Geeta Adhyay

Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष

Geeta Adhyay: श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। श्रद्धा से किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है। अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण की अमावस्या तक कुल 16 दिन तक श्राद्ध रहते हैं। इन 16 दिनों के लिए हमारे पितृ सूक्ष्म रूप में हमारे घर में विराजमान होते हैं। श्राद्ध में श्रीमद्भागवत गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए। इस पाठ का फल आत्मा को समर्पित करना चाहिए। Geeta Adhyay: पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए…. भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष की शुरुआत होती है, जो कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक कुल 16 दिन का होता है. पितृ पक्ष के इन सोलह दिन हम अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार इस दौरान सूक्ष्म रूप से हमारे पितर हमारे घर में विराजमान होते हैं और हमारे द्वारा किये गये श्राद्ध कर्म से तृप्त होते हैं. अपने पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया मुक्ति कर्म ही श्राद्ध कहलाता है और उन्हें तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं. तर्पण को ही पिंडदान भी कहा जाता है. श्रीमद भगवत गीता के 7वें अध्याय में श्राद्ध कर्म का उल्लेख मिलता है. श्राद्ध के दिन भगवत गीता के सातवें अध्याय का महात्म्य पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए और उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए. बता दें कि Geeta Adhyay श्रीमद भगवत गीता का वो ज्ञान जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था. Geeta Adhyay इस गीता का सातवें अध्याय पितृ मुक्ति और मोक्ष से जुड़ा है. श्राद्ध पक्ष में गीता के सातवें अध्याय का पाठ किया जाता है. जिसका नाम है ज्ञानविज्ञान योग. शास्त्रों में इसे पितरों के कल्याण का सबसे सरल उपाय बताया गया है. कहा जाता है कि पितृ पक्ष में श्रीमद भगवत गीता की कथा को सुनने मात्र से ही पितृ दोष से मुक्ति मिल जाती है. गीता का पाठ पितरों को मोक्ष दिलाने का अटूट साधन है. मान्यता है कि परिवार के किसी पूर्वज की मृत्यु के बाद अगर उसका अंतिम संस्कार भलीभांति नहीं किया जाता है या फिर उसकी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है तो उसकी आत्मा अपने घर और आगामी पीढ़ी के इर्द गिर्द ही भटकती रहती है और वहीं अतृप्त आत्मा परिवार के लोगों को कष्ट देकर अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दबाव बनाती है. ऐसे ही Geeta Adhyay पितृ दोष को दूर करने के लिए हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध कर्म ही मृतक को वैतरणी पार कराता है. पितृ पक्ष में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करना सबसे प्रभावशाली होता है. गीता में श्रीकृष्ण ने खुद कहा है कि ‘सर्व धमार्न परित्यज्य माम एकम शरणम व्रज’ अर्थात सभी परंपराओं और युक्तियों को छोड़कर जो व्यक्ति केवल श्रीकृष्ण की आराधना करता है. उसके लिए बाधाएं अवसर में और कांटे फूल में बदल जाते हैं. श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली वाणी का वर्णन है. इसीलिए जब संकट में भगवत वाणी का श्रवण करने से सभी संकट खुद-ब-खुद टल जाते हैं. मान्यताओं के अनुसार राजा परिक्षित से जब ऋषि शमीक का अपमान किया और ऋगी ऋषि के चलते सात दिन में सर्पदंश से मृत्यु का श्राप मिता तो सभी ऋषि-मुनियों ने श्राप से मुक्ति के जो उपाय बताए वे प्रभावहीन रहे और जब शुकदेव महराज ने उन्हें भागवत का परायण कराया तो कथा का विश्राम होते ही परीक्षित का भय दूर हुआ और उन्हें सदगति प्राप्त हुई. बता दें कि Geeta Adhyay गीता में योग शब्द को एक नहीं, बल्कि कई अर्थों में प्रयोग हुआ है और हर योग अंतिम में भगवान से मिलने के मार्ग से जोड़ता है. योग का मतलब आत्मा का परमात्मा से मिलन है. गीता में योग के कई प्रकार हैं. लेकिन मुख्य रूप से तीन योग ज्ञान योग, Geeta Adhyay कर्म योग और भक्ति योग का वास्ता मनुष्य से अधिक होता है. Geeta Adhyay महाभारत के युदध् के दौरान जब अर्जुन रिश्ते नातों में उलझ कर मोह में बंध रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन को बताया था कि जीवन का सबसे बड़ा योग कर्म योग है. उन्होंने बताया था कि कर्म योग से कोई भी प्राणी मुक्त नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा कि वह स्वंय अर्थात भगवान भी कर्म योग से बंधे हैं.

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Durga Dvatrimshat Namavalih: दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः

Durga Dvatrimshat Namavalih: दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गाऽऽपद्विनिवारिणी ।दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ॥ १॥ दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ॥ २॥ दुर्गमादुर्गमालोका दुर्गमाऽऽत्मस्वरूपिणी ।दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ॥ ३॥ दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ॥ ४॥ दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ॥ ५॥ दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया सुधी मानवः ॥ ६॥ पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः ।शत्रुभिः पीड्यमानो वा दुर्गबन्धगतोऽपि वा ।द्वात्रिंशन्नामपाठेन मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७॥ इति दुर्गाद्वात्रिंशन्नामावलिः समाप्ता ।

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ChaNDikAShTakam:चण्डिकाष्टकम्

ChaNDikAShTakam:चण्डिकाष्टकम् सहस्रचन्द्रनित्दकातिकान्त-चन्द्रिकाचयै-दिशोऽभिपूरयद् विदूरयद् दुराग्रहं कलेः ।कृतामलाऽवलाकलेवरं वरं भजामहेमहेशमानसाश्रयन्वहो महो महोदयम् ॥ १॥ विशाल-शैलकन्दरान्तराल-वासशालिनींत्रिलोकपालिनीं कपालिनी मनोरमामिमाम् ।उमामुपासितां सुरैरूपास्महे महेश्वरींपरां गणेश्वरप्रसू नगेश्वरस्य नन्दिनीम् ॥ २॥ अये महेशि! ते महेन्द्रमुख्यनिर्जराः समेसमानयन्ति मूर्द्धरागत परागमंघ्रिजम् ।महाविरागिशंकराऽनुरागिणीं नुरागिणीस्मरामि चेतसाऽतसीमुमामवाससं नुताम् ॥ ३॥ भजेऽमरांगनाकरोच्छलत्सुचाम रोच्चलन्निचोल-लोलकुन्तलां स्वलोक-शोक-नाशिनीम् ।अदभ्र-सम्भृतातिसम्भ्रम-प्रभूत-विभ्रम-प्रवृत-ताण्डव-प्रकाण्ड-पण्डितीकृतेश्वराम् ॥ ४॥ अपीह पामरं विधाय चामरं तथाऽमरंनुपामरं परेशिदृग्-विभाविता-वितत्रिके ।प्रवर्तते प्रतोष-रोष-खेलन तव स्वदोष-मोषहेतवे समृद्धिमेलनं पदन्नुमः ॥ ५॥ भभूव्-भभव्-भभव्-भभाभितो-विभासि भास्वर-प्रभाभर-प्रभासिताग-गह्वराधिभासिनीम् ।मिलत्तर-ज्वलत्तरोद्वलत्तर-क्षपाकरप्रमूत-भाभर-प्रभासि-भालपट्टिकां भजे ॥ ६॥ कपोतकम्बु-काम्यकण्ठ-कण्ठयकंकणांगदा-दिकान्त-काश्चिकाश्चितां कपालिकामिनीमहम् ।वरांघ्रिनूपुरध्वनि-प्रवृत्तिसम्भवद् विशेष-काव्यकल्पकौशलां कपालकुण्डलां भजे ॥ ७॥ भवाभय-प्रभावितद्भवोत्तरप्रभावि भव्यभूमिभूतिभावन प्रभूतिभावुकं भवे ।भवानि नेति ते भवानि! पादपंकजं भजेभवन्ति तत्र शत्रुवो न यत्र तद्विभावनम् ॥ ८॥ दुर्गाग्रतोऽतिगरिमप्रभवां भवान्याभव्यामिमां स्तुतिमुमापतिना प्रणीताम् ।यः श्रावयेत् सपुरूहूतपुराधिपत्यभाग्यं लभेत रिपवश्च तृणानि तस्य ॥ ९॥ रामाष्टांक शशांकेऽब्देऽष्टम्यां शुक्लाश्विने गुरौ ।शाक्तश्रीजगदानन्दशर्मण्युपहृता स्तुतिः ॥ १०॥ ॥ इति कविपत्युपनामक-श्री उमापतिद्विवेदि-विरचितं चण्डिकाष्टकंसम्पूर्णम् ॥

