Krishnamangalam

Shri Kartika Damodara Stotram: कार्तिक दामोदर स्तोत्रम्

Shri Kartika Damodara Stotram: कार्तिक दामोदर स्तोत्रम् Kartika Damodara Stotram:। मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार ।मत्स्याकृतिधरजय देवेश वेदविबोधककूर्मस्वरूप ।मन्दरगिरिधरसूकररूप भूमिविधारक जय देवेश ॥ १॥ । नृसिंहावतार, वामनावतार, परशुरामावतार ।काञ्चनलोचननरहरिरूप दुष्टहिरण्यकभञ्जन जय भोः । जय जय वामन बलिविध्वंसिन् दुष्टकुलान्तकभार्गवरूप ॥ २॥ । रामावतार, कृष्णावतार ।जयविश्रवसः सुतविध्वंसिन् जय कंसारे यदुकुलतिलक ।जयवृन्दावनचर देवेश देवकीनन्दन नन्दकुमार ॥ ३॥ । कृष्णावतार ।जय गोवर्धनधर वत्सारे धेनुकभञ्जन जय कंसारे ।रुक्मिणिनायक जय गोविन्द सत्यावल्लभ पाण्डवबन्धो ॥ ४॥ खगवरवाहन जय पीठारे जय मुरभञ्जन पार्थसखे त्वम् । Kartika Damodara Stotram भौमविनाशक दुर्जनहारिन् सज्जनपालक जय देवेश ॥ ५॥ शुभगुणपूरित जय विश्वेश जय पुरुषोत्तम नित्यविबोध ।भूमिभरान्तककारणरूप जय खरभञ्जन देववरेण्य ॥ ६॥ विधिभवमुखसुरसततसुवन्दित सच्चरणाम्भुज कञ्जसुनेत्र ।सकलसुरासुरनिग्रहकारिन् पूतनिमारण जय देवेश ॥ ७॥ यद्भ्रूविभ्रममात्रात्तदिदं आकमलासनशम्भुविपाद्यम् । सृष्टिस्थितिलयमृच्चति सर्वं स्थिरचरवल्लभ स त्वं जय भो ॥ ८॥ जय यमलार्जुनभञ्जनमूर्ते गोपीकुचकुङ्कुमाङ्किताङ्ग ।पाञ्चालीपरिपालन जय भो जय गोपीजनरञ्जन जय भो ॥ ९॥ गर्भगतकृष्णस्तुतिः Garbhgatakrishnastutih जय रासोत्सवरत लक्ष्मीश सततसुखार्णव जय कञ्जाक्ष ।जय जननीकरपाशसुबद्ध हरणान्नवनीतस्य सुरेश ॥ १०॥ बालक्रीडानपर जय भो त्वं मुनिवरवन्दितपदपद्मेश ॥ कालियफणिफणमर्दन जय भो द्विजपत्यर्पितमत्सिविभोन्नम् ॥ ११॥ । बुद्धावतार, कल्क्यावतार ।क्षीराम्बुजिकृतनिलयन देव वरद महाबल जय जय कान्त ।दुर्जनमोहक बुद्धस्वरूप सज्जनबोधक कल्किस्वरूप ॥ १२॥ जय युगकृत् दुर्जन विध्वंसिन् ।जय जय जय भोः जय विश्वात्मन् ॥ १३॥ Kartika Damodara Stotram इति मन्त्रं पठन्नेव कुर्यान्नीराजनं बुधः ।घटिकाद्वयशिष्टायां स्नानं कुर्याद्यथाविधि ॥ १४॥ अन्यथा नरकं याति यावदिन्द्राश्चतुर्दश । इति श्री पञ्चरात्रगमे हंसब्रह्म संवादे श्रीकार्तिकदामोदरस्तोत्रम् ॥

Shri Kartika Damodara Stotram: कार्तिक दामोदर स्तोत्रम् Read More »

Krishnamangalam

Karana Shatka Gitam: कारणषट्कगीतम्

Karana Shatka Gitam: कारणषट्कगीतम् Karana Shatka Gitam: मम जीवनस्य जीवनंउद्भाषितं नित्यशोभनंत्वमेव देवं त्वमेव सर्वंहृदि स्थिते सदा धारणंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ १॥ मम हृदयस्य हृदयंसद्भाषितं नित्य सदयंत्वमेव पूर्णं त्वमेव स्वर्णंप्रेमं आनन्दं अद्भुदयंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ २॥ मम विचारस्य विचारंसद्भाव-हॄद्भाव-सञ्चारंत्वमेव सत्यं त्वमेव नित्यंस्मृति-ज्ञानं सर्वाधारंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ ३॥ मम शरीरस्य आधारंत्वमेक नित्य निराधारंत्वमेव धर्मं त्वमेव कर्मंसर्वसूत्रस्य सूत्रधारंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ ४॥ खण्डिता (रूपगोस्वामिविरचिता) Khandita (Rupagoswamivirchita) मम सर्व सुखदायकंनित्यसुधा वेणु गायकंत्वमेव कर्ता त्वमेव धर्ता माता पिता आत्मनायकंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ ५॥ मम दिव्य नन्दनन्दनंआनन्दकन्द सुचन्दनंत्वमेव स्वामी हे अन्तर्यामी सर्व हॄदयस्य स्पन्दनंहे कृष्ण हे माधव हे देव त्वंसर्व कारणस्य कारणम् ॥ ६॥ रचयिता — श्रीकृष्णदासः

Karana Shatka Gitam: कारणषट्कगीतम् Read More »

Dream Interpretation

Dream Interpretation: सपने में दिखने वाली ये चीजें देती हैं शुभ संकेत, जल्द मिल सकती है अच्छी खबर

Dream Interpretation: कई बार सपनों में हमें ऐसे संकेत मिल जाते हैं जो हमारे भविष्य के बारे में बताते हैं. जानते हैं कि किन चीजों का सपना देखना जीवन में बहुत अच्छा माना जाता है. Swapna Shastra in Hindi: स्वप्न शास्त्र के अनुसार हर सपने का कोई ना कोई अर्थ जरूर होता है. Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र में हर सपने की विस्तार से व्याख्या की गई है. सपने हमें भविष्य में घटित होने वाले घटनाओं का संकेत देते हैं.  स्वप्नशास्त्र में कुछ चीजों का दिखना बहुत शुभ माना जाता है. यह सपने हमें अमीर बनने का संकेत देते हैं. आइए जानते हैं कि उन सपनों के बारे में जो बताते हैं कि आप जल्द ही आपको कुछ अच्छी खबर मिल सकती है. Dream Interpretation: सपने में इन चीजों का दिखना माना जाता है शुभ सपने में फल या फूल देखना शुभ संकेत होता है. यह सपना बतात है कि आपके जीवन में खुशियां और समृद्धि आने वाली है. सपने में पानी देखना भी शुभ माना जाता है. यह सपना संकेत देता है कि जल्द ही आपकी सारी ईच्छाएं पूरी होने वाली हैं. सपने में मंदिर देखना बहुत ही शुभ होता है. यह सपना बताता है कि आप जिस काम के लिए जा रहे हैं उसमें आपको भगवान का आशीर्वाद मिलेगा. सपने में सोना देखना धन प्राप्ति का संकेत है. यह सपना बताता है कि मां लक्ष्मी आप पर मेहरबान हैं. उनकी कृपा से आपको धन कमाने के नए अवसर मिलेंगे. इतना ही नहीं आपको पुराना फंसा धन भी मिलने की संभावना है. सपने में सांप देखना बहुत शुभ माना जाता है. अगर आप सपने में सांप को अपने बिल के पास जाते देखते हैं Dream Interpretation तो इसका मतलब है कि आपको जल्द कहीं से धन मिलने वाला है. सपने में जलता हुआ दीपक दिखना भी बहुत शुभ होता है. यह संकेत देता है कि आपके अच्छे दिन शुरू होने वाले हैं और आपको आर्थिक लाभ होगा. स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में कानों की बाली दिखने का सपना बहुत अच्छा होता है. ये सपना संकेत देता है कि आपको अचानक कहीं से धन लाभ हो सकता है जिसके बारे में आपने सोचा भी नहीं था. स्वप्न शास्त्र के अनुसार सपने में खुद को अंगूठी पहने हुए देखना भी बहुत शुभ होता है. यह सपना बताता है कि मां लक्ष्मी की कृपा आपके ऊपर बनी हुई है और आपको कोई आर्थिक समस्या नहीं होगी. सपने में खुद को दूध पीते हुए देखने का मतलब है कि आप जल्द ही मालामाल होने वाले हैं. Dream Interpretation दूध पीने का सपना घर में आने वाली समृद्धि का संकेत देता है. गुलाब और कमल का फूल Dream Interpretation मां लक्ष्मी का प्रिय है. अगर आप सपने में इन फूलों को देखते हैं तो समझ लें कि मां लक्ष्मी की कृपा से आपके धन भंडार भरने वाले हैं. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

Dream Interpretation: सपने में दिखने वाली ये चीजें देती हैं शुभ संकेत, जल्द मिल सकती है अच्छी खबर Read More »

Dream Interpretation

Krishna Janmashtami Puja Niyam: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि, सभी 16 चरणों के सरल वैदिक मंत्रों के साथ

