कदा नेष्यामि त्वां मुकुन्द मदीश्वरीम् ॥ ६०॥ निगिरति जगदुच्चैः सूचिभेद्ये तमिस्रे भ्रमररुचिनिचोलेनाङ्गमावृत्य दीप्तम् । परिहृतमणिकाञ्चीनूपुरायाः कदाहं तव नवमभिसाऋअं काऋअयिष्यामि देवि ॥ ६१॥ आस्ये देव्याः कथमपि मुदा न्यस्तमास्यात् त्वयेश क्षिप्तं पर्णे प्रणयजनिताद् देवि वाम्यात् त्वयाग्रे । आकूतज्ञस्तदतिनिभृतं चर्वितं खर्विताङ्ग- स्ताम्बूलीयं रसयति जनः फुल्लरोमा कदायम् ॥ ६२॥ परस्परमपश्यतोः प्रणयमानिनोर्वां कदा धृतोत्केलिकयोरपि स्वमभिरक्षतोराग्रहम् । द्वयोः स्मितमुदञ्चये नुदसि किं मुकुन्दामुना दृगन्तनटनेन मामुपरमेत्यलीकोक्तिभिः ॥ ६३॥ कदाप्यवसरः स मे किमु भविष्यति स्वामिनौ जनोऽयमनुरागतः पृथुनि यत्र कुञ्जोदरे । त्वया सह तवालिके विविधवर्णगन्धद्रव्यैश्- चिरं विरचयिष्यति प्रकटपत्रवल्लीश्रियम् ॥ ६४॥ इदं सेवाभाग्यं भवति सुलभं येन युवयोश्- छटाप्यस्य प्रेम्णः स्फुरति नहि सुप्तावपि मम । पदार्थेऽस्मिन् युष्मद्व्रजमनु निवासेन जनित- स्तथाप्याशाबन्धः परिवृढवरौ मां द्रढयति ॥ ६५॥ प्रपद्य भवदीयतां कलितनिर्मलप्रेमभि- र्महद्भिरपि काम्यते किमपि यत्र तार्णं