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Shri KumarI SahasranAmastotram: श्रीकुमारीसहस्रनामस्तोत्रम्

Shri KumarI SahasranAmastotram: श्रीकुमारीसहस्रनामस्तोत्रम् आनन्दभैरव उवाच वद कान्ते सदानन्दस्वरूपानन्दवल्लभे । कुमार्या देवतामुख्याः परमानन्दवर्धनम् ॥ १॥ अष्टोत्तरसहस्राख्यं नाम मङ्गलमद्भुतम् । यदि मे वर्तते विद्ये यदि स्नेहकलामला ॥ २॥ तदा वदस्व कौमारीकृतकर्मफलप्रदम् । महास्तोत्रं कोटिकोटि कन्यादानफलं भवेत् ॥ ३॥ आनन्दभैरवी उवाच महापुण्यप्रदं नाथ श‍ृणु सर्वेश्वरप्रिय । अष्टोत्तरसहस्राख्यं कुमार्याः परमाद्भुतम् ॥ ४॥ पठित्त्वा धारयित्त्वा वा नरो मुच्येत सङ्कटात् । सर्वत्र दुर्लभं धन्यं धन्यलोकनिषेवितम् ॥ ५॥ अणिमाद्यष्टसिद्ध्यङ्गं सर्वानन्दकरं परम् । मायामन्त्रनिरस्ताङ्गं मन्त्रसिद्धिप्रदे नृणाम् ॥ ६॥ न पूजा न जपं स्नानं पुरश्चर्याविधिश्च न । अकस्मात् सिद्धिमवाप्नोति सहस्रनामपाठतः ॥ ७॥ सर्वयज्ञफलं नाथ प्राप्नोति साधकः क्षणात् । मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्यं योनिमुद्रास्वरूपकम् ॥ ८॥ कोटिवर्षशतेनापि फलं वक्तुं न शक्यते । तथापि वक्तुमिच्छामि हिताय जगतां प्रभो ॥ ९॥ अस्याः श्रीकुमार्याः सहस्रनामकवचस्य वटुकभैरवऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । कुमारीदेवता । सर्वमन्त्रसिद्धिसमृद्धये विनियोगः ॥ १०॥ ॐ कुमारी कौशिकी काली कुरुकुल्ला कुलेश्वरी । कनकाभा काञ्चनाभा कमला कालकामिनी ॥ ११॥ कपालिनी कालरूपा कौमारी कुलपालिका । कान्ता कुमारकान्ता च कारणा करिगामिनी ॥ १२॥ कन्धकान्ता कौलकान्ता कृतकर्मफलप्रदा । कार्याकार्यप्रिया कक्षा कंसहन्त्री कुरुक्षया ॥ १३॥ कृष्णकान्ता कालरात्रिः कर्णेषुधारिणीकरा । कामहा कपिला काला कालिका कुरुकामिनी ॥ १४॥ कुरुक्षेत्रप्रिया कौला कुन्ती कामातुरा कचा । कलञ्जभक्षा कैकेयी काकपुच्छध्वजा कला ॥ १५॥ कमला कामलक्ष्मी च कमलाननकामिनी । कामधेनुस्वरूपा च कामहा काममदीनी ॥ १६॥ कामदा कामपूज्या च कामातीता कलावती । भैरवी कारणाढ्या च कैशोरी कुशलाङ्गला ॥ १७॥ कम्बुग्रीवा कृष्णनिभा कामराजप्रियाकृतिः । कङ्कणालङ्कृता कङ्का केवला काकिनी किरा ॥ १८॥ किरातिनी काकभक्षा करालवदना कृशा । केशिनी केशिहा केशा कासाम्बष्ठा करिप्रिया ॥ १९॥ कविनाथस्वरूपा च कटुवाणी कटुस्थिता । कोटरा कोटराक्षी च करनाटकवासिनी ॥ २०॥ कटकस्था काष्ठसंस्था कन्दर्पा केतकी प्रिया । केलिप्रिया कम्बलस्था कालदैत्यविनाशिनी ॥ २१॥ केतकीपुष्पशोभाढ्या कर्पूरपूर्णजिह्विका । कर्पूराकरकाकोला कैलासगिरिवासिनी ॥ २२॥ कुशासनस्था कादम्बा कुञ्जरेशी कुलानना । खर्बा खड्गधरा खड्गा खलहा खलबुद्धिदा ॥ २३॥ खञ्जना खररूपा च क्षाराम्लतिक्तमध्यगा । खेलना खेटककरा खरवाक्या खरोत्कटा ॥ २४॥ खद्योतचञ्चला खेला खद्योता खगवाहिनी । खेटकस्था खलाखस्था खेचरी खेचरप्रिया ॥ २५॥ खचरा खरप्रेमा खलाढ्या खचरानना । खेचरेशी खरोग्रा च खेचरप्रियभाषिणी ॥ २६॥ खर्जूरासवसंमत्ता खर्जूरफलभोगिनी । खातमध्यस्थिता खाता खाताम्बुपरिपूरिणी ॥ २७॥ ख्यातिः ख्यातजलानन्दा खुलना खञ्जनागतिः । खल्वा खलतरा खारी खरोद्वेगनिकृन्तनी ॥ २८॥ गगनस्था च भीता च गभीरनादिनी गया । गङ्गा गभीरा गौरी च गणनाथ प्रिया गतिः ॥ २९॥ गुरुभक्ता ग्वालिहीना गेहिनी गोपिनी गिरा । गोगणस्था गाणपत्या गिरिजा गिरिपूजिता ॥ ३०॥ गिरिकान्ता गणस्था च गिरिकन्या गणेश्वरी । गाधिराजसुता ग्रीवा गुर्वी गुर्व्यम्बशाङ्करी ॥ ३१॥ गन्धर्व्वकामिनी गीता गायत्री गुणदा गुणा । गुग्गुलुस्था गुरोः पूज्या गीतानन्दप्रकाशिनी ॥ ३२॥ गयासुरप्रियागेहा गवाक्षजालमध्यगा । गुरुकन्या गुरोः पत्नी गहना गुरुनागिनी ॥ ३३॥ गुल्फवायुस्थिता गुल्फा गर्द्दभा गर्द्दभप्रिया । गुह्या गुह्यगणस्था च गरिमा गौरिका गुदा ॥ ३४॥ गुदोर्ध्वस्था च गलिता गणिका गोलका गला । गान्धर्वी गाननगरी गन्धर्वगणपूजिता ॥ ३५॥ घोरनादा घोरमुखी घोरा घर्मनिवारिणी । घनदा घनवर्णा च घनवाहनवाहना ॥ ३६॥ घर्घरध्वनिचपला घटाघटपटाघटा । घटिता घटना घोना घनरुप घनेश्वरी ॥ ३७॥ घुण्यातीता घर्घरा च घोराननविमोहिनी । घोरनेत्रा घनरुचा घोरभैरव कन्यका ॥ ३८॥ घाताघातकहा घात्या घ्राणाघ्राणेशवायवी । घोरान्धकारसंस्था च घसना घस्वरा घरा ॥ ३९॥ घोटकेस्था घोटका च घोटकेश्वरवाहना । घननीलमणिश्यामा घर्घरेश्वरकामिनी ॥ ४०॥ ङकारकूटसम्पन्ना ङकारचक्रगामिनी । ङकारी ङसंशा चैव ङीपनीता ङकारिणी ॥ ४१॥ चन्द्रमण्डलमध्यस्था चतुरा चारुहासिनी । चारुचन्द्रमुखी चैव चलङ्गमगतिप्रिया ॥ ४२॥ चञ्चला चपला चण्डी चेकिताना चरुस्थिता । चलिता चानना चार्व्वो चारुभ्रमरनादिनी ॥ ४३॥ चौरहा चन्द्रनिलया चैन्द्री चन्द्रपुरस्थिता । चक्रकौला चक्ररूपा चक्रस्था चक्रसिद्धिदा ॥ ४४॥ चक्रिणी चक्रहस्ता च चक्रनाथकुलप्रिया । चक्राभेद्या चक्रकुला चक्रमण्डलशोभिता ॥ ४५॥ चक्रेश्वरप्रिया चेला चेलाजिनकुशोत्तरा । चतुर्वेदस्थिता चण्डा चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ ४६॥ चतुर्गुणा चन्द्रवर्णा चातुरी चतुरप्रिया । चक्षुःस्था चक्षुवसतिश्चणका चणकप्रिया ॥ ४७॥ चार्व्वङ्गी चन्द्रनिलया चलदम्बुजलोचना । चर्व्वरीशा चारुमुखी चारुदन्ता चरस्थिता ॥ ४८॥ चसकस्थासवा चेता चेतःस्था चैत्रपूजिता । चाक्षुषी चन्द्रमलिनी चन्द्रहासमणिप्रभा ॥ ४९॥ छलस्था छुद्ररूपा च छत्रच्छायाछलस्थिता । छलज्ञा छेश्वराछाया छाया छिन्नशिवा छला ॥ ५०॥ छत्राचामरशोभाढ्या छत्रिणां छत्रधारिणी । छिन्नातीता छिन्नमस्ता छिन्नकेशा छलोद्भवा ॥ ५१॥ छलहा छलदा छाया छन्ना छन्नजनप्रिया । छलछिन्ना छद्मवती छद्मसद्मनिवासिनी ॥ ५२॥ छद्मगन्धा छदाछन्ना छद्मवेशी छकारिका । छगला रक्तभक्षा च छगलामोदरक्तपा ॥ ५३॥ छगलण्डेशकन्या च छगलण्डकुमारिका । छुरिका छुरिककरा छुरिकारिनिवाशिनी ॥ ५४॥ छिन्ननाशा छिन्नहस्ता छोणलोला छलोदरी । छलोद्वेगा छाङ्गबीजमाला छाङ्गवरप्रदा ॥ ५५॥ जटिला जठरश्रीदा जरा जज्ञप्रिया जया । जन्त्रस्था जीवहा जीवा जयदा जीवयोगदा ॥ ५६॥ जयिनी जामलस्था च जामलोद्भवनायिका । जामलप्रियकन्या च जामलेशी जवाप्रिया ॥ ५७॥ जवाकोटिसमप्रख्या जवापुष्पप्रिया जना । जलस्था जगविषया जरातीता जलस्थिता ॥ ५८॥ जीवहा जीवकन्या च जनार्द्दनकुमारिका । जतुका जलपूज्या च जगन्नाथादिकामिनी ॥ ५९॥ जीर्णाङ्गी जीर्णहीना च जीमूतात्त्यन्तशोभिता । जामदा जमदा जृम्भा जृम्भणास्त्रादिधारिणी ॥ ६०॥ जघन्या जारजा प्रीता जगदानन्दवद्धीनी । जमलार्जुनदर्पघ्नी जमलार्जुनभञ्जिनी ॥ ६१॥ जयित्रीजगदानन्दा जामलोल्लाससिद्धिदा । जपमाला जाप्यसिद्धिर्जपयज्ञप्रकाशिनी ॥ ६२॥ जाम्बुवती जाम्बवतः कन्यकाजनवाजपा । जवाहन्त्री जगद्बुद्धिर्ज्जगत्कर्तृ जगद्गतिः ॥ ६३॥ जननी जीवनी जाया जगन्माता जनेश्वरी । झङ्कला झङ्कमध्यस्था झणत्कारस्वरूपिणी ॥ ६४॥ झणत्झणद्वह्निरूपा झननाझन्दरीश्वरी । झटिताक्षा झरा झञ्झा झर्झरा झरकन्यका ॥ ६५॥ झणत्कारी झना झन्ना झकारमालयावृता । झङ्करी झर्झरी झल्ली झल्वेश्वरनिवासिनी ॥ ६६॥ ञकारी ञकिराती च ञकारबीजमालिनी । ञनयोऽन्ता ञकारान्ता ञकारपरमेश्वरी ॥ ६७॥ ञान्तबीजपुटाकारा ञेकले ञैकगामिनी । ञैकनेला ञस्वरूपा ञहारा ञहरीतकी ॥ ६८॥ टुण्टुनी टङ्कहस्ता च टान्तवर्गा टलावती । टपला टापबालाख्या टङ्कारध्वनिरूपिणी ॥ ६९॥ टलाती टाक्षरातीता टित्कारादिकुमारिका । टङ्कास्त्रधारिणी टाना टमोटार्णलभाषिणी ॥ ७०॥ टङ्कारी विधना टाका टकाटकविमोहिनी । टङ्कारधरनामाहा टिवीखेचरनादिनी ॥ ७१॥ ठठङ्कारी ठाठरूपा ठकारबीजकारणा । डमरूप्रियवाद्या च डामरस्था डबीजिका ॥ ७२॥ डान्तवर्गा डमरुका डरस्था डोरडामरा । डगरार्द्धा डलातीता डदारुकेश्वरी डुता ॥ ७३॥ ढार्द्धनारीश्वरा ढामा ढक्कारी ढलना ढला । ढकेस्था ढेश्वरसुता ढेमनाभावढोनना ॥ ७४॥ णोमाकान्तेश्वरी णान्तवर्गस्था णतुनावती । णनो माणाङ्ककल्याणी णाक्षवीणाक्षबीजिका ॥ ७५॥ तुलसीतन्तुसूक्ष्माख्या तारल्या तैलगन्धिका । तपस्या तापससुता तारिणी तरुणी तला ॥ ७६॥ तन्त्रस्था तारकब्रह्मस्वरूपा तन्तुमध्यगा । तालभक्षत्रिधामूत्तीस्तारका तैलभक्षिका ॥ ७७॥ तारोग्रा तालमाला च तकरा तिन्तिडीप्रिया । तपसः तालसन्दर्भा तर्जयन्ती कुमारिका ॥ ७८॥ तोकाचारा तलोद्वेगा तक्षका तक्षकप्रिया । तक्षकालङ्कृता तोषा तावद्रूपा तलप्रिया ॥ ७९॥ तलास्त्रधारिणी तापा तपसां फलदायिनी । तल्वल्वप्रहरालीता तलारिगणनाशिनी ॥ ८०॥ तूला तौली तोलका च तलस्था तलपालिका तरुणा तप्तबुद्धिस्थास्तप्ता प्रधारिणी तपा ॥ ८१॥ तन्त्रप्रकाशकरणी तन्त्रार्थदायिनी तथा । तुषारकिरणाङ्गी च चतुर्धा वा समप्रभा ॥ ८२॥ तैलमार्गाभिसूता च तन्त्रसिद्धिफलप्रदा । ताम्रपर्णा ताम्रकेशा ताम्रपात्रप्रियातमा ॥ ८३॥ तमोगुणप्रिया तोला तक्षकारिनिवारिणी । तोषयुक्ता तमायाची तमषोढेश्वरप्रिया ॥ ८४॥ तुलना तुल्यरुचिरा तुल्यबुद्धिस्त्रिधा मतिः । तक्रभक्षा तालसिद्धिः तत्रस्थास्तत्र गामिनी ॥ ८५॥ तलया तैलभा ताली तन्त्रगोपनतत्परा । तन्त्रमन्त्रप्रकाशा च त्रिशरेणुस्वरूपिणी ॥ ८६॥ त्रिंशदर्थप्रिया तुष्टा तुष्टिस्तुष्टजनप्रिया । थकारकूटदण्डीशा थदण्डीशप्रियाऽथवा ॥ ८७॥ थकाराक्षररूढाङ्गी थान्तवर्गाथ कारिका । थान्ता थमीश्वरी थाका थकारबीजमालिनी ॥ ८८॥ दक्षदामप्रिया दोषा दोषजालवनाश्रिता । दशा दशनघोरा च देवीदासप्रिया दया ॥ ८९॥ दैत्यहन्त्रीपरा दैत्या दैत्यानां मद्दीनी दिशा । दान्ता दान्तप्रिया दासा दामना दीर्घकेशिका ॥ ९०॥ दशना रक्तवर्णा च दरीग्रहनिवासिनी देवमाता च दुर्लभा च दीर्घाङ्गा दासकन्यका ॥ ९१॥ दशनश्री दीर्घनेत्रा दीर्घनासा च दोषहा । दमयन्ती दलस्था च द्वेष्यहन्त्री दशस्थिता ॥ ९२॥ दैशेषिका दिशिगता दशनास्त्रविनाशिनी दारिद्र्यहा

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Durga Chandrakala Stuti: दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः

Durga Chandrakala Stuti: दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः वेधोहरीश्वरस्तुत्यां विहर्त्रीं विन्ध्यभूधरे ।हरप्राणेश्वरीं वन्दे हन्त्रीं विबुधविद्विषाम् ॥ १॥ अभ्यर्थनेन सरसीरुहसम्भवस्य त्यक्त्वोदिता भगवदक्षिपिधानलीलाम् ।विश्वेश्वरी विपदपागमने पुरस्तात् माता ममास्तु मधुकैटभयोर्निहन्त्री ॥ २॥ प्राङ्निर्जरेषु निहितैर्निजशक्तिलेशैः एकीभवद्भिरुदिताखिललोकगुप्त्यै ।सम्पन्नशस्त्रनिकरा च तदायुधस्थैः माता ममास्तु महिषान्तकरी पुरस्तात् ॥ ३॥ प्रालेयशैलतनया तनुकान्तिसम्पत्- कोशोदिता कुवलयच्छविचारुदेहा ।नारायणी नमदभीप्सितकल्पवल्ली सुप्रीतिमावहतु शुम्भनिशुम्भहन्त्री ॥ ४॥ विश्वेश्वरीति महिषान्तकरीति यस्याः नारायणीत्यपि च नामभिरङ्कितानि ।सूक्तानि पङ्कजभुवा च सुरर्षिभिश्च दृष्टानि पावकमुखैश्च शिवां भजे ताम् ॥ ५॥ उत्पत्तिदैत्यहननस्तवनात्मकानि संरक्षकाण्यखिलभूतहिताय यस्याः ।सूक्तान्यशेषनिगमान्तविदः पठन्ति तां विश्वमातरमजस्रमभिष्टवीमि ॥ ६॥ ये वैप्रचित्तपुनरुत्थितशुम्भमुख्यैः दुर्भिक्षघोरसमयेन च कारितासु ।आविष्कृतास्त्रिजगदार्तिषु रूपभेदाः तैरम्बिका समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ७॥ सूक्तं यदीयमरविन्दभवादिदृष्टं आवर्त्य देव्यनुपदं सुरथः समाधिः ।द्वावप्यवापतुरभीष्टमनन्यलभ्यं तामादिदेवतरुणीं प्रणमामि देवीम् ॥ ८॥ माहिष्मतीतनुभवं च रुरुं च हन्तुं आविष्कृतैर्निजरसादवतारभेदैः ।अष्टादशाहतनवाहतकोटिसंख्यैः अम्बा सदा समभिरक्षतु मां विपद्भ्यः ॥ ९॥ एतच्चरित्रमखिलं लिखितं हि यस्याः सम्पूजितं सदन एव निवेशितं वा ।दुर्गं च तारयति दुस्तरमप्यशेषं श्रेयः प्रयच्छति च सर्वमुमां भजे ताम् ॥ १०॥ यत्पूजनस्तुतिनमस्कृतिभिर्भवन्ति प्रीताः पितामहरमेशहरास्त्रयोऽपि ।तेषामपि स्वकगुणैर्ददतीं वपूंषि तामीश्वरस्य तरुणीं शरणं प्रपद्ये ॥ ११॥ कान्तारमध्यदृढलग्नतयाऽवसन्नाः मग्नाश्च वारिधिजले रिपुभिश्च रुद्धाः ।यस्याः प्रपद्य चरणौ विपदस्तरन्ति सा मे सदाऽस्तु हृदि सर्वजगत्सवित्री ॥ १२॥ बन्धे वधे महति मृत्युभये प्रसक्ते वित्तक्षये च विविधे च महोपतापे ।यत्पादपूजनमिह प्रतिकारमाहुः सा मे समस्तजननी शरणं भवानी ॥ १३॥ बाणासुरप्रहितपन्नगबन्धमोक्षः तद्बाहुदर्पदलनादुषया च योगः ।प्राद्युम्निना द्रुतमलभ्यत यत्प्रसादात् सा मे शिवा सकलमप्यशुभं क्षिणोतु ॥ १४॥ पापः पुलस्त्यतनयः पुनरुत्थितो मां अद्यापि हर्तुमयमागत इत्युदीतम् ।यत्सेवनेन भयमिन्दिरयाऽवधूतं तामादिदेवतरुणीं शरणं गतोऽस्मि ॥ १५॥ यद्ध्यानजं सुखमवाप्यमनन्तपुण्यैः साक्षात्तमच्युतपरिग्रहमाश्ववापुः ।गोपाङ्गनाः किल यदर्चनपुण्यमात्रात् सा मे सदा भगवती भवतु प्रसन्ना ॥ १६॥ रात्रिं प्रपद्य इति मन्त्रविदः प्रपन्नान् उद्बोध्य मृत्यवधिमन्यफलैः प्रलोभ्य ।बुद्ध्वा च तद्विमुखतां प्रतनं नयन्तीं आकाशमादिजननीं जगतां भजे ताम् ॥ १७॥ देशकालेषु दुष्टेषु दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः ।सन्ध्ययोरनुसन्धेया सर्वापद्विनिवृत्तये ॥ १८॥ इति श्रीमदपय्यदीक्षितविरचिता दुर्गाचन्द्रकलास्तुतिः समाप्ता ।

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Matra Navami

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय

Matra Navami: मातृ नवमी पितृ पक्ष के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, विशेषकर उन माताओं, बहुओं और बेटियों के लिए जिनका निधन सुहागिन के रूप में हुआ हो। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का इंतजार साल भर किया जाता है, क्योंकि यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। आइए, वर्ष 2025 में मातृ नवमी Matra Navami की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों के बारे में विस्तार से जानें ताकि आप अपने दिवंगत पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों When isMatra Navami 2025: मातृ नवमी 2025 कब है? हिंदी पंचांग के अनुसार, मातृ नवमी हर वर्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2025 में, मातृ नवमी श्राद्ध पूजा 15 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। • नवमी तिथि का प्रारम्भ: 15 सितंबर 2025 को सुबह 03 बजकर 06 मिनट पर। • नवमी तिथि की समाप्ति: 16 सितंबर 2025 को सुबह 01 बजकर 31 मिनट पर। मातृ नवमी 2025 के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Matra Navami 2025 श्राद्ध कर्म के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। मातृ नवमी पर आप इन शुभ मुहूर्तों में पूजा-पाठ कर सकते हैं: • अपराह्न काल पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 03 बजकर 58 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 02 घण्टे 28 मिनट। • रोहिणी नक्षत्र में पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 12 बजकर 41 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 00:49 मिनट। हालांकि, यह भी मान्यता है कि मातृ नवमी का श्राद्ध दोपहर 12 बजे से पहले करना शुभ माना गया है। मातृ नवमी का महत्व:Importance of Matra Navami पितृ पक्ष में Matra Navami मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों का पिंडदान करने के लिए समर्पित है जिनकी मृत्यु सुहागिन के रूप में हुई थी। • आत्मा की शांति और आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। • सुख-समृद्धि और सौभाग्य: मातृ नवमी का श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। जिस घर की महिला इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखती है, उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दिवंगत माताओं का श्राद्ध करने से उनकी कृपा पूरे घर पर बनी रहती है। • विशेष विधान: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में सौभाग्यवती माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध की तिथि Matra Navami मातृ नवमी को अलग से बताया गया है। पितृपक्ष में माताओं की पूजा की जाती है और माताओं तथा सुहागिन स्त्रियों के लिए श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मातृ नवमी श्राद्ध पूजा विधि:Matra Navami Shraddha Puja Method मातृ नवमी Matra Navami पर पितरों को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए निम्नलिखित विधि से श्राद्ध कर्म करें: 1. सुबह का स्नान और संकल्प: मातृ नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत हो जाएं। स्नान आदि करने के बाद सफेद और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। 2. चौकी स्थापित करें: एक लकड़ी की चौकी को अपने घर के दक्षिण दिशा में रखें। उस चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर अपने पूर्वज मातृ पितरों की फोटो या प्रतीक के रूप में स्थापित करें। 3. तर्पण और पूजन: फोटो पर फूल माला चढ़ाएं, काले तिल का दीपक जलाएं, धूपबत्ती जलाकर इत्र आदि लगाएं। तस्वीर पर तुलसी की पत्तियां अवश्य अर्पित करें। 4. श्रीमद्भागवत गीता का पाठ: इस दिन श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 5. भोजन तैयार करें और गाय को खिलाएं: घर पर जो भी भोजन तैयार किया जाता है, उसमें से कुछ भोजन सबसे पहले गायों को खिलाना चाहिए। 6. पितरों के लिए भोजन: जिन पितरों का श्राद्ध करना है, उनके लिए भी भोजन निकालकर अपने घर के बाहर जाकर दक्षिण दिशा में साफ-सुथरी जगह पर रखें। 7. तुलसी पूजन: इस दिन घर में तुलसी के पौधे अवश्य लगाएं और उनकी पूजा-अर्चना करें। तुलसी के पास एक दीपक भी अवश्य जलाएं। 8. सूर्य देव को अर्घ्य और तर्पण: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद किसी पवित्र नदी में तर्पण करना चाहिए, इससे पितृ प्रसन्न होते हैं। 9. पितरों को भोग: पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन बनाकर सबसे पहले पितरों को धूप दान करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें और उन्हें भोजन का भोग लगाएं। 10. पशु-पक्षियों को भोजन: मातृ नवमी के दिन बनाए गए भोजन में से कुत्ते, कौवे और गाय को खिलाएं, ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 11. ब्राह्मणों को भोजन और दान: इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए। मातृ नवमी के दिन पितरों को खुश करने के खास उपाय: Special ways to please the ancestors on the day of Matra Navami पितृ पक्ष में मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और उनको प्रसन्न करने का उत्तम दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए ये खास उपाय जरूर करें: • सुबह माता तुलसी की पूजा करें और उन्हें धूप-दीप जलाएं। • किसी भी गरीब और जरूरतमंद सुहागिन महिला को सुहाग का सामान जैसे – लाल साड़ी, कुमकुम, सिंदूर, चूड़ियां, अनाज, जूते-चप्पल आदि का दान जरूर करें। मातृ नवमी पर न करें ये भूल, वरना आ सकती है दरिद्रता:Do not make this mistake on Matra Navami , otherwise poverty may come. मातृ नवमी पर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन कुछ गलतियाँ करने से बचना चाहिए: • श्राद्ध न करना: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि सौभाग्यवती माता का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने के बजाय नवमी तिथि को न किया जाए, तो पितृ प्रेत योनि में भटकते