Krishna Janmashtami Puja Vidhi Mantra In Hindi: कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कई भक्त भगवान कृष्ण का षोडशोपचार पूजन करते हैं। ये पूजा सामान्य पूजा से थोड़ी बड़ी होती है। विशेषतौर पर वैष्णव संप्रदाय के लोग इस पूजा को करते हैं। यहां देखें जन्माष्टमी पूजा विधि एवं मंत्र। Krishna Janmashtami Puja Vidhi Mantra In Hindi: कृष्ण जन्माष्टमी का पावन त्योहार हिंदू धर्म के लोगों के लिए बेहद खास होता है। इस शुभ दिन पर लोग रात 12 बजे कृष्ण जी की विधि विधान पूजा करते हैं। इसके बाद उनकी आरती करके भोग लगाते हैं। यहां हम आपको जन्माष्टमी की षोडशोपचार पूजा के बारे में बताने जा रह हैं। जिसमें 16 चरण होते हैं और सभी चरणों में वैदिक मंत्रों होते हैं। यहां देखें कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि एवं मत्र। Krishna Janmashtami: ध्यानम् भगवान श्री कृष्ण का ध्यान पहले से अपने सम्मुख प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण की नवीन प्रतिमा में करें। ॐ तमद्भुतं बालकम् अम्बुजेक्षणम्, चतुर्भुज शंख गदायुधायुदम् ।श्री वत्स लक्ष्मम् गल शोभि कौस्तुभं, पीतम्बरम् सान्द्र पयोद सौभगं ।।महार्ह वैदूर्य किरीटकुन्डल त्विशा परिष्वक्त सहस्रकुन्डलम् ।उद्धम कांचनगदा कङ्गणादिभिर् विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ।।ध्यायेत् चतुर्भुजं कृष्णं, शंख चक्र गदाधरम्।पीतम्बरधरं देवं माला कौस्तुभभूषितम् ।।ॐ श्री कृष्णाय नमः। ध्यानात् ध्यानम् समर्पयामि ।। आवाहनं भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ें और Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सामने आवाहन मुद्रा दिखाकर, उनका आवाहन करें। ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।स भूमिं विश्वतो वृत्वा सुत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ।।आगच्छ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते ।क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे ।।आवाहयामि देव त्वां वसुदेव कुलोद्भवम् ।प्रतिमायां सुवर्णादिनिर्मितायां यथाविधि ।।कृष्णम् च बलबनं च वसुदेवं च देवकीम् ।नन्दगोप यशोदाम् च सुभद्राम् तत्र पूजयेत् ।।आत्मा देवानां भुवनस्य गभों यथावशं चरति देवेषः ।घोषा इदस्य शण्विर न रूपं तस्मै वातायहविषा विधेम ।।श्री क्लीं कृष्णाय नमः, सपरिवार सहित, श्री बालकृष्णं आवाहयामि ।। आसनं भगवान श्री कृष्ण का आवाहन करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ कर उन्हें आसन के लिए पांच पुष्प अञ्जलि में लेकर अपने सामने छोड़ें। पुरुष एवेदगं सर्वम् यद्भुतं यच्छ भव्यम्।उतामृतत्वस्येशानः यदन्नेनातिरोहति ।।राजाधिराज राजेन्द्र बालकृष्ण महीपते।रत्न सिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आसनं समर्पयामि।। पाद्य (चरण धोने के लिए जल) भगवान श्री कृष्ण को आसन प्रदान करने के बाद नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए पाद्य (चरण धोने के लिए जल) समर्पित करें। एतावानस्य महिमा अतो ज्यायागंश्च पूरुषः ।पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।अच्युतानन्द गोविन्द प्रणतार्ति विनाशन।पाहि मां पुन्डरीकाक्ष प्रसीद पुरुषोत्तम ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । पादोयो पाचम् समर्पयामि।। अर्घ्य पाद्य समर्पण के बाद भगवान श्री कृष्ण को अर्घ्य (सिर के अभिषेक के लिए जल) समर्पित करें। त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवात्पुनः ।ततो विश्वङ्ग्यक्रामत् साशनानशने अभि ।।परिपूर्ण परानन्द नमो नमो कृष्णाय वेधसे।गृहाणार्ध्वम् मया दत्तम् कृष्णा विष्णोर्जनार्दन ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। अर्घ्यम् समर्पयामि ।। आचमनीयं (भगवान को जल अर्पित करें) निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए आचमन के लिए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को जल समर्पित करें। तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्ध‌मिमथो पुरः ।।नमः सत्याय शुद्धाय नित्याय ज्ञान रूपिणे ।गृहाणाचमनं कृष्ण सर्व लोकैक नायक ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आचमनीयं समर्पयामि ।। पूजा के बाद भूल से भी न करें ये काम, वरना मिल सकते हैं विपरीत परिणाम स्नानं आचमन समर्पण के बाद ये मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को जल से स्नान कराएं। यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।वसन्तो अस्यासीदाज्यम् ग्रीष्म इध्मश्शरद्धविः ।।ब्रह्माण्डोदर मध्यस्थैस्तिथैश्च रघुनन्दन ।स्नापयिश्याम्यहं भक्त्या त्वं गृहाण जनार्दना ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। मलापकर्श स्नानं समर्पयामि ।। वस्त्र स्नान कराने के बाद ये मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण को मौली के रूप में वस्त्र समर्पित करें। ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये।।ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।प्रादुर्भुनोऽस्मि राष्ट्रस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।।तप्त कान्चन संकाशं पीताम्बरम् इदं हरे।सगृहाण जगन्नाथ बालकृष्ण नमोस्तुते।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।। यज्ञोपवीत (जनेऊ) वस्त्र समर्पण के बाद ये मंत्र पढ़ें और श्रीकृष्ण को यज्ञोपवीत समर्पित करें। तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् ।पशुगॅस्तागंश्चक्रे वायव्यान् आरण्यान् ग्राम्याश्चये ।।क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मी नाशयाम्यहम्।अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णदमे गृहात् ।।श्री बालकृष्ण देवेश श्रीधरानन्त राघव ।ब्रह्मसुत्रम्चोत्तरीयं गृहाण यदुनन्दन ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । यज्ञोपवीतम् समर्पयामि ।। गंध (सुगंधित द्रव्य, इत्र चंदन आदि) Krishna Janmashtami ये मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को सुगन्धित द्रव्य समर्पित करें। तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्मादजायत ।।गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।कुम्कुमागरु कस्तूरि कर्पूरं चन्दनं तता।तुभ्यं दास्यामि राजेन्द्र श्री कृष्णा स्वीकुरु प्रभो।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । गन्धम् समर्पयामि ।। आभरणं हस्तभूषण निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए Krishna Janmashtami श्रीकृष्ण के श्रृंगार के लिए आभूषण समर्पित करें। गृहाण नानाभरणानि कृष्णाय निर्मितानि ।ललाट केठोत्तम कर्ण हस्त नितम्ब हस्तांगुलि भूषणानि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। आभरणानि समर्पयामि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। हस्तभूषणं समर्पयामि । नाना परिमल द्रव्य निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को विविध प्रकार के सुगन्धित द्रव्य समर्पित करें। ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं जयाया हेतिं परिबाधमानः ।हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः। Krishna Janmashtami नाना परिमल द्रव्यं समर्पयामि ।। पुष्प निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को पुष्प, तुलसी माला समर्पित करें। माल्यादीनि सुगन्धीनि, माल्यतादीनि वैप्रभो।मया हितानि पूजार्थम्, पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम् ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः । पुष्पाणि समर्पयामि ।। अंग पूजा निम्न लिखित मंत्र पढ़ते हुए भगवन कृष्ण के अंग-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके लिए बाएं हाथ में चावल, पुष्प और चंदन लेकर प्रत्येक मन्त्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ से श्री कृष्ण की मूर्ति के पास छोड़ें। ॐ श्री कृष्णाय नमः। पादी पूजयामि ।।ॐ राजीवलोचनाय नमः । गुल्फौ पूजयामि ।।ॐ नरकान्तकाय नमः। जानुनी पूजयामि ।।ॐ वाचस्पतये नमः। जंघै पूजयामि।।ॐ विश्वरूपाय नमः । ऊरून् पूजयामि ।।ॐ बलभद्रानुजाय नमः। गुहां पूजयामि।। ॐ विश्वमूर्तये नमः। जघनं पूजयामि।।ॐ गोपीजन प्रियाय नमः। कटिं पूजयामि ।।ॐ परमात्मने नमः। उदरं पूजयामि।।ॐ श्रीकण्टाय नमः। हृदयं पूजयामि।।ॐ यज्ञिने नमः। पार्थी पूजयामि।।ॐ त्रिविक्रमाय नमः । पृष्ठदेहं पूजयामि।।ॐ पद्मनाभाय नमः । स्कन्धौ पूजयामि।।ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः। बाहुन् पूजयामि।।ॐ कमलानाथाय नमः । हस्तान् पूजयामि।। ॐ वासुदेवाय नमः । कण्ठं पूजयामि ।।ॐ सनातनाय नमः । वदनं पूजयामि ।।ॐ वसुदेवात्मजाय नमः । नासिकां पूजयामि ।।ॐ पुण्याय नमः । श्रोत्रे पूजयामि ।।ॐ श्रीशाय नमः । नेत्राणि पूजयामि ।।ॐ नन्दगोपप्रियाय नमः। भ्रवौ पूजयामि ।।ॐ देवकीनन्दनाय नमः। भ्रूमध्यं पूजयामि ।।ॐ शकटासुरमर्धनाय नमः । ललाटं पूजयामि ।।ॐ श्री कृष्णाय नमः । शिरः पूजयामि ।।ॐ श्री बालकृष्णाय नमः सर्वांगाणि पूजयामि ।। धूपं निम्न लिखित मन्त्र पढ़ते हुए श्रीकृष्ण को धूप समर्पित करें। वनस्पत्युद्भवो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्धवुत्तमः ।बालकृष्ण महिपालो धूपोयं प्रतिगृह्यताम् ।।यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।मुखं किमस्य कौ बाहू कावूरू