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Krishnamangalam

Udupi shrIkRiShNa suprabhAtam: उडुपि श्रीकृष्ण सुप्रभातम्

Udupi shrIkRiShNa suprabhAtam: उडुपि श्रीकृष्ण सुप्रभातम् Udupi shrIkRiShNa suprabhAtam: उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥॥नारायणाखिल शरण्य रथाङ्ग पाणे ।प्राणायमान विजयागणित प्रभाव ।गीर्वाणवैरि कदलीवन वारणेन्द्र ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १॥उत्तिष्ठ दीन पतितार्तजनानुकम्पिन् ।उत्तिष्ठ विश्व रचना चतुरैक शिल्पिन् ।उत्तिष्ठ वैष्णव मतोद्भव धामवासिन् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २॥उत्तिष्ठ पातय कृपामसृणान् कटाक्षान् ।उत्तिष्ठ दर्शय सुमङ्गल विग्रहन्ते ।उत्तिष्ठ पालय जनान् शरणं प्रपन्नान् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३॥उत्तिष्ठ यादव मुकुन्द हरे मुरारे ।उत्तिष्ठ कौरवकुलान्तक विश्वबन्धो ।उत्तिष्ठ योगिजन मानस राजहंस ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ४॥उत्तिष्ठ पद्मनिलयाप्रिय पद्मनाभ ।पद्मोद्भवस्य जनकाच्युत पद्मनेत्र ।उत्तिष्ठ पद्मसख मण्डल मध्यवर्तिन् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ५॥मध्वाख्यया रजतपीठपुरेवतीर्णः ।त्वत्कार्य साधनपटुः पवमान देवः ।मूर्तेश्चकार तव लोकगुरोः प्रतिष्ठाम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ६॥सन्यास योगनिरताश्रवणादिभिस्त्वाम् ।भक्तेर्गुणैर्नवभिरात्म निवेदनान्तैः ।अष्टौयजन्ति यतिनो जगतामधीशम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ७॥या द्वारकापुरि पुरातव दिव्यमूर्तिः ।सम्पूजिताष्ट महिषीभिरनन्य भक्त्या ।अद्यार्चयन्ति यतयोष्टमठाधिपास्ताम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ८॥वामेकरे मथनदण्डमसव्य हस्ते ।गृह्णंश्च पाशमुपदेष्टु मना इवासि ।गोपालनं सुखकरं कुरुतेति लोकान् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ९॥सम्मोहिताखिल चराचररूप विश्व ।श्रोत्राभिराममुरली मधुरारवेण ।आधायवादयकरेण पुनश्चवेणुम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १०॥गीतोष्णरश्मिरुदयन्वहनोदयाद्रौ ।यस्याहरत्सकललोकहृदान्धकारम् ।सत्वं स्थितो रजतपीठपुरे विभासी ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ११॥कृष्णेति मङ्गलपदं कृकवाकुवृन्दम् ।वक्तुं प्रयत्य विफलं बहुशः कुकूकुः ।त्वां सम्प्रबोधयितुमुच्चरतीतिमन्ये ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १२॥भृङ्गापिपासव इमे मधु पद्मषन्दे ।कृष्णार्पणं सुमरसो स्वितिहर्षभाजः ।झङ्कार राव मिषतः कथयन्ति मन्ये ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १३॥निर्यान्ति शावक वियोगयुता विहङ्गाः ।प्रीत्यार्भकेशु च पुनः प्रविशन्ति नीडम् ।धावन्ति सस्य कणिकानुपचेतु मारात् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १४॥भूत्वातिथिः सुमनसामनिलः सुगन्धम् ।सङ्गृह्यवाति जनयन् प्रमदं जनानाम् ।विश्वात्मनोर्चनधियातव मुञ्च निद्राम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १५॥तारालि मौक्तिक विभूषण मण्डिताङ्गी ।प्राचीदुकूल मरुणं रुचिरं दधान ।खेसौखसुप्तिक वधूरिव दृश्यतेद्य ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १६॥आलोक्य देह सुषमां तव तारकालिः ।ह्रीणाक्रमेण समुपेत्य विवर्णभावम् ।अन्तर्हितेवनचिरात्यज शेषशय्याम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १७॥साध्वीकराब्जवलयध्वनिनासमेतो ।गानध्वनिः सुदधि मन्थन घोष पुष्टः ।संश्रूयते प्रतिग्रहं रजनी विनष्टा ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १८॥भास्वानुदेश्यति हिमांशुर भूद्गतश्रीः ।पूर्वान्दिशामरुणयन् समुपैत्यनूरुः ।आशाः प्रसाद सुभगाश्च गतत्रियामा ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ १९॥आदित्य चन्द्र धरणी सुत रौहिणेय ।जीवोशनः शनिविधुं तुदकेतवस्ते ।दासानुदास परिचारक भृत्य भृत्य ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २०॥इन्द्राग्नि दण्डधर निर्रिति पाशिवायु ।वित्तेश भूत पतयो हरितामधीशाः ।आराधयन्ति पदवी च्युति शङ्कया त्वाम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २१॥वीणां सती कमलजस्य करे दधाना ।तन्त्र्यागलस्य चरवे कलयन्त्य भेदम् ।विश्वं निमज्जयति गानसुधारसाब्धौ ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २२॥देवर्षिरंबर तलादवनीं प्रपन्नः ।त्वत्सन्निधौ मधुरवादित चारु वीणा ।नामानिगायति नत स्फुरितोत्तमाङ्गो ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २३॥वातात्मजः प्रणत कल्प तरुर्हनूमान् ।द्वारे कृताञ्जलि पुटस्तवदर्शनार्थी ।तिष्ठत्यमुं कुरुकृतार्थमपेत निद्रम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २४॥सर्वोत्तमो हरिरिति श्रुतिवाक्य वृन्दैः ।चन्द्रेश्वर द्विरदवक्त्र षडाननाद्याः ।उद्घोशयन्त्य निमिषा रजनी प्रभात ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २५॥मध्वाभिदे सरसि पुण्यजले प्रभाते ।गङ्गेंभ सर्वमघमाशु हरेति जप्त्वा ।मज्जन्ति वैदिक शिखामणयो यथावन् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २६॥द्वारे मिलन्ति निगमान्त विदस्त्रयीज्ञाः ।मीमांसकाः पदविदोनयदर्शनज्ञाः ।गान्धर्ववेद कुशलाश्च तवेक्षणार्थम् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २७॥श्री मध्वयोगि वरवन्दित पादपद्म ।भैष्मी मुखांभोरुह भास्कर विश्ववन्द्य ।दासाग्रगण्य कनकादिनुत प्रभाव ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २८॥पर्याय पीठ मधिरुह्य मठाधिपास्त्वाम् ।अष्टौ भजन्ति विधिवत् सततं यतीन्द्राः ।श्री वादिराजनियमान् परिपालयन्तो ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ २९॥श्रीमन्ननन्त शयनोडुपिवास शौरे ।पूर्णप्रबोध हृदयांबर शीत रश्मे ।लक्ष्मीनिवास पुरुषोत्तम पूर्णकाम ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३०॥श्री प्राणनाथ करुणा वरुणालयार्त ।सन्त्राण शौन्द रमणीय गुणप्रपूर्ण ।सङ्कर्षणानुज फणीन्द्र फणा वितान ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३१॥आनन्दतुन्दिल पुरन्दर पूर्वदास ।वृन्दाभिवन्दित पदांबुजनन्द सूनो ।गोविन्द मन्दरगिरीन्द्र धरांबुदाभ ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३२॥मीनाकृते कमठरूप वराहमूर्ते ।स्वामिन् नृसिंह बलिसूदन जामदग्न्यः ।श्री राघवेन्द्र यदुपुङ्गव बुद्ध कल्किन् ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३३॥गोपाल गोप ललनाकुलरासलीला ।लोलाभ्रनील कमलेश कृपालवाल ।कालीयमौलि विलसन्मणिरञ्जिताङ्घ्रे ।मध्वेश कृष्ण भगवन् तव सुप्रभातम् ॥ ३४॥कृष्णस्य मङ्गल निधेर्भुवि सुप्रभातम् ।येहर्मुखे प्रतिदिनं मनुजाः पठन्ति ।विन्दन्ति ते सकल वाञ्छित सिद्धिमाशु ।ज्ञानञ्च मुक्ति सुलभं परमं लभन्ते ॥ ३५॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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Puja Path Tips

Puja Path Tips: पूजा के बाद भूल से भी न करें ये काम, वरना मिल सकते हैं विपरीत परिणाम