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Surya Gochar 2025

Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

Surya Gochar 2025: सनातन धर्म में संक्रांति का विशेष महत्व है, और जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को संक्रांति कहा जाता है। वर्ष 2025 में, कन्या संक्रांति तब मनाई जाएगी जब सूर्य देव अपनी सिंह राशि को छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि इस वर्ष Surya Gochar 2025 कन्या संक्रांति के साथ ही विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाएगी, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन इंदिरा एकादशी भी मनाई जाएगी, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देती है। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों….. कन्या संक्रांति 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्योतिषियों के अनुसार, साल 2025 में कन्या संक्रांति की तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: • संक्रांति प्रवेश: 17 सितंबर 2025, देर रात 01:54 बजे • पुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से दोपहर 11:44 बजे तक • महापुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से 07:39 बजे तक • सूर्योदय: 05:36 AM • सूर्यास्त: 05:51 PM • ब्रह्म मुहूर्त: 04:02 से 04:49 बजे • विजय मुहूर्त: 01:46 से 02:35 PM • गोधूलि बेला: 05:51 से 06:15 PM • निशीथ काल: 11:20 से 12:07 AM कन्या संक्रांति का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। यह घटना न केवल ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भी विशेष मानी जाती है। कन्या राशि में सूर्य का गोचर बुद्धि, सेवा, व्यवस्था और कर्म का प्रतीक माना जाता है। यह दिन सकारात्मक ऊर्जा, आत्मशुद्धि और कर्मयोग की भावना को बढ़ाने वाला होता है। सनातन शास्त्रों के अनुसार, कन्या संक्रांति के दिन शिल्पकार विश्वकर्मा जी का अवतरण हुआ था, इसलिए हर साल कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाती है। Surya Gochar 2025 विशेष रूप से इंजीनियरिंग, तकनीकी और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और फलदायक होता है। जो लोग मशीनरी, तकनीकी या कारीगरी से जुड़े हैं, Surya Gochar 2025 उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। पूजन एवं दान विधि कन्या संक्रांति के शुभ अवसर पर सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और पुण्य कमाने के लिए इन विधियों का पालन करें: • प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। • अपने पूजा स्थल और कार्यस्थल को स्वच्छ करके दीपक और पुष्प अर्पित करें। • लाल वस्त्र, तिल का तेल, घी, गुड़ आदि का दान करें। • आध्यात्मिक मंत्रों का जप करें, जैसे – “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”। • परिवार सहित सात्विक भोजन बनाएं और जरूरतमंदों में बांटें। • इस दिन क्रोध, विवाद और अहंकार से दूर रहें। सूर्य गोचर 2025: इन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज! Surya Gochar 2025 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 17 सितंबर 2025 को सूर्य देव के सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करने से कुछ राशियों के जातकों को करियर में विशेष लाभ और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं उन राशियों के बारे में: मेष राशि (Aries) सूर्य देव के राशि परिवर्तन से मेष राशि के जातकों को काफी हद तक लाभ मिलता दिख रहा है। सूर्य देव की दृष्टि षष्ठ भाव में होने से आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपके शत्रुओं में आपका भय रहेगा, और आप कई मामलों में कठोर निर्णय ले सकते हैं। आपके भाग्य में वृद्धि होगी, लेकिन आपको धर्म पथ पर चलना होगा और माता-पिता का सम्मान करना होगा। आप न्यायप्रिय होंगे, जिससे समाज में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलेगी, और आप कुछ नया करने की योजना भी बना सकते हैं। धनु राशि (Sagittarius) सूर्य देव के कन्या राशि में गोचर करने से धनु राशि के जातकों को भी विशेष फायदा हो सकता है। सूर्य देव की दृष्टि आपके करियर भाव में रहेगी, जिससे आपको अनुकूल परिणाम मिल सकते हैं। Surya Gochar 2025 आपकी बुद्धि और प्रगाढ़ होगी, जिससे आप जीवन में कई सही फैसले ले पाएंगे। आपमें नेतृत्व करने की क्षमता बढ़ेगी और आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे आप बड़ी सफलता पाने में सफल होंगे। पिता के साथ संबंध मधुर रहेंगे और सरकारी तंत्र से आपको सम्मान मिल सकता है। कई जातकों को सरकारी नौकरी से संबंधित कोई बड़ी खुशखबरी भी मिल सकती है। Surya Gochar 2025 आपके व्यवहार से लोग प्रभावित हो सकते हैं। माता का विशेष ख्याल रखने की सलाह दी गई है। निष्कर्ष कन्या संक्रांति 2025 एक अत्यंत शुभ और फलदायक तिथि है, खासकर जब यह विश्वकर्मा पूजा और इंदिरा एकादशी के साथ पड़ रही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है। यह गोचर कई राशियों के लिए करियर और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

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Durga in dreams

Maa Durga in dreams: सपने में मां दुर्गा को देखना शुभ या अशुभ? जानें क्या है इसका वास्तविक जीवन पर प्रभाव !