Krishna Janmashtami Puja Niyam: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि, सभी 16 चरणों के सरल वैदिक मंत्रों के साथ Read More »

Vedsar Shiv Stava

Vedsar Shiv Stava: श्री वेदसार शिव स्तव:

Vedsar Shiv Stava: वेदसार शिव स्तव (श्री वेदसार शिव स्तव): वेदसार शिव स्तव एक स्तोत्र (हिंदू भजन) है जो हिंदू भगवान शिव की शक्ति और सौंदर्य का वर्णन करता है। इसे पारंपरिक रूप से लंका के असुर राजा और शिव के भक्त रावण से जोड़ा जाता है। इस स्तोत्र की नौवीं और दसवीं दोनों चौपाइयों का समापन शिव की विशेषणों की सूची के साथ होता है, जैसे संहारक, यहाँ तक कि स्वयं मृत्यु का भी संहारक। वेदसार शिव स्तव भगवान शिव की स्तुति है। Vedsar Shiv Stava जिसे आदि गुरु शंकराचार्य ने भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए लिखा था। इस स्तुति में भगवान शिव को जगत की उत्पत्ति और फिर इस जगत के शिव में लीन होने के रूप में वर्णित किया गया है। शिव देवों के भी देव हैं, इसलिए महादेव हैं। जो देवताओं के भी दुःख दूर करते हैं, वे महादेव के समान हैं। महादेव होकर भी, जो बाघ की खाल और भस्म को अपने चारों ओर लपेटते हैं। फिर भी, देवी पार्वती का मन शिव के समान मोहित करने वाला है। तीनों लोकों के हित को ध्यान में रखते हुए, जो विष दिखाई नहीं देता, उसे कंठ में धारण करते हैं, Vedsar Shiv Stava ऐसे हैं हमारे नीलकंठ। ये शिव स्तव में प्रस्तुत हैं, जिसमें योगी के अद्वितीय रूपों का वर्णन है। वेदसार शिव स्तव के जाप के लाभ अपार शक्ति, सामर्थ्य और सकारात्मकता हैं। एक बार जब आप स्तोत्र का जाप शुरू करते हैं, तो आप सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं। आप इसे प्रतिदिन किसी भी सुविधाजनक समय पर अत्यंत प्रेम, भक्ति और विश्वास के साथ जाप कर सकते हैं। आज के समय में हर मनुष्य तमाम समस्याओं से घिरा हुआ है। Vedsar Shiv Stava ऐसे समय में वह विचलित हो जाता है और सोचता है कि काश! कोई ऐसा मंत्र या पाठ मिल जाए, जिससे उसके जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाएं और वह शांतिपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके। Vedsar Shiv Stava यहाँ पाठकों के लिए एक पाठ प्रस्तुत है, जिसकी रचना भगवान शंकराचार्य ने की है, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। इसे शंकर द्वारा दिया गया सुख का मंत्र भी माना जाता है, जिसे ‘वेदसारव्य’ के नाम से जाना जाता है। वेदसार शिव स्तव के लाभ: वेदसार शिव स्तव के जाप के लाभ अपार शक्ति, सामर्थ्य और सकारात्मकता हैं। Vedsar Shiv Stava एक बार जब आप वेदसार शिव स्तव का जाप शुरू करते हैं, तो आप सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं। आप इसे प्रतिदिन किसी भी सुविधाजनक समय पर अत्यंत प्रेम, भक्ति और विश्वास के साथ जप सकते हैं। इस स्तम्भ का जप किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति अपने जीवन में शक्ति, सामर्थ्य और सकारात्मक दृष्टिकोण चाहता है, उसे वेदसार शिव स्तम्भ का नियमित रूप से जप करना चाहिए। श्री वेदसार शिव स्तव: हिंदी पाठ:Vedsar Shiv Stava in Hindi पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य क्रत्तिं वसानं वरेण्यम् ।जटाजूटमध्ये स्फुरद्गांगवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ।। 1 ।। महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यंगभूषम् ।विरूपाक्षमिन्द्वर्कवहिनत्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पंचवक्त्रम् ।। 2 ।। गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेंद्राधिरूढं गणातीतरूपम् ।भवं भास्वरं भस्मना भूषितांग भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ।। 3 ।। शिवाकान्त शम्भो शशांकर्धमौले महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् ।त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ।। 4 ।। परात्मानमेकं जगद्विजमाधं निरीहं निराकारमोंकारवेधम् ।यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ।। 5 ।। न भूमिर्न चापो न वहिनर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ।। 6 ।। अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।तुरीयं तम: पारमाधन्तहीनं प्रपधे परं पावनं द्वैतहीनम् ।। 7 ।। नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ।। 8 ।। प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ।शिवाकान्त शांत स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य: ।। 9 ।। शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ।। 10 ।। त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्म्रड विश्वनाथ ।त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिंगात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ।। 11 ।। ।। इति श्री वेदसार शिव स्तव सम्पूर्णम् ।।

Vedsar Shiv Stava: श्री वेदसार शिव स्तव: Read More »

Venkateswara

Venkateswara Ashtottara Shatanama Stotram:श्री वेङ्कटेश्वर शतनामावली स्तोत्रम्

श्री वेङ्कटेश्वर शतनामावली स्तोत्रम् हिंदी पाठ:Venkateswara Ashtottara Shatanama Stotram in Hindi श्री वेङ्कटेशः श्रीनिवासो लक्ष्मीपतिरनामयःअमृतांशो जगद्वन्द्योगोविन्दश्शाश्वतः प्रभुं शेषाद्रि निलयो देवः केशवो मधुसूदनः ।अमृतोमाधवः कृष्णं श्रीहरिर्ज्ञानपञ्जर ॥ १ ॥ श्री वत्सवक्षसर्वेशो गोपालः पुरुषोत्तमः ।गोपीश्वरः परञ्ज्योतिर्वैकुण्ठ पतिरव्ययः ॥ २ ॥ सुधातनर्यादवेन्द्रो नित्ययौवनरूपवान् ।चतुर्वेदात्मको विष्णु रच्युतः पद्मिनीप्रियः ॥ ३ ॥ धरापतिस्सुरपतिर्निर्मलो देवपूजितः ।चतुर्भुज श्चक्रधर स्त्रिधामा त्रिगुणाश्रयः ॥ ४ ॥ निर्विकल्पो निष्कळङ्को निरान्तको निरञ्जनः ।निराभासो नित्यतृप्तो निर्गुणोनिरुपद्रवः ॥ ५ ॥ गदाधर शार्ङ्गपाणिर्नन्दकी शङ्खधारकः ।अनेकमूर्तिरव्यक्तः कटिहस्तो वरप्रदः ॥ ६ ॥ अनेकात्मा दीनबन्धुरार्तलोकाभयप्रदः ।आकाशराजवरदो योगिहृत्पद्म मन्दिरः ॥ ७ ॥ दामोदरो जगत्पालः पापघ्नोभक्तवत्सलः ।त्रिविक्रमशिंशुमारो जटामकुटशोभितः ॥ ८ ॥ शङ्खमध्योल्लसन्मञ्जूकिङ्किण्याध्यकरन्दकः ।नीलमेघश्यामतनुर्बिल्वपत्रार्चन प्रियः ॥ ९ ॥ जगद्व्यापी जगत्कर्ता जगत्साक्षी जगत्पतिः ।चिन्तितार्थप्रदो जिष्णुर्दाशरथे दशरूपवान् ॥ १० ॥ देवकीनन्दन शौरि हयग्रीवो जनार्धनः ।कन्याश्रवणतारेज्य पीताम्बरोनघः ॥ ११ ॥ वनमालीपद्मनाभ मृगयासक्त मानसः ।अश्वारूढं खड्गधारीधनार्जन समुत्सुकः ॥ १२ ॥ घनसारसन्मध्यकस्तूरीतिलकोज्ज्वलः ।सच्चिदानन्दरूपश्च जगन्मङ्गळदायकः ॥ १३ ॥ यज्ञरूपो यज्ञभोक्ता चिन्मयः परमेश्वरः ।परमार्थप्रद श्शान्तश्श्रीमान् दोर्धण्ड विक्रमः ॥ १४ ॥ परात्परः परब्रह्मा Venkateswara श्रीविभुर्जगदीश्वरः ।एवं श्री वेङ्कटेशस्यनाम्नां अष्टोत्तरं शतम् ॥ १५ ॥ पठ्यतां शृण्वतां भक्त्या सर्वाभीष्ट प्रदं शुभम् । ॥ इति श्री वेङ्कटेश्वर शतनामावली स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

Venkateswara Ashtottara Shatanama Stotram:श्री वेङ्कटेश्वर शतनामावली स्तोत्रम् Read More »

Veera Vimsati

Veera Vimsati-Kavyam Hanuman Stotram: श्री वीरविंशतिकाव्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम्