Puja Path Tips: अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  जब घर में पूजा होती है, तो वातावरण में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह समय न केवल आत्मिक शुद्धि के लिए, बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सभी नियमों के पालन करते हुए पूजा पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। लेकिन कई बार लोग अनजाने में पूजा के ठीक बाद कुछ ऐसे काम कर लेते हैं, Puja Path Tips जो इस ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी पूजा सफल और फलदायी हो, तो इन बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं पूजा करने के बाद किन कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।  Puja Path Tips:मंदिर की सही दिशा इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि आपका मंदिर वास्तु के अनुसार, सही दिशा में होना चाहिए, तभी आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। वास्तु के अनुसार, मंदिर हमेशा घर की उत्तर-पूर्व या फिर पूर्व दिशा में होना चाहिए। Puja Path Tips इन दिशाओं का ध्यान न रखने पर वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है, जिस कारण पूजा-पाठ सफल नहीं होता। इस बात का जरूर रखें ध्यान हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, आप पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब आप पूजा-पाठ के दौरान स्वच्छता और पवित्रता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें, इसलिए हमेशा स्नान करने और सुथरे कपड़े कपड़े पहनने के बाद ही Puja Path Tips पूजा-पाठ आरंभ करें। इसी के साथ मन की स्वच्छता का भी ख्याल रखना जरूरी है। इस बात का खासतौर से ध्यान रखें कि भगवान की उपासना के दौरान आपके मन में बुरे ख्याल न आएं। किस समय करें पूजा हिंदू शास्त्रों में पूजा के लिए उत्तम समय भी बताया गया है, जो ब्रह्म मुहूर्त और सूर्यास्त का समय है। दोपहर का समय भगवान के विश्राम का समय माना जाता है, इसलिए इस दौरान पूजा-अर्चना न करें, वरना आपको इसका कोई फल नहीं मिलता। Puja Path Tips साथ ही आपका मंदिर ऐसे स्थान पर होना चाहिए, जहां आप शांति से बैठकर भगवान का ध्यान कर सकें और किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। इन सभी बातों का ध्यान रखने पर आपको पूजा का पूर्ण फल मिल सकता है। कटु शब्द न बोलें पूजा के तुरंत बाद अगर आप किसी को अपशब्द कहते हैं या कोसते हैं, तो इसका नकारात्मक प्रभाव सामने आ सकता है। पूजा के दौरान और पूजा के बाद भी अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। मांस और मदिरा का सेवन पूजा के बाद शरीर और मन दोनों पवित्र अवस्था में होते हैं। Puja Path Tips ऐसे में मांस या शराब का सेवन करना आध्यात्मिक रूप से अनुचित माना जाता है। ऐसा करने से आपकी पूजा विफल हो सकती है। बाल और नाखून न काटें यह समय ऊर्जा से भरा होता है, ऐसे में बाल या नाखून काटना शुभ नहीं माना जाता। इससे सकारात्मक ऊर्जा में कमी आ सकती है। अपमान न करें पूजा के बाद यदि आप किसी का अपमान करते हैं या रूखा व्यवहार करते हैं, तो इससे पूजा का फल क्षीण हो सकता है। Puja Path Tips इसलिए आपको नम्रता बनाए रखनी है। साधु-संतों का निरादर न करें अगर पूजा के समय कोई संत या साधु आपके घर आता है, तो उनका आदर करना चाहिए है। उन्हें अनदेखा करना या दरवाजे से लौटा देना अशुभ माना जाता है। भोग ग्रहण न करें ईश्वर को अर्पित भोग को थोड़ी देर बाद ही श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिए। इसे तुरंत खाने से उसका आध्यात्मिक महत्व घट जाता है। नमक युक्त भोजन न करें मान्यता है कि पूजा के बाद नमक वाला खाना खाने से शरीर की ऊर्जात्मक अवस्था बिगड़ सकती है। इस समय हल्का और सात्त्विक भोजन ही खाना चाहिए। तुरंत पैर न धोएं पूजा के बाद कुछ समय तक उस ऊर्जा को अपने अंदर समाहित रहने दें। इसलिए कहा जाता है कि पूजा के तुरंत स्नान या पैर धोने  से बचना चाहिए। ऐसा करने से उसका प्रभाव कम हो सकता है।

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Janmashtami

Janmashtami 2025 Date: जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व Janmashtami: हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण दिवस, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति व आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से बाल गोपाल प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। तो आइए जानते हैं जन्माष्टमी 2025 की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और इससे जुड़े महत्वपूर्ण नियम: Janmashtami 2025 Date and auspicious time:जन्माष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल जन्माष्टमी Janmashtami का पर्व 16 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि का आरंभ: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 15 अगस्त को देर रात 11 बजकर 48 मिनट पर आरंभ होगी। अष्टमी तिथि का अंत: अष्टमी तिथि का समापन 16 अगस्त को रात 09 बजकर 35 मिनट पर होगा। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, इसलिए उनका जन्मोत्सव मध्य रात्रि में ही मनाया जाता है। पूजा का शुभ मुहूर्त: जन्माष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त 16 अगस्त को रात्रि 12:05 से लेकर 12:45 तक रहेगा। निशिता मुहूर्त भी रात 12 बजकर 04 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तक है। शुभ योग: इस साल जन्माष्टमी के दिन सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। Janmashtami Ka Dharmik Mahetwa: जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगरी में राजकुमारी देवकी और उनके पति वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल के रूप में उनकी मूर्ति का पूजन करना शुभ होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति कृष्णजन्माष्टमी Janmashtami का व्रत रखकर पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण की आराधना करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को अक्षय पुण्य (कभी न खत्म होने वाला पुण्य) प्राप्त होता है। इस दिन लोग भजन-कीर्तन करते हैं और मंदिरों को विशेष तौर पर सजाया जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दिन दही हांडी का आयोजन भी किया जाता है, जो भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं का प्रतीक है। Janmashtami Vrat ke Niyam or Puja Vidhi: जन्माष्टमी व्रत के नियम और पूजा विधि जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत शुभ व फलदायी माना गया है, और इसका पालन नियम पूर्वक करना चाहिए। Janmashtami Vrat Kaise Kare: जन्माष्टमी व्रत कैसे करें 1. व्रत का संकल्प: जन्माष्टमी Janmashtami के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. बाल गोपाल का श्रृंगार: इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विधिवत श्रृंगार करें। 3. मध्य रात्रि पूजा: आधी रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा करें। 4. भोग और आरती: भगवान श्रीकृष्ण को मखाने, मिश्री, मक्खन और तुलसी दल का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारें। 5. प्रसाद वितरण और व्रत पारण: परिवारजनों में प्रसाद को वितरित करें और फिर व्रत का पारण करें।     कुछ भक्त व्रत रात 12 बजे तक करते हैं, जबकि कुछ अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं। Krishna Janmashtami Vrat Ke Mahetwa Purn Niyam: कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के महत्वपूर्ण नियम ब्रह्मचर्य का पालन: व्रती को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। अन्न वर्जित: इस दिन अन्न ग्रहण करने की मनाही होती है। दिन में सोना मना: व्रत रखने वालों को दिन में नहीं सोना चाहिए। वाद-विवाद से दूर: इस दिन वाद-विवाद से दूर रहना चाहिए और अपशब्द नहीं बोलने चाहिए। गौ सेवा: इस दिन गौ सेवा करना अत्यंत शुभ माना गया है। दान: व्रत करने वालों को अन्न, धन व वस्त्र का दान करना चाहिए। जन्माष्टमी का पावन पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए!