Maa Durga in dreams: सपने हमारे अवचेतन मन का एक आईना होते हैं, जो अक्सर हमारे वास्तविक जीवन में होने वाली घटनाओं या हमारे मन की स्थिति का संकेत देते हैं। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ये सपने भविष्य में आने वाले शुभ या अशुभ प्रभावों की झलक भी दिखा सकते हैं। हर सपने का अपना एक खास मतलब होता है। ऐसे में, यदि आपको सपने में मां दुर्गा से संबंधित चीजें दिखती हैं, Durga in dreams तो उसका भी एक गहरा और महत्वपूर्ण अर्थ होता है। आइए जानते हैं सपने में मां दुर्गा को विभिन्न रूपों में देखने का क्या मतलब हो सकता है। मां दुर्गा के सपने: सामान्य संकेत सपने में मां दुर्गा का दिखना अच्छा या फिर बुरा संकेत हो सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उन्हें किस रूप में देखा है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इन सपनों का वास्तविक जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। Maa Durga in dreams: सपने में मां दुर्गा को देखना शुभ या अशुभ… शुभ संकेत माने जाने वाले मां दुर्गा के सपने:Dreams of Maa Durga considered auspicious sign सपने में मां दुर्गा की मूर्ति देखना: यदि आप सपने में मां दुर्गा की मूर्ति देखते हैं, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। यह दर्शाता है कि आपके जीवन में चल रही कई परेशानियों से छुटकारा मिलने वाला है। आपको मानसिक और शारीरिक समस्याओं से राहत मिल सकती है। Maa Durga in dreams इसके साथ ही, नौकरी या व्यापार में अपार सफलता और धन लाभ मिलने के आसार होते हैं। व्यापारियों को नई डील्स मिल सकती हैं जिनसे मुनाफा हो सकता है। सपने में मां दुर्गा का मंदिर देखना: सपने में मां दुर्गा का मंदिर देखना भी बेहद शुभ माना गया है। इसका अर्थ है कि आपकी लंबे समय से चली आ रही इच्छा अब पूरी हो सकती है। आपको कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता है और विभिन्न प्रकार की मुश्किलों से निजात मिलेगी। यह माता रानी की कृपा का संकेत है। सपने में मां दुर्गा की आरती करते देखना: अगर कोई व्यक्ति सपने में मां दुर्गा की आरती करते हुए देखता है, तो इसका मतलब है कि कोई बड़ी समस्या का समाधान मिलने वाला है। आपके जीवन में आशा की एक नई किरण उत्पन्न हो सकती है। भविष्य में आप सफलता की ओर अग्रसर होंगे। व्यापार, नौकरी और विवाह में भी लाभ मिलने के आसार हैं। शेर पर सवार मां दुर्गा को देखना: सपने में अगर किसी व्यक्ति को मां दुर्गा शेर पर सवार होकर दिखाई दें, तो यह समझना चाहिए कि उसके अच्छे दिन शुरू होने वाले हैं। आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और भविष्य भी बेहतर हो सकता है। Durga in dreams यह शुभ समाचार मिलने का भी संकेत है। मां दुर्गा को लाल वस्त्र में देखना: यदि आप मां दुर्गा को लाल वस्त्र में देखते हैं, तो यह भी एक शुभ संकेत है। इसका अर्थ है कि आपका भविष्य अच्छा होने वाला है। आपके रिश्तों में मधुरता बढ़ेगी और उन्नति, तरक्की मिलने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही, संतान की ओर से भी खुशी की प्राप्ति होगी। अविवाहित लोगों को शादी का रिश्ता भी आ सकता है। सपने में श्रृंगार किये माता को देखना: अगर आपने सपने में श्रृंगार किये माता रानी को देखा है तो यह भी शुभ माना जाता है। Maa Durga in dreams स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इसका अर्थ है कि Maa Durga in dreams आपके जीवन में खुशियां आने वाली हैं और सकारात्मकता का वास होगा। आने वाले समय में आपको कोई शुभ समाचार मिल सकती है। वहीं, शादीशुदा लोगों की समस्याएं भी दूर हो सकती हैं। अशुभ संकेत माने जाने वाले मां दुर्गा के सपने:Dreams of Maa Durga considered inauspicious sign सपने में मां दुर्गा को दुखी या रोते हुए देखना: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में अगर कोई व्यक्ति मां दुर्गा को दुखी या रोते हुए देखता है, तो यह अशुभ माना जाता है। ऐसे में कार्य क्षेत्र या व्यापार में हानि हो सकती है। Durga in dreams किसी अपने से धोखा मिलने की आशंका होती है। पैसों की तंगी बढ़ सकती है, जिससे कर्ज लेने तक की नौबत आ सकती है। इसके साथ ही, पारिवारिक क्लेश बढ़ने की संभावना भी होती है। निष्कर्ष सपने में मां दुर्गा के दर्शन कई प्रकार के अर्थ रखते हैं, जो आपके जीवन में महत्वपूर्ण बदलावों का संकेत हो सकते हैं। Maa Durga in dreams यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये व्याख्याएं स्वप्न शास्त्र और सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें। Mystery of dreams: सपनों का रहस्य रोने और परीक्षा छूटने के सपनों का क्या है मतलब ?

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Lord Rama

Where Does Lord Rama Stayed During 14 Years Of Exile: 14 वर्ष के वनवास के दौरान इन स्थानों पर ठहरे थे भगवान श्रीराम

Lord Rama: रामायण की कथा अनुसार जब भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई के साथ 14 वर्षों के वनवास पर निकल गए थे तब उन्होंने यह समय भिन्न-भिन्न स्थानों पर व्यतीत किया था। आइए जानते हैं उन स्थानों के विषय में जहां श्रीराम ने अपना वनवास बिताया था। बस कुछ ही दिनों में भगवान श्रीराम का राजतिलक होने जा रहा था…. उनकी प्रजा में हर्ष की एक लहर जैसी थी…. लेकिन तब महारानी कैकेयी की दासी मंथरा ने अपनी धूर्त मानसिकता का परिचय देते हुए कैकेयी के मस्तिष्क में विष घोल दिया। उस धूर्त दासी ने कैकेयी को महाराज दशरथ का वो वरदान याद दिलवाया जिसके अनुसार वह उनसे कोई भी दो वरदान मांगने को कहा जिसे वह मना नहीं कर सकते। कैकेयी अपनी दासी मंथरा की बातों में आकर उसके भ्रम जाल में फंस गई और उसने राजा से वे वरदान मांगे जो कहीं ना कहीं रामायण का आधार बने…. पहला वरदान अपने पुत्र भरत को राजगद्द्दी और दूसरा और शायद सबसे कठोर राम को 14 वर्ष का वनवास…. !! कैकेयी के इन दो वरदान मांगने के पीछे भी कई रहस्य हैं… कुछ कहते हैं ईर्ष्या और लालच की वजह से कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राजगद्दी मांगी तो कुछ यह कहते हैं कि कैकेयी यह जानती थी कि राजा दशरथ की मृत्यु पुत्र वियोग की वजह से होगी…..या तो भगवान राम की मृत्यु या फिर वनवास। राम को बचाने के लिए ही कैकेयी ने उनके लिए वनवास मांगा था। Where Does Lord Rama Stayed During 14 Years Of Exile अनुज लक्ष्मण और माता सीता भी प्रभु राम Lord Rama के साथ वनवास के कष्ट भोगने साथ चले थे… इस दौरान उनके साथ क्या-क्या घटनाएं घटित हुई बहुत से लोग इन सभी बातों से अवगत हैं लेकिन शायद आप इस बात से अवगत ना हों कि ये 14 वर्ष उन्होंने कहां-कहां बिताए थे। तो चलिए आपको बताते हैं वनवस का समय प्रभु राम ने कहां-कहां बिताया था। अयोध्या से विदा लेने के पश्चात भगवान Lord Rama राम अपने अनुज और पत्नी के साथ रथ पर बैठकर आर्य सुमंत के साथ तमसा नदी के तट तक पहुंचे थे। तट तक छोड़ने के लिए अयोध्या की प्रजा भी उनके साथ आई थी क्योंकि वह अपने प्रभु को अकेले जाने नहीं दे रही। रात को अपनी प्रजा के साथ प्रभु राम ने वहीं विश्राम किया और सुबह बिना किसी को जगाए मता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ नगर छोड़कर चले गए। कौशल नगरी से प्रस्थान करने के बाद भगवान राम Lord Rama अपने मित्र निषादराज गुह की नगरी श्रृंगवेरपुर के नजदीक वनों में पहुंचे और वहां एक दिन का विश्राम किया। उनके मित्र गुह ने उनका सत्कार किया और अगले दिन उन्होंने सुमंत को रथ लेकर अयोध्या लौट जाने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पैदल यात्रा आरंभ की… तत्पश्चात उन्होंने केवट के सहारे गंगा नदी को पार किया और कुरई गांव में उतरे। गंगा पार करने के बाद श्रीराम माता सीता, लक्ष्मण तथा निषादराज गुह के साथ प्रयाग की ओर प्रस्थान कर गए…जहां से वे आगे ऋषि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे। उन्होंने भारद्वाज ऋषि से अपने रहने के लिए उत्तम स्थान पूछा जिन्होंने यमुना पार चित्रकूट का नाम उन्हें सुझाया। भारद्वाज ऋषि के आश्रम से ही उन्होंने अपने मित्र निषादराज को वापिस लौट जाने का आदेश दिया और स्वयं अपने भाई लक्ष्मण और देवी सीता के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े। चित्रकूट पहुंचने पर उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में उनसे भेंट की और मंदाकिनी नदी के किनारे कल्पवास किया। भरत इसी स्थान पर उनसे मिलने पहुंचे थे। इसके कुछ समय पश्चात श्रीराम चित्रकूट से भी चले गए क्योंकि उन्हें यह भय था कि अयिध्या की प्रजा उनसे मिलने यहां आ सकती है, जिससे ऋषि-मुनियों की तपस्या में विघ्न पड़ेगा। दंडकारण्य में पहुंचकर सर्वप्रथम उन्होंने ऋषि अत्री तथा माता अनुसूया के आश्रम पहुंचकर उनसे भेंट की। माता अनुसूया से माता सीता को विभिन्न प्रकार के आभूषण और वस्त्र प्रदान किए… उनसे मिलने के पश्चात वे पुन: अपनी यात्रा के लिए निकल पड़े। Lord Rama श्रीराम ने अपने वनवास काल का ज्यादातर समय दंडकारण्य के वनों में ही बिताया था…यहां उनकी भेंट महान ऋषि अगस्त्य से हुई। अगस्त्य मुनि ने ही उन्हें प6चवटी जाकर निवास करने को कहा था। ऋषि अगस्त्य से आज्ञा पाकर Lord Rama भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी की ओर निकल गए जहां एक कुटीया बनाकर वे रहने लगे। यहां उनकी भेंट जटायु से हुई…जो उनकी कुटिया की रक्षा में प्रहरी के तौर पर तैनात रहते थे। यहीं शूर्पनखा ने Lord Rama श्रीराम और लक्ष्मण को देखा था और यहीं से माता सीता का हरण राक्षस राज रावण द्वारा हुआ था। Lord Rama श्रीराम और लक्ष्मण माता सीता को ढूंढते हुए फिर यहां से निकल गए थे।