श्री वीरविंशतिकाव्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Veera Vimsati-Kavyam Hanuman Stotram in Hindi Veera Vimsati: लांगूलमृष्टवियदम्बुधिमध्यमार्ग- मुत्प्लुत्य यान्तममरेन्द्रमुदो निदानम् ।आस्फालितस्वकभुजस्फुटिताद्रिकाण्डं द्राङ्मैथिलीनयननन्दनमद्य वन्दे ॥ १ ॥ मध्येनिशाचरमहाभयदुर्विषह्यं घोराद्भुतव्रतमिदं यददश्चचार ।पत्ये तदस्य बहुधापरिणामदूतं सीतापुरस्कृततनुं हनुमन्तमीडे ॥ २ ॥ यः पादपङ्कजयुगं रघुनाथपत्न्या नैराश्यरूषितविरक्तमपि स्वरागैः ।प्रागेव रागि विदधे बहु वन्दमानो वन्देऽञ्जनाजनुषमेव विशेषतुष्ट्यै ॥ ३ ॥ ताञ्जानकीविरहवेदनहेतुभूतान् द्रागाकलय्य सदशोकवनीयवृक्षान् ।लङ्कालकानिव घनानुदपाटयद्य-स्तं हेमसुन्दरकपिं प्रणमामि पुष्ट्यै ॥ ४ ॥ घोषप्रतिध्वनितशैलगुहासहस्र-संभ्रान्तनादितवलन्मृगनाथयूथम् ।अक्षक्षयक्षणविलक्षितराक्षसेन्द्र-मिन्द्रं कपीन्द्रपृतनावलयस्य वन्दे ॥ ५ ॥ हेलाविलङ्घितमहार्णवमप्यमन्दं घूर्णद्गदाविहतिविक्षतराक्षसेषु ।स्वम्मोदवारिधिमपारमिवेक्षमाणं वन्देऽहमक्षयकुमारकमारकेशम् ॥ ६ ॥ जम्भारिजित्प्रसभलम्बितपाशबन्धं ब्रह्मानुरोधमिव तत्क्षणमुद्वहन्तम् ।रौद्रावतारमपि रावणदीर्घदृष्टि-सङ्कोचकारणमुदारहरिं भजामि ॥ ७ ॥ दर्पोन्नमन्निशिचरेश्वरमूर्धचञ्च-त्कोटीरचुम्बि निजबिम्बमुदीक्ष्य हृष्टम् ।पश्यन्तमात्मभुजयन्त्रणपिष्यमाण-तत्कायशोणितनिपातमपेक्षि वक्षः ॥ ८ ॥ अक्षप्रभृत्यमरविक्रमवीरनाश-क्रोधादिव द्रुतमुदञ्चितचन्द्रहासाम् ।निद्रापिताभ्रघनगर्जनघोरघोषैः संस्थम्भयन्तमभिनौमि दशास्यमूर्तिम् ॥ ९ ॥ आशंस्यमानविजयं रघुनाथधाम शंसन्तमात्मकृतभूरिपराक्रमेण ।दौत्ये समागमसमन्वयमादिशन्तं वन्दे हरेः क्षितिभृतः पृतनाप्रधानम् ॥ १० ॥ यस्यौचितीं समुपदिष्टवतोऽधिपुच्छं दम्भान्धितां धियमपेक्ष्य विवर्धमानः ।नक्तञ्चराधिपतिरोषहिरण्यरेता लङ्कां दिधक्षुरपतत्तमहं वृणोमि ॥ ११ ॥ क्रन्दन्निशाचरकुलां ज्वलनावलीढैः साक्षाद्गृहैरिव बहिः परिदेवमानाम् ।स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नकृपीटयोनि-दन्दह्यमाननगरीं परिगाहमानाम् ॥ १२ ॥ मूर्तैर्गृहासुभिरिव द्युपुरं व्रजद्भि-र्व्योम्नि क्षणं परिगतं पतगैर्ज्वलद्भिः ।पीताम्बरं दधतुमुच्छ्रितदीप्ति पुच्छं सेनां Veera Vimsati वहद्विहगराजमिवाहमीडे ॥ १३ ॥ स्थम्भीभवत्स्वगुरुवालधिलग्नवह्नि-ज्वालोल्ललद्ध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै ।वन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्त-मद्यैव रामविजयाजिकवैजयन्तीम् ॥ १४ ॥ रक्षक्षयैकचितकक्षकपूश्चितौ यः सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः ।दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं लाङ्गूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु ॥ १५ ॥ आशुद्धये रघुपतिप्रणयैकसाक्ष्ये वैदेहराजदुहितुः सरिदीश्वराय ।न्यासं ददानमिव पावकमापतन्त-मब्धौ प्रभञ्जनतनूजनुषं भजामि ॥ १६ ॥ रक्षस्स्वतृप्तिरुडशान्तिविशेषशोण-मक्षक्षयक्षणविधानुमितात्मदाक्ष्यम् ।भास्वत्प्रभातरविभानुभरावभासं लङ्काभयङ्करममुं भगवन्तमीडे ॥ १७ ॥ तीर्त्वोदधिं जनकजार्पितमाप्य चूडा-रत्नं रिपोरपि पुरं परमस्य दग्ध्वा ।श्रीरामहर्षगलदश्र्वभिषिच्यमानं तं ब्रह्मचारिवरवानरमाश्रयेऽहम् ॥ १८ ॥ यः प्राणवायुजनितो गिरिशस्य शान्तः शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशंकरात्मा ।हृद्यो हरस्य हरिवद्धरितां गतोऽपि धीधैर्यशास्त्रविभवेऽतुलमाश्रये तं ॥ १९ ॥ स्कन्धेऽधिवाह्य जगदुत्तरगीतिरीत्या यः पार्वतीश्वरमतोषयदाशुतोषम् ।तस्मादवाप च वरानपरानवाप्यान् तं वानरं परमवैष्णवमीशमीडे ॥ २० ॥ उमापतेः कविपतेः स्तुतिर्बाल्यविजृम्भिता ।हनूमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री वीरविंशतिकाव्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

Veera Vimsati-Kavyam Hanuman Stotram: श्री वीरविंशतिकाव्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् Read More »

Dream Interpretation

Dream Interpretation: ये 4 सपने आते ही समझ जाएं लगने वाली है आपकी लॉटरी, शुरु होगा आपका अच्छा समय

Dream Interpretation: हम सभी जानते हैं कि मां लक्ष्मी को कमल का फूल बेहद प्रिय है. यदि आप सपने में कमल का फूल देखते हैं तो ये एक बेहद ही शुभ संकेत माना जाता है. स्वप्न शास्त्र के मुताबिक सपने में कमल का फूल देखना धन लाभ के संकेत देता है. सपनों की विचित्र दुनिया को समझना सरल नही है। सपने व्यक्ति को भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत देते हैं। कुछ सपने शुभ और कुछ सपने अशुभ फल देने वाले होते हैं। Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र में कुछ ऐसे सपनों के बारे में बताया गया है जिन्हें देखने से आप अंदाजा लगा सकता है कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में कुछ चीजों का दिखाई देना बहुत ही शुभ फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं ऐसे सपनों के बारे में जिन्हें देखने पर आप पता लगा सकते हैं कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। सोते समय सपने देखना बहुत साधारण बात है. अब आप चाहे दिन में सोएं या रात में, आपको कभी भी सपने आ सकते हैं. सपनों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता. कहने का सीधा मतलब ये है कि आप चाहकर भी सोते समय अपनी पसंद के सपने नहीं देख सकते. हालांकि, सपने में दिखने वाली चीजें कहीं न कहीं आपसे जुड़ी हो सकती हैं. सपने में कुआं देखना शुभ होता है या अशुभ, जाने सच आप बुरे सपनों के साथ-साथ अच्छे सपने भी देख सकते हैं. हालांकि, Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र के मुताबिक सपनों में दिखाई देने वाली कई बुरी चीजें अच्छे और शुभ संकेत देती हैं. स्वप्न शास्त्र की मानें तो सपने हमें भविष्य से जुड़े कई तरह के संकेत देते हैं. आज हम आपको कुछ ऐसे सपनों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें स्वप्न शास्त्र में काफी शुभ माना गया है. इस तरह के सपने धन लाभ का संकेत देते हैं. आइए जानते हैं. Shubh Sapne: सपनों की विचित्र दुनिया को समझना सरल नही है। सपने व्यक्ति को भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत देते हैं। कुछ सपने शुभ और कुछ सपने अशुभ फल देने वाले होते हैं। स्वप्न शास्त्र में कुछ ऐसे सपनों के बारे में बताया गया है जिन्हें देखने से आप अंदाजा लगा सकता है कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में कुछ चीजों का दिखाई देना बहुत ही शुभ फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं ऐसे सपनों के बारे में जिन्हें देखने पर आप पता लगा सकते हैं कि आपका अच्छा समय शुरू होने वाला है। Dream Interpretation: ये 4 सपने आते ही समझ जाएं लगने वाली है आपकी लॉटरी, शुरु होगा आपका अच्छा समय Dreaming of bathing with milk:सपने में दूध से स्नान करते हुए देखना सपने में खुद को दूध से स्नान करते हुए यदि कोई व्यक्ति देखता है तो यह बहुत ही शुभ माना गया है। इस तरह का सपने आने का मतलब है कि आपको कोई बड़ी धन लाभ मिल सकता है। इस तरह के सपने आपके अच्छे करियर की तरफ भी इशारा करते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आने पर आपके लिए तरक्की के द्वार खुलते हैं। साथ ही आपको उन्नति मिलने लगती है। इस तरह के सपने आपकी अच्छी आर्थिक स्थिति की तरफ भी इशारा करते हैं। seeing lotus flower in dream:सपने में कमल का फूल देखना स्वप्न शास्त्र Dream Interpretation के अनुसार यदि आपको सपने में कमल का फूल दिखाई देता है तो यह इस बात का संकेत है कि आपके जीवन में मां लक्ष्मी का आगमन होने जा रहा है। मां लक्ष्मी की कृपा से आपकी आर्थिक स्थिति में भी काफी वृद्धि देखने को मिलेगी। साथ ही इस तरह के सपने आपको आर्थिक समस्याओं से छुटकारा दिलाने वाला भी साबित होते हैं। इस तरह के सपने इस बात का भी संकेत देते हैं कि आपकी इनकम के अन्य स्रोत बनने वाले हैं। seeing rain in dream:सपने में बरसात देखना अक्सर लोगों को सपने में बारिश होती दिखाई देती है। Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र में इस तरह के सपनों को भी बहुत शुभ और धनवान बनाने वाला बताया गया है। इस तरह का सपने आने पर आपको अचानक धन लाभ मिल सकता है। आपको अपने किसी पुराने निवेश से लाभ मिलने का संकेत भी इस तरह के सपने देते हैं। साथ ही बारिश का दिखना आपके जीवन में आपके लव पार्टनर के आने का इशारा भी करता है। seeing good food in dream:सपने में अच्छा खाना देखना सपने में यदि आपको अच्छा-अच्छा खाना दिखाई देता है जिसका सेवन आप कर रहे हों। Dream Interpretation स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपने आपके अच्छे समय शुरू होने का संकेत देते हैं। इस तरह का सपना दिखाई देने का अर्थ है कि आपको बड़ी मात्रा में धन लाभ हो सकता है। साथ ही आपको कोई शुभ समाचार भी सुनने को मिल सकता है। साथ ही इस तरह के सपने मन में संतुष्टि के भाव को दर्शाते हैं।