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Kali Jayanti

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती 2025: माँ काली के पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास (पूर्णिमा भाद्रपद माह) की कृष्ण अष्टमी के दिन मनाई जाती है। देवी काली दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या हैं और काली कुल से संबंधित हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, देवी महाकाली के विभिन्न सौम्य और उग्र रूपों को दस महाविद्याओं के रूप में जाना जाता है। देवी महाकाली भगवान शिव के महाकाल रूप की शक्ति हैं। ब्रह्मनील तंत्र में मिले वर्णन के अनुसार, देवी काली दो रूपों में विद्यमान हैं, लाल और काली। काले रंग की काली को दक्षिणा और लाल रंग की काली को सुंदरी कहा जाता है। देवी का रंग काजल के समान काला होने के कारण, वे काली के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुईं। Kali Jayanti tithi:काली जयन्ती तिथि काली जयन्ती शुक्रवार, अगस्त 15, 2025 कोनिशिता पूजा समय – 12:04 AM से 12:47 AM अगस्त 16अवधि – 00 घण्टे 43 मिनट्स अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 15, 2025 को 11:49 PM बजेअष्टमी तिथि समाप्त – अगस्त 16, 2025 को 09:34 PM बजे

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श्री हयग्रीव (हयग्रीव) स्तोत्रम् – Hayagriva

हयग्रीव अवतार का वर्णन 1. स्कन्द पुराण (Skanda Purana) स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है कि जब मधु और कैटभ नामक दो असुर वेदों को चुरा कर पाताल में ले गए, तब ब्रह्माजी चिंतित हुए और भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों की रक्षा की। ❝हयग्रीव रूपं कृत्वा वेदान्स्तान्पुनराहृतान्।❞(स्कन्द पुराण, वैष्णव खण्ड)➤ अर्थात: विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर वेदों को असुरों से वापस लाया। श्री हयग्रीव की पौराणिक कथा प्राचीन ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, जब प्रलय काल आया, तब समस्त सृष्टि अंधकार में डूब गई। चारों ओर विनाश, जल और अज्ञान का साम्राज्य फैल गया। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने अनिरुद्ध रूप में योगनिद्रा में जल पर विश्राम किया और सृष्टि के पुनर्निर्माण का चिंतन किया। ब्रह्मा की उत्पत्ति और वेदों की चोरी विष्णु जी की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। उन्होंने सृष्टि रचने के लिए चार वेदों (ऋग, यजुर, साम और अथर्व) की रचना की।लेकिन तभी कमल के नीचे की दो जल बूंदें दो असुरों — मधु और कैटभ में परिवर्तित हो गईं। वे पाताल लोक से होते हुए कमल के तने में घुस आए और चारों वेदों को चुरा कर ले गए। शोकाकुल ब्रह्मा जी ने श्रीविष्णु से सहायता मांगी। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया — एक अद्वितीय रूप जिसमें शरीर मानव का और मुख घोड़े का था। हयग्रीव अवतार का कार्य श्री हयग्रीव की कथा श्री हयग्रीव ज्ञान के देवता हैं। हय का अर्थ है घोड़ा और ग्रीव का अर्थ है गर्दन। श्री हयग्रीव भगवान विष्णु के अवतार हैं। श्री हयग्रीव परम वासुदेव के अवतार हैं, जिन्होंने प्रलय (विनाश) के दौरान यह रूप धारण किया था, और प्रकृति के सभी स्रोत अंधकार में डूबे हुए थे। मनुष्य और जीव भी अंधकार के भंवर में फँस गए और कष्ट सहने लगे। भगवान विष्णु ने अनिरुद्ध के रूप में अवतार लिया और घूमते हुए जल पर योग निद्रा में विश्राम किया। उन्होंने अंधकार की गहराइयों से जीवन को बचाने और एक नई दुनिया बनाने के तरीके पर चिंतन किया। फिर उन्होंने अपनी नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्म देव की रचना की और उन्हें चारों वेदों के साथ-साथ सृष्टि के जटिल विवरणों की शिक्षा दी। ब्रह्मा की रचना से पहले, कमल के फूल के नीचे पत्ते पर पानी की दो बूँदें थीं। वे दो बूँदें दो असुर बन गईं – मधु और कैटभ, जो तने के माध्यम से कमल के फूल में प्रवेश कर गए। ब्रह्मा ने चार सुंदर बालकों के रूप में चार वेदों की रचना पूरी की ही थी कि असुरों ने उन शिशुओं को छीन लिया और पाताल लोक भाग गए। शोकाकुल ब्रह्मा विष्णु के अवतार श्री हयग्रीव के पास गए, जिन्होंने तब आंशिक रूप से मानव और आंशिक रूप से अश्व अवतार धारण किया था। उन्होंने वेदों को पुनः प्राप्त किया और वेदों के माध्यम से ब्रह्मा देव को सृष्टि के रहस्यों का पुनः ज्ञान दिया। एक अन्य किंवदंती के अनुसार भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप में वेदों की रचना की थी और यह अवतार उनके मत्स्य अवतार से पहले का है। श्री हयग्रीव स्तोत्रम् 1) श्रीमान् वेङकटनाथार्यः कवितार्किककेसरी। वेदान्त्वर्यो मे सन्निधत्तं सदा हृदि ॥ ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्। आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवम् उपस्महे ॥ ॥ श्रीमन् वेंकटनार्थये कविताकिर्ककेसरी वेदांताचार्यवर्यो मे सन्निधातम सदा ह्रदि | ज्ञानानन्द मयाम् देवम् निर्मलस्पथिकाकृतिम | अधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवं उपासमहे || 1 || ज्ञान के साकार स्वरूप, परम पुरुष श्री हयग्रीव का ध्यान करो। श्री हयग्रीव ज्ञान और आनंद के समन्वित स्वरूप हैं। जिनका मुख और गर्दन अश्व के समान है और जिनका शरीर शुद्ध श्वेत स्फटिक के समान दीप्तिमान और दीप्तिमान है, वे समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता हैं। वे समस्त ज्ञान के आदि देव हैं। 2) स्वतःसिद्धं शुद्धस्फटिकमणि भूभृतप्रतिभातं सुधासाध्रीचिभिर धुतिभिर अवदात्तत्रिभुवनम्। अनन्तैस्त्रयन्तैर् अनुविहित हेषा हलहलं सत्येशावद्यं ह्यवदं मादि मही महः ॥ 2॥ स्वतससिद्धं शुद्धस्फटिकमनि भूभृतप्रतिभातं सुधा साध्रिचिभिर धुतिभिर अवदातात्रिभुवनम् | अनन्तैस्त्रयन्तैर अनुविहिता हेषा हलाहलम् हताशेषावाद्यं हयवदान मीदि मही महः || 2 || अपने भक्तों के सांसारिक कष्टों को दूर करने के लिए अवतरित हुए तेजस्वी श्री हयग्रीव की महिमा का गान करो। उनकी शुभ छवि शुद्ध श्वेत स्फटिक के समान है। श्री हयग्रीव अपनी अमृतमयी श्वेत किरणों से तीनों लोकों को श्वेत और पवित्र बनाते हैं। वे तीनों लोकों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। उनके अश्व रूप से निकलने वाली हला हला ध्वनि एक हिनहिनाहट है जिसमें उपनिषदों का सार और उनके पैरों में अलंकरणों के स्वर समाहित हैं। वेदों में भी यह हिनहिनाहट निरंतर प्रतिध्वनित होती है। श्री हयग्रीव की हिनहिनाहट, ‘हष हला हलम’, अशुभता और पापों के साथ-साथ व्यक्ति के मार्ग की बाधाओं को भी दूर करती है। श्री हयग्रीव से प्रार्थना करें कि वे दुर्भाग्य को दूर करें और उनकी शुभ हिनहिनाहट सुनने की क्षमता प्राप्त करें जो सांसारिक कष्टों के लिए सुखदायक मरहम का काम करती है। 3) समाहारअस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्युहानां लावि वितिर्बोधजलधेः। कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं हृत्वंतर्ध्वन्तं ह्यवदं हेषा हलहलाः ॥ 3 ॥ समाहारस्सनाम प्रतिपदमृचं धाम यजुषां लयः प्रत्यूहनं लहरी वित्तिर्बोधजलधेः | कथा दर्पक्षुभ्यत् कथककुल कोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वन्तं हयवदना हेषा हलाहलः || 3 || श्री हयग्रीव के दिव्य कंठ से निकलने वाली हला हला की ध्वनियाँ सामवेदों का संग्रह, ऋग्वेद का संक्षिप्त अर्थ और यजुर्वेद की वाणी का सार हैं। श्री हयग्रीव का स्वरूप ही मंत्रों का सार है क्योंकि वे उनमें समाहित हैं। हया हया ध्वनियाँ उन सभी बाधाओं का निवारण करती हैं जो किसी भी व्यक्ति को शुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में आती हैं। वे सच्चे ज्ञान के सागर से उठती अविरल लहरों के समान हैं। वे ज्ञान का दीप जलाती हैं और मोक्ष की ओर हमारे मार्ग को प्रकाशित करती हैं। हल हल ध्वनि की ध्वनियाँ ही वेदों के सत्य को विकृत करने वाले व्यर्थ के तर्कों से उत्पन्न आंतरिक अंधकार और भ्रम को दूर करती हैं। निर्दोष और कमजोर लोगों को उन समर्थकों के शोर से बचाया जाता है जो अपने भ्रामक मतों का समर्थन करते हैं। हिनहिनाहट की दिव्य ध्वनियाँ हमारी चेतना और सिद्धांतों की वास्तविक समझ को अवरुद्ध करने वाले काले बादलों को नष्ट करती हैं, और हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करती हैं। 4) प्राची संध्या काचिदन्तर निश्चयः प्रज्ञादृष्टेर्जन श्रीपूर्वा। वक्त्री वेदान भातु मे वाजि वक्त्रा वाशाख्य वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ 4 ॥ प्राची