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Shri Navadurgasvarupanusandhana Stuti: श्री नवदुर्गास्वरूपानुसन्धानस्तुतिः

Shri Navadurgasvarupanusandhana Stuti: श्री नवदुर्गास्वरूपानुसन्धानस्तुतिः वक्ष्येऽहं नव दुर्गायाः स्वरूपाण्यधुना क्रमात् । प्रथमा वन दुर्गा स्यात् शूलिन्याख्या द्वितीयिका ॥ १॥ तृतीया जातवेदास्तु शान्तिदुर्गा चतुर्थिका । पञ्चमी शबरी दुर्गा ज्वलद् दुर्गा च षष्ठिका ॥ २॥ सप्तमी लवणाभिख्या दीपदुर्गा तथाऽष्टमी । नवमी ह्यासुरी दुर्गा प्रोक्ता एता नवाम्बिकाः ॥ ३॥ पुरा भण्डमहायुद्धे ललिताम्बाऽट्टहासतः । आविर्भूता इमा देव्यः मध्वाद्यसुरभीकराः ॥ ४॥ स्मरणादर्चनात्तासां जपात् दुर्गाणि मानवाः । तरन्ति तरसा नान्यो ह्युपायोऽस्ति कलौ युगे ॥ ५॥ दुःखेन शत्रुभिर्गन्तुमशक्यत्वात् यतोऽम्बिका । दुर्गेति कथिता शम्भुं समरोद्युक्तमाश्रिता ॥ ६॥ दुर्गात् सन्त्रायते यस्मात् देवी दुर्गेति कथ्यते । प्रपद्ये शरणं देवि चेत्याहाथर्वणी श्रुतिः ॥ ७॥ आक्रीडायां भवानी सा शम्भोः कोपे तु काळिका । जगतां पालने विष्णुः युद्धे दुर्गा शिवप्रिया ॥ ८॥ समष्टि व्यष्टि भेदेन द्विधा तन्मूर्तिरीरिता । समष्टिरेव सर्वत्र पूज्यते हि द्विजातिभिः ॥ ९॥ विख्याता सर्वदा दुर्गा महिषासुरमर्दिनी । समष्टिरूपिणी देवी नवदुर्गात्मिका शिवा ॥ १०॥ विन्ध्यदर्पविनाशार्थमगस्त्येन वने पुरा । या दुर्गा पूजिता तस्मात् वनदुर्गेति कीर्तिता ॥ ११॥ त्रिपुराणां महायुद्धे वहन्ती शूलमायुधम् । शम्भोः वामगता दुर्गा तस्मात् सा शूलिनी मता ॥ १२॥ जातवेदः स्वरूपा या गङ्गां नयति शाम्भवम् । वीर्यं तस्मात् जातवेदोदुर्गेति प्रथिता भुवि ॥ १३॥ ऋणरोगपिशाचादि सर्वोपद्रव नाशनात् । रुद्रकोपप्रशमनात् शान्ति दुर्गेति कीर्तिता ॥ १४॥ या पार्थस्यानुग्रहार्थं शबरात्मानमीश्वरम् । पुरा वने ह्यनुगता तस्मात्सा शबरी मता ॥ १५॥ रक्षार्थं शक्तिसेनास्ताः पुरा भण्डासुराहवे । अभिजज्वाल शिबिरं ज्वलद् दुर्गा ततो मता ॥ १६॥ लवणासुर संहृत्यै लक्ष्मणेन समर्चिता । या पुरा रामविनुता सा दुर्गा लवणाभिधा ॥ १७॥ हार्दान्धकारं या दुर्गा वारयन्त्याशु योगिनाम् । दीपवत्तिमिरं सा स्यात् दीपदुर्गा सुखप्रदा ॥ १८॥ असुरान् मोहयन्ती या पुराऽयच्छत् सुधारसम् । सुरेभ्यः साऽऽसुरी दुर्गा कीर्तिता सर्वसिद्धिदा ॥ १९॥ समष्टिदुर्गा अरिशङ्खकृपाण खेट बाणान्सधनुश्शूलक तर्जनीर्दधाना । मम सा महिषोत्तमाङ्गसंस्था नवदुर्गासदृशी श्रियेऽस्तु दुर्गा ॥ २०॥ १. वनदुर्गाध्यानम् । सौवर्णाम्बुज मध्यगां त्रिनयनां सौदामिनी सन्निभां शङ्खं चक्रवराभयानि दधतीमिन्दोः कलां बिभ्रतीम् । ग्रैवेयाङ्गद हार कुण्डलधरामाखण्डलाद्यैः स्तुतां ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनीं शशिमुखीं पार्श्वस्थपञ्चाननाम् ॥ २१॥ २. शूलिनीदुर्गाध्यानम् । अध्यारूढां मृगेन्द्रं सजलजलधरश्यामळां हस्त पद्मैः शूलं बाणं कृपाणीमरिजलजगदाचापपाशान्वहन्तीम् । चन्द्रोत्तंसां त्रिनेत्रां चतसृभिरसिना खेटकं बिभ्रतीभिः कन्याभिः सेव्यमानां प्रतिभटभयदां शूलिनीं भावयामि ॥ २२॥ ३. जातवेदोदुर्गाध्यानम् । विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवाळखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्चक्रधरासिखेट विशिखान् पाशाङ्कुशौ तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥ २३॥ ४. शान्तिदुर्गाध्यानम् । रोगोपद्रव शत्रुभीति विविध क्रूराहि शूकोल्बणोद्- दुष्टारिष्टपिशाचजा बहुविधास्ता आपदो ह्यामयाः । यद्ध्यानात्प्रशमं प्रयान्ति सहसा सा शान्तिदुर्गाऽवतात् हस्ताश्लिष्टवरत्रिशूल कमलाभीतिर्मृगेन्द्रासना ॥ २४॥ ५. शबरीदुर्गाध्यानम् । गुञ्जाफलाकल्पित हाररम्यां श्रुत्योः शिखण्डं शिखिनो वहन्तीम् । कोदण्डबाणौ दधतीं कराभ्यां कटिस्थवल्कां शबरीं स्मरामि ॥ ६. ज्वलद्दुर्गाध्यानम् । ज्वालामालावलीढा ज्वलनशरधनुश्शङ्खचक्रासिखेटान् शूलं सन्तर्जनीं या करसरसिरुहैस्सन्दधाना त्रिनेत्रा । और्वाग्निं सङ्किरन्ती रणभुवि दितिजान्नाशयन्ती परा सा दुर्गा जाज्वल्यमाना भवतु मम सदा सिंहसंस्था पुरस्तात् ॥ २६॥ ७. लवणदुर्गाध्यानम् । करकमल विराजच्चक्रशङ्खासिशूला परिलसितकिरीटा पाटितानेकदैत्या । त्रिनयनलसिताङ्गी तिग्मरश्मिप्रकाशा पवनसखनिभाङ्गी लावणी पातु दुर्गा ॥ २७॥ ८. दीपदुर्गाध्यानम् । दीपान्तर्ज्वलितारविन्दसदृशा सिंहासनस्था शिवा शूलेष्वासशरारि शङ्ख कमलाभीतीष्ट हस्तोज्ज्वला । सम्पूज्याऽमरलोक वासिभिरसावाखेलयन्ती मुदा स्वाभादीप्तनिशा महेशरमणी दुर्गाम्बिका रक्षतात् ॥ २८॥ ९. आसुरीदुर्गाध्यानम् । शरच्चन्द्रकान्तिर्वराभीतिशूलान् सृणिं हस्तपद्मैर्दधानाऽम्बुजस्था । विभूषाम्बराढ्याऽहियज्ञोपवीता मुदोऽथर्वपुत्री करोत्वासुरी नः ॥ २९॥ समष्टिस्तुतिः । नवीकृताकारधराऽपि याऽनवीकृताऽविकारापि विकाररूपिणी । विसर्गरूपाऽप्यविसर्गरक्षणोन्मुखी सदा रक्षतु सा नवात्मिका ॥ ३०॥ दुर्गे शूलिनि जातवेदसि महाशान्त्याह्वये शाबरि ज्वालादुर्गवराभिधे लवणगे दीपाभिधे ह्यासुरि । एह्यम्बे पुरतो ममाद्य भयकृद्रोगारि पीडादिमान् विध्वस्तान् कुरु देहि सौख्यमतुलं भक्तिं तथाऽव्याहताम् ॥ ३१॥ फलाशंसनम् । नवदुर्गास्वरूपानुसन्धायकमनुत्तमम् । इदं स्तोत्रवरं नित्यं यः पठेत् सर्वसिद्धिदम् ॥ ३२॥ त्रिकालं ह्येककालं वा सङ्कान्तावयने तथा । विषौ दर्शे पौर्णमास्यामष्टम्यां भौमवासरे ॥ ३३॥ शुक्रवारे चतुर्दश्यां रोहिण्यां वा विशेषतः । कृष्णाङ्गारचतुर्दश्यां भौमाश्विन्यां पठेदिदम् ॥ ३४॥ महामृत्युं च तरति महादुर्गाणि शीघ्रतः । निशीथिन्यां जपेदेतत् वाक्सिद्धिरपि लभ्यते ॥ ३५॥ सर्वान् कामानवाप्रोति सर्वसिद्धिञ्च विन्दति । अत्युत्पातभये जाते रोगोपद्रवसम्भवे ॥ ३६॥ ऋणे बन्धे च यो धीमान् नवदुर्गां हृदि स्मरन् । पठेदाशु सुखं याति महादेव्याः प्रसादतः ॥ ३७॥ गोपनीयमिदं स्तोत्रं नात्र कार्या विचारणा । नवदुर्गा महाविद्या नवधा ह्युद्धृताश्च ताः ॥ ३८॥ जपित्वाऽन्ते पठेदेतत् स्तोत्रं तस्याणिमादयः । वशं यान्ति न सन्देहो नवदुर्गा प्रसीदति ॥ ३९॥ एवं यो हृदि भावयन् स्तुतिमिमां सङ्कीर्तयन् प्रत्यहं मन्त्राणां नवकं नवाकृतिधरां दुर्गामुपास्ते शिवाम् । संयात्याशु मनो विचिन्तितफलं सन्तानसत्सम्पदः कान्ताभूधनधान्यवर्गमतुलां पुष्टिं च निर्वैरताम् ॥ ४०॥ (अथर्वण रहस्ये श्री दक्षिणामूर्तिसंहितायां विद्याम्नाय कल्पतः) इति श्री नवदुर्गास्वरूपानुसन्धानस्तुतिः समाप्ता ।