Dream Interpretation: ये 4 सपने आते ही समझ जाएं लगने वाली है आपकी लॉटरी, शुरु होगा आपका अच्छा समय Read More »

Pradosh Vrat 2025

Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग

Pradosh Vrat 2025: भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए भक्तगण हर महीने प्रदोष व्रत रखते हैं। यह पवित्र व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और चूंकि हर महीने में दो त्रयोदशी तिथियां होती हैं, इसलिए साल में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। आइए आपको बताते हैं कि अगस्त महीने में कब-कब यह व्रत रखा जाएगा। साथ ही, पूरे साल की तिथियों के बारे में भी यहां जानकारी लें। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके उनकी कृपा पाने के लिए रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं, उन्हें अच्छे फल मिलते हैं। यह व्रत दुखों को दूर करने, अच्छी सेहत और सुख-शांति पाने के लिए बहुत शुभ माना जाता है। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। Pradosh Vrat 2025 इससे पहले शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के अगले दिन गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस दिन देवों के देव महादेव की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। आइए, भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत की सही डेट और शुभ मुहूर्त जानते हैं- Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग कब है प्रदोष व्रत? (Pradosh Vrat 2025 Kab Hai) भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत बुधवार के दिन पड़ने वाला है। इसके लिए यह बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। बुध प्रदोष व्रत करने से मचाही मुराद पूरी होती है। साथ ही कारोबार संबंधी परेशानी दूर होती है। साधक श्रद्धा भाव से Pradosh Vrat 2025 प्रदोष व्रत के दिन शिव परिवार की पूजा करते हैं। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। Pradosh Vrat 2025 इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) भाद्रपद महीने का Pradosh Vrat 2025 पहला प्रदोष व्रत 20 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि दोपहर 01 बजकर 58 मिनट पर शुरू होगी और 21 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी। इस प्रकार 20 अगस्त के दिन बुध प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। 20 अगस्त के दिन पूजा का समय शाम 06 बजकर 56 मिनट से लेकर 09 बजकर 07 मिनट तक है। साधक अपनी सुविधा अनुसार समय पर स्नान-ध्यान कर देवों के देव महादेव और जगत की देवी मां पार्वती की पूजा कर सकते हैं। वहीं, प्रदोष काल में महादेव की पूजा- आरती अवश्य करें।  What is effective in Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत में क्या खाएं? त्रयोदशी तिथि के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें और महादेव का ध्यान कर व्रत का संकल्प लें। प्रदोष व्रत के दौरान खानपान (Pradosh Vrat me kya kya khaye) के नियम का पालन करना चाहिए। Pradosh Vrat 2025 व्रत के दौरान संतरा, केला, सेब समेत आदि चीजों का सेवन कर सकते हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है साथ ही दूध, दही, सिंघाड़े का हलवा, साबूदाना की खिचड़ी, कुट्टू के आटे की पूड़ी भी व्रत थाली में शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा नारियल पानी और समा चावल की खीर भी खा सकते हैं। What not to eat during Pradosh fast: प्रदोष व्रत में क्या न खाएं? प्रदोष व्रत के दिन लहसुन और प्याज (Pradosh Vrat me kya nahi khaye) का सेवन करने की सख्त मनाही है। इस दिन मांस मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए। इसके अलावा व्रत के दौरान गेहूं, चावल का सेवन करने से करना बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन चीजों का सेवन करने से व्रत खंडित हो सकता है और जातक को महादेव की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग Read More »

Narayana Guru Jayanti

Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती

Narayana Guru Jayanti: श्री नारायण जयंती केरल का एक राज्य त्योहार है। यह मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में ओणम के मौसम के दौरान छठयम दिवस पर मनाया जाता है। श्री नारायण गुरु जयंती केरल राज्य में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक अवकाश है। यह नारायण गुरु के जन्मदिन का उत्सव है, जो एक समाज सुधारक और संत थे। जहां उन्होंने आध्यात्मिक उत्थान के लिए ध्यान-साधना में खुद को लीन कर लिया, वहीं उन्होंने केरल में उन लोगों के सशक्तिकरण के लिए भी काम किया, जो जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण पददलित थे। Narayana Guru Jayanti श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के नक्शेकदम पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक भाईचारे को अपनाया और प्रचारित किया। Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती श्री नारायण गुरु जयंती तिथि: बुधवार, 20 अगस्त 2025 केरल में श्री नारायण गुरु जयंती कैसे मनाई जाती है श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। Narayana Guru Jayanti यह राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है।इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों का उपयोग करके पुष्पांजलि से सजाया जाता है। लोग महान गुरु की याद में सामंजस्यपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों पर विशेष जोर देते हुए सामुदायिक दावतों का आयोजन किया जाता है। Narayana Guru Jayanti यहां आम प्रार्थनाएं भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या पंथ से परे लोग शामिल होते हैं।शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये बातचीत और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। श्री नारायण जयंती समारोह श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है। इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे-चौड़े हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों से पुष्पांजलि अर्पित करके सजाया जाता है। Narayana Guru Jayanti लोग महान गुरु की स्मृति में सौहार्दपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों के लिए विशेष रूप से सामुदायिक भोज आयोजित किए जाते हैं। Narayana Guru Jayanti इसके अलावा, सामूहिक प्रार्थनाएँ भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोग शामिल होते हैं। शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये वार्ताएँ और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है श्री नारायण गुरु की विरासत श्री नारायण गुरु का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब केरल के समाज में जाति व्यवस्था व्याप्त थी। एझावा जाति में जन्मे, जिसे निचली जाति माना जाता था, उन्होंने समाज के उच्च जाति वर्ग द्वारा अपने साथ किए जाने वाले भेदभाव का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। मलयालम में उनकी सबसे प्रसिद्ध उक्ति का अनुवाद है, “एक जाति, एक धर्म, सबके लिए एक ईश्वर”। नारायण गुरु ने तथाकथित निम्न जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए राज्य भर में 40 से ज़्यादा मंदिरों का प्राण-प्रतिष्ठा किया। जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ प्रसिद्ध “वैकोम सत्याग्रह” आंदोलन, जो वैकोम स्थित श्री महादेव मंदिर के इर्द-गिर्द केंद्रित था, एक ऊँची जाति के व्यक्ति द्वारा नारायण गुरु को प्रसिद्ध मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर चलने से रोकने के कारण शुरू हुआ था। Narayana Guru Jayanti इसके परिणामस्वरूप अंततः सभी प्रतिबंध हटा दिए गए और सभी को, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो, मंदिर की ओर जाने वाले सार्वजनिक रास्तों पर चलने की आज़ादी दी गई। शिवगिरि तीर्थयात्रा 1924 में उनके आशीर्वाद से स्वीकृत हुई और उनके तीन शिष्यों द्वारा आरंभ की गई और आज भी जारी है। गुरु के मार्गदर्शन में, यह तीर्थयात्रा स्वच्छता, शिक्षा, भक्ति, कृषि, हस्तशिल्प और व्यापार के गुणों को बढ़ावा देने के लिए की जाती है। तीन प्रमुख पवित्र ग्रंथों का अनुवाद करने के साथ-साथ उन्होंने मलयालम, तमिल और संस्कृत में अपनी 40 से अधिक कृतियाँ भी प्रकाशित कीं। श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के पदचिन्हों पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक बंधुत्व को मूर्त रूप दिया और उसका प्रचार किया। केरल का एक अधिक मानवीय और समतावादी समाज के रूप में विकास इन्हीं पदचिन्हों पर आधारित था। श्री नारायण गुरु का देहांत 20 सितंबर 1928 को हुआ। आज, यह दर्शन केरल राज्य के लिए जीवन पद्धति है।

Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती Read More »