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Shri Hayagriva Stotram – श्रीहयग्रीवस्तोत्रं

श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥ स्वतःसिद्धं शुद्धस्फटिकमणिभूभृत्प्रतिभटं सुधासध्रीचीभिः द्युतिभिरपतापतिभुवनम् । अनन्तैः त्रय्यन्तैरनुविदितहेषाहलहलं हताशेषावद्यं हयवदनमीडीमहि वहः ॥ व्याख्यानं इन्दिरामन्दिरोरस्कमिन्दादिसुरवन्दितम्- वन्दारुबृन्दमन्दारं वन्दे गोविन्दबालकम् ॥ १॥ कन्दर्पसंवराकारं बृन्दावनविभूषणम् । आनन्दकन्दजं नन्दनन्दनं वन्दिषीमहि ॥ प्रणिपत्य गुरूत्तंसं श्रीमद्वेदान्तदेशिकम् । हयग्रीवस्तवव्याख्यां कुर्वेऽहं तत्प्रसादतः ॥ इह खलु श्रीमान् वेदान्तदेशिकः, सम्यगुपासनविशेषवशीकृत हृदय पुण्डरीकमध्यमण्डनायित ताण्डवप्रचण्डतुरङ्गमुख मार्ताण्डमण्डलः, सकल पण्डितनिकुरुम्बमुक्तातपत्रितकीर्तिमण्डलः, सर्वतन्त्रस्वतन्त्रः, कवितार्किककेसरी, परमकारुणिकः,भगवत्मल्याणगुणगणानुसन्धानेन अनादिसंसार सञ्चितदौष्कर्श्य पाशबन्दीकृत प्राणिबृन्दं सन्तितारयिषुः, श्रीहयग्रीवमभिष्टोतुं प्रतिजानीते (स्वत) इति । स्वतस्सिद्धं – स्वप्रकाशम्, ननु सिद्धशब्दस्य भावार्थविहित कृत्प्रत्ययान्तत्वे स्वत इति पञ्चम्यर्थभूतहेत्वर्थविहित तसिल्प्रत्ययस्यानन्वयः स्यात् – सिद्धशब्दस्य प्रकाशमात्रार्थकत्वेन, स्वशब्दस्यापि “प्रकाशार्थकत्वेन तसिः पञ्चम्यर्थहेत्वर्थकत्वेन च प्रकाशाधीनप्रकाशार्थलाभात्, प्रकृते प्रकाशस्य नित्यत्वेन स्वात्मानं प्रति स्वस्य हेतुत्वासम्भवेन च तदसम्भवात्, कर्त्रर्थविहित कृतकृत्प्रत्ययान्तत्वे पूर्वोक्तरीत्या । स्वाधीन प्रकाशवत्त्वमर्थस्स्यात्। तथा च स्वस्येव स्वप्रकाशस्यापि नित्यत्वेन पूर्वोक्त दूषणग्रासादिति चेत्, मैवम्। उभयधाऽपि दोषाभावात्। तथाहि। आद्यपक्षे-प्रकाशस्य स्वाधीनत्वे तात्पर्याभावात्। अन्यानधीनत्वे तात्पर्यात्, द्वितीयपक्षे- स्वाधीनप्रकाशवत्त्वे तात्पर्याभावात्, अन्यानधीनप्रकाशवत्त्वे तात्पर्यात्, उभयथापि मणि प्रकाशमण्यादि व्यावृत्तिसिद्धेः। स्वतः – स्वस्मात्, सिद्धं – सिद्धिः – ज्ञानं, प्रकाश स्वरूपं; सिद्धं ज्ञातं प्रकाशितं वा; स्वाधीन प्रकाशाभिन्नं अन्याधीन प्रकाशरहितं वेत्यर्थः। सार्वविभक्तिकतसिल् प्रत्ययान्तत्वे तु प्रथमार्ध वर्णनसम्भवेन स्वयं प्रकाशार्थलाभान्न कोऽपि दोषगन्धः। यद्वा – स्वतः – स्वस्मात्, सिद्धं – उत्पन्नं, कारणान्तरापादितोत्पत्ति शून्यमित्यर्थः। नित्यमिति यावत्। अथवा, नित्यत्वं नान्याधीनमित्यावा – (स्वत) इति। अनेन नित्यमुक्त दिव्यावृत्तिः, तेषां स्वरूप स्वभावस्थितिप्रवृत्तीनां भगवदायत्तत्वात्। ननु नित्यमुक्तस्वरूव स्वभावादीनामपि नित्यत्वात्कथं भगदायत्तत्वमिति चेन्न, नित्यानामपि तद्वतिरेक प्रसञ्जितव्यतिरेक प्रतियोगित्वरूप भगवदायत्तत्वसम्भवात्। तथा च श्रुतिः- “को ह्येवान्यात्म प्राण्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” इति – परमाणुगतपारिमाण्डल्यस्य नित्यत्वेऽप्याश्रयाधीनावस्थाया न्यायविद्भिरङ्गीकाराच्च। ननु सिद्धशब्दस्य नित्यपर्यायत्वं कथमिति चेदुच्यते – “सिद्दे शब्दार्थसम्बन्धे” इत्यत्र महाभाष्ये सिद्धशब्दस्य नित्यपर्यायत्वेन व्याख्यानात्। तथा हि। सिद्धशब्दस्य कः पदार्थः? नित्यपर्यायवाची सिद्धशब्दः कथं पुनः ज्ञायते? मत्कूट स्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते तद्वच्च सिद्धं। सिद्धा पृथिवी, सिद्ध माकाश मित्यलं बहुना। (शुद्धस्फटिकमणिभूभृत्प्रतिभट) मिति। शुद्धस्य – निर्मलस्य, स्फटिकमणिभूभृतः – स्फटिकमयपर्वतस्य, प्रतिभटं – ततोऽप्यतिशयित कान्तिमत्त्वेन तं तिरस्कुर्वन्तमित्यर्थः । सुधासध्रीचीभिः – अमृतसहचरीखिः, द्युतिभिः – कान्तिभिः, (अपतापत्रिभुवनम्) अपगतः तापः – आध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकादि समस्तदुःखात्मकस्तापो यस्मिन् तत्; त्रयाणां भुवनानां समाहार स्त्रिभुवनं, पात्रादित्वान्न जीप्। अपतापं त्रिभुवनं यस्य तथोक्तः; हयग्रीवकान्तयश्चन्द्रमण्डलमध्यवृत्तिसुधास हितास्सत्य स्त्रिलोकीसन्तापहारिण्यो भवन्ति। मण्डलस्थस्सुधांशोः “पुंसां कर्मानलार्तानां