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Shri Durgastavanam: श्रीदुर्गास्तवनम्

Shri Durgastavanam: श्रीदुर्गास्तवनम् महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती शिवे ।जगदम्बे महामाये शक्तिरूपे नमोऽस्तुते ॥ १॥ सुमाङ्गल्ये महेशानि सच्चिदानन्दरूपिणे ।सर्वदुःख हरे देवि मातर्दुर्गे नमोऽस्तुते ॥ २॥ सिंहस्कन्धसमारूढे सशस्त्रैर्समलङ्कृते ।अभयं कुरु मे मात तस्यैनित्यै नमो नमः ॥ ३॥ सृष्टि स्थितिलय कर्त्री परिपूर्णाच सर्वदा ।गौराङ्गीदैत्यदमनीं मातर्तस्यै नमो नमः ॥ ४॥ भक्तानां सुखदां नित्यां योगक्षेमकरीं सदा ।भयान्मे त्राहित्वन्नित्यं दुर्गेदेवि नमोऽस्तुते ॥ ५॥ शरणागतदीनानामार्तित्राण परायणे ।संसारभयनाशिन्यै देव्यैतस्यै नमो नमः ॥ ६॥ उमासती दाक्षायणी पार्वती त्वां वरानने ।सर्वत्रास हरे देवि महेशानि नमोऽस्तुते ॥ ७॥ सच्चिदानन्दरूपायै धात्र्यैशान्त्यै नमो नमः ।अनन्तभूति पूर्णायै देव्यैतस्यै नमो नमः ॥ ८॥ अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायिके परमेश्वरि ।सन्मतिदान शिलायै तस्यैदेव्यै नमो नमः ॥ ९॥ अजरामरकारिण्यै भुक्तिमुक्तिञ्चसम्पदम् ।अनन्त धनधान्यादि दात्र्यैदेव्यै नमो नमः ॥ १०॥ इति श्री स्वामी उमेश्वरानन्दतीर्थविरचितं दुर्गास्तवनं अथवा श्रीनवदुर्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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ShrIchaNDIdhvajastotram: श्रीचण्डीध्वजस्तोत्रम्

ShrIchaNDIdhvajastotram: श्रीचण्डीध्वजस्तोत्रम् अस्य श्री चण्डीध्वज स्त्रोत्र महामन्त्रस्य । मार्कण्डेय ऋशिः ।अनुश्तुप् छन्दः । श्रीमहालक्ष्मीर्देवता । श्रां बीजम् । श्रीं शक्तिः ।श्रूं कीलकम् । मम वाञ्छितार्थ फलसिद्ध्यर्थं विनियोगः ।अङ्गन्यसः ।श्रां श्रीं श्रुं श्रैं श्रौं श्रः इति कर हृदयादिन्यासौ । श्यानन् ।ॐ श्रीं नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै भूत्यै नमो नमः ।परमानन्दरूपायै नित्यायै सततं नमः ॥ १ ॥ नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २ ॥ रक्षमां शरण्ये देवि धन-धान्य-प्रदायिनि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ३ ॥ नमस्तेऽस्तु महाकाली परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ४ ॥ नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मी परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ५ ॥ महासरस्वती देवी परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ६ ॥ नमो ब्राह्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ७ ॥ नमो महेश्वरी देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ८ ॥ नमस्तेऽस्तु च कौमारी परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ९ ॥ नमस्ते वैष्णवी देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १० ॥ नमस्तेऽस्तु च वाराही परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ११ ॥ नारसिंही नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १२ ॥ नमो नमस्ते इन्द्राणी परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १३ ॥ नमो नमस्ते चामुण्डे परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १४ ॥ नमो नमस्ते नन्दायै परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १५ ॥ रक्तदन्ते नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १६ ॥ नमस्तेऽस्तु महादुर्गे परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १७ ॥ शाकम्भरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १८ ॥ शिवदूति नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ १९ ॥ नमस्ते भ्रामरी देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २० ॥ नमो नवग्रहरूपे परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २१ ॥ नवकूट महादेवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २२ ॥ स्वर्णपूर्णे नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २३ ॥ श्रीसुन्दरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २४ ॥ नमो भगवती देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २५ ॥ दिव्ययोगिनी नमस्ते परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २६ ॥ नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २७ ॥ नमो नमस्ते सावित्री परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २८ ॥ जयलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ २९ ॥ मोक्षलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरूपिणि ।राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥ ३० ॥ चण्डीध्वजमिदं स्तोत्रं सर्वकामफलप्रदम् ।राजते सर्वजन्तूनां वशीकरण साधनम् ॥ ३२ ॥ ॥ श्रीचण्डीध्वज स्तोत्रम् ॥

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