Krishnamangalam

Shri Kaviraja Stuti: श्रीकविराजस्तुतिः

Shri Kaviraja Stuti: श्रीकविराजस्तुतिः Shri Kaviraja Stuti:विलोचनकदम्बकं यदुपलभ्य लुभ्य त्किमा- लिलेह न हि किं पपौ न हि ममज्ज किंवा न हि ।परं तु किमिवाभवन्नवतमाललक्ष्मीतिर- रिक्रयानिगमसाम्प्रदायिकमुपास्महे तन्महः ॥ १॥अबालकजवाधरः सलिलवाहवाहद्युतिः नवाब्जवनवादिदृग्बृहदवार्यबाहुद्वयः ।स वाङ्मनसबाह्यद्दक्प्रमदवारवारां निधिः भवाल्लवणवारिधेः सविधवासवानुद्धरेत् ॥ २॥यदीयसुषमावलोकनमुदः शरत्कौमुदी- कदम्बपरिशीलनप्रमदधाटिकाचेटिका ।तदम्बुदकदम्बडम्बरविडम्बिकिञ्चिच्छर- त्सरोजदुरहङ्कृतेरनवकाशनेत्रं भजे ॥ ३॥सिताभ्रचयपङ्किला विधुशिलाम्बुवापीविधु- प्रभामयसरोजिनी यदि सृजेत् प्रसूनं नवम् ।तदीयमुपमा यदीयनयनस्य नः स्पर्धिनी- ममन्दमुदमम्बुधेस्तटकुटीचरं तक्रियात् ॥ ४॥कुतूहलमयी हरिन्महमयं नभोमेदिनी प्रमोदलहरीमयी जगति यत्र कुत्र क्वचित् ।मतिः परमरंस्त यद्वदनबिम्बसञ्चुम्बिनी तदस्तु वटभूरुहस्तटचरिष्णु धाम श्रियै ॥ ५॥किमद्भुतततेः किमुल्लसनसम्पदः किं महो- त्सवस्य कुतुकस्य किं किमु जगत्त्रयीविस्मृतेः ।बभूव हृदयं यदाननविहारि जाने न तत् पुनातु लवणाम्बुधे सविधचुम्बि किञ्चिन्महः ॥ ६॥अधीनमिति यत्कृपानिमुखमित्यशेषोपमा ससङ्ग्रहमिति द्युतिः प्रणयपूर्णमित्युत्सवः ।अजस्रमनुशीलयत्यधिकलुब्धमित्यक्षित- द्वटाव निरुहस्तटीघटितधाम धामाश्रये ॥ ७॥यदीयरजसां गणः कबलितोडुवासां गणः पतत्यमिततारकप्रियकरच्छटाकारकः ।सुधां किरति यत्कलाकरपुलाकराशिर्दृशो- स्तमम्बुधितटीचरं कमपि कान्तिसारं भजे ॥ ८॥सुधांशुमयमाम्मुसुमांसलमृजं सुधारासुधा- विधौतमतिनिर्मलप्रबलकौमुदीप्रोत्थितम् ।परस्परविघर्षणैर्दहितशार्मणस्रोतसं भुवि क्वचन पुञ्जितं मधुरिमाणमन्तर्भजे ॥ ९॥प्रतिक्षणरतिक्षणप्रदमुरारिपादद्वयी- विहारसुखसञ्चितद्रढिमनीलशैलद्रवे ।अपाकृतबलस्त्रपाभरजयाय मादृङ्मनो- द्रवं विरचयन्मदं मधुरिमा स कोऽपि क्रियात् ॥ १०॥वदान्ययशसो जगद्विजयगर्वगम्भीरिमा तुलाकणकलङ्कितानवसरः क्षमासम्पदः ।महोर्मिभरिताद्भुतस्तबकिता कृपाचातुरी तुरीयपुरुषार्थदं जयति मर्म शर्म श्रियाम् ॥ ११॥दृशोरमृतवापिकामधुरिमैकधाराधरे घनप्रमदकन्दलो वपुषि पानबाहुद्वये ।भवामयपयोनिधेस्तरणसेतुरव्याहतं पदं मनसि काचनाचरतु सा चितश्चातुरी ॥ १२॥मदंहसि मदं हसत्पलमनूननानैनसां प्रचण्डिमपिचण्डिले मरुति हिण्डमाने मुहः ।चलत्पतितपावनाधिपपतातिकास्तम्भकृ- त्किमाततभुजद्वयः स मयि निर्दयः किं भवेत् ॥ १३॥परे तपति विक्रमाह्वयनिदाघचण्डातप- व्यथादलनकेलिकौतुककदस्ववानम्बुदः ।क्रियाज्जलधिकूलभृन्मुदितभाव्यलक्ष्मीवधू- प्रसाधनविधौ हरिन्मणिजदर्पणस्तर्पणम् ॥ १४॥सखे किमुपलभ्य कां ननु दशां भजे वेद्मि नो परस्परमिति ब्रुवद्वचनसत्यतासिद्धये ।निमज्ज्य सुखनीरधौ न हि बहिर्ययौ दृङ्ममनो- द्वयं यदवलोकने तवलोकवाञ्छास्तु नः ॥ १५॥दुरुद्धरमहाधमाधिपतिमादृशोद्धारणा- तिभारगिरिविघ्नवन्मधुरिमाब्धिजीचिप्लवः ।जगन्नयनभाग्यवैभवमहौषधीवाधव- द्वयाद्रवमयोदयः स्फुरतु कोऽपि मन्मानसे ॥ १६॥महोत्सवकरम्बितामितरगन्धशून्यापर- प्रमोदमयसृष्टिमुल्लसितलोभकोशं दृशोः ।अकण्टकविलुण्ठनापणमनश्वरश्रेयसां मुहुर्मुहुरहं महोघनमहोज्ज्वलं कामये ॥ १७॥कलङ्ककपटस्फुटोदररजच्छटापङ्किलं यन्दाननसुधाम्भसः कलुषहृत्पटीमण्डलम् ।धिनोति वसुधां सुधामयमयूखमाली मुहुः मम प्रमददोहनः स भवताज्जगन्मोहनः ॥ १८॥यदाननसुधाकरद्युतिसुधाधिपानेच्छयोः मुहुर्विवृतसर्वतोमुखमतित्वरं धावतोः ।अनाविलमणीमयाभरणमन्तरायस्त्विषा भवन्नयनयोर्ममाभयनयोदयं सङ्क्रियात् ॥ १९॥सपत्नविरहो महोल्लसितमाधुरीसम्पदां सहासननवोत्सवो निखिलमोहलक्ष्मीततेः ।परप्रमदकन्दलीवलदमन्दलीलाभरः स रक्षतु पुरस्सरः सरसिजस्रजश्चक्षुषा ॥ २०॥पराजितवराकरक्तकनवौष्ठलेखाकरः श्रिया विमलनाकरक्षणशिलाविलासाकरः ।मुखेन हरिणा करम्बितसुधांशुनिन्दाकरः स मेऽस्त्वघनिराकरः खलु गृहीतपद्माकरः ॥ २१॥कृपालुकुलमौलिना सपदि येन सम्पत्तथा वनीयकमनीयतापदतनूरुचिन्तापदम् ।शितिक्षितिमहेन्द्र हे शरण शून्यताशालिनां गणे सुरतरूपमोचितमहे भवं ध्यायताम् ॥ २२॥श्रियं च सुहृदे ददद्वितरसन्मतिं भूपजा- ङ्गणे सुरतरूपमोचितमहे भवं ध्यायताम् ।जबाधरदरस्मितं मुखरुचा महेन्द्रप्रभा- करम्बिततमालसारसदृगन्तरं गाहताम् ॥ २३॥दिशं विरचयन्महो विपुलबाहुपुष्पावली करम्बिततमालसारसदृगन्तरं गाहताम् ।अरे हृदय यः सुधारसनिधानवेणुध्वनि वनेजनयनाशयातनुतनुतराधिकारङ्गदम् ॥ २४॥तमीक्षणनटं सकृत्तटवतीशतीरस्थली वनेजनयनाशयातनुतराधिकारङ्गदम् ।प्रपन्नपरिपालने पतितपावने पाटवी पवित्रपदपङ्करुटपतनपूतपाषाणकम् ॥ २५॥पयरसुपरिपन्थिपीडितपदः स पाता प्रभुः प्रियं प्रतनपूरुषः परमपुण्यदः पूरयेत् ।महेन्द्रमणिमञ्जुतां मलिनयन् महोमण्डलैः मनोहरमहामहामधुरमर्मणां मर्दनः ।महीध्रमयमन्दिरो मनुजमत्ततामञ्जरी मधुर्मथनकृन्मथोर्मसृणयेन्मदीयां मतिम् ॥ २६॥उदञ्चितसमुच्चकोरकरुचिप्रसूनस्मितं- स्फुरत्तरलतातिखेलदलकान्तभालास्यभृत् ।स्वरूपमिह ते न कः प्रकटवासवेलावने जजल्प कुशलान्यनल्पय मुकुन्द कल्पद्रुम ॥ २७॥सुधारसमयोदयं मुहुरुदञ्चयन् यः स्वरू- पलक्षणरुचिच्छटापटिमपूरिताशातटः ।धनाञ्जनरुचिं दधाति बहुधा नवैराश्रितो महोभिरनिशं दिशेत् कुशलमम्बुजाक्षोऽम्बुदः ॥ २८॥अरङ्कुधरधामवन्नरजनीमहोल्लासभृ- त्कलापचयपूर्णविग्रहमहः श्रिया भास्वरम् ।नकैरवगतां मुदं दिशति यन्नदीनोदये पराङ्मुखमहं भजेऽद्भुतसुधानिधिं धाम तत् ॥ २९॥अनुक्षणरसार्द्रतां सृजति यो यदीयं वल- द्विनोदकमलं वपुः कलयतोऽपि यस्योदयः ।न चन्द्रकिरणोच्चतामपि च ताडितालोकस- न्तनिर्यमनुमोदिता स्मर तमद्भुताम्भोधरम् ॥ ३०॥तुलानवसरोजबानवमरो जवामौष्ठदृ- ग्घनाञ्जनकलापगञ्जनकलापगर्हच्छविः ।भुजायुगमहोकचायुगसहोरुचातुर्यभा- ग्भुजन्मदवलम्बतां मदबलं दृढार्तेर्हरेत् ॥ ३१॥भविष्यदरुणानुजध्वजवियोगचिन्ताशुचो विभिन्नशितशैलभृद्गलितरक्तधारोपमम् ।शिवं दिशतु नीलभूधरविलग्नसोपानभू- पतद्बहलतूलतुन्दिलविशालशोणांशुकम् ॥ ३२॥हृदामितरवृत्तिभिः सह विधूतमूर्तिक्षणं समं कमलकोरकाकृतिकरैरुदस्तं ततः ।स्खलत्तदनुपीठतः सह सहस्रनेत्रोदकैः क्रियात् किमपि मन्महः श्रियमनारतं तन्महः ॥ ३३॥नदेशनिनदाधिपल्लवितलोककोलाहला स्फुटार्तिविनिवेदनाश्रवणसावधानः किमु ।सलीलसवनस्थलीगमनकौतुकोपक्रमे तिरोवलितकन्धरो धरधुरन्धरोऽस्तु श्रियै ॥ ३४॥जगद्विहरणोचितस्वतनुसङ्गहासाङ्गतो- तरङ्गरुचिरङ्गससङ्ग्रहविधित्सया किं धुतः ।गमोत्सवसमुत्सुको द्यतुमहं ह सारंहसा बलान्यधवलावनीधरवनीवसन्तो विभुः ॥ ३५॥प्रमोदजलधौ निमज्जति मनो जलार्द्रा दृशः कदम्बकुसुमश्रियं हरति वर्ष्म बद्धोऽञ्जलिः ।प्रधावति जयध्वनिर्निपतितं शिरोभूषणे स कोऽपि समयः क्रियादिति चरित्रचित्रः श्रियम् ॥ ३६॥पुरा परिचितेतरप्रणयचातुरीं कस्यचि- न्मतिं नवकुमुद्वतीमभिलषन्तमालिङ्गितुम् ।वहन्तमवरोहणं किमु कलाकरं तं भजे शितिक्षितिधरः स्खलद्विपुलगण्डशैलोपमम् ॥ ३७॥शनैरतुसरत्तरप्रमदवारिपूरेक्षण- प्रमुक्तजनतेक्षगप्रकरसानुरोधः किमु ।स्वकीयचरणद्वयीविहरमाणभक्ताशय- व्यथालवविशङ्कितः किमु मृदु ब्रजन् पातु सः ॥ ३८॥अनाथजनतार्पितं भरणभारमाविर्भव- त्कृपादरमुपादेत् किमु विलासयात्रालसम् ।दरोदितशिरोनतिः क्वचन चारु गारुत्मत- प्रभालधिनकारु तद्भवतु दारु कारुण्यभाक् ॥ ३५॥विपन्नजनतावनप्रचुरधावनत्रासतः सदारतिकरक्षणव्यतिकरस्पृहोल्लासतः ।विलम्बमवलम्ब्य चुम्बति नितान्तधीरागति- र्यदीयपदसारसं समदसारसङ्गं हरेत् ॥ ४०॥विधूतिमभितो दधद्बहुविधां मुहुर्मादृशा- मनुद्धरणदुर्दमाद्बहलदुर्यशःकर्दमात् ।समुद्धृतिविधानकृन्मुरहरस्य लोकोत्तरो जयत्यतितरां हरेरपि हरेः प्रयाणोत्सवः ॥ ४१॥मुहुः परिजनोत्करैर्धृतगुणैः कृताकर्षणो नरप्रकरवीक्षितः सकरतारकोलाहलः ।गृहीततनुरुत्तरैरलसयानशीलोऽवतु ब्रजेशपुरनागरीवसनतस्करो दुष्कृतात् ॥ ४२॥सुखाम्बुधिगभीरतावकलनादिवोर्ध्वस्फुर । द्भुजाधिविनिवेदनाप्रवणलोकसन्तानकम् ।