पापिनां क्लेशशान्तये, स्वदेतेन्दुस्समुद्रेण ह्लादयन्गोगणेनवे” त्यादिवचनात्। अनन्तैः- निरवधिकैः,त्रय्यन्तैः – वेदान्तैः, (अनुविहितहेषाहलहलम्), अनुविहितः – अनुसृतः, हेषा – हेषाभ्यो हलहलः, अश्वध्वनिविशेषो यस्य तथोक्तम्। यथोक्तं भागवते द्वितीय स्कन्धे ब्रह्मनारदसंवादे – “वाचो बभूवु रुशती श्वसतोऽस्य न स्त” इति। “तस्य ह वा तस्य महतो भूतस्य निश्वसित मेतदृग्वेद” इति श्रुतिः। (हताशेषावद्यं) हतानि – परिहृतानि, अशेषावद्यानि – नमस्तदोषाः, येन तत्तथोक्तम्। आश्रितानामिति शेषः। यद्वा – आश्रितापराधोपेक्षकत्वमत्र विवक्षिम्। “न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तये” त्युक्तेः। हतानि- अत्यन्तासंश्लिष्टानि, अशेषावद्यानि – समस्तहेयानि, यस्मिन् तथोक्तम्। निखिलहेयप्रत्यनीकत्वात्तत्र दोषा न सम्भवन्तीति भावः। तथा च श्रुतिः – “अपहतपाप्मा विरजो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसङ्कल्प” इति। हयवदनं – हयस्य वदनमिव वदनं यस्य तथोक्तम्, शाक पार्थिवादित्वान्मध्यमपदलोपी समासः। (मह) इति। परं ब्रह्म ज्योतिषा मपि ज्योतिरयं पुरुषस्स्वयञ्ज्योतिः। “तेजस्तेजस्विनामह” मित्याद्युक्तेः। ईडीमहि – स्तुवीमहि। (ईड- स्तुतौ लडात्मनेपदम्) नित्यत्व- तेजिष्ठत्व -सकलदोषापहारित्व- वेदप्रवक्तृत्व- निर्दोषत्वादिगुणकं श्रीहयग्रीवं स्तुम इत्यर्थः। स्वभावोक्तिरलङ्कारः। “स्वभावोक्तिरलङ्कारो यथावद्वस्तुवर्णन” मितिलक्षणात्। अत्र स्वातन्त्र्याभिमान निवृत्तये कर्तुरनुपादानम् । प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः प्रज्ञादृष्टे रञ्जनश्री रपूर्वा । वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ २॥ भगवन्तं स्तोतुं तदाविर्भावप्रार्थनया तमभिमुखीकरोति। प्राचीति। वासुदेवस्य – “सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः, तत स्स वासुदेवेति विद्वद्भिः परिपठ्यत” इत्याद्युक्तस्य परमात्मनः, वाजिवक्त्रा -हयवदना, वागीशाख्या – वागीशेति आख्या यस्या तथोक्ता; वेदान् -ऋग्यजुस्सामाधर्वणरूपान्, वक्त्री – व्यञ्जयन्ती, “ऋचस्सामानि जज्ञिरे छन्दाङ्ग्सि जज्ञिरे तस्मात्” इति, “प्रवक्ता छण्डसां वक्ता पञ्चरात्रस्य य स्स्वय”मित्यादिवचनात्। अत्र “न लोकाय निष्ठाखलर्थतृणा”मिति षष्ठीनिषेधः। अन्तर्निशायाः – अज्ञाननिशीथिन्याः, काचित्-विलक्षणा सन्ध्या, प्राची सन्ध्या – विभातसन्ध्या, अज्ञानान्धकार निवर्तिनीति यावत्। (प्रज्ञादृष्टेः) प्रज्ञा – तत्त्वहितपुरुषार्थविषयिणी धीः, सैव, दृष्टिः – ईक्षणं, तस्याः, अपूर्वा – प्रसिद्धा विलक्षणा, अञ्जनश्रीः – अञ्जनसम्पन्मूर्तिः, तनुः मे, भातु – स्फुरतु, भा -दीप्तौ लोट्। तादृशमूर्तिसाक्षात्कारे स्वस्याप्यज्ञाननिवृत्तिपूर्वक ज्ञानवृद्धिर्भूयादित्याशयः। रूपकालङ्कारः। “आरोप्यविषयस्य स्यादतिरोहितरूपिणः, उपरञ्जितमारोप्यमाणं तदूप्रकं मत” मिति लक्षणात् । ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥ ३॥ पूर्वस्मिन् श्लोके हयमुखसन्निधानं प्रार्थितम्। इदानीं सन्निहितं भगवन्तमुपास्मह इत्याह (ज्ञानानन्देति)। ज्ञानानन्दमयं – ज्ञानानन्दप्रचुरम्। “तत् प्रकृतवचने मयडिति प्राचुर्यार्थे मयट्। यद्वा – ज्ञानानन्दमयं – ज्ञानानन्दस्वरूपं, “स्वार्थे मयट्, प्राणमय इत्यादिवत्। “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् यदेष अकाश आनन्दो न स्या” दित्युक्तेः। (निर्मलस्फटिकाकृतिम्) निर्मलः- जाज्वल्यमानः, स्फटिकः – स्फटिकमणिः, तस्याकृतिरिवाकृतिर्यस्य तं; सर्वविद्यानां – सकलकलानाम्, आधारं – निलयं, “छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवतात्मे” त्युक्तेः। हयग्रीवं देवमुपास्महे – ध्यायामः, “आस- उपवेशने” । विशुद्धविज्ञान घनस्वरूपं विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम् । दयानिधिं देहभृतां शरण्यं देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥ ४॥ गुरुलघूपायभूतयोर्भक्ति प्रपत्त्योर्मध्ये प्रचरामीत्याह (विशुद्ध) मिति। अहं – दासभूतः, दयायाः निधिं – अक्षयस्थानं, तम्, अत एव देहभृतां – प्राणिनां, शरण्यं – रक्षकं, (विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपं) विशुद्धेन – निर्मलेन, विज्ञानेन, घनं – निबिडं, अन्तर्बहिर्ज्ञानमयमित्यर्थः। यद्वा, विज्ञानरूपो घनः -पिण्डः, तद्रूपमित्यर्थः। “विज्ञानघन एवे”ति श्रुतेः, स्वरूपं यस्य, तम्। (विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम्) विज्ञानस्य – ज्ञानयोगस्य, विश्राणने – वितरणे, बद्धा -धृता, दीक्षा – सङ्कल्पः, यस्य तम्। “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्, ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति त” इत्यादिवचनात्। हयग्रीवं, प्रपद्ये – शरणं यामि, “पद्ल् -गतौ” लडात्मनेपदम्। ज्ञानस्वरूपस्य ज्ञानप्रदस्य दयाळोः सर्वभूतशरण्यस्य शरणागता अस्मत्संरक्षणं कियदिति भावः । समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्यूहानां लहरिविततिर्बोधजलधेः । कथादृप्यत्कौतस्कुतकलह कोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदनहेषाहलहलः ॥ ५॥ भगवति हयास्ये भक्तिप्रपत्तिरूपोपायद्वयं विधाय,सम्प्रति चिकीर्षितस्तोत्रपरिसमाप्ति प्रतिबन्धकाज्ञानान्धकारनिवृत्तिं सर्वविघ्नोपशमाद्धयमुख हेषारवसकाशात् स्वस्य प्रार्थयते (समाहर) इति। साम्नां – सामशाखानां, समाहारः – सङ्घातः, तत्स्वरूपमिति यावत्। “प्रणवोद्गीथवचस” इत्युक्तेः। ऋक्साखानां, प्रतिपदं- तदर्थबोधकपर्यायपदं, यजुषां – तैत्तिरीयशाखानां, धाम – वासप्थानं, प्रत्यूहानां – विद्याप्रतिबन्धकविघ्नानां, लयः – ध्वंसः, बोधजलधेः – ज्ञानसागरस्य, लहरिविततिः – तरङ्गपरंवरा,(हयवदन हेषाहलहलः) हयवदनस्य – हयग्रीवस्य, हेषाख्यो हलहलः – अश्वध्वनिः, (कथादृप्यत्कौतस्कुतकलह कोलाहलभवम्) कथासु – वादकथासु, दृप्यन्तः कौतस्कुताः – कुतः कुत इति वादिनः, स “कस्कादित्वात्सः”, तेषां, कलहकोलाहलेन – अयथार्थवादकलहेन, भवः – जन्यः, अन्तर्द्वान्तम्, हरतु – निवर्तयतु, “हृञ्- हरणे”। हेषाहलहलस्य समाहाराद्यभेदोक्त्या भेदरूपकालङ्कारः । अपौरुषेयै रपि वाक्प्रपञ्चै रद्यापि ते भूतिमदृष्टपाराम् । स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव कारुण्यतो नाथ ! कटाक्षणीयः ॥ ६॥ साक्षात्कृते भगवति विविध विचित्रानन्ताश्चर्य सनकसनन्दनादि ध्यानागोचर दिव्यस्वभावं दृष्ट्वाऽस्य भगवद्गुणानुवर्णने प्रयत्नः परिहसास्पद इत्यभिप्रेत्याह (अपौरुषेयै रिति)। हे नाथ – हे हयग्रीव, अद्यापि – इदानी मपि, अपौरुषेयैः – नित्यैः, “अनादिनिधना ह्येषा वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवे” त्याद्युक्तेः। वाक्प्रपञ्चैरपि – वेदजालैरपि, (अदृष्टपाराम्) अदृष्टं – प्रतिपादनाविषयीभूतं, पारम्-अवधिः, यस्या स्सा तथोक्ता “यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सहे” ति श्रुतेः । “नान्तोऽस्ति म दिव्यानां विभूतीनां परन्तपे” त्यादि स्मृतेश्च । भूतिं – गुणाद्यैश्वर्यं, स्तुवन् – वर्णयन्, अहं, मुग्धः – बालः, कृत्यसाध्ये यतमान इति यावत्; इति – हेतोः, त्वया, कारुण्यत एव – कृपावशादेव, न ह्यस्मदादिषु कटाक्षनिमित्तं किञ्चिदस्तीति भावः। कटाक्षणीयः – बालेष्वकिञ्चित्कुर्वत्स्वपि परमकारुणिकस्य पितुः करुणाकटाक्षः स्वाभाविक इति भावः । दाक्षिण्यरम्या गिरिशस्य मूर्तिर्देवी सरोजासनधर्मपत्नी । व्यासादयोऽपि व्यपदेश्यवाच स्स्फुरन्ति सर्वे तव शक्तिलेशैः ॥ ७॥ लोके ये विद्यादिकाः ते सर्वेऽपि भवदीयशक्त्यंशैः स्पृशन्तीत्याह (दाक्षिण्ये) ति । हे नाथ – हे हयग्रीव, गिरिशस्य – रुद्रस्य, (दाक्षिण्यरम्या) दाक्षिण्यीन – सुखप्रियवचनादिना, रम्या -मनोहरा, यद्वा, दाक्षिण्येन – विद्याप्रदान सामर्थ्वेन, रम्या – मनोज्ञा, मूर्तिः, सरोजासनस्य – चतुर्मुखस्य, धर्मपत्नी – सहधर्मचरी, देवी – सरस्वती, व्यपदेश्यवाचः – प्रसिद्ध ग्रन्थकर्तारो व्यासादयः, व्यासवाल्मीकिशुक पराशरादयोऽपि, सर्वे – पूर्वसमुदितव्यतिरिक्ताः, तव शक्तिलेशैः – विद्याशक्त्यंशैः, स्फुरन्ति – भान्ति। “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्त मनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाती” ति श्रुतेः।