मृदङ्गरवरङ्गतुङ्गिमतरङ्गिघण्टारवं भजे पशुपदारदृक्पतनपात्रयात्रोत्सवम् ॥ ४३॥महीतलमहो जगद्विजयवादिनिःसाणज- प्रणादभरनिर्भरभ्रमधुरीणसन्नाहिनम् ।भजे चलपरेतराट्पतितराज्यधैर्याचल- स्खलत्पृथुशिलारवप्रतिममङ्घ्रिघोष हरेः ॥ ४४॥स्वतः प्रसरणोत्सुकामरुणचेलभामेलना- दश‍ृङ्खलितखेलितां नवसुधांशुधारोन्मदाम् ।विधूननपम्परोदयविधूतसाम्यासनां भजामि वदनद्युतिं मदनमोहनस्य प्रभोः ॥ ४५॥करोद्धरणवाञ्छया करिवरस्य गाढत्वचा- वगाढसरसीमिलन्मलिनकण्टकैः पीडनम् ।नतोन्नतनिजाङ्गजङ्गमतयेव संसूचय- न्युपाधिविगलत्कृपानदनृपालपादोऽवतात् ॥ ४६॥कनत्किसलयावलीसुललितप्रभारामव- न्नवारुणरुचारुणेक्षणविपत्त्रियामान्तवत् ।महेन्द्रमणिमानसम्पदणिमानमानर्तय- ज्जयत्यतिलसज्जवाविजयसन्जवासो महः ॥ ४७॥वपुर्लवणिमोर्मिषु प्रतिफलन्निजास्यप्रभा- वलोकनबलोत्थिता मम विमोहिता नोहिता ।भवेदिह महाधमोद्धरणपात्रयात्रोदये मुरारिरिति चिन्तयन् किमु समावृताङ्गोऽवतात् ॥ ४८॥अये हरिपदद्वये हृदयखेलदेलातिगं तदीययुगपद्गतौ बत कुतो विमर्शस्तवः ।यतस्तदपदोषमानसपदं वदन्ति त्वया विमृश्यमिदमेव यद्भवति विभ्रमश्रीर्गतिः ॥ ४९॥मुकुन्दमुखवापिकाजगदपूर्वलक्ष्मीसमु- द्नमाग्रसरबुद्बुदप्रतिममिन्दुबिन्दुव्रजम् ।प्रफुल्लतरमुल्लसद्भुवनमोहवल्लीनव- प्रसूनवलयभ्रमं प्रबलयन्तमन्तर्भजे ॥ ५०॥दुरापरमणीयमारमणवक्त्रकान्तिच्छटा- वलोकनवलोभतः किमु शिरस्तटोर्ध्वं गता ।मदीयनयनायनीभवतु कापि यात्रोत्सवो- त्सुकस्य परमेशितुश्चरमचुम्बिनी पट्टिका ॥ ५१॥जनार्दनदृशोर्भृशोल्लसितपुण्डरीकोत्करा- धिराज्यगरिमोपरि स्फुरितचामरोड्डामराम् ।भजे फणिफटाच्छटानटललाटसीम्नि भ्रुवोः स मां विलसितामनाविलसिताभ्ररेखाद्वयीम् ॥ ५२॥हरेर्गमननिस्वनैः शमनयातनानिःसर- न्मुरारिपुरसम्मुखप्रबलपापिनां विघ्नदौ ।विघातविनिवारणं निगदितुं किमु द्वाःस्थितौ विहायसि विहारदृक् क्वचन चक्रभृत् पातु नः ॥ ५३॥नृलोकविषदोल्लसत्सुकृतजालबद्धं बहि- र्गतं श्रुतिशिरोऽम्बुधेः किमपि रत्नमभ्रप्रभम् ।महीपटतटस्थलीललितलोचनालङ्क्रिया प्रियाणि च फलं क्रियाद्वसनदामनद्धो हरिः ॥ ५४॥ललाटतटभूनदपटुकृरग्टकनकदल- न्नवीनशतपर्विकास्तबकमिन्दुबिन्दुत्विवाम् ।तरङ्गनिकरं गतावधिमधिश्रयद्विस्मृतं प्रयातु वदनं न कम्पवदनन्तशोभाम्बुधः ॥ ५५॥गमक्रमकुतूहली क्व च दधद्ममी विभ्रमी समुद्धटितभङ्गिमन्दिरकपाटवरपाटवम् ।गुणालयमृणालिनीकुसुमकान्तिकीर्ति श्रिया- मनध्ययनलोचनः कलुषमोचनं नः क्रियात् ॥ ५६॥नखद्युतिविलासवैभवलवार्थिकोटिक्षयां करप्रकरमाधुरीपदनिपातदैन्यग्रहात् ।ध्रुवं म्रदिमशालिसुन्दरगतिर्गतिर्मादृशां दृशा विशदपुष्कर द्युतितिरस्क्रियादुष्करः ॥ ५७॥अगाधनिजमाधुरीधृतनिमञ्जनायाः श्रुतेः विकर्षणवशादिवोत्तरलमौलिभिर्मानवैः ।गृहीतमरिजैत्रयात्रिकमिवाखिलाशाचरं भजे मुरजयि क्षणे मुरजघण्टिकानिस्वनम् ॥ ५८॥निमेषकणिकाविपद्युवतिदर्शनं दुष्क्रिया- द्विषन्विविधविभ्रमो नृपचमुर्जुगप्सास्पदम ।यदन्यदखिलं तदप्यपथमेव यस्मिन् दृशो- र्मुकुन्दवदनस्पृशोः स समयोस्तु नः श्रेयसे ॥ ५९॥विलोकितमितस्ततो विरचयग्निवान्वेषय- न्ननाकलितमादृशः किमु नताननो लज्जया ।मदीयपतितावलीनृपतितासहस्रासहा सहस्रदलदा ? सर्षदविलोचनः सम्भवेत् ॥ ६०॥मुहुर्मथितलोचनोच्चयविषादचक्रं चर- त्तमालतरुमस्तकोत्थितसिताब्जमत्यद्भुतम् ।चलद्दलितकज्जलद्युतिमुरारिमौलौ मिल- त्त्विषा धवलदीधितेः प्रबलमातपत्रं भजे ॥ ६१॥चलन्नृहरिभूतिवैभववनीसमुद्भेदव- न्महाद्भुतमहीरहबृहत्पलाशोपमम् ।स्मरामि दियदुन्मुखं किमपि मण्डलाकारभृ- त्पटेन घटनाद्धनाघनघटानिभेनोद्भटम् ॥ ६२॥परेतपृतनापतिः पतितमण्डले चण्डता- मखण्डबहुदण्डदां प्रकटरान यदाकर्णनम् ।गतेषु पतितेषु पूजनजनम्रतासम्भ्रमं त्रपाबहलमावहत् स हृदि गाहतां काहलः ॥ ६३॥धनांशुमघनाशिनाकृतिघनाघनाडम्बरं विलोक्य विहितप्रडीनगतयोऽगतीनां गतेः ।दृगम्बुजविहारलोभत इवापतन्तः स्थित- च्छदाश्चलदुपर्यधो जयति चामराणां कुलम् ॥ ६४॥प्रहारशकलीभवन्नमुचिवैरिकैरोटभू- जुटन्मणिगणोच्चलत्तरझणक्रियामांसलः ।पलायनपरायणव्यसनवारहाहारवा- नवाप्य कलितोन्नतिर्जयति कोऽपि वेत्रध्वनिः ॥ ६५॥जगत्त्रितयभानकृद्यदुकुलप्रदीपप्रभा- प्रभासनसमुद्भवस्मयरसादिवोद्ग्रीवताम् ।गतैः किल शिखाशतैर्घनतमास्तमाघस्मराः स्मरामि धरणीपतेः सरणिदीपिका दीपिकाः ॥ ६६॥रसास्थितिवशाकृपानिधिकृपाकटाक्षास्पदं ततो विधिबलावरजमौलिसीमां गतः ।अनाप्तजलजाक्षवीक्षणलवस्तदाकाङ्क्षया विनम्रवदनोघटस्त्रुटितजीवनः पातु नः ॥ ६॥शरद्विमलकौमुदीमयमहीमहाह्लादभू- धरोपरि परिस्फुटामृतझरीव लीलावहा ।सुधाधरणिरोहणत्रिजगतीमनोमोहनो- त्तमाङ्गतलनिर्गलत्सलिलनिर्झरी पातु नः ॥ ६८॥स्वजातकुसुमस्त्रजामसमभावलावण्यकृ- न्मुरारिमुखहक्पदाम्बुजसमुच्चलश्रीलवः ।अवाप्तुमिव माधवाननविलोचनाङ्घ्रिद्वय- क्रमभ्रमणविभ्रमप्रियमदभ्रमम्भः क्रियात् ॥ ६९॥मुखेन्दुमथ लोचनं स्वसुतवैरिभावान्निजा धिपाभरणलोहितोपलकुलश्रियो लुण्टनात् ।स्वशैत्यविजयाद्रदच्छदहृदोश्च सीमेत्यज- द्भजद्भुवनपावनं चरणमम्बु विष्णोर्जयेत् ॥ ७०॥वहन्तमलमम्बुदं स्ववहनाधिकस्निग्धतां पपौ दलितकालियो ललितकालिमाडन्बरैः ।रुषेत्वपनयत्पयोजनयनस्य नैल्यं मुहुः पयो जनयतु प्रियाण्यनयतुष्टिभाजो मम ॥ ७१॥निपीय वदनाम्बुजोदरमरन्दवृन्दं हरेः पदाब्जमधुलालसागतमिलिन्दमाला किमु ।विधौतमुखवर्णकैः शितिपुषां पयोविनुषां ततः सपदि पातु काचन कृपालुतः पातुका ॥ ७२॥जगत्त्रितयचित्तमोहनमनुपदेशाय किं कपोलतलचुम्बिनः कति च केचन श्रीपतेः ।विलोचनपिधायकाः किमतिलुण्ठनाय श्रियां दिशन्तु मदनामयं वदनवारिपूरा हरेः ॥ ७३॥कचिद्द्रुतगतिश्रियो हृदयचौर्यभीता इव क च स्थिरतरा जगन्नयनरुद्धमार्गा इव ।दिशन्तु मम सन्ततं स्खलनशोभिताम्भोधिजा- धिवास्यशरदिन्दवः कुशलमम्भसां बिन्दवः ॥ ७४॥लसद्वसनदामसन्नहनयन्त्रणानर्गल- स्खलत्कमललोचनाननसुधांशुपीयूषवत् ।मिलन्मलयसम्भवद्रवकदम्बवल्गुच्छवि च्छिनत्तु दुरितामयं किमपि वारिधारामयम् ॥ ७५॥विलोचनविलुण्ठितामृतमुखालयोद्घाटना- तटद्वयनटद्विशङ्कटकवाटयुग्मोपमम् ।भजाम्यभिषवोत्सवोत्तरतरङ्गिकेलीकर- क्रियस्य कमलाकरग्रहकरस्य कर्णद्वयीम् ॥ ७६॥धनः क्वगतमात्मनो मदमदभ्रमाहूतवान् परेतसदृशि द्युतौ प्रतिकरोति पाथोरहम् ।रसातलगतं विधुर्मधुरिमाणमाकृष्टवान् यदङ्गनयनाननावरणतः स्वपन् पातु सः ॥ ७७॥अखण्डसुखसम्पदानयनयोः शितिक्षमाधर- स्थलीसुषमया निशारतिगुरोर्विषादश्रिया ।समं समदमुत्थितः प्रभुरभूतपूर्वं क्रियात् कृपाविपुलसम्पुटप्रतिमदृष्टिरिष्टं मम ॥ ७८॥प्लवप्रवररामणीयक इवाभिलुब्धोत्थितं सुधामयमरीचिमण्डलपिचण्डमध्यात् किमु ।घनप्रमदमर्मतः किमु समुद्धृतं शर्म तत् करोतु करुणानिधेरभिनवाक्षियुग्मं गम ॥ ७९॥अनादृतजगस्थितेर्निजरथैकवासोद्वल- त्कलेश्च रुचिसन्ततेः स्वरथसन्निवेशावनीम् ।विमृश्य विभजद्धृवं रथतटभ्रमीविभ्रमि क्रियान्मुहुरदभ्रमिष्टचयमभ्रमित्रं महः ॥ ८०॥मनोवचनयोगिचिन्तनपरिच्युतश्रीधरा- धिरोहणमहोत्सवोन्नतनिमित्ततां दर्शयन् ।तुलामुचि रुचिच्छटापटिमविक्रियात्पातक- व्यथाहररथाङ्गभृन्मम मनोरथानश्लथान् ॥ ८१॥रथो मुरहरत्विषा विकसता विलासेन सा सलोचनचयेन सप्रमदसम्भवेनाम्भसा ।तदप्यमितवीचिभिर्गहनतां जगाहे यतः स तर्पयतु दर्पहृत् कलिमलस्य कोऽपि क्षणः ॥ ८२॥स्वकीयसुरनिम्नगाप्रभृतिलीर्थराजीनृपा- भिषेकमुकुटं शिरस्यसितशैलचूडामणिम् ।अधोऽप्यमरधोरणीमुकुटधाटिकामावह- द्रथोपरि परिस्फुटं किमपि पीठमन्तर्दधे ॥ ८३॥हरेर्यदभवत्त्विषां भुवि तदेव तादृक् पुन- र्वदेन्ननु वदेन्न तद्यदभवद्रथारोहणे ।विलोचनचयोत्कथोपरि विभावयत्तच्च किं शुभानि यदिदंविधं तदनिशं विधत्तां महः ॥ ७४॥किमद्रवमयी सुधा न धवलाकृतिश्चन्द्रिका न बिन्दुपतनान्विता प्रमदवृष्टिरत्युन्नता ।शताङ्गमधिरोहतः स्फुरतु कापि केलीमन- स्तटे तटविटप्यधः स्फुटकृटी नटस्य प्रभोः ॥ ८५॥विकीर्ण इव कुत्रचित् कचन दुर्मदोर्मिक्रमः क्व

Shri Kaviraja Stuti: श्रीकविराजस्तुतिः Read More »

Krishnamangalam

EkAkSharakRiShNamantram:एकाक्षरकृष्णमन्त्रम्

EkAkSharakRiShNamantram:एकाक्षरकृष्णमन्त्रम् ॐ पूर्णज्ञानात्मने हृदयाय नमः ।ॐ पूणैश्वर्यात्मने शिरसे स्वाहा ।ॐ पूर्णपरमात्मने शिखायै वषट् ।ॐ पूर्णानन्दात्मने कवचाय हुं ।ॐ पूर्णतेजात्मने नेत्राभ्यां वौषट् ।ॐ पूर्णशक्त्यात्मने अस्त्राय फट् ।इति दिग्बन्धः ॥एकाक्षर श्रीकृष्णमहामन्त्रस्य -ब्रह्मा ऋषिः – निचृत् गायत्री छन्दः – श्रीकृष्णो देवता -श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ध्यानम्ध्यायेद्धरिं मणिनिभं जगदेकवन्द्यं सौन्दर्यसारमरिशङ्खवराभयानि ।दोर्भिर्दधानमजितं सरसं सभैष्मी-सत्यासमेतमखिलप्रदमिन्दिरेशम् ॥मूलमन्त्रं ॐ – क्लीं – ॐइति एकाक्षरकृष्णमन्त्रं सम्पूर्णम् ।

EkAkSharakRiShNamantram:एकाक्षरकृष्णमन्त्रम् Read More »