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Krishnamangalam

आनन्दस्तोत्रम्: Anandastotram

आनन्दस्तोत्रम्: Anandastotram श्रीकृष्णः परमानन्दो गोविन्दो नन्दनन्दनः । तमालश्यामलरुचिः शिखण्डकृतशेखरः ॥ १॥ पीतकौशेयवसनो मधुरस्मितशोभितः । कन्दर्पकोटिलावण्यो वृन्दारण्यमहोत्सवः ॥ २॥ वैजयन्तीस्फुरद्वक्षाः कक्षात्तलगुडोत्तमः । कुञ्जापितरतिर्गुञ्जापुञ्जमञ्जुलकण्ठकः ॥ ३॥ कर्णिकाराढ्यकर्णश्रीधृतिस्वर्णाभवर्णकः । मुरलीवादनपटुर्वल्लवीकुलवल्लभः ॥ ४॥ गान्धर्वाप्तिमहापर्वा राधाराधनपेशलः । इति श्रीकृष्णचन्द्रस्य नाम विंशतिसंज्ञितम् ॥ ५॥ आनन्दाख्यं महास्तोत्रं यः पठेच्छृणुयाच्च यः । स परं सौख्यमासाद्य कृष्णप्रेमसमन्वितः ॥ ६॥ सर्वलोकप्रियो भूत्वा सद्गुणावलिभूषितः । व्रजराजकुमारस्य सन्निकर्षमवाप्नुयात् ॥ ७॥ इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां श्रीमहानन्दाख्यस्तोत्रं समाप्तम् ।

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